jagdish
jagdish Jul 6, 2017

॥ #महामृत्युंजय - एक आत्ममंथन ॥ -------------------------------------- ॥ॐ हौं ॐ जूं ॐ सः॥ ” ओउम् (ॐ)

#मंत्र
॥ #महामृत्युंजय - एक आत्ममंथन ॥
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॥ॐ हौं ॐ जूं ॐ सः॥
” ओउम् (ॐ)त्रयम्बकं यजामहे, सुगन्धिम् पुष्टिवर्धनं
उर्वारुकमिव बंधनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥”
अक्सर कहा जाता है ,मृत्यु से बचना है तो महामृत्युंजय जाप
कराओ | जो व्यक्ति मृत्यु के नजदीक होता है और भयभीत होता
हैं तो सोचते है कि महामृत्युंजय की जाप कराने या कराने से मृत्यु से
बच जाएंगे।

मृत्युंजय
अगर इसको अलग अलग करो तो मृत्यु और जय यानि मृत्यु पर
जीत!शास्त्र कहते है कि मन्त्र ऐसा है अगर कोई इसे एकाग्रता से
जपे या लीन हो जाए तो ये मन्त्र उसे शिवत्व का अनुभव करा देता
है जो जन्म मरण से मुक्त करने वाला है |

ओउम् -
उस परम सत्य का एक चिन्ह है ओउम् (ॐ)
ओउम् (ॐ)एक प्रणव है पर वास्तव में तो ये पूर्ण विराट सत्ता का
सूचक है | ओउम् साधना की शुरुआत है, ओउम् ही साधना का
विराम है | महर्षियों ने बताया ओउम् को जानने के लिये तुम आते हो,
बीच की सारी यात्रा तय करते हो चाहे वो वैराग है, त्याग है
षटसम्पति है चाहे प्रारब्ध पर विश्वास है ओउम् तत्व से शुरुआत है,
साधना – ओउम् तत्व का विचार है,
सिद्धि – ओउम् तत्व का अनुभव है “ओउम् मैं हो जाऊं”

त्रयम्बकं -
॥ त्रिनेत्रधारी ॥
* तीन नेत्र वाले भगवान शिव को जब प्रलय करनी होती है तब
तीसरा नेत्र खोलते हैं आप सबको पता है |
* जब काम देव भस्म करना था तब तीसरा नेत्र खोले थे।
* एक शिव पार्वती की कहानी आती है, पार्वती ने शिव की दोनों
आँखे बंद की तो सृष्टि में अँधेरा होने लगा तब भगवान ने तीसरे नेत्र
को खोले थे।
* तृतीय नेत्र से मतलब विवेक है जिसमे हमारी मनोमय
सृष्टि की प्रलय होती है | पहले मैं मेरे में, स्वार्थ, इच्छओं में,
कामनाओं में जी रहे थे | देवाधिदेव ने तीसरा नेत्र विवेक जगा कर
सारी सृष्टि लय की है | दिव्य दृष्टि जो देवाधिदेव और गुरुवों की कृपा
से मिलती है |

यजामहे-
हम वंदन करते है जब तक अपने स्वरूप में पहुंचते नहीं, आस्था
रखते है, आस्था रखकर भक्ति करते है, श्रद्धा रखते है | एक तरह
से वंदन करते हैं,"स्वयं को स्वयं से मिलाने की अनुरोध ""जीवात्मा
का शिवतत्व में विलय"
भक्त बार बार प्रार्थना करता है मैं वही तत्व स्वरूप हूँ तो फिर,
फिर मैं देह के बंधन में क्यों आ जाता हूँ |

सुगन्धिम्-
यहां सुगन्ध का तात्पर्य है पवित्रतापूर्ण चरित्र है जो विवेक से ही
प्राप्त होती है -:""पवित्राणाय साधुनाम्""
जो विवेकवान है वो ही पवित्र है |
शिवतत्व है वो संसार से छूटा हुआ है | जो ये शरीर है इसके
व्यवहार से वो आत्मतत्व बहुत अछूता है, जब शिव उस तत्व के
निश्चय में रहते है तो उनकी देह से भी वो निर्लेपता सिद्ध होती है |
शमशान की राख उन्होंने देह पर लगाई है | भीतर का वैराग भी
छलकता है इसलिए शिव को सुगंधिम् बोला गया |

पुष्टिवर्धनं
यानि सबका पालन पोषण करने वाला
पुष्टि – पालन,वर्धनम् – बढ़ना
पुष्टि -आधार का सूचक हुआ कि वो जो आत्म तत्व है वो सबका
आधार है | जड़ का, चेतन का, चौरासी लाख योनियों का, सबका
आधार है | सबका अपना विवेक जागेगा, सत्य की खुशबू जहां –
तहां से आने लगेगी | सुगन्धिम पुष्टिवर्धनम यानि सबका आधार,
सबका पालन करने वाला, अब देह की पालन नहीं पर जो पूरे
ब्रह्माण्ड में सत्ता व्याप्त है उस सत्ता की व्यापकता को बनाये
रखना ये होता है उसकी पुष्टि | अगर साधको के हिसाब से देखा
जाये तो हमारी साधना को पोषण मिलता है आत्म विचार से |
वर्धनम् -बढ़ना
हम सब इस साधना की राह पर चल रहे होते है तो रोज रोज
ग्रंथियां खुलती है तो अनुभव बढ़ता है | इस अनुभव को बढ़ाने
वाला और ग्रंथियों को खोलने वाला, जिसकी हम आराधना
कर रहे है, साधना कर रहे है वो भी वही शिवतत्व है जो धीरे
धीरे हमारे भीतर ग्रंथियां खोलता जा रहा है, अपना अनुभव देता
जा रहा है | ये है ओउम् की कृपा जो साधना की राह पर हमारी
पुष्टि भी करता है और वृद्धि भी करता है |

उर्वारुकमिव
इसका मतलब है जैसे एक बेल पर लगा फल पक कर डाल से छूट
जाता है जैसे सुबह आप उठते है घर के आंगन में आम का पेड़ है
आम गिरे हुए मिलते है | प्रार्थना की है कि जैसे एक पेड़ से लगा
हुआ फल पकते ही डाल से अलग हो जाता है, ईश्वर तू कोई ऐसी
कृपा कर मेरे अंदर परिपक्वता आ जाये, ऐसा मेरा निश्चय दृढ़ कर
दे कि मैं भी इतने सहज रूप से जन्म मृत्यु से छूट जाऊं और
अपने आनंद स्वरूप का अनुभव कर लूँ मतलब हमारा रिश्ता उस
शिवतत्व से कुछ ऐसा ही है और उसको अनुभव करने के लिये
समझो हम जगत रूपी बेल पर आ भी गये तो यहाँ एक डर है
जन्म – मरण का | उसके लिये बोलता है मेरे अंदर ऐसी परिपक्वता
आ जाये जैसे एक पेड़ से टुटा हुआ फल दुबारा नहीं जुड़ेगा मैं
ऐसी साधना को, निश्चय को प्राप्त हो जाऊं जहां पर मेरा भी
आवागमन समाप्त हो जाये |

बंधनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्
ये तीन शब्द इकट्ठे है
एक तो बंधन दूसरा मृत्यु तीसरा मोक्ष
मतलब हम उस शिवतत्व की आराधना इसलिए करते है कि
मृत्यु का या अज्ञान का जो बंधन है उससे मुक्त करे | जब अज्ञान
का बंधन है!जो जन्म लेने वाला हो तो उसमे मृत्यु का बंधन स्वयमेव
है इन तीन शब्दों में प्रार्थना कर दी गई कि भगवान तुम हमे इस
अज्ञान के बंधन से मुक्त करो |""मृत्योर्मा अमृतं गमय्""
यह अमृत की प्रार्थना है
ये अमृत यानि अमर तत्व, जब तक अमृत तत्व का निश्चय है,
भीतर जो आनंद की प्राप्ति है वही अमृत है वो अमर तत्व है
जो हमें जन्म – मरण के भय से मुक्त कर देता है, हमारे आवागमन
की कल्पना टूट जाती है हमारे मृत्यु का भय चला जाता है और
अपने स्वरूप की अमरता को जानकर आनंद स्वरूप हो जाते हैं।
फिर बोध होता है--सत्यम् शिवम् सुंदरम् ""
शिव ही सत्य है ,शिव ही सुन्दर हैऔर शिव ही कल्याणस्वरूप है,
जीवात्मा का उस ब्रह्म शिवतत्व से संविलय हो जाती है।
ना मै" रहता,ना "मेरा"रहता,और ना ही अपने अस्तित्व का अनुभव
ही रहता! सिर्फ एक देवाधिदेव ही रहते हैं।सम्पुर्ण जगत ही शिवमय
अनुभव में आने लगता है |
सारी दुनिया को लगता है कि मृत्युंजय जप करने से मृत्यु से
बच सकते हैं ,किन्तु बस इस मन्त्र को जपते जायेंगे तो शायद
यम नहीं आएगा पर ये बहुत बड़ा रहस्य है |
मृत्यु से बचना ,मृत्यु पर विजय नही,
मृत्युभय पर विजय प्राप्ती करना ,मृत्युंजय की साधना मृत्यु को
नही मृत्युभय को समाप्त करतीहै,जो कि अमरत्व है,तभी देवाधिदेव
को मृत्युंजय कहा गया है।
जिसने मृत्यु को समझा वही उस भय से मुक्त हो सकता है,उसी की
मृत्युंजय की साधना पूरी होगी | जो ब्रह्म ज्ञान के जिज्ञासु हैं वो एक
तरह से रोज मृत्युंजय जाप की तपस्या कर रहे है | जो आपका
अभ्यास चल रहा है वो मृत्युंजय जाप ही चल रहा है, मृत्युंजय
जाप यही है,उस देवाधिदेव महादेव की कृपा संपूर्ण जगत पर सदा
बनी रहे, इन्ही शुभेक्षाओं के सांथ -शिवोहम् सर्वोवर्यः
....................................

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कामेंट्स

Santosh Pal Jul 6, 2017
जय शिव शंकर हर हर भोले

white beauty Mar 27, 2020

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jatan kurveti Mar 27, 2020

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Amar jeet mishra Mar 27, 2020

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white beauty Mar 26, 2020

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white beauty Mar 26, 2020

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white beauty Mar 26, 2020

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white beauty Mar 26, 2020

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white beauty Mar 25, 2020

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white beauty Mar 25, 2020

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