कार्तिक माहात्म्य अठारहवां अध्याय

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कामपीड़ित जलंधर ने शिवरूप धरकर तोड़ी मर्यादाः कार्तिक माहात्म्य 18वां अध्याय

पिछली कथा में आपने पढ़ा कि ब्रह्मा जी के वरदान से शक्तिमान बने जलंधर ने शिवजी की सेना से युद्ध आरंभ किया. ब्रह्माजी के वरदान की रक्षा करने के लिए कार्तिकेय युद्धस्थल में पीछे हट गए. नंदी और वीरभद्र को जलंधर ने बहुत पीड़ित किया. वे दोनों घायल होकर गिरे तो शिवगण घबराहट में भागने लगे. शिवजी ने उन्हें अभय दिया तो वे युद्ध के लिए पुनः हुंकार भरने लगे. अब युद्ध का संचालन करने को स्वयं शिवजी रणभूमि में आ रहे हैं.

पिछली कथा से आगे…

अब रौद्र रूप महाप्रभु शंकर नन्दी पर चढ़कर युद्धभूमि में आये. उनको आया देख कर उनके पराजित गण फिर लौट आये और सिंहनाद करते हुए आयुधों से दैत्यों पर प्रहार करने लगे. भीषण रूपधारी रूद्र को देख दैत्य भागने लगे तब जलन्धर हजारों बाण छोड़ता हुआ शंकर की ओर दौडा़.

उसके शुम्भ निशुम्भ आदि वीर भी शंकर जी की ओर दौड़े. इतने में शंकर जी ने जलन्धर के सब बाण जालों को काट अपने अन्य बाणों की आंधी से दैत्यों को अपने फरसे से मार डाला.

खड़गोरमा नामक दैत्य को अपने फरसे से मार डाला और बलाहक का भी सिर काट दिया. घस्मर भी मारा गया और शिवगण चिशि ने प्रचण्ड नामक दैत्य का सिर काट डाला. किसी को शिवजी के बैल ने मारा और कई उनके बाणों द्वारा मारे गये.

यह देख जलन्धर अपने शुम्भादिक दैत्यों को धिक्कारने और भयभीतों को धैर्य देने लगा. पर किसी प्रकार भी उसके भय ग्रस्त दैत्य युद्ध को न आते थे जब दैत्य सेना पलायन आरंभ कर दिया, तब महा क्रुद्ध जलन्धर ने शिवजी को ललकारा और सत्तर बाण मारकर शिवजी को दग्ध कर दिया.

शिवजी उसके बाणों को काटते रहे. यहां तक कि उन्होंने जलन्धर की ध्वजा, छत्र और धनुष को काट दिया. फिर सात बाण से उसके शरीर में भी तीव्र आघात पहुंचाया. धनुष के कट जाने से जलन्धर ने गदा उठायी. शिवजी ने उसकी गदा के टुकड़े कर दिये तब उसने समझा कि शंकर मुझसे अधिक बलवान हैं.

अतएव उसने गन्धर्व माया उत्पन्न कर दी अनेक गन्धर्व अप्सराओं के गण पैदा हो गये, वीणा और मृदंग आदि बाजों के साथ नृत्य व गान होने लगा. इससे अपने गणों सहित रूद्र भी मोहित हो एकाग्र हो गये. उन्होंने युद्ध बंद कर दिया.

फिर तो काम मोहित जलन्धर बडी़ शीघ्रता से शंकर का रूप धारण कर वृषभ पर बैठकर पार्वती के पास पहुंचा उधर जब पार्वती ने अपने पति को आते देखा, तो अपनी सखियों का साथ छोड़ दिया और आगे आयी. उन्हें देख कामातुर जलन्धर का वीर्यपात हो गया और उसके पवन से वह जड़ भी हो गया.

गौरी ने उसे दानव समझा. वह अन्तर्धान हो उत्तर की मानस पर चली गयीं तब पार्वती ने विष्णु जी को बुलाकर दैत्यधन का वह कृत्य कहा और यह प्रश्न किया कि क्या आप इससे अवगत हैं?

भगवान विष्णु ने उत्तर दिया – आपकी कृपा से मुझे सब ज्ञात है. हे माता! आप जो भी आज्ञा करेंगी, मै उसका पालन करूंगा.

जगतमाता ने विष्णु जी से कहा – उस दैत्य ने जो मार्ग खोला है उसका अनुसरण उचित है. अब वह और जीने के योग्य नहीं है. उसके शरीर में प्राण अब शोभा नहीं पाते. उसने समस्त मर्यादाओं को भंग किया है. उसके साथ वैसा ही व्यवहार होना चाहिए जिसका वह अधिकारी है. मैं आज्ञा देती हूं कि उसकी पत्नी का पतिव्रत भ्रष्ट करें, वह दैत्य तभी मरेगा.

पार्वती जी की आज्ञा पाते ही विष्णु जी उसको शिरोधार्य कर छल करने के लिए जलन्धर के नगर की ओर गये.

कथा जारी रहेगी.

।।कार्तिक माहात्म्य अठारहवां अध्याय पूर्ण।।

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गांडीव धनुष की गाथा ब्रह्मा से शुरू हुई, जिसने तीनों लोकों से बुरी शक्तियों को खत्म करने का हथियार बनाया। धनुष को 1000 साल तक अपने पास रखने के बाद, ब्रह्मा ने प्रजापतियों में से एक को धनुष पारित किया। प्रजापति ने एक और 1000 वर्षों तक धनुष को अपने पास रखा। जब राक्षसों के विनाश का समय आ गया था, तो प्रजापति ने इंद्र को गांडीव दिया। गांडिवा से तीरों की असंख्य रेखाओं की शूटिंग करते हुए, इंद्र ने राक्षसों को गांडिवा के साथ समाप्त कर दिया और इसे 3585 वर्षों के लिए विजय का प्रतीक माना। तब इंद्र ने अपने छोटे भाई वरुण को स्नेहपूर्वक प्रणाम किया। 100 वर्षों तक धनुष रखने के बाद, वरुण ने अर्जुन को गांडीव भेंट किया। इस प्रकार अर्जुन प्रसिद्ध धनुष का स्वामी बन गया। अर्जुन 65 वर्षों तक गांडीव धनुष के स्वामी थे। कुरुक्षेत्र युद्ध में गांडीव अर्जुन की पसंद का हथियार था। युद्ध के 36 साल बाद अर्जुन ने समुद्र में धनुष विसर्जित किया। आखिरकार गांडीव इसके पिछले मालिक वरुण के पास लौट आया।

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Anilkumar Tailor Nov 23, 2020

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संकल्प Nov 22, 2020

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Shakti Nov 23, 2020

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Vijay Jaiswal Nov 23, 2020

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Vijay Jaiswal Nov 22, 2020

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Shakti Nov 22, 2020

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श्रीकार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन महाराज जन्मोत्सव विशेष 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ श्रीकार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन महाराज का परिचय 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ सृष्टि के रचयिता ब्रम्हा जी के मानस पुत्र मरीच से कश्यप और अदिति से सूर्य की उत्पत्ति हुयी। सूर्य से वैवस्वत मनु की उत्पत्ति हुयी। पुराणों के अनुसार मनु आर्यों के प्रथम पूर्वज थे। पौराणिक इतिहास के अनुसार मनु के ज्येष्ठ पुत्र इक्ष्वाकु और पुत्री इला थी। इक्ष्वाकु से सुर्यवंश का विस्तार हुआ। मनु ने पुत्री इला का विवाह चन्द्रमा के पुत्र बुध से किया। बुध से ही चन्द्रमा का विस्तार हुआ। इला के नाम पर मातृगोत्र से यह ‘ऐल वां के नाम से भी सुविख्यात हुआ। बुध और इला से पुरूरवा का जन्म हुआ। महाराज पुरूरवा ने ऐलवां की प्रतिस्थापना प्रतिष्ठानपुर वर्तमान में इलाहाबाद में की और उसे राजधानी बनाया । महाराज पुरूरवा का विवाह उर्वशी से हुआ और उनके आठ पुत्र हुये जिनमें आयु और अमावस प्रमुख थे। आयु ने स्वर्भानु की प़ुत्री प्रभा से विवाह किया और उनके पॉंच पुत्र हुये जिन में ज्येष्ठ पुत्र नहुष थे। महाराज नहुष बहुत ही प्रतापी थे और उनकी छह संताने हुयी जिनमें यति और ययाति प्रमुख थे। यति मुनि हो गये और राज्य का त्याग कर दिया। ययाति को राज्य का उत्तराधिकार प्राप्त हुआ। राजा ययाति बङे पराक्रमी धर्मनिष्ठ सत्यवादी एवं प्रजापालक थे। ययाति की दो रानियॉं थी। प्रथम भार्गव ऋषि शुक्र उषना की पुत्री देव यानी और द्वितीय दैत्यराज वृश पर्वा की पुत्री शमिष्ठा। देवयानी से यदु और तुर्वसु तथा शमिष्ठा से द्रुह, अनु और पुरु नाम के पॉंच पुत्र हुये। ययाति ने अपने राज्य को पॉंच प़ुत्रो में बॉंट दिया जिस कारण ययाति से पॉंच राजवंशों का उदय हुआ। यदु से यादव राजवंश, तुर्वसु से तुर्वस, द्रुह से द्रुह, अनु से आनव और पुरू से पौरव राजवंश का विस्तार हुआ। ययाति ने अपने ज्येष्ठ पुत्र यदु को चंबल-वेतवा और केन नदियों का मघ्यवर्ती राज्य दिया। महाराज यदु के पॉंच पुत्र हुये जिनमे सहसतजित, क्रौत प्रमुख थे। महाराज सहसतजित के पुत्र शतजित थे। शतजित के तीनों पुत्र हैहय, वेणुघ्य और हय बड़े ही पराक्रमी और धर्मात्मा थे। महाराज हैहय के चरित्र और वीरता के कारण ही उनके वंशज हैहयवंश वंशज विख्यात हुयें। महाराज हैहय से धर्मनेत्र उत्पन्न हुये। धर्मऩेत्र का विवह उल्कादेवी से हुआ और इनकी राजधानी माहेश्वरपुरी थी। राजा धर्मनेत्र से राजा कीर्ति उत्पन्न हुये। राजा कीर्ति का पुत्र साहंजि हुये। साहंजि का विवाह चंपावती से हुआ और इनके पुत्र का नाम माहिमान था। माहिमान अपने पिता के बाद राजगद्दी पर बैठे और अपनी शूर वीरता से दक्षिण प्रदेश का बहुत सा भाग अपने राज्य में मिला लिया। इनके द्वारा विजित प्रदेश में आर्य संस्कृति और सभ्यता का खूब प्रचार हुआ और दिग्विजयी आर्य नरेशों के इतिहास में इनका स्थान सुविख्यात है। दक्षिण प्रदेश में काफी दूर तक राज्य फैल जाने के कारण सुविधा की दृष्टि से महाराज माहिश्मान ने नर्मदा नदी के किनारे माहिश्मती नगरी बसाई और उसे ही अपनी राजधानी बनायी। यह नगर वर्तमान समय में जिला ऩिर्माण में मान्धाता के नाम से प्रसिद्ध है। इनकी रानी का नाम सुभद्रा था। राजा माहिश्मान के प्रतापशाली पुत्र भद्रसंन हुये। इनकी रानी का दिया थी। इस समय तक हैहय वंशियों का राज्य काशी तक फैल चुका था। हैहय एवं काशी कुलों की परस्पर स्पर्धा में दिवोदास के साथ हुये युद्ध में भद्रसेन के पुत्रों का वध कर दिया गया किन्तु भद्रसेन का एक पुत्र दुर्दम जीवित बच गये और कालोपरान्त राजा दुर्दम ने दिवोदास को पराजित करके अपने भाइयो के वध का प्रतिशोध लिया। राजा दुर्दम और इनकी महारानी ज्योतिश्मती से राजा कनक (या धनद) उत्पन्न हुये। इनके द्वारा विजित प्रदेश में आर्य संस्कृति और सभ्यता का खूब प्रचार हुआ और दिग्विजयी आर्य नरेशों के इतिहास में इनका स्थान सुविख्यात है। दक्षिण प्रदेश में काफी दूर तक राज्य फैल जाने के कारण सुविधा की दृष्टि से महाराज माहिश्मान ने नर्मदा नदी के किनारे माहिश्मती नगरी बसाई और उसे ही अपनी राजधानी बनायी। राजा कनक के चार सुविख्यात पुत्र कृतवीर्य, कृतौजा, कृतवर्मा और कृताग्नि हुये। राजा कनक के ज्येष्ठ पुत्र कृतवीर्य उनके पश्चात राज्य के उत्तराधिकारी बने। वे पुण्यवान प्रतापी राजा थे और अपने समकालीन राजाओ मे वे सर्वश्रेष्ठ राजा माने जाते थे। इनकी रानी का नाम कौशिक था। महाराज कृतवीर्य से कार्तवीर्य अर्जुन उत्पन्न हुये। इन्हे सहस्त्रार्जुन के नाम से भी जाना जाता है महाराज कृतवीर्य के पश्चात कार्तवीर्यार्जुन (सहस्त्रार्जुन) जी राजगद्दी पर बैठे। महाराज कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्त्रार्जुन) जी का जन्म कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को श्रवण नक्षत्र में प्रात: काल के मुहूर्त में हुआ था। पौराणिक ग्रंथो में कार्तवीर्य अजुर्न के अनेक नाम अंकित है जैसे सहस्त्रार्जुन, कृतवीर्य, नन्दन, राजेश्वर, हैहयाधिपति, दषग्रीविजयी, सुदर्शन, चक्रावतार, सप्तद्वीपाधि आदि। महाराज कार्तवीर्यार्जुन जी के राज्याभिषेक में स्वयं दत्तात्रेय जी एवं ब्रम्हा जी पधारें। राजसिंहासन पर बैठते ही उन्होने घोषणा कर दी कि मेरे अतिरिक्त कोई भी शस्त्र -अस्त्र धारण नही करेगा। वे अकेले ही सब प्रकार से अपनी प्रजा का पालन और रक्षा करते थे। युद्ध दान धर्म दया एवं वीरता में उनके समान कोई नही था। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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