🕉 शिव और सर्प के अबूझ रिश्ते 🕉

🕉    शिव और सर्प के अबूझ रिश्ते   🕉

#महादेव
भगवान शंकर जिसके आराध्य हों या फिर अगर कोई साधक भगवान शंकर का ध्यान करता हो तो उनके बारे में कई भाव मन में प्रस्फुटित होते हैं। जैसे कि भगवान शंकर त्रिशूल लिए साधना पर बैठे है। उनका तीसरा नेत्र यानी भ्रिकुटी बंद है। उनकी जटाओं से गंगा प्रवाहित हो रही है। उनका शरीर समुद्र मंथन के समय विषपान करने की वजह से नीला दिख रहा है। भगवान शंकर की जटाओं और शरीर के इर्द-गिर्द कई सांप लिपटे हुए है। शिव के मस्तक पर एक ओर चंद्र है तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प भी उनके गले का हार है। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है। साधन क्रम में विचार सागर में कई विचारों का आगमन होता है। भगवान शंकर के बारे में कई कथा-कहानियां पुराणों, धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है। उनसे जुड़ी कई कथाएं साधकों को उनसे जोड़े रखती है और साधकों के लिए वह प्रेरणादायी भी है।
पौराणिक मान्यताओं में भगवान शंकर और सर्प का जुड़ाव गहरा है तभी तो वह उनके शरीर से लिपटे रहते है। यह बात सिर्फ मान्यताओं तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह इस कलियुग में भी हकीकत में परिलक्षित होती दिखती है। यूं तो भगवान जनता जनार्दन के लिए अपनी कृपा बरसाने में अति दयालु है लेकिन कहते हैं कि अगर आपको भगवान शंकर के दर्शन ना हो और अगर सर्प के दर्शन हो जाएं तो समझिए कि साक्षात भगवान शंकर के ही दर्शन हो गए। हम चल रहे हैं राजस्थान के माउंट आबू में। माउंट आबू राजस्थान का इकलौता हिल स्टेशन है जो अर्धकाशी भी कहलाता है। पौराणिक मान्यताओं और पुराणों के मुताबिक माउंट आबू अर्धकाशी इसलिए कहलाता है क्योंकि यहां भगवान शंकर के 108 छोटे-बड़े मंदिर हैं। दुनिया की इकलौती जगह जहां भगवान शंकर नहीं, उनकी शिवलिंग भी नहीं बल्कि उनके अंगूठे की पूजा होती है। माउंट आबू में ही अचलगढ़ दुनिया की इकलौती ऐसी जगह है जहां भगवान शिव के अंगूठे की पूजा होती है। भगवान शिव के सभी मंदिरों में तो उनके शिवलिंग की पूजा होती है लेकिन यहां भगवान शिव के अंगूठे की पूजा होती है।
यहीं पर एक मंदिर है पांडव गुफा के करीब जहां के बारे में कहा जाता है पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान कुछ समय यहां बिताया था। शिव मंदिर में बीते सोमवार को भगवान शंकर को जल और दूध से नहलाने पहुंचे श्रद्धालुओं को लगा जैसे भोले एक विशालकाय नाग के रूप में प्रकट हो गए। मंदिर भोले की जयकारों से गूंज रह था। शिवलिंग पर जल, बिल्व पत्र, भांग, धतूरा, फूल आदि चढ़ाए जाने का क्रम जारी था। तभी एक विशालकाय सर्प न जाने कहां से आकर शिवलिंग से लिपट गया। इस नाग का आकार लगभग 6 फीट का था। इस बीच कुछ लोगों ने डरते-डरते शिवलिंग पर जल भी अर्पित किया लेकिन नागराज कई घंटों तक शिवलिंग से लिपटे रहे। सावन का दूसरा सोमवार और शिवलिंग पर जल चढ़ाने का सिलसिला चलता रहा। इस बीच नाग की अटखेलियां भी जारी रही। वह कभी शिवलिंग के ऊपर बैठता तो कभी शिवलिंग की चारों तरफ लिपटकर बैठ जाता। लोग हैरान थे लेकिन जो लोग वहां थे उनके मुताबिक यह हैरानी उस सांप को नहीं थी। वह शायद