Ritu Sen
Ritu Sen Apr 18, 2019

🌹🌹🌼🌾🌹🌹🌼🌾🌹🌹🌼🌾🌹🌹🌼🌾🌹💕🌹🌹🌼🌾🌹 Jai Mata Di🌹🌾🌼🌹🌹💕

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Jai Shri Hanuman ji good morning ji🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

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कामेंट्स

,OP JAIN (RAJ) Apr 18, 2019
जय श्री हनुमान जी आपका हर एक पल शुभ और मंगलमय हो सुप्रभात दीदी आप और आपके पूरे परिवार को हनुमान जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं

Vijay Yadav🌷009660504471697 Apr 18, 2019
Jay shri radhe Krishna ji good morning ji aapki har manokamna thakur ji puri Kare ji god bless you and your family ji 🌷🌷🙏🙏

🌲💜राजकुमार राठोड💜🌲 Apr 19, 2019
🌹सुप्रभात वंदन जी🌹 🙏जय श्री राम जय हनुमान 🙏 आपको हनुमान जन्मोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ

Rajesh Lakhani Apr 19, 2019
JAI SHREE HANUMAN SHUBH PRABHAT BEHENA RAM BHAKAT HANUMA JI MAHARAJ KI KRUPA AAP PER OR AAP KE PARIVAR PER SADA BANI RAHE HANUMAN JAYANTI KI HARDIK SUBKAMNAYE BEHENA PRANAM

GIRISH Apr 19, 2019
very good morning hello meri beti sada Khush raho JAI SHRI KRISHNA Ji

