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Languages : हिंदी | नेपाली | _____________________________________ QA : Verse no. 2.52 . Bhagavad Gita Multilingual . प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या २.५२ . प्रश्न १ : वेदों का मुख्य उद्देश्य क्या है ? कृष्णभावनाभावित भक्त क्यों वेदों के विधि विधानों से उदासीन हो जाता है? . उत्तर १ : "वैदिक रस्में तथा अनुष्ठान यथा त्रिकाल संध्या, प्रातःकालीन स्नान, पितृ-तर्पण आदि नवदीक्षितों के लिए अनिवार्य हैं | किन्तु जब कोई पूर्णतया कृष्णभावनाभावित हो और कृष्ण की दिव्य प्रेमभक्ति में लगा हो, तो वह इन विधि-विधानों के प्रति उदासीन हो जाता है, क्योंकि उसे पहले ही सिद्धि प्राप्त हो चुकी होती है | यदि कोई परमेश्र्वर कृष्ण की सेवा करके ज्ञान को प्राप्त होता है तो उसे शास्त्रों में वर्णित विभिन्न प्रकार की तपस्याएँ तथा यज्ञ करने की आवश्यकता नहीं रह जाती | इसी प्रकार जो यह नहीं समझता कि वेदों का उद्देश्य कृष्ण तक पहुँचना है और अपने आपको अनुष्ठानादि में व्यस्त रखता है, वह केवल अपना समय नष्ट करता है | कृष्णभावनाभावित व्यक्ति शब्द-ब्रह्म की सीमा या वेदों तथा उपनिषदों की परिधि को भी लाँघ जाते हैं |" . संदर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता २.५२, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद . ****अब आप ये प्रश्नोत्तर हमारी एंड्राइड एप्प के माध्यम से सीधे अपने फ़ोन में भी पा सकते हैं | कृपया हमारी एप्प सबसे ऊपर दिए गए लिंक से डाउनलोड करें | (Bhagavad Gita Multilingual) __________________________________________ प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या २.५२ . प्रश्न १: वेदको मुख्य उद्देश्य के हो? किन कृष्ण दिमागका भक्तहरू वेदको नियममा बेवास्ता गर्छन्? . उत्तर १ : "वैदिक विधिविधान अन्तर्गत पर्ने सबै किसिमका त्रिकाल सन्ध्याहरु, प्रात:कालीन स्नान, पितृतर्पण, इत्यादिलगायतका कुराहरु नवदीक्षितहरुका लागि मात्र अनिवार्य हुन्छन् तर जो पूर्णरुपले कृष्णभावनामा छ, कृष्णकै दिव्य सेवामा संलग्न छ त्यो व्यक्त्ति यी सारा विधिविधानप्रति उदासीन रहेको हुन्छ, किनभने यसबाट पाइने पूर्णता उसले पहिले नै प्राप्त गरिसकेको हुन्छ | यदि कुनै व्यक्त्ति भगवान् कृष्णको सेवा गरेर ज्ञानका स्तरमा पुगेको छ भने उसले शास्त्रहरुमा भनिएका विविध किसिमका तपस्या र यज्ञहरु सम्पादन गरिरहनु आवश्यक छैन | यसै गरी यदि कसैले वेदको लक्ष्य कृष्णसम्म पुग्नु हो भन्ने कुरा बुझेको छैन र यस्तै यज्ञानुष्ठानमा लागिरहेको छ भने, त्यसले निरर्थक समय नष्ट गरिरहेछ भन्ने बुझ्नु पर्दछ | कृष्णभावनामा रहेको व्यक्त्ति शव्दब्रह्मको सीमाभन्दा पनि पर पुगेको हुन्छ वा वेद र उपनिषदहरुको परिधिभन्दा पनि माथि उठिसकेको हुन्छ |" . संदर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता २.५२, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद . ****अब आप ये प्रश्नोत्तर हमारी एंड्राइड एप्प के माध्यम से सीधे अपने फ़ोन में भी पा सकते हैं | कृपया हमारी एप्प सबसे ऊपर दिए गए लिंक से डाउनलोड करें | (Bhagavad Gita Multilingual) ___________________________________________

