Vandana Singh
Vandana Singh Mar 9, 2021

🚩🔔🕉️💐Om Namo Bhagwate Vasudevaya Namah 💐🔥💐🙏🙏

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Niranjanpal Mar 9, 2021
ॐ भगवते वासुदेवाय नमः ॐ भगवते वासुदेवाय नमः

Sunil Vohra Apr 13, 2021

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Omprakash Dubey Apr 13, 2021

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M. Kumar Apr 11, 2021

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Neha Sharma, Haryana Apr 11, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 175*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 16*🙏🌸 *इस अध्याय में कश्यप जी के द्वारा अदिति को पयोव्रत का उपदेश..... *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! जब देवता इस प्रकार भागकर छिप गये और दैत्यों ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया; तब देवमाता अदिति को बड़ा दुःख हुआ। वे अनाथ-सी हो गयीं। *एक बार बहत दिनों के बाद जब परम प्रभावशाली कश्यप मुनि की समाधि टूटी, तब वे अदिति के आश्रम पर आये। उन्होंने देखा कि न तो वहाँ सुख-शान्ति है और न किसी प्रकार का उत्साह या सजावट ही। *परीक्षित! जब वे वहाँ जाकर आसन पर बैठ गये और अदिति ने विधिपूर्वक उनका सत्कार कर लिया, तब वे अपनी पत्नी अदिति से-जिसके चेहरे पर बड़ी उदासी छायी हुई थी, बोले- ‘कल्याणी! इस समय संसार में ब्राह्मणों पर कोई विपत्ति तो नहीं आयी है? धर्म का पालन तो ठीक-ठीक होता है? काल के कराल गाल में पड़े हुए लोगों का कुछ अमंगल तो नहीं हो रहा है? *प्रिये! गृहस्थाश्रम तो, जो लोग योग नहीं कर सकते, उन्हें भी योग का फल देने वाला है। इस गृहस्थाश्रम में रहकर धर्म, अर्थ और काम के सेवन में किसी प्रकार विघ्न तो नहीं हो रह है? यह भी सम्भव है कि तुम कुटुम्ब के भरण-पोषण में व्यग्र रही हो, अतिथि आये हों और तुमसे बिना सम्मान पाये ही लौट गये हों; तुम खड़ी होकर उनका सत्कार करने में भी असमर्थ रही हो। इसी से तो तुम उदास नहीं हो रही हो? जिन घरों में आये हुए अतिथि का जल से भी सत्कार नहीं किया जाता और वे ऐसे ही लौट जाते हैं, वे घर अवश्य ही गीदड़ों के घर के समान हैं। *प्रिये! सम्भव है, मेरे बाहर चले जाने पर कभी तुम्हारा चित्त उद्विग्न रहा हो और समय पर तुमने हविष्य से अग्नियों में हवन न किया हो। सर्वदेवमय भगवान् के मुख हैं-ब्राह्मण और अग्नि। गृहस्थ पुरुष यदि इन दोनों की पूजा करता है तो उसे उन लोकों की प्राप्ति होती है, जो समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं। *प्रिये! तुम तो सर्वदा प्रसन्न रहती हो; परन्तु तुम्हारे बहुत-से लक्षणों से मैं देखा रहा हूँ कि इस समय तुम्हारा चित्त अस्वस्थ है। तुम्हारे सब लड़के तो कुशल-मंगल से हैं न? *अदिति ने कहा- भगवन! ब्राह्मण, गौ, धर्म और आपकी यह दासी-सब कुशल हैं। मेरे स्वामी! यह गृहस्थ-आश्रम ही अर्थ, धर्म और काम की साधना में परम सहायक है। प्रभो! आपके निरन्तर स्मरण और कल्याण-कामना से अग्नि, अतिथि, सेवक, भिक्षुक और दूसरे याचकों का भी मैंने तिरस्कार नहीं किया है। भगवन! जब आप-जैसे प्रजापति मुझे इस प्रकार धर्म पालन का उपदेश करते हैं; तब भला मेरे मन की ऐसी कौन-सी कामना है जो पूरी न हो जाये? आर्यपुत्र! समस्त प्रजा-वह चाहे सत्त्वगुणी, रजोगुणी या तमोगुणी हो-आपकी ही सन्तान है। कुछ आपके संकल्प से उत्पन्न हुए हैं और कुछ शरीर से। भगवन्! इसमें सन्देह नहीं कि आप सब सन्तानों के प्रति-चाहे असुर हों या देवता-एक-सा भाव रखते हैं, सम हैं। तथापि स्वयं परमेश्वर भी अपने भक्तों की अभिलाषा पूर्ण किया करते हैं। *मेरे स्वामी! मैं आपकी दासी हूँ। आप मेरी भलाई के सम्बनध में विचार कीजिये। मर्यादापालक प्रभो! शत्रुओं ने हमारी सम्पत्ति और रहने का स्थान तक छीन लिया है। आप हमारी रक्षा कीजिये। बलवान दैत्यों ने मेरे ऐश्वर्य, धन, यश और पद छीन लिये हैं तथा हमें घर से बाहर निकाल दिया है। इस प्रकार मैं दुःख के समुद्र में डूब रही हूँ। आपसे बढ़कर हमारी भलाई करने वाला और कोई नहीं है। इसलिये मेरे हितैषी स्वामी! आप सोच-विचार कर अपने संकल्प से ही मेरे कल्याण का कोई ऐसा उपाय कीजिये, जिससे कि मेरे पुत्रों को वे वस्तुएँ फिर से प्राप्त हो जायें। *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- 'इस प्रकार अदिति ने जब कश्यप जी से प्रार्थना की, तब वे कुछ विस्मित-से होकर बोले- ‘बड़े आश्चर्य की बात है। भगवान की माया भी कैसी प्रबल है! यह सारा जगत स्नेह की रज्जु से बँधा हुआ है। कहाँ यह पंचभूतों से बना हुआ अनातमा शरीर और कहाँ प्रकृति से परे आत्मा? न किसी का कोई पति है, न पुत्र है और न तो सम्बन्धी ही है। मोह ही मनुष्यों को नचा रहा है। प्रिये! तुम सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में विराजमान, अपने भक्तों के दुःख मिटाने वाले जगद्गुरु भगवान वासुदेव की आराधना करो। वे बड़े दीनदयालु हैं। अवश्य ही श्रीहरि तुम्हारी कामनाएँ पूर्ण करेंगे। मेरा यह दृढ़ निश्चय है कि भगवान की भक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती। इसके सिवा कोई दूसरा उपाय नहीं है’। *अदिति ने पूछा- 'भगवन! मैं जगदीश्वर भगवान की आराधना किस प्रकार करूँ, जिससे वे सत्यसंकल्प प्रभु मेरा मनोरथ पूर्ण करें। पतिदेव! मैं अपने पुत्रों के साथ बहुत दुःख भोग रही हूँ। जिससे वे शीघ्र ही मुझ पर प्रसनन हो जायें, उनकी आराधना की वही विधि मुझे बतलाइये।' *कश्यप जी ने कहा- 'देवि! जब मुझे संतान की कामना हुई थी, तब मैंने भगवान ब्रह्मा जी से यही बात पूछी थी। उन्होंने मुझे भगवान को प्रसन्न करने वाले जिस व्रत का उपदेश किया था, वही मैं तुम्हें बतलाता हूँ। फाल्गुन के शुक्ल पक्ष में बारह दिन तक केवल दूध पीकर रहे और परम भक्ति से भगवान कमलनयन की पूजा करे। अमावस्या के दिन यदि मिल सके तो सूअर की खोदी हुई मिट्टी से अपना शरीर मलकर नदी में स्नान करे। उस समय यह मंत्र पढ़ना चाहिये। *हे देवि! प्राणियों को स्थान देने की इच्छा से वराह भगवान ने रसातल से तुम्हारा उद्धार किया था। तुम्हें मेरा नमस्कार है। तुम मेरे पापों को नष्ट कर दो। इसके बाद अपने नित्य और नैमित्तिक नियमों को पूरा करके एकाग्रचित्त से मूर्ति, वेदी, सूर्य, जल, अग्नि और गुरुदेव के रूप में भगवान की पूजा करे। (और इस प्रकार स्तुति करे-) *‘प्रभो! आप सर्वशक्तिमान हैं। अंतर्यामी और आराधनीय हैं। समस्त प्राणी आप में और आप समस्त प्राणियों में निवास करते हैं। इसी से आपको ‘वासुदेव’ कहते हैं। आप समस्त चराचर जगत और उसके कारण के भी साक्षी हैं। भगवन! मेरा आपको नमस्कार है। आप अव्यक्त और सूक्ष्म हैं। प्रकृति और पुरुष के रूप में भी आप ही स्थित हैं। आप चौबीस गुणों के जानने वाले और गुणों की संख्या करने वाले सांख्यशास्त्र के प्रवर्तक हैं। आपको मेरा नमस्कार है।' *आप वह यज्ञ हैं, जिसके प्रायणीय और उदयनीय-ये दो कर्म सिर हैं। प्रातः, मध्याह्न और सायं-ये तीन सवन ही तीन पाद हैं। चारों वेद चार सींग हैं। गायत्री आदि सात छन्द ही सात हाथ हैं। यह धर्ममय वृषभरूप यज्ञ वेदों के द्वारा प्रतिपादित है, इसकी आत्मा हैं स्वयं आप! आपको मेरा नमस्कार है। आप ही लोक कल्याणकारी शिव और आप ही प्रलयकारी रुद्र हैं। समस्त शक्तियों को धारण करने वाले भी आप ही हैं। आपको मेरा बार-बार नमस्कार है। आप समस्त विद्याओं के अधिपति एवं भूतों के स्वामी हैं। आपको मेरा नमस्कार। आप ही सबके प्राण और आप ही इस जगत् के स्वरूप भी हैं। आप योग के कारण तो हैं ही, स्वयं योग और उससे मिलने वाला ऐश्वर्य भी आप ही हैं। *हे हिरण्यगर्भ! आपके लिये मेरे नमस्कार। आप ही आदिदेव हैं। सबके साक्षी हैं। आप ही नर-नारायण ऋषि के रूप में प्रकट स्वयं भगवान हैं। आपको मेरा नमस्कार। आपका शरीर मरकत मणि के समान साँवला है। समस्त सम्पत्ति और सौन्दर्य की देवी लक्ष्मी आपकी सेविका हैं। पीताम्बरधारी केशव! आपको मेरा बार-बार नमस्कार। आप सब प्रकार के वर देने वाले हैं। वर देने वालों में श्रेष्ठ हैं। तथा जीवों के एकमात्र वरणीय हैं। यही कारण है कि धीर विवेकी पुरुष अपने कल्याण के लिये आपके चरणों की रज की उपासना करते हैं। जिनके चरणकमलों की सुगन्ध प्राप्त करने की लालसा में समस्त देवता और स्वयं लक्ष्मी जी भी सेवा में लगी रहती हैं, वे भगवान मुझ पर प्रसन्न हों’। *प्रिये! भगवान हृषीकेश का आवाहन पहले ही कर ले। फिर इन मन्त्रों के द्वारा पाद्य, आचमन आदि के साथ श्रद्धापूर्वक मन लगाकर पूजा करे। गन्ध, माला आदि से पूजा करके भगवान को दूध से स्नान करावे। उसके बाद वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, पाद्य, आचमन, गन्ध, धूप आदि के द्वारा द्वादशाक्षर मन्त्र से भगवान की पूजा करे। यदि सामर्थ्य हो तो दूध में पकाये हुए तथा घी और गुड़ मिले हुए शालि के चावल का नैवेद्य लगावे और उसी का द्वादशक्षर मन्त्र से हवन करे। उस नैवेद्य को भगवानके भक्तों में बाँट दे या स्वयं पा ले। आसमान और पूजा के बाद ताम्बूल निवेदन करे। एक सौ आठ बार द्वादशाक्षर मन्त्र का जप करे और स्तुतियों के द्वारा भगवानका स्तवन करे। प्रदक्षिणा करके बड़े प्रेम और आनन्द से भूमि पर लोटकर दण्डवत्-प्रणाम करे। निर्माल्य को सिर से लगाकर देवता का विसर्जन करे। कम-से-कम दो ब्राह्मणों को यथोचित रीति से खीर का भोजन करावे। दक्षिणा आदि से उनका सत्कार करे। इसके बाद उनसे आज्ञा लेकर अपने इष्ट-मित्रों के साथ बचे हुए अन्न को स्वयं ग्रहण करे। उस दिन ब्रह्मचर्य से रहे और दूसरे दिन प्रातःकाल ही स्नान आदि करके पवित्रतापूर्वक पूर्वोक्त विधि से एकाग्र होकर भगवान की पूजा करे। इस प्रकार जब तक व्रत समाप्त न हो, तब तक दूध से स्नान कराकर प्रतिदिन भगवान की पूजा करे। भगवान् की पूजा में आदर-बुद्धि रखते हुए केवल पयोव्रती रहकर यह व्रत करना चाहिये। पूर्ववत् प्रतिदिन हवन और ब्राह्मण भोजन कराना चाहिये। इस प्रकार पयोव्रती रहकर बारह दिन तक प्रतिदिन भगवान की आराधना, होम और पूजा करे तथा ब्राह्मण-भोजन कराता रहे। *फाल्गुन शुक्ल प्रतिपदा से लेकर त्रयोदशीपर्यन्त ब्रह्मचर्य से रहे, पृथ्वी पर शयन करे और तीनों समय स्नान करे। झूठ न बोले। पापियों से बात न करे। पाप की बात न करे। छोटे-बड़े सब प्रकार के भोगों का त्याग कर दे। किसी भी प्राणी को किसी प्रकार से कष्ट न पहुँचावे। भगवान की आराधना में लगा ही रहे। *त्रयोदशी के दिन विधि जानने वाले ब्राह्मणों के द्वारा शात्रोक्त विधि से भगवान विष्णु को पंचामृत स्नान करावे। उस दिन धन का संकोच छोड़कर भगवान की बहुत बड़ी पूजा करनी चाहिये और दूध में चरु (खीर) पकाकर विष्णु भगवान को अर्पित करना चाहिये। अत्यन्त एकाग्रचित्त से उसी पकाये हुए चरु के द्वारा भगवान का यजन करना चाहिये और उनको प्रसन्न करने वाला गुणयुक्त तथा स्वादिष्ट नैवेद्य अर्पण करना चाहिये। *प्रिये! आचार्य और ऋत्विजों को शुद्ध, सात्त्विक और गुणयुक्त भोजन कराना ही चाहिये; दूसरे ब्राह्मण और आये हुए अतिथियों को भी अपनी शक्ति के अनुसार भोजन कराना चाहिये। गुरु और ऋत्विजों को यथायोग्य दक्षिणा देनी चाहिये। जो चाण्डाल आदि अपने-आप वहाँ आ गये हों, उन सभी को तथा दीन, अंधे और असमर्थ पुरुषों को भी अन्न आदि देकर सन्तुष्ट करना चाहिये। जब सब लोग खा चुकें, तब उन सबके सत्कार को भगवान की प्रसन्नता का साधन समझते हुए अपने भाई-बन्धुओं के साथ स्वयं भोजन करे। प्रतिपदा से लेकर त्रयोदशी तक प्रतिदिन नाच-गाना, बाजे-गाजे, स्तुति, स्वस्तिवाचन और भगवत्कथाओं से भगवान की पूजा करे-करावे। *प्रिये! यह भगवान की श्रेष्ठ आराधना है। इसका नाम है ‘पयोव्रत’। ब्रह्मा जी ने मुझे जैसा बताया था, वैसा ही मैंने तुम्हें बता दिया। *देवि! तुम भाग्यवती हो। अपनी इन्द्रियों को वश में करके शुद्ध भाव एवं श्रद्धापूर्ण चित्त से इस व्रत का भलीभाँति अनुष्ठान करो और इसके द्वारा अविनाशी भगवान की आराधना करो। *कल्याणी! यह व्रत भगवान को सन्तुष्ट करने वाला है, इसलिये इसका नाम है ‘सर्वयज्ञ’ और ‘सर्वव्रत’। यह समस्त तपस्याओं का सार और मुख्य दान है। जिनसे भगवान प्रसन्न हों-वे ही सच्चे नियम हैं, वे ही उत्तम यम हैं, वे ही वास्तव में तपस्या, दान, व्रत और यज्ञ हैं। *इसलिये देवि! संयम और श्रद्धा से तुम इस व्रत का अनुष्ठान करो। भगवान शीघ्र ही तुम पर प्रसन्न होंगे और तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण करेंगे। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 **************************************************

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Neha Sharma, Haryana Apr 11, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 172*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 13*🙏🌸 *इस अध्याय में आगामी सात मन्वन्तरों का वर्णन...... *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! विवस्वान् के पुत्र यशस्वी श्राद्धदेव ही सातवें (वैवस्वत) मनु हैं। यह वर्तमान मन्वन्तर ही उनका कार्यकाल है। उनकी सन्तान का वर्णन मैं करता हूँ। *वैवस्वत मनु के दस पुत्र हैं- इक्ष्वाकु, नभग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, नाभाग, दिष्ट, करुष, पृषध्र और वसुमान। परीक्षित! इस मन्वन्तर में आदित्य, वसु, रुद्र, विश्वेदेव, मरुद्गण, अश्विनीकुमार और ऋभु- ये देवताओं के प्रधान गण हैं और पुरन्दर उनका इन्द्र है। कश्यप, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भरद्वाज- ये सप्तर्षि हैं। इस मन्वन्तर में भी कश्यप की पत्नी अदिति के गर्भ से आदित्यों के छोटे भाई वामन के रूप में भगवान् विष्णु ने अवतार ग्रहण किया था। *परीक्षित! इस प्रकार मैंने संक्षेप से तुम्हें सात मन्वन्तरों का वर्णन सुनाया; अब भगवान् की शक्ति से युक्त अगले (आने वाले) सात मन्वन्तरों का वर्णन करता हूँ। *परीक्षित! यह तो मैं तुम्हें पहले (छठे स्कन्ध में) बता चुका हूँ कि विवस्वान् (भगवान् सूर्य) की दो पत्नियाँ थीं- संज्ञा और छाया। ये दोनों ही विश्वकर्मा की पुत्री थीं। कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि उनकी एक तीसरी पत्नी वडवा भी थी। (मेरे विचार से तो संज्ञा का ही नाम वडवा हो गया था।) उन सूर्यपत्नियों में संज्ञा से तीन सन्तानें हुईं- यम, यमी और श्राद्धदेव। छाया के भी तीन सन्तानें हुईं- सावर्णि, शनैश्चर और तपती नाम की कन्या जो संवरण की पत्नी हुई। जब संज्ञा ने वडवा का रूप धारण कर लिया, तब उससे दोनों अश्विनीकुमार हुए। *आठवें मन्वन्तर में सावर्णि मनु होंगे। उनके पुत्र होंगे निर्मोक, विरजस्क आदि। परीक्षित! उस समय सुतपा, विरजा और अमृतप्रभ नामक देवगण होंगे। उन देवताओं के इन्द्र होंगे विरोचन के पुत्र बलि। विष्णु भगवान् ने वामन अवतार ग्रहण करके इन्हीं से तीन पग पृथ्वी माँगी थी; परन्तु इन्होंने उनको सारी त्रिलोकी दे दी। राजा बलि को एक बार तो भगवान् ने बाँध दिया था, परन्तु फिर प्रसन्न होकर उन्होंने इनको स्वर्ग से भी श्रेष्ठ सुतल लोक का राज्य दे दिया। वे इस समय वहीं इन्द्र के समान विराजमान हैं। आगे चलकर ये ही इन्द्र होंगे और समस्त ऐश्वर्यों से परिपूर्ण इन्द्रपद का भी परित्याग करके परमसिद्धि प्राप्त करेंगे। *गालव, दीप्तिमान्, परशुराम, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, ऋष्यश्रृंग और हमारे पिता भगवान् व्यास- ये आठवें मन्वन्तर में सप्तर्षि होंगे। इस समय ये लोग योग बल से अपने-अपने आश्रम मण्डल में स्थित हैं। देवगुह्य की पत्नी सरस्वती के गर्भ से सार्वभौम नामक भगवान् का अवतार होगा। ये ही प्रभु पुरन्दर इन्द्र से स्वर्ग का राज्य छीनकर राजा बलि को दे देंगे। *परीक्षित! वरुण के पुत्र दक्षसावर्णि नवें मनु होंगे। भूतकेतु, दीप्तकेतु आदि उनके पुत्र होंगे। पार, मारीचिगर्भ आदि देवताओं के गण होंगे और अद्भुत नाम के इन्द्र होंगे। उस मन्वन्तर में द्युतिमान् आदि सप्तर्षि होंगे। आयुष्यमान् की पत्नी अम्बुधारा के गर्भ से ऋषभ के रूप में भगवान् का कलावतार होगा। अद्भुत नामक इन्द्र उन्हीं की दी हुई त्रिलोकी का उपभोग करेंगे। दसवें मनु होंगे उपश्लोक के पुत्र ब्रह्मसावर्णि। उनमें समस्त सद्गुण निवास करेंगे। भूरिषेण आदि उनके पुत्र होंगे और हविष्यमान्, सुकृति, सत्य, जय, मूर्ति आदि सप्तर्षि। सुवासन, विरुद्ध आदि देवताओं के गण होंगे और इन्द्र होंगे शम्भु। *विश्वसृज की पत्नी विषूचि के गर्भ से भगवान् विष्वक्सेन के रूप में अंशावतार ग्रहण करके शम्भु नामक इन्द्र से मित्रता करेंगे। *ग्यारहवें मनु होंगे अत्यन्त संयमी धर्म सावर्णि। उनके सत्य, धर्म आदि दस पुत्र होंगे। विहंगम, कामगम, निर्वाणरुचि आदि देवताओं के गण होंगे। अरुणादि सप्तर्षि होंगे वैधृत नाम के इन्द्र होंगे। आर्यक की पत्नी वैधृता के गर्भ से धर्मसेतु के रूप में भगवान् का अंशावतार होगा और उसी रूप में वे त्रिलोकी की रक्षा करेंगे। *परीक्षित! बारहवें मनु होंगे रुद्र सार्वणि। उनके देववान्, उपदेव और देवश्रेष्ठ आदि पुत्र होंगे। उस मन्वन्तर में ऋतुधामा नामक इन्द्र होंगे और हरित आदि देवगण। तपोमूर्ति, तपस्वी आग्नीध्रक आदि सप्तर्षि होंगे। सत्यसहाय की पत्नी सूनृता के गर्भ से स्वधाम के रूप में भगवान् का अंशावतार होगा और उसी रूप में भगवान उस मन्वन्तर का पालन करेंगे। *तेरहवें मनु होंगे परम जितेन्द्रिय देवसावर्णि। चित्रसेन, विचित्र आदि उनके पुत्र होंगे। सुकर्म और सुत्राम आदि देवगण होंगे तथा इन्द्र का नाम होगा दिवस्पति। उस समय निर्मोक और तत्त्वदर्श आदि सप्तर्षि होंगे। देवहोत्र कि पत्नी बृहती के गर्भ से योगेश्वर के रूप में भगवान का अंशावतार होगा और उसी रूप में भगवान् दिवस्पति को इन्द्रपद देंगे। *महाराज! चौदहवें मनु होंगे इन्द्र सावर्णि। उरू, गम्भीर, बुद्धि आदि उनके पुत्र होंगे। उस समय पवित्र, चाक्षुष आदि देवगण होंगे और इन्द्र का नाम होगा शुचि। अग्नि, बाहु, शुचि, शुद्ध और मागध आदि सप्तर्षि होंगे। उस समय सत्रायण की पत्नी विताना के गर्भ से बृहद्भानु के रूप में भगवान अवतार ग्रहण करेंगे तथा कर्मकाण्ड का विस्तार करेंगे। *परीक्षित! ये चौदह मन्वन्तर भूत, वर्तमान और भविष्य- तीनों ही काल में चलते रहते हैं। इन्हीं के द्वारा एक सहस्र चतुर्युगी वाले कल्प के समय की गणना की जाती है। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 **************************************************

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sanjay snehi Apr 13, 2021

