Sanjay Singh
Sanjay Singh Apr 6, 2020

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कामेंट्स

rAj Apr 6, 2020
राधे राधे शुभ रात्रि भाई t,c

Shivsanker Shukala Apr 6, 2020
शुभ रात्रि भैया जी जय श्री राधे कृष्णा

Subhash Nagar Apr 6, 2020
रात्रि वंदन जी जय श्री राधे कृष्ण बोलो राधे राधे जी राधे राधे जी राधे राधे

madanpal singh Apr 6, 2020
jai shree radhe radhe kirisana jiii shubh ratari jiii aapka har pal shub magalmay hoo jiii 🕉️ 🙏🏼🌹 🕉️🌹🙏🏻🕉️

Rk Soni(Ganesh Mandir) Apr 6, 2020
श्री राधे कृष्ण शुभ रात्री जी आप स्वस्थ रहे,खुश रहे🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏🙏🙏🙏🙏

sushma Apr 6, 2020
गुड नाईट जी

Dr.ratan Singh Apr 6, 2020
😷🌹ॐ नमः शिवाय 🌹😷 🙏🕯️शुभरात्रि वंदन भाई🕯️🙏 🎎आपको सपरिवार महावीर जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई 🙏 🙏आप और आपके पूरे परिवार पर बाबा भोलेनाथ और महावीर स्वामी जी की कृपादृष्टि सदा बनी रहे जी🎎 🎭आपका सोमवार की रात्री शुभ अतिसुन्दर शिवमय और मंगलमय व्यतीत हो 🍑

Manoj Gupta Apr 6, 2020
Radhe Krishna Ji 🌷🌸💐 good night ji 🙏🙏🌷

*प्राचीनकाल में गोदावरी नदी के किनारे वेदधर्म मुनि का आश्रम था। एक दिन गुरुजी ने अपने शिष्यों से कहा की- शिष्यों! अब मुझे कोढ़ निकलेगा और मैं अंधा भी हो जाऊँगा, इसिलिए काशी में जाकर रहूँगा। है कोई शिष्य जो मेरे साथ रह कर सेवा करने के लिए तैयार हो ? सब चुप हो गये। उनमें संदीपनी ने कहा- गुरुदेव! मैं आपकी सेवा में रहूँगा। गुरुदेव ने कहा इक्कीस वर्ष तक सेवा के लिए रहना होगा। संदीपनी बोले इक्कीस वर्ष तो क्या मेरा पूरा जीवन ही अर्पित है आपको। वेदधर्म मुनि एवं संदीपन काशी में रहने लगे । कुछ दिन बाद गुरु के पूरे शरीर में कोढ़ निकला और अंधत्व भी आ गया । शरीर कुरूप और स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया । संदीपनी के मन में लेशमात्र भी क्षोभ नहीं हुआ । वह दिन रात गुरु जी की सेवा में तत्पर रहने लगा । गुरु को नहलाता, कपड़े धोता, भिक्षा माँगकर लाता और गुरुजी को भोजन कराता । गुरुजी डाँटते, तमाचा मार देते... किंतु संदीपनी की गुरुसेवा में तत्परता व गुरु के प्रति भक्तिभाव और प्रगाढ़ होता गया।* *गुरु निष्ठा देख काशी के अधिष्ठाता देव विश्वनाथ संदीपनी के समक्ष प्रकट होकर बोले- तेरी गुरुभक्ति देख कर हम प्रसन्न हैं । कुछ भी वर माँग लो । संदीपनी गुरु से आज्ञा लेने गया और बोला भगवान शिवजी वरदान देना चाहते हैं, आप आज्ञा दें तो आपका रोग एवं अंधेपन ठीक होने का वरदान मांग लूँ ? गुरुजी ने डाँटा,बोले- मैं अच्छा हो जाऊँ और मेरी सेवा से तेरी जान छूटे यही चाहता है तु ? अरे मूर्ख ! मेरा कर्म कभी-न-कभी तो मुझे भोगना ही पड़ेगा । संदीपनी ने भगवान शिवजी को वरदान के लिए मना कर दिया। शिवजी आश्चर्यचकित हो गये और गोलोकधाम पहुंच के श्रीकृष्ण से पूरा वृत्तान्त कहा। श्रीकृष्ण भी संदीपनी के पास वर देने आये। संदीपनी ने कहा- प्रभु! मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप मुझे यही वर दें कि गुरुसेवा में मेरी अटल श्रद्धा बनी रहे।* *एक दिन गुरुजी ने संदीपनी को कहा कि- मेरा अंत समय आ गया है। सभी शिष्यों से मिलने की इच्छा है । संदीपनी ने सब शिष्यों को सन्देश भेज दिया। सारे शिष्य उनके दर्शन के लिए आये। गुरुजी ने सभी शिष्यों कुछ न कुछ दिया । किसी को पंचपात्र, किसी को आचमनी , किसी को आसन किसी को माला दे दी । जब संदीपनी का आये तो सभी वस्तुएं समाप्त हो चुकी थी । गुरुजी चुप हो गए,फिर बोले कि मैं तुम्हे क्या दूँ ? तुम्हारी गुरूभक्ति के समान मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है । मैं तुम्हें यह वर देता हूँ कि- त्रिलोकी नाथ का अवतार होने वाला है, वह तुम्हारे शिष्य बनेंगे । संदीपनी के लिए इससे बड़ी भेंट और क्या होती । उन्होंने गुरूजी की अंत समय तक सेवा की। जब श्रीकृष्ण अवतार हुआ तो गुरुजी के दिए उस वरदान को फलीभूत करने के लिए स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने दूर उज्जैन में स्थित संदीपनी ऋषि के आश्रम में भ्राता बलराम जी के साथ आए और संदीपनी ऋषि के शिष्य बने... ऐसी है गुरुभक्ति की शक्ति। इसिलिए गुरुभक्ति ही सार है... राधे राधे...संगृहीत कथा*🙏🚩

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Sanjay Singh May 10, 2020

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Meena Dubey May 10, 2020

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Sanjay Singh May 9, 2020

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Sanjay Singh May 9, 2020

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Radhe Chouhan May 9, 2020

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Sanjay Singh May 8, 2020

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Radhe Chouhan May 8, 2020

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Meena Dubey May 8, 2020

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