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*कृपया प्रश्नों के उत्तर कमेंट्स में दें* आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- 2.53 अध्याय 2: गीता का सार . . श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्र्चला | समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि || ५३ || . . श्रुति – वैदिक ज्ञान के; विप्रतिपन्ना – कर्मफलों से प्रभावित हुए बिना; ते – तुम्हारा; यदा – जब; स्थास्यति – स्थिर हो जाएगा; निश्र्चला – एकनिष्ठ; समाधौ – दिव्य चेतना या कृष्णभावनामृत में; अचला – स्थिर; बुद्धिः – बुद्धि; तदा – तब; योगम् – आत्म-साक्षात्कार; अवाप्स्यसि – तुम प्राप्त करोगे | . . जब तुम्हारा मन वेदों की अलंकारमयी भाषा से विचलित न हो और वह आत्म-साक्षात्कार की समाधि में स्थिर हो जाय, तब तुम्हें दिव्य चेतना प्राप्त हो जायेगी | . . तात्पर्यः ‘कोई समाधि में है’ इस कथन का अर्थ यह होता है कि वह पूर्णतया कृष्णभावनाभावित है अर्थात् उसने पूर्ण समाधि में ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् को प्राप्त कर लिया है | आत्म-साक्षात्कार की सर्वोच्च सिद्धि यह जान लेना है कि मनुष्य कृष्ण का शाश्र्वत दास है और उसका एकमात्र कर्तव्य कृष्णभावनामृत में अपने सारे कर्म करना है | कृष्णभावनाभावित व्यक्ति या भगवान् के एकनिष्ट भक्त को न तो वेदों की अलंकारमयी वाणी से विचलित होना चाहिए न ही स्वर्ग जाने के उद्देश्य से सकाम कर्मों में प्रवृत्त होना चाहिए | कृष्णभावनामृत में मनुष्य कृष्ण के सान्निध्य में रहता है और कृष्ण से प्राप्त सारे आदेश उस दिव्य अवस्था में समझे जा सकते हैं | ऐसे कार्यों के परिणामस्वरूप निश्चयात्मक ज्ञान की प्राप्ति निश्चित है | उसे कृष्ण या उनके प्रतिनिधि गुरु की आज्ञाओं का पालन मात्र करना होगा | . प्रश्न १ : आत्म-साक्षात्कार की सर्वोच्च सिद्धि क्या है ? इसे प्राप्त करने की क्या विधि है? . अब आप हमारी भगवद्गीता एप्प में माध्यम से भी ये श्लोक(चित्र व प्रश्नोत्तर सहित) सीधे अपने एंड्राइड फ़ोन में पा सकते हैं | कृपया हमारी एंड्राइड एप्प यहाँ से डाउनलोड करें : Bhagavad Gita Multilingual

