Deepika Bhansali
Deepika Bhansali Jan 14, 2020

https://youtu.be/yg0RX2OW2SI

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प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या १८.६६ . प्रश्न १ : अध्यात्मवादी कितने प्रकार के होते हैं ? इनमें से सर्वश्रेष्ठ कौन है ? मनुष्य इस अवस्था तक किस प्रकार पहुँच सकता है ? . उत्तर १ : "अध्यात्मवादी कई प्रकार के होते हैं - कुछ निर्गुण ब्रह्म के प्रति आकृष्ट होते हैं, कुछ परमात्मा के प्रति लेकिन जो भगवान् के साकार रूप के प्रति आकृष्ट होता है और इससे भी बढ़कर जो साक्षात् भगवान् कृष्ण के प्रति आकृष्ट होता है, वह सर्वोच्च योगी है | दूसरे शब्दों में, अनन्यभाव से कृष्ण की भक्ति गुह्यतम ज्ञान है और सम्पूर्ण गीता का यही सार है | कर्मयोगी, दार्शनिक, योगी तथा भक्त सभी अध्यात्मवादी कहलाते हैं, लेकिन इनमें से शुद्धभक्त ही सर्वश्रेष्ठ है | यहाँ पर मा शुचः (मत डरो, मत झिझको, मत चिन्ता करो) विशिष्ट शब्दों का प्रयोग अत्यन्तसार्थक है | मनुष्य को यह चिन्ता होती है कि वह किस प्रकार सारे धर्मों को त्यागे और एकमात्र कृष्ण की शरण में जाए,लेकिन ऐसी चिन्ता व्यर्थ है |" ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: प्रश्न २ : इस श्लोक में किन-किन धार्मिक विधियों का वर्णन है ? इन विधियों के क्या लाभ हैं ? मनुष्य एक बार में ही इन सभी धार्मिक विधियों के लाभ को किस प्रकार प्राप्त कर सकता है ? . उत्तर २ : "भगवान् ने अनेक प्रकार के ज्ञान तथा धर्म की विधियाँ बताई हैं - परब्रह्म का ज्ञान, परमात्मा का ज्ञान, अनेक प्रकार के आश्रमों तथा वर्णों का ज्ञान, संन्यास का ज्ञान, अनासक्ति, इन्द्रिय तथा मन का संयम, ध्यान आदि का ज्ञान । उन्होंने अनेक प्रकार से नाना प्रकार के धर्मों का वर्णन किया है । अब, भगवद्गीता का सार प्रस्तुत करते हुए भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! अभी तक बताई गई सारी विधियों का परित्याग करके, अब केवल मेरी शरण में आओ । इस शरणागति से वह समस्त पापों से बच जाएगा, क्योंकि भगवान् स्वयं उसकी रक्षा का वचन दे रहे हैं ।" . "धर्म की विविध विधियाँ हैं और ज्ञान, ध्यानयोग आदि जैसे शुद्ध करने वाले अनुष्ठान हैं, लेकिन जो कृष्ण के शरणागत हो जाता है, उसे इतने सारे अनुष्ठानों के पालन की आवश्यकता नहीं रह जाती | कृष्ण की शरण में जाने मात्र से वह व्यर्थ समय गँवाने से बच जाएगा | इस प्रकार वह तुरन्त सारी उन्नति कर सकता है और समस्त पापों से मुक्त हो सकता है |" . सन्दर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता १८.६६, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद

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हरे कृष्णा | हम १३ फरवरी २०२० से श्रीमद्भागवद्गीता श्लोक प्रति श्लोक फिर से शुरू करेंगे | . *कृपया प्रश्नों के उत्तर कमेंट्स में दें* आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- १८.७८ अध्याय अठारह : उपसंहार - संन्यास की सिद्धि . . यत्र योगेश्र्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः | तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवो नीतिर्मतिर्मम || ७८ || .. . यत्र– जहाँ; योग-ईश्र्वरः– योग के स्वामी; कृष्णः– भगवान् कृष्ण;यत्र– जहाँ; पार्थः– पृथापुत्र; धनुः–धरः– धनुषधारी; तत्र– वहाँ; श्रीः– ऐश्र्वर्य; विजयः– जीत;भूतिः– विलक्षण शक्ति; ध्रुवा– निश्चित; नीतिः– नीति; मतिः मम– मेरा मत | . . जहाँ योगेश्र्वर कृष्ण है और जहाँ परम धनुर्धर अर्जुन हैं, वहीँ ऐश्र्वर्य, विजय, अलौकिक शक्ति तथा नीति भी निश्चित रूप से रहती है | ऐसा मेरा मत है | . . तात्पर्य :भगवद्गीता का शुभारम्भ धृतराष्ट्र की जिज्ञासा से हुआ | वह भीष्म, द्रोण तथा कर्ण जैसे महारथियों की सहायता से अपने पुत्रों की विजय के प्रति आशावान था | उसे आशा थी कि विजय उसके पक्ष में होगी | लेकिन युद्धक्षेत्र के दृश्य का वर्णन करने के बाद संजय ने राजा से कहा “आप अपनी विजय की बात सोच रहें हैं, लेकिन मेरा मत है कि जहाँ कृष्ण तथा अर्जुन उपस्थित हैं, वहीँ सम्पूर्ण श्री होगी |” उसने प्रत्यक्ष पुष्टि की कि धृतराष्ट्र को अपने पक्ष की विजय की आशा नहीं रखनी चाहिए | विजय तो अर्जुन के पक्ष की निश्चित है, क्योंकि उसमें कृष्ण हैं | श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन के सारथी का पद स्वीकार करना एक ऐश्र्वर्य का प्रदर्शन था | कृष्ण समस्त ऐश्र्वर्यों से पूर्ण हैं और इनमें से वैराग्य एक है | ऐसे वैराग्य के भी अनेक उदाहरण हैं, क्योंकि कृष्ण वैराग्य के भी ईश्र्वर हैं | ... युद्ध तो वास्तव में दुर्योधन तथा युधिष्ठिर के बीच था | अर्जुन अपने ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर की ओर से लड़ रहा था | चूँकि कृष्ण तथा अर्जुन युधिष्ठिर की ओर थे अतएव युधिष्ठिर की विजय ध्रुव थी | युद्ध को यह निर्णय करना था कि संसार पर शासन कौन करेगा | संजय ने भविष्यवाणी की कि सत्ता युधिष्ठिर के हाथ में चली जाएगी | यहाँ पर इसकी भी भविष्यवाणी हुई है कि इस युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद युधिष्ठिर उत्तरोत्तर समृद्धि करेंगे, क्योंकि वे न केवल पुण्यात्मा तथा पवित्रात्मा थे, अपितु वे कठोर नीतिवादी थे | उन्होंने जीवन भर कभी असत्य भाषण नहीं किया था | ऐसे अनेक अल्पज्ञ व्यक्ति हैं, जो भगवद्गीता को युद्धस्थल में दो मित्रों की वार्ता के रूप में ग्रहण करते हैं | लेकिन इससे ऐसा ग्रंथ कभी शास्त्र नहीं बन सकता | कुछ लोग विरोध कर सकते हैं कि कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध करने के लिए उकसाया, जो अनैतिक है, लेकिन वास्तविकता तो यह है कि भगवद्गीता नीति का परम आदेश है | यह नीति विषयक आदेश नवें अध्याय के चौंतीसवें श्लोक में है – मन्मना भव मद्भक्तः| मनुष्य को कृष्ण का भक्त बनना चाहिए और सारे धर्मों का सार है – कृष्ण की शरणागति (सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज) | भगवद्गीता का आदेश धर्म तथा नीति की परम विधि है | अन्य सारी विधियाँ भले ही शुद्ध करने वाली तथा इस विधि तक ले जाने वाली हों, लेकिन गीता का अन्तिम सन्देश समस्त नीतियों तथा धर्मों का सार वचन है – कृष्ण की शरण ग्रहण करो या कृष्ण को आत्मसमर्पण करो | यह अठारहवें अध्याय का मत है | . भगवद्गीता से हम यह समझ सकते हैं कि ज्ञान तथा ध्यान द्वारा अपनी अनुभूति एक विधि है, लेकिन कृष्ण की शरणागति सर्वोच्च सिद्धि है | यह भगवद्गीता के उपदेशों का सार है | वर्णाश्रम धर्म के अनुसार अनुष्ठानों (कर्मकाण्ड) का मार्ग, ज्ञान का गुह्य मार्ग हो सकता है | लेकिन धर्म के अनुष्ठान के गुह्य होने पर भी ध्यान तथा ज्ञान गुह्यतर हैं तथा पूर्ण कृष्णभावनाभावित होकर भक्ति में कृष्ण की शरणागति गुह्यतम उपदेश है | यही अठारहवें अध्याय का सार है | . भगवद्गीता की अन्य विशेषता यह है कि वास्तविक सत्य भगवान् कृष्ण हैं | परम सत्य की अनुभूति तीन रूपों में होती है – निर्गुण ब्रह्म, अन्तर्यामी परमात्मा तथा भगवान् श्रीकृष्ण | परम सत्य के पूर्ण ज्ञान का अर्थ है, कृष्ण का पूर्ण ज्ञान | यदि कोई कृष्ण को जान लेता है तो ज्ञान के सारे विभाग इसी ज्ञान के अंश हैं | कृष्ण दिव्य हैं क्योंकि वे अपनी नित्य अन्तरंगा शक्ति में स्थित रहते हैं | जीव उनकी शक्ति से प्रकट हैं और दो श्रेणी के होते हैं – नित्यबद्ध तथा नित्यमुक्त | ऐसे जीवों की संख्या असंख्य है और वे सब कृष्ण के मूल अंश माने जाते हैं | भौतिक शक्ति २४ प्रकार से प्रकट होती है | सृष्टि शाश्र्वत काल द्वारा प्रभावित है और बहिरंगाशक्ति द्वारा इसका सृजन तथा संहार होता है | यह दृश्य जगत पुनःपुनः प्रकट तथा अप्रकट होता रहता है | . भगवद्गीता में पाँच प्रमुख विषयों की व्याख्या की गई है – भगवान्, भौतिक प्रकृति, जीव, शाश्र्वतकाल तथा सभी प्रकार के कर्म | सब कुछ भगवान् कृष्ण पर आश्रित है | परमसत्यत की सभी धारणाएँ – निराकार ब्रह्म, अन्तर्यामी परमात्मा तथा अन्य दिव्य अनुभूतियाँ – भगवान् के ज्ञान की कोटि में सन्निहित हैं | यद्यपि ऊपर से भगवान्, जीव, प्रकृति तथा काल भिन्न प्रतीत होते हैं, लेकिन ब्रह्म से कुछ भी भिन्न नहीं है | लेकिन ब्रह्म सदैव समस्त वस्तुओं से भिन्न है | भगवान् चैतन्य का दर्शन है “अचिन्त्यभेदाभेद” | यह दर्शन पद्धति परमसत्य के पूर्णज्ञान से युक्त है | . जीव अपने मूलरूप में शुद्ध आत्मा है | वह परमात्मा का एक परमाणु मात्र है | इस प्रकार भगवान् कृष्ण की उपमा सूर्य से दी जा सकती है और जीवों की सूर्यप्रकाश से | चूँकि सारे जीव कृष्ण की तटस्था शक्ति हैं, अतएव उनका संसर्ग भौतिक शक्ति (अपरा) या आध्यात्मिक शक्ति (परा) से होता है | दूसरे शब्दों में, जीव भगवान् की पराशक्ति से है, अतएव उसमें किंचित् स्वतन्त्रता रहती है | इस स्वतन्त्रता के सदुपयोग से ही वह कृष्ण के प्रत्यक्ष आदेश के अन्तर्गत आता है | इस प्रकार वह ह्लादिनी शक्ति की अपनी सामान्य दशा को प्राप्त होता है | . इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय “उपसंहार-संन्यास की सिद्धि” का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ | . . प्रश्न १ : भगवद्गीता में किन पाँच प्रमुख विषयों की व्याख्या की गई है ? . प्रश्न २ : परम सत्य की अनुभूति किन तीन रूपों में होती है ? इनमें से पूर्ण ज्ञान क्या है ?

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प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या १८.५५ . प्रश्न १ : विशते शब्द का क्या महत्त्व है ? इसे इस श्लोक में किन उदाहरणों द्वारा समझाया गया है ? . उत्तर १ : "मुक्ति का अर्थ देहात्मबुद्धि से मुक्ति प्राप्त करना है | आध्यात्मिक जीवन में वैसा ही अन्तर, वही व्यक्तित्व (स्वरूप) बना रहता है, लेकिन शुद्ध कृष्णभावनामृत में ही विशते शब्द का अर्थ है “मुझमें प्रवेश करता है|” भ्रमवश यह नहीं सोचना चाहिए कि यह शब्द अद्वैतवाद का पोषक है और मनुष्य निर्गुण ब्रह्म से एकाकार हो जाता है | ऐसा नहीं है |विशते का तात्पर्य है कि मनुष्य अपने व्यक्तित्व सहित भगवान् के धाम में, भगवान् की संगति करने तथा उनकी सेवा करने के लिए प्रवेश कर सकता है | उदाहरणार्थ, एक हरा पक्षी (शुक) हरे वृक्ष में इसलिए प्रवेश नहीं करता कि वह वृक्ष से तदाकार (लीन) हो जाय, अपितु वह वृक्ष के फलों का भोग करने के लिए प्रवेश करता है | निर्विशेषवादी सामान्यतया समुद्र में गिरने वाली तथा समुद्र से मिलने वाली नदी का दृष्टान्त प्रस्तुत करते हैं | यह निर्विशेषवादियों के लिए आनन्द का विषय हो सकता है, लेकिन साकारवादी अपने व्यक्तित्व को उसी प्रकार बनाये रखना चाहता है, जिस प्रकार समुद्र में एक जलचर प्राणी | यदि हम समुद्र की गहराई में प्रवेश करें तो हमें अनेकानेक जीव मिलते हैं | केवल समुद्र की ऊपरी जानकारी पर्याप्त नहीं है, समुद्र की गहराई में रहने वाले जलचर प्राणियों की भी जानकारी रखना आवश्यक है |" :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: प्रश्न २ : प्रत्येक जीव की स्वाभाविक स्थिति क्या है ? मुक्ति के बाद इसकी प्रकृति को किन वैदिक संदर्भों से समझाया गया है ? . उत्तर २ : "मुक्ति के बाद भक्तियोग चलता रहता है | इसकी पुष्टि वेदान्तसूत्र से (4.१.