निर्भय होकर आनंद की अनुभूति कर रहा था। इतने लोगों के बीच कोई सांप लगभग 6 घंटों तक शिवलिंग से लिपटा रहा। लोग टकटकी लगाए देखते रहे। कुछ लोगों के लिए भोले सर्प के रूप में शिवलिंग से आकर लिपटे थे तो कुछ लोग उस पल को शिद्दत से महसूस करना चाह रहे थे। यही वजह थी कि मंदिर में भीड़ बढ़ने लगी। इलाके में खबर फैलने लगी। अचानक सर्प गायब हो गया। वहां श्रद्धालुओं के चढ़ाए पुष्प और फल तो दिख रहे थे लेकिन सर्प नहीं। सांप इंसानों के लिए खतरनाक होता है लेकिन यह बात भी सच है कि उसे हम इंसानों से ज्यादा डर लगता है। आस्था, विश्वास की परिभाषा आध्यात्म की सीमा रेखा में सब कुछ मानने पर ही निर्भर है। स्थानीय लोगों के मुताबिक माउंट आबू के उन मंदिरों में जो जंगल के बीचों बीच है वहां इस प्रकार की घटनाएं सावन के महीने में सोमवार को या फिर शिवरात्रि के मौके पर जरूर होती है। पिछले वर्ष इन्हीं जंगलों के एक शिव मंदिर में पंचमुखी (पांच मुंह वाला सांप) दिखा था। ये घटनाएं ये सिद्ध करती है कि शिव (शिवलिंग) और सर्प का गहरा नाता है। यह रिश्ता इंसानी समझ से परे है। क्या मानें क्या ना मानें यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है। कुछ लोगों के लिए यह भोले का रूप हो सकता है तो कुछ के लिए कोरा अंधविश्वास। लेकिन यह बात सोचने पर जरूर विवश करती है कि हजारों की भीड़ में एक सांप छह घंटे तक शिवलिंग से कैसे लिपटा रहा। वह भी भोले के जयकारों और मंदिर में बजती घंटियों के बीच।

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कामेंट्स

R N Agroya Aug 5, 2020

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Dr.ratan Singh Aug 5, 2020

🎎श्रावण माह विशेष🎎 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 🚩🔱ॐ नमः शिवाय 🔱🚩 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️ 💐श्रावण मास माहात्म्य 💐 ☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️ ✍️ अध्याय= 23- 24✍️ ✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️ 🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱 🎎🦚 कृष्ण जन्माष्टमी व्रत का वर्णन 🦚🎎 🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 ईश्वर बोले – हे सनत्कुमार – श्रावण मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी को वृष के चन्द्रमा में अर्धरात्रि में इस प्रकार के शुभ योग में देवकी ने वसुदेव से श्रीकृष्ण को जन्म दिया (भारत के पश्चिमी प्रदेशों में युगादि तिथि के अनुसार मास का नामकरण होता है अतः श्रावण कृष्ण अष्टमी को भाद्रपद अष्टमी समझना चाहिए) सूर्य के सिंह राशि में प्रवेश करने पर इस श्रेष्ठ महोत्सव को करना चाहिए. सप्तमी के दिन अल्प आहार करें. इस दिन दंतधावन करके उपवास के नियम का पालन करे और जितेन्द्रिय होकर रात में शयन करे. जो मनुष्य केवल उपवास के द्वारा कृष्णजन्माष्टमी का दिन व्यतीत करता है, वह सात जन्मों में किए गए पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है. पापों से मुक्त होकर गुणों के साथ जो वास होता है उसी को सभी भोगों से रहित उपवास जानना चाहिए. अष्टमी के दिन नदी आदि के निर्मल जल में तिलों से स्नान करके किसी उत्तम स्थान में देवकी का सुन्दर सूतिकागृह बनाना चाहिए. जो अनेक वर्ण के वस्त्रों, कलशों, फलों, पुष्पों तथा दीपों से सुशोभित हो और चन्दन तथा अगरु से सुवासित हो. उसमे हरिवंशपुराण के अनुसार गोकुल लीला की रचना करें और उसे बाजों की ध्वनियों तथा नृत्य, गीत आदि मंगलों से सदा युक्त रखे. उस गृह के मध्य में षष्ठी देवी की प्रतिमा सहित सुवर्ण, चाँदी, ताम्र, पीतल, मिटटी, काष्ठ अथवा मणि की अनेक रंगों से लिखी हुई श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित करें. वहाँ आठ शल्य वाले पर्यंक (पलंग) के ऊपर सभी शुभ लक्षणों से संपन्न प्रसूतावस्था वाली देवी की मूर्त्ति रखकर उन सबको एक मंच पर स्थापित करे और उस पर्यंक में स्तनपान करते हुए सुप्त बालरूप श्रीकृष्ण को भी स्थापित करें. उस सूतिकागृह में एक स्थान पर कन्या को जन्म दी हुई यशोदा को भी कृष्ण के समीप लिखे. साथ ही साथ हाथ जोड़े हुए देवताओं, यक्षों, विद्याधरों तथा अन्य देवयोनियों को भी लिखे और वहीँ पर खड्ग तथा ढाल धारण करके खड़े हुए वासुदेव को भी लिखे. इस प्रकार कश्यप के रूप में अवतीर्ण वसुदेव जी, अदितिस्वरूपा देवकी, शेषनाग के अवतार बलराम, अदिति के ही अंश से प्रादुर्भूत यशोदा, दक्ष प्रजापति के अवतार नन्द, ब्रह्मा के अवतार गर्गाचार्य, सभी अप्सराओं के रूप में प्रकट गोपिकावृन्द, देवताओं के रूप में जन्म लेने वाले गोपगण, कालनेमिस्वरूप कंस, उस कंस के द्वारा व्रज में भेजे गए वृषासुर – वत्सासुर – कुवलयापीड – केशी आदि असुर, हाथों में शास्त्र लिए हुए दानव तथा यमुनादह में स्थित कालिय नाग – इन सबको वहाँ चित्रित करना चाहिए. इस प्रकार पहले इन्हे बनाकर श्रीकृष्ण ने जो कुछ भी लीलाएँ की हैं, उन्हें भी अंकित करके भक्तिपरायण होकर प्रयत्नपूर्वक सोलहों उपचारों से “देवकी.” – इस मन्त्र के द्वारा उनकी पूजा करनी चाहिए. वेणु तथा वीणा की ध्वनि के द्वारा गान करते हुए प्रधान किन्नरों से निरंतर जिनकी स्तुति की जाती है, हाथों में भृंगारि, दर्पण, दूर्वा, दधि-कलश लिए हुए किन्नर जिनकी सेवा कर रहे हैं, जो शय्या के ऊपर सुन्दर आसन पर भली-भाँति विराजमान हैं, जो अत्यंत प्रसन्न मुखमण्डल वाली हैं तथा पुत्र से शोभायमान हैं, वे देवताओं की माता तथा विजयसुतसुता देवी देवकी अपने पति वासुदेव सहित सुशोभित हो रही हैं. उसके बाद विधि जानने वाले मनुष्य को चाहिए कि आदि में प्रणव तथा अंत में नमः से युक्त करके अलग-अलग सभी के नामो का उच्चारण करके सभी पापों से मुक्ति के लिए देवकी, वसुदेव,वासुदेव, बलदेव, नन्द तथा यशोदा की पृथक-पृथक पूजा करनी चाहिए. उसके बाद चन्द्रमा के उदय होने पर श्रीहरि का स्मरण करते हुए चन्द्रमा को अर्घ्य प्रदान करें. इस प्रकार कहना चाहिए – हे क्षीरसागर से प्रादुर्भूत, हे अत्रिगोत्र में उत्पन्न आपको नमस्कार है. हे रोहिणीकांत ! मेरे इस अर्घ्य को आप स्वीकार कीजिए. देवकी के साथ वासुदेव, नन्द के साथ यशोदा, रोहिणी के साथ चन्द्रमा और श्रीकृष्ण के साथ बलराम की विधिवत पूजा करके मनुष्य कौन-सी परम दुर्लभ वस्तु को नहीं प्राप्त कर सकता है. कृष्णाष्टमी का व्रत एक करोड़ एकादशी व्रत के समान होता है. इस प्रकार से उस रात पूजन करके प्रातः नवमी तिथि को भगवती का जन्म महोत्सव वैसे ही मानना चाहिए जैसे श्रीकृष्ण का हुआ था. उसके बाद भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए और उन्हें जो-जो अभीष्ट हो गौ, धन आदि प्रदान करना चाहिए, उस समय यह कहना चाहिए – श्रीकृष्ण मेरे ऊपर प्रसन्न हों. गौ तथा ब्राह्मण का हित करने वाले आप वासुदेव को नमस्कार है, शान्ति हो, कल्याण हो – ऐसा कहकर उनका विसर्जन कर देना चाहिए. उसके बाद मौन होकर बंधु-बांधवों के साथ भोजन करना चाहिए. इस प्रकार जो प्रत्येक वर्ष विधानपूर्वक कृष्ण तथा भगवती का जन्म-महोत्सव मनाता है वह यथोक्त फल प्राप्त करता है. उसे पुत्र, संतान, आरोग्य तथा अतुल सौभाग्य प्राप्त होता है. वह इस लोक में धार्मिक बुद्धिवाला होकर मृत्यु के बाद वैकुण्ठलोक को जाता है. हे सनत्कुमार ! अब इसके उद्यापन का वर्णन करूंगा. इसे किसी पुण्य दिन में विधिपूर्वक करें. एक दिन पूर्व एक बार भोजन करें और रात में ह्रदय में विष्णु का स्मरण करते हुए शयन करें. इसके बाद प्रातःकाल संध्या आदि कृत्य संपन्न करके ब्राह्मणों स्वस्तिवाचन कराएं और आचार्य का वरण करके ऋत्विजों की पूजा करें. इसके बाद वित्त शाठ्य से रहित होकर एक पल अथवा उसके आधे अथवा उसके भी आधे पल सुवर्ण की प्रतिमा बनवानी चाहिए और इसके बाद रचित मंडप में मंडल के भीतर ब्रह्मा आदि देवताओं की स्थापना करें. इसके बाद वहाँ तांबे अथवा मिटटी का एक घट स्थापित करें और उसके ऊपर चाँदी या बाँस का एक पात्र रखे. उसमे गोविन्द की प्रतिमा रखकर वस्त्र से आच्छादित करके व्यक्ति सोलहों उपचारों से वैदिक तथा तांत्रिक मन्त्रों के द्वारा विधिवत पूजन करे. इसके बाद शंख में पुष्प, फल, चन्दन तथा नारिकेल फल सहित शुद्ध जल लेकर पृथ्वी पर घुटने टेककर यह कहते हुए देवकी सहित भगवान् श्रीकृष्ण को अर्घ्य प्रदान करे – कंस के वध के लिए, पृथ्वी का भार उतारने के लिए, कौरवों के विनाश के लिए तथा दैत्यों के संहार के लिए आपने अवतार लिया है, हे हरे ! मेरे द्वारा प्रदत्त इस अर्घ्य को आप देवकी सहित ग्रहण करें. इसके बाद बुद्धिमान को चाहिए कि चन्द्रमा को पूर्वोक्त विधि से अर्घ्य प्रदान करें. पुनः भगवान् से प्रार्थना करें – हे जगन्नाथ ! हे देवकीपुत्र ! हे प्रभो ! हे वसुदेवपुत्र ! हे अनंत ! आपको नमस्कार है, भवसागर से मेरी रक्षा कीजिए. इस प्रकार देवेश्वर से प्रार्थना करके रात्रि में जागरण करना चाहिए. पुनः प्रातःकाल शुद्ध जल में स्नान करके जनार्दन का पूजन खीर, तिल और घृत से मूल मन्त्र के द्वारा भक्तिपूर्वक एक सौ आठ आहुति देकर पुरुषसूक्त से हवन करें और पुनः “इदं विष्णुर्वी चक्रमे.” इस मन्त्र से केवल घृत(घी) की आहुतियाँ देनी चाहिए. पुनः पूर्णाहुति देकर तथा होमशेष संपन्न करने के अनन्तर आभूषण तथा वस्त्र आदि से आचार्य की पूजा करनी चाहिए. उसके बाद व्रत की संपूर्णता के लिए दूध देने वाली, सरल स्वभाव वाली, बछड़े से युक्त, उत्तम लक्षणों से संपन्न, सोने की सींग, चाँदी के खुर, कांस्य की दोहनी, मोती की पूंछ, ताम्र की पीठ तथा सोने के घंटे से अलंकृत की हुई एक कपिला गौ को वस्त्र से आच्छादित करके दक्षिणा सहित दान करना चाहिए. इस प्रकार दान करने से व्रत संपूर्णता को प्राप्त होता है. कपिला गौ के अभाव में अन्य गौ भी दी जा सकती है. इसके बाद ऋत्विजों को यथायोग्य दक्षिणा