Shree Khudneshwar Dham(Shiv Mandir),Morwa ,Dist.- Samastipur,Bihar

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Shree Khudneshwar Dham(Shiv Mandir),Morwa ,Dist.- Samastipur,Bihar

#महादेव #मंदिर
Shree Khudneshwar Dham(Shiv Mandir),Morwa ,Dist.- Samastipur,Bihar ,Where The Shivlingam had been discovered by a Muslim lady named khudano biby.She continued to worship Lord Shiv there and after her death the Hindu devotees graved her in the temple(garbage grih)of lord Shiv.People who come to worship Lord Shiv,also offer their prayers to Khudano Bibi

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Ramesh Agrawal Aug 7, 2020

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Dr.ratan Singh Aug 6, 2020

🎎श्रावण माह विशेष🎎 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 🚩🔱ॐ नमः शिवाय 🔱🚩 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️ 💐श्रावण मास माहात्म्य 💐 ☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️☸️ ✍️ अध्याय= 25-26 ✍️ ✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️ 🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱🔱 🎎श्रावण अमावस्या को किए जाने वाले पिठोरी व्रत का वर्णन🎎 ********************************************* ✍️ ईश्वर बोले – हे मुनिश्रेष्ठ ! अब मैं उत्तम पिठोरी व्रत का वर्णन करूँगा. सभी संपदाओं को प्रदान करने वाला यह व्रत श्रावण मास की अमावस्या को होता है. जो यह घर है वह सभी वस्तु मात्र का अधिष्ठान है इसलिए इसे पीठ कहा गया है और पूजन में वस्तु मात्र के समूह को “आर” कहते हैं, अतः हे मुनीश्वर ! इस व्रत का नाम इसलिए “पिठोर” है. अब मैं उसकी विधि कहूँगा, सावधान होकर सुनिए. दीवार को ताम्रवर्ण, कृष्णवर्ण अथवा श्वेतवर्ण धातु से पोतना चाहिए. अगर ताम्रवर्ण से पोता गया हो तो पीले रंग से, कृष्ण वर्ण से पोता गया तो श्वेत रंग से और श्वेत वर्ण से पोता गया हो तो कृष्ण वर्ण से चित्र बनाना चाहिए. अथवा श्वेत पीत से, लाल से, काले या हरे वर्ण से चित्र बनाएं. मध्य में पार्वती सहित शिव की मूर्त्ति अथवा शिवलिंग को बनाकर विस्तीर्ण दीवार पर संसार की अनेक चीजों का चित्र बनाएं. चतुःशाला सहित रसोईघर, देवालय, शयनघर, सात खजाने, स्त्रियों का अंतःपुर जो महलों तथा अट्टालिकाओं से सुशोभित तथा शाल के वृक्षों से मण्डित हो, चूने आदि से दृढ़ता से बंधे पाषाणों तथा ईंटों से सुशोभित हो और जिसमें विचित्र दरवाजे-छत तथा क्रीड़ास्थान हों, इन सभी को चित्रित करें. बकरियां, गायें, भैंस, घोड़े, ऊँट, हाथी, चलने वाला रथ, अनेक प्रकार की सवारी गाड़ियाँ, स्त्रियां, बच्चे, वृद्ध, जवान, पुरुष, पालकी, झूला और अनेक प्रकार के मंच – इन सबका अंकन करें. सुवर्ण, चाँदी, ताम्र, सीसा, लोहा, मिटटी तथा पीतल के और अन्य प्रकार के विभिन्न रंगों वाले पात्रों को लिखें. शयन संबंधी जितने भी साधन हैं – चारपाई, पलंग, बिस्तर, तकिया आदि, बिल्ली, मैना अन्य और भी शुभ पक्षी, पुरुषों तथा