माता सती योगाग्नि..🌅🌅 भगवान #ब्रह्मा के पुत्र #दक्ष प्रजापति की सभी पुत्रियाँ गुणवती थीं। फिर भी दक्ष के मन में संतोष नहीं था। वे चाहते थे उनके घर में एक ऐसी पुत्री का जन्म हो, जो सर्व शक्ति-संपन्न हो एवं सर्वविजयिनी हो। अत: दक्ष एक ऐसी ही पुत्री के लिए तप करने लगे। तप करते-करते अधिक दिन बीत गए, तो भगवती #आद्या ने प्रकट होकर कहा, 'मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूं। तुम किस कारण तप कर रहे हो? दक्ष ने तप करने का कारण बताया तो मां बोली मैं स्वयं पुत्री रूप में तुम्हारे यहां जन्म धारण करूंगी और मेरा नाम '#सती' होगा। मैं सती के रूप में जन्म लेकर अपनी लीलाओं का विस्तार करूंगी। फलतः भगवती आद्या ने सती रूप में दक्ष के यहां जन्म लिया। सती दक्ष की सभी पुत्रियों में सबसे अलौकिक थीं। सती ने बाल्यावस्था में ही कई ऐसे अलौकिक आश्चर्य चकित करने वाले कार्य कर दिखाए थे, जिन्हें देखकर स्वयं दक्ष को भी विस्मय होता था । जब सती विवाह योग्य हो गई, तो दक्ष को उनके लिए वर की चिंता होने लगी। उन्होंने ब्रह्मा जी से इस विषय में परामर्श किया। ब्रह्मा जी ने कहा, सती आद्या की अवतार हैं। आद्या आदि शक्ति और शिव आदि पुरुष हैं। अतः सती के विवाह के लिए #शिव ही योग्य और उचित वर हैं। दक्ष ने ब्रह्मा जी की बात मानकर सती का विवाह भगवान शिव के साथ कर दिया। सती #कैलाश में जाकर भगवान शिव के साथ रहने लगीं। भगवान शिव के दक्ष के दामाद थे, किंतु किसी वजह से दक्ष के ह्रदय में भगवान शिव के प्रति बैर और विरोध भाव पैदा हो गया। एक बार देवलोक में ब्रह्मा ने धर्म के निरूपण के लिए एक सभा का आयोजन किया था। सभी बड़े-बड़े देवता सभा में एकत्र हुुए। भगवान शिव भी इस सभा में बैठे थे। सभा मण्डल में दक्ष का आगमन हुआ। दक्ष के आगमन पर सभी देवता उठकर खड़े हो गए, पर भगवान शिव खड़े नहीं हुए। उन्होंने दक्ष को प्रणाम भी नहीं किया। फलतः दक्ष ने अपमान का अनुभव किया। केवल यही नहीं, उनके ह्रदय में भगवान शिव के प्रति ईर्ष्या की आग जल उठी। वे उनसे बदला लेने के लिए समय और अवसर की प्रतीक्षा करने लगे। एक बार सती और शिव कैलाश पर्वत पर बैठे हुए परस्पर वार्तालाप कर रहे थे। उसी समय आकाश मार्ग से कई विमान कनखल की ओर जाते हुए दिखाई पड़े। सती ने उन विमानों को दिखकर भगवान शिव से पूछा, 'प्रभो, ये सभी विमान किसके है और कहां जा रहे हैं? भगवान शकंर ने उत्तर दिया आपके पिता ने बडे यज्ञ का आयोजन किया हैं। समस्त देवता और देवांगनाएं इन विमानों में बैठकर उसी यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए जा रहे हैं।' इस पर सती ने दूसरा प्रश्न किया, "क्या मेरे पिता ने आपको यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए नहीं बुलाया?" भगवान शंकर ने उत्तर दिया, "आपके पिता मुझसे बैर रखते है, फिर वे मुझे क्यों बुलाने लगे?" सती मन ही मन सोचने लगीं फिर बोलीं- "यज्ञ के इस अवसर पर अवश्य मेरी सभी बहनें आएंगी। उनसे मिले हुए बहुत दिन हो गए। यदि आपकी अनुमति हो, तो मैं भी अपने पिता के घर जाना चाहती हूं। यज्ञ में सम्मिलित हो लूंगी और बहनों से भी मिलने का सुअवसर मिलेगा।" भगवान शिव ने उत्तर दिया, "इस समय वहां जाना उचित नहीं होगा। आपके पिता मुझसे बैर रखते