ॐ नमः शिवाय 🙏 जय माता दी 🌷🌷 माता चन्द्र घंटा दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏

ॐ नमः शिवाय 🙏
जय माता दी 🌷🌷
माता चन्द्र घंटा  दिवस की 
आप  सभी को  हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏

+838 प्रतिक्रिया 148 कॉमेंट्स • 672 शेयर

कामेंट्स

Queen Apr 8, 2019
🌺 Jai shree radhe radhe krishna dear sister Ji Good Evening Ji aap or apki family pr mata Rani di kripa bni rahe always be happy dear sister Ji 🌺

Indian women (Dheeraj kanwar) Apr 8, 2019
🌹🚩🚩शुभ साईं संध्या वंदन🌹🌹 *संबंध उसी आत्मा से,* *जुड़ता है जिनका हमसे,* *पिछले जन्मों का कोई रिश्ता'* *होता है'* *वरना दुनिया के इस भीड़ में,,* *कौन किसको जानता है..* 🌹🙏।।जय श्री कृष्ण ।।🙏🌹 ।। शुभ संध्या।।

Renu Singh Apr 8, 2019
🙏🌹Jai Mata Di Shubh Sandhya vandan pyaari bahena ji Mata rani ji ki kripa aap aur aapki family pr sadaiv bani rahe Aapka har pal mangalmay ho Bahena ji 🙏

Himani Sharma Apr 8, 2019
Jay mata di pyari Didi Ji good evening happy gangour ma gangour k asirvad ap pr hmesa bna rhe

Neeru Miglani Apr 8, 2019
🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते. ╔══════════════════╗ ║ •||जय माता दी||• ║ ╚══════════════════╝ सुख, शान्ति एवम समृध्दि की मंगलमयी कामनाओं के साथ आप एवं आप के परिवार जनो को नवरात्री की हार्दिक मंगल कामनायें । माँ अम्बे आपको सुख समृद्धि वैभव ख्याति प्रदान करे। जय माँ भवानी।।👣🌹👣🌹👣🌹👣🌹👣 •||नवरात्री||• की " हार्दिक " शुभकामनाएं !!

🌷INDRESH KUMAR SHARMA🌷 Apr 8, 2019
🌷शुभ संध्यावंदन बहन🌷🙇‍♂️ 🌹जयकारा शेरावाली का🌹 🌹 बोल सांचे दरबार की🌹   🌲💃🌹जय🌹💃🌲    🌹🌷 जय माता दी🌷🌹 🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹🌻🌹

Madhu sharma Apr 8, 2019
🌹 Jai Mata Di 🌹🌿 Om Namah Shivay Har Har Mahadev 🌿🌹 jai sairam ji Didi ji 🙏🌷🌷 Baba bhole nath ji aur mata rani ka Aashirwad aap avam aap ki family par Har pal bana rhe ji mata rani aap ki sabhi manokamnaye puran kare ji mata rani ke Aashirwad se aap ke Har din Har pal Ati Shubh Sukhad Sundar khushiyo bhare avam mangalmay ho ji good night ji 🙏🙏🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷

माता सती योगाग्नि..🌅🌅 भगवान #ब्रह्मा के पुत्र #दक्ष प्रजापति की सभी पुत्रियाँ गुणवती थीं। फिर भी दक्ष के मन में संतोष नहीं था। वे चाहते थे उनके घर में एक ऐसी पुत्री का जन्म हो, जो सर्व शक्ति-संपन्न हो एवं सर्वविजयिनी हो। अत: दक्ष एक ऐसी ही पुत्री के लिए तप करने लगे। तप करते-करते अधिक दिन बीत गए, तो भगवती #आद्या ने प्रकट होकर कहा, 'मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूं। तुम किस कारण तप कर रहे हो? दक्ष ने तप करने का कारण बताया तो मां बोली मैं स्वयं पुत्री रूप में तुम्हारे यहां जन्म धारण करूंगी और मेरा नाम '#सती' होगा। मैं सती के रूप में जन्म लेकर अपनी लीलाओं का विस्तार करूंगी। फलतः भगवती आद्या ने सती रूप में दक्ष के यहां जन्म लिया। सती दक्ष की सभी पुत्रियों में सबसे अलौकिक थीं। सती ने बाल्यावस्था में ही कई ऐसे अलौकिक आश्चर्य चकित करने वाले कार्य कर दिखाए थे, जिन्हें देखकर स्वयं दक्ष को भी विस्मय होता था । जब सती विवाह योग्य हो गई, तो दक्ष को उनके लिए वर की चिंता होने लगी। उन्होंने ब्रह्मा जी से इस विषय में परामर्श किया। ब्रह्मा जी ने कहा, सती आद्या की अवतार हैं। आद्या आदि शक्ति और शिव आदि पुरुष हैं। अतः सती के विवाह के लिए #शिव ही योग्य और उचित वर हैं। दक्ष ने ब्रह्मा जी की बात मानकर सती का विवाह भगवान शिव के साथ कर दिया। सती #कैलाश में जाकर भगवान शिव के साथ रहने लगीं। भगवान शिव के दक्ष के दामाद थे, किंतु किसी वजह से दक्ष के ह्रदय में भगवान शिव के प्रति बैर और विरोध भाव पैदा हो गया। एक बार देवलोक में ब्रह्मा ने धर्म के निरूपण के लिए एक सभा का आयोजन किया था। सभी बड़े-बड़े देवता सभा में एकत्र हुुए। भगवान शिव भी इस सभा में बैठे थे। सभा मण्डल में दक्ष का आगमन हुआ। दक्ष के आगमन पर सभी देवता उठकर खड़े हो गए, पर भगवान शिव खड़े नहीं हुए। उन्होंने दक्ष को प्रणाम भी नहीं किया। फलतः दक्ष ने अपमान का अनुभव किया। केवल यही नहीं, उनके ह्रदय में भगवान शिव के प्रति ईर्ष्या की आग जल उठी। वे उनसे बदला लेने के लिए समय और अवसर की प्रतीक्षा करने लगे। एक बार सती और शिव कैलाश पर्वत पर बैठे हुए परस्पर वार्तालाप कर रहे थे। उसी समय आकाश मार्ग से कई विमान कनखल की ओर जाते हुए दिखाई पड़े। सती ने उन विमानों को दिखकर भगवान शिव से पूछा, 'प्रभो, ये सभी विमान किसके है और कहां जा रहे हैं? भगवान शकंर ने उत्तर दिया आपके पिता ने बडे यज्ञ का आयोजन किया हैं। समस्त देवता और देवांगनाएं इन विमानों में बैठकर उसी यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए जा रहे हैं।' इस पर सती ने दूसरा प्रश्न किया, "क्या मेरे पिता ने आपको यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए नहीं बुलाया?" भगवान शंकर ने उत्तर दिया, "आपके पिता मुझसे बैर रखते है, फिर वे मुझे क्यों बुलाने लगे?" सती मन ही मन सोचने लगीं फिर बोलीं- "यज्ञ के इस अवसर पर अवश्य मेरी सभी बहनें आएंगी। उनसे मिले हुए बहुत दिन हो गए। यदि आपकी अनुमति हो, तो मैं भी अपने पिता के घर जाना चाहती हूं। यज्ञ में सम्मिलित हो लूंगी और बहनों से भी मिलने का सुअवसर मिलेगा।" भगवान शिव ने उत्तर दिया, "इस समय वहां जाना उचित नहीं होगा। आपके पिता मुझसे बैर रखते हैं हो सकता हैं वे आपका भी अपमान करें। बिना बुलाए किसी के घर जाना उचित नहीं होता हैं।" इस पर सती ने प्रश्न किया "ऐसा क्यों?" भगवान शिव ने उत्तर दिया "विवाहिता लड़की को बिना बुलाए पिता के घर नहीं जाना चाहिए, क्योंकि विवाह हो जाने पर लड़की अपने पति की हो जाती हैं। पिता के घर से उसका संबंध टूट जाता हैं।" लेकिन सती अपने मायके जाने के लिए हठ करती रहीं। अपनी बात बार-बात दोहराती रहीं। उनकी इच्छा देखकर भगवान शिव ने पीहर जाने की अनुमति दे दी। उनके साथ अपना एक गण भी साथ में भेज दिया उस गण का नाम 'वीरभद्र' था। सती #वीरभद्र के साथ अपने पिता के घर गईं। घर में सती से किसी ने भी प्रेमपूर्वक वार्तालाप नहीं किया। दक्ष ने उन्हें देखकर कहा तुम क्या यहाँ मेरा अपमान कराने आई हो? अपनी बहनों को तो देखो वे किस प्रकार भांति-भांति के अलंकारों और सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित हैं। तुम्हारे शरीर पर मात्र बाघांबर हैं। तुम्हारा पति श्मशानवासी और भूतों का नायक हैं। वह तुम्हें बाघांबर छोड़कर और पहना ही क्या सकता हैं। दक्ष के कथन से सती के ह्रदय में पश्चाताप का सागर उमड़ पड़ा। वे सोचने लगीं उन्होंने यहां आकर अच्छा नहीं किया। भगवान ठीक ही कह रहे थे, बिना बुलाए पिता के घर भी नहीं जाना चाहिए। पर अब क्या हो सकता हैं? अब तो आ ही गई हूं। पिता के कटु और अपमानजनक शब्द सुनकर भी सती मौन रहीं। वे उस यज्ञमंडल में गईं जहां सभी देवता और ॠषि-मुनि बैठे थे तथा यज्ञकुण्ड में धू-धू करती जलती हुई अग्नि में आहुतियां डाली जा रही थीं। सती ने यज्ञमंडप में सभी देवताओं के तो भाग देखे, किंतु भगवान शिव का भाग नहीं देखा। वे भगवान शिव का भाग न देखकर अपने पिता से बोलीं "पितृश्रेष्ठ! यज्ञ में तो सबके भाग दिखाई पड़ रहे हैं किंतु कैलाशपति का भाग नहीं हैं। आपने उनका भाग क्यों नहीं रखा?" दक्ष ने गर्व से उत्तर दिया "मैं तुम्हारे पति शिव को देवता नहीं समझता। वह तो भूतों का स्वामी, नग्न रहने वाला और हड्डियों की माला धारण करने वाला हैं। वह देवताओं की पंक्ति में बैठने योग्य नहीं हैं। उसे कौन भाग देगा?" सती के नेत्र लाल हो उठे। उनका मुखमंडल प्रलय के सूर्य की भांति तेजोदिप्त हो उठा। उन्होंने पीड़ा से तिलमिलाते हुए कहा "ओह! मैं इन शब्दों को कैसे सुन रहीं हूं मुझे धिक्कार हैं। देवताओ तुम्हें भी धिक्कार हैं! तुम भी उन कैलाशपति के लिए इन शब्दों को कैसे सुन रहे हो जो मंगल के प्रतीक हैं और जो क्षण मात्र में संपूर्ण सृष्टि को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं। वे मेरे स्वामी हैं। नारी के लिए उसका पति ही स्वर्ग होता हैं। जो नारी अपने पति के लिए अपमानजनक शब्दों को सुनती हैं उसे नरक में जाना पड़ता हैं। पृथ्वी सुनो, आकाश सुनो और देवताओं, तुम भी सुनो! मेरे पिता ने मेरे स्वामी का अपमान किया हैं। मैं अब एक क्षण भी जीवित रहना नहीं चाहती।" सती अपने कथन को समाप्त करती हुई यज्ञ के कुण्ड में कूद पड़ी। जलती हुई आहुतियों के साथ उनका शरीर भी जलने लगा। सती अग्निदाह योग के बारे में सुनने के बाद भगवान शिव उग्र हो उठे। अपने गुस्से को नियंत्रित करने में असमर्थ, उन्होंने आगे बढ़कर श्रेष्ठ भैरव गणों में वीरभद्र और #भद्रकाली, #दक्षिणा को आगे बढ़ाया। यज्ञमंडप में खलबली पैदा हो गई, हाहाकार मच गया। देवता उठकर खड़े हो गए। वीरभद्र क्रोध से कांप उठे। वे उछ्ल-उछलकर यज्ञ का विध्वंस करने लगे। यज्ञमंडप में भगदड़ मच गई। देवता और ॠषि-मुनि भाग खड़े हुए। हालांकि कई देवताओं ने दक्षिणा, वीरभद्र और भद्रकाली की मदद करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने दक्ष प्रजापति की सेना को नष्ट कर दिया और वीरभद्र ने देखते ही देखते दक्ष प्रजापति का मस्तक काटकर फेंक दिया। भगवान शिव प्रचंड आंधी की भांति #कनखल जा पहुंचे। सती के जले हुए शरीर को देखकर भगवान शिव ने अपने आपको भूल गए। सती के प्रेम और उनकी भक्ति ने शंकर के मन को व्याकुल कर दिया। उन शंकर के मन को व्याकुल कर दिया जिन्होंने काम पर भी विजय प्राप्त की थी और जो सारी सृष्टि को नष्ट करने की क्षमता रखते थे। वे सती के प्रेम में खो गए, बेसुध हो गए। भगवान ब्रह्मा ने अपने बेटे दक्ष प्रजापति के जीवन के लिए भगवान शिव से पुनः अनुरोध किया और उसे अपने व्यवहार के लिए माफ करने के लिए कहा। भगवान ब्रह्मा के अनुरोध पे भगवान शिव शांत तो हो गए, लेकिन दक्ष प्रजापति के सिर को एक #बकरी के सिर के साथ स्थानांतरित करके उसे पुनर्जीवित किया। उन्होंने अपने कंधे पर देवी सती के शरीर को रखा और अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करते हुए, ब्रह्मांड के मध्य से चलना शुरू कर दिया। भगवान शिव ने उन्मत की भांति सती के जले हुए शरीर को कंधे पर रख सभी दिशाओं में भ्रमण करने लगे। शिव और सती के इस अलौकिक प्रेम को देखकर पृथ्वी रुक गई, हवा रूक गई, जल का प्रवाह ठहर गया और रुक गईं देवताओं की सांसेंं। सृष्टि व्याकुल हो उठी, सृष्टि के प्राणी पुकारने लगे' त्राहिमाम! त्राहिमाम! जगत के बढते इस असंतुलन को देख देवताओं को बहुत चिंता होने लगी और ब्रह्मांड में संतुलन बहाल करने में मदद करने के लिए उन्होंने भगवान विष्णु से संपर्क किया। सती वियोग में भगवान शंकर के दुख को हरने भयानक संकट उपस्थित देखकर सृष्टि के पालक भगवान #विष्णु आगे बढ़े। वे भगवान शिव की बेसुधी में अपने चक्र से सती के एक-एक अंग को काट-काट कर गिराने लगे। धरती पर इक्यावन स्थानों में सती के अंग कट-कटकर गिरे। जब सती के सारे अंग कट कर गिर गए, तो भगवान शिव पुनः अपने आप में आए। जब वे अपने आप में आए, तो पुनः सृष्टि के सारे कार्य चलने लगे। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र का इस्तेमाल सती के शरीर को टुकड़ों को काटने के लिए किया था, जो पृथ्वी के भिन्न जगहों पे जाकर गिरे। शरीर के टुकड़े की कुल संख्या ५१ थी, और वे ५१ विभिन्न स्थानों पर गिर गई। इन सभी जगहों को हिंदू धर्म में पवित्र #शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है, और उनमें से प्रत्येक में काली या देवी सती शक्ति मंदिर है। आज भी उन स्थानों में सती का पूजन होता हैं, उपासना होती हैं। धन्य था शिव और सती का प्रेम। शिव और सती के प्रेम ने उन्हें अमर और वंदनीय बना दिया। भगवान शिव अपनी पत्नी के वियोग में ध्यान और शोक करने के लिए कैलाश पर्वत लौट आऐ। देवी सती अंततः #पार्वती के रूप में दुबारा जन्म लेकर भगवान शिव के पास लौट आयी। कुमार रौनक कश्यप,,,,,,,,,

