Gumansingh Rathore
Gumansingh Rathore Sep 19, 2017

भोजन करने से पहले भगवान को भोग लगाने का क्यों है नियम?

भोजन करने से पहले भगवान को भोग लगाने का क्यों है नियम?

अपने देखा होगा कि कई लोग भोजन करने से पहले भगवान का ध्यान करते हैं। कुछ लोग भगवान के नाम पर भोजन का कुछ अंश थाली से बाहर रखकर नैवैद्य रुप में अर्पित करते हैं। इसके पीछे धार्मिक कारण के साथ ही वैज्ञानिक कारण भी है।

सबसे पहले धार्मिक कारणों की बात करते हैं। गीता के तीसरे अध्याय में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि व्यक्ति बिना यज्ञ किए भोजन करता है वह चोरी का अन्न खाता है। इसका अर्थ हो जो व्यकि भगवान को अर्पित किए बिना भोजन करता है वह अन्न देने वाले भगवान से अन्न की चोरी करता है। ऐसे व्यक्ति को उसी प्रकार का दंड मिलता है जैसे किसी की वस्तु को चुराने वाले को सजा मिलती है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में लिखा है 'अन्न विष्टा, जलं मूत्रं, यद् विष्णोर निवेदितम्। यानी भगवान को बिना भोग लगाया हुआ अन्न विष्टा के समान और जल मूत्र के तुल्य है। ऐसा भोजन करने से शरीर में विकार उत्पन्न होता है और विभिन्न प्रकार के रोग होते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो स्वस्थ रहने के लिए भोजन करते समय मन को शांत और निर्मल रखना चाहिए। अशांत मन से किया गया भोजन पचने में कठिन होता है। इससे स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसलिए मन की शांति के लिए भोजन से पहले अन्न का कुछ भाग भगवान को अर्पित करके ईश्वर का ध्यान करने की सलाह वेद और पुराणों में दी गई है।
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- ॥हरिॐ॥

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Anita Sharma Mar 1, 2021

. "गीता का सच्चा अर्थ" चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथपुरी से दक्षिण भारत की यात्रा पर निकले थे। उन्होंने एक स्थान पर देखा कि सरोवर के किनारे एक ब्राह्मण स्नान करके बैठा है और गीता का पाठ कर रहा है। वह पाठ करने में इतना तल्लीन है कि उसे अपने शरीर का भी पता नहीं है। उसके नेत्रों से आँसू की धारा बह रही है। महाप्रभु चुपचाप जाकर उस ब्राह्मण के पीछे खड़े हो गए। पाठ समाप्त करके जब ब्राह्मण पुस्तक बन्द की तो महाप्रभु सम्मुख आकर पूछा, 'ब्राह्मण देवता ! लगता है कि आप संस्कृत नहीं जानते, क्योंकि श्लोकों का उच्चारण शुद्ध नहीं हो रहा था। परन्तु गीता का ऐसा कौन-सा अर्थ आप समझते हैं जिसके आनन्द में आप इतने विभोर हो रहे थे ?' अपने सम्मुख एक तेजोमय भव्य महापुरुष को देखकर ब्राह्मण ने भूमि में लेटकर दण्डवत किया। वह दोनों हाथ जोड़कर नम्रतापूर्वक बोला, 'भगवन ! में संस्कृत क्या जानूँ और गीता के अर्थ का मुझे क्या पता ? मुझे पाठ करना आता ही नहीं मैं तो जब इस ग्रंथ को पढ़ने बैठता हूँ, तब मुझे लगता है कि कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों और बड़ी भारी सेना सजी खड़ी है। दोनों सेनाओं के बीच में एक रथ खड़ा है। रथ पर अर्जुन दोनों हाथ जोड़े बैठा है, और रथ के आगे घोड़ों की रास पकड़े भगवान श्रीकृष्ण बैठे हैं। भगवान मुख पीछे घुमाकर अर्जुन से कुछ कह रहे हैं, मुझे यह स्पष्ट दिखता है। भगवान और अर्जुन की ओर देख-देखकर मुझे प्रेम से रुलाई आ रही है। गीता और उसके श्लोक तो माध्यम हैं। असल सत्य भाषा नहीं, भक्ति है और इस भक्ति में मैं जितना गहरा उतरता जाता हूँ मेरा आनन्द बढ़ता जाता है।' 