स्त्रियों के अनेक प्रकार के आभूषण, बिछाने तथा ओढ़ने के जो वस्त्र हैं, यज्ञ के जितने भी पात्र होते है, मंथन के लिए दो स्तम्भ व तीन रस्सियां, दूध, मक्खन, दही, तकर, छाछ, घी, तेल, तिल – इन सभी को दीवार पर लिखें. गेहूं, चावल, अरहर, जौ, मक्का, वार्तानल (एक प्रकार का अन्न होता है), चना, मसूर, कुलथी, मूंग, कांगनी, तिल, कोदों, कातसी नामक अन्न, साँवाँ, चावल, उड़द – ये सभी धान्यवर्ग भी अंकित करें. सील, लोढ़ा, चूल्हा, झाड़ू, पुरुषों व स्त्रियों के सभी वस्त्र, बाँस तथा तृण के बने हुए सूप आदि, ओखली, मूसल, (गेहूं आदि पीसने तथा अरहर आदि दलने के लिए) दो यन्त्र – चाकी तथा दरैता, पंखा, चंवर, छत्र, जूता, दो खड़ाऊं, दासी, दास, नौकर, पोष्यवर्ग, तृण आदि पशुओं का आहार, धनुष, बाण, शतघ्नी (एक प्रकार का अस्त्र), खडग, भाला, बरछी, ढाल, पाश, अंकुश, गदा, त्रिशूल, भिन्दिपाल, तोमर, मुद्गर, फरसा, पट्टिश, भुशुण्डि, परिघ, चक्रयन्त्र आदि, जलयन्त्र, दवात, लेखनी, पुस्तक, सभी प्रकार के फल, छुरी, कैंची, अनेक प्रकार के पुष्प, विल्वपत्र, तुलसीदल, मशाल-दीपक तथा दीवट आदि उनके साधन, अनेक विध खाने योग्य शाक तथा पकवानों के जितने भी प्रकार हैं – उन सभी को लिखना है. जो वस्तुएं यहां नहीं बताई गई है उस सबको भी दीवार पर लिखना है क्योंकि यहां पर सभी कुछ लिखना संभव नहीं है क्योंकि एक-एक पदार्थ के सैकड़ो तथा हजारों भेद हैं और मैं कितना कह सका हूँ. सोलहों उपचारों से इन सभी का पूजन होना चाहिए. पूजन में अनेक प्रकार के गंध-द्रव्य, पुष्प, धूप तथा चन्दन अर्पित करें. ब्राह्मणों, बालकों तथा सौभाग्यवती स्त्रियों को भोजन कराएं. उसके बाद पार्वती सहित शिव से प्रार्थना करें – “मेरा व्रत संपूर्ण हो. हे साम्ब शिव ! हे दयासागर ! हे गिरीश ! हे चंद्रशेखर ! इस व्रत से प्रसन्न होकर आप हमारे मनोरथ पूर्ण करें.” इस प्रकार पाँच वर्ष तक व्रत करके बाद में उद्यापन कर देना चाहिए. इसमें घृत तथा बिल्वपत्रों से शिव-मन्त्र के द्वारा होम होता है. एक दिन अधिवासन करके सर्वप्रथम ग्रह होम करना चाहिए. आहुति की संख्या एक हजार आठ अथवा एक सौ आठ होनी चाहिए. हे वत्स ! उसके बाद आचार्य की पूजा करें और भूयसी दक्षिणा दें. इसके बाद व्यक्ति इष्ट बंधुजनों तथा कुटुंब के साथ स्वयं भोजन करे. ऐसा विधान किए जाने पर मनुष्य सभी कामनाओं को प्राप्त कर लेता है. इस लोक में जो-जो वस्तुएं उसे परम अभीष्ट होती है, उन सभी को वह पा लेता है. हे वत्स ! मैंने आपसे इस उत्तम पिठोरी व्रत का वर्णन कर दिया. इस व्रत के समान सभी मनोरथों तथा समृद्धियों को प्रदान करने वाला और शिवजी की प्रसन्नता करने वाला न कोई व्रत हुआ है और न तो होगा. मनुष्य इस व्रत में दीवार पर जो-जो वस्तु बनाता है उसको निश्चित रूप से पा लेता है. || इस प्रकार श्रीस्कन्द पुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “अमावस्या में पिठोरी व्रत कथन” नामक पच्चीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ || 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 ✍️अध्याय=26✍️ 🎎श्रावण अमावस्या को किये जाने वाले वृष पूजन और