+9 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 8 शेयर

भगवती तारा दैहिक ,दैविक तथा भौतिक _ इन तीनो तापो से तारने वाली कको तारा कहा जाता है |तारा शब्द का सरल अर्थ है उभारने वाली | काली तथा तारा में सामान्य सा भेद है | यह १]अविधा २]अस्मिता ३]राग ४]द्वेष ५]अभिनिवेश इन पांचो क्लेशो से जिव की रक्षा करती है | तारा के अंतर्गत तीन शक्तिओ की गणना की जाते है १]उग्र तारा २]एकजटा ३]नील सरसती साधको को उग्रआपत्ति काटीं दुःख से छुटकारा दिलाकर भव बंधन से मुख्त करते वाली तथा संसार रूपी विपत्ति से तारने वाली होने के कारन इससे उग्र तारा कहते है|कैवल्य दायिनी होने के कारन इसका ना एकजटा है |तथा सरलता पूर्वक ज्ञान देने वाली होने के कारण इससे नील सरस्वती कहा जाता हैं. चेतावनी - सिद्ध गुरु कि देखरेख मे साधना समपन्न करेँ , सिद्ध गुरु से दिक्षा , आज्ञा , सिद्ध यंत्र , सिद्ध माला , सिद्ध सामग्री लेकर हि गुरू के मार्ग दरशन मेँ साधना समपन्न करेँ । बिना गुरू साधना करना अपने विनाश को न्यौता देना है बिना गुरु आज्ञा साधना करने पर साधक पागल हो जाता है या म्रत्यु को प्राप्त करता है इसलिये कोई भी साधना बिना गुरु आज्ञा ना करेँ । विशेष - किसी विशिष्ट समस्या ,तंत्र -मंत्र -किये -कराये -काले जादू -अभिचार ,नकारात्मक ऊर्जा प्रभाव आदि पर परामर्श /समाधान हेतु संपर्क करें राजगुरु जी तंत्र मंत्र यंत्र ज्योतिष विज्ञान अनुसंधान संस्थान महाविद्या आश्रम (राजयोग पीठ )फॉउन्डेशन ट्रस्ट (रजि.) . किसी भी प्रकार की जानकारी के लिए इस नंबर पर फ़ोन करें : मोबाइल नं. : - 06306762688 08601454449 व्हाट्सप्प न०;- 6306762688

+8 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 1 शेयर
Shanti Pathak May 19, 2019

+14 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 52 शेयर
Geeta Sharma May 19, 2019

+170 प्रतिक्रिया 29 कॉमेंट्स • 87 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB