Bhagvan Sriman Narayan 108 Divya Bhavya Mandirien - Part 3 Chozha Kingdom ( Chozha Naadu) Divyadesam

Bhagvan Sriman Narayan 108 Divya Bhavya Mandirien - Part 3 Chozha Kingdom ( Chozha Naadu) Divyadesam

#ज्ञानवर्षा #विष्णु
Bhagvan Sriman Narayan 108 Divya Bhavya Mandirien - Part 3

Chozha Kingdom ( Chozha Naadu) Divyadesams

Introduction to Thiruppathis

In Chozha Nadu, there are 40 Divyadesams found. In these 40 Divyadesams, bhagvan gives his seva in standing posture seva in 23 divyadesams, in sleeping posture seva in 13 Divyadesams and in sitting posture seva in 6 divyadesams.

Facing his face towards East direction, gives seva in 33 divyadesams, towards West direction, in 4 divyadesams, towards South direction, in 2 Divyadesams and towards North direction, in 1 Divyadesam.

Among these 40 Divyadesams in Chozha Naadu, the Bhagwan is said to be giving his seva in Krishnavathaar at 8 Divyadesams and in Ramavathaar in 3 Divyadesams.

In these 40 Divyadesams, Thiruvellkkulam is also called as ("Thenn Thirupathi") South Tirupathi. It is said that bhakts can offer the dedications to this bhagvan those who are not able to go to Tirumala - Tirupati, so, this sthal bhagvan and Sri Venkatachalapathy of Tirumala are considered to be the same.

In these 40 Divyadesams, the Maatha is given the name on the base of the flower in 21 divyadesams.

Trichy Temples
Thiruvarangam (Sri Rangam) - Sri Ranganathaswamy Temple
Thirukkozhi - Sri Azhagiya Manavala Temple
Thirukkarambanoor - Sri Purushothama Temple
Thiruvellarai - Sri Pundarikasha Temple
Thiru Anbil - Sri Vadivazhagiya Nambi Temple
Thirupper Nagar - Sri Appakkudathaan Temple
Thirukkandiyur - Sri Hara Saabha Vimocchana Temple

Kumbakonam Temples
Thiruvelliyankudi - Sri Kola Valvilli Rama Temple
Thiru Aadhanoor - Sri Aandu Alakkum Ayan Temple
Thirukkudanthai - Sri Saarangapani Temple
Thiruppullam Boothankudi - Sri Valvil Rama Temple
Thirukkavitthalam (Kabisthalam) - Sri Gajendra Varadha  Temple
Thirunandhipura Vinnagaram (Nathan Kovil) - Sri Jaganatha Temple
Thirukkoodaloor - Sri Aaduthurai Temple
Thiru Vinnagar - Sri Oppiliappa Temple
Thiru Narayoor (Naachiyar Kovil) - Sri Thirunarayoor Nambi Temple
Thiruccherai - Sri Saranatha Temple
Thirukkannamangai - Sri Bhaktavatsala Temple

Tanjore Temple
Thiru Thanjaimaamani Koil - Sri Neelamega Temple

Mayavaram Temples
Thiruvazhunthoor - Sri Devaadi Raja Temple
Thiru Sirupuliyur - Sri Arulmaakadal Temple
Thiru Thalaicchanga Naanmathiyam - Sri Naan Madhiya Temple
Thiru Indhaloor - Sri Parimala Ranganatha Temple

Nagapattinam Temples
Thirukkannapuram - Sri Neelamega Temple
Thirukkannankudi - Sri Loganatha Temple
Thiru Naagai - Sri Neelamega Perumal Temple

Chidambaram Temple
Thiru Chithrakoodam (Chidambaram) - Sri Govindaraja Temple

Seergazhi Temples
Thirukkazhiseerama Vinnagaram (Seerkazhi) - Thirivikarama Temple
Thiruvaali Thirunagari - Sri Lakshmi Narashima Temple
Thiru Kavalampaadi - Sri Gopala Krishna Temple
Thiru Arimeya Vinnagaram - Sri Kuda Maadu Koothan Temple
Thiru Vann Purushothaman - Sri Purushothama Temple
Thiru Sempon Sei Kovil - Sri Perarulalan Temple
Thiru Manimaada Kovil - Sri Narayana Temple
Thiru VaiKunda Vinnagaram - Sri Vaikuntha Natha Temple
Thiru Devanaar Thogai - Sri Deiva Nayaka  Temple
Thiru Thetri Aambalam - Sri Sengamala Ranganatha  Temple
Thiru Manikkoodam - Sri Varadharaja Temple
Thiru Vellakkulam (Annan Kovil) - Sri Srinivasa Temple
Thiru Paarthanpalli - Sri Thamaraiyal Kelvan Temple
.............to be continued

