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शिर्डी के सांई बाबा । Shirdi Sai Baba.

शिर्डी के सांई बाबा ।
Shirdi Sai Baba.

“जिंदगी में यदि आप भगवान् के साथ मधुर संबंध स्थापित कर लो तो आपकी जिंदगी निश्चित ही बेहद खुबसूरत होगी।” ~ सांई बाबा ।
   
शिर्डी के साईं बाबा, एक भारतीय धार्मिक गुरु थे, जिन्हें उनके भक्त संत, फ़क़ीर और सतगुरु भी कहते थे। उनके हिन्दू और मुस्लिम दोनों भक्त उन्हें पूजते थे, और उनकी मृत्यु के बाद भी आज भी हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग उन्हें पूजते है। साईं बाबा की किसी एक समाज में प्रतिष्ठा नही है। उन्होंने अपने आप को एक सच्चे सद्गुरु को समर्पित कर दिया था, लोग उन्हें भगवान का अवतार ही समझते थे।

वैश्विक स्तर पर भी लोग साईं बाबा को जानते है। नश्वर चीजो का उन्हें कोई मोह नही था और उनका मुख्य उद्देश्य स्वयं को खुद की अनुभूति दिलाना था। वे लोगो को प्यार, दया, मदद, समाज कल्याण, संतोष, आंतरिक शांति और भगवन की भक्ति और गुरु का पाठ पढ़ाते थे। उन्होंने लोगो को धार्मिक भेदभाव करने से भी मना किया था। साईबाबा लोगो को हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्म का पाठ पढ़ाते थे, उन्होंने उनके रहने वाली मस्जिद को हिन्दू नाम द्वारकामाई का नाम भी दिया था, जिसमे हिन्दू और मुस्लिम दोनों एकसाथ साईबाबा को पूजते थे। साईबाबा की एक प्रसिद्ध सुभाषित “सबका मालिक एक” है, जो हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मो से जुडी हुई है, इसके साथ ही वे यह भी कहते थे की, “मुझे और और तुम्हे तुम्हारी प्रार्थना का जवाब मिल जाएंगा।” इसका साथ-साथ वे हमेशा “अल्लाहमालिक” बोल का भी उपयोग करते थे।

पृष्टभूमि

साईबाबा का असल नाम और जन्मनाम आज तक किसी को पता नही है। कुछ लोगो का ऐसा मानना है की उनका जन्म 28 सितम्बर 1835 में हुआ था, लेकिन इससे संबंधित को पर्याप्त दस्तावेज नही है। अक्सर जब उनसे उनके भूतकाल के बारे में पूछा जाता था तब हमेशा वे दुर्ग्राह्य जवाब देते थे। “साईं” नाम उन्हें उनके शिर्डी आने पर दिया गया था, शिर्डी महाराष्ट्र के पश्चिम का एक गाँव है। साईं शब्द धार्मिक भिक्षुको से जुड़ा हुआ है। बहुत सी भारतीय और मध्य पूर्व भाषाओ में “बाबा” शब्द साधारणतः बड़े पापा, पापा और किसी वृद्ध पुरुष के संबोधन में बोला जाता था। इसीलिए साईं बाबा को लोग एक पवित्र और धार्मिक पिता मानते थे। साईं बाबा के कुछ अनुयायी भी उस समय में धार्मिक संत और गुरु के नाम से प्रसिद्ध हुए थे, जैसे की शिर्डी के खंडोबा मंदिर का पुजारी महालसापति और उपासनी महाराज। दुसरे धार्मिक गुरु भी उनका बहुत सम्मान करते थे जैसे की संत बिड़कर महाराज, संत गंगागीर, संत जानकीदास महाराज और सती गोदावरी माताजी। साईबाबा सभी बाबाओ को अपना भाई कहते थे, विशेषतः अक्कलकोट के स्वामी समर्थ को वे अपना भाई मानते थे।