१२) होती है – आप्रायणात् तत्रापि हि दृष्टम् | इसका अर्थ है कि मुक्ति के बाद भक्तियोग चलता रहता है | श्रीमद्भागवत में वास्तविक भक्तिमयी मुक्ति की जो परिभाषा दी गई है उसके अनुसार यह जीव का अपने स्वरूप या अपनी निजी स्वाभाविक स्थिति में पुनःप्रतिष्ठापित हो जाना है | स्वाभाविक स्थिति की व्याख्या पहले ही की जा चुकी है – प्रत्येक जीव परमेश्र्वर का अंश है, अतएव उसकी स्वाभाविक स्थिति सेवा करने की है | मुक्ति के बाद यह सेवा कभी रूकती नहीं | वास्तविक मुक्ति तो देहात्मबुद्धि की भ्रान्त धारणा से मुक्त होना है |" . सन्दर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता १८.५५, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद

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हरे कृष्णा | हम १३ फरवरी २०२० से श्रीमद्भागवद्गीता श्लोक प्रति श्लोक फिर से शुरू करेंगे | . *कृपया प्रश्नों के उत्तर कमेंट्स में दें* आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- १८.६६ अध्याय अठारह : उपसंहार - संन्यास की सिद्धि . . सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज | अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा श्रुचः || ६६ || . . सर्व-धर्मान् - समस्त प्रकार के धर्म; परित्यज्य - त्यागकर; माम् - मेरी; एकम् - एकमात्र;*शरणम्* - शरण में; व्रज - जाओ; अहम् - मैं; त्वाम् - तुमको; सर्व - समस्त; पापेभ्यः - पापों से; मोक्षयिष्यामि - उद्धार करूँगा;*मा* - मत; शुचः - चिन्ता करो । . . समस्त प्रकार के धर्मों का परित्याग करो और मेरी शरण में आओ । मैं समस्त पापों से तुम्हारा उद्धार कर दूँगा । डरो मत । . . तात्पर्य : भगवान् ने अनेक प्रकार के ज्ञान तथा धर्म की विधियाँ बताई हैं - परब्रह्म का ज्ञान, परमात्मा का ज्ञान, अनेक प्रकार के आश्रमों तथा वर्णों का ज्ञान, संन्यास का ज्ञान, अनासक्ति, इन्द्रिय तथा मन का संयम, ध्यान आदि का ज्ञान । उन्होंने अनेक प्रकार से नाना प्रकार के धर्मों का वर्णन किया है । अब, भगवद्गीता का सार प्रस्तुत करते हुए भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! अभी तक बताई गई सारी विधियों का परित्याग करके, अब केवल मेरी शरण में आओ । इस शरणागति से वह समस्त पापों से बच जाएगा, क्योंकि भगवान् स्वयं उसकी रक्षा का वचन दे रहे हैं । . सातवें अध्याय में यह कहा गया था कि वही कृष्ण की पूजा कर सकता है, जो सारे पापों से मुक्त हो गया हो । इस प्रकार कोई यह सोच सकता है कि समस्त पापों से मुक्त हुए बिना कोई शरणागति नहीं पा सकता है । ऐसे सन्देह के लिए यहाँ यह कहा गया है कि कोई समस्त पापों ऐ मुक्त न भी हो तो केवल श्री कृष्ण के शरणागत होने पर स्वतः मुक्त कर दिया जाता है । पापों से मुक्त होने के लिए कठोर प्रयास करने की कोई आवश्यकता नहीं है । मनुष्य को बिना झिझक के कृष्ण को समस्त जीवों के रक्षक के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए । उसे चाहिए कि श्रद्धा तथा प्रेम से उनकी शरण ग्रहण करे । . हरि भक्ति विलास में (११.६७६) कृष्ण की शरण ग्रहण करने की विधि का वर्णन हुआ है - . आनुकूल्यस्य सङकल्पः प्रातिकूल्यस्य वर्जनम् | रक्षिष्यतीति विश्र्वासो गोप्तृत्वे वरणं तथा | आत्मनिक्षेप कार्पण्ये षड्विधा शरणागतिः || . भक्तियोग के अनुसार मनुष्य हो वही धर्म स्वीकार करना चाहिए, जिससे अन्ततः भगवद्भक्ति हो सके | समाज में अपनी स्थिति के अनुसार कोई एक विशेष कर्म कर सकता है, लेकिन यदि अपना कर्म करने से कोई कृष्णभावनामृत तक नहीं पहुँच पाता,तो उसके सारे कार्यकलाप व्यर्थ हो जाते हैं | जिस कर्म से कृष्णभावनामृत की पूर्णावस्था न प्राप्त हो सके उससे बचना चाहिए | मनुष्य को विश्र्वास होना चाहिए कि कृष्ण समस्त परिस्थितियों में उसकी सभी कठिनाइयों से रक्षा करेंगे | इसके विषय में