हैं हो सकता हैं वे आपका भी अपमान करें। बिना बुलाए किसी के घर जाना उचित नहीं होता हैं।" इस पर सती ने प्रश्न किया "ऐसा क्यों?" भगवान शिव ने उत्तर दिया "विवाहिता लड़की को बिना बुलाए पिता के घर नहीं जाना चाहिए, क्योंकि विवाह हो जाने पर लड़की अपने पति की हो जाती हैं। पिता के घर से उसका संबंध टूट जाता हैं।" लेकिन सती अपने मायके जाने के लिए हठ करती रहीं। अपनी बात बार-बात दोहराती रहीं। उनकी इच्छा देखकर भगवान शिव ने पीहर जाने की अनुमति दे दी। उनके साथ अपना एक गण भी साथ में भेज दिया उस गण का नाम 'वीरभद्र' था। सती #वीरभद्र के साथ अपने पिता के घर गईं। घर में सती से किसी ने भी प्रेमपूर्वक वार्तालाप नहीं किया। दक्ष ने उन्हें देखकर कहा तुम क्या यहाँ मेरा अपमान कराने आई हो? अपनी बहनों को तो देखो वे किस प्रकार भांति-भांति के अलंकारों और सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित हैं। तुम्हारे शरीर पर मात्र बाघांबर हैं। तुम्हारा पति श्मशानवासी और भूतों का नायक हैं। वह तुम्हें बाघांबर छोड़कर और पहना ही क्या सकता हैं। दक्ष के कथन से सती के ह्रदय में पश्चाताप का सागर उमड़ पड़ा। वे सोचने लगीं उन्होंने यहां आकर अच्छा नहीं किया। भगवान ठीक ही कह रहे थे, बिना बुलाए पिता के घर भी नहीं जाना चाहिए। पर अब क्या हो सकता हैं? अब तो आ ही गई हूं। पिता के कटु और अपमानजनक शब्द सुनकर भी सती मौन रहीं। वे उस यज्ञमंडल में गईं जहां सभी देवता और ॠषि-मुनि बैठे थे तथा यज्ञकुण्ड में धू-धू करती जलती हुई अग्नि में आहुतियां डाली जा रही थीं। सती ने यज्ञमंडप में सभी देवताओं के तो भाग देखे, किंतु भगवान शिव का भाग नहीं देखा। वे भगवान शिव का भाग न देखकर अपने पिता से बोलीं "पितृश्रेष्ठ! यज्ञ में तो सबके भाग दिखाई पड़ रहे हैं किंतु कैलाशपति का भाग नहीं हैं। आपने उनका भाग क्यों नहीं रखा?" दक्ष ने गर्व से उत्तर दिया "मैं तुम्हारे पति शिव को देवता नहीं समझता। वह तो भूतों का स्वामी, नग्न रहने वाला और हड्डियों की माला धारण करने वाला हैं। वह देवताओं की पंक्ति में बैठने योग्य नहीं हैं। उसे कौन भाग देगा?" सती के नेत्र लाल हो उठे। उनका मुखमंडल प्रलय के सूर्य की भांति तेजोदिप्त हो उठा। उन्होंने पीड़ा से तिलमिलाते हुए कहा "ओह! मैं इन शब्दों को कैसे सुन रहीं हूं मुझे धिक्कार हैं। देवताओ तुम्हें भी धिक्कार हैं! तुम भी उन कैलाशपति के लिए इन शब्दों को कैसे सुन रहे हो जो मंगल के प्रतीक हैं और जो क्षण मात्र में संपूर्ण सृष्टि को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं। वे मेरे स्वामी हैं। नारी के लिए उसका पति ही स्वर्ग होता हैं। जो नारी अपने पति के लिए अपमानजनक शब्दों को सुनती हैं उसे नरक में जाना पड़ता हैं। पृथ्वी सुनो, आकाश सुनो और देवताओं, तुम भी सुनो! मेरे पिता ने मेरे स्वामी का अपमान किया हैं। मैं अब एक क्षण भी जीवित रहना नहीं चाहती।" सती अपने कथन को समाप्त करती हुई यज्ञ के कुण्ड में कूद पड़ी। जलती हुई आहुतियों के साथ उनका शरीर भी जलने लगा। सती अग्निदाह योग के बारे में सुनने के बाद भगवान शिव उग्र हो उठे। अपने गुस्से को नियंत्रित करने में असमर्थ, उन्होंने आगे बढ़कर श्रेष्ठ भैरव गणों में वीरभद्र और #भद्रकाली, #दक्षिणा को आगे बढ़ाया। यज्ञमंडप में खलबली पैदा हो गई, हाहाकार मच गया। देवता उठकर खड़े हो गए। वीरभद्र क्रोध से कांप उठे। वे उछ्ल-उछलकर यज्ञ का विध्वंस करने लगे। यज्ञमंडप में भगदड़ मच गई। देवता और ॠषि-मुनि भाग खड़े हुए। हालांकि कई देवताओं ने दक्षिणा, वीरभद्र और भद्रकाली की मदद करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने दक्ष प्रजापति की सेना को नष्ट कर दिया और वीरभद्र ने देखते ही देखते दक्ष प्रजापति का मस्तक काटकर फेंक दिया। भगवान शिव प्रचंड आंधी की भांति #कनखल जा पहुंचे। सती के जले हुए शरीर को देखकर भगवान शिव ने अपने आपको भूल गए। सती के प्रेम और उनकी भक्ति ने शंकर के मन को व्याकुल कर दिया। उन शंकर के मन को व्याकुल कर दिया जिन्होंने काम पर भी विजय प्राप्त की थी और जो सारी सृष्टि को नष्ट करने की क्षमता रखते थे। वे सती के प्रेम में खो गए, बेसुध हो गए। भगवान ब्रह्मा ने अपने बेटे दक्ष प्रजापति के जीवन के लिए भगवान शिव से पुनः अनुरोध किया और उसे अपने व्यवहार के लिए माफ करने के लिए कहा। भगवान ब्रह्मा के अनुरोध पे भगवान शिव शांत तो हो गए, लेकिन दक्ष प्रजापति के सिर को एक #बकरी के सिर के साथ स्थानांतरित करके उसे पुनर्जीवित किया। उन्होंने अपने कंधे पर देवी सती के शरीर को रखा और अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करते हुए, ब्रह्मांड के मध्य से चलना शुरू कर दिया। भगवान शिव ने उन्मत की भांति सती के जले हुए शरीर को कंधे पर रख सभी दिशाओं में भ्रमण करने लगे। शिव और सती के इस अलौकिक प्रेम को देखकर पृथ्वी रुक गई, हवा रूक गई, जल का प्रवाह ठहर गया और रुक गईं देवताओं की सांसेंं। सृष्टि व्याकुल हो उठी, सृष्टि के प्राणी पुकारने लगे' त्राहिमाम! त्राहिमाम! जगत के बढते इस असंतुलन को देख देवताओं को बहुत चिंता होने लगी और ब्रह्मांड में संतुलन बहाल करने में मदद करने के लिए उन्होंने भगवान विष्णु से संपर्क किया। सती वियोग में भगवान शंकर के दुख को हरने भयानक संकट उपस्थित देखकर सृष्टि के पालक भगवान #विष्णु आगे बढ़े। वे भगवान शिव की बेसुधी में अपने चक्र से सती के एक-एक अंग को काट-काट कर गिराने लगे। धरती पर इक्यावन स्थानों में सती के अंग कट-कटकर गिरे। जब सती के सारे अंग कट कर गिर गए, तो भगवान शिव पुनः अपने आप में आए। जब वे अपने आप में आए, तो पुनः सृष्टि के सारे कार्य चलने लगे। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र का इस्तेमाल सती के शरीर को टुकड़ों को काटने के लिए किया था, जो पृथ्वी के भिन्न जगहों पे जाकर गिरे। शरीर के टुकड़े की कुल संख्या ५१ थी, और वे ५१ विभिन्न स्थानों पर गिर गई। इन सभी जगहों को हिंदू धर्म में पवित्र #शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है, और उनमें से प्रत्येक में काली या देवी सती शक्ति मंदिर है। आज भी उन स्थानों में सती का पूजन होता हैं, उपासना होती हैं। धन्य था शिव और सती का प्रेम। शिव और सती के प्रेम ने उन्हें अमर और वंदनीय बना दिया। भगवान शिव अपनी पत्नी के वियोग में ध्यान और शोक करने के लिए कैलाश पर्वत लौट आऐ। देवी सती अंततः #पार्वती के रूप में दुबारा जन्म लेकर भगवान शिव के पास लौट आयी। कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,,,

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#त्रिपुरमालिनी 'त्रिगर्त' जालंधर #षष्टम् शक्तिपीठ, #पंजाब 🌸🌸 #त्रिगर्त या #जालंधर शक्तिपीठ ५१ शक्तिपीठों में से एक है। हिन्दू धर्म के पुराणों के अनुसार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आये। ये अत्यंत पावन तीर्थस्थान कहलाये। ये तीर्थ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर फैले हुए हैं। देवीपुराण में ५१ शक्तिपीठों का वर्णन है। यस्माच्चण्डं च मुण्डं च गृहीत्वा त्व मुपागता:। चण्डमुण्डेति ततो लोके ख्याता देवि भविष्यसि।। यह शक्तिपीठ पंजाब के जालंधर में स्थित है, यहाँ माता सती का वाम वक्ष गिरा था। यहाँ की शक्ति 'त्रिपुरमालिनी' तथा भैरव '#भीषण' हैं। अनुमानत: प्राचीन विश्लेषणों से इसे त्रिगर्त प्रदेश (वर्तमान #कांगड़ा घाटी) के अंतर्गत मानना ही उचित होगा, जिसमें 'कांगड़ा शक्ति त्रिकोणपीठ' की तीन जाग्रत देवियाँ- '#चिन्तापूर्णी', '#ज्वालामुखी' तथा '#सिद्धमाता विद्येश्वरी' विराजती हैं। वैसे यहाँ विश्वमुखी देवी का मंदिर है, जहाँ पीठ स्थान पर वक्ष मूर्ति कपड़े से ढंकी रहती है और धातु निर्मित मुखमण्डल बाहर दिखता है। इसे 'वाम वक्षपीठ' एवं 'त्रिगर्त तीर्थ' भी कहते हैं और यही 'जालंधर पीठ' नामक शक्तिपीठ माना जाता है। यहाँ सती के वाम वक्ष का निपात हुआ था। यह शक्तिपीठ पंजाब के जालंधर में उत्तर की तरफ रेलवे स्टेशन से मात्र १ किमी की दुरी पर स्थापित है। यह मंदिर माँ त्रिपुरमालिनी देवी मंदिर और देवी तालाब मंदिर नाम से जाना जाता है। हजारो भक्त माँ की कृपा पाने दर्शन हेतु दुर दुर से यहा आते है। इस मंदिर में भगवान शिव की पूजा भीषण भैरव के रूप में की जाती है। मंदिर का शिखर सोने से बनाया गया है। समय समय पर मंदिर परिसर में माँ के जगरात्रे और नवरात्रो में बड़ी धूम धाम से मेला सजता है। मंदिर बहूत सारी मनमोहक झांकिया भी त्यौहारो पर लगाता है जिसे देखने भक्तो की अपार भीड दुर दराज से आती है। माँ त्रिपुरमालिनी देवी मंदिर परिसर : कहा जाता है की यह मंदिर 200 साल पुराना है। यह मंदिर तालाब के मध्य स्थित है जहा जाने के लिए 12 फ़ीट चोड़ी जगह है। मुख्य भगवती के मंदिर में तीन मूरत है। माँ भगवती के साथ माँ लक्ष्मी और माँ सरस्वती विराजमान है। भक्त इस मंदिर में इन देवियो की मूरत के परिकर्मा देते है। पूरा मंदिर परिसर लग भग 400 मीटर में फैला हुआ है। मंदिर परिसर में भक्तो के आराम करने की सुविधा भी है। ऐसी मान्यता है कि, जालंधर में स्थित शक्ति पीठ विवरण, किसी भी धार्मिक ग्रंथ में नहीं मिलता है। अनुमानतः कांगड़ा घाटी, हिमाचल प्रदेश को मानना उचित होगा जिसमें ‘कांगड़ा शक्ति पीठ’ है। यहाँ तीन जाग्रत देवियाँ-चिन्तापूर्णी, ज्वालामुखी और विधेश्वरी व कांगड़ा माता विराजमान है। इसे ‘वाम वक्षपीठ’ एवं ‘त्रिगर्त तीर्थ’ भी कहते हैं और यही ‘जालंधर पीठ’ नामक शक्तिपीठ माना जाता है। कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,

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Shashi Bhushan Singh May 18, 2019

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#अम्बाजी माता #सप्तम् शक्तिपीठ, बनासकांठा, #गुजरात🌋 अम्बाजी माता मन्दिर भारत में माँ शक्ति के ५१ शक्तिपीठों में से एक प्रधान पीठ है जो गुजरात-राजस्थान सीमा पर अरासुर पर्वत पर स्थित है। गुजरात का अम्बाजी मंदिर बेहद प्राचीन है। माँ अम्बा-भवानी के शक्तिपीठों में से एक इस मंदिर के प्रति माँ के भक्तों में अपार श्रद्धा है। इस मंदिर के गर्भगृह में मां की कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है। शक्ति के उपासकों के लिए यह मंदिर बहुत महत्व रखता है। यहाँ देवी शक्ति माँ सिंहवाहिनी अम्बा व भगवान शिव #बटुकभैरव के रुप में स्थापित हैं। यहां माँ का एक #श्रीयंत्र स्थापित है। इस श्रीयंत्र को कुछ इस प्रकार सजाया जाता है कि देखने वाले को लगे कि माँ अम्बे यहां साक्षात विराजी हैं। अम्बाजी मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां पर भगवान #श्रीकृष्ण का मुंडन संस्कार संपन्न हुआ था। वहीं भगवान #श्रीराम भी शक्ति की उपासना के लिए यहां आ चुके हैं। अरासुरी अम्बाजी मन्दिर में कोई प्रतिमा स्थापित नहीं है, केवल पवित्र श्रीयंत्र की पूजा मुख्य आराध्य रूप में की जाती है। इस यंत्र को कोई भी सीधे आंखों से देख नहीं सकता एवं इसकी फ़ोटोग्राफ़ी का भी निषेध है। माँ अम्बाजी की मूल पीठस्थल कस्बे में #गब्बर पर्वत के शिखर पर है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां तीर्थयात्रा करने वर्ष पर्यन्त आते रहते हैं, विशेषकर पूर्णिमा के दिन। भदर्वी पूर्णिमा के दिन यहाँ बड़ा मेला लगता है। देश भर से भक्तगण यहां मां की पूजा अर्चना हेतु आते हैं, विशेषकर जुलाई माह में। इस समय पूरे अम्बाजी कस्बे को दीपावली की तरह प्रकाश से सजाया जाता है। माना जाता है कि ये मन्दिर लगभग बारह सौ वर्ष से अधिक प्राचीन है। इस मंदिर का शिखर १०३ फ़ीट ऊंचा है और इस पर ३५८ स्वर्ण कलश स्थापित हैं। इस मेले में एक अनुमान के अनुसार २००८ में २५ लाख यात्री पहुंचने की संभावना थी। अम्बाजी मन्दिर हिन्दुओं की ५१ शक्ति-पीठों में से एक है। देवी की ५१ शक्तिपीठों में से १२ प्रमुख शक्ति पीठ इस प्रकार से हैं:- मां भगवती महाकाली मां शक्ति, उज्जैन, माँ कामाक्षी, कांचीपुरम, माता ब्रह्मरंध्र, श्रीशैलम में, श्री कुमारिका, कन्याकुमारी,महालक्ष्मी मंदिर, कोल्हापुर, देवी ललिता, प्रयाग, विन्ध्यवासिनी देवी, विन्ध्याचल, विशालाक्षी, वाराणसी, मंगलावती, गया एवं मां सुंदरी, बंगाल में तथा गुह्येश्वरी नेपाल में। गब्बर पर्वत गुजरात एवं राजस्थान की सीमा पर स्थित है। यहां पर पवित्र गुप्त नदी सरस्वती का उद्गम अरासुर पहाड़ी पर प्राचीन पर्वतमाला अरावली के दक्षिण-पश्चिम में समुद्र सतह से १,६०० फीट (४९० मी॰) की ऊंचाई पर ८.३३ कि॰मी2 (३.२२ वर्ग मील) क्षेत्रफ़ल में अम्बाजी शक्तिपीठ स्थित है। यह ५१ शक्तिपीठों में से एक है जहां मां सती का हृदय गिरा था। इसका उल्लेख "तंत्र चूड़ामणि" में भी मिलता है। इस गब्बर पर्वत के शिखर पर देवी का एक छोटा मंदिर स्थित है जिसकी पश्चिमी छोर पर दीवार बनी है। यहां नीचे से ९९९ सीढ़ियों के जीने से पहाड़ी पर चढ़कर पहुंचा जा सकता है। माता श्री अरासुरी अम्बिका के निज मंदिर में श्री बीजयंत्र के सामने एक पवित्र ज्योति अटूट प्रज्ज्वलित रहती है। माँ अम्बाजी मंदिर गुजरात-राजस्थान सीमा पर स्थित है। माना जाता है कि यह मंदिर लगभग बारह सौ साल पुराना है। इस मंदिर के जीर्णोद्धार का काम १९७५ से शुरू हुआ था और तब से अब तक जारी है। श्वेत संगमरमर से निर्मित यह मंदिर बेहद भव्य है। मंदिर का शिखर एक सौ तीन फुट ऊंचा है। शिखर पर ३५८ स्वर्ण कलश सुसज्जित हैं। मंदिर से लगभग ३ किलोमीटर की दूरी पर गब्बर नामक पहाड़ है। इस पहाड़ पर भी देवी मां का प्राचीन मंदिर स्थापित है। माना जाता है यहां एक पत्थर पर मां के पदचिह्न बने हैं। पदचिह्नों के साथ-साथ मां के रथचिह्न भी बने हैं। अम्बाजी के दर्शन के उपरान्त श्रद्धालु गब्बर जरूर जाते हैं। हर साल भाद्रपदी पूर्णिमा के मौके पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु जमा होते हैं। भाद्रपदी पूर्णिमा को इस मंदिर में एकत्रित होने वाले श्रद्धालु पास में ही स्थित गब्बरगढ़ नामक पर्वत श्रृंखला पर भी जाते हैं, जो इस मंदिर से दो मील दूर पश्चिम की दिशा में स्थित है। प्रत्येक माह पूर्णिमा और अष्टमी तिथि पर यहां मां की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। शक्तिस्वरूपा अम्बाजी देश के अत्यंत प्राचीन ५१ शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। वस्तुतः हिन्दू धर्म के प्रमुख बारह शक्तिपीठ हैं। इनमें से कुछ शक्तिपीठ हैं- कांचीपुरम का कामाक्षी मंदिर, मलयगिर‍ि का ब्रह्मारंब मंदिर, कन्याकुमारी का कुमारिका मंदिर, अमर्त-गुजरात स्थित अम्बाजी का मंदिर, कोल्हापुर का महालक्ष्मी मंदिर, प्रयाग का देवी ललिता का मंदिर, विंध्या स्थित विंध्यवासिनी माता का मंदिर, वाराणसी की मां विशालाक्षी का मंदिर, गया स्थित मंगलावती और बंगाल की सुंदर भवानी और असम की कामख्या देवी का मंदिर। नवरात्रि में यहां का वातावरण आकर्षक और शक्तिमय रहता है। नौ दिनों तक चलने वाले नवरात्रि पर्व में श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहां माता के दर्शन के लिए आते हैं। इस समय मंदिर प्रांगण में गरबा करके शक्ति की आराधना की जाती है। समूचे गुजरात से कृषक अपने परिवार के सदस्यों के साथ मां के दर्शन के लिए एकत्रित होते हैं। व्यापक स्तर पर मनाए जाने वाले इस समारोह में ‘भवई’ और ‘गरबा’ जैसे नृत्यों का प्रबंध किया जाता है। साथ ही यहां पर ‘सप्तशती’ (मां की सात सौ स्तुतियां) का पाठ भी आयोजित किया जाता है। कैसे पहुंचें- अम्बाजी मंदिर गुजरात और राजस्थान की सीमा से लगा हुआ है। आप यहां राजस्थान या गुजरात जिस भी रास्ते से चाहें पहुंच सकते हैं। यहां से सबसे नजदीक स्टेशन माउंटआबू का पड़ता है। अहमदाबाद से हवाई सफर भी कर सकते हैं। अम्बाजी मंदिर अहमदाबाद से १८० किलोमीटर और माउंटआबू से ४५ किलोमीटर दूरी पर स्थित है। इसके अलावा गब्बर पर्वत पर अन्य दर्शनीय स्थल भी हैं, जैसे सनसेट प्वाइंट, गुफाएं, माताजी के झूले एवं रज्जुमार्ग का सास्ता। हाल की खोज से ज्ञात हुआ है कि अम्बाजी के इस मन्दिर का निर्माण वल्लभी शासक, सूर्यवंश सम्राट अरुण सेन ने चौथी शताब्दी, ईसवी में करवाया था। कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,,

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Rajeev Thapar May 18, 2019

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|| औरत ही मकान को घर बनाती है ; चाहे तो नाश कर दे या सर्वनाश ||📚🕉️ एक गांव में एक जमींदार था। उसके कई नौकरों में जग्गू भी था। गांव से लगी बस्ती में, बाकी मजदूरों के साथ जग्गू भी अपने पांच लड़कों के साथ रहता था। जग्गू की पत्नी बहुत पहले गुजर गई थी। एक झोंपड़े में वह बच्चों को पाल रहा था। बच्चे बड़े होते गये और जमींदार के घर नौकरी में लगते गये। सब मजदूरों को शाम को मजूरी मिलती। जग्गू और उसके लड़के चना और गुड़ लेते थे। चना भून कर गुड़ के साथ खा लेते थे। बस्ती वालों ने जग्गू को बड़े लड़के की शादी कर देने की सलाह दी।उसकी शादी हो गई और कुछ दिन बाद गौना भी आ गया। उस दिन जग्गू की झोंपड़ी के सामने बड़ी बमचक मची। बहुत लोग इकठ्ठा हुये नई बहू देखने को। फिर धीरे धीरे भीड़ छंटी। आदमी काम पर चले गये। औरतें अपने अपने घर। जाते जाते एक बुढ़िया बहू से कहती गई – पास ही घर है। किसी चीज की जरूरत हो तो संकोच मत करना, आ जाना लेने। सबके जाने के बाद बहू ने घूंघट उठा कर अपनी ससुराल को देखा तो उसका कलेजा मुंह को आ गया।जर्जर सी झोंपड़ी, खूंटी पर टंगी कुछ पोटलियां और झोंपड़ी के बाहर बने छः चूल्हे (जग्गू और उसके सभी बच्चे अलग अलग चना भूनते थे)। बहू का मन हुआ कि उठे और सरपट अपने गांव भाग चले। पर अचानक उसे सोच कर धचका लगा– वहां कौन से नूर गड़े हैं। मां है नहीं। भाई भौजाई के राज में नौकरानी जैसी जिंदगी ही तो गुजारनी होगी। यह सोचते हुये वह बुक्का फाड़ रोने लगी। रोते-रोते थक कर शान्त हुई। मन में कुछ सोचा। पड़ोसन के घर जा कर पूछा –अम्मां एक झाड़ू मिलेगा? बुढ़िया अम्मा ने झाड़ू, गोबर और मिट्टी दी।साथ मेंअपनी पोती को भेज दिया।वापस आ कर बहू ने एक चूल्हा छोड़ बाकी फोड़ दिये।सफाई कर गोबर-मिट्टी से झोंपड़ीऔर दुआर लीपा। फिर उसने सभी पोटलियों के चने एक साथ किये और अम्मा के घर जा कर चना पीसा।अम्मा ने उसे सागऔर चटनी भी दी। वापस आ कर बहू ने चने के आटे की रोटियां बनाई और इन्तजार करने लगी। जग्गू और उसके लड़के जब लौटे तो एक ही चूल्हा देख भड़क गये।चिल्लाने लगे कि इसने तो आते ही सत्यानाश कर दिया। अपने आदमी का छोड़ बाकी सब का चूल्हा फोड़ दिया। झगड़े की आवाज सुन बहू झोंपड़ी से निकली। बोली –आप लोग हाथ मुंह धो कर बैठिये, मैं खाना निकालती हूं। सब अचकचा गये! हाथ मुंह धो कर बैठे। बहू ने पत्तल पर खाना परोसा – रोटी, साग, चटनी। मुद्दत बाद उन्हें ऐसा खाना मिला था। खा कर अपनी अपनी कथरी ले वे सोने चले गये। सुबह काम पर जाते समय बहू ने उन्हें एक एक रोटी और गुड़ दिया।चलते समय जग्गू से उसने पूछा – बाबूजी, मालिक आप लोगों को चना और गुड़ ही देता है क्या ? जग्गू ने बताया कि मिलता तो सभी अन्न है पर वे चना-गुड़ ही लेते हैं।आसान रहता है खाने में। बहू ने समझाया कि सब अलग अलग प्रकार का अनाज लिया करें। देवर ने बताया कि उसका काम लकड़ी चीरना है। बहू ने उसे घर के ईंधन के लिये भी कुछ लकड़ी लाने को कहा।बहू सब की मजदूरी के अनाज से एक- एक मुठ्ठी अन्न अलग रखती। उससे बनिये की दुकान से बाकी जरूरत की चीजें लाती। जग्गू की गृहस्थी धड़ल्ले से चल पड़ी। एक दिन सभी भाइयों और बाप ने तालाब की मिट्टी से झोंपड़ी के आगे बाड़ बनाया। बहू के गुण गांव में चर्चित होने लगे।जमींदार तक यह बात पंहुची। वह कभी कभी बस्ती में आया करता था। आज वह जग्गू के घर उसकी बहू को आशीर्वाद देने आया। बहू ने पैर छू प्रणाम किया तो जमींदार ने उसे एक हार दिया। हार माथे से लगा बहू ने कहा कि मालिक यह हमारे किस काम आयेगा। इससे अच्छा होता कि मालिक हमें चार लाठी जमीन दिये होते झोंपड़ी के दायें - बायें,तो एक कोठरी बन जाती। बहू की चतुराई पर जमींदार हंस पड़ा। बोला –ठीक, जमीन तो जग्गू को मिलेगी ही। यह हार तो तुम्हारा हुआ। –औरत चाहे घर को स्वर्ग बना दे, चाहे नर्क! हमे लगता है कि देश, समाज, और घर को औरत ही गढ़ती है।📚🕉️

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