साईं सत्चरित्र किताब के अनुसार, साईं जब 16 साल के थे तभी ब्रिटिश भारत के महाराष्ट्र राज्य के अहमदनगर जिले के शिर्डी गाँव में आए थे। वे एक सन्यासी बनकर जिन्दगी जी रहे थे, और हमेशा नीम के पेड़ के निचे ध्यान लगाकर बैठे रहते या आसन में बैठकर भगवान की भक्ति में लीन हो जाते थे। श्री साईं सत्चरित्र में गाँव वालो की उनके प्रति की प्रतिक्रिया का भी उल्लेख किया गया है।

गाँव के लोग भी उस 16 साल के लड़के को लगातार ध्यान, लगाता हुआ देख आश्चर्यचकित थे, क्योकि ठंडी और गर्मी का उनके शरीर पर कोई प्रभाव दिखाई नही दे रहा था। दिन में वे किसी से नही मिलते थे और रात में उन्हें किसी का डर नही था।

उनकी मौजूदगी ने गाँव वालो की जिज्ञासा को आकर्षित किया था और रोज़ उन्हें धार्मिक प्रवृत्ति के लोग जैसे महालसापति, अप्पा जोगले और काशीनाथ मिलने आया करते थे। कुछ लोग उन्हें पागल समझते थे तो कुछ लोग उनपर पत्थर भी फेकते थे। इसके बाद साईबाबा ने गाँव छोड़ दिया था और इसके बाद गाँव वालो को उनकी थोड़ी जानकारी मिली थी।

जानकारों के अनुसार से बहुत से संत और फकीरों से मिले थे और जुलाहा की तरह काम करते थे। कहा जाता है की 1857 में रानी लक्ष्मीबाई के समय में भारतीय क्रांति के समय में भी साईबाबा थे। ऐसा माना जाता है की सबसे पहले साईबाबा तीन साल तक शिर्डी रहे थे और फिर एक साल तक गायब हो गये थे और फिर हमेशा के लिए 1858 में शिर्डी वापिस आ गये थे, जिनमे उनके जन्म को 1838 का बताया गया था।

शिर्डी में वापसी

1858 में साईबाबा शिर्डी वापिस आए थे। इस समय वे अलग ही तरह के कपडे पहने हुए थे, उपर उन्होंने घुटनों तक कफनी पोशाक और कपड़ो की ही एक टोपी पहन रखी थी। उनके एक अनुयायी रामगिर बुआ ने ध्यान से देखने पर पाया की साईबाबा ने एक व्यायामी की तरह कपडे पहने हुए है, कपड़ो के साथ-साथ उनके बाल भी काफी घने और लम्बे थे। जब लम्बे समय के बाद वे शिर्डी लौटकर आए थे तो लोगो को उनका एक नया रूप देखने मिला था। उनकी पोषाख के अनुसार वे एक मुस्लिम फ़क़ीर लग रहे थे और लोग उन्हें हिन्दू और मुस्लिम दोनों का गुरु मानते थे।

वापिस आने के बाद तक़रीबन 4 से 5 साल तक साईबाबा एक नीम के पेड़ के निचे रहते थे और अक्सर कभी-कभी लम्बे समय के लिए शिर्डी के जंगलो में भी चले जाते थे। लंबे समय तक ध्यान में लगे रहने की वजह से वे कयी दिनों तक लोगो से बात भी नही करते थे। लेकिन बाद में कुछ समय बाद लोगो ने उन्हें एक पुरानी मस्जिद रहने के लिए दी, वहाँ वे लोगो से भिक्षा मांगकर रहते थे और वहाँ उनसे मिलने रोज़ बहुत से हिन्दू और मुस्लिम भक्त आया करते थे। मस्जिद में पवित्र धार्मिक आग भी जलाते थे जिसे उन्होंने धुनी का नाम दिया था, लोगो के अनुसार उस धुनी में एक अद्भुत चमत्कारिक शक्तियाँ थी, उस धुनी से ही साईबाबा अपने भक्तो को जाने से पहले उधि देते थे। लोगो के अनुसार साईबाबा द्वारा दी गयी उस उधि में अद्भुत ताकत होती थी। संत के साथ-साथ वे एक स्थानिक हकीम की भूमिका भी निभाते थे और बीमार लोगो को अपनी धुनी से ठीक करते थे। साईबाबा अपने भक्तो को धार्मिक पाठ भी पढ़ाते थे, और हिन्दुओ को रामायण और भगवत गीता और मुस्लिमो को कुरान पढने के लिए कहते थे।

