ये है माथे पर तिलक लगाने का वैज्ञानिक महत्व ।।

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ये है माथे पर तिलक लगाने का वैज्ञानिक महत्व ।।
ये है माथे पर तिलक लगाने का वैज्ञानिक महत्व ।।

ये है माथे पर तिलक लगाने का वैज्ञानिक महत्व

जानिए हिन्दू धर्म में तिलक लगाने का "वैज्ञानिक महत्व ?

शायद भारत के सिवा और कहीं भी मस्तक पर तिलक लगाने की प्रथा प्रचलित नहीं है। यह रिवाज अत्यंत प्राचीन है। माना जाता है कि मनुष्य के मस्तक के मध्य में विष्णु भगवान का निवास होता है, और तिलक ठीक इसी स्थान पर लगाया जाता है।

मनोविज्ञान की दृष्टि से भी तिलक लगाना उपयोगी माना गया है। माथा चेहरे का केंद्रीय भाग होता है, जहां सबकी नजर अटकती है। उसके मध्य में तिलक लगाकर, विशेषकर स्त्रियों में, देखने वाले की दृष्टि को बांधे रखने का प्रयत्न किया जाता है।

स्त्रियां लाल कुंकुम का तिलक लगाती हैं। यह भी बिना प्रयोजन नहीं है। लाल रंग ऊर्जा एवं स्फूर्ति का प्रतीक होता है। तिलक स्त्रियों के सौंदर्य में अभिवृद्धि करता है। तिलक लगाना देवी की आराधना से भी जुड़ा है। देवी की पूजा करने के बाद माथे पर तिलक लगाया जाता है। तिलक देवी के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।

तिलक का महत्व?

हिन्दु परम्परा में मस्तक पर तिलक लगाना शूभ माना जाता है इसे सात्विकता का प्रतीक माना जाता है विजयश्री प्राप्त करने के उद्देश्य रोली, हल्दी, चन्दन या फिर कुम्कुम का तिलक या कार्य की महत्ता को ध्यान में रखकर, इसी प्रकार शुभकामनाओं के रुप में हमारे तीर्थस्थानों पर, विभिन्न पर्वो-त्यौहारों, विशेष अतिथि आगमन पर आवाजाही के उद्देश्य से भी लगाया जाता है ।

मस्तिष्क के भ्रु-मध्य ललाट में जिस स्थान पर टीका या तिलक लगाया जाता है यह भाग आज्ञाचक्र है । शरीर शास्त्र के अनुसार पीनियल ग्रन्थि का स्थान होने की वजह से, जब पीनियल ग्रन्थि को उद्दीप्त किया जाता हैं, तो मस्तष्क के अन्दर एक तरह के प्रकाश की अनुभूति होती है ।

इसे प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया जा चुका है हमारे ऋषिगण इस बात को भलीभाँति जानते थे पीनियल ग्रन्थि के उद्दीपन से आज्ञाचक्र का उद्दीपन होगा । इसी वजह से धार्मिक कर्मकाण्ड, पूजा-उपासना व शूभकार्यो में टीका लगाने का प्रचलन से बार-बार उस के उद्दीपन से हमारे शरीर में स्थूल-सूक्ष्म अवयन जागृत हो सकें ।

इस आसान तरीके से सर्वसाधारण की रुचि धार्मिकता की ओर, आत्मिकता की ओर, तृतीय नेत्र जानकर इसके उन्मीलन की दिशा में किया गयचा प्रयास जिससे आज्ञाचक्र को नियमित उत्तेजना मिलती रहती है ।

तन्त्र शास्त्र के अनुसार माथे को इष्ट इष्ट देव का प्रतीक समझा जाता है हमारे इष्ट देव की स्मृति हमें सदैव बनी रहे इस तरह की धारणा क ध्यान में रखकर, ताकि मन में उस केन्द्रबिन्दु की स्मृति हो सकें ।

