ये है माथे पर तिलक लगाने का वैज्ञानिक महत्व ।।

ये है माथे पर तिलक लगाने का वैज्ञानिक महत्व ।।
ये है माथे पर तिलक लगाने का वैज्ञानिक महत्व ।।
ये है माथे पर तिलक लगाने का वैज्ञानिक महत्व ।।
ये है माथे पर तिलक लगाने का वैज्ञानिक महत्व ।।

ये है माथे पर तिलक लगाने का वैज्ञानिक महत्व

जानिए हिन्दू धर्म में तिलक लगाने का "वैज्ञानिक महत्व ?

शायद भारत के सिवा और कहीं भी मस्तक पर तिलक लगाने की प्रथा प्रचलित नहीं है। यह रिवाज अत्यंत प्राचीन है। माना जाता है कि मनुष्य के मस्तक के मध्य में विष्णु भगवान का निवास होता है, और तिलक ठीक इसी स्थान पर लगाया जाता है।

मनोविज्ञान की दृष्टि से भी तिलक लगाना उपयोगी माना गया है। माथा चेहरे का केंद्रीय भाग होता है, जहां सबकी नजर अटकती है। उसके मध्य में तिलक लगाकर, विशेषकर स्त्रियों में, देखने वाले की दृष्टि को बांधे रखने का प्रयत्न किया जाता है।

स्त्रियां लाल कुंकुम का तिलक लगाती हैं। यह भी बिना प्रयोजन नहीं है। लाल रंग ऊर्जा एवं स्फूर्ति का प्रतीक होता है। तिलक स्त्रियों के सौंदर्य में अभिवृद्धि करता है। तिलक लगाना देवी की आराधना से भी जुड़ा है। देवी की पूजा करने के बाद माथे पर तिलक लगाया जाता है। तिलक देवी के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।

तिलक का महत्व?

हिन्दु परम्परा में मस्तक पर तिलक लगाना शूभ माना जाता है इसे सात्विकता का प्रतीक माना जाता है विजयश्री प्राप्त करने के उद्देश्य रोली, हल्दी, चन्दन या फिर कुम्कुम का तिलक या कार्य की महत्ता को ध्यान में रखकर, इसी प्रकार शुभकामनाओं के रुप में हमारे तीर्थस्थानों पर, विभिन्न पर्वो-त्यौहारों, विशेष अतिथि आगमन पर आवाजाही के उद्देश्य से भी लगाया जाता है ।

मस्तिष्क के भ्रु-मध्य ललाट में जिस स्थान पर टीका या तिलक लगाया जाता है यह भाग आज्ञाचक्र है । शरीर शास्त्र के अनुसार पीनियल ग्रन्थि का स्थान होने की वजह से, जब पीनियल ग्रन्थि को उद्दीप्त किया जाता हैं, तो मस्तष्क के अन्दर एक तरह के प्रकाश की अनुभूति होती है ।

इसे प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है हमारे ऋषिगण इस बात को भलीभाँति जानते थे पीनियल ग्रन्थि के उद्दीपन से आज्ञाचक्र का उद्दीपन होगा । इसी वजह से धार्मिक कर्मकाण्ड, पूजा-उपासना व शूभकार्यो में टीका लगाने का प्रचलन से बार-बार उस के उद्दीपन से हमारे शरीर में स्थूल-सूक्ष्म अवयन जागृत हो सकें ।

इस आसान तरीके से सर्वसाधारण की रुचि धार्मिकता की ओर, आत्मिकता की ओर, तृतीय नेत्र जानकर इसके उन्मीलन की दिशा में किया गयचा प्रयास जिससे आज्ञाचक्र को नियमित उत्तेजना मिलती रहती है ।

तन्त्र शास्त्र के अनुसार माथे को इष्ट इष्ट देव का प्रतीक समझा जाता है हमारे इष्ट देव की स्मृति हमें सदैव बनी रहे इस तरह की धारणा क ध्यान में रखकर, ताकि मन में उस केन्द्रबिन्दु की स्मृति हो सकें ।

शरीर व्यापी चेतना शनैः शनैः आज्ञाचक्र पर एकत्रित होती रहे । चुँकि चेतना सारे शरीर में फैली रहती है । अतः इसे तिलक या टीके के माधअयम से आज्ञाचक्र पर एकत्रित कर, तीसरे नेत्र को जागृत करा सकें ताकि हम परामानसिक जगत में प्रवेश कर सकें।

तिलक का हमारे जीवन में कितना महत्व है शुभघटना से लेकर अन्य कई धार्मिक अनुष्ठानों, संस्कारों, युद्ध लडने जाने वाले को शुभकामनाँ के तौर पर तिलक लगाया जाता है वे प्रसंग जिन्हें हम हमारी स्मृति-पटल से हटाना नही चाहते इन शुशियों को मस्तिष्क में स्थआई तौर पर रखने, शुभ-प्रसंगों इत्यादि के लिए तिलक लगाया जाता है हमारे जीवन में तिलक का बडा महत्व है तत्वदर्शन व विज्ञान भी इसके प्रचलन को शिक्षा को बढाने व हमारे हमारे जीवन सरल व सार्थकता उतारने के जरुरत है ?।

तिलक हिंदू संस्कृति में एक पहचान चिन्ह का काम करता है। तिलक केवल धार्मिक मान्यता नहीं है बल्कि कई वैज्ञानिक कारण भी हैं इसके पीछे। तिलक केवल एक तरह से नहीं लगाया जाता। हिंदू धर्म में जितने संतों के मत हैं, जितने पंथ है, संप्रदाय हैं उन सबके अपने अलग-अलग तिलक होते हैं।