सोचने की कोई आवश्यकता नहीं कि जीवन-निर्वाह कैसे होगा? कृष्ण इसको सँभालेंगे | मनुष्य को चाहिए कि वह अपने आप को निस्सहाय माने और अपने जीवन की प्रगति के लिए कृष्ण को ही अवलम्ब समझे | पूर्ण कृष्णभावनामृत होकर भगवद्भक्ति में प्रवृत्त होते ही वह प्रकृति के समस्त कल्मष से मुक्त हो जाता है | धर्म की विविध विधियाँ हैं और ज्ञान, ध्यानयोग आदि जैसे शुद्ध करने वाले अनुष्ठान हैं, लेकिन जो कृष्ण के शरणागत हो जाता है, उसे इतने सारे अनुष्ठानों के पालन की आवश्यकता नहीं रह जाती | कृष्ण की शरण में जाने मात्र से वह व्यर्थ समय गँवाने से बच जाएगा | इस प्रकार वह तुरन्त सारी उन्नति कर सकता है और समस्त पापों से मुक्त हो सकता है | . श्रीकृष्ण की सुन्दर छवि के प्रति मनुष्य को आकृष्ट होना चाहिए | उनका नाम कृष्ण इसीलिए पड़ा, क्योंकि वे सर्वाकर्षक हैं | जो व्यक्ति कृष्ण की सुन्दर, सर्वशक्तिमान छवि से आकृष्ट होता है, वह भाग्यशाली है | अध्यात्मवादी कई प्रकार के होते हैं - कुछ निर्गुण ब्रह्म के प्रति आकृष्ट होते हैं, कुछ परमात्मा के प्रति लेकिन जो भगवान् के साकार रूप के प्रति आकृष्ट होता है और इससे भी बढ़कर जो साक्षात् भगवान् कृष्ण के प्रति आकृष्ट होता है, वह सर्वोच्च योगी है | दूसरे शब्दों में, अनन्यभाव से कृष्ण की भक्ति गुह्यतम ज्ञान है और सम्पूर्ण गीता का यही सार है | कर्मयोगी, दार्शनिक, योगी तथा भक्त सभी अध्यात्मवादी कहलाते हैं, लेकिन इनमें से शुद्धभक्त ही सर्वश्रेष्ठ है | यहाँ पर मा शुचः (मत डरो, मत झिझको, मत चिन्ता करो) विशिष्ट शब्दों का प्रयोग अत्यन्तसार्थक है | मनुष्य को यह चिन्ता होती है कि वह किस प्रकार सारे धर्मों को त्यागे और एकमात्र कृष्ण की शरण में जाए,लेकिन ऐसी चिन्ता व्यर्थ है | . प्रश्न १ : अध्यात्मवादी कितने प्रकार के होते हैं ? इनमें से सर्वश्रेष्ठ कौन है ? मनुष्य इस अवस्था तक किस प्रकार पहुँच सकता है ? . प्रश्न २ : इस श्लोक में किन-किन धार्मिक विधियों का वर्णन है ? इन विधियों के क्या लाभ हैं ? मनुष्य एक बार में ही इन सभी धार्मिक विधियों के लाभ को किस प्रकार प्राप्त कर सकता है ?

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हरे कृष्णा | हम १३ फरवरी २०२० से श्रीमद्भागवद्गीता श्लोक प्रति श्लोक फिर से शुरू करेंगे | . *कृपया प्रश्नों के उत्तर कमेंट्स में दें* आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- १८.५५ अध्याय अठारह : उपसंहार - संन्यास की सिद्धि . . भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्र्चास्मि तत्त्वतः | ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् || ५५ || . . भक्त्या– शुद्ध भक्ति से; माम्– मुझको; अभिजानाति– जान सकता है; यावान्– जितना; यः च अस्मि– जैसा मैं हूँ; तत्त्वतः– सत्यतः; ततः– तत्पश्चात्; माम्– मुझको; तत्त्वतः– सत्यतः; ज्ञात्वा– जानकर; विशते– प्रवेश करता है; तत्-अनन्तरम्– तत्पश्चात् | . . केवल भक्ति से मुझ भगवान् को यथारूप में जाना जा सकता है | जब मनुष्य ऐसी भक्ति से मेरे पूर्ण भावनामृत में होता है, तो वह वैकुण्ठ जगत् में प्रवेश कर सकता है | . . तात्पर्य : भगवान् श्रीकृष्ण तथा उनके स्वांशों को न तो मनोधर्म द्वारा जाना जा सकता है, न ही अभक्तगण उन्हें समझ पाते हैं | यदि कोई व्यक्ति भगवान् को समझना चाहता है, तो उसे शुद्ध भक्त के पथप्रदर्शन में शुद्ध भक्ति ग्रहण करनी होती है, अन्यथा भगवान् सम्बन्धी सत्य (तत्त्व) उससे सदा छिपा रहेगा | जैसा कि भगवद्गीता (७.