Vinay Mishra
Vinay Mishra Jan 18, 2021

Good evening 💥 ॐ 🙏

Good evening 💥 ॐ 🙏

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madan pal 🌷🙏🏼 Jan 18, 2021
जय श्री राधे राधे कृष्णा जी शुभ संध्या वंदन जी आपका हर पल शुभ मंगल हो जी 🌷🙏🏼🌷🙏🏼🌷

*आज का प्रेरक प्रसंग* *!!!---: ईर्ष्या और हमारा जीवन :---!!!* ========================== एक बार एक महात्मा ने अपने शिष्यों से कहा कि वे कल प्रवचन में अपने साथ एक थैली में कुछ आलू भरकर लाएं। साथ ही निर्देश भी दिया कि उन आलुओं पर उस व्यक्ति का नाम लिखा होना चाहिए जिनसे वे ईर्ष्या करते हैं। अगले दिन किसी शिष्य ने चार आलू, किसी ने छह तो किसी ने आठ आलू लाए। प्रत्येक आलू पर उस व्यक्ति का नाम लिखा था जिससे वे नफरत करते थे। अब महात्मा जी ने कहा कि अगले सात दिनों तक आपलोग ये आलू हमेशा अपने साथ रखें। शिष्यों को कुछ समझ में नहीं आया कि महात्मा जी क्या चाहते हैं, लेकिन सबने आदेश का पालन किया। दो-तीन दिनों के बाद ही शिष्यों को कष्ट होने लगा। जिनके पास ज्यादा आलू थे, वे बड़े कष्ट में थे। किसी तरह उन्होंने सात दिन बिताए और महात्मा के पास पहुंचे। महात्मा ने कहा, ‘अब अपनी-अपनी थैलियां निकाल कर रख दें।’ शिष्यों ने चैन की सांस ली। महात्मा जी ने विगत सात दिनों का अनुभव पूछा। शिष्यों ने अपने कष्टों का विवरण दिया। उन्होंने आलुओं की बदबू से होने वाली परेशानी के बारे में बताया। सभी ने कहा कि अब बड़ा हल्का महसूस हो रहा है।… महात्मा ने कहा, ‘जब मात्र सात दिनों में ही आपको ये आलू बोझ लगने लगे, तब सोचिए कि आप जिन व्यक्तियों से ईर्ष्या या नफरत करते हैं, आपके मन पर उनका कितना बड़ा बोझ रहता होगा। और उसे आप जिंदगी भर ढोते रहते हैं। सोचिए, ईर्ष्या के बोझ से आपके मन और दिमाग की क्या हालत होती होगी? *शिक्षा*;- ईर्ष्या के अनावश्यक बोझ के कारण आपलोगों के मन में भी बदबू भर जाती है, ठीक उन आलुओं की तरह। इसलिए अपने मन से इन भावनाओं को निकाल दो। यदि किसी से प्यार नहीं कर सकते तो कम से कम नफरत मत करो। आपका मन स्वच्छ, निर्मल और हल्का रहेगा।

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*आज का प्रेरक प्रसंग* *!!!---: ईर्ष्या और हमारा जीवन :---!!!* ========================== एक बार एक महात्मा ने अपने शिष्यों से कहा कि वे कल प्रवचन में अपने साथ एक थैली में कुछ आलू भरकर लाएं। साथ ही निर्देश भी दिया कि उन आलुओं पर उस व्यक्ति का नाम लिखा होना चाहिए जिनसे वे ईर्ष्या करते हैं। अगले दिन किसी शिष्य ने चार आलू, किसी ने छह तो किसी ने आठ आलू लाए। प्रत्येक आलू पर उस व्यक्ति का नाम लिखा था जिससे वे नफरत करते थे। अब महात्मा जी ने कहा कि अगले सात दिनों तक आपलोग ये आलू हमेशा अपने साथ रखें। शिष्यों को कुछ समझ में नहीं आया कि महात्मा जी क्या चाहते हैं, लेकिन सबने आदेश का पालन किया। दो-तीन दिनों के बाद ही शिष्यों को कष्ट होने लगा। जिनके पास ज्यादा आलू थे, वे बड़े कष्ट में थे। किसी तरह उन्होंने सात दिन बिताए और महात्मा के पास पहुंचे। महात्मा ने कहा, ‘अब अपनी-अपनी थैलियां निकाल कर रख दें।’ शिष्यों ने चैन की सांस ली। महात्मा जी ने विगत सात दिनों का अनुभव पूछा। शिष्यों ने अपने कष्टों का विवरण दिया। उन्होंने आलुओं की बदबू से होने वाली परेशानी के बारे में बताया। सभी ने कहा कि अब बड़ा हल्का महसूस हो रहा है।… महात्मा ने कहा, ‘जब मात्र सात दिनों में ही आपको ये आलू बोझ लगने लगे, तब सोचिए कि आप जिन व्यक्तियों से ईर्ष्या या नफरत करते हैं, आपके मन पर उनका कितना बड़ा बोझ रहता होगा। और उसे आप जिंदगी भर ढोते रहते हैं। सोचिए, ईर्ष्या के बोझ से आपके मन और दिमाग की क्या हालत होती होगी? *शिक्षा*;- ईर्ष्या के अनावश्यक बोझ के कारण आपलोगों के मन में भी बदबू भर जाती है, ठीक उन आलुओं की तरह। इसलिए अपने मन से इन भावनाओं को निकाल दो। यदि किसी से प्यार नहीं कर सकते तो कम से कम नफरत मत करो। आपका मन स्वच्छ, निर्मल और हल्का रहेगा।

