मायमंदिर फ़्री कुंडली
डाउनलोड करें
Gumansingh Rathore
Gumansingh Rathore Sep 19, 2017

भोजन करने से पहले भगवान को भोग लगाने का क्यों है नियम?

भोजन करने से पहले भगवान को भोग लगाने का क्यों है नियम?

अपने देखा होगा कि कई लोग भोजन करने से पहले भगवान का ध्यान करते हैं। कुछ लोग भगवान के नाम पर भोजन का कुछ अंश थाली से बाहर रखकर नैवैद्य रुप में अर्पित करते हैं। इसके पीछे धार्मिक कारण के साथ ही वैज्ञानिक कारण भी है।

सबसे पहले धार्मिक कारणों की बात करते हैं। गीता के तीसरे अध्याय में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि व्यक्ति बिना यज्ञ किए भोजन करता है वह चोरी का अन्न खाता है। इसका अर्थ हो जो व्यकि भगवान को अर्पित किए बिना भोजन करता है वह अन्न देने वाले भगवान से अन्न की चोरी करता है। ऐसे व्यक्ति को उसी प्रकार का दंड मिलता है जैसे किसी की वस्तु को चुराने वाले को सजा मिलती है।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में लिखा है 'अन्न विष्टा, जलं मूत्रं, यद् विष्णोर निवेदितम्। यानी भगवान को बिना भोग लगाया हुआ अन्न विष्टा के समान और जल मूत्र के तुल्य है। ऐसा भोजन करने से शरीर में विकार उत्पन्न होता है और विभिन्न प्रकार के रोग होते हैं।

वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो स्वस्थ रहने के लिए भोजन करते समय मन को शांत और निर्मल रखना चाहिए। अशांत मन से किया गया भोजन पचने में कठिन होता है। इससे स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसलिए मन की शांति के लिए भोजन से पहले अन्न का कुछ भाग भगवान को अर्पित करके ईश्वर का ध्यान करने की सलाह वेद और पुराणों में दी गई है।
-
- ॥हरिॐ॥

+132 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 104 शेयर

कामेंट्स

🕉️🕉️जय श्री सच्चिदानंद स्वरूपाय नमः 🕉️🕉️ 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 सतसंग वाणी 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 एक समय ऋषभदेव के पुत्र नौ योगी ऋषियों के साथ चौमासा व्यतीत करने के लिए महाराज जनक जी के यहाँ ठहरने के लिए आये हुए थे। तब वही पर महाराज जनक जी ने योगीश्वर से हाथ जोड़कर पूछा हे-- महात्मन ! भक्ति किस प्रकार हो सकती है। ***** योगी सुखद और सुहावने वचन के साथ बोला ---हे विदेहराज जनक मै उसके सुन्दर लक्षण बतलाता हू सुनो- कभी हँसते हुए जब चित प्रसन्न हो जाता है, तो उसी को कभी क्रोध के लक्षण भी हो जाते हैं। इसलिए तुम भगवान् से स्नेह कर सकने के लिए भक्ति धारण करो।सगुण ज्ञान से ही सब भवसागर से तर जाते हैं। **** हमारी आयु बड़ी बीत गई , हम ममता में फसे रहे आयु रोती है कि बिना हरि भक्ति के इतनी आयु बीत गई। **** भक्ति के तीन लक्षण बताये गए हैं--उत्तम, मध्यम और निष्कृत । जो सारे चराचर जगत में उस एक ही परब्रम्ह को देखता है वही भक्ति का सर्वोत्तम लक्षण है। *** संतजनों की संगति से सत्यमार्ग पर चलना मध्यम भक्ति के लक्षण है। ***** जो रज के बराबर भी एक को नही समझते हैं उस निष्कृत लक्षण में तो सारी दुनिया मोह माया में फँसी हुयी है। जब तक तृष्णा नही मिटती तब तक विरक्त नही होता है। ******************************************* सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। अर्थात :- सर्वदा सत्य की विजय और असत्य की पराजय और सत्य से ही विद्वानों व् महर्षियो का मार्ग विस्तृत होता है। ।।। 🌷🌷🕉️ जय श्री गुरुदेवाय नमः 🕉️🌷🌷 🔲✔️ सत्य सनातन धर्म की सदा जय हो।👏 🔲✔️ धर्म की जय हो। 🔲✔️अधर्म का नाश हो। 🔲✔️मानव समाज का कल्याण हो। 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 🕉️जय श्री राम🕉️