२५) कहा जा चुका है – नाहं प्रकाशः सर्वस्य– मैं सबों के समक्ष प्रकाशित नहीं होता | केवल पाण्डित्य या मनोधर्म द्वारा ईश्र्वर को नहीं समझा जा सकता | कृष्ण को केवल वही समझ पाता है, जो कृष्णभावनामृत तथा भक्ति में तत्पर रहता है | इसमें विश्वविद्यालय की उपाधियाँ सहायक नहीं होती हैं | . जो व्यक्ति कृष्ण विज्ञान (तत्त्व) से पूर्णतया अवगत है, वही वैकुण्ठजगत् या कृष्ण के धाम में प्रवेश कर सकता है | ब्रह्मभूत होने का अर्थ यह नहीं है कि वह अपना स्वरूप खो बैठता है | भक्ति तो रहती ही है और जब तक भक्ति का अस्तित्व रहता है, तब तक ईश्र्वर, भक्त तथा भक्ति की विधि रहती है | ऐसे ज्ञान का नाश मुक्ति के बाद भी नहीं होता | मुक्ति का अर्थ देहात्मबुद्धि से मुक्ति प्राप्त करना है | आध्यात्मिक जीवन में वैसा ही अन्तर, वही व्यक्तित्व (स्वरूप) बना रहता है, लेकिन शुद्ध कृष्णभावनामृत में ही विशते शब्द का अर्थ है “मुझमें प्रवेश करता है|” भ्रमवश यह नहीं सोचना चाहिए कि यह शब्द अद्वैतवाद का पोषक है और मनुष्य निर्गुण ब्रह्म से एकाकार हो जाता है | ऐसा नहीं है |विशते का तात्पर्य है कि मनुष्य अपने व्यक्तित्व सहित भगवान् के धाम में, भगवान् की संगति करने तथा उनकी सेवा करने के लिए प्रवेश कर सकता है | उदाहरणार्थ, एक हरा पक्षी (शुक) हरे वृक्ष में इसलिए प्रवेश नहीं करता कि वह वृक्ष से तदाकार (लीन) हो जाय, अपितु वह वृक्ष के फलों का भोग करने के लिए प्रवेश करता है | निर्विशेषवादी सामान्यतया समुद्र में गिरने वाली तथा समुद्र से मिलने वाली नदी का दृष्टान्त प्रस्तुत करते हैं | यह निर्विशेषवादियों के लिए आनन्द का विषय हो सकता है, लेकिन साकारवादी अपने व्यक्तित्व को उसी प्रकार बनाये रखना चाहता है, जिस प्रकार समुद्र में एक जलचर प्राणी | यदि हम समुद्र की गहराई में प्रवेश करें तो हमें अनेकानेक जीव मिलते हैं | केवल समुद्र की ऊपरी जानकारी पर्याप्त नहीं है, समुद्र की गहराई में रहने वाले जलचर प्राणियों की भी जानकारी रखना आवश्यक है | . भक्त अपनी शुद्ध भक्ति के कारण परमेश्र्वर के दिव्य गुणों तथा ऐश्र्वर्यों को यथार्थ रूप में जान सकता है | जैसा कि ग्याहरवें अध्याय में कहा जा चुका है, केवल भक्ति द्वारा इसे समझा जा सकता है | इसी की पुष्टि यहाँ भी हुई है | मनुष्य भक्ति द्वारा भगवान् को समझ सकता है और उनके धाम में प्रवेश कर सकता है | . भौतिक बुद्धि से मुक्ति की अवस्था – ब्रह्मभूत अवस्था – को प्राप्त कर लेने के बाद भगवान् के विषय में श्रवण करने से भक्ति का शुभारम्भ होता है | जब कोई परमेश्र्वर के विषय में श्रवण करता है, तो स्वतः ब्रह्मभूत अवस्था का उदय होता है और भौतिक कल्मष – यथा लोभ तथा काम – का विलोप हो जाता है | ज्यों-ज्यों भक्त के हृदय से काम तथा इच्छाएँ विलुप्त होती जाती हैं, त्यों-त्यों वह भगवद्भक्ति के प्रति अधिक आसक्त होता जाता है और इस तरह वह भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाता है | जीवन की उस स्थिति में वह भगवान् को समझ सकता है | श्रीमद्भागवत में भी इसका कथन हुआ है | मुक्ति के बाद भक्तियोग चलता रहता है | इसकी पुष्टि वेदान्तसूत्र से (4.१.१२) होती है – आप्रायणात् तत्रापि हि दृष्टम् | इसका अर्थ है कि मुक्ति के बाद भक्तियोग चलता रहता है | श्रीमद्भागवत में वास्तविक भक्तिमयी मुक्ति की जो परिभाषा दी गई है उसके अनुसार यह जीव का अपने स्वरूप या अपनी निजी स्वाभाविक स्थिति में पुनःप्रतिष्ठापित हो जाना है | स्वाभाविक स्थिति की व्याख्या पहले ही की जा चुकी है – प्रत्येक जीव परमेश्र्वर का अंश है, अतएव उसकी स्वाभाविक स्थिति सेवा करने की है | मुक्ति के बाद यह सेवा कभी रूकती नहीं | वास्तविक मुक्ति तो देहात्मबुद्धि की भ्रान्त धारणा से मुक्त होना है | प्रश्न १ : विशते शब्द का क्या महत्त्व है ? इसे इस श्लोक में किन उदाहरणों द्वारा समझाया गया है ? . प्रश्न २ : प्रत्येक जीव की स्वाभाविक स्थिति क्या है ? मुक्ति के बाद इसकी प्रकृति को किन वैदिक संदर्भों से समझाया गया है ?

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प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या १७.२३ . प्रश्न १ : कृष्णभावनामृत किसे कहते हैं ? मनुष्य किस प्रकार तपस्या, यज्ञ,अन इत्यादि को आध्यात्मिक उन्नतिन बना सकता है ? . उत्तर १ : "यह बताया जा चुका है कि तपस्या,यज्ञ,दान तथा भोजन के तीन-तीन भेद हैं-सात्त्विक,राजस तथा तामस । लेकिन चाहे ये उत्तम हों, मध्यम हों या निम्न हों, ये सभी बद्ध तथा भौतिक गुणों से कलुषित हैं । किन्तु जब ये ब्रह्म-ॐ तत् सत् को लक्ष्य करके किये जाते हैं तो आध्यात्मिक उन्नति के साधन बन जाते हैं । शास्त्रों में ऐसे लक्ष्य का संकेत हुआ है । ॐ तत् सत् ये तीन शब्द विशेष रूप में परम सत्य भगवान् के सूचक हैं ।" . "आदिकाल में जब प्रथम जीवात्मा ब्रह्मा ने यज्ञ किये,तो उन्होंने इन तीनों शब्दों के द्वारा भगवान् को लक्षित किया था । अतएव गुरु-परम्परा द्वारा उसी सिद्धान्त का पालन किया जाता रहा है । अतः इस मन्त्र का अत्यधिक महत्त्व है । अतएव भगवद्गीता के अनुसार कोई भी कार्य ॐ तत् सत् के लिए, अर्थात् भगवान् के लिए, किया जाना चाहिए। जब कोई इन तीनों शब्दों के द्वारा तप, दान तथा यज्ञ सम्पन्न करता है, तो वह कृष्णभावनामृत में कार्य करता है । कृष्णभावनामृत दिव्य कार्यों का वैज्ञानिक कार्यान्वन है, जिससे मनुष्य भगवद्धाम वापस जा सके । ऐसी दिव्य विधि से कर्म करने में शक्ति का क्षय नहीं होता ।" . संदर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता १७.२३, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद

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हरे कृष्णा | हम १३ फरवरी २०२० से श्रीमद्भागवद्गीता श्लोक प्रति श्लोक फिर से शुरू करेंगे | . *कृपया प्रश्नों के उत्तर कमेंट्स में दें* आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- १८.५५ अध्याय अठारह : उपसंहार - संन्यास की सिद्धि . . भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्र्चास्मि तत्त्वतः | ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् || ५५ || . . भक्त्या– शुद्ध भक्ति से; माम्– मुझको; अभिजानाति– जान सकता है; यावान्– जितना; यः च अस्मि– जैसा मैं हूँ; तत्त्वतः– सत्यतः; ततः– तत्पश्चात्; माम्– मुझको; तत्त्वतः– सत्यतः; ज्ञात्वा– जानकर; विशते– प्रवेश करता है; तत्-अनन्तरम्– तत्पश्चात् | . . केवल भक्ति से मुझ भगवान् को यथारूप में जाना जा सकता है | जब मनुष्य ऐसी भक्ति से मेरे पूर्ण भावनामृत में होता है, तो वह वैकुण्ठ जगत् में प्रवेश कर सकता है | . . तात्पर्य : भगवान् श्रीकृष्ण तथा उनके स्वांशों को न तो मनोधर्म द्वारा जाना जा सकता है, न ही अभक्तगण उन्हें समझ पाते हैं | यदि कोई व्यक्ति भगवान् को समझना चाहता है, तो उसे शुद्ध भक्त के पथप्रदर्शन में शुद्ध भक्ति ग्रहण करनी होती है, अन्यथा भगवान् सम्बन्धी सत्य (तत्त्व) उससे सदा छिपा रहेगा | जैसा कि भगवद्गीता (७.२५) कहा जा चुका है – नाहं प्रकाशः सर्वस्य– मैं सबों के समक्ष प्रकाशित नहीं होता | केवल पाण्डित्य या मनोधर्म द्वारा ईश्र्वर को नहीं समझा जा सकता | कृष्ण को केवल वही समझ पाता है, जो कृष्णभावनामृत तथा भक्ति में तत्पर रहता है | इसमें विश्वविद्यालय की उपाधियाँ सहायक नहीं होती हैं | . जो व्यक्ति कृष्ण विज्ञान (तत्त्व) से पूर्णतया अवगत है, वही वैकुण्ठजगत् या कृष्ण के धाम में प्रवेश कर सकता है | ब्रह्मभूत होने का अर्थ यह नहीं है कि वह अपना स्वरूप खो बैठता है | भक्ति तो रहती ही है और जब तक भक्ति का अस्तित्व रहता है, तब तक ईश्र्वर, भक्त तथा भक्ति की विधि रहती है | ऐसे ज्ञान का नाश मुक्ति के बाद भी नहीं होता | मुक्ति का अर्थ देहात्मबुद्धि से मुक्ति प्राप्त करना है | आध्यात्मिक जीवन में वैसा ही अन्तर, वही व्यक्तित्व (स्वरूप) बना रहता है, लेकिन शुद्ध कृष्णभावनामृत में ही विशते शब्द का अर्थ है “मुझमें प्रवेश करता है|” भ्रमवश यह नहीं सोचना चाहिए कि यह शब्द अद्वैतवाद का पोषक है और मनुष्य निर्गुण ब्रह्म से एकाकार हो जाता है | ऐसा नहीं है |विशते का तात्पर्य है कि मनुष्य अपने व्यक्तित्व सहित भगवान् के धाम में, भगवान् की संगति करने तथा उनकी सेवा करने के लिए प्रवेश कर सकता है | उदाहरणार्थ, एक हरा पक्षी (शुक) हरे वृक्ष में इसलिए प्रवेश नहीं करता कि वह वृक्ष से तदाकार (लीन) हो जाय, अपितु वह वृक्ष के फलों का भोग करने के लिए प्रवेश करता है | निर्विशेषवादी सामान्यतया समुद्र में गिरने वाली तथा समुद्र से मिलने वाली नदी का दृष्टान्त प्रस्तुत करते हैं | यह निर्विशेषवादियों के लिए आनन्द का विषय हो सकता है, लेकिन साकारवादी अपने व्यक्तित्व को उसी प्रकार बनाये रखना चाहता है, जिस प्रकार समुद्र में एक जलचर प्राणी | यदि हम समुद्र की गहराई में प्रवेश करें तो हमें अनेकानेक जीव मिलते हैं | केवल समुद्र की ऊपरी जानकारी पर्याप्त नहीं है, समुद्र की गहराई में रहने वाले जलचर प्राणियों की भी जानकारी रखना आवश्यक है | . भक्त अपनी शुद्ध भक्ति के कारण परमेश्र्वर के दिव्य गुणों तथा ऐश्र्वर्यों को यथार्थ रूप में जान सकता है | जैसा कि ग्याहरवें अध्याय में कहा जा चुका है, केवल भक्ति द्वारा इसे समझा जा सकता है | इसी की पुष्टि यहाँ भी हुई है | मनुष्य भक्ति द्वारा भगवान् को समझ सकता है और उनके धाम में प्रवेश कर सकता है | . भौतिक बुद्धि से मुक्ति की अवस्था – ब्रह्मभूत अवस्था – को प्राप्त कर लेने के बाद भगवान् के विषय में श्रवण करने से भक्ति का शुभारम्भ होता है | जब कोई परमेश्र्वर के विषय में श्रवण करता है, तो स्वतः ब्रह्मभूत अवस्था का उदय होता है और भौतिक कल्मष – यथा लोभ तथा काम – का विलोप हो जाता है | ज्यों-ज्यों भक्त के हृदय से काम तथा इच्छाएँ विलुप्त होती जाती हैं, त्यों-त्यों वह भगवद्भक्ति के प्रति अधिक आसक्त होता जाता है और इस तरह वह भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाता है | जीवन की उस स्थिति में वह भगवान् को समझ सकता है | श्रीमद्भागवत में भी इसका कथन हुआ है | मुक्ति के बाद भक्तियोग चलता रहता है | इसकी पुष्टि वेदान्तसूत्र से (4.१.१२) होती है – आप्रायणात् तत्रापि हि दृष्टम् | इसका अर्थ है कि मुक्ति के बाद भक्तियोग चलता रहता है | श्रीमद्भागवत में वास्तविक भक्तिमयी मुक्ति की जो परिभाषा दी गई है उसके अनुसार यह जीव का अपने स्वरूप या अपनी निजी स्वाभाविक स्थिति में पुनःप्रतिष्ठापित हो जाना है | स्वाभाविक स्थिति की व्याख्या पहले ही की जा चुकी है – प्रत्येक जीव परमेश्र्वर का अंश है, अतएव उसकी स्वाभाविक स्थिति सेवा करने की है | मुक्ति के बाद यह सेवा कभी रूकती नहीं | वास्तविक मुक्ति तो देहात्मबुद्धि की भ्रान्त धारणा से मुक्त होना है | प्रश्न १ : विशते शब्द का क्या महत्त्व है ? इसे इस श्लोक में किन उदाहरणों द्वारा समझाया गया है ? . प्रश्न २ : प्रत्येक जीव की स्वाभाविक स्थिति क्या है ? मुक्ति के बाद इसकी प्रकृति को किन वैदिक संदर्भों से समझाया गया है ?

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