Manoj Prasadh
Manoj Prasadh Dec 12, 2017

जानिए सफला एकादशी की व्रतकथा, व्रतविधि और महत्व।

जानिए सफला एकादशी की व्रतकथा, व्रतविधि और महत्व।

सफला एकादशी पारंपरिक हिंदू कैलेंडर में 'पॉश' महीने के दौरान कृष्ण पक्ष के 'एकादशी' (11 वें दिन) पर मनाया जाने वाला शुभ उपवास है। इस एकादशी को 'पॉसा कृष्ण एकदशी' भी कहा जाता है। यदि आप ग्रेगोरीयन कैलेंडर का पालन करते हैं तो इसे दिसंबर से जनवरी के महीनों के बीच मनाया जाता है।

सफला एकादशी का दिन हिंदुओं के लिए पवित्र है क्योंकि यह माना जाता है कि इस दिन ईमानदारी से उपवास करके भक्त अपने पापों को दूर कर सकते हैं और आनंदित जीवन का आनंद उठा सकते हैं। एकादशी एक श्रद्धेय दिन है जो हर चंद्र हिंदू माह में दो बार आती है और इस दिन विश्व के संरक्षक भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।

सफला एकादशी व्रत कथा:
चम्पावती नगरी में एक महिष्मान नाम का राजा राज्य करता था। उसके चार पुत्र थे। उन सबमें लुम्पक नामवाला बड़ा राजपुत्र महापापी था। वह पापी सदा परस्त्री और वेश्यागमन तथा दूसरे बुरे कामों में अपने पिता का धन नष्ट किया करता था। सदैव ही देवता, बाह्मण, वैष्णवों की निंदा किया करता था। जब राजा को अपने बड़े पुत्र के ऐसे कुकर्मों का पता चला तो उन्होंने उसे अपने राज्य से निकाल दिया। तब वह विचारने लगा कि कहाँ जाऊँ? क्या करूँ?

अंत में उसने चोरी करने का निश्चय किया। दिन में वह वन में रहता और रात्रि को अपने पिता की नगरी में चोरी करता तथा प्रजा को तंग करने और उन्हें मारने का कुकर्म करता। कुछ समय पश्चात सारी नगरी भयभीत हो गई। वह वन में रहकर पशु आदि को मारकर खाने लगा। नागरिक और राज्य के कर्मचारी उसे पकड़ लेते किंतु राजा के भय से छोड़ देते।

वन के एक अतिप्राचीन विशाल पीपल का वृक्ष था। लोग उसकी भगवान के समान पूजा करते थे। उसी वृक्ष के नीचे वह महापापी लुम्पक रहा करता था। इस वन को लोग देवताओं की क्रीड़ास्थली मानते थे। कुछ समय पश्चात पौष कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन वह वस्त्रहीन होने के कारण शीत के चलते सारी रात्रि सो नहीं सका। उसके हाथ-पैर अकड़ गए।

सूर्योदय होते-होते वह मूर्छित हो गया। दूसरे दिन एकादशी को मध्याह्न के समय सूर्य की गर्मी पाकर उसकी मूर्छा दूर हुई। गिरता-पड़ता वह भोजन की तलाश में निकला। पशुओं को मारने में वह समर्थ नहीं था अत: पेड़ों के नीचे गिर हुए फल उठाकर वापस उसी पीपल वृक्ष के नीचे आ गया। उस समय तक भगवान सूर्य अस्त हो चुके थे। वृक्ष के नीचे फल रखकर कहने लगा- हे भगवन! अब आपके ही अर्पण है ये फल। आप ही तृप्त हो जाइए। उस रात्रि को दु:ख के कारण रात्रि को भी नींद नहीं आई।

उसके इस उपवास और जागरण से भगवान अत्यंत प्रसन्न हो गए और उसके सारे पाप नष्ट हो गए। दूसरे दिन प्रात: एक ‍अतिसुंदर घोड़ा अनेक सुंदर वस्तुअओं से सजा हुआ उसके सामने आकर खड़ा हो गया।

उसी समय आकाशवाणी हुई कि हे राजपुत्र! श्रीनारायण की कृपा से तेरे पाप नष्ट हो गए। अब तू अपने पिता के पास जाकर राज्य प्राप्त कर। ऐसी वाणी सुनकर वह अत्यंत प्रसन्न हुआ और दिव्य वस्त्र धारण करके ‘भगवान आपकी जय हो’ कहकर अपने पिता के पास गया। उसके पिता ने प्रसन्न होकर उसे समस्त राज्य का भार सौंप दिया और वन का रास्ता लिया।

अब लुम्पक शास्त्रानुसार राज्य करने लगा। उसके स्त्री, पुत्र आदि सारा कुटुम्ब भगवान नारायण का परम भक्त हो गया। वृद्ध होने पर वह भी अपने पुत्र को राज्य का भार सौंपकर वन में तपस्या करने चला गया और अंत समय में वैकुंठ को प्राप्त हुआ।

अत: जो मनुष्य इस परम पवित्र सफला एकादशी का व्रत करता है उसे अंत में मुक्ति मिलती है। जो नहीं करते वे पूँछ और सींगों से रहित पशुओं के समान हैं। इस सफला एकादशी के माहात्म्य को पढ़ने से अथवा श्रवण करने से मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।

सफला एकादशी व्रत विधि:

पद्म पुराण के अनुसार सफला एकादशी के दिन भगवान विष्णु का विधि- विधान व विशेष मंत्रों के साथ पूजन किया जाता है। सफला एकादशी के दिन उपवास करना चाहिए। दीप, धूप, नारियल, फल, सुपारी, बिजौरा, नींबू, अनार, सुंदर आंवला, लौंग, बेर, आम आदि से भगवान श्रीहरि की आराधना करनी चाहिए।