+457 प्रतिक्रिया 84 कॉमेंट्स • 245 शेयर

दो लिंग : नर और नारी । दो पक्ष : शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष। दो पूजा : वैदिकी और तांत्रिकी (पुराणोक्त)। दो अयन : उत्तरायन और दक्षिणायन। तीन देव : ब्रह्मा, विष्णु, शंकर। तीन देवियाँ : महा सरस्वती, महा लक्ष्मी, महा गौरी। तीन लोक : पृथ्वी, आकाश, पाताल। तीन गुण : सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण। तीन स्थिति : ठोस, द्रव, वायु। तीन स्तर : प्रारंभ, मध्य, अंत। तीन पड़ाव : बचपन, जवानी, बुढ़ापा। तीन रचनाएँ : देव, दानव, मानव। तीन अवस्था : जागृत, मृत, बेहोशी। तीन काल : भूत, भविष्य, वर्तमान। तीन नाड़ी : इडा, पिंगला, सुषुम्ना। तीन संध्या : प्रात:, मध्याह्न, सायं। तीन शक्ति : इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति। चार धाम : बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम्, द्वारका। चार मुनि : सनत, सनातन, सनंद, सनत कुमार। चार वर्ण : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। चार निति : साम, दाम, दंड, भेद। चार वेद : सामवेद, ॠग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद। चार स्त्री : माता, पत्नी, बहन, पुत्री। चार युग : सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग, कलयुग। चार समय : सुबह, शाम, दिन, रात। चार अप्सरा : उर्वशी, रंभा, मेनका, तिलोत्तमा। चार गुरु : माता, पिता, शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु। चार प्राणी : जलचर, थलचर, नभचर, उभयचर। चार जीव : अण्डज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज। चार वाणी : ओम्कार्, अकार्, उकार, मकार्। चार आश्रम : ब्रह्मचर्य, ग्राहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास। चार भोज्य : खाद्य, पेय, लेह्य, चोष्य। चार पुरुषार्थ : धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। चार वाद्य : तत्, सुषिर, अवनद्व, घन। पाँच तत्व : पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल, वायु। पाँच देवता : गणेश, दुर्गा, विष्णु, शंकर, सुर्य। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा। पाँच कर्म : रस, रुप, गंध, स्पर्श, ध्वनि। पाँच उंगलियां : अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा। पाँच पूजा उपचार : गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य। पाँच अमृत : दूध, दही, घी, शहद, शक्कर। पाँच प्रेत : भूत, पिशाच, वैताल, कुष्मांड, ब्रह्मराक्षस। पाँच स्वाद : मीठा, चर्खा, खट्टा, खारा, कड़वा। पाँच वायु : प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान। पाँच इन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा, मन। पाँच वटवृक्ष : सिद्धवट (उज्जैन), अक्षयवट (Prayagraj), बोधिवट (बोधगया), वंशीवट (वृंदावन), साक्षीवट (गया)। पाँच पत्ते : आम, पीपल, बरगद, गुलर, अशोक। पाँच कन्या : अहिल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी। छ: ॠतु : शीत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, बसंत, शिशिर। छ: ज्ञान के अंग : शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष। छ: कर्म : देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान। छ: दोष : काम, क्रोध, मद (घमंड), लोभ (लालच), मोह, आलस्य। सात छंद : गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती। सात स्वर : सा, रे, ग, म, प, ध, नि। सात सुर : षडज्, ॠषभ्, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद। सात चक्र : सहस्त्रार, आज्ञा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मुलाधार। सात वार : रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि। सात मिट्टी : गौशाला, घुड़साल, हाथीसाल, राजद्वार, बाम्बी की मिट्टी, नदी संगम, तालाब। सात महाद्वीप : जम्बुद्वीप (एशिया), प्लक्षद्वीप, शाल्मलीद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप, पुष्करद्वीप। सात ॠषि : वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वामदेव, शौनक। सात ॠषि : वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, भारद्वाज। सात धातु (शारीरिक) : रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य। सात रंग : बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल। सात पाताल : अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल। सात पुरी : मथुरा, हरिद्वार, काशी, अयोध्या, उज्जैन, द्वारका, काञ्ची। सात धान्य : उड़द, गेहूँ, चना, चांवल, जौ, मूँग, बाजरा। आठ मातृका : ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, ऐन्द्री, वाराही, नारसिंही, चामुंडा। आठ लक्ष्मी : आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी। आठ वसु : अप (अह:/अयज), ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभास। आठ सिद्धि : अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व। आठ धातु : सोना, चांदी, ताम्बा, सीसा जस्ता, टिन, लोहा, पारा। नवदुर्गा : शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री। नवग्रह : सुर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु। नवरत्न : हीरा, पन्ना, मोती, माणिक, मूंगा, पुखराज, नीलम, गोमेद, लहसुनिया। नवनिधि : पद्मनिधि, महापद्मनिधि, नीलनिधि, मुकुंदनिधि, नंदनिधि, मकरनिधि, कच्छपनिधि, शंखनिधि, खर्व/मिश्र निधि। दस महाविद्या : काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्तिका, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला। दस दिशाएँ : पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आग्नेय, नैॠत्य, वायव्य, ईशान, ऊपर, नीचे। दस दिक्पाल : इन्द्र, अग्नि, यमराज, नैॠिति, वरुण, वायुदेव, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा, अनंत। दस अवतार (विष्णुजी) : मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि। दस सति : सावित्री, अनुसुइया, मंदोदरी, तुलसी, द्रौपदी, गांधारी, सीता, दमयन्ती, सुलक्षणा, अरुंधती। उक्त जानकारी शास्त्रोक्त 📚 आधार पर... हैं । *हर हर महादेव...* 🏹 🙏 सब सनातनी हिन्दू के पास जानकारी होनी चाहिए