प्रदान करें. इसके बाद आठ ब्राह्मणों को भोजन कराएँ और उन्हें भी दक्षिणा दे, पुनः सावधान होकर जल से परिपूर्ण कलश ब्राह्मणों को प्रदान करें और उनसे आज्ञा लेकर अपने बंधुओं के साथ भोजन करें. हे ब्रह्मपुत्र ! इस प्रकार व्रत का उद्यापन – कृत्य करने पर वह बुद्धिमान मनुष्य उसी क्षण पाप रहित हो जाता है और पुत्र-पौत्र से युक्त तथा धन-धान्य से संपन्न होकर बहुत समय तक सुखों का उपभोग कर अंत में वैकुण्ठ प्राप्त करता है. || इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वरसनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “कृष्णजन्माष्टमी व्रत कथन” नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ || 🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚 ✍️ अध्याय - 24 ✍️ ✍️✍️✍️✍️✍️✍️ 🦚श्री कृष्णजन्माष्टमी व्रत के माहात्म्य 🦚 🎎 में राजा मितजित का आख्यान 🎎 ********************************** 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 ईश्वर बोले – हे ब्रह्मपुत्र ! पूर्वकल्प में दैत्यों के भार से अत्यंत पीड़ित हुई पृथ्वी बहुत व्याकुल तथा दीन होकर ब्रह्माजी की शरण में गई. उसके मुख से वृत्तांत सुनकर ब्रह्माजी ने देवताओं के साथ क्षीरसागर में विष्णु के पास जाकर स्तुतियों के द्वारा उनको प्रसन्न किया तब नारायण श्रीहरि सभी दिशाओं में प्रकट हुए और ब्रह्माजी के मुख से संपूर्ण वृत्तांत सुनकर बोले – हे देवताओं ! आप लोग डरें मत, मैं वसुदेव के द्वारा देवकी के गर्भ से अवतार लूँगा और पृथ्वी का संताप दूर करूँगा. सभी देवता लोग यादवों का रूप धारण करें – ऐसा कहकर भगवान् अंतर्ध्यान हो गए. समय आने पर वह देवकी के गर्भ से उत्पन्न हुए. वसुदेव ने कंस के भय से उन्हें गोकुल पहुंचा दिया और कंस का विनाश करने वाले उन कृष्ण का वहीँ पर पालन-पोषण हुआ. बाद में मथुरा में आकर उन्होंने अनुचरों सहित कंस का वध किया तब पुरवासियों ने आदरपूर्वक यह प्रार्थना की – हे कृष्ण ! हे कृष्ण ! हे महायोगिन ! हे भक्तों को अभय देने वाले ! हे देव ! हे शरणागत वत्सल ! हम शरणागतों की रक्षा कीजिए. हे देव ! हम आपसे कुछ निवेदन करते हैं, इसे आप कृपा करके हम लोगों को बताएं. आपके जन्मदिन के कृत्य कोई कहीं भी नहीं जानता. वह सब आपसे जानकर हम सभी लोग उस जन्मदिन पर वर्धापन नामक उत्सव मनाएंगे. अपने प्रति उनकी भक्ति, श्रद्धा तथा सौहार्द को देखकर श्रीकृष्ण ने अपने जन्मदिन के संपूर्ण कृत्य को उनसे कह दिया. उसे सुनकर उन पुरवासियों ने भी विधानपूर्वक उस व्रत को किया तब भगवान् ने प्रत्येक व्रतकर्ता को अनेक वर प्रदान किए. इस प्रसंग में एक प्राचीन इतिहास भी कहा जाता है – अंगदेश में उत्पन्न एक मितजित नामक राजा था. उसका पुत्र महासेन सत्यवादी था तथा सन्मार्ग पर चलने वाला था. सब कुछ जानने वाला वह राजा अपनी प्रजा को आनंदित करता हुआ उनका विधिवत पालन करता था. इस प्रकार रहते हुए उस राजा का अकस्मात दैवयोग से पाखंडियों के साथ बहुत कालपर्यंत साहचर्य हो गया और उनके संसर्ग से वह राजा अधर्मपरायण हो गया. वह राजा वेद, शास्त्र तथा पुराणों की बहुत निंदा करने लगा और वर्णाश्रम के धर्म के प्रति अत्यधिक द्वेष भाव से युक्त हो गया. हे मुनिश्रेष्ठ ! बहुत दिन व्यतीत होने के पश्चात काल की प्रेरणा से वह राजा मृत्यु को प्राप्त हुआ और यमदूतों के अधीन हो गया. यमदूतों के द्वारा पाश में बांधकर पीटते हुए यमराज के पास ले जाते हुए वह बहुत पीड़ित हुआ. दुष्टों की संगति के कारण उसे नरक में गिरा दिया गया और वहां बहुत समय तक उसने यातनाएँ प्राप्त की. यातनाओं को भोगकर अपने पाप के शेष भाग से वह पिशाच योनि को प्राप्त हुआ. भूख व प्यास से व्याकुल वह भ्रमण करता हुआ मारवाड़ देश में आकर किसी वैश्य के शरीर में प्रवेश करके रहने लगा. वह उसी के साथ पुण्यदायिनी मथुरापुरी चला गया. वहां पास के ही रक्षकों ने उस पिशाच को उसके गृह से निकाल दिया तब वह पिशाच वन में तथा ऋषियों के आश्रम में भ्रमण करने लगा. किसी समय दैवयोग से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन व्रत करने वाले मुनियों तथा द्विजों के द्वारा महापूजा तथा नामसंकीर्तन आदि के साथ रात्रि-जागरण किया जा रहा था, वहाँ पहुँचकर उसने विधिवत सब कुछ देखा और श्रीहरि की कथा का श्रवण किया. इससे वह उसी क्षण पापरहित, पवित्र तथा निर्मल मनवाला हो गया. वह यमदूतों से मुक्त हो गया और प्रेत योनि छोड़कर विमान में बैठ दिव्य भोगों से युक्त हो विष्णुलोक पहुँच गया. इस प्रकार इस व्रत के प्रभाव से पिशाच योनि को प्राप्त उस राजा को विष्णु का सान्निध्य प्राप्त हुआ. तत्त्वदर्शी मुनियों ने पुराणों में इस शाश्वत तथा सार्वलौकिक व्रत का पूर्ण रूप से वर्णन किया है. सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाले इस व्रत को करके मनुष्य सभी वांछित फल प्राप्त करता है. इस प्रकार जो कृष्णजन्माष्टमी के दिन इस शुभ व्रत को करता है, वह इस लोक में अनेक प्रकार के सुखों को भोगकर शुभ कामनाओं को प्राप्त करता है. हे ब्रह्मपुत्र ! वहाँ वैकुण्ठ में एक लाख वर्ष तक देव विमान में आसीन होकर नानाविध सुखों का उपभोग करके अवशिष्ट पुण्य के कारण इस लोक में आकर सभी ऐश्वर्यों से समृद्ध तथा सभी अशुभों से रहित होकर महाराजाओं के कुल में उत्पन्न होता है, वह कामदेव के सामान स्वरुप वाला होता है. जिस स्थान पर कृष्ण जन्मोत्सव की उत्सव विधि लिखी हो अथवा सभी सौंदर्य से युक्त श्रीकृष्ण जन्मसामग्री किसी दूसरे को अर्पित की गई हो अथवा उत्सवपूर्वक अनुष्ठित व्रतों से विश्वसृष्टा श्रीकृष्ण की पूजा की जाती हो वहाँ शत्रुओं का भय कभी नहीं होता है. उस स्थान पर मेघ व्यक्ति की इच्छा करने मात्र से वृष्टि करता है और प्राकृतिक आपदाओं से भी कोई भय नहीं होता. जिस घर में कोई देवकी पुत्र श्रीकृष्ण के चरित्र की पूजा करता है, वह घर सब प्रकार से समृद्ध रहता है और वहाँ भूत-प्रेत आदि बाधाओं का भय नहीं होता है. जो मनुष्य किसी के साथ में भी शांत होकर इस व्रतोत्सव का दर्शन कर लेता है वह भी पाप से मुक्त होकर श्रीहरि के धाम जाता है. || इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “जन्माष्टमीव्रत कथन” नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ || 🚩🔱 हर हर महादेव 🔱🚩 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪

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Raj Rani Bansal Aug 5, 2020

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