gautam kothari
gautam kothari Nov 18, 2017

जय पशुपतिनाथ

जय पशुपतिनाथ
जय पशुपतिनाथ
जय पशुपतिनाथ
जय पशुपतिनाथ

केदारनाथ ज्योतिर्लिंग का भाग माने जाने वाले पशुपतिनाथ मंदिर का रहस्य?
जय हो....
जय #महाकाल
भोलेनाथ,,,भारत समेत विश्वभर में हिन्दू देवी-देवताओं से संबंधित कई मंदिर और तीर्थ स्थान मौजूद है। आज हम जिस धार्मिक स्थल की बात कर रहे हैं वह भगवान शिव, जिन्हें उनके भक्त भोलेनाथ, महादेव, रुद्र, आदि नाम से जानते हैं, को समर्पित स्थान है।
पशुपतिनाथ मंदिर,,,नेपाल का पशुपतिनाथ मंदिर ऐसा ही एक स्थान है, जिसके विषय में यह माना जाता है कि आज भी इसमें शिव की मौजूदगी है।
केदारनाथ मंदिर,,,पशुपतिनाथ मंदिर को शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, केदारनाथ मंदिर का आधा भाग माना जाता है। पशुपतिनाथ मंदिर नेपाल की राजधानी काठमांडू से किलोमीटर उत्तर-पश्चिम देवपाटन गांव में बागमती नदी के तट पर है स्थित है।
भगवान शिव,,,यूं तो भगवान शिव की महिमा अद्भुत है, उनसे जुड़ी कहानियां किसी के भी मस्तिष्क में हैरानी के भाव पैदा कर सकती हैं। उनसे जुड़े रहस्य और पौराणिक घटनाएं उनके भक्तों को आज भी उनसे जोड़कर रखती हैं।
काठमांडू,,,केदारनाथ ज्योतिर्लिंग का आधा भाग माने जाने की वजह से काठमांडू के पशुपतिनाथ मंदिर का महत्व अपने आप बढ़ जाता है। लेकिन आज हम आपको बताएंगे इस मंदिर से जुड़े कुछ खास रहस्य।
पौराणिक कथा के अनुसार जब महाभारत के युद्ध में पांडवों द्वारा अपने ही रिश्तेदारों का रक्त बहाया गया तब भगवान शिव उनसे बेहद क्रोधित हो गए थे। श्रीकृष्ण के कहने पर वे भगवान शिव से मांफी मांगने के लिए निकल पड़े।
गुप्त काशी,,,गुप्त काशी में पांडवों को देखकर भगवान शिव वहां से विलुप्त होकर एक अन्य थान पर चले गए। आज इस स्थान को केदारनाथ के नाम से जाना जाता है।
भैंस,,,शिव का पीछा करते हुए पांडव केदारनाथ भी पहुंच गए लेकिन भगवान शिव उनके आने से पहले ही भैंस का रूप लेकर वहां खड़े भैंसों के झुंड में शामिल हो गए। पांडवों ने महादेव को पहचान तो लिया लेकिन भगवान शिव भैंस के ही रूप में भूमि में समाने लगे।
क्षमादान,,,इसपर भीम ने अपनी ताकत के बल पर भैंस रूपी महादेव को गर्दन से पकड़कर धरती में समाने से रोक दिया। भगवान शिव को अपने असल रूप में आना पड़ा और फिर उन्होंने पांडवों को क्षमादान दे दिया।
देह,,,लेकिन भगवान शिव का मुख तो बाहर था लेकिन उनका देह केदारनाथ पहुंच गया था। जहां उनका देह पहुंचा वह स्थान केदारनाथ और उनके मुख वाले स्थान पशुपतिनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
शिवलिंग की पूजा,,,इन दोनों स्थानों के दर्शन करने के बाद ही ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने का पुण्य प्राप्त होता है। पशुपतिनाथ में भैंस के सिर और केदारनाथ में भैंस की पीठ के रूप में शिवलिंग की पूजा होती है।
नहीं मिलती पशु योनि,,,पशुपति नाथ मंदिर के विषय में यह मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस स्थान के दर्शन करता है उसे किसी भी जन्म में पशु योनि प्राप्त नहीं होती। लेकिन साथ ही यह भी माना जाता है कि पशुपतिनाथ के दर्शन करने वाले व्यक्ति को सबसे पहले नंदी के दर्शन नहीं करने चाहिए, अगर ऐसा होता है तो उस व्यक्ति को पशु योनि मिलना तय होता है।
आर्य घाट,,,पशुपतिनाथ मंदिर के बाहर एक घाट स्थित है जिसे आर्य घाट के नाम से जाना जाता है। पौराणिक काल से ही केवल इसी घाट के पानी को मंदिर के भीतर ले जाए जाने का प्रावधान है। अन्य किसी भी स्थान का जल अंदर लेकर नहीं जाया जा सकता।
रुद्राक्ष की माला,,,पशुपतिनाथ विग्रह में चारों दिशाओं में एक मुख और एकमुख ऊपर की ओर है। प्रत्येक मुख के दाएं हाथ में रुद्राक्ष की माला और बाएं हाथ में कमंदल मौजूद है
अर्धनारीश्वर,,,ये पांचों मुख अलग-अलग गुण लिए हैं। जो मुख दक्षिण की ओर है उसे अघोर मुख कहा जाता है, पश्चिम की ओर मुख को सद्योजात, पूर्व और उत्तर की ओर मुख को क्रमश: तत्वपुरुष और अर्धनारीश्वर कहा जाता है। जो मुख ऊपर की ओर है उसे ईशान मुख कहा जाता है।
पारस पत्थर,,,पशुपतिनाथ मंदिर का ज्योतिर्लिंग चतुर्मुखी है। ऐसा माना जाता है कि ये पारस पत्थर के समान है, जो लोहे को भी सोना बना सकता है।
नेपाल,,,नेपाल की सामान्य जनता और स्वयं राजपरिवार के लिए भी पशुपतिनाथ ज्योतिर्लिंग ही उनके अराध्य देव हैं।
धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व,,,पशुपतिनाथ मंदिर, हिन्दू धर्म के आठ सबसे प्रमुख स्थानों में से एक है। आपको ये जानकर भी खुशी होगी कि इस मंदिर को वैश्विक संस्था युनेस्को द्वारा विश्व सांस्कृतिक विरासत स्थल की श्रेणी में भी रखा गया है। निश्चित तौर पर यह पशुपतिनाथ मंदिर के धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों ही महत्व को दर्शाता है।..

