MANOJKUMAR SRIVASTAVA
MANOJKUMAR SRIVASTAVA Mar 25, 2020

Remember, we are all affecting the world every moment, whether we mean to or not. Our actions and states of mind matter, because we're so deeply interconnected with one another. Working on our own consciousness is the most important thing that we are doing at any moment, and being love is the supreme creative act. https://www.speakingtree.in/speaking-tree/spiritual-thought/ram-dass_19047

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Swami Lokeshanand Jun 1, 2020

दो भाई थे। पर दोनों के स्वभाव में जमीन आसमान का अंतर था। एक संत सेवी था, दूसरा वेश्यागामी। एक रात वह संत सेवी भाई, संत की सेवा करके घर आ रहा था। रास्ते में उसके पैर में एक खूंटी गड़ गई। बड़ा गहरा जख्म हो गया और बहुत खून बह गया। वह बड़ी मुश्किल से घर पहुँचा। उसी रात वेश्यालय से लौट रहे, वेश्यागामी भाई को, रास्ते में लाखों रुपए का हीरों का हार पड़ा मिला। रात में वेश्यागामी भाई कहने लगा- मैं तो पहले से ही कहता था कि कुछ नहीं रखा इन संतों में। अब देख लिया? तुम यहाँ दर्द से कराह रहे हो, मैं ऐश कर रहा हूँ। दोनों ने विचार किया कि किसी जानकार के पास चलना चाहिए। और सुबह होते ही वे एक ज्योतिषी के पास गए। अपना परिचय दिए बिना ही दोनों की जन्मपत्रियाँ ज्योतिषी के आगे रख दी। ज्योतिषी ने पहले संतसेवी की पत्री उठाई। उसे पढ़कर पत्री एक तरफ रख दी, और बोले- ये पत्री मेरे पास क्यों ले आए हो? यह तो कल रात मर गया होगा। और वेश्यागामी की पत्री देखी तो बोले- यह किस देश के राजा की पत्री है? मेरा सौभाग्य है जो ऐसी पत्री मेरे पास आई। लोकेशानन्द कहता है कि यही सत्कर्म और दुष्कर्म का फल है। वर्तमान का सत्कर्म, पूर्वजन्म के पाप को काट कर, सूली का सूल बना देता है। और वर्तमान का दुष्कर्म, पूर्वजन्म के पुण्य को नष्ट कर, सम्राट को भी सामान्य मनुष्य बना देता है। हमें समझना होगा कि अपनी वर्तमान अवस्था के जिम्मेदार हम स्वयं ही हैं। आपकी परिस्थिति आपके कर्म का ही फल है। अपनी भूल दूसरे पर मत लादो, न तो ईश्वर पर, न ही भाग्य पर। आपका ही पाप चक्रवृद्धि ब्याज सहित आप पर आ गिरता है। तब कोई ताकत उसे रोक नहीं पाती। वायु तो निरंतर बहती है, जिस जहाज का पाल खुला हो, वह वायु का उपयोग कर आगे बढ़ जाए। पर जिसका पाल खुला नहीं है, वह वायु को दोष क्यों दे? योंही ईश्वर की कृपा तो निरंतर बरसती है, जिसके पास सत्कर्म हो, वह कृपा का उपयोग कर आगे बढ़ जाए। पर जिसके पास सत्कर्म नहीं है, वह ईश्वर को दोष क्यों दे? सदा भगवान और संत की सेवा करते रहो। यही एकमात्र सत्कर्म है।

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Swami Lokeshanand Jun 1, 2020