शरीर व्यापी चेतना शनैः शनैः आज्ञाचक्र पर एकत्रित होती रहे । चुँकि चेतना सारे शरीर में फैली रहती है । अतः इसे तिलक या टीके के माधअयम से आज्ञाचक्र पर एकत्रित कर, तीसरे नेत्र को जागृत करा सकें ताकि हम परामानसिक जगत में प्रवेश कर सकें।

तिलक का हमारे जीवन में कितना महत्व है शुभघटना से लेकर अन्य कई धार्मिक अनुष्ठानों, संस्कारों, युद्ध लडने जाने वाले को शुभकामनाँ के तौर पर तिलक लगाया जाता है वे प्रसंग जिन्हें हम हमारी स्मृति-पटल से हटाना नही चाहते इन शुशियों को मस्तिष्क में स्थआई तौर पर रखने, शुभ-प्रसंगों इत्यादि के लिए तिलक लगाया जाता है हमारे जीवन में तिलक का बडा महत्व है तत्वदर्शन व विज्ञान भी इसके प्रचलन को शिक्षा को बढाने व हमारे हमारे जीवन सरल व सार्थकता उतारने के जरुरत है ?।

तिलक हिंदू संस्कृति में एक पहचान चिन्ह का काम करता है। तिलक केवल धार्मिक मान्यता नहीं है बल्कि कई वैज्ञानिक कारण भी हैं इसके पीछे। तिलक केवल एक तरह से नहीं लगाया जाता। हिंदू धर्म में जितने संतों के मत हैं, जितने पंथ है, संप्रदाय हैं उन सबके अपने अलग-अलग तिलक होते हैं।

आइए जानते हैं कितनी तरह के होते हैं तिलक–

सनातन धर्म में शैव, शाक्त, वैष्णव और अन्य मतों के अलग-अलग तिलक होते हैं। शैव- शैव परंपरा में ललाट पर चंदन की आड़ी रेखा या त्रिपुंड लगाया जाता है। शाक्त- शाक्त सिंदूर का तिलक लगाते हैं। सिंदूर उग्रता का प्रतीक है। यह साधक की शक्ति या तेज बढ़ाने में सहायक माना जाता है। वैष्णव- वैष्णव परंपरा में चौंसठ प्रकार के तिलक बताए गए हैं।

इनमें प्रमुख हैं- लालश्री तिलक-इसमें आसपास चंदन की व बीच में कुंकुम या हल्दी की खड़ी रेखा बनी होती है। विष्णुस्वामी तिलक- यह तिलक माथे पर दो चौड़ी खड़ी रेखाओं से बनता है। यह तिलक संकरा होते हुए भोहों के बीच तक आता है। रामानंद तिलक- विष्णुस्वामी तिलक के बीच में कुंकुम से खड़ी रेखा देने से रामानंदी तिलक बनता है।

श्यामश्री तिलक- इसे कृष्ण उपासक वैष्णव लगाते हैं। इसमें आसपास गोपीचंदन की तथा बीच में काले रंग की मोटी खड़ी रेखा होती है। अन्य तिलक- गाणपत्य, तांत्रिक, कापालिक आदि के भिन्न तिलक होते हैं। साधु व संन्यासी भस्म का तिलक लगाते हैं।

तिलक धारण- प्रकार?

गङ्गा, मृत्तिका या गोपी-चन्दन से ऊर्ध्वपुण्ड्र, भस्म से त्रिपुण्ड्र और श्रीखण्ड चन्दन से दोनो प्रकार का तिलक कर सकते है । किंतु उत्सवकी रात्रि में सर्वाङ्ग में चन्दन लगाना चाहिये ।

भस्मादि-तिलक-विधि

तिलक के बिना सत्कर्म सफल नही हो पाते । तिलक बैठकर लगाना चाहिये । अपने-अपने आचार के अनुसार मिट्टी, चन्दन और भस्म- इनमे से किसी के द्वारा तिलक लगाना चाहिये । किंतु भगवान पर चढ़ाने से बचे हुए चन्दन को ही लगाना चाहिये ।