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Y.R.Singh May 10, 2020

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Languages : | हिंदी | नेपाली | __________________________________________ प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या २.५१ . Bhagavad Gita Multilingual प्रश्न १ : संसार में सर्वत्र जीवन में कौन-कौन से चार प्रकार के दुःख पाए जाते हैं ? इन दुखों का मुख्य कारण क्या है ? मनुष्य किस प्रकार इन दुखों से छुटकारा पा सकता है ? . उत्तर १ : "अज्ञानवश मनुष्य यह नहीं समझ पाता कि यह भौतिक जगत् ऐसा दुखमय स्थान है जहाँ पद-पद पर संकट हैं | केवल अज्ञानवश अल्पज्ञानी पुरुष यह सोच कर कि कर्मों से वे सुखी रह सकेंगे सकाम कर्म करते हुए स्थिति को सहन करते हैं | उन्हें यह ज्ञात नहीं है कि इस संसार में कहीं भी कोई शरीर दुखों से रहित नहीं है | संसार में सर्वत्र जीवन के दुख-जन्म, मृत्यु, जरा तथा व्याधि – विद्यमान हैं | किन्तु जो अपने वास्तविक स्वरूप को समझ लेता है और इस प्रकार भगवान् की स्थिति को समझ लेता है , वही भगवान् की प्रेमा-भक्ति में लगता है | फलस्वरूप वह वैकुण्ठलोक जाने का अधिकारी बन जाता है जहाँ न तो भौतिक कष्टमय जीवन है न ही काल का प्रभाव तथा मृत्यु है | अपने स्वरूप को जानने का अर्थ है भगवान् की अलौकिक स्थिति को भी जान लेना | जो भ्रमवश यह सोचता है कि जीव की स्थिति तथा भगवान् की स्थिति एकसमान हैं उसे समझो कि वह अंधकार में है और स्वयं भगवद्भक्ति करने में असमर्थ है | वह अपनेआपको प्रभु मान लेता है और इस तरह जन्म-मृत्यु की पुनरावृत्ति का पथ चुन लेता है | किन्तु जो यह समझते हुए कि उसकी स्थिति सेवक की है अपने को भगवान् की सेवा में लगा देता है वह तुरन्त ही वैकुण्ठलोक जाने का अधिकारी बन जाता है |" . संदर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता २.५१, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद . ****अब आप ये प्रश्नोत्तर हमारी एंड्राइड एप्प के माध्यम से सीधे अपने फ़ोन में भी पा सकते हैं | कृपया हमारी एप्प सबसे ऊपर दिए गए लिंक से डाउनलोड करें | (Bhagavad Gita Multilingual) ________________________________________ प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या २.५१ . प्रश्न १: कुन चार प्रकारका शोकहरू संसारमा जहाँसुकै जीवनमा पाइन्छन्? यी दु: खको मुख्य कारण के हो? यी दु: खबाट मानिस कसरी छुटकारा पाउन सक्छ? . उत्तर १ : "अज्ञानका कारणले गर्दा मानिसले यो भौतिक जगत् दु:खमय छ र यहाँ हरेक पाइलामा खतरा छ भन्ने कुरा बुझ्दैन | अज्ञानकै कारणले अल्पबुद्धि मनुष्यहरु सकाम कर्मद्वारा नै सुख पाइन्छ भन्ने ठानेर त्यस्तै कर्म गर्दै परिस्थितिसँग सामञ्जस्य गर्ने प्रयत्न गर्दछन् | तिनीहरु यो संसारमा कहीं पनि दुःखीरहित जीवन दिनसक्ने कुनै भौतिक शरीर छैन भन्ने कुरा बुझ्दैनन् | जन्म, मृत्यु, बुढ्यौली र रोग जस्ता जीवनका कष्टहरु यो संसारमा जहाँतहींं विधमान छन् | तर जसले भगवानको नित्य सेवकका रुपमा आफ्नो वास्तविक अस्तित्त्वलाई बुझेको छ, र यसै गरी जसले भगवानको स्वरुपलाई पनि बुझेको छ, त्यही व्यक्त्तिले आफूलाई भागावान्को प्रेमाभक्त्तिमा संलग्न गराउन सक्दछ | अनि मात्र त्यो व्यक्त्ति वैकुण्ठ लोकमा जानयोग्य हुन्छ | वैकुण्ठ लोकमा भौतिक जगतमा जस्तो कष्टमय जीवन छैन र त्यहाँ समय र मृत्युको प्रभाव पनि हुँदैन | आफ्नो वास्तविक स्वरुपको जानकारी पाउनुको अर्थ हो भगवान्को अलौकिक स्वरुपको पनि जानकारी पाउनु | जसले भ्रमवश जीवात्माको अवस्थालाई र परमात्माको अवस्थालाई एउटै स्तरको भन्ने बुझेको छ, त्यो व्यक्त्ति अन्धकारमा छ भन्ने बुझ्नु पर्दछ र ऊ आफूलाई भगवानको भक्त्तिमा लगाउन पनि असमर्थ हुन्छ | जसले आफूलाई भगवान् ठान्दछ त्यसले बारम्बार दोहोरिने जन्म र मृत्युको बाटोलाई पछ्याउँदै छ भन्ने बुझ्नुपर्छ | तर जसले आफूलाई भगवान्को सेवक ठानेर, सेवामा लगाउँछ त्यो व्यक्त्ति तुरुन्त वैकुण्ठलोकमा जान योग्य हुन्छ |" . संदर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता २.५१, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद . ****अब आप ये प्रश्नोत्तर हमारी एंड्राइड एप्प के माध्यम से सीधे अपने फ़ोन में भी पा सकते हैं | कृपया हमारी एप्प सबसे ऊपर दिए गए लिंक से डाउनलोड करें | (Bhagavad Gita Multilingual) _____________________________________

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Neetu May 9, 2020

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*कृपया प्रश्नों के उत्तर कमेंट्स में दें* आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- 2.52 अध्याय 2: गीता का सार . . यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति | तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च || ५२ || . . यदा – जब; ते – तुम्हारा; मोह – मोह के; कलिलम् – घने जंगल को; बुद्धिः – बुद्धिमय दिव्य सेवा; वयतितरिष्यति – पार कर जाति है; तदा – उस समय; गन्ता असि – तुम जाओगे; निर्वेदम् – विरक्ति को; श्रोतव्यस्य – सुनने योग्य के प्रति; श्रुतस्य – सुने हुए का; च – भी | . . जब तुम्हारी बुद्धि मोह रूपी सघन वन को पार कर जायेगी तो तुम सुने हुए तथा सुनने योग्य सब के प्रति अन्यमनस्क हो जाओगे | . . तात्पर्यः भगवद्भक्तों के जीवन में ऐसे अनेक उदाहरण प्राप्त हैं जिन्हें भगवद्भक्ति के कारण वैदिक कर्मकाण्ड से विरक्ति हो गई | जब मनुष्य श्रीकृष्ण को तथा उनके साथ अपने सम्बन्ध को वास्तविक रूप में समझ लेता है तो वह सकाम कर्मों के अनुष्ठानों के प्रति पूर्णतया अन्यमनस्क हो जाता है, भले ही वह अनुभवी ब्राह्मण क्यों न हो | भक्त परम्परा में महान भक्त तथा आचार्य श्री माधवेन्द्रपुरी का कहना है – . सन्ध्यावन्दन भद्रमस्तु भवतो भोः स्नान तुभ्यं नमो | भो देवाः पितरश्र्च तर्पणविधौ नाहं क्षमः क्षम्यताम् || यत्र क्कापि निषद्य यादव कुलो त्तमस्य कंस दविषः | स्मारं स्मारमद्यं हरामि तदलं मन्ये किमन्येन मे || . “हे मेरी त्रिकाल प्रार्थनाओ, तुम्हारी जय हो | हे स्नान, तुम्हें प्रणाम है | हे देवपितृगण, अब मैं आप लोगों के लिए तर्पण करने में असमर्थ हूँ | अब तो जहाँ भी बैठता हूँ, यादव कुलवंशी, कंस के हंता श्रीकृष्ण का ही स्मरण करता हूँ और इस तरह मैं अपने पापमय बन्धन से मुक्त हो सकता हूँ | मैं सोचता हूँ कि यही मेरे लिए पर्याप्त है |” . वैदिक रस्में तथा अनुष्ठान यथा त्रिकाल संध्या, प्रातःकालीन स्नान, पितृ-तर्पण आदि नवदीक्षितों के लिए अनिवार्य हैं | किन्तु जब कोई पूर्णतया कृष्णभावनाभावित हो और कृष्ण की दिव्य प्रेमभक्ति में लगा हो, तो वह इन विधि-विधानों के प्रति उदासीन हो जाता है, क्योंकि उसे पहले ही सिद्धि प्राप्त हो चुकी होती है | यदि कोई परमेश्र्वर कृष्ण की सेवा करके ज्ञान को प्राप्त होता है तो उसे शास्त्रों में वर्णित विभिन्न प्रकार की तपस्याएँ तथा यज्ञ करने की आवश्यकता नहीं रह जाती | इसी प्रकार जो यह नहीं समझता कि वेदों का उद्देश्य कृष्ण तक पहुँचना है और अपने आपको अनुष्ठानादि में व्यस्त रखता है, वह केवल अपना समय नष्ट करता है | कृष्णभावनाभावित व्यक्ति शब्द-ब्रह्म की सीमा या वेदों तथा उपनिषदों की परिधि को भी लाँघ जाते हैं | . प्रश्न १ : वेदों का मुख्य उद्देश्य क्या है ? कृष्णभावनाभावित भक्त क्यों वेदों के विधि विधानों से उदासीन हो जाता है? . अब आप हमारी भगवद्गीता एप्प में माध्यम से भी ये श्लोक(चित्र व प्रश्नोत्तर सहित) सीधे अपने एंड्राइड फ़ोन में पा सकते हैं | कृपया हमारी एंड्राइड एप्प यहाँ से डाउनलोड करें : Bhagavad Gita Multilingual

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*कृपया प्रश्नों के उत्तर कमेंट्स में दें* आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- 2.51 अध्याय 2: गीता का सार . . कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः | जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम् || ५१ || . . कर्म-जम् – सकाम कर्मों के कारण; बुद्धि-युक्ताः – भक्ति में लगे; हि – निश्चय ही; फलम् – फल; त्यक्त्वा – त्याग कर; मनीषिणः – बड़े-बड़े ऋषि मुनि या भक्तगण; जन्म-बन्ध – जन्म तथा मृत्यु के बन्धन से; विनिर्मुक्ताः – मुक्त; पदम् – पद पर; गच्छन्ति – पहुँचते हैं; अनामयम् – बिना कष्ट के | . . इस तरह भगवद्भक्ति में लगे रहकर बड़े-बड़े ऋषि, मुनि अथवा भक्तगण अपने आपको इस भौतिक संसार में कर्म के फलों से मुक्त कर लेते हैं | इस प्रकार वे जन्म-मृत्यु के चक्र से छूट जाते हैं और भगवान् के पास जाकर उस अवस्था को प्राप्त करते हैं, जो समस्त दुखों से परे है | . . तात्पर्यः मुक्त जीवों का सम्बन्ध उस स्थान से होता है जहाँ भौतिक कष्ट नहीं होते | भागवत में (१०.१४.५८) कहा गया है – . समाश्रिता से पदपल्लवप्लवं महत्पदं पुण्ययशो मुरारेः | भवाम्बुधिर्वत्सपदं परं पदं पदं पदं यद्विपदां न तेषाम् || . “जिसने उन भगवान् के चरणकमल रूपी नाव को ग्रहण कर लिया है, जो दृश्य जगत् के आश्रय हैं और मुकुंद नाम से विख्यात हैं अर्थात् मुक्ति के दाता हैं, उसके लिए यह भवसागर गोखुर में समाये जल के समान है | उसका लक्ष्य परं पदम् है अर्थात् वह स्थान जहाँ भौतिक कष्ट नहीं है या कि वैकुण्ठ है; वह स्थान नहीं जहाँ पद-पद पर संकट हो |” . अज्ञानवश मनुष्य यह नहीं समझ पाता कि यह भौतिक जगत् ऐसा दुखमय स्थान है जहाँ पद-पद पर संकट हैं | केवल अज्ञानवश अल्पज्ञानी पुरुष यह सोच कर कि कर्मों से वे सुखी रह सकेंगे सकाम कर्म करते हुए स्थिति को सहन करते हैं | उन्हें यह ज्ञात नहीं है कि इस संसार में कहीं भी कोई शरीर दुखों से रहित नहीं है | संसार में सर्वत्र जीवन के दुख-जन्म, मृत्यु, जरा तथा व्याधि – विद्यमान हैं | किन्तु जो अपने वास्तविक स्वरूप को समझ लेता है और इस प्रकार भगवान् की स्थिति को समझ लेता है , वही भगवान् की प्रेमा-भक्ति में लगता है | फलस्वरूप वह वैकुण्ठलोक जाने का अधिकारी बन जाता है जहाँ न तो भौतिक कष्टमय जीवन है न ही काल का प्रभाव तथा मृत्यु है | अपने स्वरूप को जानने का अर्थ है भगवान् की अलौकिक स्थिति को भी जान लेना | जो भ्रमवश यह सोचता है कि जीव की स्थिति तथा भगवान् की स्थिति एकसमान हैं उसे समझो कि वह अंधकार में है और स्वयं भगवद्भक्ति करने में असमर्थ है | वह अपनेआपको प्रभु मान लेता है और इस तरह जन्म-मृत्यु की पुनरावृत्ति का पथ चुन लेता है | किन्तु जो यह समझते हुए कि उसकी स्थिति सेवक की है अपने को भगवान् की सेवा में लगा देता है वह तुरन्त ही वैकुण्ठलोक जाने का अधिकारी बन जाता है | भगवान् की सेवा कर्मयोग या बुद्धियोग कहलाती है, जिसे स्पष्ट शब्दों में भगवद्भक्ति कहते हैं | . प्रश्न १ : संसार में सर्वत्र जीवन में कौन-कौन से चार प्रकार के दुःख पाए जाते हैं ? इन दुखों का मुख्य कारण क्या है ? मनुष्य किस प्रकार इन दुखों से छुटकारा पा सकता है ? . अब आप हमारी भगवद्गीता एप्प में माध्यम से भी ये श्लोक(चित्र व प्रश्नोत्तर सहित) सीधे अपने एंड्राइड फ़ोन में पा सकते हैं | कृपया हमारी एंड्राइड एप्प यहाँ से डाउनलोड करें : Bhagavad Gita Multilingual

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Shiv Yadav May 8, 2020

फेस बुक ट्विटर पर यादवों के इतिहास को छिपाने की साजिश के विरुद्ध बहुत तेजी से जागरूकता अभियान जारी है । इसी बीच कुछ दूषित मानसिकता के लोग भी अपने आप को प्रदर्शित करने से रोक नही पा रहे हैं । एक उदाहरण आपके लिए पेश है और साथ ही पेश है उसका हश्र ....श्री कृष्ण के माता पिता को गाली देने वाले इस मूर्ख व्यक्ति पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रसंघ अध्यक्ष उदय प्रकाश यादव की शिकायत पर मुकदमा दर्ज हो चुका है । कानून के शासन में हम किसी को गाली नही दे रहे हैं हम सरकार से मांग कर रहे हैं ...किसी और से नही ...अगर बीच मे कोई कूदेगा तो कानूनी तौर पर ही उससे निपटा जाएगा । ऐसे लोगों के खिलाफ हम हर स्तर पर लड़ेंगे ... गजेन्द्र सिंह यादव एडवोकेट हाई कोर्ट , इलाहाबाद

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Meena Sharma May 10, 2020

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