दीपावली का आगमन द्रिश्य - सरयु नदी, अयोद्धया ।

दीपावली का आगमन द्रिश्य - सरयु नदी, अयोद्धया ।
दीपावली का आगमन द्रिश्य - सरयु नदी, अयोद्धया ।
दीपावली का आगमन द्रिश्य - सरयु नदी, अयोद्धया ।
दीपावली का आगमन द्रिश्य - सरयु नदी, अयोद्धया ।

Banks of River Sarayu , Ayodhya on the occasion of Diwali 2017.
Devotees are ready to welcome the Lord.

Jai Shree Ram .

+137 प्रतिक्रिया 7 कॉमेंट्स • 127 शेयर
sn vyas Sep 19, 2020

🎿 🔔 🎿 🔔 🎿 🔔 🎿 🔔 🎿 🔔 *🙏🏻सादर वन्दे🙏* *🚩धर्म यात्रा🚩* *⛳आई माता मन्दिर, बिलाड़ा⛳* बिलाड़ा का प्राचीन नाम " बलिपुर " था ।इसकी स्थापना दानवीर असुर राजा बलि ने हज़ारों वर्षों पहले की । " वीणा " नामक नदी के किनारे बसे होने के कारण बिलाड़ा को " वीणातट नगर " के नाम से भी जाना जाता था। प्राचीन ग्रंथों एवं कथाओं के अनुसार एक बार राजा बलि ने संपूर्ण ब्रह्माण्ड को जीतने के लिए सौ यज्ञों का आयोजन करवाया।इनमें से सौ वाँ यज्ञ बलिपुर ( जिसे आज बिलाड़ा के रूप में जाना जाता हैं ) में आयोजित किया ।राजा बलि द्वारा किये गए यज्ञों के प्रमाण आज भी बिलाड़ा में अपभ्रंश के रूप में मौजूद हैं । बिलाड़ा , श्री आईमाताजी की पवित्र नगरी के रूप में संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध है ।आई माता का मंदिर बिलाड़ा के बीचो-बीच बडेर में स्थित है।नवदुर्गा अवतार श्री आई माताजी ने गुजरात के अम्बापुर में अवतार लिया। अम्बापुर में कई चमत्कारों के पश्चात श्री आई माताजी देशाटन करते हुए बिलाड़ा पधारे ।यहाँ पर उन्होंने भक्तों को सदैव सन्मार्ग पर चलने के सदुपदेश दिए । एक दिन उन्होंने हज़ारों भक्तों के समक्ष स्वयं को अखंड ज्योति में विलीन कर दिया । इसी अखंड ज्योति से केसर का प्रकट होना मंदिर में माताजी की उपस्थिति का साक्षात् प्रमाण है ।पाँच सदी से भी अधिक समय से प्रज्वलित हो रही केसर ज्योत ने हमेशा से लोगों को आकर्षित किया है। इस ज्योत के माध्यम से आई माता के दर्शन करने हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु बिलाड़ा पहुँचते है। इस ज्योत से निकलने वाले धुएं से काजल के स्थान पर केसर टपकती है।बिलाड़ा के आई माता मंदिर में वर्ष 1561 से लगातार ज्योत प्रज्वलित हो रही है।लोक मान्यता है कि इस ज्योत में आई माता विद्यमान है। इसके माध्यम से वे अपने श्रद्धालुओं को आशीर्वाद प्रदान करती है।घी का दीपक जलाने पर आमतौर पर , इससे काजल निकलता है और ऊपर का भाग काला हो जाता है।आईमाता के मंदिर में दीपक के ऊपर का भाग काला नजर नही आता।दीपक के ऊपर के भाग में पीलेपन का आभास होता है। इस कारण श्रद्धालु इसे केसर ज्योत कहकर इसके दर्शन करते है । आईमाता के मंदिर में प्रज्वलित दीपक की बाती साल में एक बार बदली जाती है।इस बाती को आई पंथ के धर्मगुरु अपने हाथ से बदलते है। उनके अलावा कोई इसे हाथ नहीं लगाता।बाती बदलने के समय भादवा बीज पर भव्य मेले का आयोजन किया जाता है।घर-घर से दूध लाकर घी बनाते है ।अखंड केसर ज्योत में डालने के लिए घी को बनाने का तरीका भी अलग ही है।इस दूध से ,भादवा की बीज के दिन ही बिलौना कर घी निकाला जाता है। यही घी केसर ज्योत में काम लिया जाता है। बिलाडा महल , जो आई माताजी के मंदिर के पास ही है। इसके अलावा बिलाड़ा में एक कल्पवृक्ष ,बाणगंगा , राजा बाली मंदिर ,दादा वाड़ी भी दर्शनीय हैं । बिलाड़ा , जोधपुर जिले में, नाडोल से 130 कि.मी. और पाली से 75 कि.मी.दूर है । 🎿 🔔 🎿 🔔 🎿 🔔 🎿 🔔 🎿 🔔