'भैया ! तुम्हीं ने गीता का सच्चा अर्थ जाना है और गीता का ठीक पाठ करना तुम्हें ही आता है।' यह कहकर महाप्रभु ने उस ब्राह्मण को अपने हाथों से उठाकर हृदय से लगा लिया।

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पौराणिक आठ दिव्य बालक 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 हमारे धर्म ग्रंथों में ऐसे अनेक बच्चों के बारे में बताया गया है जिन्होंने कम उम्र में ही कुछ ऐसे काम किए, जिन्हें करना किसी के बस में नहीं था। लेकिन अपनी ईमानदारी, निष्ठा व समर्पण के बल पर उन्होंने मुश्किल काम भी बहुत आसानी से कर दिए। आज हम आपको 8 ऐसे ही बच्चों के बारे में बता रहे हैं- 1. बालक ध्रुव 🔸🔸🔹🔹 बालक ध्रुव की कथा का वर्णन श्रीमद्भागवत में मिलता है। उसके अनुसार ध्रुव के पिता का नाम उत्तानपाद था। उनकी दो पत्नियां थीं, सुनीति और सुरुचि। ध्रुव सुनीति का पुत्र था। एक बार सुरुचि ने बालक ध्रुव को यह कहकर राजा उत्तानपाद की गोद से उतार दिया कि मेरे गर्भ से पैदा होने वाला ही गोद और सिंहासन का अधिकारी है। बालक ध्रुव रोते हुए अपनी मां सुनीति के पास पहुंचा। मां ने उसे भगवान की भक्ति के माध्यम से ही लोक-परलोक के सुख पाने का रास्ता सूझाया। माता की बात सुनकर ध्रुव ने घर छोड़ दिया और वन में पहुंच गया। यहां देवर्षि नारद की कृपा से ऊं नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र की दीक्षा ली। यमुना नदी के किनारे मधुवन में बालक ध्रुव ने इस महामंत्र को बोल घोर तप किया। इतने छोटे बालक की तपस्या से खुश होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए। भगवान विष्णु ने बालक ध्रुव को ध्रुवलोक प्रदान किया। आकाश में दिखाई देने वाला ध्रुव तारा बालक ध्रुव का ही प्रतीक है। 2. गुरुभक्त आरुणि 🔸🔸🔹🔹🔸🔸 महाभारत के अनुसार आयोदधौम्य नाम के एक ऋषि थे। उनके एक शिष्य का नाम आरुणि था। वह पांचालदेश का रहने वाला था। आरुणि अपने गुरु की हर आज्ञा का पालन करता था। एक दिन गुरुजी ने उसे खेत की मेढ़ बांधने के लिए भेजा। गुरु की आज्ञा से आरुणि खेत पर गया और मेढ़ बांधने का प्रयास करने लगा। काफी प्रयत्न करने के बाद भी जब वह खेत की मेढ़ नहीं बांध पाया तो मेढ़ के स्थान पर वह स्वयं लेट गया ताकि पानी खेत के अंदर न आ सके। जब बहुत देर तक आरुणि आश्रम नहीं लौटा तो उसके गुरु अपने अन्य शिष्यों के साथ उसे ढूंढते हुए खेत तक आ गए। यहां आकर उन्होंने आरुणि को आवाज लगाई। गुरु की आवाज सुनकर आरुणि उठकर खड़ा हो गया। जब उसने पूरी बात अपने गुरु को बताई तो आरुणि की गुरुभक्ति देखकर गुरु आयोदधौम्य बहुत प्रसन्न हुए और उसे सारे वेद और धर्मशास्त्रों का ज्ञान हो जाने का आशीर्वाद दिया। 3. परमज्ञानी अष्टावक्र 🔸🔸🔹🔹🔸🔸 प्राचीन काल में कहोड नामक एक ब्राह्मण थे। उनकी पत्नी का नाम सुजाता था। समय आने पर सुजाता गर्भवती हुई। एक दिन जब कहोड वेदपाठ कर रहे थे, तभी सुजाता के गर्भ में स्थित शिशु बोला – पिताजी। आप रातभर वेदपाठ करते हैं, किंतु वह ठीक से नहीं होता। गर्भस्थ शिशु के इस प्रकार कहने पर कहोड क्रोधित होकर बोले कि- तू पेट में ही ऐसी टेढ़ी-मेढ़ी बातें करता है, इसलिए तू आठ स्थानों से टेढ़ा उत्पन्न होगा। इस घटना के कुछ दिन बाद कहोड राजा जनक के पास धन की इच्छा से गए। वहां बंदी नामक विद्वान से वे शास्त्रार्थ में हार गए। नियमानुसार उन्हें जल में डूबा दिया गया। कुछ दिनों बाद अष्टावक्र का जन्म हुआ किंतु उसकी माता ने उसे कुछ नहीं बताया। जब अष्टावक्र 12 वर्ष का हुआ, तब एक दिन उसने अपनी माता से पिता के बारे पूछा। तब माता ने उसे पूरी बात सच-सच बता दी। अष्टावक्र भी राजा जनक के दरबार में शास्त्रार्थ करने के लिए गया। यहां अष्टावक्र और बंदी के बीच शास्त्रार्थ हुआ, जिसमें अष्टावक्र ने उसे पराजित कर दिया। अष्टावक्र ने राजा से कहा कि बंदी को भी नियमानुसार जल में डूबा देना चाहिए। तब बंदी ने बताया कि वह जल के स्वामी वरुणदेव का पुत्र है। उसने जितने भी विद्वानों को शास्त्रार्थ में हराकर जल में डुबाया है, वे सभी वरुण लोक में हैं। उसी समय जल में डूबे हुए सभी ब्राह्मण पुन: बाहर आ गए। अष्टावक्र के पिता कहोड भी जल से निकल आए। अष्टावक्र के विषय में जानकर उन्हें बहुत प्रसन्न हुई और पिता के आशीर्वाद से अष्टावक्र का शरीर सीधा हो गया। 4. आस्तिक 🔸🔸🔹🔹 महाभारत के अनुसार आस्तिक ने ही राजा जनमेजय के सर्प यज्ञ को रुकवाया था। आस्तिक के पिता जरत्कारु ऋषि थे और उनकी माता का नाम भी जरत्कारु था। आस्तिक की माता नागराज वासुकि की बहन थी। जब राजा जनमेजय को पता चला कि उनके पिता की मृत्यु तक्षक नाग द्वारा काटने पर हुई थी तो उन्होंने सर्प यज्ञ करने का निर्णय लिया। उस यज्ञ में दूर-दूर से भयानक सर्प आकर गिरने लगे। जब यह बात नागराज वासुकि को पता चली तो उन्होंने आस्तिक से इस यज्ञ को रोकने के लिए निवेदन किया। आस्तिक यज्ञ स्थल पर जाकर ज्ञान की बातें करने लगे, जिसे सुनकर राजा जनमेजय बहुत प्रसन्न हुए। जनमेजय ने आस्तिक को वरदान मांगने के लिए कहा, तब आस्तिक ने राजा से सर्प यज्ञ बंद करने के लिए निवेदन किया। राजा जनमेजय ने पहले तो ऐसा करने से इनकार कर दिया, लेकिन बाद में वहां उपस्थित ब्राह्मणों के कहने पर उन्होंने सर्प यज्ञ रोक दिया और आस्तिक की प्रशंसा की। 5. भक्त प्रह्लाद 🔸🔸🔹🔸🔸 बालक प्रह्लाद की कथा का वर्णन श्रीमद्भागवत में मिलता है। प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यपु दैत्यों के राजा थे। वह भगवान विष्णु को अपना शत्रु मानता था परंतु प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। जब यह बात हिरण्यकश्यपु को पता चली तो उसने प्रह्लाद पर अनेक अत्याचार किए, लेकिन फिर भी प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति कम न हुई। अंत में स्वयं भगवान विष्णु प्रह्लाद की रक्षा के लिए नृसिंह अवतार लेकर प्रकट हुए। नृसिंह भगवान ने हिरण्यकश्यपु का वध कर दिया और प्रह्लाद को अपनी गोद में बैठा कर प्रेम किया। 