अपने लिये न घिसें । अँगूठे से नीचे से ऊपर की ओर ऊर्ध्वपुण्ड्र लगाकर तब त्रिपुण्ड्र लगाना चाहिये । दोपहर से पहले जल मिला कर भस्म लगाना चाहिये । दोपहर के बाद जल न मिलावे । मध्याह्न मे चन्दन मिलाकर और शाम को सूखा ही भस्म लगाना चाहिये । जल से भी तिलक लगाया जाता है ।

अँगूठे से ऊर्ध्वपुण्ड्र करने के बाद मध्यमा और अनामिका से बायी ओर से प्रारम्भ कर दाहिनी ओर भस्म लगावे । इसके बाद अँगूठे से दाहिनी ओर से प्रारम्भ कर बायी ओर लगावे। इस प्रकार तीन रेखाएँ खिंच जाती है।

तीनों अँगुलियों के मध्यका स्थान रिक्त रखे । नेत्र रेखाओं कि सीमा है, अर्थात बाये नेत्र से दाहिने नेत्र तक ही भस्म की रेखाएँ हो । इससे अधिक लम्बी और छोटी होना भी हानिकर है । इस प्रकार रेखाओं की लम्बाई छः अंगुल होती है ।

भस्म लगाने से पहले भस्म को अभिमन्त्रित कर लेना चाहिये । भस्म को बायी हथेली पर रखकर जलादि मिलाकर निम्नलिखित मन्त्र पढ़े –

ॐ अग्निरिति भस्म । ॐ वायुरिति भस्म । ॐ जलमिति भस्म । ॐ स्थलमिति भस्म । ॐ व्योमेति भस्म । ॐ सर्वं ह वा इदं भस्म । ॐ मन एतानि चक्षूंषि भस्मानीति ।
(क) भस्म का अभिमन्त्रण
ॐ यद्देवेषु त्र्यायुषमिति भुजायाम् ।
ॐ तन्नो अस्तु त्र्यायुषमित ह्रदये ।
ख) भस्म लगाने का मन्त्र –

‘ॐ नमः शिवाय’
मन्त्र बोलते हुए ललाट, ग्रीवा, भुजाओं और ह्रदय में भस्म लगाये, अथवा निम्नलिखित भिन्न-भिन मन्त्र बोलते हुए भिन्न-भिन्न स्थानोंमे भस्म लगाये –
ॐ त्र्यायुषं जमदग्नोरिति ललाटे ।
ॐ कश्यपस्य त्र्यायुषमिति ग्रीवायाम् ।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार कालपुरूष की गणना प्रथम राशि मेष से की गई है। महर्षि पराशर के सिद्धांत के अनुसार कालपुरूष के मस्तक वाले स्थान में मेष राशि स्थित है।

जिसका स्वामी मंगल ग्रह सिंदूरी लाल रंग का अधिष्ठाता है। सिंदूरी लाल रंग राशि पथ की मेष राशि का ही रंग है। इसीलिए इस रंग (लाल रोली या सिंदूर) का तिलक मेष राशि वाले स्थान (मस्तक) पर लगाया जाता है। तिलक लगाने में सहायक हाथ की अंगुलियों का भी भिन्न-भिन्न महत्व बताया है।

तिलक धारण करने में अनामिका अंगुली शांति प्रदान करती है। मघ्यमा अंगुली मनुष्य की आयु वृद्धि करती है।

अंगूठा प्रभाव और ख्याति तथा आरोग्य प्रदान कराता है। इसीलिए राजतिलक अथवा विजय तिलक अंगूठे से ही करने की परंपरा रही है। तर्जनी मोक्ष देने वाली अंगुली है।

सामुद्रिकशास्त्र के अनुसार भी अनामिका तथा अंगूठा तिलक करने में सदा शुभ माने गए हैं। अनामिका सूर्य पर्वत की अधिष्ठाता अंगुली है।

यह अंगुली सूर्य का प्रतिनिधित्व करती है, जिसका तात्पर्य यही है कि सूर्य के समान, दृढ़ता, तेजस्व, प्रभाव, सम्मान, सूर्य जैसी निष्ठा-प्रतिष्ठा बनी रहे। दूसरा अंगूठा है जो हाथ में शुक्र क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है। शुक्र ग्रह जीवन शक्ति का प्रतीक है।

संजीवनी विद्या का प्रणेता तथा जीवन में सौम्यता, सुख-साधन तथा काम-शक्ति देने वाला शुक्र ही संसार का रचयिता है।

यदि हम आँखे बंद करके बैठ जाएँ और कोई व्यक्ति हमारे भ्रू-मध्य के एकदम निकट ललाट की ओर तर्जनी उँगली ले जाए । तो वहाँ हमें कुछ विचित्र अनुभव होगा । यही तृतीय नेत्र की प्रतीति है। इस संवेदना को हम अपनी ऊँगली भृकुटि-मध्य लाकर भी अनुभव कर सकता है।

इसलिए इस केन्द्र पर जब तिलक अथवा टीका लगाया जाता है, तो उससे आज्ञाचक्र को नियमित रुप से उत्तेजना मिलती रहती है। इससे सजग रुप में हम भले ही उससे जागरण के प्रति अनभिज्ञ रहें, पर अनावरण का वह क्रम हनवरत चलता रहता है। तिलक का तत्वदर्शन अपने आप में अनेंको प्रेरणाएँ सँजोएं हुए है।

तिलक या त्रिपुंड प्रायः चंदन का होता है। चंदन की प्रकृति शीतल होती है। शीतल चंदन जब मस्तक पर लगाया जाता है, तो उसके पीछे भाव यह होता है कि चिंतन का जो केंद्रिय संस्थान मस्तिष्क के रुप में खोपड़ी के अंदर विराजमान है, वह हमेशा शीतल बना रहे, उसके विचार और भाव इतने श्रेष्ठ हों जि अपनी तरह औंरो को भी शीतलता, शांति और प्रसन्नता प्रदान करता रहे।

तिलक का महत्व जनजीवन में इतना अधिक है कि जब कोई महत्वपूर्ण, सम्मानसूचक, प्रसन्नदायक घतना घटती है, तो माथे पर तिलक लगा दिया जाता है। विवाह हो रहा हो तो तिलक, कोई युद्ध पर जा रहा हो तो तिलक हो। कोई युद्ध से विजयी होकर लौट रहा हो तो तिलक हो अर्थात् कोई भी सुखमय घटना हो, उसके साथ तिलक का अविच्छिन संबंध जोड़ दिया जाता है। ऐसा इसलिए कि वह आमनद चिरस्मरणीय बना रहे। विवाहित स्त्रियाँ माँग में सिंदूर और माथे पर बिंदी लगाती है।

बिंदी टीके का रुप है, वैसे ही माँग का सिंदूर तिलक का प्रतिक है। किंतु यहाँ इन्हे परिणीता के सुहाग के साथ जोड़ा दिया गया है। यह अक्षत सुहाग के चिन्ह हैं। इनमें समर्पण और निष्ठा का भाव पूर्णरुपेण पति की ओर है। वह उसकी समर्पिता है।

अब उसके नारित्व पर कोई बाधा नहीं पड़ेगी, इसलिए पत्नी को पति के जीवन रहने तक इन्हे धारण करना पड़ता है। तिलक द्रव्य के रुप में भीन्न-भीन्न प्रकार की वस्तो्ओं का प्रयोग किया जाता है। श्वेत और रक्त चंदन भक्ति के प्रतिक हैं। इनका इस्तेमाल भजनानंदी किस्म के लोग करते है। केशर एवं गोरोचन ज्ञान तथा वैराज्ञ्य के प्रतिक है।

ज्ञानी तत्वचिंतक और विरक्त ह्रदय वाले लोग इसका प्रयोग करते है। कस्तूरी ज्ञान, वैराज्ञ्य, भक्ति, प्रेम, सौंदर्य, ऐश्वर्य सभी का प्रतीक है ।

