!! जय श्री शनी महाराज की!!

स्वयं में इश्वर
स्वयं में ईश्वर को देखना 'ध्यान' है..
दुसरो में ईश्वर देखना 'प्रेम' है..
और सर्वत्र ईश्वर देखना 'साधना' है..
शिखर तक पहुचने के लिए सच्ची साधना जरुरी है..
आस्था की आँखों से ईश्वर को देखा जा सकता है..
और साधना की 'सरगम' से उसे सूना जा सकता है..
ईश्वर याने अपने ही 'स्व-स्वरुप' की पहचान करना है...
ईश्वर खोज ने की नही 'जानने' की प्रक्रिया है..
उसे ढूंड ने के लिए अपने पैसे और अपना कीमती समय बर्बाद ना करे..
उसे अपने 'अंतरंग' में खोजे.
आत्म ग्यान(चिंतन, मनन, सत्संग, ध्यास और ध्यान) द्वारा ही ईश्वर को पाया जाता है. परिश्रम पूर्वक प्रयत्न करने से वों बहुत आसानी से हमारे 'हृदय' में ही मिल जाते है. -(ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देश्ऽर्जुन तिष्ठति )

!! जय श्री हनुमान की!!
!! शुभ प्रभात!!

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Lalit Sanwal Mar 28, 2020

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Rakesh Pandey Mar 28, 2020

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Harilal Prajapati Mar 28, 2020

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umaVerma Mar 28, 2020

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umaVerma Mar 28, 2020

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Sanjay Singh Mar 28, 2020

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Sanjay Singh Mar 28, 2020

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