PANDIT RAJ
PANDIT RAJ Sep 6, 2017

सत्यकाम जाबाल

सत्यकाम जाबाल

सत्यकाम जाबाल

प्राचीनकालमें उत्तरी हिन्दुस्थानमें जाबाला नामकी एक निर्धन दासी रहती थी । उसका सत्यकाम नामका एक पुत्र था । जाबाला दिनभर कडा परिश्रम कर अपना तथा अपने प्रिय पुत्रका पेट भरती थी । जबाला गरीब होते हुए भी बहुत प्रामाणिक थी । उसने अपने पुत्रको भी सदा सत्य बोलना सिखाया था । उसने उसका नाम भी सत्यकाम (सत्यमें रूचि रखनेवाला) रखा था । सत्यकामके अतिरिक्त जबालाका कोई नहीं था । सत्यकामको देखकर वह सबकुछ एक क्षणके लिए भूल जाती थी । उस समय पुत्रको शिक्षा प्राप्त कराने हेतु उसे दूर वनमें किसी ऋषिके पास भेजती थी । बालकको आठ वर्षकी अवस्थासे बीस वर्षकी अवस्थातक गुरुके पास रहना पडता था । वहांपर वह प्रत्येक कार्यमें प्रवीण बनता था ।

सत्यकाम आठ वर्षका होते ही अपनी मांसे बोला, `मां, अब मैं शिक्षा ग्रहण करने वन जा रहा हूं ।' सत्यकाममें शिक्षा प्राप्त करनेकी बहुत उमंग थी । जबाला सोचमें पड गई । छोटा-सा सत्यकाम इतना दूर कैसे रह पाएगा ! उसकी आंखोंके समक्ष घना वन दिखाई देने लगा तथा सत्यकामके बिना सूना-सूना लगनेवाला उसका घर भी दिखाई देने लगा ।

एक अन्य कल्पना मनमें आते ही उसके नेत्रोंमें अश्रु आ गए । वह एक दासी थी । वह ऊंची जाति अथवा कुलकी नहीं थी । उस कालमें उच्च कुलके बालक ही गुरुके पास शिक्षा ग्रहण करने जाते थे । उसे तो सत्यकामके पिताका नाम भी ज्ञात नहीं था । ऐसे बालकको कौन गुरु अपने निकट रखेंगे !

सत्यकामने पूछा, `मां, मैं गुरुजीके पास जा रहा हूं, तो वे मेरे गोत्रके विषयमें पूछेंगे न ? तब, मैं उन्हें क्या बताऊंगा ?'

जबला रोते हुए कहती है, `बेटा सत्यकाम, मैं युवा थी तब अनेक घरोंमें दासीके रूपमें काम करती थी । उसी समय तुम्हारा जन्म हुआ । तुम दासीपुत्र हो । तुम्हारे पिताका नाम भी मुझे ज्ञात नहीं है । मेरा नाम जबाला है, इसलिए तुम अपने गुरुसे अपना नाम, सत्यकाम जाबाल, इतना ही बताना ।'

सत्यकाम गुरुकी खोजमें वह वन-वन घूमता हुआ गौतम ऋषिके आश्रममें पहुंचा । उस समय गौतम ऋषिके पास अनेक राजपुत्र एवं ब्राह्मणकुमार शिक्षा लेने आए थे । सत्यकामने घबराते-सकुचाते आश्रममें प्रवेश किया । उस समय स्नान कर भस्म लगाए हुए एवं पीठपर लम्बे, खुले केश छोडकर बैठे अनेक तेजस्वी कुमार वेदपाठ कर रहे थे । गौतम ऋषि ध्यानमग्न बैठे थे । सत्यकाम डरते-डरते आगे बढा ।

एक दरिद्र लडका आश्रममें घुसकर सीधे गुरुजीके निकट जा रहा है, यह देखकर शिष्योंमें कुलबुलाहट होने लगी । `अरे, वह देखो एक शुद्र लडका आश्रमें पढने आया है !' ऐसे उपहासभरे शब्द भी सत्यकामके कानोंमें पडे । इतनेमें गौतम ऋषिने अपने नेत्र खोलकर सब ओर शान्तिने दृष्टि घुमाई । एक क्षणमें पूरे आश्रममें शान्ति छा गई ।

गौतम ऋषि कोमल स्वरमें बोले, `बालक, तुम्हें क्या चाहिए ?' सत्यकाम नीचे देखते हुए धीमें स्वरमें बोला, `भगवन्, मुझे आपसे शिक्षा लेना है ।'

गौतम ऋषि सराहते हुए बोले, ‘बालक, तुम्हारी सोच अच्छी है, परन्तु तुम्हारा गोत्र क्या है ?’ सत्यकाम शीश झुकाकर बोला, `भगवन्, मेरा नाम सत्यकाम और माताका नाम जबाला है । इसलिए, मैं सत्यकाम जाबाल हूं । इससे अधिक मुझे कुछ ज्ञात नहीं है ।'

यह सुनकर शिष्योंके मुखपर उपहासका भाव उभर आया । गौतम ऋषिने एक बार पुन: सब ओर दृष्टि घुमाई ।

गौतम ऋषिने कहा, `बालक सत्यकाम, तुमने सत्य कहा; इतना पर्याप्त है । यद्यपि तुम अपनेको दासीपुत्र कहते हो, तो भी मेरे विचारसे तुम्हें ब्राह्मणपुत्र होना चाहिए । जो सत्य कहता है, उसे मैं ब्राह्मण मानता हूं ।'

तदुपरान्त गौतम ऋषिने सत्यकामका उपनयन संस्कार किया । उसकी शिक्षा आरम्भ करनेसे पूर्व (अपनी पध्दतिके अनुसार) परीक्षा लेने हेतु उन्होंने उसे चारसौ गायें सौंपकर उन्हें चरानेके लिए वन जानेको कहा । ऐसे कामसे शिष्यकी बुदि्धका पता चलता था । वे गायें पूर्णतः दुर्बल थीं । शिष्योंने उनकी अच्छी देखभाल नहीं की होगी । उनका सारा ध्यान वेद रटनेमें लगा रहता होगा । सत्यकामने कहा, इन गायोंकी संख्या चार सौसे सहस्र होनेपर आश्रम लौटूंगा ।'

सत्यकाम वनमें अनेक वर्ष रहा । वह गायोंकी मनसे सेवा करता । एक दिन उसके समक्ष उसके झुण्डका एक बैल आया । उसके शरीरमें वायुदेव (हवा) ने प्रवेश किया, जिससे वह पूंछ उठाकर सींगसे भूमि खोदते हुए उछल-कूद करने लगा ।

वह बैल मनुष्यवाणीमें बोला, `सत्यकाम !'

सत्यकामने यह चमत्कार देखकर विनयपूर्वक कहा, `कहिए भगवन् !'

बैल बोला, `हमारी संख्या अब सहस्र हो गई है; अब हमें आचार्यजीके पास ले जाओ । उससे पूर्व मैं तुम्हें थोडा ज्ञान देता हूं । तुम्हारी सेवासे मैं सन्तुष्ट हुआ ।'

बैलके रूपमें प्रत्यक्ष वायुदेव ही बोल रहे थे । उन्होंने सत्यकामको ईश्वरीय ज्ञानके एक चौथा भागका उपदेश किया । वे बोले, `सत्यकाम, प्रकाशमान ये चारों दिशाएं ईश्वरकी ही अंश हैं । अब तुम्हें आगेका ज्ञान अगि्नदेवता देंगे ।' वायु सर्व दिशाओंमें घूमती है इसलिए, उसे यह ज्ञान है ।

वायुदेवताकी आज्ञानुसार अगले दिन सत्यकाम गायें लेकर आश्रमकी ओर निकला । मार्गमें सायंकाल हुई तब उसने गायोंको बांधा, अगि्न प्रज्वलित की एवं उसमें समिधा डालने लगा । अगि्न प्रसन्न हुई एवं बोली, `सत्यकाम, मैं तुम्हें ईश्वरीय ज्ञानका चौथा भाग बताती हूं ।’

सत्यकामने नम्रतासे कहा, `कहिए भगवन्'

अगि्नने कहा, `समुद्र, पृथ्वी, वायु और आकाश ईश्वरके अंश हैं । हन्स तुम्हें और/अधिक ज्ञान देगा ।' ‘अगि्न’, समुद्र एवं पृथ्वीपर घूमती है । आकाशमें भी सूर्यके रूपमें रहती है; इसलिए उसे यह ज्ञान ज्ञात था ।

अगले दिन सायंकाल सत्यकामने गायोंको बांधा, अगि्न प्रज्वलित की एवं उसमें समिधा डालने लगा । इतनेमें वहां एक हन्स उडता हुआ आया एवं बोला, `सत्यकाम, मैं तुम्हें ईश्वरीय ज्ञानका चौथा भाग बताता हूं ।' सत्यकाम बोला, `कहिए भगवन् !'

उसने कहा, `अगि्न, सूर्य, चन्द्र एवं बिजली ये सब ईश्वरके अंश हैं । बाकी ज्ञान तुम्हें पनडुब्बा पक्षी बताएगा ।' हंसके रूपमें तो प्रत्यक्ष सूर्य ही बोल रहे थे । सूर्य तो जैसे आकाशमें उडनेवाला एक सोनेका हंस ही है ।

दूसरे दिन सायंकालके समय सत्यकामने गायोंको बांधा, अगि्न प्रज्वलित की एवं वह उसमें समिधा डालने लगा । इतनेमें वहां एक पनडुब्बा पक्षी उडते हुए आया एवं बोला, `सत्यकाम, मैं तुम्हें ईश्वरीय ज्ञानका चौथा भाग बताता हूं ।' प्राणदेवताने ही इस पक्षीका रूप लिया था । सत्यकाम बोला, `आगे कहिए भगवन् !'

पनडुब्बा पक्षी बोला, `प्राण, आंखें, कान एवं मन ईश्वरके ही अंश हैं । प्रत्येक प्राणीमें ईश्वरका अंश होता है ।

इस प्रकार, सत्यकाम पूर्ण ज्ञानी होकर आश्रम पहुंचा । उसे दूरसे देखकर ही गौतम ऋषि सबकुछ समझ गए ।

गौतम ऋषि बोले, `सत्यकाम ! ईश्वरका ज्ञान प्राप्त कर तुम तेजस्वी दिखाई दे रहे हो । तुम्हें यह ज्ञान किसने दिया ?' सत्यकामके मुखपर ज्ञानका अपूर्व तेज झलक रहा था ।

सत्यकाम विनयपूर्वक बोला, `मनुष्यकी अपेक्षा अन्य प्राणियोंने ही मुझे ज्ञान दिया । परन्तु भगवन्, आपके मुखसे वह ज्ञान पुनः सुननेकी मेरी इच्छा है । मैंने सूना है कि गुरुमुखके अतिरिक्त अन्य स्थानसे प्राप्त सर्व विद्या व्यर्थ है ।'

सत्यकामको, सर्व चराचर सृष्टिमें भरे ईश्वरका ज्ञान गौतमऋषिने अपनी रसयुक्त वाणीमें पुनः समझाया । अन्य सर्व शिष्योंने लज्जासे शीश झुका दिए । इतने वर्ष वेद रटकर भी उन्हें इतना ज्ञान नहीं हुआ था । आगे चलकर यही सत्यकाम बहुत प्रसिद्ध ऋषि हुए एवं उनसे शिक्षा ग्रहणकर कई शिष्य ज्ञानी बने ।

(छांदोग्यउपनिषदकी सुप्रसिध्द कथापर आधारित)

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Pashupati Nath Singh Sep 6, 2017
कर्म को जीवन में धारण करने से ही मानव से देव का निर्मान होता है ।

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Mansing Sumaniya Mar 25, 2020

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AARYAM Mar 27, 2020

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Chandrashekhar Karwa Mar 27, 2020

श्रीरामचरित मानस  Serial No 437 (अयोध्याकाण्ड)    2/234/1  चौपाई / छंद / दोहा - मोरें सरन रामहि की पनही । राम सुस्वामि दोसु सब जनही ॥ व्यक्त भाव एवं प्रेरणा - श्री भरतलालजी श्री चित्रकूटजी में प्रभु श्री रामजी से मिलने के पूर्व विचार करने लगे कि क्या प्रभु उनके मिलने पर उन्हें त्याग देंगे या सेवक मानकर उन्हें अपना लेंगे । श्री भरतलालजी सोचने लगे कि प्रभु श्री रामजी तो अच्छे से भी अच्छे स्वामी है पर दोष तो उनके दास श्री भरतलालजी का ही है । फिर जो श्री भरतलालजी ने सोचा वह अद्भुत है । श्री भरतलालजी अपने मन में विचार करते हैं कि वे प्रभु श्री रामजी के श्री कमलचरणों की शरण के लायक तो शायद नहीं हैं पर प्रभु श्री रामजी के श्री कमलचरणों की पादुका की ही शरण उन्हें मिल जाये तो भी उनका कल्याण हो जायेगा । www.devotionalthoughts.in

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Chandrashekhar Karwa Mar 27, 2020

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Chandrashekhar Karwa Mar 27, 2020

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Chandrashekhar Karwa Mar 27, 2020

*भक्ति हमें जो प्रभु को प्रिय लगता है वह करने के लिए प्रेरित करती है । प्रभु के लिए नियम पालन करना भक्ति हमें सिखाती है । मन को सही मार्ग पर ले जाने का एक ही उपाय है, भक्ति, केवल भक्ति और केवल भक्ति ।* *कभी भी, कितने भी जन्म के बाद भी आखिर मिलना तो प्रभु से ही होगा क्योंकि वे ही हमारे मूल स्वरूप हैं । इसलिए बुद्धिमानी यही है कि इस मानव जन्म में ही ऐसा प्रयास किया जाये । यह सिद्धांत है कि सजातीय तत्व ही मिलता है । हम चेतन तत्व हैं और प्रभु चेतन हैं इसलिए हमारा मिलना प्रभु से ही हो सकता है । संसार जड़ है इसलिए हम कितना भी संसार से चिपके पर संसार से हम कभी भी मिल नहीं पायेंगे ।* प्रभु से जोड़ने वाले इस तरह के रोजाना सुबह व्हाट्सएप पर एक मैसेज पाने के लिए 9462308471 पर SHREE HARI लिखकर व्हाट्सएप करें www.bhaktivichar.in GOD GOD & only GOD जो प्रभु के चिंतन से दिन की शुरुआत करना चाहते हैं उन्हें यह फॉरवर्ड करें और ऐसे ग्रुपों में शेयर करें

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Mannish Sharma Mannu Mar 27, 2020

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Chandrashekhar Karwa Mar 26, 2020

श्रीरामचरित मानस Serial No 435 (अयोध्याकाण्ड)   2/231/दोहा  चौपाई / छंद / दोहा - भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ ॥ कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ ॥ व्यक्त भाव एवं प्रेरणा - जब श्री लक्ष्मणजी ने यह कहा कि राज्य का मद सबसे कठिन मद है तो प्रभु श्री रामजी ने श्री भरतलालजी के बचाव में जो कहा वह ध्यान देने योग्य है । प्रभु ने कहा कि श्री अयोध्याजी के राज्य की बात ही क्या है अगर श्री त्रिदेवजी श्री भरतलालजी को त्रिलोकी का राज्या भी दे देवें तो भी उन्हें राज्य मद नहीं हो सकता । प्रभु ने उपमा देते हुये कहा कि क्या खटाई की कुछ बूंदों से क्षीरसागर फट सकता है । जैसे यह कतई संभव नहीं वैसे ही श्री भरतलालजी को राज्य मद हो यह कतई संभव नहीं है । www.devotionalthoughts.in

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Chandrashekhar Karwa Mar 26, 2020

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