+23 प्रतिक्रिया 5 कॉमेंट्स • 129 शेयर

भोजन सम्बन्धी कुछ नियम ... १ - पांच अंगो ( दो हाथ , २ पैर , मुख ) को अच्छी तरह से धो कर ही भोजन करे ! २. गीले पैरों खाने से आयु में वृद्धि होती है ! ३. प्रातः और सायं ही भोजन का विधान है ! ४. पूर्व और उत्तर दिशा की ओर मुह करके ही खाना चाहिए ! ५. दक्षिण दिशा की ओर किया हुआ भोजन प्रेत को प्राप्त होता है ! ६ . पश्चिम दिशा की ओर किया हुआ भोजन खाने से रोग की वृद्धि होती है ! ७. शैय्या पर , हाथ पर रख कर , टूटे फूटे वर्तनो में भोजन नहीं करना चाहिए ! ८. मल मूत्र का वेग होने पर , कलह के माहौल में , अधिक शोर में , पीपल ,वट वृक्ष के नीचे , भोजन नहीं करना चाहिए ! ९ परोसे हुए भोजन की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए ! १०. खाने से पूर्व अन्न देवता , अन्नपूर्णा माता की स्तुति कर के ,उनका धन्यवाद देते हुए , तथा सभी भूखो को भोजन प्राप्त हो इस्वर से ऐसी प्राथना करके भोजन करना चाहिए ! ११. भोजन बनने वाला स्नान करके ही शुद्ध मन से , मंत्र जप करते हुए ही रसोई में भोजन बनाये और सबसे पहले ३ रोटिया अलग निकाल कर ( गाय , कुत्ता , और कौवे हेतु ) फिर अग्नि देव का भोग लगा कर ही घर वालो को खिलाये ! १२. इर्षा , भय , क्रोध , लोभ , रोग , दीन भाव , द्वेष भाव , के साथ किया हुआ भोजन कभी पचता नहीं है ! १३. आधा खाया हुआ फल , मिठाईया आदि पुनः नहीं खानी चाहिए ! १४. खाना छोड़ कर उठ जाने पर दुबारा भोजन नहीं करना चाहिए ! १५. भोजन के समय मौन रहे ! १६. भोजन को बहुत चबा चबा कर खाए ! १७. रात्री में भरपेट न खाए ! १८. गृहस्थ को ३२ ग्रास से ज्यादा न खाना चाहिए ! १९. सबसे पहले मीठा , फिर नमकीन ,अंत में कडुवा खाना चाहिए ! २०. सबसे पहले रस दार , बीच में गरिस्थ , अंत में द्राव्य पदार्थ ग्रहण करे ! २१. थोडा खाने वाले को --आरोग्य ,आयु , बल , सुख, सुन्दर संतान , और सौंदर्य प्राप्त होता है ! २२. जिसने ढिढोरा पीट कर खिलाया हो वहा कभी न खाए ! २३. कुत्ते का छुवा ,रजस्वला स्त्री का परोसा , श्राध का निकाला , बासी , मुह से फूक मरकर ठंडा किया , बाल गिरा हुवा भोजन ,अनादर युक्त , अवहेलना पूर्ण परोसा गया भोजन कभी न करे ! २४. कंजूस का , राजा का , वेश्या के हाथ का , शराब बेचने वाले का दिया भोजन कभी नहीं करना चाहिए !...

+25 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 103 शेयर
SUNIL KUMAR SHARMA Jul 17, 2019