6. गुरुभक्त उपमन्यु 🔸🔸🔹🔹🔸🔸 गुरु आयोदधौम्य के एक शिष्य का नाम उपमन्यु था। वह बड़ा गुरुभक्त था। गुरु की आज्ञा से वह रोज गाय चराने जाता था। एक दिन गुरु ने उससे पूछा कि तुम अन्य शिष्यों से मोटे और बलवान दिख रहे हो। तुम क्या खाते हो? तब उपमन्यु ने बताया कि मैं भिक्षा मांगकर ग्रहण कर लेता हूं। गुरु ने उससे कहा कि मुझे निवेदन किया बिना तुम्हें भिक्षा का अन्न नहीं खाना चाहिए। उपमन्यु ने गुरुजी की बात मान ली। कुछ दिनों बाद पुन: गुरुजी ने उपमन्यु से वही प्रश्न पूछा तो उसने बताया कि वह गायों का दूध पीकर अपनी भूख मिटाता है। तब गुरु ने उसे ऐसा करने से भी मना कर दिया, लेकिन इसके बाद भी उपमन्यु के पहले जैसे दिखने पर गुरुजी ने उससे पुन: वही प्रश्न किया। तब उपमन्यु ने बताया कि बछड़े गाय का दूध पीकर जो फेन (झाग) उगल देते हैं, वह उसका सेवन करता है। गुरु आयोदधौम्य ने उसे ऐसा करने से भी मना कर दिया। जब उपमन्यु के सामने खाने-पीने के सभी रास्ते बंद हो गए तब उसने एक दिन भूख से व्याकुल होकर आकड़े के पत्ते खा लिए। वह पत्ते जहरीले थे। उन्हें खाकर उपमन्यु अंधा हो गया और वह वन में भटकने लगा। दिखाई न देने पर उपमन्यु एक कुएं में गिर गया। जब उपमन्यु शाम तक आश्रम नहीं लौटा तो गुरु अपने अन्य शिष्यों के साथ उसे ढूंढने वन में पहुंचे। वन में जाकर गुरु ने उसे आवाज लगाई तब उपमन्यु ने बताया कि वह कुएं में गिर गया है। गुरु ने जब इसका कारण पूछा तो उसने सारी बात सच-सच बता दी। तब गुरु आयोदधौम्य ने उपमन्यु को देवताओं के चिकित्सक अश्विनी कुमार की स्तुति करने के लिए कहा। उपमन्यु ने ऐसा ही किया। स्तुति से प्रसन्न होकर अश्विनी कुमार प्रकट हुए और उपमन्यु को एक फल देकर बोले कि इसे खाने से तुम पहले की तरह स्वस्थ हो जाओगे। उपमन्यु ने कहा कि बिना अपने गुरु को निवेदन किए मैं यह फल नहीं खा सकता। उपमन्यु की गुरुभक्ति से प्रसन्न होकर अश्विन कुमार ने उसे पुन: पहले की तरह स्वस्थ होने का वरदान दिया, जिससे उसकी आंखों की रोशनी भी पुन: लौट आई। गुरु के आशीर्वाद से उसे सारे वेद और धर्मशास्त्रों का ज्ञान हो गया। 7. मार्कण्डेय ऋषि 🔸🔸🔹🔸🔸 धर्म ग्रंथों के अनुसार मार्कण्डेय ऋषि अमर हैं। आठ अमर लोगों में मार्कण्डेय ऋषि का भी नाम आता है। इनके पिता मर्कण्डु ऋषि थे। जब मर्कण्डु ऋषि को कोई संतान नहीं हुई तो उन्होंने अपनी पत्नी के साथ भगवान शिव की आराधना की। उनकी तपस्या से प्रकट हुए भगवान शिव ने उनसे पूछा कि वे गुणहीन दीर्घायु पुत्र चाहते हैं या गुणवान 16 साल का अल्पायु पुत्र। तब मर्कण्डु ऋषि ने कहा कि उन्हें अल्पायु लेकिन गुणी पुत्र चाहिए। भगवान शिव ने उन्हें ये वरदान दे दिया। जब मार्कण्डेय ऋषि 16 वर्ष के होने वाले थे, तब उन्हें ये बात अपनी माता द्वारा पता चली। अपनी मृत्यु के बारे में जानकर वे विचलित नहीं हुए और शिव भक्ति में लीन हो गए। इस दौरान सप्तऋषियों की सहायता से ब्रह्मदेव से उनको महामृत्युंजय मंत्र की दीक्षा मिली। इस मंत्र का प्रभाव यह हुआ कि जब यमराज तय समय पर उनके प्राण हरने आए तो शिव भक्ति में लीन मार्कण्डेय ऋषि को बचाने के लिए स्वयं भगवान शिव प्रकट हो गए और उन्होंने यमराज के वार को बेअसर कर दिया। बालक मार्कण्डेय की भक्ति देखकर भगवान शिव ने उन्हें अमर होने का वरदान दिया। 8. गुरुभक्त एकलव्य 🔸🔸🔹🔹🔸🔸 एकलव्य की कथा का वर्णन महाभारत में मिलता है। उसके अनुसार एकलव्य निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र था। वह गुरु द्रोणाचार्य के पास धनुर्विद्या सीखने गया था, लेकिन राजवंश का न होने के कारण द्रोणाचार्य ने उसे धनुर्विद्या सिखाने से मना कर दिया। तब एकलव्य ने द्रोणाचार्य की एक प्रतिमा बनाई और उसे ही गुरु मानकर धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा। एक बार गुरु द्रोणाचार्य के साथ सभी राजकुमार शिकार के लिए वन में गए। उस वन में एकलव्य अभ्यास कर रहा था। अभ्यास के दौरान कुत्ते के भौंकने पर एकलव्य ने अपने बाणों से कुत्ते का मुंह बंद कर दिया। जब द्रोणाचार्य व राजकुमारों ने कुत्ते को इस हाल में देखा तो वे उस धनुर्धर को ढूंढने लगे, जिसने इतनी कुशलता से बाण चलाए थे। एकलव्य को ढूंढने पर द्रोणाचार्य ने उससे उसके गुरु के बारे में पूछा। एकलव्य ने बताया कि उसने प्रतिमा के रूप में ही द्रोणाचार्य को अपना गुरु माना है। तब गुरु द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा के रूप में एकलव्य से दाहिने हाथ का अंगूठा मांग लिया। एकलव्य ने बिना कुछ सोचे अपने अंगूठा द्रोणाचार्य को दे दिया। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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श्री हनुमतेनमः #हनुमानचालीसा रचना की रोचक कहानी 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 भगवान को अगर किसी युग में आसानी से प्राप्त किया जा सकता है तो वह युग है कलियुग। इस कथन को सत्य करता एक दोहा रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने लिखा है कलियुग केवल नाम अधारा , सुमिर सुमिर नर उतरहि पारा। जिसका अर्थ है की कलयुग में मोक्ष प्राप्त करने का एक ही लक्ष्य है वो है भगवान का नाम लेना। तुलसीदास ने अपने पूरे जीवन में कोई भी ऐसी बात नहीं लिखी जो गलत हो। उन्होंने अध्यात्म जगत को बहुत सुन्दर रचनाएँ दी हैं। ऐसा माना जाता है कि कलयुग में हनुमान जी सबसे जल्दी प्रसन्न हो जाने वाले भगवान हैं। उन्होंने हनुमान जी की स्तुति में कई रचनाएँ रची जिनमें हनुमान बाहुक, हनुमानाष्टक और हनुमान चालीसा प्रमुख हैं। हनुमान चालीसा की रचना के पीछे एक बहुत जी रोचक कहानी है जिसकी जानकारी शायद ही किसी को हो। आइये जानते हैं हनुमान चालीसा की रचना की कहानी :- ये बात उस समय की है जब भारत पर मुग़ल सम्राट अकबर का राज्य था। सुबह का समय था एक महिला ने पूजा से लौटते हुए तुलसीदास जी के पैर छुए। तुलसीदास जी ने नियमानुसार उसे सौभाग्यशाली होने का आशीर्वाद दिया। आशीर्वाद मिलते ही वो महिला फूट-फूट कर रोने लगी और रोते हुए उसने बताया कि अभी-अभी उसके पति की मृत्यु हो गई है। इस बात का पता चलने पर भी तुलसीदास जी जरा भी विचलित न हुए और वे अपने आशीर्वाद को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त थे। क्योंकि उन्हें इस बात का ज्ञान भली भाँति था कि भगवान राम बिगड़ी बात संभाल लेंगे और उनका आशीर्वाद खाली नहीं जाएगा। उन्होंने उस औरत सहित सभी को राम नाम का जाप करने को कहा। वहां उपस्थित सभी लोगों ने ऐसा ही किया और वह मरा हुआ व्यक्ति राम नाम के जाप आरंभ होते ही जीवित हो उठा। यह बात पूरे राज्य में जंगल की आग की तरह फैल गयी। जब यह बात बादशाह अकबर के कानों तक पहुंची तो उसने अपने महल में तुलसीदास को बुलाया और भरी सभा में उनकी परीक्षा लेने के लिए कहा कि कोई चमत्कार दिखाएँ। ये सब सुन कर तुलसीदास जी ने अकबर से बिना डरे उसे बताया की वो कोई चमत्कारी बाबा नहीं हैं, सिर्फ श्री राम जी के भक्त हैं। अकबर इतना सुनते ही क्रोध में आ गया और उसने उसी समय सिपाहियों से कह कर तुलसीदास जी को कारागार में डलवा दिया। तुलसीदास जी ने तनिक भी प्रतिक्रिया नहीं दी और राम का नाम जपते हुए कारागार में चले गए। उन्होंने कारागार में भी अपनी आस्था बनाए रखी और वहां रह कर ही हनुमान चालीसा की रचना की और लगातार 40 दिन तक उसका निरंतर पाठ किया। चालीसवें दिन एक चमत्कार हुआ। हजारों बंदरों ने एक साथ अकबर के राज्य पर हमला बोल दिया। अचानक हुए इस हमले से सब अचंभित हो गए। अकबर एक सूझवान बादशाह था इसलिए इसका कारण समझते देर न लगी। उसे भक्ति की महिमा समझ में आ गई। उसने उसी क्षण तुलसीदास जी से क्षमा मांग कर कारागार से मुक्त किया और आदर सहित उन्हें विदा किया। इतना ही नहीं अकबर ने उस दिन के बाद तुलसीदास जी से जीवनभर मित्रता निभाई। इस तरह तुलसीदास जी ने एक व्यक्ति को कठिनाई की घड़ी से निकलने के लिए हनुमान चालीसा के रूप में एक ऐसा रास्ता दिया है। जिस पर चल कर हम किसी भी मंजिल को प्राप्त कर सकते हैं। इस तरह हमें भी भगवान में अपनी आस्था को बरक़रार रखना चाहिए। ये दुनिया एक उम्मीद पर टिकी है। अगर विश्वास ही न हो तो हम दुनिया का कोई भी काम नहीं कर सकते। 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 #हनुमानचालीसा रचना की रोचक कहानी 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 भगवान को अगर किसी युग में आसानी से प्राप्त किया जा सकता है तो वह युग है कलियुग। इस कथन को सत्य करता एक दोहा रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने लिखा है कलियुग केवल नाम अधारा , सुमिर सुमिर नर उतरहि पारा। जिसका अर्थ है की कलयुग में मोक्ष प्राप्त करने का एक ही लक्ष्य है वो है भगवान का नाम लेना। तुलसीदास ने अपने पूरे जीवन में कोई भी ऐसी बात नहीं लिखी जो गलत हो। उन्होंने अध्यात्म जगत को बहुत सुन्दर रचनाएँ दी हैं। ऐसा माना जाता है कि कलयुग में हनुमान जी सबसे जल्दी प्रसन्न हो जाने वाले भगवान हैं। उन्होंने