1910 के बाद साईबाबा की ख्याति मुंबई में फैलती गयी। इसके बाद बहुत से लोग उनके दर्शन करने आते गये क्योकि उन्हें एक चमत्कारिक और शक्तिशाली अवतार और बाबा मानने लगे थे लोग। इसके बाद गाँव वालो ने उनका पहला मंदिर भिवपुरी, कर्जत में बनाया।

ओम सांई राम।

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Sunil upadhyaya Jul 19, 2019

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Swami Lokeshanand Jul 18, 2019

तुलसीदासजी ने विचित्र चौपाइयाँ लिखीं। "मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा" और "भवन एक पुनि दीख सुहावा" एक विभीषण के ही घर को घर कहा, रावण सहित शेष राक्षसों के घरों को घर नहीं कहा, मंदिर कह दिया। जब लंका में आग लग गयी, तब- "जारा नगर निमिष एक माहीं। एक विभीषण कर गृह नाहीं॥" वह "घर" तो छूट गया,"मंदिर" सभी जल गए। विचार करें, मंदिर वह है जो प्रीति का केन्द्र हो। घर उपयोग के लिए है, रहने के लिए है, प्रीत लगाने के लिए नहीं है। भवन से प्रीत लगाने वाला ही तो प्रेत बनता है। जिसे भवन से प्रीत है, उसे घर में ही आसक्ति है, गृहासक्ति है, तो घर ही उसके जीवन का लक्ष्य हो गया, मंदिर हो गया। जबकि विभीषण जिस घर में रहता है, उसमें उसे आसक्ति नहीं है। मंदिर तो वहाँ भी है, पर अलग से बना है- "हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा" इसे समझें, मंदिर दो प्रकार के हैं, देव मंदिर और देह मंदिर। विभीषण के मंदिर में देव पूजा होती है, वहाँ श्रीसीतारामजी विराजते हैं, वह तो देव मंदिर है। शेष सबमें देह की पूजा होती थी, वे देह मंदिर हैं। देखो, देह संभालो, पर उसे भी तो देखो जिससे यह जीवित है, उसी से इसकी कीमत है। हिसाब लगाओ! कितने टिन तेल, साबुन, पाउडर, क्रीम इस पर मले, कितना घी, गेहूँ, चावल, दाल, फल, सब्जी, मिठाइयाँ, पापड़, पकोड़े, अचार, चटनी, मुरब्बे इसे खिलाए, इसकी पूजा का कोई अंत है? देव को न जाने, देह को ही पूजे, इसी के सुख के लिए जीवन बिता दे, कमाना खाना और पैखाना ही जिसके जीवन का लक्ष्य है, वही तो असली राक्षस है। तुलसीदासजी का संकेत है कि अ दुनियावालों! इस देह की कितनी ही पूजा कर लो, सज़ा लो, संवार लो, इसे तो जलना ही पड़ेगा, जलना ही पड़ेगा। अब यह विडियो देखें- हनुमानजी ने देह मंदिरों में आग लगा दी- https://youtu.be/_DW_XzDxzQk

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saidas Jul 18, 2019

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saidas Jul 18, 2019

🌷OM❤SAI❤RAM🌷 Jaise Suraj Ki Garmi Se 💜💙💜💙💜💙💜💙💜 जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन 💛💚💛💚💛💚💛💚💛💚💛 को मिल जाए 💛💚💛💚💛 जैसे सूरज की गर्मी से जलते हुए तन को मिल जाये तरुवर की छाया ऐसा ही सुख मेरे मन को मिला है मैं जब से शरण तेरी आया, मेरे राम भटका हुआ मेरा मन था कोई, मिल ना रहा था सहारा लहरों से लड़ती हुई नाव को जैसे मिल ना रहा हो किनारा उस लड़खड़ाती हुई नाव को जो किसी ने किनारा दिखाया शीतल बने आग चंदन के जैसी, राघव कृपा हो जो तेरी उजियाली पूनम की हो जाए रातें, जो थी अमावस अंधेरी युग युग से प्यासी मरूभूमी ने जैसे सावन का संदेस पाया जिस राह की मंज़िल तेरा मिलन हो, उस पर कदम मैं बढ़ाऊँ फूलों में खारों में, पतझड़ बहारों में, मैं ना कभी डगमगाऊँ पानी के प्यासे को तकदीर ने जैसे जी भर के अमृत पिलाया Jaise Suraj Ki Garmi Se 💛💚💛💚💛💚💛💚💛 Jaise suraj ki garmi se jalate hue tan ko Mil jaaye taruwar ki chhaaya Aisa hi sukh mere man ko mila hai Main jab se sharan teri aya, mere raam Bhataka hua mera man tha koi, mil na raha tha sahaara Laharon se ladti hui naaw ko jaise mil na raha ho kinaara Us ladkhadaati hui naaw ko jo kisi ne kinaara dikhaaya Shital bane ag chndan ke jaisi, raaghaw kripa ho jo teri Ujiyaali punam ki ho jaae raaten, jo thi amaawas andheri Yug yug se pyaasi marubhumi ne jaise saawan ka sndes paaya Jis raah ki mnjil tera milan ho, us par kadam main badhaaun Fulon men khaaron men, patajhad bahaaron men, main na kabhi dagamagaaun Paani ke pyaase ko takadir ne jaise ji bhar ke amrit pilaaya 🌷SRI SATCHIDANANDA SADGURU SAINATH MAHARAJ KI JAI 🌷

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Pt Vinod Pandey 🚩 Jul 18, 2019

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Renu Singh Jul 18, 2019

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saidas Jul 18, 2019

🌷OM❤SAI❤RAM🌷 मेरा कोई न सहारा बिन तेरे, 💜💙💜💙💜💙💜💙 मेरा कोई न सहारा बिन तेरे, गुरुदेव सांवरिया मेरे तेरे बिना मेरा है कौन यहाँ प्रभु तुम्हे छोड़ मैं जाऊं कहां मैं तो आन पड़ा हूँ दर तेरे, गुरुदेव सांवरिया मेरे... मेने जनम लिया जग में आया तेरी कृपा से यह नर तन पाया तूने किये उपकार घनेरे, गुरुदेव सांवरिया मेरे... मेरे नैना कब से तरस रहे सावन भादो है बरस रहे अब छाए घनघोर अँधेरे, गुरुदेव सांवरिया मेरे... प्रभु आ जाओ प्रभु आ जाओ अब और ना मुझको तरसाओ, काटो जनम मरण के फेरे, गुरुदेव सांवरिया मेरे... जिस दिन दुनिया ने आया मैंने पल भर चैन नहीं पाया सहे कष्ट पे कष्ट घनेरे, गुरुदेव सांवरिया मेरे... मेरा सच्चा मार्ग छूट गया मुझे पांच लुटेरों ने लूट लिया मैंने यतन किये बहुतेरे गुरुदेव सांवरिया मेरे... तुम दीन बंधू हितकारी, हम आये शरण तिहारी काटो जनम मरण के फेरे गुरुदेव सांवरिया मेरे... विशिओं के जाल मैं फंस कर के मोह माया के पाश में फसकर के दुःख पाया मैंने प्रभु जी घनेरे, गुरुदेव सांवरिया मेरे... हम दीन हीन संसारी, आशा एक नाथ तिहारी तेरे चरण कमल के चेरे, गुरुदेव सांवरिया मेरे... तूने लाखों पापी तारे, नहीं कोई गुण दोष विचारे, खड़ा भिक्षु द्वार पे तेरे गुरुदेव सांवरिया मेरे... 🌷 SRI SATCHIDANANDA SADGURU SAINATH MAHARAJ KI JAI 🌷

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