sompal Prajapati
sompal Prajapati Apr 20, 2019

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प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या १३.१८ . प्रश्न १ : आध्यात्मिक जगत भौतिक जगत से किस प्रकार भिन्न है ? . उत्तर १ : "परमात्मा या भगवान् ही सूर्य, चन्द्र तथा नक्षत्रों जैसी प्रकाशमान वस्तुओं के प्रकाशस्त्रोत हैं | वैदिक साहित्य से हमें पता चलता है कि वैकुण्ठ राज्य में सूर्य या चन्द्रमा की आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि वहाँ पर परमेश्र्वर का तेज जो है | भौतिक जगत् में वह ब्रह्मज्योति या भगवान् का आध्यात्मिक तेज महत्तत्व अर्थात् भौतिक तत्त्वों से ढका रहता है | अतएव इस जगत् में हमें सूर्य, चन्द्र, बिजली आदि के प्रकाश की आवश्यकता पड़ती है, लेकिन आध्यात्मिक जगत् में ऐसी वस्तुओं की आवश्यकता नहीं होती | वैदिक साहित्य में स्पष्ट है कि वे इस भौतिक जगत् में स्थित नहीं हैं, वे तो आध्यात्मिक जगत् (वैकुण्ठ लोक) में स्थित हैं, जो चिन्मय आकाश में बहुत ही दूरी पर है |" :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: प्रश्न २ : जीवात्मा तथा परमात्मा में क्या-क्या अन्तर है ? . उत्तर २ : "वे प्रत्येक हृदय में परम नियन्ता के रूप में स्थित हैं | परमेश्र्वर के हाथ-पैर सर्वत्र फैले हैं, लेकिन जीवात्मा के विषय में ऐसा नहीं कहा जा सकता | अतएव यह मानना ही पड़ेगा कि कार्य क्षेत्र को जानने वाले दो ज्ञाता हैं-एक जीवात्मा तथा दूसरा परमात्मा | पहले के हाथ-पैर केवल किसी एक स्थान तक सीमित (एकदेशीय) हैं, जबकि कृष्ण के हाथ-पैर सर्वत्र फैले हैं | इसकी पुष्टि श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद् में (३.१७) इस प्रकार हुई है - सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत् | वह परमेश्र्वर या परमात्मा समस्त जीवों का स्वामी या प्रभु है, अतएव वह उन सबका चरम लक्ष्य है | अतएव इस बात से मना नहीं किया जा सकता कि परमात्मा तथा जीवात्मा सदैव भिन्न होते हैं |" . संदर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता १३.१८, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद

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suraj bhardwaj May 20, 2019

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*कृपया प्रश्नों के उत्तर कमेंट्स में दें* आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीत यथारूप १३.१९ अध्याय १३ : प्रकृति, पुरुष तथा चेतना . . इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः | मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते || १९ || . . इति - इस प्रकार; क्षेत्रम् - कर्म का क्षेत्र (शरीर);तथा - भी; ज्ञानम् - ज्ञान; ज्ञेयम् - जानने योग्य; च - भी; उक्तम् - कहा गया;समासतः - संक्षेप में; मत्-भक्तः - मेरा भक्त; एतत् - यह सब; विज्ञाय - जान कर; मत्-भावाय - मेरे स्वभाव को; उपपद्यते - प्राप्त करता है | . . इस प्रकार मैंने कर्म क्षेत्र (शरीर), ज्ञान तथा ज्ञेय का संक्षेप में वर्णन किया है | इसे केवल मेरे भक्त ही पूरी तरह समझ सकते हैं और इस तरह मेरे स्वभाव को प्राप्त होते हैं | . . तात्पर्य: भगवान् ने शरीर, ज्ञान तथा ज्ञेय का संक्षेप में वर्णन किया है | यह ज्ञान तीन वस्तुओं का है - ज्ञाता, ज्ञेय तथा जानने की विधि | ये तीनों मिलकर विज्ञान कहलाते हैं | पूर्ण ज्ञान भगवान् के अनन्य भक्तों द्वारा प्रत्यक्षतः समझा जा सकता है | अन्य इसे समझ पाने में असमर्थ रहते हैं | अद्वैतवादियों का कहना है कि अन्तिम अवस्था में ये तीनों बातें एक हो जाती हैं, लेकिन भक्त ऐसा नहीं मानते | ज्ञान तथा ज्ञान के विकास का अर्थ है अपने को कृष्णभावनामृत में समझना | हम भौतिक चेतना द्वारा संचालित होते हैं, लेकिन ज्योंही हम अपनी सारी चेतना कृष्ण के कार्यों में स्थानान्तरित कर देते हैं, और इसका अनुभव करते हैं कि कृष्ण ही सब कुछ हैं, तो हम वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं | दूसरे शब्दों में, ज्ञान तो भक्ति को पूर्णतया समझने के लिए प्रारम्भिक अवस्था है | पन्द्रहवें अध्याय में इसकी विशद व्याख्या की गई है | . अब हम सारांश में कह सकते हैं कि श्लोक ६ तथा ७ के महाभूतानि से लेकर चेतना धृतिः तक भौतिक तत्त्वों तथा जीवन के लक्षणों की कुछ अभिव्यक्तियों का विश्लेषण हुआ है | ये सब मिलकर शरीर तथा कार्यक्षेत्र का निर्माण करते हैं, तथा श्लोक ८ से लेकर १२ तक अमानित्वम् से लेकर तत्त्वज्ञानार्थ-दर्शनम् तक कार्यक्षेत्र के दोनों प्रकार के ज्ञाताओं, अर्थात् आत्मा तथा परमात्मा के ज्ञान की विधि का वर्णन हुआ है | श्लोक १३ से १८ में अनादि मत्परम् से लेकर हृदि सर्वस्य विष्ठितम् तक जीवात्मा तथा परमात्मा का वर्णन हुआ है | . इस प्रकार तीन बातों का वर्णन हुआ है - कार्यक्षेत्र (शरीर) , जानने की विधि तथा आत्मा एवं परमात्मा | यहाँ इसका विशेष उल्लेख हुआ है कि भगवान् के अनन्य भक्त ही इन तीनों बातों को ठीक से समझ सकते हैं | अतएव ऐसे भक्तों के लिए भगवद्गीता अत्यन्त लाभप्रद है, वे ही परम लक्ष्य, अर्थात् परमेश्र्वर कृष्ण के स्वभाव को प्राप्त कर सकते हैं | दूसरे शब्दों में, केवल भक्त ही भगवद्गीता को समझ सकते हैं और वांछित फल प्राप्त कर सकते हैं - अन्य लोग नहीं | . प्रश्न १ : वास्तविक ज्ञान किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है ? भगवान् ने अब तक इस अध्याय में किन तीन बातों का मुख्यतः वर्णन किया है ? इन्हें किस प्रकार ठीक से समझा जा सकता है ?

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