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Nitin Kharbanda Mar 27, 2020

तुलसी कौन थी? तुलसी(पौधा) पूर्व जन्म मे एक लड़की थी जिस का नाम वृंदा था, राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्त थी.बड़े ही प्रेम से भगवान की सेवा, पूजा किया करती थी.जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया। जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था. वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी. एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा``` - स्वामी आप युद्ध पर जा रहे है आप जब तक युद्ध में रहेगे में पूजा में बैठ कर``` आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करुगी,और जब तक आप वापस नहीं आ जाते, मैं अपना संकल्प नही छोडूगी। जलंधर तो युद्ध में चले गये,और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गयी, उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके, सारे देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास गये। सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि – वृंदा मेरी परम भक्त है में उसके साथ छल नहीं कर सकता । फिर देवता बोले - भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते है। भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पँहुच गये जैसे ही वृंदा ने अपने पति को देखा, वे तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छू लिए,जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काट कर अलग कर दिया,उनका सिर वृंदा के महल में गिरा जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पडा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है? उन्होंने पूँछा - आप कौन हो जिसका स्पर्श मैने किया, तब भगवान अपने रूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके,वृंदा सारी बात समझ गई, उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ, और भगवान तुंरत पत्थर के हो गये। सभी देवता हाहाकार करने लगे लक्ष्मी जी रोने लगे और प्रार्थना करने लगे यब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे सती हो गयी। उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने कहा –आज से इनका नाम तुलसी है, और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और में बिना तुलसी जी के भोग स्वीकार नहीं करुगा। तब से तुलसी जी कि पूजा सभी करने लगे। और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है। देव-उठावनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है !

