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Mysuvichar Jan 29, 2018

Mahakali Mantra

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श्री कालिका महापुराण में आज ग्यारहवां दिन *माता सती से विवाह का प्रस्ताव* मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इसके अनन्तर सती ने पुनः शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि में उपवास किया था और आश्विन मास में देवेश्वर का भक्ति भाव से पूजन किया था । इस तरह से इस नन्दा व्रत के पूर्ण हो जाने पर नवमी तिथि में दिन के भाग में भक्तिभाव से परमाधिक विनम्र उस सती को भगवान् हर प्रत्यक्ष हो गये थे अर्थात् सती के समक्ष में प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित हो गए थे। प्रत्यक्ष रूप से हर का अवलोकन करके सती आनन्द युक्त हृदय वाली हो गयी थी । फिर उस सती ने लज्जा से अवनत होते हुए विनम्र होकर उनके चरणों में प्रणाम किया था। इसके अनन्तर महादेवजी ने उस व्रत के धारण करने वाली सती से कहा था । शिव स्वयं भार्या के लिए उसकी इच्छा करने वाले होते हुए भी उसके आश्चर्य के फल के प्रदान कराने वाले हुए थे । ईश्वर ने कहा-हे दक्ष की पुत्री! आपके इस व्रत से मैं परम प्रसन्न हो गया हूँ। अब आप वरदान का वरण कर लो जो भी आपको अभिमत होवे । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-जगत् के स्वामी महादेव उसके भाव को जानते हुए उस सती के वचनों के श्रवण करने की इच्छा से वरदान माँग लो' यह बोले थे । वह सती भी लज्जा से समाविष्टा होती हुई जो कुछ भी हृदय में स्थित था उसके कहने में समर्थ न हो सकी थी क्योंकि बाला को जो भी मनोरथ अभीष्ट था वह लज्जा से समाच्छादित हो गया था अर्थात् लज्जावश उस अभीप्सित को मन में ही रखकर कुछ भी न बोल सकी थीं । इसी बीच में कामदेव उस समय में अभिप्राय के सहित हर की नेत्र मुख और व्यापार से चिन्हित प्राप्त करके विवर चाप का पुष्पहेति के द्वारा सन्धान करने वाला हो गया था। इसके अनन्तर हर्षण बाण के द्वारा उसने (कामदेव ने) हर के हृदय बेधन किया था। इसक उपरान्त हर्षित शम्भु ने फिर एक बार सती को देखा था । उस समय में परमेश्वर शिव ने परब्रह्म के चिन्तन को एकदम भुला ही दिया था। फिर इस कामदेव ने मोहनबाण के द्वारा भगवान् हर को बेधित किया था। तब हर्षित होकर शम्भु उस अवसर पर बहुत ही अधिक मोहित हो गये थे । हे द्विजोत्तमों! जब इन्होंने मोह और हर्ष को व्यक्त कर दिया था तो वह माया के द्वारा भी विमोहित हो गये थे । इसके अनन्तर सती ने अपनी लज्जा को स्तम्भित करके जिस समय में हर से वह बोली थी-हे वरद! मेरे अभीष्ट वर इस अर्थ को करने वाले को प्रदान करिए । उस समय में सती के वाक्य के अवसान की प्रतीक्षा न करके ही वृषभध्वज ने दाक्षायणी से पुनः 'मेरी भार्या हो जाओ' कहला दिया था । हर के यह वचन सुनकर जो अभीष्ट के फल का भावना से युक्त था वह सती मनोगत वर की प्राप्ति करके परम प्रमुदित होती हुई मौन होकर स्थित हो गयी थी। हे द्विजोत्तमो! कामवासना से समन्वित महादेवजी आगे वहाँ पर ब्रह्म चारुहास वाली सती ने अपने हावों और भावों से किया था। उस समय में अपने भावों का आदान-प्रदान करके श्रृंगार नामक रस ने उन दोनों में प्रवेश किया था । वे विप्रेन्द्रों! भगवान् हर के आगे स्निग्ध भिन्न अंजन की प्रभा से समान प्रभा वाली, स्फटिक के समान उज्ज्वल कान्ति वाले हर के सामने चन्द्रमा के समीप में अंकलेख की तरह राजित हुई थी । इसके अनन्तर दाक्षायणी पुनः उन महादेवजी से बोली थी-हे जगत्पते! मेरे पिता के सामने गोचर होकर मुझे ग्रहण कीजिए । उस समय में देवी सती ने इस प्रकार से जो स्मितयुक्त वचन कहा था कि 'मेरी भार्या हो जाओ' यह महादेव जी ने कहा था। इसके अनन्तर कामदेव यह देखकर रति और अपने मित्र वसन्त के साथ प्रसन्नता से युक्त हो गया था और निरन्तर अपने आपको अभिनन्दित किया था। हे द्विजोत्तमों! इसके अनन्तर दाक्षायणी ने शम्भु को समाश्वासित करके हर्ष और मोह से होती हुई वह सती माता के समीप गयी थी। भगवान् हर भी हिमालय के प्रस्थ से प्रवेश करके जो कि उनका आश्रम था दाक्षायणी के विप्रलम्भ (वियोग) के दुःख से ध्यान में परायण हो गए थे। इसके उपरान्त विप्रलब्ध भी अर्थात् वियोग से युक्त होते हुए भी उन्होंने ब्रह्माजी के वाक्य का स्मरण किया था जो कि जाया के परिग्रहण के अर्थ में पद्मयोनि ने (ब्रह्माजी ने) कहा था। पहले विश्वास से ब्रह्मवाक्य के पर का स्मरण करके ही वृषभध्वज मन से ब्रह्माजी का चिन्तन करने लगे थे । इसके अनन्तर चिन्तन किए हुए यह परेमेष्ठी ( ब्रह्मा ) त्रिशूली के आगे शीघ्र ही इष्ट की सिद्धि से प्रेरित हुए प्रविष्ट हुए थे जहाँ पर हिमालय के प्रस्थ में यह विप्रलब्ध भगवान् शम्भु विराजमान थे सावित्री के सहित ब्रह्माजी वहाँ पर ही उपस्थित हो गए थे । इसके उपरान्त भगवान् हर ने सावित्री के सहित धाता को देखकर बड़ी ही उत्सुकता के साथ विप्रलब्ध शम्भु सती से बोले । ईश्वर ने कहा-हे ब्रह्माजी, विश्व के अर्थ जो दारा के परिग्रहण की कृति में आपने जो कहा था वह अब मुझे उस सार्थक की ही भाँति प्रतीत होता है । अत्यन्त भक्ति से दाक्षायणी के द्वारा मेरी आराधना की गयी है। जिस समय में उसके द्वारा प्रपूजित मैं उसको वरदान देने के लिए गया था तब उसके समीप कामदेव ने विशाल बाणों से वेध दिया था और मैं माया से मोहित हो गया था कि मैं उसका प्रतिकार शीघ्र ही करने में असमर्थ हो गया हूँ देवी का वाँच्छित मैंने यह भी देखा था। हे विभो! व्रत की भक्ति से प्रसन्नता से समन्वित मैं उसका भक्ता हो जाऊँ। इससे हे प्रजापते ! अब आप विश्व के लिए और मेरे लिए ऐसा करें कि दक्ष प्रजापति मुझे आमन्त्रित करके अपनी पुत्री को मुझे शीघ्र ही प्रदान कर देवे । आप दक्ष के भवन में गमन कीजिए और मेरा वचन उनसे कहिए कि जिस प्रकार से सती का वियोग भस्म हो जावे वैसा ही पुन: आप करें। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस प्रजापति के सकाश में महादेव जी ने यह इतना कहकर उन्होंने सावित्री का अवलोकन किया था तो उनको सती का विप्रयोग विशेष बढ़ गया था। लोकों के ईश ब्रह्माजी ने उनसे सम्भाषण करके वे आनन्द से संयुत कृत-कृत्य अर्थात् सफल हो गये थे और उन्होंने जगतों का हित तथा शिव का हित कर यह वचन कहा था। ब्रह्माजी ने कहा हे वृषभध्वज! हे भगवान्! हे शम्भो! जो आप कहते हैं उसमें विश्व का अर्थ तो सुनिश्चित ही है । इसमें आपका स्वार्थ नहीं है और न कोई मेरा स्वार्थ है । दक्ष तो अपनी पुत्री को आपके लिए स्वयं ही दे देगा और मैं भी आपके वाक्य को उसके ही समक्ष कह दूंगा। मार्कण्डेय मुनि ने कहा - लोक पितामह ब्रह्माजी ने यह महादेवजी से कहकर अतीव वेग वाले स्पन्दन द्वारा वे दक्ष प्रजापति के निवास स्थान पर गये थे । इसके अनन्तर उधर दक्ष भी सम्पूर्ण वृतान्त सती के मुख से सुनकर यह चिंता कर रहा था कि यह मेरी पुत्री शम्भु को कैसे दे दी जावे । आये हुए भी महादेव परम प्रसन्न होकर चले गए थे वह भी पुनः ही सुता के लिए कैसे इक्षित हैं अथवा मुझे उनके निकट शीघ्र ही कोई दूत भेजना चाहिए । यह योग्य नहीं है कि यदि विभु अपने लिए इसको न ग्रहण करें तो एक अनुचित ही बात होगी। मैं उन्हीं वृषभध्वज की पूजा करूँगा कि जिस तरह से वह स्वयं ही मेरी पुत्री के स्वामी हो जावें । वे भी इसी के द्वारा अत्यन्त प्रयत्न के साथ अतीव वांच्छा करती हुई से पूजित हुए हैं । शम्भु मेरे भर्ता होवे और इस प्रकार से उन्होंने उसे वर भी दिया । इस रीति से दक्ष चिन्तन कर रहे थे कि उसी समय में ब्रह्माजी उसके आगे समुपस्थित हो गये। वे हंसों के रथ में सावित्री के साथ ही विराजमान थे । प्रजापति दक्ष ने ब्रह्माजी को देखकर उनका प्रणिपात किया था और वह विनम्र होकर स्थित हो गया था। उसने उनको आसन दिया था और यथोचित रीति से सम्भाषण किया था । इसके अनन्तर उन सब लोकों के ईश से वहाँ पर आगमन का कारण दक्ष ने पूछा था । हे विपेन्द्रों! वह दक्ष चिन्ता से आविष्ट भी था किन्तु हर्षित हो रहा था । दक्ष ने कहा -हे जगतों के गुरुवर! यहाँ पर आपके आगमन का कारण बतलाइए? आप पुत्र के स्नेह से अथवा किसी कार्य के वश में इस आश्रम में समागत हुए हैं । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस प्रकार से महात्मा दक्ष के द्वारा पूछे गये सुरश्रेष्ठ ( ब्रह्माजी ) ने उस प्रजापति दक्ष को आनन्दित करते हुए हँसकर यह वाक्य कहा था। ब्रह्माजी ने कहा-हे दक्ष! सुनिए, मैं तुम्हारे जिस कार्य के लिए यहाँ पर समागत हुआ हूँ वह कार्य लोकों का हितकर है तथा पथ्य है और आपका भी अभीप्सित है । तेरी पुत्री ने जगत् के पति महादेव की समाराधना करके जो वर प्राप्त करने की उनसे प्रार्थना की थी वह आज स्वयं ही गृह में समागत हुए है । शम्भु ने आपकी पुत्री के लिए आपके समीप में मुझे पुनः प्रस्थापित किया है जो कृत्य परम श्रेय है उसका अवधारण करिए। जिस समय वरदान देने को वे आए थे तभी से लेकर आपकी पुत्री के वियोग से शीघ्र ही कल्याण की प्राप्ति नहीं कर रहे हैं, कामदेव