आइए जानते हैं कितनी तरह के होते हैं तिलक–

सनातन धर्म में शैव, शाक्त, वैष्णव और अन्य मतों के अलग-अलग तिलक होते हैं। शैव- शैव परंपरा में ललाट पर चंदन की आड़ी रेखा या त्रिपुंड लगाया जाता है। शाक्त- शाक्त सिंदूर का तिलक लगाते हैं। सिंदूर उग्रता का प्रतीक है। यह साधक की शक्ति या तेज बढ़ाने में सहायक माना जाता है। वैष्णव- वैष्णव परंपरा में चौंसठ प्रकार के तिलक बताए गए हैं।

इनमें प्रमुख हैं- लालश्री तिलक-इसमें आसपास चंदन की व बीच में कुंकुम या हल्दी की खड़ी रेखा बनी होती है। विष्णुस्वामी तिलक- यह तिलक माथे पर दो चौड़ी खड़ी रेखाओं से बनता है। यह तिलक संकरा होते हुए भोहों के बीच तक आता है। रामानंद तिलक- विष्णुस्वामी तिलक के बीच में कुंकुम से खड़ी रेखा देने से रामानंदी तिलक बनता है।

श्यामश्री तिलक- इसे कृष्ण उपासक वैष्णव लगाते हैं। इसमें आसपास गोपीचंदन की तथा बीच में काले रंग की मोटी खड़ी रेखा होती है। अन्य तिलक- गाणपत्य, तांत्रिक, कापालिक आदि के भिन्न तिलक होते हैं। साधु व संन्यासी भस्म का तिलक लगाते हैं।

तिलक धारण- प्रकार?

गङ्गा, मृत्तिका या गोपी-चन्दन से ऊर्ध्वपुण्ड्र, भस्म से त्रिपुण्ड्र और श्रीखण्ड चन्दन से दोनो प्रकार का तिलक कर सकते है । किंतु उत्सवकी रात्रि में सर्वाङ्ग में चन्दन लगाना चाहिये ।

भस्मादि-तिलक-विधि

तिलक के बिना सत्कर्म सफल नही हो पाते । तिलक बैठकर लगाना चाहिये । अपने-अपने आचार के अनुसार मिट्टी, चन्दन और भस्म- इनमे से किसी के द्वारा तिलक लगाना चाहिये । किंतु भगवान पर चढ़ाने से बचे हुए चन्दन को ही लगाना चाहिये ।

अपने लिये न घिसें । अँगूठे से नीचे से ऊपर की ओर ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाकर तब त्रिपुण्ड्र लगाना चाहिये । दोपहर से पहले जल मिला कर भस्म लगाना चाहिये । दोपहर के बाद जल न मिलावे । मध्याह्न मे चन्दन मिलाकर और शाम को सूखा ही भस्म लगाना चाहिये । जल से भी तिलक लगाया जाता है ।

अँगूठे से ऊर्ध्वपुण्ड्र करने के बाद मध्यमा और अनामिका से बायी ओर से प्रारम्भ कर दाहिनी ओर भस्म लगावे । इसके बाद अँगूठे से दाहिनी ओर से प्रारम्भ कर बायी ओर लगावे। इस प्रकार तीन रेखाएँ खिंच जाती है।

तीनों अँगुलियों के मध्यका स्थान रिक्त रखे । नेत्र रेखाओं कि सीमा है, अर्थात बाये नेत्र से दाहिने नेत्र तक ही भस्म की रेखाएँ हो । इससे अधिक लम्बी और छोटी होना भी हानिकर है । इस प्रकार रेखाओं की लम्बाई छः अंगुल होती है ।

भस्म लगाने से पहले भस्म को अभिमन्त्रित कर लेना चाहिये । भस्म को बायी हथेली पर रखकर जलादि मिलाकर निम्नलिखित मन्त्र पढ़े –

ॐ अग्निरिति भस्म । ॐ वायुरिति भस्म । ॐ जलमिति भस्म । ॐ स्थलमिति भस्म । ॐ व्योमेति भस्म । ॐ सर्वं ह वा इदं भस्म । ॐ मन एतानि चक्षूंषि भस्मानीति ।
(क) भस्म का अभिमन्त्रण
ॐ यद्देवेषु त्र्यायुषमिति भुजायाम् ।
ॐ तन्नो अस्तु त्र्यायुषमित ह्रदये ।
ख) भस्म लगाने का मन्त्र –

‘ॐ नमः शिवाय’
मन्त्र बोलते हुए ललाट, ग्रीवा, भुजाओं और ह्रदय में भस्म लगाये, अथवा निम्नलिखित भिन्न-भिन मन्त्र बोलते हुए भिन्न-भिन्न स्थानोंमे भस्म लगाये –
ॐ त्र्यायुषं जमदग्नोरिति ललाटे ।
ॐ कश्यपस्य त्र्यायुषमिति ग्रीवायाम् ।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार कालपुरूष की गणना प्रथम राशि मेष से की गई है। महर्षि पराशर के सिद्धांत के अनुसार कालपुरूष के मस्तक वाले स्थान में मेष राशि स्थित है।

जिसका स्वामी मंगल ग्रह सिंदूरी लाल रंग का अधिष्ठाता है। सिंदूरी लाल रंग राशि पथ की मेष राशि का ही रंग है। इसीलिए इस रंग (लाल रोली या सिंदूर) का तिलक मेष राशि वाले स्थान (मस्तक) पर लगाया जाता है। तिलक लगाने में सहायक हाथ की अंगुलियों का भी भिन्न-भिन्न महत्व बताया है।

तिलक धारण करने में अनामिका अंगुली शांति प्रदान करती है। मघ्यमा अंगुली मनुष्य की आयु वृद्धि करती है।

अंगूठा प्रभाव और ख्याति तथा आरोग्य प्रदान कराता है। इसीलिए राजतिलक अथवा विजय तिलक अंगूठे से ही करने की परंपरा रही है। तर्जनी मोक्ष देने वाली अंगुली है।

सामुद्रिकशास्त्र के अनुसार भी अनामिका तथा अंगूठा तिलक करने में सदा शुभ माने गए हैं। अनामिका सूर्य पर्वत की अधिष्ठाता अंगुली है।

यह अंगुली सूर्य का प्रतिनिधित्व करती है, जिसका तात्पर्य यही है कि सूर्य के समान, दृढ़ता, तेजस्व, प्रभाव, सम्मान, सूर्य जैसी निष्ठा-प्रतिष्ठा बनी रहे। दूसरा अंगूठा है जो हाथ में शुक्र क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है। शुक्र ग्रह जीवन शक्ति का प्रतीक है।

संजीवनी विद्या का प्रणेता तथा जीवन में सौम्यता, सुख-साधन तथा काम-शक्ति देने वाला शुक्र ही संसार का रचयिता है।

यदि हम आँखे बंद करके बैठ जाएँ और कोई व्यक्ति हमारे भ्रू-मध्य के एकदम निकट ललाट की ओर तर्जनी उँगली ले जाए । तो वहाँ हमें कुछ विचित्र अनुभव होगा । यही तृतीय नेत्र की प्रतीति है। इस संवेदना को हम अपनी ऊँगली भृकुटि-मध्य लाकर भी अनुभव कर सकता है।

इसलिए इस केन्द्र पर जब तिलक अथवा टीका लगाया जाता है, तो उससे आज्ञाचक्र को नियमित रुप से उत्तेजना मिलती रहती है। इससे सजग रुप में हम भले ही उससे जागरण के प्रति अनभिज्ञ रहें, पर अनावरण का वह क्रम हनवरत चलता रहता है। तिलक का तत्वदर्शन अपने आप में अनेंको प्रेरणाएँ सँजोएं हुए है।

तिलक या त्रिपुंड प्रायः चंदन का होता है। चंदन की प्रकृति शीतल होती है। शीतल चंदन जब मस्तक पर लगाया जाता है, तो उसके पीछे भाव यह होता है कि चिंतन का जो केंद्रिय संस्थान मस्तिष्क के रुप में खोपड़ी के अंदर विराजमान है, वह हमेशा शीतल बना रहे, उसके विचार और भाव इतने श्रेष्ठ हों जि अपनी तरह औंरो को भी शीतलता, शांति और प्रसन्नता प्रदान करता रहे।

तिलक का महत्व जनजीवन में इतना अधिक है कि जब कोई महत्वपूर्ण, सम्मानसूचक, प्रसन्नदायक घतना घटती है, तो माथे पर तिलक लगा दिया जाता है। विवाह हो रहा हो तो तिलक, कोई युद्ध पर जा रहा हो तो तिलक हो। कोई युद्ध से विजयी होकर लौट रहा हो तो तिलक हो अर्थात् कोई भी सुखमय घटना हो, उसके साथ तिलक का अविच्छिन संबंध जोड़ दिया जाता है। ऐसा इसलिए कि वह आमनद चिरस्मरणीय बना रहे। विवाहित स्त्रियाँ माँग में सिंदूर और माथे पर बिंदी लगाती है।

बिंदी टीके का रुप है, वैसे ही माँग का सिंदूर तिलक का प्रतिक है। किंतु यहाँ इन्हे परिणीता के सुहाग के साथ जोड़ा दिया गया है। यह अक्षत सुहाग के चिन्ह हैं। इनमें समर्पण और निष्ठा का भाव पूर्णरुपेण पति की ओर है। वह उसकी समर्पिता है।

अब उसके नारित्व पर कोई बाधा नहीं पड़ेगी, इसलिए पत्नी को पति के जीवन रहने तक इन्हे धारण करना पड़ता है। तिलक द्रव्य के रुप में भीन्न-भीन्न प्रकार की वस्तो्ओं का प्रयोग किया जाता है। श्वेत और रक्त चंदन भक्ति के प्रतिक हैं। इनका इस्तेमाल भजनानंदी किस्म के लोग करते है। केशर एवं गोरोचन ज्ञान तथा वैराज्ञ्य के प्रतिक है।

ज्ञानी तत्वचिंतक और विरक्त ह्रदय वाले लोग इसका प्रयोग करते है। कस्तूरी ज्ञान, वैराज्ञ्य, भक्ति, प्रेम, सौंदर्य, ऐश्वर्य सभी का प्रतीक है ।

मार्कण्डेय पुराण के ‘स्त्रिय समस्ता सकला जगत्सु’ के अनुसार नारी समाज शक्ति रूपा है।

नारी समाज के सौभाग्य में लाल वर्ण की प्रधानता का यही कारण और मस्तक पर लाल वर्ण के रूप में हम मातृशक्ति धारण करने की कामना करते हैं।

यही कारण है कि ज्यादातर सांस्कृतिक तिलक महिलाएं ही पुरूषों के भाल पर करती है। चाहे वह बहिन, पत्नी या माँ किसी भी रूप में हो।

मानस की पंक्तियाँ : चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीड़ , तुलसीदास चंदन घिसें ,तिलक देत रघुबीर . तिलक परम्परा का अनुमोदन करतीं हैं .आज भी फौजी जब शत्रु से मोर्चे के लिए घर से विदा लेता है, तो माँ बहिन पत्नी उसको तिलक लगातीं हैं ,यात्रा पर जाने से पूर्व तिलक लगाने को शुभ माना जाता है।