अब भरतजी ने माँ सीताजी के चरणों में प्रणाम किया, जैसे चरण वैसा माथा। आज भरतजी अयोध्या को अस्वीकार करके आए हैं, कल सीताजी लंका को ठोकर मार देंगी। कंठ अवरुद्ध होने से, सीताजी भरतजी को आशीर्वाद वाणी से तो नहीं दे पाईं, पर आँखों के पानी से दे दिया। आँसू भरतजी की पीठ पर पड़े। भरतजी ने सिर उठा कर देखा, सजल नेत्रों से सजल नेत्रों में करुणा देखी, तो भरतजी निश्चिंत हो गए। देखो, माँ का स्थान तो पिता से भी बड़ा है। पिता से मिलकर इतने निश्चिंत नहीं हुए थे जितने माँ से मिलकर हो गए। स्वामी राजेश्वरानंदजी का भाव है, कि माँ कहने भर से ही मुंह खुल जाता है, बाप कहें तो बंद होता है, तो बालक माँ के सामने जितना खुलकर बात कह पाता है, पिता के सामने नहीं ही कह पाता। हमारे यहाँ कितनी चर्चा चलती है, हम कहते ही हैं- "त्वमेव माता च पिता त्वमेव" "राम हैं मात पिता गुरु बंधु" "तुम्हीं हो माता पिता तुम्हीं हो" माँ सदा पहले है। सत्य भी है, अन्त:करण में भक्ति हो, तो भगवान भगवान हैं, भीतर भक्ति ही न हो तो सामने खड़ा परमात्मा भी परमात्मा नहीं। सूर्य तो सबके लिए एक समान है, पर लाख निकला रहे, उल्लू जिसके भीतर प्रकाश नहीं, उसके लिए तो अंधकार की ही सत्ता है। तो भक्ति पहले, भगवान बाद में। इसीलिए सबमें माँ पहले कहा है, पिता बाद में। तभी तो जब भक्तों की रक्षा की बात आती है, तब भगवान स्वयं भी माँ ही बनकर रक्षा करते हैं, पिता बनकर नहीं। "करहूँ सदा तिन्ह के रखवारी। जिमि बालक राखहि महतारी॥" गजब बात है, भारत ही एकमात्र ऐसा देश है, जहाँ "भारत माता" कहा जाता है। और सब जगह तो पितृभूमि कहते हैं, हमारे यहाँ ही "मातृभूमि" है। सीताजी हमारी माँ हैं, सीताजी वो शक्ति हैं जो इसी धरती से ही प्रकट होती हैं, और रामराज्य की स्थापना का लक्ष्य पूरा कर, पुनः इसी धरती में ही समा जाती हैं। लोकेशानन्द कहता है, ऐसी पावन धरती पर जन्म लेकर और सीताजी जैसी माँ पाकर हम धन्य हो गए।

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white beauty May 31, 2020

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Swami Lokeshanand May 31, 2020

दो मित्र गुरूजी से शिक्षा प्राप्त कर, राजा के दरबार में पहुँचे। राजा ने उन्हें कुछ ज्ञान की बात सुनाने के लिए कहा। उनमें से एक ने कहा- "देत भुवालम्, फरत लिलारम्। न विद्या, न च पौरूषम्॥" माने राजा देता है, तो भाग्य फलीभूत होता है, विद्या या पुरूषार्थ से जगत के सुख साधन नहीं प्राप्त हुआ करते। दूसरे ने कहा- "फरत लिलारम्, देत भुवालम्। न विद्या, न च पौरूषम्॥" माने भाग्य फलीभूत होता है, तो राजा देता है, विद्या या पुरूषार्थ से जगत के सुख साधन नहीं प्राप्त हुआ करते। राजा को पहले वाले की बात बहुत अच्छी लगी। अपनी प्रशंसा किसे अच्छी नहीं लगती? तो उपहार के रूप में उसे हीरों से भरा एक कद्दू दे दिया। दूसरे ने तो राजा की प्रशंसा की नहीं थी जो उसे हीरे मिलते। उसे सत्तू दे कर विदा किया। अब देखें, हुआ यह कि पहले वाले को कद्दू खाना बिल्कुल पसंद नहीं था, और सत्तू बहुत पसंद था। रास्ते में उसने अपने उस मित्र से कहा- भाई! मुझे सत्तू बहुत अच्छा लगता है, तूं मेरा कद्दू ले ले, और मुझे अपना सत्तू दे दे। आप समझ ही गए होंगे कि किसे क्या प्राप्त हुआ? लोकेशानन्द कहता है कि भगवान और भगवत्स्वरूप संतों की सेवा से जो सत्कर्म एकत्र होता है, उसी से कालांतर में भाग्य का निर्माण होता है और सांसारिक ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। भाग्य में होता है तो मिलता है, नहीं होता तो नहीं ही मिलता। विद्या और पुरूषार्थ तो बहाना मात्र है। आप इसी एक विचार को लेकर, सदा उसी में विभोर रहो। सोते जागते सब समय, आपकी बुद्धि इसी एक विचार से परिपूर्ण रहे। व्यवहार तो निभता रहे, पर दूसरे सारे आश्रय छूट जाएँ। यही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। साधारण मानव करोड़ों जन्मों के व्यवहार से जिन सब अवस्थाओं से मुक्त होता है, सावधान साधक एक ही जन्म में उन सभी अवस्थाओं को भोग लेता है। वह दूसरी चिन्ता ही नहीं लेता, दूसरी बात के लिए निभिषमात्र भी समय नहीं देता। तब मुक्ति में देरी नहीं होती।