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Vinay Mishra Feb 24, 2021

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vineeta tripathi Feb 24, 2021

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*💐वास्तविक पुण्य 💐 किसी आश्रम में एक साधु रहता था। काफी सालों से वह इसी आश्रम में रह रहा था। अब वह काफी वृद्ध हो चला था और मृत्यु को वह निकट महसूस कर रहा था, लेकिन संतुष्ट था कि 30 साल से उसने प्रभु का सिमरन किया है, उसके खाते में ढेर सारा पुण्य जमा है इसलिए उसे मोक्ष मिलना तो तय ही है। एक दिन उसके ख्याल में एक स्त्री आयी। स्त्री ने साधु से कहा - "अपने एक दिन के पुण्य मुझे दे दो और मेरे एक दिन के पाप तुम वरण कर लो।" इतना कह कर स्त्री लोप हो गयी। साधु बहुत बेचैन हुआ कि इतने बरस तो स्त्री ख्याल में ना आयी, अब जब अंत नजदीक है तो स्त्री ख्याल में आने लगी। फिर उसने ख्याल झटक दिया और प्रभु सुमिरन में बैठ गया। स्त्री फिर से ख्याल में आयी। फिर से उसने कहा कि - "एक दिन का पुण्य मुझे दे दो और मेरा एक दिन का पाप तुम वरण कर लो।" इस बार साधु ने स्त्री को पहचानने की कोशिश की लेकिन स्त्री का चेहरा बहुत धुंधला था, साधु से पहचाना नहीं गया! साधु अब चिंतित हो उठा कि एक दिन का पुण्य लेकर यह स्त्री क्या करेगी! हो ना हो ये स्त्री कष्ट में है! लेकिन गुरु जी ने कहा हुआ है कि आपके पुण्य ही आपकी असल पूंजी है, यह किसी को कभी मत दे बैठना। और इतनी मुश्किल से पुण्यो की कमाई होती है, यह भी दे बैठे तो मोक्ष तो गया। हो ना हो ये मुझे मोक्ष से हटाने की कोई साजिश है। साधू ने अपने गुरु के आगे अपनी चिंता जाहिर की। गुरु ने साधु को डांटा। 'मेरी शिक्षा का कोई असर नहीं तुझ पर? पुण्य किसी को नहीं देने होते। यही आपकी असली कमाई है।" साधु ने गुरु जी को सत्य वचन कहा और फिर से प्रभु सुमिरन में बैठ गया। स्त्री फिर ख्याल में आ गयी। बोली - तुम्हारा गुरु अपूर्ण है, इसे ज्ञान ही नहीं है, तुम तो आसक्ति छोड़ने का दम भरते हो, बीवी-बच्चे, दीन-दुनिया छोड़ कर तुम इस अभिमान में हो कि तुमने आसक्ति छोड़ दी है। तुमने और तुम्हारे गुरु ने तो आसक्ति को और जोर से पकड़ लिया है। किसी जरूरतमंद की मदद तक का चरित्र नहीं रहा तुम्हारा तो।" साधु बहुत परेशान हो गया! वह फिर से गुरु के पास गया। स्त्री की बात बताई। गुरु ने फिर साधु को डांटा, "गुरु पर संदेह करवा कर वह तुम्हे पाप में धकेल रही है। जरूर कोई बुरी आत्मा तुम्हारे पीछे पड़ गयी है।" साधु अब कहाँ जाए! वह वापिस लौट आया और फिर से प्रभु सुमिरन में बैठ गया। स्त्री फिर ख्याल में आयी। उसने फिर कहा - "इतने साल तक अध्यात्म में रहकर तुम गुलाम भी बन गए हो। गुरु से आगे जाते। इतने साल के अध्ययन में तुम्हारा स्वतंत्र मत तक नहीं बन पाया। गुरु के सीमित ज्ञान में उलझ कर रह गए हो। मैं अब फिर कह रही हूँ, मुझे एक दिन का पुण्य दे दो और मेरा एक दिन का पाप वरण कर लो। मुझे किसी को मोक्ष दिलवाना है। यही प्रभु इच्छा है।" साधु को अपनी अल्पज्ञता पर बहुत ग्लानि हुई। संत मत कहता है कि पुण्य किसी को मत दो और धर्म कहता है जरूरतमंद की मदद करो। यहां तो फंस गया। गुरु भी राह नही दे रहा कोई, लेकिन स्त्री मोक्ष किसको दिलवाना चाहती है। साधु को एक युक्ति सूझी। जब कोई राह ना दिखे तो प्रभु से तार जोड़ो। प्रभु से राह जानो। प्रभु से ही पूछ लो कि उसकी रजा क्या है? उसने प्रभु से उपाय पूछा। आकाशवाणी हुई। वाणी ने पूछा - "पहले तो तुम ही बताओ कि तुम कौन से पुण्य पर इतरा रहे हो?" साधु बोला - "मैंने तीस साल प्रभू सुमिरन किया है। तीस साल मैं भिक्षा पर रहा हूँ। कुछ संचय नही किया। त्याग को ही जीवन माना है। पत्नी बच्चे तक सब त्याग दिया।" वाणी ने कहा - "तुमने तीस बरस कोई उपयोगी काम नही किया। कोई रचनात्मक काम नही किया। दूसरों का कमाया और बनाया हुआ खाया। राम-राम, अल्लाह-अल्लाह, गॉड-गॉड जपने से पुण्य कैसे इकठा होते है मुझे तो नही पता। तुम डॉलर-डॉलर, रुपिया-रुपिया जपते रहो तो क्या तुम्हारा बैंक खाता भर जायेगा? तुम्हारे खाते में शून्य पुण्य है।" साधु बहुत हैरान हुआ। बहुत सदमे में आ गया।