इस प्रकार तिलक या टीका एक धार्मिक प्रतीत होते हुए भी उसमें विज्ञान और दर्शन का साथ-साथ समावेश है। इनको समझ सकें और उनकी शिक्षाओं को आत्त्मसात् कर सकें तो ही उसकी सार्थकता है।

ये है माथे पर तिलक लगाने का वैज्ञानिक महत्व ।।

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कामेंट्स

Kanhiya Singh Kanhiya Singh Sep 9, 2017
आपका तिलक का महत्व अच्‍छा है। इसमें विस्तार की जरूरत है। धन्यवाद।

TR Madhavan Sep 9, 2017
@pari (Jaipur) मैंने अबतक जित्ने भी पोस्ट कियें हैं वक्त मिला थो पडिए और आफ कि राय जरूर पोस्ट करिये, धन्यवाद ।

TR Madhavan Sep 10, 2017
सभी को मेरा धन्यवाद ।

Neha Sharma, Haryana Jan 22, 2020

जय श्री राधेकृष्णा शुभ प्रभात वंदन *कुएँ का गिरगिट अर्थात राजा नृग की कथा:* श्रीकृष्ण उन दिनों अपनी राजधानी द्वारका पुरी में ही रह रहे थे। जरासंध के उत्पातों से तंग आकर उन्होंने वहाँ से दूर पश्चिमी समुद्र के पास द्वारका में अपनी राजधानी बनाई थी। यह राजधानी अत्यन्त सुंदर थी। इसमें ऊँचे-ऊँचे महल और अट्टालिकाएँ थीं। ऊँचे शिखरों और लहराते ध्वजों वाले मन्दिर थे। सुन्दर और आकर्षक वस्तुओं से पटे बड़े-बड़े बाजार थे। इसकी सड़कें चौड़ी और चिकनी थीं। इन पर दोनों शाम सुगन्धित जल का छिड़काव होता था। बाजार में सुन्दर-सुन्दर सरोवर और जलाशय थे जिनकी सीढ़ियाँ सफेद संगमरमर की बनी हुई थीं। इन तालाबों में सदा जल भरा रहता था जिसमें कमल, कुमुदनी आदि विविधरंगी और सुगन्धपूरित पुष्प खिले रहते थे। फूलों पर भौरे मंडराते रहते थे, जिसके फलस्वरूप कोई उनके पास जाकर उन्हें तोड़ने का प्रयास नहीं करता था। इन जलाशयों में विविध मछलियाँ अठखेलियाँ करती थीं, जिसके फलस्वरूप इन सरोवरों की शोभा निराली हो उठती थी। नगर के भीतर ऐसी शोभा थी तो बाहर भी वह कुछ कम नहीं थी। नगर के किनारे-किनारे बड़े-बड़े और मन मोहक उपवन लगे थे। कुछ में सभी ऋतुओं में फल देने वाले फलदार वृक्ष लगे थे तो कुछ में सभी प्रकार के गन्ध-पूरित फूल। उन फूलों में सभी थे-गुलाब, जूही चमेली बेला, रातरानी कनैल, अड़हुल, गेंदा, गन्धराज आदि। इन सुन्दर उपवनों में नगरवासी प्रायः भ्रमण-हेतु आते ही रहते थे शुद्ध वायु के लिए उपवनों से अच्छा स्थान नहीं हो सकता था। एक दिन श्रीकृष्ण-पुत्र प्रद्युम्न अपने कुछ साथियों के साथ जैसे चारुभानु, गद और साम्ब आदि के साथ उपवन के परिभ्रमण को आए। वह देर तक इधर-उधर घूमते फूलों की शोभा निहारते रहे और उनकी गन्ध से अपने को तृप्त करते रहे। घूमते-घूमते उन्हें प्यास लग आई। वे प्यास बुझाने के लिए पानी ढूँढ़ते रहे पर दुर्भाग्यवश पानी उन्हें कहीं नहीं मिला। नगर के अन्दर तो कई सरोवर थे पर नई बस रही राजधानी के उपवनों में अभी तक जलाशय की व्यवस्था करने की बात किसी के ध्यान में नहीं आई थी। श्रीकृष्ण-पुत्र प्रद्युम्न ने सोचा, वह पिता से कहकर इन उपवनों में सुन्दर स्वच्छ जलाशयों का निर्माण कराएँगे जिससे आगे चलकर किसी को पेयजल के संकट का सामना नहीं करना पड़े। पर यह तो भविष्य की बात थी। अभी जो सभी पिपासा से पीड़ित हो रहे थे, उसका क्या उपाय था। घूमते-घूमते वे एक कुएँ के पास पहुँचे। उन्हें कुएँ को देखकर बहुत प्रसन्नता हुई। प्यास से व्याकुल उन लोगों ने सोचा कि उनकी प्यास अब शान्त होकर रहेगी। वे कुएँ के पास गये और उसके भीतर झाँका तो उनकी सारी आशा निराशा में परिवर्तित हो गई। कुएँ में एक बूँद जल नहीं था। पता नहीं वह कब से सूखा पड़ा था किन्तु उसमें एक विचित्र जीव को देख कर उनके आश्चर्य की सीमा नहीं रही। उसमें एक बहुत बड़ा गिरगिट पड़ा था। कुआँ काफी लम्बा-चौड़ा और गहरा था। गिरगिट का आकार किसी पर्वत की तरह लग रहा था। कुछ देर तक तो इन लोगों ने गिरगिट को कौतूहल पूर्वक देखा किन्तु शीघ्र ही उसकी छटपटाहट से द्रवित हो गये। वह कुएँ से निकलने को बेचैन था किन्तु लाख प्रयासों के बाद भी वह उससे बाहर नहीं निकल पा रहा था। वह कुएँ की दीवार पर, शक्ति लगाकर चढ़ने का प्रयास करता किन्तु थोड़ा ऊपर जाने के बाद ही फिसल कर गिर पड़ता। वह बारी-बारी से कुएँ के चारों दीवारों पर चढ़ने का प्रयास करता किन्तु थोड़ा ऊपर जाने के बाद ही फिसलकर गिर पड़ता। इन लोगों को उसके कष्ट के निवारण का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। दीवारों से फिसलने और गिरने के कारण उसका शरीर लहूलुहान हो रहा था। दर्शकों को इन पर बहुत दया आई। उन्होंने पेड़ की डालियों और रस्सियों के सहारे उसको