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Neha Sharma, Haryana Apr 11, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 174*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 15*🙏🌸 *इस अध्याय में राजा बलि की स्वर्ग पर विजय...... *राजा परीक्षित ने पूछा- भगवन्! श्रीहरि स्वयं ही सबके स्वामी हैं। फिर उन्होंने दीन-हीन की भाँति राजा बलि से तीन पग पृथ्वी क्यों माँगी? तथा जो कुछ वे चाहते थे, वह मिल जाने पर भी उन्होंने बलि को बाँधा क्यों? मेरे हृदय में इस बात का बड़ा कौतुहल है कि स्वयं परिपूर्ण यज्ञेश्वर भगवान् के द्वारा याचना और निरपराध का बन्धन-ये दोनों ही कैसे सम्भव हुए? हम लोग यह जानना चाहते हैं। *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! जब इन्द्र ने बलि को पराजित करके उनकी सम्पत्ति छीन ली और उनके प्राण भी ले लिये, तब भृगुनन्दन शुक्राचार्य ने उन्हें अपनी संजीवनी विद्या से जीवित कर दिया। इस पर शुक्राचार्य जी के शिष्य महात्मा बलि ने अपना सर्वस्व उनके चरणों पर चढ़ा दिया और वे तन-मन से गुरुजी के साथ ही समस्त भृगुवंशी ब्राह्मणों की सेवा करने लगे। इससे प्रभावशाली भृगुवंशी ब्राह्मण उन पर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने स्वर्ग पर विजय प्राप्त करने की इच्छा वाले बलि का महाभिषेक की विधि से अभिषेक करके उनसे विश्वजित् नाम का यज्ञ कराया। यज्ञ की विधि से हविष्यों के द्वारा जब अग्नि देवता की पूजा की गयी, तब यज्ञ कुण्ड में से सोने की चद्दर से मढ़ा हुआ एक बड़ा सुन्दर रथ निकला। फिर इन्द्र के घोड़ों-जैसे हरे रंग के घोड़े और सिंह के चिह्न से युक्त रथ पर लगाने की ध्वजा निकली। साथ ही सोने के पत्र से मढ़ा हुआ दिव्य धनुष, कभी खाली न होने वाले दो अक्षय तरकश और दिव्य कवच भी प्रकट हुए। दादा प्रह्लाद जी ने उन्हें एक ऐसी माला दी, जिसके फूल कभी कुम्हलाते न थे तथा शुक्राचार्य ने एक शंख दिया। *इस प्रकार ब्राह्मणों की कृपा से युद्ध की सामग्री प्राप्त करके उनके द्वारा स्वस्तिवाचन हो जाने पर राजा बलि ने उन ब्राह्मणों की प्रदक्षिणा की और नमस्कार किया। इसके बाद उन्होंने प्रह्लाद जी से सम्भाषण करके उनके चरणों में नमस्कार किया। फिर वे भृगुवंशी ब्राह्मणों के दिये हुए दिव्य रथ पर सवार हुए। जब महारथी राजा बलि ने कवच धारण कर धनुष, तलवार, तरकश आदि शस्त्र ग्रहण कर लिये और दादा की दी हुई सुन्दर माला धारण कर ली, तब उनकी बड़ी शोभा हुई। उनकी भुजाओं में सोने के बाजूबंद और कानों में मकराकृति कुण्डल जगमगा रहे थे। उनके कारण रथ पर बैठे हुए वे ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो अग्निकुण्ड में अग्नि प्रज्वलित हो रही हो। उनके साथ उन्हीं के समान ऐश्वर्य, बल और विभूति वाले दैत्य सेनापति अपनी-अपनी सेना लेकर हो लिये। ऐसा जान पड़ता था मानो वे आकाश को पी जायेंगे और अपने क्रोध भरे प्रज्वलित नेत्रों से समस्त दिशाओं को, क्षितिज को भस्म कर डालेंगे। *राजा बलि ने इस बहुत बड़ी आसुरी सेना को लेकर उसका युद्ध के ढंग से संचालन किया तथा आकाश और अन्तरिक्ष को कँपाते हुए सकल ऐश्वर्यों से परिपूर्ण इन्द्रपुरी अमरावती पर चढ़ाई की। देवताओं की राजधानी अमरावती में बड़े सुन्दर-सुन्दर नन्दनवन आदि उद्यान और उपवन हैं। उन उद्यानों और उपवनों में पक्षियों के जोड़े चहकते रहते हैं। मधु लोभी भौंरे मतवाले होकर गुनगुनाते रहते हैं। *लाल-लाल नये-नये पत्तों, फलों और पुष्पों से कल्पवृक्षों की शाखाएँ लदी रहती हैं। वहाँ के सरोवरों में हंस, सारस, चकवे और बतखों की भीड़ लगी रहती है। उन्हीं में देवताओं के द्वारा सम्मानित देवांगनाएँ जल क्रीड़ा करती रहती हैं। ज्योतिर्मय आकाशगंगा ने खाई की भाँति अमरावती को चारों ओर से घेर रखा है। उसके चारों ओर बहुत ऊँचा सोने का परकोटा बना हुआ है, जिसमें स्थान-स्थान पर बड़ी-बड़ी अटारियाँ बनी हुई हैं। सोने के किवाड़ द्वार-द्वार पर लगे हुए हैं और स्फटिक मणि के गोपुर (नगर के बाहरी फाटक) हैं। उसमें विश्वकर्मा ने ही उस पुरी का निर्माण किया है। सभा के स्थान, खेल के चबूतरे और रथ के चलने के बड़े-बड़े भागों से वह शोभायमान है। दस करोड़ विमान उसमें सर्वदा विद्यमान रहते हैं और मणियों के बड़े-बड़े चौराहे एवं हीरे और मूँगे की वेदियाँ बनी हुई हैं। वहाँ की स्त्रियाँ सर्वदा सोलह वर्ष की-सी रहती हैं, उनका यौवन और सौन्दर्य स्थिर रहता है। वे निर्मल वस्त्र पहनकर अपने रूप की छटा से इस प्रकार देदीप्यमान होती है, जैसे अपनी ज्वालाओं से अग्नि। *देवांगनाओं के जूड़े से गिरे हुए नवीन सौगन्धित पुष्पों की सुगन्ध लेकर वहाँ के मार्गों में मन्द-मन्द हवा चलती रहती है। सुनहली खिड़कियों में से अगर की सुगन्ध से युक्त सफ़ेद धूआँ निकल-निकलकर वह के मार्गों को ढक दिया करता है। उसी मार्ग से देवांगनाएँ जाती-आती हैं। स्थान-स्थान पर मोतियों की झालरों से सजाये हुए चँदोवे तने रहते हैं। सोने की मणिमय पताकाएँ फहराती रहती हैं। छज्जों पर अनेकों झंडियाँ लहराती रहती हैं। मोर, कबूतर और भौंरे कलगान करते रहते हैं। देवांगनाओं के मधुर संगीत से वहाँ सदा ही मंगल छाया रहता है। मृदंग, शंख, नगारे, ढोल, वीणा, वंशी, मँजीरे और ऋष्टियाँ बजती रहती हैं। गन्धर्व बाजों के साथ गाया करते हैं और अप्सराएँ नाचा करती हैं। इनसे अमरावती इतनी मनोहर जान पड़ती है, मानो उसने अपनी छटा से छटा की अधिष्ठात्री देवी को भी जीत लिया है। *उस पुरी में अधर्मी, दुष्ट, जीव द्रोही, ठग, मानी, कामी और लोभी नहीं जा सकते। जो इन दोषों से रहित हैं, वे ही वहाँ जाते हैं। असुरों की सेना के स्वामी राजा बलि ने अपनी बहुत बड़ी सेना से बाहर की ओर सब ओर से अमरावती को घेर लिया लिया और इन्द्रपत्नियों के हृदय में भय का संचार करते हुए उन्होंने शुक्राचार्य जी के दिये हुए महान् शंख को बजाया। उस शंख की ध्वनि सर्वत्र फैल गयी। *इन्द्र ने देखा कि बलि ने युद्ध की बहुत बड़ी तैयारी की है। अतः सब देवताओं के साथ वे अपने गुरु बृहस्पति जी के पास गये और उनसे बोले‌‌‌‌- ‘भगवन! मेरे पुराने शत्रु बलि ने इस बार युद्ध की बहुत बड़ी तैयारी की है। मुझे ऐसा जान पड़ता है कि हम लोग उनका सामना नहीं कर सकेंगे। पता नहीं, किस शक्ति से इनकी इतनी बढ़ती हो गयी है। *मैं देखता हूँ कि इस समय बलि को कोई भी किसी प्रकार से रोक नहीं सकता। वे प्रलय की आग से समान बढ़ गये हैं और जान पड़ता है, मुख से इस विश्व को पी जायेंगे, जीभ से दसों दिशाओं को चाट जायेंगे और नेत्रों की ज्वाला से दिशाओं को भस्म कर देंगे। आप कृपा करके मुझे बतलाइये कि मेरे शत्रु की इतनी बढ़ती का, जिसे किसी प्रकार भी दबाया नहीं जा सकता, क्या कारण है? इसके शरीर, मन और इन्द्रियों में इतना बल और इतना तेज कहाँ से आ गया है कि इसने इतनी बड़ी तैयारी करके चढ़ाई की है’। *देवगुरु बृहस्पति जी ने कहा- ‘इन्द्र! मैं तुम्हारे शत्रु बलि की उन्नति का कारण जानता हूँ। ब्रह्मवादी भृगुवंशियों ने अपने शिष्य बलि को महान् तेज देकर शक्तियों का खजाना बना दिया है। सर्वशक्तिमान् भगवान् को छोड़कर तुम या तुम्हारे-जैसा और कोई भी बलि के सामने उसी प्रकार नहीं ठहर सकता, जैसे काल के सामने प्राणी। इसलिये तुम लोग स्वर्ग को छोड़कर कहीं छिप जाओ और उस समय की प्रतीक्षा करो, जब तुम्हारे शत्रु का भाग्यचक्र पलटे। इस समय ब्राह्मणों के तेज से बलि की उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। उसकी शक्ति बहुत बढ़ गयी है। जब यह उन्हीं ब्राह्मणों का तिरस्कार करेगा, तब अपने परिवार-परिकर के साथ नष्ट हो जायेगा। *बृहस्पति जी देवताओं के समस्त स्वार्थ और परमार्थ के ज्ञाता थे। उन्होंने जब इस प्रकार देवताओं को सलाह दी, तब वे स्वेच्छानुसार रूप धारण करके स्वर्ग छोड़कर चले गये। देवताओं के छिप जाने पर विरोचननन्दन बलि ने अमरावतीपुरी पर अपना अधिकार कर लिया और फिर तीनों लोकों को जीत लिया। *जब बलि विश्वविजयी हो गये, तब शिष्यप्रेमी भृगुवंशियों ने अपने अनुगत शिष्य से सौ अश्वमेध यज्ञ करवाये। उन यज्ञों के प्रभाव से बलि की कीर्ति-कौमुदी तीनों लोकों से बाहर भी दशों दिशाओं में फैल गयी और वे नक्षत्रों के राजा चन्द्रमा के समान शोभायमान हुए। ब्राह्मण-देवताओं की कृपा से प्राप्त समृद्ध राज्यलक्ष्मी का वे बड़ी उदारता से उपभोग करने लगे और अपने को कृतकृत्य-सा मानने लगे। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 **************************************************

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Neha Sharma, Haryana Apr 11, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 173*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸 🌸🙏*अध्याय - 14*🙏🌸 *इस अध्याय में मनु आदि के पृथक्-पृथक् कर्मों का निरूपण.... *राजा परीक्षित ने कहा- भगवन्! आपके द्वारा वर्णित ये मनु, मनुपुत्र, सप्तर्षि आदि अपने-अपने मन्वन्तर में किसके द्वारा नियुक्त होकर कौन-कौन-सा काम किस प्रकार करते हैं- यह आप कृपा करके मुझे बतलाइये। *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! मनु, मनुपुत्र, सप्तर्षि और देवता- सबको नियुक्त करने वाले स्वयं भगवान् ही हैं। *राजन! भगवान् के जिन यज्ञपुरुष आदि अवतार शरीरों का वर्णन मैंने किया है, उन्हीं की प्रेरणा से मनु आदि विश्व-व्यवस्था का संचालन करते हैं। चतुर्युगी के अन्त में समय के उलट-फेर से जब श्रुतियाँ नष्ट प्राय हो जाती हैं, तब सप्तर्षिगण अपनी तपस्या से पुनः उसका साक्षात्कार करते हैं। उन श्रुतियों से ही सनातन धर्म की रक्षा होती है। राजन्! भगवान् की प्रेरणा से अपने-अपने मन्वन्तर में बड़ी सावधानी से सब-के-सब मनु पृथ्वी पर चारों चरण से परिपूर्ण धर्म का अनुष्ठान करवाते हैं। मनुपुत्र मन्वन्तरभर काल और देश दोनों का विभाग करके प्रजापालन तथा धर्मपालन का कार्य करते हैं। पंच-महायज्ञ आदि कर्मों में जिन ऋषि, पितर, भूत और मनुष्य आदि का सम्बन्ध है- उनके साथ देवता उस मन्वन्तर में यज्ञ का भाग स्वीकार करते हैं। *इन्द्र भगवान् की दी हुई त्रिलोकी की अतुल सम्पत्ति का उपभोग और प्रजा का पालन करते हैं। संसार में यथेष्ट वर्षा करने का अधिकार भी उन्हीं को है। भगवान् युग-युग में सनक आदि सिद्धों का रूप धारण करके ज्ञान का, याज्ञवल्क्य आदि ऋषियों का रूप धारण करके कर्म का और दत्तात्रेय आदि योगेश्वरों के रूप में योग का उपदेश करते हैं। वे मरीचि आदि प्रजापतियों के रूप में सृष्टि का विस्तार करते हैं, सम्राट् के रूप में लुटेरों का वध करते हैं और शीत, उष्ण आदि विभिन्न गुणों को धारण करके कालरूप से सबको संहार की ओर ले जाते हैं। नाम और रूप की माया से प्राणियों की बुद्धि विमूढ़ हो रही है। इसलिये वे अनेक प्रकार के दर्शनशास्त्रों के द्वारा महिमा तो भगवान् की ही गाते हैं, परन्तु उनके वास्तविक स्वरूप को नहीं जान पाते। *परीक्षित! इस प्रकार मैंने तुम्हें महाकल्प और अवान्तर कल्प का परिमाण सुना दिया। पुराणतत्त्व के विद्वानों ने प्रत्येक अवान्तर कल्प में चौदह मन्वन्तर बतलाये हैं। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 **************************************************

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