लेकिन हिम्मत करके उसने प्रभु से पूछा कि "फिर वह स्त्री पुण्य क्यो मांग रही है।" प्रभु ने कहा - "क्या तुम जानते हो वह स्त्री कौन है?" साधु ने कहा - "नही जानता लेकिन जानना चाहता हूं।" प्रभु ने कहा - "वह तुम्हारी पत्नी है। तुम जिसे पाप का संसार कह छोड़ आये थे। कुछ पता है वह क्या करती है?" साधु की आंखे फटने लगी। उसने कहा, "नही प्रभु। उसके बारे में मैं कुछ नहीं जानता!" प्रभु ने कहा - "तो सुनो, जब तुम घर से चुपचाप निकल आये थे तब वह कई दिन तुम्हारे इन्तजार में रोई। फिर एक दिन संचय खत्म हो गया और बच्चों की भूख ने उसे तुम्हारे गम पोंछ डालने के लिए विवश कर दिया। उसने आंसू पोंछ दिए और नौकरी के लिए जगह-जगह घूमती भटकती रही। वह इतनी पढ़ी लिखी नही थी। तुम बहुत बीच राह उसे छोड़ गए थे। उसे काम मिल नही रहा था इसलिए उसने एक कुष्ठ आश्रम में नौकरी कर ली। वह हर रोज खुद को बीमारी से बचाती उन लोगो की सेवा करती रही जिन्हे लोग वहां त्याग जाते हैँ। वह खुद को आज भी पापिन कहती है कि इसीलिए उसका मर्द उसे छोड़ कर चला गया!" प्रभु ने आगे कहा - "अब वह बेचैन है तुम्हे लेकर। उसे बहुत दिनों से आभास होंने लगा है कि उसका पति मरने वाला है। वह यही चाहती है कि उसके पति को मोक्ष मिले जिसके लिए वह घर से गया है। उसने बारंबार प्रभु को अर्जी लगाई है की प्रभु मुझ पापिन की जिंदगी काम आ जाये तो ले लो। उन्हें मोक्ष जरूर देना। मैंने कहा उसे कि अपना एक दिन उसे दे दो। कहती है मेरे खाते में पुण्य कहाँ, होते तो मैं एक पल ना लगाती। सारे पुण्य उन्हें दे देती। वह सुमिरन नहीं करती, वह भी समझती है कि सुमिरन से पुण्य मिलते हैं।" "मैंने उसे नहीं बताया कि तुम्हारे पास अथाह पुण्य जमा हैं। पुण्य सुमिरन से नहीं आता। मैंने उसे कहा कि एक साधु है उस से एक दिन के पुण्य मांग लो, अपने एक दिन के पाप देकर। उसने सवाल किया कि ऐसा कौन होगा जो पाप लेकर पुण्य दे देगा। मैंने उसे आश्वस्त किया कि साधु लोग ऐसे ही होते हैं।" "वह औरत अपने पुण्य तुम्हे दे रही थी और तुम ना जाने कौन से हिसाब किताब में पड़ गए। तुम तो साधु भी ठीक से नहीं बन पाए। तुमने कभी नहीं सोचा कि पत्नी और बच्चे कैसे होंगे। लेकिन पत्नी आज भी बेचैन है कि तुम लक्ष्य को प्राप्त होवो। तुम्हारी पत्नी को कुष्ठ रोग है, वह खुद मृत्यु शैया पर है लेकिन तुम्हारे लिए मोक्ष चाह रही है। तुम सिर्फ अपने मोक्ष के लिए तीस बरस से हिसाब किताब में पड़े हो।" साधू के बदन पर पसीने की बूंदे बहने लगी, सांस तेज होने लगी, उसने ऊँची आवाज में चीख लगाई - "यशोदा$$$$$$!:" साधु हड़बड़ा कर उठ बैठा, उसके माथे पर पसीना बह रहा था। उसने बाहर झाँक कर देखा, सुबह होने को थी। उसने जल्दी से अपना झोला बाँधा और गुरु जी के सामने जा खड़ा हुआ। गुरु जी ने पूछा "आज इतने जल्दी भिक्षा पर?" साधु बोला - "घर जा रहा हूँ।" गुरु जी बोले - "अब घर क्या करने जा रहे हो?" साधु बोला - "धर्म सीखने" धर्म वह नहीं है कि मंदिरों की घंटी बजाएं घंटों पूजा करें। मस्जिदों में जाकर नमाज पढ़ें गिरजाघरों में जाकर प्रार्थना करें गुरु ग्रंथ साहब का पाठ करें धर्म तो वह है किसी भूखे को खाना खिलाएं किसी अंधे को सड़क पार कराएं किसी जरूरतमंद की सहायता करें किसी बीमार असहाय का इलाज कराएं किसी छात्र की पढ़ने में सहायता करें यही असली धर्म है यही असली पुण्य है, पूजा-पाठ दिखावा करने से आपके पुण्य नहीं बढ़ेंगे वास्तविक किसी की सच्ची मदद करेंगे तभी आपके वास्तविक पुण्य का खाता बढ़ेगा। जय श्री कृष्ण*

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2️⃣0️⃣❗0️⃣2️⃣❗2️⃣0️⃣2️⃣1️⃣ *कहानी* *धीरज का फल* परमात्मा उसे ही आखिरी में और अधिक से अधिक देते हैं, जो विश्वास और धीरज बनाए रखते हैं! एक बार एक राज्य के राजा ने सोचा आज मैं अपने नगरजनो को दान करूंगा! सब को ये संदेश मिल सब दौरे चले आए, सब को कतार में खड़े रहने को कहा गया, सब के अंदर लालच थी सब से ज़्यादा पाने कि! फिर राजा ने सब को दान दिया और तभी राजा कि नज़र दूर खड़े एक व्यक्ति पर गई! राजा ने उसे भूलाकर पूछा तुम्हे नही चाहिए कुछ?? तब व्यक्ति बोला जो मेरे नसीब में हैं वो तो कुछ भी करके आएगा ही आएगा फिर क्यों मैं लालचवश उछल-कूद करूं! राजा उस व्यक्ति कि श्रद्धा, धीरज देख प्रसन्न हुए और कहा आज से तुम मेरे सेवादारी बनकर दरबार में मेरी सेवा करोगे! सीख - उस व्यक्ति ने "धीरज और विश्वास" बनाए रखा फिर उसे चाहे आखिरी में मिल पर सब से अधिक, चार गुना ज़्यादा मिला! जिसको जो भी मिला वो तो थोड़े समय रहते शायद समाप्त हो जाएगा परंतु उस व्यक्ति को जो मिला उससे उसका जीवन ही सुधर गया! कैसे..?? 1-वो पूरा समय राज दरबार में रहेगा, 2-राजा कि सेवा करने पर उसे वहाँ से धन भी मिलेगा, 3-राजा का सेवादारी होने पर उसका नाम भी राजा के साथ जोड़ा जाएगा, 4-उसे सुख-शांति, नाम सब मिला! इस तरह जब हम हर एक अवस्था में, पर परिस्थिती में परमात्मा पर विश्वास रखते हुए, धीरज से सही समय कि प्रतिक्षा करते है, तो परमात्मा हमें हमारी सोच से भी ज़्यादा देते हैं! हम थोड़ी सी भी तकलीफ आने पर, थोड़ा संघर्ष करने पर विश्वास तोड़ देते है,इसी कारण हम तक आया हुआ फल भी चला जाता है! अतः धीरज का फल मीठा ही होता है, बस उसके आने तक विश्वास कि डोर को पकड़कर रखें..!! *🙏🏽🙏🏼🙏🏻जय जय श्री राधे*🙏🏿🙏🙏🏾