निकालने का प्रयास किया किन्तु इस पर्वताकार गिरगिट को निकालना आसान नहीं था। कोई भी रस्सी या पेड़ की डाली उसके भार को सहन नहीं कर पाती और टूट जाती। वे निराश हो गए और उन्होंने मन ही मन भगवान कृष्ण को स्मरण किया। वह तत्काल उस कुएँ के पास पहुँच गए। जिसमें वह गिरगिट गिरा पड़ा था। दर्शकों ने उन्हें बताया कि इस दुःखी जीव को निकालने का उन्होंने बहुत प्रयास किया परन्तु वे उसे निकालने में सफल नहीं हो सके। उसके दुःख से सभी दुःखी हैं। उन्होंने आगे कहा, *"पता नहीं कब से भूख-प्यास से पीड़ित इस अन्धे कुएँ में पड़ा है। आप सर्व-शक्तिमान हैं। कृपाकर इस निरीह प्राणी को इस अन्धकूप से निकालिए।"* भगवान श्रीकृष्ण के लिए यह कौन-सी बड़ी बात थी ? उन्होंने बाएँ हाथ से ही उस विशाल गिरगिट को कुएँ से बाहर निकाल दिया। निकलते ही वह गिरगिट गिरगिट नहीं रहा। एक प्रकाशवान पुरुष के रूप में वह परिवर्तित हो गया। उसके सिर पर मुकुट और शेष शरीर पर बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण शोभा पा रहे थे। उसका रंग इतना गोरा था कि लगता था कि वह कच्चे सोने से बना है। इस तेजोमय पुरुष को देखकर भगवान श्रीकृष्ण सब कुछ समझ गए किन्तु अन्य लोगों की जानकारी के लिए उन्होंने उससे पूछा *"आप देखने से ही कोई देवपुरुष लगते हैं। आपको गिरगिट की योनि में जन्म लेकर इतना कष्ट क्यों सहना पड़ा ? निश्चित ही आप पूर्व जन्म में कोई पराक्रमी राजा-महराजा थे।"* उस पुरुष ने श्रीकृष्ण को प्रणाम करते हुए कहा, *"आपका सोचना एकदम ठीक है। आप कोई अन्तर्यामी हैं ? आप से क्या छिपा है फिर भी आप पूछते हैं तो बताना ही पड़ेगा। क्योंकि आपकी मुझ पर अपार कृपा है। आपके दर्शन-मात्र से बिना कोई यज्ञ जाप या तपस्या किए गिरगिट की योनि से मेरा उद्धार हो गया।"* *"मैं पहले नृग नामक राजा था। मेरे पास अपार सम्पत्ति थी। मैं उसे अपने भोग-विलास में नहीं लगाकर दूसरों के मध्य उनके दान में लगा रहता था। दान लेने वालों की मेरे यहां भीड़ लगी रहती थी। विशेषकर ब्राह्मणों की।"* *"मैंने कई दुधारी गायों को बछड़ों के साथ ब्राह्मणों को दान दिया। दान देने के पूर्व मैं गायों के सींगों को सोने से मढ़वाना नहीं भूलता था।"* *"उनके खुरों में चाँदी मढ़वाता था तथा उन्हें रेशमी वस्त्र, स्वर्णनिर्मित हार और अन्य आभूषणों से सजाकर ही दान करता था। भगवान ! मेरी दानशीलता प्रसिद्ध थी। मैंने गायें ही नहीं, भूमि, सोना, घर, घोड़े, हाथी, तिलों के पर्वत, चाँदी, शय्या, वस्त्र, रत्न आदि दान किए। अनेक यज्ञों का अनुष्ठान किया। बहुत से कुएँ जलाशय आदि बनवाए।"* भगवान कृष्ण ने पूछा, *"इतना सब करने के बाद भी आपको यह निकृष्ट गिरगिट योनि क्यों प्राप्त हुई ?"* राजा नृग ने कहा *"भगवान ने ठीक ही पूछा। एक अनजानी गलती से मेरी यह दुर्दशा हुई। एक दिन ऐसे तपस्वी ब्राह्मण की गाय, जो कभी दान नहीं लेता था मेरी गायों के झुण्ड में आ मिली। मुझे इसका कोई पता नहीं था। मैंने अन्य गायों की तरह उसे भी सजा-सँवार कर किसी अन्य ब्राह्मण को दान में दे दिया।"* *"जब वह ब्राह्मण इस सजी-सजाई गाय को लेकर चला तो गाय के वास्तविक मालिक से उसकी मुलाकात हो गई।"* *"उसने कहा, ‘यह गाय मेरी है तुम कहाँ लिये जा रहे हो ? इसको सजाने-सँवारने से मैं इसको पहचानने में भूल नहीं सकता।’"* *"दान लिए ब्राह्मण ने कहा, ‘गाय तुम्हारी नहीं मेरी है क्योंकि राजा नृग ने मुझे इसे दान में दिया है। वे दोनों ब्राह्मण आपस में झगड़ते हुए मेरे समीप पहुँचे। एक ने कहा—‘यह गाय मुझे अभी-अभी दान में दी गई है।’ दूसरे ने कहा, ‘यदि ऐसी बात है तो राजा द्वारा मेरी गाय चुरा ली गई है।"* *मैंने दोनों ब्राह्मणों से अनुनय-विनय की और कहा, ‘मैं लाख उच्चकोटि की गाय दूँगा। आप लोग यह गाय मुझे वापिस कर दीजिए।"* *"गाय के वास्तविक मालिक ने कहा, ‘मैं अपनी गाय के बदले कुछ नहीं लूँगा और वह चला गया।"* *"दूसरे ने कहा, ‘एक लाख क्या कई लाख गाएँ भी मुझे दीजिए तो भी मैं लेने को तैयार नहीं।’ और दूसरा ब्राह्मण भी चला गया।"* *"कालक्रम से मेरी मृत्यु हुई। मैं यमलोक पहुँचा।’ यमराज ने पूछा, ‘आप ने बहुत पुण्य कार्य किए हैं किन्तु एक छोटा-सा पाप भी आपसे हुआ है। भले ही अनजाने में हुआ हो। आप बताइए कि आप पहले अपने पाप का फल भोगेंगे अथवा पुण्य का ?"* *‘‘मैंने कहा, ‘पहले पाप का ही भोग लेता हूँ।’ मेरे कहते ही मैं विशाल गिरगिट बन कर धरती पर आ गिरा। यही मेरी कहानी है"* शुभ प्रभात। आज का दिन आपके लिए शुभ एवं मंगलमय हो।

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kamlesh sharma Jan 22, 2020

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Udit Sagar Jan 22, 2020

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Neha Sharma, Haryana Jan 21, 2020

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*“खरी कमाई”* 🙏🏻🚩🌹 👁❗👁 🌹🚩🙏🏻 एक बड़े सदाचारी और विद्वान ब्राह्मण थे| उनके घर में प्रायः रोटी-कपड़े की तंगी रहती थी| साधारण निर्वाहमात्र होता था| वहाँ के राजा बड़े धर्मात्मा थे| ब्राह्मणी ने अपने पति से कई बार कहा कि आप एक बार तो राजा से मिल आओ, पर ब्राह्मण कहते हैं कि वहाँ जाने के लिए मेरा मन नहीं कहता| वहाँ जाकर आप माँगो कुछ नहीं, केवल एक बार जाकर आ जाओ| पत्नी ने ज्यादा कहा तो स्त्री की प्रसन्नता के लिए वे राजा के पास चले गये| राजा ने उनको बड़े त्याग से रहने वाले गृहस्थ ब्राह्मण जानकर उनका बड़ा आदर-सत्कार किया और उनसे कहा कि आप एक दिन और पधारें| अभी तो आप मर्जी से आये हैं, एक दिन आप मेरे पर कृपा करके मेरी मर्जी से पधारें| ऐसा कहकर राजा ने उनकी पूजा करके आनंदपूर्वक उनको विदा कर दिया| घर आने पर ब्राह्मणी ने पूछा कि राजा ने क्या दिया? ब्राह्मण बोले- दिया क्या, उन्होंने कहा कि एक दिन आप फिर आओ| ब्राह्मणी ने सोचा कि अब माल मिलेगा| राजा ने निमन्त्रण दिया है, इसलिए अब जरुर कुछ देंगे| एक दिन राजा रात्रि में अपना वेश बदलकर, बहुत गरीब आदमी के कपड़े पहनकर घूमने लगे| ठंडी के दिन थे| एक लुहार के यहाँ एक कड़ाह बन रहा था| उसमें घन मारने वाले आदमी की जरूरत थीं| राजा इस काम के लिए तैयार हो गये| लुहार ने कहा की एक घंटा काम करने के दो पैसे दिये जायँगे| राजा ने बड़े उत्साह से, बड़ी तत्परता से दो घंटे काम किया| राजा के हाथों में छाले पड़ गये, पसीना आ गया, बड़ी मेहनत पड़ी| लुहार ने चार पैसे दे दिये| राजा उन चार पैसों को लेकर आ गया और आकर हाथों पर पट्टी बाँधी| धीरे-धीरे हाथों में पड़े छाले ठीक हो गये| एक दिन ब्राह्मणी के कहने पर वे ब्राह्मण देवता राजा के यहाँ फिर पधारे| राजा ने उनका बड़ा आदर किया, आसन दिया, पूजन किया और उनको वे चार पैसे भेंट दे दिये| ब्राह्मण बड़े संतोषी थे| वे उन चार पैसों को लेकर घर पहुँचे| ब्राह्मणी सोच रही थी कि आज खूब माल मिलेगा| जब उसने चार पैसों को देखा तो कहा कि राजा ने क्या दिया और क्या आपने लिया! आप-जैसे पण्डित ब्राह्मण और देने वाला राजा! ब्राह्मणी ने चार पैसे बाहर फेंक दिये| जब सुबह उठकर देखा तो वहाँ चार जगह सोने की सीकें दिखाई दींए| सच्चा धन उग जाता है| सोने की उन सीकों की वे रोजाना काटते पर दूसरे दिन वे पुनः उग आतीं| उनको खोदकर देखा तो मूल में वे ही चार पैसे मिले! राजा ने ब्राह्मण को अन्न नहीं दिया; क्योंकि राजा का अन्न शुद्ध नहीं होता, खराब पैसों का होता है| मदिरा आदि पर लगे टैक्स के पैसे होते हैं, चोरों को दंड देने से प्राप्त हुए पैसे होते हैं-ऐसे पैसों को देकर ब्राह्मण को भ्रष्ट नहीं करना है| इसलिये राजा ने अपनी खरी कमाई के पैसे दिये| आप भी धार्मिक अनुष्ठान आदि में अपनी खरी कमाई का धन खर्च करिये|. जय गणेश

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Neha Sharma, Haryana Jan 20, 2020

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devi Lakshmi Jan 21, 2020

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🟢🟢🟢 ⚜🕉⚜ 🟢🟢🟢 *🙏ॐ श्रीगणेशाय नम:🙏* *🙏शुभप्रभातम् जी🙏* *इतिहास की मुख्य घटनाओं सहित पञ्चांग-मुख्यांश ..* *📝आज दिनांक 👉* *📜 22 जनवरी 2020* *बुधवार* *🏚नई दिल्ली अनुसार🏚* *🇮🇳शक सम्वत-* 1941 *🇮🇳विक्रम सम्वत-* 2076 *🇮🇳मास-* माघ *🌓पक्ष-* कृष्णपक्ष *🗒तिथि-* त्रयोदशी-25:50 तक *🗒पश्चात्-* चतुर्दशी *🌠नक्षत्र-* मूल-24:20 तक *🌠पश्चात्-* पूर्वाषाढ़ा *💫करण-* गर-13:45 तक *💫पश्चात्-* वणिज *✨योग-* व्याघात-27:39 तक *✨पश्चात्-* हर्षण *🌅सूर्योदय-* 07:13 *🌄सूर्यास्त-* 17:51 *🌙चन्द्रोदय-* 29:53 *🌛चन्द्रराशि-* धनु-दिनरात *🌞सूर्यायण-* उत्तरायन *🌞गोल-* दक्षिणगोल *💡अभिजित-* कोई नहीं *🤖राहुकाल-* 12:32 से 13:52 *🎑ऋतु-* शिशिर *❄अवधि* सर्दियों का मौसम *⏳दिशाशूल-* उत्तर *✍विशेष👉* *_🔅आज बुधवार को 👉 माघ बदी त्रयोदशी 25:50 तक पश्चात् चतुर्दशी शुरु , प्रदोष व्रत , विघ्नकारक भद्रा 25:49 से , मूल संज्ञक नक्षत्र 24:20 तक , मेरू त्रयोदशी व्रत ( जैन ) , श्री आदिनाथ निर्वाण दिवस ( जैन ) , ठाकुर श्री रोशनसिंह जयन्ती व श्री माणिक सरकार जन्मदिवस।_* *_🔅कल बृहस्पतिवार को 👉 माघ बदी चतुर्दशी 26:19 तक पश्चात् अमावस्या शुरु , रटन्ती कालिका पूजन , मास शिवरात्रि व्रत , विघ्नकारक भद्रा 14:04 बजे तक , भगवान ऋषभदेव निर्वाणोत्सव ( माघ बदी चतुर्दशी ) , नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जयन्ती , श्री बाला साहेब केशव ठाकरे जयन्ती , श्री नरेन्द्र मोहन सेन बलिदान दिवस व कुष्ठ निवारण अभियान दिवस।_* *🎯आज की वाणी👉* 🌹 *एदतर्थं कुलीनानां* *नृपाः कुर्वन्ति सङ्ग्रहम् ।* *आदिमध्यावसानेषु* *न त्यजन्ति च ते नृपम् ।।* *भावार्थ👉* _राजा लोग अपने आस पास अच्छे कुल के लोगों को इसलिए रखते हैं क्योंकि ऐसे लोग ना आरम्भ में, न बीच में और न ही अंत में साथ छोड़कर जाते हैं।_ 🌹 *22 जनवरी की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ👉* 1517 - तुर्की ने काहिरा पर कब्जा किया। 1673 - न्यूयॉर्क एवं बोस्टन के बीच डाक सेवा की शुरुआत हुई। 1760 - वांदीवाश के युद्ध में अंग्रेजों ने फ्रांसिसियों को हराया। 1771 – स्पेन ने फॉकलैंड द्वीप इंग्लैंड को सौंपा। 1811 - कास विद्रोह की शुरुआत सैन एंटोनियो, स्पेनिश टेक्सास में हुई। 1824 - अशंती ने गोल्ड कोस्ट में ब्रिटिश सेना को कुचलने के लिए, ब्रिटिश गवर्नर सर चार्ल्स मैककैथी की हत्या कर दी थी। 1831 – प्रख्यात जीवविज्ञानी चार्ल्स डार्विन स्नातक बने। 1837 - दक्षिणी सीरिया में भूकंप से हजारों लोग मरे। 1905 - रूस के सेंट पीट्सबर्ग में मजदूरों पर गोलियां चलाई गयी जिसमें 500 से ज्यादा लोग मरे। 1924 - रैमसे मैकडोनाल्ड ब्रिटेन में लेबर पार्टी के पहले प्रधानमंत्री बने। 1963 - देहरादून में दृष्टिहीनों के लिए राष्ट्रीय पुस्तकालय की स्थापना हुई। 1965 – पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में इस्पात कारखाना शुरू हुआ। 1970 - बोइंग 747 का न्यूयॉर्क एवं लंदन के बीच पहली व्यावसायिक उड़ान शुरु हुई। 1972 – इस्तानबुल की पूरी आबादी को 24 घंटे की अवधि के लिए नजरबंद किया गया। 1973 – अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात को कानूनी मान्यता दे दी। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि महिलाओं गर्भवती होने के पहले 6 महीने के भीतर गर्भपात करवा सकती हैं। 1973 – जॉर्डन एयरलाइंस का विमान नाइजीरिया मे दुर्घटनाग्रस्त हुआ जिसमें 176 यात्रियों की मौत हुई। 1981 - रोनाल्ड रीगन का सं.रा. अमेरिका के 40वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण। 1993 - इंडियन एयरलांइस का विमान औरंगाबाद मे दुर्घटनाग्रस्त, 61 यात्रियों की मौत। 