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sunita Sharma Mar 27, 2020

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Languages : | हिंदी | नेपाली | __________________________________________ प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या २.७ . Bhagavad Gita Multilingual . प्रश्न १ : अर्जुन ने कृष्ण के समक्ष युद्ध न करने के लिए किस प्रकार के तर्क प्रस्तुत किये ? . उत्तर १ : "बुद्धिमान् होने के कारण अर्जुन समझ गया कि पारिवारिक सदस्यों के प्रति उसका अनुराग तथा मृत्यु से उनकी रक्षा करने की उसकी इच्छा ही उसकी उलझनों का कारण है | यद्यपि वह समझ रहा था कि युद्ध करने का कर्तव्य उसकी प्रतीक्षा कर रहा था, किन्तु कृपण-दुर्बलता (कार्पण्यदोष) के कारण वह अपना कर्तव्य नहीं निभा रहा था | अतः वह परम गुरु भगवान् कृष्ण से कोई निश्चित हल निकालने का अनुरोध कर रहा है | वह कृष्ण का शिष्यत्व ग्रहण करता है | वह मित्रतापूर्ण बातें बंद करना चाहता है | गुरु तथा शिष्य की बातें गम्भीर होती हैं और अब अर्जुन अपने मान्य गुरु के समक्ष गम्भीरतापूर्वक बातें करना चाहता है इसीलिए कृष्ण भगवद्गीता-ज्ञान के आदि गुरु है और अर्जुन गीता समझने वाला प्रथम शिष्य है |" :::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: प्रश्न २ : बृहदारण्यक उपनिषद् से उद्धरित श्लोक का क्या अर्थ है : . यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माँल्लोकात्प्रैतिसकृपणः ? . उत्तर २ : '– “कृपण वह है जो मानव जीवन की समस्याओं को हल नहीं करता और आत्म-साक्षात्कार के विज्ञान को समझे बिना कूकर-सूकर की भाँति संसार को त्यागकर चला जाता है |” जीव के लिए मनुष्य जीवन अत्यन्त मूल्यवान निधि है, जिसका उपयोग वह अपने जीवन की समस्याओं को हल करने में कर सकता है, अतः जो इस अवसर का लाभ नहीं उठाता वह कृपण है |' . संदर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता २.७, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद . ****अब आप ये प्रश्नोत्तर हमारी एंड्राइड एप्प के माध्यम से सीधे अपने फ़ोन में भी पा सकते हैं | कृपया हमारी एप्प सबसे ऊपर दिए गए लिंक से डाउनलोड करें | _______________________________________ प्रश्नोत्तर : श्लोक संख्या २.७ . प्रश्न १ : अर्जुनको उलझनको मुख्य कारण के थियो ? उ कुन प्रकार यसलाई निवारण गर्नको लागी इच्छुक छ ? . उत्तर १ : "अर्जुन बुद्धिमान् व्यक्त्ति थिए | पारिवारिक जनहरुप्रतिको उनको प्रेम र मृत्युबाट उनीहरुको रक्षा गर्ने चाहना नै उनको चिन्ताको कारण हो भन्ने कुरा उनी बुझ्न सक्दथे | लडाइं गर्नु उनको कर्तव्य हो र उक्त्त कर्तव्यले उनको प्रतिक्षा गरिरहेको छ भन्ने कुरा पनि उनी बुझ्दथे तर कार्पण्य दोषले गर्दा उनी आफ्नो कर्तव्यपालन गर्न सकिरहेका थिएनन् | त्यसैले, निश्चित समाधान निकाल्नका लागि उनी परमगुरु भगवान् श्रीकृष्णसँग अनुरोध गर्दैछन् | उनी शिष्य बनेर आफूलाई कृष्णमा समर्पित गर्दैछन् | उनी अब कृष्णसँग मित्रवत् होइन शिष्यवत् कुराकानी गर्न चाहन्छन् | गुरु र शिष्यबीचका कुराकानीहरु गम्भीर हुन्छन् | अहिले अर्जुन आफ्ना आदरणीय गुरु कृष्णसँग अति गम्भीरतापूर्वक कुरा गर्न चाहन्छन् | कृष्ण भागवत्गीतारुपी विज्ञानका मूल गुरु हुनुहुन्छ र अर्जुन यो गीताज्ञान बुझ्ने पहिलो शिष्य हुन् अर्थात् जसले मानवका रुपमा रहेर आफ्ना जीवनका समस्याहरुको समाधान गर्न सक्दैन र जसले आत्मासाक्षात्कारको विज्ञान नबुझीकन कुकुर बिरालाले जस्तै संसार त्याग्छ त्यो कृपण हो | जीवात्माका लागि मानिसको शरीर एउटा बहुमूल्य सम्पत्ति हो | उसले आफ्ना जीवनका समस्याको समाधान गर्ने कार्यमा यो शरीरको उपयोग गर्न सक्दछ | जसले यो अवसरको समुचित उपयोग गर्दैन त्यो कृपण हो, कञ्जुस हो |" ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: प्रश्न २ : बृहदारण्यक उपतिषद्‌बाट उद्धारीत श्लोक को अर्थ के हो : यो वा एतदक्षरे गागर्यवि दिवास्मा ल्लो कात प्रैतिस कृपण : ? . उत्तर २ : "अर्थात् जसले मानवका रुपमा रहेर आफ्ना जीवनका समस्याहरुको समाधान गर्न सक्दैन र जसले आत्मासाक्षात्कारको विज्ञान नबुझीकन कुकुर बिरालाले जस्तै संसार त्याग्छ त्यो कृपण हो | जीवात्माका लागि मानिसको शरीर एउटा बहुमूल्य सम्पत्ति हो | उसले आफ्ना जीवनका समस्याको समाधान गर्ने कार्यमा यो शरीरको उपयोग गर्न सक्दछ | जसले यो अवसरको समुचित उपयोग गर्दैन त्यो कृपण हो, कञ्जुस हो |" . संदर्भ : श्रीमद्भगवद्गीता २.७, तात्पर्य, श्रील प्रभुपाद . ***अब हाम्रो भगवद् गीता अनुप्रयोगमार्फत तपाई यी पदहरू पाउन सक्नुहुनेछ (चित्र र प्रश्नोत्तर सहित) सीधा तपाईको एन्ड्रोइड फोनमा। कृपया हाम्रो एप्प माथी दिएको लिंक बाट डाउनलोड गर्नु I ______________________________________________

