Tarlok
Tarlok Mar 25, 2019

वह ईनशान किस काम का जो की सिरफ अपनो को छोड कर किसी और की शारिरीक , आतमिक, मानशिक,सामाजिक,या आरथीक रूप से जरुरत मंद की मदद न करे।

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कामेंट्स

Narayan Tiwari Mar 25, 2019
जय मृत्युंजय🚩जय मांई मंदिर ऐप पर बहुत से यूजर्स बनावटी चेहरे लिए घूम रहें है! बहुत से यूजर्स के चेहरों पर मुखौटे हैं। व्यक्ति बाहर से जैसा दिखता है, वैसा अंदर हैं नहीं! जैसा वह अंदर हैं। बाहर वैसा दिखना नहीं चाहता! चेहरों की मानों मंडी लगीं हैं..! ।। जय मांई की।।🚩

Narayan Tiwari Mar 26, 2019
@soulhealer कल पोस्ट की गई है सतनाम वाहेगुरु जी।।🚩

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Deepak nagpal Apr 24, 2019

https://youtu.be/zWWX51jLC94

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शिव son Apr 23, 2019

वरदान:-

किसी के व्यर्थ समाचार को सुनकर इन्ट्रेस्ट बढ़ाने के बजाए फुलस्टाप लगाने वाले परमत से मुक्त भव

कई बच्चे चलते-चलते श्रीमत के साथ आत्माओं की परमत मिक्स कर देते हैं। जब कोई ब्राह्मण संसार का समाचार सुनाता है तो उसे बहुत इन्ट्रेस्ट से सुनते ह...

(पूरा पढ़ें)
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Deepak nagpal Apr 24, 2019

https://youtu.be/zWWX51jLC94

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Swami Lokeshanand Apr 24, 2019

कौशल्याजी ने भरतजी को अपनी गोद में बैठा लिया और अपने आँचल से उनके आँसू पोंछने लगीं। कौशल्याजी को भरतजी की चिंता हो आई। दशरथ महाराज भी कहते थे, कौशल्या! मुझे भरत की बहुत चिंता है, कहीं राम वनवास की आँधी भरत के जीवन दीप को बुझा न डाले। राम और भरत मेरी दो आँखें हैं, भरत मेरा बड़ा अच्छा बेटा है, उन दोनों में कोई अंतर नहीं है। और सत्य भी है, संत और भगवान में मात्र निराकार और साकार का ही अंतर है। अज्ञान के वशीभूत होकर, अभिमान के आवेश में आकर, कोई कुछ भी कहता फिरे, उनके मिथ्या प्रलाप से सत्य बदल नहीं जाता कि भगवान ही सुपात्र मुमुक्षु को अपने में मिला लेने के लिए, साकार होकर, संत बनकर आते हैं। वह परमात्मा तो सर्वव्यापक है, सबमें है, सब उसी से हैं, पर सबमें वह परिलक्षित नहीं होता, संत में भगवान की भगवत्ता स्पष्ट झलकने लगती है। तभी तो जिसने संत को पहचान लिया, उसे भगवान को पहचानने में देरी नहीं लगी, जो सही संत की दौड़ में पड़ गया, वह परमात्मा रूपी मंजिल को पा ही गया। भरतजी आए तो कौशल्याजी को लगता है जैसे रामजी ही आ गए हों। भरतजी कहते हैं, माँ! कैकेयी जगत में क्यों जन्मी, और जन्मी तो बाँझ क्यों न हो गई ? कौशल्याजी ने भरतजी के मुख पर हाथ रख दिया। कैकेयी को क्यों दोष देते हो भरत! दोष तो मेरे माथे के लेख का है। ये माता तुम पर बलिहारी जाती है बेटा, तुम धैर्य धारण करो। यों समझते समझाते सुबह हो गई और वशिष्ठजी का आगमन हुआ। यद्यपि गुरुजी भी बिलखने लगे, पर उन्होंने भरतजी के माध्यम से, हम सब के लिए बहुत सुंदर सत्य सामने रखा। कहते हैं, छ: बातें विधि के हाथ हैं, इनमें किसी का कुछ बस नहीं है और नियम यह है कि अपरिहार्य का दुख नहीं मनाना चाहिए। "हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ"

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