buitiful temple

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lndu Malhotra Apr 23, 2021

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ram ji Apr 23, 2021

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कथा है कि एक छोटे से मत्स्य ने मनु से अपनी रक्षा कि गुहार की। मनु ने उसे एक घट में रख लिया। कुछ समय में वह मत्स्य घटाकार हो गया। घट छोटा पड़ गया तो मनु ने उसे तालाब में, तालाब छोटा पड़ा तो गंगा में, और जब वह मत्स्य पूरी गंगा के आकार का हो गया तो उसे सागर में रख दिया। महाप्रलय का समय आने पर वह मत्स्य मनु से बोला कि आप मेरे सींग से एक नाव बाँधकर, उस पर सप्तॠषियों और कल्याणकारी बीजों को लेकर बैठ जाएँ। मनु ने ऐसा ही किया। वह मत्सय हजारों वर्षों तक मनु को परमार्थ का उपदेश देता चलता रहा और अंततः उस नाव को हिमालय के शिखर पर बाँधकर अदृश्य हो गया। अब अर्थ- मन ही मनु है। "अस्य मतं स मत्स्य" परमात्मोन्मुखी वृत्ति ही मत्स्य है। प्रारंभ में, जब यह वृत्ति उदय हुई ही है, साधक को ही इसकी रक्षा करनी पड़ती है। कालांतर में पुष्ट होने पर तो यही साधक की महाप्रलय से रक्षा करने लगेगी। इसे घट रूपी हृदय में रखने पर, यह वृत्ति पुष्ट होकर समस्त हृदय में व्याप्त हो जाती है। कालांतर में, त्याग रूपी तालाब और फिर भक्ति रूपी गंगा से ओतप्रोत होने पर, यह वृत्ति परमात्मानन्द के सागर में गोते लगाने लगती है। यही उस मत्स्य का सागर के आकार का हो जाना है। यों धैर्यपूर्वक साधन करते करते, परमात्मोन्मुखी वृत्ति की रक्षा करते करते, अंतःकरण भगवदाकार हो जाता है। यही मत्स्यावतार है। तब महाप्रलय का, जन्म मरण के बंधन का सदा सदा के लिए विलीन होने का समय आता है। यहाँ भगवान का पतित पावन नाम ही नाव है, स्वरूप स्मरण ही मत्स्य से बंधी रस्सी है, संतोपदेश ही कल्याणकारी बीज हैं। तब हजारों सांसारिक प्रवृत्तियों का अंत हो जाता है, और आत्मविचार स्थिर हो जाता है, यही हिमालय के शिखर से बंध जाना है। तब "ब्रह्म जानेति ब्रह्मैव भवति" वह ब्रह्म हो जाता है। *आपके साथ भी ऐसा ही हो सकता है, बस आप एक इष्ट चुनकर, उनका एक नाम और एक रूप निश्चित कर, नामजप और रूपध्यान करते हुए, उस परमात्मोन्मुखी वृत्ति की रक्षा में संलग्न हो जाएँ।*

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Radha Bansal Apr 23, 2021

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