+10 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
sn vyas Sep 18, 2020

🌴🍇🌴🍇🌴🍇🌴🍇🌴🍇 *🙏 शुभ प्रभात🙏* *🚩धर्म यात्रा 🚩* *👌शीतला माता मन्दिर भाटुन्द 👌* *दैवीय चमत्कार - 50 लाख लीटर पानी से भी नहीं भरा शीतला माता के मंदिर में स्थित ये छोटा सा घडा़ , वैज्ञानिक भी भी हैरान ।* राजस्थान के पाली जिले के , बाली ब्लाक के " भाटुन्द " गाँव में , हर साल , सैकड़ों साल पुराना इतिहास और चमत्कार दोहराया जाता है।शीतला माता के मन्दिर में स्थित आधा फीट गहरा और इतना ही चौड़ा घड़ा श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ के लिए खोला जाता है । करीब 800 साल से लगातार साल में केवल दो बार ये घड़ा सामने लाया जाता है। अब तक इसमें 50 लाख लीटर से ज्यादा पानी भरा जा चुका है। इसको लेकर मान्यता है कि इसमें कितना भी पानी डाला जाए , ये कभी भरता नहीं है। ऐसी भी मान्यता है कि इसका पानी राक्षस पीता है , जिसके चलते ये पानी से कभी नहीं भर पाता है। दिलचस्प है कि वैज्ञानिक भी अब तक इसका कारण नहीं पता कर पाए हैं। ग्रामीणों के अनुसार करीब 800 साल से गाँव में यह परम्परा चल रही है। घड़े से पत्थर साल में दो बार हटाया जाता है। पहला शीतला सप्तमी पर और दूसरा ज्येष्ठ माह की पूनम पर। दोनों मौकों पर गाँव की महिलाएँ इसमें कलश भर-भरकर हज़ारो लीटर पानी डालती हैं , लेकिन आश्चर्य कि घड़ा नहीं भरता है । फिर अंत में पुजारी प्रचलित मान्यता के तहत माता के चरणों से लगाकर दूध का भोग चढ़ाता है तो घड़ा पूरा भर जाता है। दूध का भोग लगाकर इसे बन्द कर दिया जाता है। इन दोनों दिन गाँव में मेला भी लगता है। वैज्ञानिकों को भी नही पता कि कहाँ जाता है पानी , दिलचस्प है कि इस घड़े को लेकर वैज्ञानिक स्तर पर कई शोध हो चुके हैं ,मगर भरने वाला पानी कहाँ जाता है , यह कोई पता नहीं लगा पाया है। भाटुन्द में अनेक देवताओं के बड़े भव्य मंदिर हैं।कहा जाता है कि यह गाँव भुकंम्भ के कारण दो -- तीन बार उजड़ा (डटन) भी है। यह सदियों पुरानी ब्राहमणो की नगरी है। ब्राहमणो के आव्हान पर माँ शीतला माता साक्षात दर्शन देकर यहाँ विराजमान हुईं है। सदियों पुरानी एतिहासिक कहानी इस प्रकार है कि यहाँ पहाड़ी जंगलों में एक राक्षस रहता था। यह राक्षस किसी की शादी नहीं होने देता था , जब किसी की शादी होती , फैरे लेने के समय आ जाता था और वर (दुल्हे )को खा जाता था। इस कारण यहाँ कि लड़कियों से कोई शादी नहीं करता था। लड़कियों का ऐसा हाल देखकर ब्राहमणों ने शीतला माता की घोर तपस्या की , जब माँ ने प्रसन्न होकर दर्शन दिए और ब्राहमणो ने अपनी तकलीफ का वर्णन किया , माँ बोली अब आप लोग धूमधाम से शादी करो मैं आप लोगों की रक्षा करूँगी। इस प्रकार माँ का वचन सुनकर ब्राहमण लोग बहुत खुश हो गए। ब्राहमणो ने अपनी बच्चियों के विवाह की तैयारियाँ चालु की। फैरो के समय राक्षस आ गया , माँ शीतला ने अपने त्रिशूल से राक्षस का वध किया था। वध करते समय राक्षस ने माँ शीतला माता से पानी पीने व खाने की इच्छा प्रकट की , माँ ने राक्षस को वरदान दिया कि साल में दो बार तुझको पानी व खाने केलिए दिया जाएगा। जो हर साल चैत्र शुक्ल ७ को , वह ज्येष्ठ शुक्ल १५ को दिया जाता है। माँ शीतला माता के सामने एक शीतला माता कुण्ड (ऊखली) है जो आधा फिट गहरा है। पुरा गाँव इस ऊखली में घड़ो से पानी डालता है , लेकिन पानी किधर जाता है , इसका आज तक किसीको मालुम नहीं है। पुरा पानी राक्षस पिता है। ऐसा गाँव वालो का मानना है। एक बार सिरोही दरबार ने भी इस आधा फुट गहरी ऊखली को , दो कुओं का पानी लाकर भरने की निष्फल कोशिश की थी उसे माँ के प्रकोप का सामना करना पड़ा था।सिरोही दरबार के पूरे शरीर पर कोढ़ निकल गयी थे। माँ की आराधना करने से ही कोढ़ समाप्त हुई थी । नाडोल से 53 कि.मी. ,रणकपुर से 45 कि.मी. कुम्भलगढ़ से 77 कि.मी.दूर भाटुन्द है , यहाँ से पाली करीब 100 कि.मी की दूरी पर है । जय शीतला माता 🌴 🍇 🌴 🍇 🌴 🍇 🌴 🍇

+14 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 3 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB