चिराग
चिराग Nov 28, 2017

" प्रेरक प्रसंग : गीता और स्वामी विवेकानंद... "

"  प्रेरक प्रसंग : गीता और स्वामी विवेकानंद...  "

प्रेरक प्रसंग : गीता और स्वामी विवेकानंद...

एक प्रसंग के अनुसार एक दिन एक युवक स्वामी विवेकानंद के पास आया। उसने कहा- मैं आपसे गीता पढ़ना चाहता हूं। स्वामीजी ने युवक को ध्यान से देखा और कहा- पहले छ: माह प्रतिदिन फुटबॉल खेलो,‍ फिर आओ, तब मैं गीता पढ़ाऊंगा।

युवक आश्चर्य में पड़ गया। गीताजी जैसे ‍पवित्र ग्रंथ के अध्ययन के बीच में यह फुटबॉल कहां से आ गया? इसका क्या काम? स्वामीजी उसको देख रहे थे।

उसकी चकित अवस्था को देख स्वामीजी ने समझाया- बेटा! भगवद्गीता वीरों का शास्त्र है। एक सेनानी द्वारा एक महारथी को दिया गया दिव्य उपदेश है। अत: पहले शरीर का बल बढ़ाओ। शरीर स्वस्थ होगा तो समझ भी परिष्कृत होगी। गीताजी जैसा कठिन विषय आसानी से समझ सकोगे। 

जो शरीर को स्वस्थ नहीं रखता, सशक्त-सजग नहीं रख सकता अर्थात् जो शरीर को नहीं संभाल पाया, वह गीताजी के विचारों को, अध्यात्म को कैसे संभाल सकेगा। उसे पचाने के लिए स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन ही चाहिए। गीता के अध्यात्म को अपने जीवन में कैसे उतार पाएगा? 

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Pk Nanda Nov 29, 2017
very nice and useful post Dhanyabad ji Suprabhat

Bheem Nirola Nov 29, 2017
ॐ नमः। सत्यं वचनम्।। शुभ प्रभात।।

Swami Lokeshanand Apr 25, 2019

आज अयोध्या में बहुत दिनों बाद दरबार लगा है। राजसिंहासन सूना पड़ा है, वशिष्ठजी सभाध्यक्ष हैं। भरतजी और राममाता ने दरबार में प्रवेश किया। विचित्र दृश्य है, होना तो यह चाहिए था कि भरतजी माँ को सहारा देते, यहाँ माँ ही भरतजी को सहारा देकर ला रहीं हैं। उनका अपने से खड़े रह पाना ही कठिन हो रहा है, चलना तो दूर की बात है। कौशल्याजी बाँई ओर के सिंहासन पर बैठ गईं, भरतजी ने कातर दृष्टि से पहले शत्रुघ्नजी की ओर देखा, फिर भूमि पर दृष्टि टिका ली। शत्रुघ्नजी ने तुरंत नीचे भूमि पर उतरीय बिछा दिया, भरतजी बैठ गए। गुरुजी धीर गंभीर वाणी से बोले, भरत! चक्रवर्ती महाराज ने श्रीराम को वनवास और तुम्हें यह राजपद दिया है, जैसे रामजी ने पिताजी की आज्ञा मानी, तुम भी मानो। कम से कम, जब तक रामजी लौटकर अयोध्या वापिस नहीं आ जाते, तब तक तो बैठो। अधिकार समझकर नहीं तो जिम्मेदारी समझकर, कर्तव्य समझकर ही बैठो, पर बैठो। रामजी के आ जाने पर, जो उचित समझो करना, पर अभी तो पद संभालना ही योग्य है। भरत! यह अयोध्या रूपी पौधा कितने कितने महापुरुषों के जीवन से सींचा गया है, क्या यह यूँही सूख जाएगा? राममाता का भी यही मत है, वे भी समझाती हैं, सभी मंत्री भी यही समझा रहे हैं। पर भरतजी का मत है कि पहले मैं भगवान का दर्शन करूंगा, राज्य संचालन बाद में देखा जाएगा। देखें, धर्म दो प्रकार का माना गया है, देह धर्म और आत्म धर्म। जहाँ देह धर्म आत्म धर्म में रुकावट बन जाता है, वहाँ महापुरुष देह धर्म छोड़ देता है। भरतजी भी देह धर्म छोड़ रहे हैं। भरतजी कहते हैं, मेरा जन्म रामजी की सेवा के लिए हुआ है, भोग भोगने के लिए नहीं हुआ। लोकेशानन्द का आग्रह है कि अब आप पाठकजन विचार करें, आपका जन्म किसलिए हुआ है?

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sompal Prajapati Apr 25, 2019

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Swami Lokeshanand Apr 24, 2019

कौशल्याजी ने भरतजी को अपनी गोद में बैठा लिया और अपने आँचल से उनके आँसू पोंछने लगीं। कौशल्याजी को भरतजी की चिंता हो आई। दशरथ महाराज भी कहते थे, कौशल्या! मुझे भरत की बहुत चिंता है, कहीं राम वनवास की आँधी भरत के जीवन दीप को बुझा न डाले। राम और भरत मेरी दो आँखें हैं, भरत मेरा बड़ा अच्छा बेटा है, उन दोनों में कोई अंतर नहीं है। और सत्य भी है, संत और भगवान में मात्र निराकार और साकार का ही अंतर है। अज्ञान के वशीभूत होकर, अभिमान के आवेश में आकर, कोई कुछ भी कहता फिरे, उनके मिथ्या प्रलाप से सत्य बदल नहीं जाता कि भगवान ही सुपात्र मुमुक्षु को अपने में मिला लेने के लिए, साकार होकर, संत बनकर आते हैं। वह परमात्मा तो सर्वव्यापक है, सबमें है, सब उसी से हैं, पर सबमें वह परिलक्षित नहीं होता, संत में भगवान की भगवत्ता स्पष्ट झलकने लगती है। तभी तो जिसने संत को पहचान लिया, उसे भगवान को पहचानने में देरी नहीं लगी, जो सही संत की दौड़ में पड़ गया, वह परमात्मा रूपी मंजिल को पा ही गया। भरतजी आए तो कौशल्याजी को लगता है जैसे रामजी ही आ गए हों। भरतजी कहते हैं, माँ! कैकेयी जगत में क्यों जन्मी, और जन्मी तो बाँझ क्यों न हो गई ? कौशल्याजी ने भरतजी के मुख पर हाथ रख दिया। कैकेयी को क्यों दोष देते हो भरत! दोष तो मेरे माथे के लेख का है। ये माता तुम पर बलिहारी जाती है बेटा, तुम धैर्य धारण करो। यों समझते समझाते सुबह हो गई और वशिष्ठजी का आगमन हुआ। यद्यपि गुरुजी भी बिलखने लगे, पर उन्होंने भरतजी के माध्यम से, हम सब के लिए बहुत सुंदर सत्य सामने रखा। कहते हैं, छ: बातें विधि के हाथ हैं, इनमें किसी का कुछ बस नहीं है और नियम यह है कि अपरिहार्य का दुख नहीं मनाना चाहिए। "हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ"

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Tarlok Apr 25, 2019

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🌹🌹🌹😊😀मुस्कान 😀😊🌹🌹🌹 होंठों की मुस्कान ही मनुष्य का वास्तविक परिधान है,,, रहिमन अपनी विपत्ति को जाय ना कहिये रोय, सुनते ही सब हँसेगे बाट ना लेईहै कोय,, हम जो नहीं कर पाए उसके लिए उदास क्यों होना, हम आज जो कर सकते हैं उस पर बीते दिनों का असर आखिर क्यों आने देना चाहिए। बीती बातों को भुलाकर अगर आज में ही अपनी उर्जा लगाई जाए तो बेहतर नतीजे हमें आगे बढ़ने को ही प्रेरित करेंगे। कल में अटके रहकर हम अपने आज को भी प्रभावित करते हैं और आने वाले कल को भी। थोड़ा संयम थोड़ा हौसले की जरूरत है हंसते रहे मन को किसी भी परिस्थिति में 😔 उदास ना होने दे,, कितना जानता है वह शख्स मेरे बारे में मेरे मुस्कराने पर भी पूंछ लिया तुम्हे तकलीफ क्या है हर हर महादेव जय शिव शंकर

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