एक बार महर्षि नारद को यह अहंकार हो गया था,कि वही भगवान श्री हरि विष्णु के सबसे बड़े भक्त हैं। भगवान विष्णु का उनसे बड़ा भक्त तीनों लोकों में कोई नहीं है। महर्षि नारद अपनी इसी अहंकार की मस्ती में एक दिन पृथ्वी पर पहुंचे। पर जब वह पृथ्वी लोक पर पहुंचे, तो उन्हें बड़ा ही आश्चर्य हुआ… क्योंकि पृथ्वी लोक पर हर एक व्यक्ति भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण के साथ राधा का ही नाम ले रहा था। महर्षि नारद पृथ्वी लोक पर राधा रानी की स्तुति भगवान श्रीकृष्ण के नाम के साथ सुनकर बड़े ही खींच गए। तथा वह सोचने लगे कि भगवान श्री विष्णु से सबसे ज्यादा प्रेम तो मैं करता हूं, भगवान विष्णु का तो सबसे बड़ा भक्त मैं हूं… दिन-रात उन्हीं के नाम का गुणगान करते रहता हूं। इसके बावजूद भी उनके नाम के साथ मेरा नाम जोड़ने के बजाय आखिर क्यों पृथ्वी लोक के इंसान राधा नाम को जोड़ रहे हैं। अपने इस समस्या को लेकर महर्षि नारद मुनि भगवान श्रीकृष्ण के पास गए। परंतु जब वह भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि भगवान श्रीकृष्ण तो अस्वस्थ हैं। तथा वह सर की पीड़ा से कराह रहे हैं। भगवान श्रीकृष्ण को इस हालत में देख कर महर्षि नारद का दिल द्रवित हो उठा। तथा उन्होंने भगवान् श्री कृष्ण से कहा… कि भगवन आप मुझे तुरंत बताइए, कि मैं किस प्रकार आपकी इस पीड़ा को दूर कर सकता हूं। यदि इसके लिए मुझे अपने प्राणों का त्याग भी करना पड़े, तो भी मैं इसमें जरा सी भी देरी नहीं करुंगा। तब भगवान श्रीकृष्ण महर्षि नारद जी से बोले… आपको मेरे इस पीड़ा के लिए अपने प्राण त्यागने की जरूरत नहीं है। मुझे तो यदि कोई मेरा भक्त अपने चरणों का धुला हुआ पानी (चरणामृत) पिला दे, तो मैं इस पीड़ा से मुक्त हो जाऊं। श्रीकृष्ण की बात सुनकर महर्षि नारद जी सोचने लगे कि स्वयं पूरे जगत के पालक, परमात्मा भगवान श्रीकृष्ण को यदि मैं अपने पैरों का धुला हुआ जल (चरणामृत) पिने दूंगा, तो मुझे घोर नरक की प्राप्ति होगी। मैं इतने बड़े पापा को अपने ऊपर नहीं ले सकता। महर्षि नारद यह सब सोचकर भगवान श्री कृष्ण को अपनी असमर्थता जताते हैं। तब भगवान श्रीकृष्ण महर्षि नारद जी से बोले, यदि आप यह कार्य नहीं कर सकते तो कृपया आप मेरी तीनों पत्नियों के पास जाकर यह सारी बात बताएं। संभवता मेरी पत्नियां मेरी इस पीड़ा को दूर करने में मेरी कुछ मदद कर दे।श्री कृष्ण की आज्ञा से महर्षि नारद सबसे पहले श्री कृष्ण की सबसे प्रिय पत्नी रुकमणी के पास गए। और उन्हें जाकर सारा वृत्तांत बताया, परंतु रुकमणी ने भी अपना चरनाअमृत देने से मना कर दिया। इसके बाद नारदजी एक-एक करके कृष्ण के और भी दो पत्नियां सत्यभामा  और जमाबंदी के पास गए। पर उन दोनों ने भी यह पाप करने से मना कर दिया। तब हारकर नारद मुनि भगवान श्रीकृष्ण के पास आ गए। और उन्हें पूरी बात बताई। तब भगवान श्रीकृष्ण ने महर्षि नारद से राधा के पास जाकर उनसे मदद मांगने को कहा। भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा पाकर नारद जी कृष्ण की प्रेयसी राधा के पास पहुंचे। और राधा के पास जाकर जैसे ही नारद जी ने उन्हें भगवान श्रीकृष्ण का हाल सुनाया। राधा ने बगैर कुछ सोचे-समझे और बिना विचार किये  एक जल से भरा पात्र लिया, तथा उसने अपने दोनों चरणों को धो दिया। राधा रानी ने अपने पैरों से धुले हुए उस जल के पात्र को महर्षि नारद को पकड़ाते हुए,राधा जी नारद से बोली कि मैं जानती हूं… कि मेरे इस कार्य के लिए मुझे रौरव नामक नरक, तथा उसी के समान अनेकों नरकों की प्राप्ति होगी। परंतु मैं अपने प्रियतम श्रीकृष्ण को होने वाली पीड़ा को बिल्कुल भी सहन नहीं कर सकती। उन्हें पीड़ा से मुक्त करने के लिए मैं अनेकों नरक की यातना सहने और झेलने को तैयार हूं। नारदजी तुरंत राधा के पैरों से धुले हुए जल के पात्र को लेकर भगवान श्रीकृष्ण के पास पहुंचे।  पर जब नारद जी श्री कृष्णा के पास पहुंचे तो वे देखते है की, श्रीकृष्ण मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं। तब नारद को ज्ञात हो गया कि क्यों पृथ्वी लोक के सभी वासी राधे-कृष्ण के प्रेम का स्तुति गान कर रहे हैं। महर्षि नारद ने भी अपनी वीणा पकड़ी,और नारद जी भी श्री राधे-कृष्ण नाम का गुणगान करने लगे । जय श्री राधे कृष्णा 🙏🙏🙏🙏

+617 प्रतिक्रिया 112 कॉमेंट्स • 219 शेयर
gopal Krishna Jul 17, 2019

+13 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 47 शेयर
gopal Krishna Jul 17, 2019

+11 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 39 शेयर
gopal Krishna Jul 17, 2019

+17 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 53 शेयर
gopal Krishna Jul 17, 2019

+12 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 42 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB