💐जय श्री कृष्णा💐

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जितेन्द्र दुबे Nov 23, 2020
*🚩🌹🥀जय श्री मंगलमुर्ती गणेशाय नमः 🌺🌹💐🌺 शुभ प्रभात 🌹 राम राम जी 🚩मंदिर के सभी भाई बहनों को राम राम जी परब्रह्म परमात्मा आप सभी की मनोकामना पूर्ण करें 🙏 🚩🔱🚩प्रभु भक्तो को सादर प्रणाम 🙏 🚩🔱🚩🕉️ त्रयंबकम यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम उर्वारुकमिव बंधनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् 🌺ऊँ महाकालेश्वाराय नमः🌺 ऊँ सोमेश्वाराय नमः 🌺ऊँ ओमकारेश्वर नमः🌺 ऊँ रामेश्वाराय नमः🌹 ॐ राम रामाय नमः 🌹 ॐ हं हनुमते नमःॐ हं हनुमते नमः ॐ शं शनिश्चराय नमः 🌹ऊँ महाकालेश्वाराय नमः🚩ऊँ नमः शिवाय 🚩ऊँ राधेकृष्णचंद्राय नमः🚩 भगवान भोलेनाथ की कृपा दृष्टि आप सभी पर हमेशा बनी रहे आप का हर पल मंगलमय हो 🚩जय श्री राम 🚩हर हर महादेव🚩राम राम जी🚩💐💐शुभ प्रभात स्नेह वंदन💐🌺🌻 आंवला नवमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🥀🌻🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏

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*♦️💫भगवान श्रीकृष्ण 💫♦️* कृष्ण......यह शब्द, यह नाम सुनकर सबसे पहले मन में क्या आता है आपके? नटखट कन्हैया, बाल गोपाल, राधा जी के प्रेमी, गोपियों से रासलीला रचाते कृष्ण अथवा यशोदा मईया के नन्दलाल? कृष्ण शब्द सुनकर मन में प्यारे से कान्हा की, प्रेमी कान्हा की छवि का आना उचित है.....परन्तु सिर्फ "बाल छवि" और "प्रेमी छवि" का आना वास्तव में चिंता का विषय है। हम बाल छवि तो याद रखते हैं....परन्तु सिर्फ उनके माखन चुराने से, उनकी शरारतों की वजह से अथवा अनेकों प्रकार की लीलाओं की वजह से, परन्तु हम यह क्यों भूल जाते हैं कि उसी बाल्यकाल के दौरान कान्हा ने अनेकों असुरों के सीने पर चढ़कर उनका वध किया था, कालिया का मान मर्दन किया था, एक उंगली पर गोवर्धन उठा लिया था...और सबसे बड़ी बात, कि कंस का वध भी उन्होंने बाल्यकाल में ही किया था। हम प्रेमी कन्हैया को तो याद रखते हैं, परन्तु हम पराक्रमी कन्हैया को क्यों विस्मृत कर देते हैं? हम उन्हें माखनचोर, कान्हा, मनमोहन, चित्तचोर आदि तमाम नामों से पुकारते हैं, परन्तु चौसठ कलाओं में निपुण "योगेश्वर" के नाम को क्यों भूल जाते हैं? और चलिये यदि भूले भी नहीं, तो उस रूप में उनको क्यों नहीं पूजते आप? हमेशा वंशीधर और राधा के साथ वाले स्वरूप को ही क्यों पूजा जाता है? और यदि हम भी योगेश्वर को भूल जाएं.....तो भावी पीढियां तो सिर्फ "प्रेमी कृष्ण" की पूजा करती रह जाएंगी, प्रेम सीखती रह जाएँगी! प्रेमी कृष्ण बहुत ही मनोहर छवि है....ये सम्पूर्ण संसार प्रेम पर टिका हुआ है, अतएव श्री कृष्ण से प्रेम सीखना उचित है और आवश्यक भी....परन्तु सिर्फ प्रेम हमे जीवित नहीं रख सकता कलियुग में। कलियुग में जीवित रहने के लिये प्रेम से अधिक "पराक्रम" की आवश्यकता है। कान्हा की अपेक्षा, महाभारत के रण की कूटनीति सीखाने वाले "द्वारिकाधीश" से सीखने की गरज है। सीखने की गरज है उनसे....कि आपकी लक्ष्य प्राप्ति में , आपके विजय श्री के वरण में यदि कोई आपका ही स्नेही बाधक बनता है, तो भी आप सिर्फ अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करें। सीखने की आवश्यकता है उनसे, कि कैसे अनुचित को अनुचित ठहराया जाता है, फिर चाहे आपके विपक्ष में आपके अपने ही बन्धु बांधव क्यों न हों। सीखना चाहिये उनसे, कि जहां धर्म को ताक पर रखकर एक स्त्री का चीरहरण हो रहा हो , सर्वप्रथम सबकुछ छोड़ छाड़कर उसकी रक्षा करनी चाहिए। वही योगेश्वर, जिन्होंने गीता का अमर उपदेश दिया ,आज हम सभी उनको पूजते हैं , पर हममें से कम ही लोगों के पास गीता है। वही कृष्ण, जिन्हें शस्त्र उठाये बिना, अपनी बुद्धि के बल पर मात्र पांच की संख्या वाले पांडवों को महाभारत जैसे भीषण रण में विजय दिला दी....उनसे सिर्फ प्रेम नहीं, वो कूटनीति और बुद्धि भी सीखने की परम आवश्यकता है। वो आनन्द के देव हैं....हमेशा मुस्कुराते रहने वाले....अपने बाल्यकाल से लेकर अपने जीवन की हर एक अवस्था मे धीरे धीरे अपने प्रियजनों को खोने के बाद भी ,एक नई ऊर्जा के साथ आनन्दित रहने वाले और जीवन के हर आनन्द या विपत्ति में भी मन को शांत रखने वाले, एकचित्त रहने वाले....योगेश्वर से यह ढंग सीखना चाहिए। समस्या यदि दो दिन बाद आने को है, तो आज से ही चिंता क्यों?जबकि अभी तो दो दिन और तीन रातें आपके पास आनन्दित रहने के लिये शेष हैं। हर परिस्थिति में एक समान रहने का ढंग उनसे सीखना चाहिए। ये भी सीखना चाहिए कि भले ही रण में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा हो, परन्तु अनुचित होता देखने पर अथवा असत्य को जीतते देखकर अपनी प्रतिज्ञा तोड़ने में भी संकोच नहीं करना चाहिए। हमें उनका प्रेम स्वरूप जितना आनन्दित करता है ,उनका योद्धा स्वरूप भी उतना ही आकर्षित करना चाहिए, असल कृष्णभक्ति के यहीं मायने हैं। अन्यथा ये घोर चिंता का विषय है कि हम "कन्हैया ,किसको कहेगा तू मैया" और "तू ही तो मेरी जान है राधा" तो याद रखते हैं.....परन्तु दिनकर जी कि उन पंक्तियों को भूल जाते हैं, जो सृष्टि के कण कण में व्याप्त श्री कृष्ण के वास्तविक स्वरूप का निरूपण करती हैं...... "यह देख गगन मुझमें लय है, यह देख पवन मुझमें लय है, मुझमें लय है झनकार सकल, मुझमें लय है संसार सकल। अमरत्व फूलता है मुझमें, संहार झूलता है मुझमें। ‘उदयाचल मेरा दीप्त भाल, भूमंडल वक्षस्थल विशाल, भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं, मैनाक-मेरु पग मेरे हैं, दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर, सब हैं मेरे मुख के अन्दर। तथा.... ‘अम्बर में कुन्तल-जाल देख, पद के नीचे पाताल देख, मुट्ठी में तीनों काल देख, मेरा स्वरूप विकराल देख। सब जन्म मुझी से पाते हैं, फिर लौट मुझी में आते हैं। आज इन पंक्तियों को भुला दिया जाना, मुझे चिंताजनक लगता है। अतः आनन्दित रहिये.....लेकिन "योगेश्वर श्री कृष्ण" की सीखों को भी मत भूलिए। अपने नन्हे मुन्ने बालकों को आप कान्हा जरूर बनाइये और हाथ मे वंशी जरूर थमाइये,परन्तु उन्हें ऐसा संस्कार भी दीजिये कि एक दिन वंशी के स्थान पर वो "सुदर्शन चक्र" भी उठा सकें। Jay Shri Krishna 🙏🏻🌹

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AMIT KUMAR INDORIA Jan 25, 2021

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