मार्कण्डेय पुराण के ‘स्त्रिय समस्ता सकला जगत्सु’ के अनुसार नारी समाज शक्ति रूपा है।

नारी समाज के सौभाग्य में लाल वर्ण की प्रधानता का यही कारण और मस्तक पर लाल वर्ण के रूप में हम मातृशक्ति धारण करने की कामना करते हैं।

यही कारण है कि ज्यादातर सांस्कृतिक तिलक महिलाएं ही पुरूषों के भाल पर करती है। चाहे वह बहिन, पत्नी या माँ किसी भी रूप में हो।

मानस की पंक्तियाँ : चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीड़ , तुलसीदास चंदन घिसें ,तिलक देत रघुबीर . तिलक परम्परा का अनुमोदन करतीं हैं .आज भी फौजी जब शत्रु से मोर्चे के लिए घर से विदा लेता है, तो माँ बहिन पत्नी उसको तिलक लगातीं हैं ,यात्रा पर जाने से पूर्व तिलक लगाने को शुभ माना जाता है।

इस प्रकार तिलक या टीका एक धार्मिक प्रतीत होते हुए भी उसमें विज्ञान और दर्शन का साथ-साथ समावेश है। इनको समझ सकें और उनकी शिक्षाओं को आत्त्मसात् कर सकें तो ही उसकी सार्थकता है।

ये है माथे पर तिलक लगाने का वैज्ञानिक महत्व ।।

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कामेंट्स

Kanhiya Singh Kanhiya Singh Sep 9, 2017
आपका तिलक का महत्व अच्‍छा है। इसमें विस्तार की जरूरत है। धन्यवाद।

TR Madhavan Sep 9, 2017
@pari (Jaipur) मैंने अबतक जित्ने भी पोस्ट कियें हैं वक्त मिला थो पडिए और आफ कि राय जरूर पोस्ट करिये, धन्यवाद ।

TR Madhavan Sep 10, 2017
सभी को मेरा धन्यवाद ।

Neha Sharma,Haryana Dec 14, 2019

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Neha Sharma,Haryana Dec 14, 2019