कुश ग्रहण का विधान🎎 ////////////////////////////////////////////////////////////// ✍️ ईश्वर बोले – हे सनत्कुमार ! श्रावण मास में अमावस्या के दिन जो करणीय है, उसको तथा प्रसंगवश जो कुछ अन्य बात मुझे याद आ गई है, उसको भी मैं आपसे कहता हूँ. पूर्वकाल में अनेक प्रकार के महान बल तथा पराक्रम वाले, जगत का विध्वंस करने वाले तथा देवताओं का उत्पीड़न करने वाले दुष्ट दैत्यों के साथ मेरे अनेक युद्ध हुए. मैंने शुभ वृषभ अर्थात नन्दी पर आरूढ़ होकर संग्राम किए, किन्तु महाशक्तिशाली तथा महापराक्रमी उस वृषभ ने मुझको नहीं छोड़ा. अंधकासुर के साथ युद्ध में तो नन्दी का शरीर विदीर्ण हो गया था, उसकी त्वचा कट गई, शरीर से रक्त बहने लगा और उसके प्राण मात्र बचे रह गए थे फिर भी जब तक मैंने उस दुष्ट का संहार नहीं किया तब तक वह नन्दी धैर्य धारण कर मेरा वहन करता रहा. उसकी इस दशा को मैंने जान लिया था. उसके बाद उस अंधक का वध करके मैंने प्रसन्न होकर नन्दी से कहा – हे सुव्रत ! मैं तुम्हारे इस कृत्य से प्रसन्न हूँ, वर माँगो. तुम्हारे घाव ठीक हो जाएँ. तुम बलवान हो जाओ और तुम्हारा पराक्रम तथा रूप पहले से भी बढ़ जाए. इसके अतिरिक्त तुम जो-जो वर माँगोगे, उसे मैं तुम्हें अवश्य दूँगा. नंदिकेश्वर बोले – हे देवदेव ! हे महेश्वर ! मेरी कोई याचना नहीं है. आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो फिर इससे बढ़कर क्या वैभव हो सकता है. तथापि हे भगवन ! लोकोपकार के लिए मैं मांग रहा हूँ. हे शिव ! आज श्रावण मास की अमावस्या है, जिसमें आप मुझ पर प्रसन्न हुए हैं. इस तिथि में गायों सहित उत्तम मिटटी से निर्मित वृषभों की पूजा करनी चाहिए. आज अमावस्या के दिन जन्म लेना कामधेनु तुल्य होता है. अतः इस तिथि में वर प्रदान करें की यह अमावस्या वांछित फल देने वाली हो. आज के दिन भक्तिपूर्वक प्रत्यक्ष वृषभों तथा गायों की पूजा करनी चाहिए. गेरू आदि धातुओं से प्रयत्नपूर्वक उन्हें भूषित करना चाहिए. उनकी सींगों पर सोना, चाँदी आदि के पत्तर मढ़े और रेशम के बड़े-बड़े गुच्छों को भी सींगों पर बांधे. अनेक प्रकार के वर्णों से चित्रित सुन्दर वस्त्र से उनकी पीठ को ढक दें और गले में मनोहर शब्द करने वाला घण्टा बाँध दे. सूर्योदय से लगभग चार घड़ी बीतने पर गायों को ग्राम से बाहर ले जाकर पुनः सांयवेला में ग्राम में प्रवेश कराएं. आहार के रूप में सरसों, तिल की खली आदि अनेक प्रकार का अन्न इस दिन अर्पित करें. जो इस दिन ऐसा करता है, उसका गोधन सदा बढ़ता रहता है. जिस घर में गाय ना हों वह श्मशान के समान होता है. पंचामृत तथा पंचगव्य दूध के बिना नहीं बनते है. गोबर से लेप किए बिना घर पवित्र नहीं होता. हे सुरोत्तम ! जहाँ गोमूत्र से छिड़काव नहीं होता वहाँ चींटी आदि जंतुओं का उपद्रव विद्यमान रहता है. हे महादेव ! दूध के बिना भोजन का रस ही क्या है? हे प्रभो ! यदि आप मेरे ऊपर प्रसन्न है तो इन वरों को तथा अन्य वरों को भी मुझे प्रदान कीजिए. हे सनत्कुमार ! तब नन्दी का यह वचन सुनकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ. मैंने कहा – हे वृषश्रेष्ठ ! जो तुमने माँगा है सब हो जाए. हे नन्दिन ! इस दिन का जो अन्य नाम है, उसे भी सुनो. जो वृषभ किसी के द्वारा कहीं भी किसी कार्य में प्रयुक्त नहीं किया जाता और तृण खाता हुआ तथा जल पीता हुआ जो शांतिपूर्वक विचरण करता है तथा महान वीर व बलशाली होता है उसे “पोल” कहा जाता है. अतः हे नन्दिन ! उसी के नाम से यह दिन “पोला” नामवाला होगा. इस दिन अपने इष्ट बंधुओं के साथ महान उत्सव करना चाहिए. हे वत्स ! मैंने उस दिन ये श्रेष्ठ वर प्रदान किए थे अतः लोगों के द्वारा इस श्रेष्ठ दिन को “पोला” नामवाला कहा गया है. इस दिन सभी कामनाओ को पूर्ण करने वाला वृषभों का महान उत्सव करना चाहिए. इसके साथ ही अब मैं इसी तिथि में किए जाने वाले कुशग्रहण का वर्णन करूँगा. श्रावण मास की अमावस्या के दिन पवित्र होकर कुशों को उखाड़ लाएं. वे कुश सदा ताजे होते हैं, उन्हें बार-बार प्रयोग में लाना चाहिए. कुश, काश, यव, दूर्वा, उशीर, सकूदक, गेहूँ, व्रीहि, मूंज और बल्वज – ये दस दर्भ होते हैं. “ब्रह्माजी के साथ उत्पन्न होने वाले तथा ब्रह्माजी की इच्छा से प्रकट होने वाले हे दर्भ ! मेरे सभी पापों का नाश कीजिए और कल्याणकारक होइए” – इस मन्त्र का उच्चारण करने के साथ ईशान दिशा में मुख करके “हुं फट” – मन्त्र के द्वारा एक ही बार में कुश को उखाड़ लें. जिनके अग्र भाग टूटे हुए ना हों तथा शुष्क न हों, वे हरित वर्ण के कुश श्राद्धकर्म के योग्य कहे गए हैं और जडऱहित कुश देवकार्यों तथा जप आदि में प्रयोग के योग्य होते हैं. सात पत्तों वाले कुश देवकार्य तथा पितृकार्य के लिए श्रेष्ठ होते हैं. मूलरहित तथा गर्भयुक्त, अग्रभागवाले तथा दस अंगुल प्रमाण वाले दो दर्भ पवित्रक के लिए उपयुक्त होते हैं. ब्राह्मण के लिए चार कुश पत्रों का पवित्रक बताया गया है और अन्य वर्णों के लिए क्रमशः तीन, दो और एक दर्भ का पवित्रक कहा गया है अथवा सभी वर्णों के लिए दो दर्भों का ग्रंथियुक्त पवित्रक होता है. यह पवित्रक धारण करने के लिए होता है, इसे मैंने आपको बता दिया है. उत्पवन हेतु सभी के लिए दो दर्भ उपयुक्त होते हैं. पचास दर्भों से ब्रह्मा और पच्चीस दर्भों से विष्टर बनाना चाहिए. आचमन के समय हाथ से पवित्रक को नहीं निकालना चाहिए. विकिर के लिए पिंड देने तथा अग्नौकरण करने के साथ और पाद्य देने के पश्चात पवित्रक का त्याग कर देना चाहिए. दर्भ के समान पुण्यप्रद, पवित्र और पापनाशक कुछ भी नहीं है. देवकर्म तथा पितृकर्म – ये सब दर्भ के अधीन हैं. उस प्रकार के दर्भों को श्रावण मास की अमावस्या के दिन उखाड़ना चाहिए, इससे इनकी पवित्रता बनी रहती है. श्रावण मास की अमावस्या का वर्णन क्या किया जाए. हे सनत्कुमार ! श्रावण मास की अमावस्या के दिन जो कृत्य होता है, उसे मैंने कह दिया. श्रावण मास में और भी जो करणीय है, उसे भी मैं आपसे कहता हूँ. || इस प्रकार श्रीस्कन्द पुराण के अंतर्गत ईश्वर सनत्कुमार संवाद में श्रावण मास माहात्म्य में “अमावस्या के दिन वृषभ पूजन-कुशग्रहण” नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ || 🚩🔱 हर हर महादेव 🔱🚩 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪🇮🇪