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Anju Mishra Mar 27, 2020

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः 🙏🌹 मत्स्य जंयती की सभी को हार्दिक शुभकामनाएं मत्स्य जंयती विशेष 👇 मत्स्य जयंती का महत्व मत्स्य जयंती चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार की पूजा की जाती है। विष्णु पुराण के अनुसार मत्स्य अवतार भगवान विष्णु का प्रथम अवतार माना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के इस अवतार की पूजा करने से विशेष लाभ की प्राप्ति होती है। मत्स्य जयंती के दिन मत्स्य पुराण का सुनना और पढ़ना भी अधिक श्रेष्ठ माना जाता है। इस दिन मछलियों को आटें की गोली खिलाने से भी विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। मत्यस्य जयंती के दिन निर्जला व्रत किया जाता है और भोजन का दान दिया जाता है। इस दिन व्रत रखने वाले व्यक्ति को अपने सभी पापों से मुक्ति मिलती है और उसे जीवन के सभी सुखों की प्राप्ति होती है। मत्स्य जयंती के दिन मछली को नदी या समुद्र में छोड़ने से भी भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। मत्स्य जयंती शुभ मुहूर्त मत्स्य जयन्ती मुहूर्त - दोपहर 1 बजकर 40 मिनट से दोपहर 4 बजकर 08 मिनट तक तृतीया तिथि प्रारम्भ - शाम 07 बजकर 53 मिनट से (26 मार्च 2020) तृतीया तिथि समाप्त - अगले दिन रात 10 बजकर 12 मिनट तक (27 मार्च 2020)

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Shanti Pathak Mar 26, 2020

🌹🌹ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय 🌹🌹 🌹🌹शुभ गुरुवार, शुभ प्रभात जी 🌹🌹 *💥विष्णु को नारायण और हरि क्यों कहते है💥* भगवान विष्णु की पूजा हिन्दू धर्म में सबसे ज्यादा होती है | कोई उन्हें विष्णु के रूप में तो कोई उन्हें कृष्ण या राम के रूप में पूजते है | धर्म की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने कई अवतार समय समय पर धारण करके इस धरा को पाप से मुक्त करवाया है | वेद व्यास जी द्वारा रचित भविष्य पुराण में बताया गया है की कलियुग में भी विष्णु कल्कि अवतार फिर से लेंगे | "विष्णु का हरि और नारायण नाम " पालनहार भगवान विष्णु के सबसे बड़े भक्त नारद मुनि उन्हें नारायण कहकर ही बुलाते हैं | इसके अलावा उन्हें अनन्तनरायण, सत्य नारायण लक्ष्मीनारायण, शेषनारायण इन सभी नामों से भी बुलाया जाता रहा है | पर मूल बात यह है कि इन सभी नामों में नारायण जुड़ा रहा है| नारायण इसलिए कहलाते है विष्णु पौराणिक कथा के अनुसार, जल देवता वरुण भगवान विष्णु के पैरों से पैदा हुए थे साथ ही देव नदी गंगा भी विष्णु के पैरो से निकली थी जिन्हें हम विष्णुपदोदकी के नाम से भी पुकारते है | "भगवान विष्णु का जल में वास " जल का दूसरा नाम नीर और नार भी है | भगवान विष्णु का निवास (आयन ) भी समुन्द्र (नार ) में बताया गया है | इसी कारण इनका नाम जल के आधार पर नारायण पड़ा | अत: नारायण का अर्थ जल में रहने वाले देवता | विष्णु का हरि नाम कैसे पड़ा :- हरि शब्द का अर्थ है जो मन को हर ले | शास्त्रों में बताया गया है कि हरि हरति पापणि विष्णु हरते है पापो को | इनकी सबसे प्रिय तिथि एकादशी है जिसका हिन्दू धर्म में अत्यंत महत्व है | इस दिन उपवास रखने से व्यक्ति के जन्मो जन्मो के पाप नष्ट होते है और हर सुख की प्राप्ति होती है | जय श्री हरि

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harsh Malhotra Mar 27, 2020

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