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*🌹☘🍃🥬🥬🌲🌲🌲गुप्त नवरात्रियों की आप सभी को शुभ कामनाएं*

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*🌹रामायण काल की ऐतिहासिकता का अहम हिस्सा है, दूनागिरी पर्वत*
*🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹दूनागिरी की सिंह वाहिनी, तेरी जयकार मां चन्द्रवदनी*
*🌹 ’रमाकांत पंत,प्रभारी उत्तराखण्ड़ आज*
दूनागिरी///’*’ताः सर्वाः पूजिताः पृथ्व्यां पुण्यक्षेत्रे च भारते*।
पूजिता सुरथेना दौ दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी*।।
*🌹ततः श्री रामचन्द्रेण रावणस्य वधार्थिना*
तत्पश्जाज्जगता। माता त्रिषु लोकेषु पूजिता।।
भगवती प्रकृति के वे सभी रूप पृथ्वी पर पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में पूजित है। सर्वप्रथम राजा सुरथ ने दुर्गति का नाश करने वाली दुर्गा देवी का पूजन किया था। तत्पश्चात रावण का वध करने की इच्छा से भी रामचन्द्र ने उनका पूजन किया था तभी से *🌹☘🍃🍃🌲🎄🥬जगतजननी दुर्गा तीनों लोकों में पूजित है। दूनागिरी की दुर्गा माता का विराट स्वरूप अनन्त व अगोचर है* इनकी महिमा को शब्दों में समेट पाने की क्षमता किसी में भी नहीं है।
हिमालय की वसुंधरा में बसे जनपद अल्मोडा का दूनागिरी क्षेत्र सदियों से आराधना का प्रसिद्ध केन्द्र रहा है। एक बार जो यहां पहुंच जाए, बार-बार यहां के दर्शनों की इच्छा रखता है। द्वाराहाट नगर से १४ किमी. दूर समुद्र सतह से १६५० मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह क्षेत्र समूचे उत्तराखण्ड में अपना विशिष्ट स्थान रखता है और रामायणकाल की ऐतिहासिकता की गवाही भी देता है। द्रोण पर्वत की चोटी पर आदिशक्ति महामाया दो पिण्डी के शिलाओं के रूप में दर्शन देकर भक्तों को निहाल करती है। *🌹☘☘🍃जानकार महात्मा इस शिखर को संजीवनी शिखर के नाम से भी पुकारते हैं। इन्हीं की कृपा से लक्ष्मण को संजीवनी प्राप्त हुई। रामायण काल की यादों को अपने आंचल में समेटे इस मंदिर के बारे में कहावत है कि त्रेता युग में राम-रावण युद्ध के दौरान जब लक्ष्मण को मेघनाथ के साथ युद्ध करते हुए शक्ति लग गई, तब लक्ष्मण को मूर्छा से जगाने के लिए सुषेन वैद्य ने हनुमान जी को द्रोर्णांचल पर्वत पर संजीवनी लेने भेजा। काफी प्रयासों के बाद भी वे संजीवनी को नहीं ढूंढ पाये तो उन्होंने समूचा द्रोणांचल पर्वत अपनी हथेली पर उठा लिया। कहा जाता है कि जब वे द्रोणांचल पर्वत को उठाकर लंका की ओर ले जा रहे थे तब पर्वत का एक हिस्सा टूटकर इस क्षेत्र में गिर गया और तब से यह क्षेत्र द्रोणागिरी के नाम से प्रसिद्ध हो गया और कालांन्तर में दूनागिरी के नाम से जाना जाने लगा। दूनागिरी पर्वत के आसपास धार्मिक महत्व के अनेकों पौराणिक स्थल मौजूद हैं। यह क्षेत्र प्राकृतिक दृष्टि से काफी मनमोहक है। *🌹बनवास काल के दौरान पाण्डवों ने भी अपना काफी समय मां दूनागिरी के सानिध्य में व्यतीत किया। दूनागिरी से आगे पाण्डवखोली काफी प्रसिद्ध व रमणीक स्थान है। भटकोट नामक पवित्र स्थल भी दूनागिरी के सामने ही स्थित है*। इसकी ऊंचाई ७०६६ मीटर है। यह इस क्षेत्र की सबसे ऊंची चोटी मानी जाती है।
मान्यता है कि यहां के जंगलों में पारस पत्थर भी उपलब्ध है। इस विषय में एक दन्त कथा भी प्रचलित है। वर्षों पहले एक बार एक महिला लोहे की दराती से यहां के जंगलों में घास काट रही थी कि घास काटते-काटते ही उस महिला की दराती पत्थर से टकराने के कारण सोने की हो गयी।
*🌹दूनागिरी मंदिर में स्थित दो शिला विग्रहों को शिव व शक्ति के रूप में भी पूजा जाता है। काली व दुर्गा के रूप में भी इनकी स्तुति होती है। श्रद्धावान भक्तजन बताते हैं कि शताब्दीयों पूर्व में राजा सुधारदेव ने दूनागिरी मंदिर में मूर्तियों की स्थापना की*। जगतगुरू शंकराचार्य ने ८वीं शताब्दी में इस स्थान पर आकर देवी का पूजन किया।
चैत्र व आश्विन माह एंव गुप्त नवरात्रि में यहां विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। इस क्षेत्र में जडी-बूटियों के अपार भण्डार बताया जाता है। यदि जडी-बूटियों के संरक्षण के लिए सार्थक प्रयास हो तो यह तमाम जडी-बूटियां लोगों को नवजीवन प्रदान करने में सहायक सिद्ध होंगी। उत्तराखण्ड को पर्यटन के क्षेत्र में अग्रणीय बनाने का दावा करने वाली वर्तमान सरकार इसके विकास के लिए क्या प्रयास करती है, यह अभी देखने का विषय है।
*🌹अभीष्ट सिद्धि की प्राप्ति के लिए यह शिखर अतुलनीय है, ’’ते सिद्धि यान्ति वै विप्राः प्रार्थितां सिद्धिनायकै।‘‘ इस पर्वत पर कालिका का पूजन करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। इनका पूजन काली के रूप में भी किया जाता है। ’’कालिका देवी द्रोणादि्रकुक्षिसंस्थिताम्‘‘ माना जाता है कि माता दूनागिरी के आंचल में विशल्यकरणी, सावर्ण्यकरिणी, सजीवकरणी तथा सन्धानी नामक महाऔषधियों का दिव्य भण्डार है। इन्हीं औषधियों से लक्ष्मण की मूर्छा भंग हुई। महर्षि भारद्वाज पुत्र द्रोणाचार्य की तपोभूमि के रूप में इस पर्वत की पुराणों में विशेष ख्याति है। समीपस्थ पर्वत लोध्र का जिसे भटकोट कहते हैं, उस पर्वत की महिमा भी आलौकिक है। *🌹दूर्नागिरी पर्वत पर महान युग संत भटकोटी जी के दर्शन होते हैं। जगत के कल्याण के लिए इन्होंने अपना जीवन माता दूनागिरी के चरणों में अर्पित कर दिया है*

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Gopal Sajwan"कुँजा जी" Jul 8, 2019
आपसे आग्रह करता हूं , मेरी पोस्ट पर अपना मत प्रदान करें । हां या नहीं

MasterJi Jul 19, 2019

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🌷🌷 ॐ अज निरंजन निर्विकाराये नमः🌷🌷 🌷🌷ॐ जय श्री आदित्याय नमः🌷🌷 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 🚩 सुविचार 🚩 ********************************************* ईश्वर में मन क्यों नही लगता और सभी मन विषयो में ही क्यों लगा रहता है। ****************************************** जब हरि कृपा होती है तब ही मन भगवान् की ओर लगता है। और जीव सुखी होता हैं।नही तो जितने रोम है जानो उतने ही रोकने वाले एवं अवरोधक तत्व मनुष्य में है अतः सभी प्रसन्ता पूर्वक हरि करना चाहिए। **** प्राणी वासनाओ पर नियंत्रण नही कर पता और मन विषयो में लगाये रहता है। जो मन और इंद्रियों को रोककर तत्वों का विचार नही करता है। मन को खुद ही विषयो में लगाये हुए हैं। मन से मिथ्या विचार करता है।जिससे उसका उद्धार नही हो सकता है। 🌷🕉️ सर्व परवशं दुःखम सर्वं आत्मवशं सुखं। एतद विद्यात समासेन लक्षणम सुख दुखयो।। 🌷🌷 ॐ जय श्री निर्विकाराये नमः 🌷🌷 🌷🌷 ॐ जय श्री गुरुदेवाय नमः 🌷🌷 🚩☑️ आज के आनंद की जय 🙏 🚩☑️ परमानन्द की जय 🙏 🚩☑️ प्राणियों में सद्भावना हो । 🚩☑️ बोलो भाई सब भक्तन की जय। 🚩☑️ बोलो भाई सब संतन की जय ।। 🚩☑️ भारत माता की जय। 🚩🚩🚩🚩 जय श्री राम🚩🚩🚩🚩

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Kalpana bist Jul 20, 2019

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🕉️🕉️जय श्री आदित्याय नमः🕉️🕉️ 🌷ॐ अज निरंजन निर्विकाराये नमः🌷 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 माया जिसका नाम है और नारायण में लीन हैवह या तो अलग है या निष्काम जाने क्यो ? @@@@@@@@@@@@@@@@@@@@ ***** माया भगवान् की इच्छा है, उसके त्रिगुण रूप है:-सात्विक ,राजस और तामस । 🌷 तमसो लक्षणम कामो राजसस्त्वर्थ उच्यते। सत्त्वस्य लक्षणम धर्म: श्रेष्ठयमेषनां यथोत्तरं।। अर्थात--तमोगुण का लक्षण काम, रजोगुण का अर्थसंग्रह की इच्छा और सत्वगुण का लक्षण धर्मसेवा करना है। परंतु तमोगुण से रजोगुण और रजोगुण से सत्वगुण श्रेष्ठ है। **** जहाँ हरि नही वहाँ काम,क्रोध,मदऔर लोभ के भ्रम जाल है। अतः उत्तम कार्य करना योग्य है। **** भगवान् की रचना महाप्रलय के भी ऊपर है। वह जैसा करना चाहते हैं, तब माया की ही ओर देखते है तब महातत्व तक की सारी उत्पत्ति। करके जगत को सामान रीति से भर देते हैं। वही परब्रम्ह जब नाश करना चाहते हैं तब अपनी माया सहित मूसलाधार वर्षा कर देते हैं। *** इससे सब ईश्वरं की इच्छा और माया का ही व्यवहार है अतः हरि को समझना उचित है। *****प्रभु की माया से कोई बच नहीं सकता। भगवान् की इच्छा और माया सब एक ही है जो प्राणी हरि भक्ति करते हैं वही संसारी जीव पार पाते हैं और सफल होते हैं। *** जिसने परब्रम्ह को जाना उसी ने उन्हें पाया है वही आनंदित है।। 🌷🌷ॐ जय श्री जगतनियन्ताय नमः🌷🌷 🌷🌷ॐ जय श्री सूर्यदेवाय नमः 🌷🌷 🚩✔️ आज के आंनद की जय ।। 🚩✔️ परमानंद की जय ।। 🚩✔️प्राणियों में सद्भावना हो। 🚩✔️बोलो भाई सब संतन की जय। 🚩✔️बोलो भाई सब भक्तन की जय। 🚩✔️ भारत माता की जय।। 🌷🌷🌷ॐ जय श्री गुरुदेवाय नमः 🌷🌷🌷 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🕉️🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 🌷🌷🌷जय श्री राम🌷🌷🌷

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SUNIL KUMAR SHARMA Jul 20, 2019

मथुरा में एक संत रहते थे। उनके बहुत से शिष्य थे। उन्हीं में से एक सेठ जगतराम भी थे। जगतराम का लंबा चौड़ा कारोबार था। वे कारोबार के सिलसिले में दूर दूर की यात्राएं किया करते थे। एक बार वे कारोबार के सिलसिले में कन्नौज गये। कन्नौज अपने खुश्बूदार इत्रों के लिये प्रसिद्ध है। उन्होंने इत्र की एक मंहगी शीशी संत को भेंट करने के लिये खरीदी।सेठ जगतराम कुछ दिनों बाद काम खत्म होने पर वापस मथुरा लौटे। अगले दिन वे संत की कुटिया पर उनसे मिलने गये। संत कुटिया में नहीं थे। पूछा तो जवाब मिला कि यमुना किनारे गये हैं, स्नान-ध्यान के लिये। जगतराम घाट की तरफ चल दिये। देखा कि संत घुटने भर पानी में खड़े यमुना नदी में कुछ देख रहे हैं और मुस्कुरा रहे हैं। तेज चाल से वे संत के नजदीक पहुंचे। प्रणाम करके बोले आपके लिये कन्नौज से इत्र की शीशी लाया हूँ। संत ने कहा लाओ दो। सेठ जगतराम ने इत्र की शीशी संत के हाथ में दे दी। संत ने तुरंत वह शीशी खोली और सारा इत्र यमुना में डाल दिया और मुस्कुराने लगे।जगतराम यह दृश्य देख कर उदास हो गये और सोचा एक बार भी इत्र इस्तेमाल नहीं किया , सूंघा भी नहीं और पूरा इत्र यमुना में डाल दिया। वे कुछ न बोले और उदास मन घर वापस लौट गये। कई दिनों बाद जब उनकी उदासी कुछ कम हुई तो वे संत की कुटिया में उनके दर्शन के लिये गये। संत कुटिया में अकेले आंखे मूंदे बैठे थे और भजन गुनगुना रहे थे। आहट हुई तो सेठ को द्वार पर देखा। प्रसन्न होकर उन्हें पास बुलाया और कहा – ”उस दिन तुम्हारा इत्र बड़ा काम कर गया। सेठ ने आश्चर्य से संत की तरफ देखा और पूछा “मैं कुछ समझा नहीं। संत ने कहा- उस दिन यमुना में राधा जी और श्री कृष्ण की होली हो रही थी। श्रीराधा जी ने श्रीकृष्ण के ऊपर रंग डालने के लिये जैसे ही बर्तन में पिचकारी डाली उसी समय मैंने तुम्हारा लाया इत्र बर्तन में डाल दिया। सारा इत्र पिचकारी से रंग के साथ श्रीकृष्ण के शरीर पर चला गया और भगवान श्रीकृष्ण इत्र की महक से महकने लगे। तुम्हारे लाये इत्र ने श्रीकृष्ण और श्रीराधा रानी की होली में एक नया रंग भर दिया। तुम्हारी वजह से मुझे भी श्रीकृष्ण और श्रीराधा रानी की कृपा प्राप्त हुई।सेठ जगतराम आंखे फाड़े संत को देखते रहे। उनकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। संत ने सेठ की आंखों में अविश्वास की झलक देखी तो कहा शायद तुम्हें मेरी कही बात पर विश्वास नहीं हो रहा। जाओ मथुरा के सभी श्रीकृष्ण राधा के मंदिरों के दर्शन कर आओ, फिर कुछ कहना। सेठ जगतराम मथुरा में स्थित सभी श्रीकृष्ण राधा के मंदिरों में गये। उन्हें सभी मंदिरों में श्रीकृष्णराधा की मूर्ति से अपने इत्र की महक आती प्रतीत हुयी। सेठ जगतराम का इत्र श्रीकृष्ण और श्रीराधा रानी ने स्वीकार कर लिया था। वे संत की कुटिया में वापस लौटे और संत के चरणों में गिर पड़े। सेठ की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। और उसे संत जी का अधिकार मालूम हुआ। संत की आंखें भी प्रभु श्रीकृष्ण की याद में गीली हो गयीं। इसलिए सदैव ध्यान रहे कि संत महात्मा भले ही हमारे जैसे दिखते हों, रहते हों लेकिन वे हर वक्त ईश्वर में मन लगाये रहते हैं। हम जैसों के लिये यह अधिकार तब प्राप्त होगा जब हमारी भक्ति बढ़े, नाम सिमरन बढ़े। जय श्री राधे कृष्णा 🙏🙏🙏

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Pappu Shriwas Jul 20, 2019

हम सब जानते है देवतओं और दानवो ने सागर मंथन किया जिसमे अच्छी और बुरी दोनों चीजे निकली। उसी मंथन में हलाहल नाम का विष भी निकला और उस से समस्त विश्व विनाश की और बढ़ने लगा। किसी में इतनी शक्ति नहीं थी की उस विष के जानलेवा प्रभाव को रोक सके। विश्व को व...

(पूरा पढ़ें)
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Archana Mishra Jul 20, 2019

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