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Ashish shukla Aug 6, 2020

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Ravindra Rana Aug 6, 2020

🔱ऊँ नमःशिवाय🔱शिवोऽहम्🔱 *👁️🔱हर हर👁️महादेव🔱👁️* *💕🌹जय श्री महाकाल🌹💕* ✍️जय भोले सभी भक्तों को✍️ 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 🚩🚩राम नाम महिमा 🚩🚩✍️ स्कन्दपुराण के ब्राह्मखंड में व्यास जी कहते हैं - जो लोग राम-राम-राम इस मंत्र का उच्चारण करते हैं, खाते, पीते, सोते, चलते और बैठते समय, सुख में या दुःख में #राम मंत्र का जप करते हैं, उन्हें दुःख, दुर्भाग्य व व्याधि का भी भय नहीं रहता। उनकी आयु, सम्पति और बल प्रतिदिन बढ़ते रहते हैं। राम का नाम लेने से मनुष्य भयंकर पाप से छूट जाता है। वह नरक में नहीं पड़ता और अक्षय गति को प्राप्त होता है। पार्वती द्वारा शिव जी से पूछने पर शिवजी कहते हैं 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 पद्मपुराण उत्तरखंड🚩 राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।। रकारादीनि नामानि शृण्वतो मम पार्वति। मन: प्रसन्नतां याति रामनामाभिशंकया।। (पद्म. उत्तर. २८१।२१-२२) 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 ’मैं तो ‘राम! राम! राम!’ इस प्रकार जप करते हुए ‘श्रीराम’ नाम में ही निरन्तर रमण किया करता हूँ। ‘राम’ नाम सम्पूर्ण सहस्त्रनाम के समान है। रकारादि जितने नाम हैं,उन्हें सुनकर ‘राम’ नाम की आशंका से मेरा मन प्रसन्न हो जाता है।’ 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 रामचरितमानस🚩 महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू॥ महिमा जासु जान गनराऊ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ॥ भावार्थ:-✍️ "राम" नाम वह महामंत्र है जिसे श्रीशंकर जी निरन्तर जपते रहते हैं, जो कि जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होने के लिये सबसे आसान ज्ञान है।"राम"नाम की महिमा को श्रीगणेश जी जानते हैं जो कि इस नाम के प्रभाव के कारण ही सर्वप्रथम पूजित होते हैं। 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 नहिं कलि करम न भगति बिबेकू।🚩 राम नाम अवलंबन एकू॥ कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू॥ भावार्थ:-✍️ कलियुग में न तो कर्म है, न भक्ति है और न ज्ञान ही है, केवल"राम" नाम ही एकमात्र आधार है। जिस प्रकार कपटी कालनेमि को मारने में श्रीहनुमान जी समर्थ हैं उसी प्रकार बुद्धिमान मनुष्य कलियुग में कालनेमि रूपी कपट को "राम" नाम से मारकर कपट-रहित हो जाते हैं।🚩🚩 ⛳☘️⛳☘️⛳☘️⛳☘️⛳☘️⛳☘️⛳

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Shikhaashu singh Aug 7, 2020

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