ने भी उस समय अत्यधिक बेधन किया था उसे जगत् के प्रभु का बेधन सभी पुष्कर बाणों से एक ही साथ किया था। वह कामदेव के द्वारा बाणों से बिद्ध होकर आत्मा का परिचन्तन त्याग कर जैसे कोई सामान्य जन हो उसी भाँति अतीव व्याकुल वाणी को भुलाकर विप्रयोग से गणों के आगे अन्य कृति में भी 'सती कहाँ है' यह बोला करते हैं। मैंने जो पूर्व में चाहा था और आपने तथा कामदेव ने इच्छा की थी एवं मरीचि आदि मुनिवरों ने जिसकी इच्छा की थी । हे पुत्र ! वह कार्य अब सिद्ध हो गया है। आपकी पुत्री के द्वारा शम्भु की आराधना की गई थी और वे भी उस तुम्हारी पुत्री विचिन्तन से हिमवद्गिरि में अनुमोदन करने के लिए इच्छुक हैं । जिस प्रकार से अनेक प्रकार के भावों के द्वारा सती ने नन्दा के व्रत से शम्भु की आराधना की थी ठीक उसी भाँति उनके द्वारा सती की आराधना की जा रही है । इसलिए हे दक्ष! शम्भु के लिए परिकल्पित अपनी पुत्री सती को बिना विलम्ब किए हुए उनको दे दो उसी से आपकी कृतकृत्यता अर्थात् सफलता है । मैं उनको नारद द्वारा आपके आलय में ले आऊँगा। उसके लिए आप भी इस सती को जो कि उन्हीं के लिए परिकल्पित है उन्हें दे दो । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-दक्ष ने 'ऐसा ही होगा', यह दक्ष ने ब्रह्माजी से कहा था और ब्रह्माजी भी वहाँ से उसी स्थान पर चले गए थे जहाँ पर भगवान् शम्भु विराजमान थे। ब्रह्माजी के चले जाने पर दक्ष प्रजापति भी अपनी दारा और तनया के साथ आनन्दयुक्त हो गया था और पीयूष से परिपूरित की ही भाँति पूर्ण देह वाला हो गया था । इसके अनन्तर लासन ब्रह्माजी भी मोद से प्रसन्न होकर महादेवजी के समीप प्राप्त हो गये थे जो कि हिमालय पर्वत पर संस्थित थे । वृषभध्वज ने उन आते हुए लोकों के स्त्रष्टा को देखकर वे सती की प्राप्ति में बारम्बार मन में संशय कर रहे थे। इसके अनन्तर दूर ही ही से साम से समन्वित ब्रह्माजी को महादेवजी ने जो कामवासना को भस्म में धारण किए थे और कामदेव के द्वारा उन्मादित हो गये थे, कहा था । ईश्वर ने कहा-हे ब्रह्माजी! आपके पुत्र (दक्ष) ने सती के अर्थ में स्वयं क्या कहा था ? आप मुझे बतलाइए जिससे कामदेव के द्वारा मेरा हृदय विदीर्ण न किया जावे । बाधमान विप्रयोग सती के बिना मुझको हनन कर रहा है । हे सुरश्रेष्ठ! यह कामदेव अन्य सब प्राणियों का त्याग कर मेरे ही पीछे पड़ा हुआ है । हे ब्रह्माजी! वह सती जिस तरह से भी मुझे प्राप्त हो जावे वही आप शीघ्र ही करिए । ब्रह्माजी ने कहा-हे वृषभध्वज! सती के अर्थ में जो मेरे पुत्र ( दक्ष) ने कह दिया था उसको आप सुनिए और अपना साध्य सिद्ध हो गया, यही अवधारित कर लीजिए। उसने कहा था कि मुझे मेरी पुत्री उन्हीं के लिए देने के योग्य है और उनके लिए ही वह परिकल्पिता है । यह कर्म तो मुझे भी अभीष्ट था ही किन्तु अब आपके वाक्य से पुन: अधिक अभीप्सित हो गया है । मेरी पुत्री के द्वारा शिव समाराधित किए गए हैं और इसी के लिए उसने स्वयं ही ऐसा किया है और वे शिव भी उनकी इच्छा करते हें अर्थात् सती को भार्या के रूप में पाना चाहते हैं । इसी कारण से मुझे इसको हर के ही लिए देना चाहिए । अर्थात् मैं उन्हीं को दूँगा । वे शिव किसी शुभ मुहूर्त और शुभ लग्न में मेरे समीप में आ जावें । हे ब्रह्माजी, उसी समय में मैं भिक्षार्थ में के लिए अपनी पुत्री सती को दे दूँगा । शम्भु वृषभध्वज ! दक्ष ने यही प्रसन्नता के साथ कहा था। इसलिए आप किसी परम शुभ मुहूर्त में उस सती की अनुयाचना करने के लिए उन (दक्ष) के समीप में गमन कीजिए । ईश्वर ने कहा- मैं आपके साथ तथा महात्मा नारद जी के साथ ही यहाँ से गमन करूँगा । हे जगतों के द्वारा पूज्य! इस कारण से आप शीघ्रताशीघ्र ही नारद जी का स्मरण करिए । मरीचि आदि दस मानस पुत्रों को भी स्मरण करिए उन सबके ही साथ मैं अपने गणों सहित दक्ष के निवास स्थान पर जाऊँगा । इसके अनन्तर कमलासन प्रभु के द्वारा वे सब स्मरण किए गए थे जो मन के समान वेग वाले ब्रह्माजी के पुत्र नारद के ही सहित थे । *🙏🌹जय भगवती जय महामाया🌹🙏*

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🕉️🚩श्री कालिका महापुराण में आज🚩 🕉️ श्री कालिका महापुराण दसवां दिन *श्री हरि द्वारा भगवान शिव का अनुनयन* मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-सती देवी अपना बचपन व्यतीत करके फिर परमाधिक शोभन यौवन को प्राप्त हो गई थी और अत्यधिक रूप लावण्य से सुसम्पन्न वह समस्त अंगों के द्वारा सुमनोहर अर्थात् बहुत ही अधिक मन को हरण करने वाली सुन्दरी थी। दक्ष प्रजापति ने जो लोकों का ईश था उस सती को देखा कि वह यौवन से सुसम्पन्न पूर्ण युवती हो गई हैं। तब उसने यह चिन्ता की थी कि इस सती भी प्रतिदिन स्वयं ही भगवान् शम्भु को प्राप्त करने की इच्छा रखने वाली हो गयी थी। उस सती ने अपनी माता की आज्ञा से भगवान् शम्भु की आराधना की थी जो अपने घर में स्थित होकर की गयी थी । आश्विन मास में नन्दाकाख्या में गुड़ और ओदन से सहित लवणों से हर का योजन करके इसके पश्चात् उसने वन्दना की थी । कार्तिक मास की चतुर्दशी तिथि में पुओं के सति प्रपायसों (खीर ) से जो समाकीर्ण थे भगवान् हर की समाराधना करके फिर परमेश्वर प्रभु शम्भु का स्मरण किया था। मार्गशीर्ष मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि में तिलों के सहित यव और ओदनों से भगवान् हर का पूजन करके फिर नीलों के द्वारा दिवस को व्यतीत करती थी। पौष मास में कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि के दिन में रात्रि में जागरण करके प्रातःकाल में शिव का उस सती ने कृष्ण के द्वारा यजन किया था । माघ मास की पूर्णमासी में रात्रि में जागरण करके गीले वस्त्र धारण करती हुई नदी के तट पर भगवान् हर का पूजन करती थी । उस पूरे मास में भगवान् शम्भु में नियत मन वाली ने नियत आहार किया था जो अनेक प्रकार के फलों और पुष्पों से ही किया गया था जो भी उस काल में समुत्पन्न होने वाले थे । माघ मास में विशेष रूप से कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी में रात्रि जागरण करके देव का विल्व पत्रों के द्वारा यजन किया करती थी। चैत्र मास में शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी में पलाश के पुष्पों से भगवान् शिव की पूजा की थी और दिन तथा रात में उनका स्मरण करते हुए समय को व्यतीत किया था। वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया के दिन में यवों के सहित ओदनों के द्वारा देव शम्भु का यजन करके द्रव्यों पूरे मास अनचरण किया करती थी वृषवाहन प्रभु का स्मरण करती हुई उस सती ने निराहार रहकर ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि में वृषवाहन देव का यजन करके वसनों से और पुष्यों के द्वारा उसको पूर्ण किया था। आषाढ़मास की चतुर्दशी तिथि में जो कि शुक्ल पक्ष की थी कृतिवासा देव का वृहती के पुष्पों के द्वारा यजन करके उसने उसी भाँति पूजन किया था । श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन और चतुर्दशी में उसने पवित्र यज्ञोपवीतों तथा वस्त्रों के द्वारा देव का पूजन किया था। भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी में नाना भाँति के फल तथा पुष्पों के द्वारा भली-भाँति देव का भजन करके चतुर्दशी में जल का ही भोजन किया था। इस प्रकार से जो पूर्व में व्रत सती ने आरम्भ किया था उसी समय में सावित्री के सहित ब्रह्माजी भगवान् शम्भु के समीप हुए थे । भगवान् वासुदेव भी अपनी लक्ष्मी देवी के सहित उनके सन्निधि में गए थे जहाँ पर भगवान् शम्भु हिमालय गिरि के प्रस्थ पर अपने गणों के सहित विराजमान थे । भगवान् शम्भु के उन दोनों ब्राह्मणों की ओर भगवान् कृष्ण को देखकर जो अपनी पत्नियों के साथ संगत हुए वहाँ पर प्राप्त हुए थे जैसा भी समुचित शिष्टाचार था उसी के अनुसार उनसे सम्भाषण करके उनके यहाँ पर समागमन का कारण शंकर प्रभु ने पूछा था। इस प्रकार से उन दोनों का दर्शन करके जो दाम्पत्य भाव से संगत थे, शम्भु ने भी दारा से परिग्रहण करने की इच्छा मन में की थी। इसके उपरान्त तात्विक रूप से अपने आगमन का कारण पूछा कि आप लोग यहाँ पर किस प्रयोजन को सुसम्पादित किए जाने के लिए समागत हुए हैं और आपका यहाँ पर क्या कार्य हैं ? इसी रीति से भगवान् शम्भु के द्वारा पूछे गए वे दोनों में से लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने भगवान् विष्णु के द्वारा प्रेरित होकर महादेव जी से कहा था। ब्रह्माजी ने कहा-हे त्रिलोचन! जिस कार्य के सम्पादन कराने के लिए यहाँ पर हम दोनों ही आये हैं उसका अब आप श्रवण कीजिए । हे वृषभध्वज! विशेष रूप से तो हम दोनों का आगमन देव अर्थात् आपके ही लिए है और सम्पूर्ण विश्व के लिए भी है । हे शम्भो! मैं तो केवल सृजन करने के ही कार्य में निरत रहता हूँ और यह भगवान् हरि उस सृष्टि के पालन करने के कार्य संलग्न में रहा करते हैं और आप इस सृष्टि का संहार करने में रत हुआ करते हैं यही प्रतिसर्ग में जगत् का कार्य होता रहता है । उस कर्म में सदैव मैं आप दोनों के सहित समर्थ हूँ। यह हरि मेरे और आपके सहयोग के बिना समर्थन नहीं होते हैं। आप संहार करने में हम दोनों के सहयोग के बिना समर्थ नहीं होते हैं । इस कारण हे वृषभध्वज ! परस्पर के कृत्यों में सभी की सहायता आवश्यक है । हमारी सहायता सदा योग्य ही है अन्यथा यह जगत् नहीं होता है । कुछ ऐसे हैं आपके वीर्य से समुत्पन्न होने वाले के द्वारा वध के योग्य हैं और मेरे अंश से समुत्पन्न के द्वारा वध के लायक होते हैं। दूसरे ऐसे हैं जो माया के द्वारा देवों के बैरी असुर वध के योग्य होते हैं । आप तो जब योग से मुक्त होते हैं और राग -द्वेष से मुक्त हैं तथा केवल प्राणियों पर ही दया करने में निरत रहा करते हैं तो आपके द्वारा असुर वध करने के योग्य नहीं हो सकते हैं । हे ईश! उनके अबाधित रहने पर यह सृष्टि और स्थिति कैसे संभव हो सकते हैं ? हे हर! जब सृजन, पालन और संहार के कर्म न करने योग्य होंगे तब हमारा शरीर भेद और माया का भी युक्त नहीं होता है । वैसे हम सब एक ही स्वरूप वाले हैं अर्थात् तात्पर्य यह है कि ब्रह्मा विष्णु और महेश्वर इन तीनों का एक ही शक्ति स्वरूप हैं हम सब कार्यों के विभिन्न होने ही से भिन्न रूप वाले होते हैं । यदि कार्यों का भेद सिद्ध नहीं होता है तो यह रूपों का भेद भी प्रयोजन से रहित ही है । वैसे एक ही तीनों रूपों में होकर हम विभिन्न स्वरूप वाले होते हैं । हे महेश्वर ! यह सनातन अर्थात् सदा से चला आया तत्व है इसको जान लीजिए । यह माया भी भिन्न रूपों से कमला नाम वाली अर्थात् महालक्ष्मी सरस्वती और सावित्री तथा सन्ध्या कार्यों के भेद से ही भिन्न हुई हैं । हे महेश्वर! अनुराग की प्रवृति का मूल नारी ही है । रामा के परिग्रह से ही पीछे काम, क्रोध आदि का उद्भव (जन्म) होता है। काम क्रोध आदि के कारणस्वरूप अनुराग के होने पर यहाँ पर जन्तुगण विराग के हेतु का यत्नपूर्वक सान्त्वन किया करते हैं । अनुराग के वृक्ष से संग ही सर्वप्रथम महान् फल होता है। उसी संग से काम की समुत्पत्ति हुआ करती है। काम से क्रोध उत्पन्न होता है । स्वाभाविक ज्ञान से ही वैराग्य और निवृत्ति होती है । संसार की विमुखता से सनातन हेतु असंग ही होती है । हे महेश्वर! यहाँ पर दया नित्य ही हुआ करती हैं अर्थात् जो संसार से विमुख हैं उसमें नित्य ही दया का होना आवश्यक है और दया के साथ-साथ शान्ति भी होती है । अहिंसा और तप, शान्ति ज्ञानमार्ग का अनुसाधन है । आपके तपोनिष्ठ, विसंगी अर्थात् संगरहित तथा दया से संयुत होने पर अहिंसा तथा शान्ति आपको सदा ही होगी। इसके न करने पर जो-जो दोष हैं वे सभी आपको बतला दिए गए हैं । हे जगत्पते! इस कारण से आप विश्व के और देवों के हित के लिए भार्यार्थ में एक परमशोभना वामा का परिग्रहण करें । जिस प्रकार से लक्ष्मी भगवान् विष्णु की पत्नी है और सावित्री मेरी पत्नी है उसी भाँति शम्भु की जो सहचारिणी होवे उसका ही आप परिग्रहण कीजिए। मार्कण्डेय मुनि कहा-इस तरह से हर के आगे ब्रह्माजी के वचन का श्रवण कर मन्द मुस्कराहट के सहित मुख