#अघोर

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कामेंट्स

alok Nov 18, 2017
जय बाबा पशुपतिनाथ

Captain Nov 18, 2017
ॐ नमः शिवाय

Kanchan Bhagat Nov 18, 2017
ऊँ जय भोलेनाथ ऊँ नयः शिवाय

मनीष शर्मा Nov 18, 2017
बहुत रोचक एवं ज्ञानवर्दक जानकारी हे, जय पशुपतिनाथ ।

संकट मोचन पवन पुत्र हनुमान जयंती चैत्र माह की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। शास्त्रों के मुताबिक चैत्र पूर्णिमा को ही बजरंगबली का जन्म हुअा था। इस दिन बजरंगबली की विधिवत पूजा करने से शत्रु पर विजय मिलने के साथ ही मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। पवन पुत्र हनुमान को भगवान शिव का 11 वां अवतार माना जाता है। उनका अवतार रामभक्ति और भगवान श्री राम के कार्यों को सिद्ध करने के लिए हुआ था। वे बाल ब्रह्मचारी थे और बचपन से लेकर अपना पूरा जीवन उन्होंने राम भक्ति और भगवान श्री राम की सेवा में समर्पित कर दिया था। हनुमान जी की जन्म कथा हनुमान जी को भगवान शिव का 11वां अवतार माना जाता है। हनुमान जी के जन्म से जुड़ी पौराणिक कथा के मुताबिक एक बार अमरत्व की प्राप्ति के लिये जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया, तो उससे निकले अमृत को असुरों ने छीन लिया। इसके बाद देव और दानवों में युद्ध छिड़ गया। इसे देख भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया, जिसे देख देवताओं और असुरों के साथ ही भगवान शिव भी कामातुर हो गए। इस दौरान भगवान शिव ने वीर्य त्याग किया, जिसे पवनदेव ने वानरराज केसरी की पत्नी अंजना के गर्भ में प्रविष्ट कर दिया। इसके फलस्वरूप माता अंजना के गर्भ से श्री हनुमान का जन्म हुआ। हनुमान जयंती व्रत और पूजन विधि हनुमान जयंती का व्रत रखने वालों को एक दिन पूर्व ब्रह्मचर्य का पालन करने के साथ ही कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है। इस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर भगवान श्रीराम, माता सीता व श्री हनुमान का स्मरण करने के बाद स्वच्छ होकर हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित कर विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। इन्हें जनेऊ भी चढ़ाई जाती है। सिंदूर और चांदी का वर्क चढ़ाने की भी परंपरा है। कहा जाता है, एक बार माता सीता को मांग में सिंदूर लगाते देख हनुमान जी ने इसका महत्व पूछा। माता सीता ने उन्हें बताया कि पति-परमेश्वर की लंबी आयु के लिए मांग में सिंदूर लगाया जाता है। इसके बाद भगवान श्री राम की लंबी आयु के लिए हनुमान जी ने अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया था, इसीलिए हनुमान जयंती के दिन उन्हें सिंदूर चढ़ाया जाता है। इसके अलावा हनुमान चालीसा और बजरंग बाण का पाठ किया जाता है और उनकी आरती उतारी जाती है। इस दिन स्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस के सुंदरकांड या हनुमान चालीसा का अखंड पाठ भी करवाया जाता है। प्रसाद के रुप में उन्हें गुड़, भीगे या भुने चने एवं बेसन के लड्डू चढ़ाए जाते हैं। संत श्री लखनदास महाराज

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Ganesh Apr 18, 2019

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Neha Sharma Apr 19, 2019

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Neha Sharma Apr 18, 2019

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O.P.Sharma Apr 19, 2019

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