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white beauty May 30, 2020

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white beauty May 31, 2020

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Swami Lokeshanand May 31, 2020

भूमि पर पड़े भरतजी ने, दौड़ कर आए रामजी के चरणों को, अपने पास अनुभव किया, तो हाथों से चरण पकड़ लिए। रामजी कहते हैं उठो, भरतजी उठते नहीं। क्योंकि लाठी अपनेआप गिर तो सकती है, उठे कैसे? बल लकड़ी में नहीं होता, उन हाथों में होता है, जिनमें लकड़ी होती है। मैं गिर तो सकता हूँ, पर अपने से उठ नहीं सकता। मैं गिरा हुआ हूँ, गिरे हुओं को उठाने का सामर्थ्य तो भगवान आपके ही हाथों में है। भगवान ने भरतजी को जबरदस्ती उठाकर हृदय से लगा लिया। अब एक शिकायत इधर है एक उधर। रामजी पूछ रहे हैं कि भरत! तुम भूमि पर ही क्यों पड़े रहे, चरणों में सिर क्यों नहीं रखा? भरतजी के भाव देखें- • मैं सदा ही आपके चरणों में सिर रखता रहा, आज तो आप मेरे सिर पर चरण रख दीजिए, उन पर बनी वज्र रेखा से मेरा दुर्भाग्य कट जाए। • आपका अवतार पृथ्वी का भार उतारने के लिए हुआ है ना, मैं पृथ्वी पर भार हूँ, मेरा सिर काट लीजिए, पृथ्वी का भार कम हो जाएगा। • मैं तो आपके चरणों की धूल हूँ, धूल धूल में मिल रही है, मैं आपके चरणों में सिर रखने का अधिकारी नहीं हूँ। • आपकी चरणरज से अहिल्या का पाप कट गया, मैं भी पापी हूँ, मेरे मस्तक पर आपका चरण पड़ जाए तो मेरा भी पाप कट जाए। • मैं तो आपका बालक हूँ, धरती पर लोटकर जिद्द कर रहा हूँ कि मुझे अपने साथ ले चलो। • मेरी नासिका से आपकी विरहाग्नि से तप्त, गर्म गर्म श्वास निकल रही है, मुझे भय था कि ये आपके कोमल अति कोमल चरण कमलों को छू जाती तो उनपर फफोले पड़ जाते। भरतजी कहते हैं- आपने मेरे साथ पक्षपात किया है, क्या मैं आपका कुछ नहीं? आपने मुझे क्यों त्याग दिया? क्या मैं दासों से भी गिर गया? राघव, वन आने से पहले एक बार मुझे बुलवा तो लिया होता। आप मुझे किसके भरोसे छोड़कर आ गए? पर अब मैं आपके पास आ गया हूँ, अब आपके चरणों के बिना नहीं रहूँगा। भैया! मैं आपके बिना जी नहीं पाऊँगा। भरतजी स्वयं दीपक बने हैं, रामजी का प्रेम घी है, वनवास काल बाती है, राम का विरह अग्नि है, भरतजी का हृदय इस आग से जल रहा है। लोकेशानन्द कहता है यह आग हमें भी लग जाए, हमारा भी हृदय जल जाए, तो बात बन जाए।

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white beauty May 30, 2020

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Sunita Pawar Jun 1, 2020

चाणक्य के 15 अमर वाक्य | 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ 1) दुनिया की सबसे बड़ी ताकत पुरुष का विवेक और महिला की सुन्दरता है। 2) हर मित्रता के पीछे कोई स्वार्थ जरूर होता है, यह कड़वा सच है। 3) अपने बच्चों को पहले पांच साल तक खूब प्यार करो। छः साल से पंद्रह साल तक कठोर अनुशासन और संस्कार दो। सोलह साल से उनके साथ मित्रवत व्यवहार करो।आपकी संतति ही आपकी सबसे अच्छी मित्र है।" 4) दूसरों की गलतियों से सीखो अपने ही ऊपर प्रयोग करके सीखने को तुम्हारी आयु कम पड़ेगी। 5) किसी भी व्यक्ति को बहुत ईमानदार नहीं होना चाहिए। सीधे वृक्ष और व्यक्ति पहले काटे जाते हैं। 6) अगर कोई सर्प जहरीला नहीं है तब भी उसे जहरीला दिखना चाहिए वैसे दंश भले ही न हो पर दंश दे सकने की क्षमता का दूसरों को अहसास करवाते रहना चाहिए। 7) कोई भी काम शुरू करने के पहले तीन सवाल अपने आपसे पूछो... मैं ऐसा क्यों करने जा रहा हूँ ? इसका क्या परिणाम होगा ? क्या मैं सफल रहूँगा? 8) भय को नजदीक न आने दो अगर यह नजदीक आये, इस पर हमला कर दो यानी भय से भागो मत इसका सामना करो। 9) काम का निष्पादन करो, परिणाम से मत डरो। 10) सुगंध का प्रसार हवा के रुख का मोहताज़ होता है, पर अच्छाई सभी दिशाओं में फैलती है।" 11) ईश्वर चित्र में नहीं चरित्र में बसता है. अपनी आत्मा को मंदिर बनाओ। 12) व्यक्ति अपने आचरण से महान होता है जन्म से नहीं। 13) ऐसे व्यक्ति जो आपके स्तर से ऊपर या नीचे के हैं, उन्हें दोस्त न बनाओ, वह तुम्हारे कष्ट का कारण बनेगे। समान स्तर के मित्र ही सुखदायक होते हैं। 14) अज्ञानी के लिए किताबें और अंधे के लिए दर्पण एक समान उपयोगी है। 15) शिक्षा सबसे अच्छी मित्र है।शिक्षित व्यक्ति सदैव सम्मान पाता है। शिक्षा की शक्ति के आगे युवा शक्ति और सौंदर्य दोनों ही कमजोर है. राजा भोज ने कवि कालीदास से दस सर्वश्रेष्ट सवाल किए- 1- दुनिया में भगवान की सर्वश्रेष्ठ रचना क्या है? उत्तर- ''मां'' 2- सर्वश्रेष्ठ फूल कौन सा है? उत्तर- "कपास का फूल" 3- सर्वश्र॓ष्ठ सुगंध कौन सी है? उत्तर- वर्षा से भीगी मिट्टी की सुगंध । 4-सर्वश्र॓ष्ठ मिठास कौन सी? - "वाणी की" 5- सर्वश्रेष्ठ दूध- "मां का" 6- सबसे काला क्या है? "कलंक" 7- सबसे भारी क्या है? "पाप" 8- सबसे सस्ता क्या है? "सलाह" 9- सबसे महंगा क्या है? "सहयोग" 10-सबसे कडवा क्या है? ऊत्तर- "सत्य". वो डांट कर अपने बच्चो को अकेले मे रोती है? वो माँ है और माँ एसी ही होती है । जितना बडा प्लाट होता है, उतना बडा बंगला नही होता. जितना बडा बंगला होता है, उतना बडा दरवाजा नही होता. जितना बडा दरवाजा होता है, उतना बडा ताला नही होता. जितना बडा ताला होता है, उतनी बडी चाबी नही होती. परन्तु चाबी पर पुरे बंगले का आधार होता है। इसी तरह मानव के जीवन मे बंधन और मुक्ति का आधार मन की चाबी पर ही निर्भर होता है। है मानव! तू सबकुछ कर पर किसी को परेशान मत कर, जो बात समझ न आऐ उस बात मे मत पड़! पैसे के अभाव मे जगत 1% दूखी है, समझ के अभाव मे जगत 99% दूखी है. आज का श्रेष्ठ विचार:- यदि आप धर्म करोगे तो भगवान से आपको माँगना पड़ेगा, लेकिन यदि आप कर्म करोगे तो भगवान को देना पड़ेगा..! 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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