1996 - कैलीफ़ोर्निया विश्वविद्यालय की वेधशाला के वैज्ञानिकों ने पृथ्वी से लगभग 3,50,000 प्रकाश वर्ष की दूरी पर दो नये ग्रहों की खोज की। 1998 - अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन पर मोनिका लेविंस्की ने अवैध शारीरिक संबंध स्थापित करने का आरोप लगाया। 2002 - फ़िलिस्तीनी शहर तुल्कोरम पर इस्रायल का कब्ज़ा। 2002 - अफ़ग़ानिस्तान के पुनर्निर्माण के लिए टोकियो में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की बैठक में 3.5 अरब डॉलर की मदद की घोषणा। 2003 – नासा के अंतरिक्षयान पायनीयर 10 पृथ्वी से सर्वाधिक दूर मानव निर्मित यान से अंतिम बार संपर्क स्थापित हुआ। 2006 - श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे ने विद्रोही संगठन लिट्टे से बातचीत की पेशकश की। 2006 - इवा मोराल्स ने बोलीविया के राष्ट्रपति पद की शपथ ली। 2008 - राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने लोकसभा में विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी को आगामी लोकसभा चुनाव के दौरान भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने के प्रस्ताव का समर्थन किया। 2008 - पाकिस्तान के दक्षिणी वजीरिस्तान में लाक्या क़िले पर आतंकवादियों के हमले में पांच पाकिस्तानी सैनिक मारे गये। 2009- फ़िल्म स्लमडॉग मिलेनियर का ऑस्कर के लिए नामांकन हुआ। 2009 - सरकार ने सार्वजनिक निजी भागीदारी आधार वाली तीन बंदरगाह परियोजनाओं को मंज़ूदी दी। 2014 – लघु ग्रह सेरेज पर जल वाष्प की उपस्थिति का पता चला। 2015 - उक्रेन के दोनेत्स्क में हुए विस्फोट में 13 लोगों की माैत। 2019 - राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद ने प्रधानमंत्री राष्‍ट्रीय बाल पुरस्‍कार -2019 प्रदान किए। 2019 - जाने-माने गुजराती कवि सितांशु यशशचंद्र सरस्‍वती सम्‍मान 2017 से पुरस्‍कृत। 2019 - हरियाणा सरकार ने ऐसिड सर्वाइवर्स को मासिक पेंशन देने की एक योजना शुरू की। 2019 - अफगानिस्तान: तालिबानी हमले में करीब 65 लोगों की मौत। *22 जनवरी को जन्मे व्यक्ति👉* 1531 – ब्रिटेन के गणितज्ञ और दार्शनिक फ़्रांसीस बेकन का जन्म हुआ। 1775 – फ़्रांस के भौतिकशास्त्री एवं गणितज्ञ आन्द्रे मेरी ऐम्पेयर का जन्म हुआ। उन्होंने इलोक्ट्रोनिक टेलीग्राफ़ बनाया और विद्युत की गति की तीव्रता का पता लगाया और उसे मापने के लिए एक यंत्र बनाया। 1788 – जार्ज गोईन बायरन नामक ब्रिटिश कवि का जन्म हुआ। 1892 - ठाकुर रोशन सिंह - भारत की आज़ादी के लिए संघर्ष करने वाले क्रांतिकारियों में से एक। 1909 - यू. थांट - बर्मा के राजनयिक तथा संयुक्त राष्ट्र के तीसरे महासचिव थे। 1934 - विजय आनंद - फिल्म अभिनेता , निर्माता व सम्पादक। 1949 - माणिक सरकार- राजनीतिज्ञ एवं त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री। 1972 - नम्रता शिरोडकर - फिल्म अभिनेत्री । 1976 - टी. एम. कृष्णा - कर्नाटक संगीत शैली के प्रसिद्ध गायक तथा मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त व्यक्ति। 1977 - तरुण राम फुकन, असम के सामाजिक कार्यकर्ता *22 जनवरी को हुए निधन👉* 1666 – मुगल बादशाह शाहजहाँ का निधन हुआ। 1901 – ब्रिटेन की रानी विक्टोरिया का 82 वर्ष की आयु में निधन हुआ। 2014 - ए. नागेश्वर राव - भारतीय सिनेमा के प्रसिद्ध तेलुगु फ़िल्म अभिनेता और फ़िल्म निर्माता। *22 जनवरी के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव👉* 🔅 श्री आदिनाथ निर्वाण दिवस (जैन ) । 🔅 _ठाकुर श्री रोशनसिंह जयन्ती।_ 🔅 _श्री माणिक सरकार जन्मदिवस।_ *कृपया ध्यान दें जी👉* *यद्यपि इसे तैयार करने में पूरी सावधानी रखने की कोशिश रही है। फिर भी किसी घटना , तिथि या अन्य त्रुटि के लिए मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं है ।* 🌻आपका दिन *_मंगलमय_* हो जी ।🌻 ⚜⚜ 🌴 💎 🌴⚜⚜

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