वाले हरि ने उस समय में लोकों के ईश ब्रह्माजी से कहा । ईश्वर ने कहा -जो आपने कहा है वह इसी प्रकार से तथ्य है। ब्रह्माजी! यह विश्व के ही निमित्त से होना ही चाहिए किन्तु स्वार्थ से भली - भाँति ब्रह्मा के चिन्तन करने से मेरी प्रवृत्ति नहीं होती है तो भी वह मैं करूंगा जो जगत् की भलाई के लिए आप कहेंगे। सो हे महाभाग! आप श्रवण कीजिए । जो मेरे तेज को सहन करने में भागशः समर्थ हो यहाँ पर भार्या के ग्रहण करने में उसी को आप बतलाइये जो योगिनी और कामरूपिणी दोनों ही होवे । जब मैं योग में युक्त होऊँ उस अवसर पर उसी भाँति वह भी योगिनी हो जावेगी और जिस समय में कामवासना में आसक्त होऊँ तो उस अवसर पर वह मोहिनी ही होवेगी । हे ब्रह्माजी! भार्या के लिए उसी को आप बतलाइए जो वरवर्णिनी होवे । वेदों के ज्ञाता महामनीषीगण जो अक्षर को जानते हैं अर्थात् जिस अक्षर का ज्ञान रखते हैं उसी परमज्योति के स्वरूप वाले को जो सनातन है मैं चिन्तन करूँगा । हे ब्रह्माजी! मैं उसी की चिन्ता में सदा आसक्त होता हुआ भावना को गमन किया करता हूँ अर्थात् भावना में निमग्न हो जाता हूँ । उस भावना में जो विघ्न डालने वाली हो वह मेरी होने वाली वाम न होवे । हे महाभाग! आप अथवा विष्णु भगवान् या मैं भी सब पर ब्रह्मा के रूप वाले हैं और एक दूसरे के अंगभूत हैं । जो योग्य हो उसका ही अनुचिन्तन करो । हे कमलासन! उसकी चिन्ता के बिना मैं स्थित नहीं रहूँगा उस कारण से ऐसी ही जाया को बतलाइए जो सदा मेरे कर्म के ही अनुगत रहने वाली होवे । मार्कण्डेय मुनि ने कहा - सम्पूर्ण जगतों के 1. स्वामी ब्रह्माजी ने यह उनके वचन का श्रवण कर स्थिति के सहित प्रसन्न मन वाले ने यह वचन कहा था। ब्रह्माजी ने कहाहे महादेव! जैसी आपने वर्णित की है वैसी ही एक है जो प्रजापति दक्ष की तनया पुत्री ) हुई है जिसका नाम 'सती' है और वह परम शोभना है । वह ऐसी सुधीमती आपकी भार्या होगी। उसी को जो आपको पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कामिनी है। उसको आप जान लीजिए । हे देवेश्वर! आप तो सभी आत्माओं में वर्तमान रहने वाले हैं । मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इनके अनन्तर ब्रह्माजी के वचन के उपरान्त भगवान् मधुसूदन ने कहा कि जो कुछ भी ब्रह्माजी ने कहा है वह सब आप करिए । उन शंकर प्रभु के द्वारा 'मैं वही मरूंगा', ऐसा कहने पर वे दोनों ( ब्रह्मा और विष्णु) अपने-अपने आश्रमों को चले गए थे। ब्रह्माजी और हरि भगवान् बहुत ही प्रसन्न हुए जो कि सावित्री और कमला से संयुत थे। कामदेव भी महादेव जी के वचन का श्रवण करके अपने मित्र (बसन्त) के सहित और पत्नी रति के साथ में आमोद से युक्त हो गया था। उसने विविक्त रूप वाला कर शम्भु को प्राप्त कर निरन्तर बसन्त को विनियोजित कर वहीं पर स्थित हो गया। *🙏🌹जय भगवती जय महामाया🌹🙏*

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Manoj Kumar Aggarwal Feb 27, 2021

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