*जय श्री शनिदेव की जय वीर बजरंग बली की* 🌹🙏🌹*शुभ प्रभात् वंदन*🌹🙏🌹 🌹🙏🌹*शुभ शनिवार*🌹🙏🌹 *शास्त्रों में वर्णन है कि एक बार हनुमान जी को भी शनि का प्रकोप सहना पड़ा था। जब किसी को शनि की साढ़ेसाती लगती है या जन्म कुंडली में शनि देव प्रताडि़त करते हैं तो अक्सर ज्योतिषाचार्य उस व्यक्ति को हनुमान जी की शरण में जाने को कहते हैं ताकि वह उपाय द्वारा शनि का प्रकोप शांत कर सके, परन्तु एक बार संयोग से हनुमान जी शनि के काबू आ गए।* *भ्रमण करते शनि की हनुमान जी से भेंट हो गई। दोनों के मध्य भागवत चर्चा होने लगी। उस समय बात पाप-पुण्य की होने लगी। तब शनि देव हनुमान जी से कहने लगे, ‘‘मैं सब प्राणियों को उनके द्वारा किए गए कर्मों का शुभ-अशुभ फल तोल कर बराबर कर देता हूं। जीवन में प्रत्येक प्राणी पर कभी न कभी अपना प्रभाव अवश्य डालता हूं क्योंकि सृष्टि में प्राणी से कई बार जाने-अनजाने ही कुछ पाप हो जाते हैं जिसका उसे फल भोगना पड़ता है।’’* *शनि देव की यह बात सुनकर हनुमान जी कहने लगे, ‘‘शनिदेव कहीं अनजाने में मेरे द्वारा कोई पाप तो नहीं हो गया जिसके लिए मुझे उसका प्रायश्चित करना पड़े।’’* *शनि देव तुरन्त बोले, ‘‘अवश्य मारुति नंदन पवन पुत्र। मैं आपके पास इसी प्रयोजन से आया हूं क्योंकि मैं आपकी राशि में प्रवेश करने जा रहा हूं। आप सावधान रहें, मैं आपको शीघ्र ही पीड़ित करूंगा।’’* *शनि के ये वाक्य सुनकर हनुमान जी आश्चर्य में पड़ गए तथा बोले, ‘‘मैंने तो अपना सारा जीवन ब्रह्मचारी रहते हुए भगवान श्रीराम की सेवा में अर्पित कर दिया है। उनके भजन के अलावा कोई काम ही नहीं किया तो आप मेरी राशि में क्यों प्रवेश करना चाहते हैं। कृपया मेरे द्वारा किए गए बुरे कर्म या अपराध के बारे में अवश्य बतलाएं।’’* *तब शनि देव कहने लगे, ‘‘हनुमान जी आपने राम-रावण युद्ध में मेघनाद द्वारा किए जा रहे यज्ञ को भंग किया था, आपने धर्म कार्य किए हैं इसीलिए मैं आपकी राशि पर अढ़ाई या 7 वर्ष के लिए नहीं मात्र एक दिन के लिए आऊंगा।’’* *इतना सुनकर हनुमान जी ने शनि को एक दिन आने के लिए अनुमति दे दी तथा शनि को सावधान किया कि आपने आना ही है तो अपनी पूर्ण तैयारी करके आना।* *अगले दिन हनुमान जी ने अपने ईष्ट प्रभु भगवान श्री राम का स्मरण किया तथा विशाल पहाड़ उठा कर शनि के आने की प्रतीक्षा करने लगे तथा मन ही मन विचार करने लगे कि जब शनि देव आएंगे तो विशाल पहाड़ ही उन पर दे मारूंगा। पूरा दिन विशाल पहाड़ उठाकर हनुमान जी शनि की प्रतीक्षा करने लगे पर शाम तक शनि नहीं आए। शाम होने पर हनुमान जी ने विशाल पहाड़ को रख दिया तभी अचानक शनि देव प्रकट हुए। उन्हें देखकर हनुमान जी ने शनि से कहा, ‘‘सुबह से ही मैं आपकी प्रतीक्षा कर रहा था परन्तु आप आए नहीं।’’* *तभी शनि देव बोले, ‘‘हे पवन पुत्र रुद्रावतार हनुमान जी मैं तो सुबह ही आ गया था अब तो मैं लौट रहा हूं। मेरा प्रयोजन सफल रहा।’’* *तब हनुमान जी बोले, ‘‘आपके दर्शन तो अब हो रहे हैं शनि देव। आपके प्रकोप का क्या हुआ। तभी शनि देव मुस्करा कर बोले-मेरे प्रभाव के कारण ही तो आप सुबह से विशाल पहाड़ उठा कर खड़े रहे। मेरी वक्र दृष्टि के कारण ही आप आज सारा दिन पीड़ित रहे हैं। मैंने सुबह ही आपको विशाल पहाड़ उठवा दिया तथा शाम तक आपको दंडित किया इसलिए मेरा प्रयोजन सफल रहा। आप राम भक्त हैं, सदैव राम नाम का जाप करते हैं इसीलिए आपको दंड का कष्ट कम महसूस हुआ। आपको सुबह से शाम तक पहाड़ तो मेरे प्रकोप के कारण ही उठाना पड़ा है।’’* *शनि देव की ये बातें सुन कर हनुमान जी मुस्करा उठे। शनिदेव अपना कार्य समाप्त करके हनुमान जी से विदा लेकर शनि लोक रवाना हो गए। शनि के जन्म के समय पिता सूर्य को ग्रहण लगा था तभी उसकी शक्ति का सूर्य देव को ज्ञान हो गया था।*

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kamlesh sharma Dec 14, 2019

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Neha Sharma,Haryana Dec 14, 2019

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