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Ramesh Agrawal Feb 25, 2021

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*"अनोखा दोस्त कौआ"* 🙏🏻🚩🌹 🌹🚩🙏🏻 एक कौआ था। वह एक किसान के घर के आँगन के पेड़ पर रहता था। किसान रोज़ सुबह उसे खाने के लिए पहले कुछ देकर बाद में खुद खाता था। किसान खेत में चले जाने के बाद कौआ रोज़ उड़ते-उड़ते ब्रह्माजी के दरबार तक पहुँचता था और दरबार के बाहर जो नीम का पेड़ था, उस पर बैठकर ब्रह्माजी की सारी बातें सुना करता था। शाम होते ही कौआ उड़ता हुआ किसान के पास पहुँचता और ब्रह्माजी के दरबार की सारी बातें उसे सुनाया करता था। एक दिन कौए ने सुना कि ब्रह्माजी कह रहे हैं कि इस साल बारिश नहीं होगी। अकाल पड़ जायेगा। उसके बाद ब्रह्माजी ने कहा - "पर पहाड़ो में खूब बारिश होगी।" शाम होते ही कौआ किसान के पास आया और उससे कहा - "बारिश नहीं होगी, अभी से सोचो क्या किया जाये"। किसान ने खूब चिन्तित होकर कहा - "तुम ही बताओ दोस्त क्या किया जाये"। कौए ने कहा - "ब्रह्माजी ने कहा था पहाड़ों में जरुर बारिश होगी। क्यों न तुम पहाड़ पर खेती की तैयारी करना शुरु करो?" किसान ने उसी वक्त पहाड़ पर खेती की तैयारी की। आस-पास के लोग जब उस पर हँसने लगे, उसे बेवकूफ कहने लगे, उसने कहा - "तुम सब भी यही करो। कौआ मेरा दोस्त है, वह मुझे हमेशा सही रास्ता दिखाता है" - पर लोगों ने उसकी बात नहीं मानी। उस पर और ज्यादा हँसने लगे। उस साल बहुत ही भयंकर सूखा पड़ा। वह किसान ही अकेला किसान था जिसके पास ढेर सारा अनाज इकट्ठा हो गया। देखते ही देखते साल बीत गया इस बार कौए ने कहा - "ब्रह्माजी का कहना था कि इस साल बारिश होगी। खूब फसल होगी। पर फसल के साथ-साथ ढेर सारे कीड़े पैदा होगें। और कीड़े सारी फसल के चौपट कर देंगे।" इस बार कौए ने किसान से कहा - "इस बार पहले से ही तुम मैना पंछी और छछूंदों को ले आना ताकि वे कीड़ों को खा जाये।" किसान ने जब ढेर सारे छछूंदों को ले आया, मैना और पंछी को ले आया, आसपास के लोग उसे ध्यान से देखने लगे - पर इस बार वे किसान पर हंसे नहीं। इस साल भी किसान ने अपने घर में ढेर सारा अनाज इकट्ठा किया। इसके बाद कौआ फिर से ब्रह्माजी के दरबार के बाहर नीम के पेड़ पर बैठा हुआ था जब ब्रह्माजी कर रहे थे - "फसल खूब होगी पर ढेर सारे चूहे फसल पर टूट पड़ेगे।" कौए ने किसान से कहा - "इस बार तुम्हें बिल्लियों को न्योता देना पड़ेगा - एक नहीं, दो नहीं, ढेर सारी बिल्लियाँ"। इस बार आस-पास के लोग भी बिल्लियों को ले आये। इसी तरह पूरे गाँव में ढेर सारा अनाज इकट्ठा हो गया। कौए ने सबकी जान बचाई। 🌹🙏🏻🚩 *जय सियाराम* 🚩🙏🏻🌹

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