हनुमान जी की स्तुति में कई रचनाएँ रची जिनमें हनुमान बाहुक, हनुमानाष्टक और हनुमान चालीसा प्रमुख हैं। हनुमान चालीसा की रचना के पीछे एक बहुत जी रोचक कहानी है जिसकी जानकारी शायद ही किसी को हो। आइये जानते हैं हनुमान चालीसा की रचना की कहानी :- ये बात उस समय की है जब भारत पर मुग़ल सम्राट अकबर का राज्य था। सुबह का समय था एक महिला ने पूजा से लौटते हुए तुलसीदास जी के पैर छुए। तुलसीदास जी ने नियमानुसार उसे सौभाग्यशाली होने का आशीर्वाद दिया। आशीर्वाद मिलते ही वो महिला फूट-फूट कर रोने लगी और रोते हुए उसने बताया कि अभी-अभी उसके पति की मृत्यु हो गई है। इस बात का पता चलने पर भी तुलसीदास जी जरा भी विचलित न हुए और वे अपने आशीर्वाद को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त थे। क्योंकि उन्हें इस बात का ज्ञान भली भाँति था कि भगवान राम बिगड़ी बात संभाल लेंगे और उनका आशीर्वाद खाली नहीं जाएगा। उन्होंने उस औरत सहित सभी को राम नाम का जाप करने को कहा। वहां उपस्थित सभी लोगों ने ऐसा ही किया और वह मरा हुआ व्यक्ति राम नाम के जाप आरंभ होते ही जीवित हो उठा। यह बात पूरे राज्य में जंगल की आग की तरह फैल गयी। जब यह बात बादशाह अकबर के कानों तक पहुंची तो उसने अपने महल में तुलसीदास को बुलाया और भरी सभा में उनकी परीक्षा लेने के लिए कहा कि कोई चमत्कार दिखाएँ। ये सब सुन कर तुलसीदास जी ने अकबर से बिना डरे उसे बताया की वो कोई चमत्कारी बाबा नहीं हैं, सिर्फ श्री राम जी के भक्त हैं। अकबर इतना सुनते ही क्रोध में आ गया और उसने उसी समय सिपाहियों से कह कर तुलसीदास जी को कारागार में डलवा दिया। तुलसीदास जी ने तनिक भी प्रतिक्रिया नहीं दी और राम का नाम जपते हुए कारागार में चले गए। उन्होंने कारागार में भी अपनी आस्था बनाए रखी और वहां रह कर ही हनुमान चालीसा की रचना की और लगातार 40 दिन तक उसका निरंतर पाठ किया। चालीसवें दिन एक चमत्कार हुआ। हजारों बंदरों ने एक साथ अकबर के राज्य पर हमला बोल दिया। अचानक हुए इस हमले से सब अचंभित हो गए। अकबर एक सूझवान बादशाह था इसलिए इसका कारण समझते देर न लगी। उसे भक्ति की महिमा समझ में आ गई। उसने उसी क्षण तुलसीदास जी से क्षमा मांग कर कारागार से मुक्त किया और आदर सहित उन्हें विदा किया। इतना ही नहीं अकबर ने उस दिन के बाद तुलसीदास जी से जीवनभर मित्रता निभाई। इस तरह तुलसीदास जी ने एक व्यक्ति को कठिनाई की घड़ी से निकलने के लिए हनुमान चालीसा के रूप में एक ऐसा रास्ता दिया है। जिस पर चल कर हम किसी भी मंजिल को प्राप्त कर सकते हैं। इस तरह हमें भी भगवान में अपनी आस्था को बरक़रार रखना चाहिए। ये दुनिया एक उम्मीद पर टिकी है। अगर विश्वास ही न हो तो हम दुनिया का कोई भी काम नहीं कर सकते। 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰

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Kabir Chaudhary Mar 1, 2021

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Kabir Chaudhary Mar 2, 2021

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