पूजा करने बाद भगवान विष्णु की आरती कर भगवान को भोग लगाना चाहिए। भोग लगाने व प्रसाद वितरण के बाद ब्राह्मण को भोजन करना चाहिए। पद्म पुराण के अनुसार सफला एकादशी के दिन दीप दान करने का विशेष विधान है।

सफला एकादशी का व्रत अपने नाम के अनुसार फल देता है। हिन्दू धर्मानुसार इस व्रत के पुण्य से मनुष्य के सभी कार्य सफल होते हैं और उसके पाप खत्म हो जाते हैं।

सफला एकादशी का महत्व:

सफला एकादशी का महत्व ‘ब्रह्मांडा पुराण' में धर्मराज युधिष्ठिर और भगवान कृष्ण के बीच बातचीत के रूप में वर्णित है। हिंदू ग्रंथों के मुताबिक यह कहा जाता है कि 100 राजसूया यज्ञ और 1000 अश्वमेधि यज्ञ मिल कर भी इतना लाभ नहीं दे स्सकते जितना सफला एकादशी का व्रत रख कर मिल सकता हैं।

सफला एकादशी का दिन एक ऐसे दिन के रूप में वर्णित है जिस दिन व्रत रखने से दुःखों की समाप्ति होती है और भाग्य खुल जाता है। सफला एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति को अपनी साड़ी इच्छाओं और सपनों को पूरा करने में मदद मिलती हैं।

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कामेंट्स

murari pandit Dec 13, 2017
, भगवते वासुदेवाय ओम नमो भगवते वासुदेवाय

sudhirRay Dec 30, 2017
एकादशी का व्रत किस दिन किया जाता है कब और कैसे

gajrajraj Jan 14, 2018
✨✨✨✨✨✨✨✨✨ हर पतंग जानती है, अंत में कचरे मे जाना है लेकिन उसके पहले हमे, आसमान छूकर दिखाना है । ​" बस ज़िंदगी भी यही चाहती है "​ ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ 🌸 ​इस मकर सक्रान्ति🏵✨🌟🌟 के पावन पर्व पर आपको व् आपके परिवारजनो को हार्दिक मंगल शुभकामनाऍ ... ✨✨💐🙏🏻मकर सक्रांन्ति✨🙏🏻💐✨

Gajrajg Jan 29, 2018
उम्र में चाहे कोई बड़ा या छोटा हो,* *लेकिन वास्तव में बड़ा तो वही है,* *जिसके दिल में सबके लिए प्रेम,स्नेह* *और सम्मान की भावना हो॥ 🙏 शुभदिवस 🙏

Gajrajg Feb 1, 2018
पूरे की ख्वाहिश में ये इंसान' बहुत कुछ खौत्ता है ! भूल जाता है कि आधा चाँद भी खूबसूरत होता है. सुप्रभात

Gajrajg Feb 17, 2018
*👉भरोसा उस पर करो* *जो आपके अंदर तीन* *बातें जान सके...* *मुस्कुराहट के पीछे दुःख,* *गुस्से के पीछे प्यार,* *चुप रहने के पीछे वजह ।*. *_" ʝa¥ ֆɦʀɛɛ kʀɨֆɦռa "_* 😘

Gajrajg Mar 6, 2018
ये महज एक दिन नहीं है, ये अपने सपनो को सच करने का एक और मौका है। गुड मॉर्निंग!

Gajrajg Mar 8, 2018
यदि आप उस व्यक्ति की खोज कर रहे हैं जो आपकी ज़िन्दगी बदल सकता है , तो एक बार शीशे में एक नज़र डालें। Good morning

Thakur Nechwani Mar 25, 2018
श्रीराम जिनका नाम है , अयोध्या जिनका धाम है , ऐसे रघुनंदन को प्रणाम है . आपको और आपके परिवार को श्रीराम नवमी की हार्दिक शुभकामनायें.

bebi singh Apr 22, 2018
jai laxmi narayena👃🙏🌷🌷🌷🌷

girdharilal Dec 15, 2019

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एकादश मुखि हनुमत् कवचम् रुद्रयामलतः ॐ श्रीसमस्तजगन्मङ्गलात्मने नमः । श्रीदेव्युवाच शैवानि गाणपत्यानि शाक्तानि वैष्णवानि च । कवचानि च सौराणि यानि चान्यानि तानि च ॥ १॥ श्रुतानि देवदेवेश त्वद्वक्त्रान्निःसृतानि च । किञ्चिदन्यत्तु देवानां कवचं यदि कथ्यते ॥ २॥ ईश्वर उवाच शृणु देवि प्रवक्ष्यामि सावधानावधारय । हनुमत्कवचं पुण्यं महापातकनाशनम् ॥ ३॥ एतद्गुह्यतमं लोके शीघ्रं सिद्धिकरं परम् । जयो यस्य प्रगानेन लोकत्रयजितो भवेत् ॥ ४॥ ॐ अस्य श्रीएकादशवक्त्रहनुमत्कवचमालामन्त्रस्य वीररामचन्द्र ऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः । श्रीमहावीरहनुमान् रुद्रो देवता । ह्रीं बीजं । ह्रौं शक्तिः । स्फें कीलकम् । सर्वदूतस्तम्भनार्थं जिह्वाकीलनार्थं, मोहनार्थं राजमुखीदेवतावश्यार्थं ब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीभूतप्रेतादिबाधापरिहारार्थं श्रीहनुमद्दिव्यकवचाख्यमालामन्त्रजपे विनियोगः । ॐ ह्रौं आञ्जनेयाय अङ्गुष्ठभ्यां नमः । ॐ स्फें रुद्रमूर्तये तर्जनीभ्यां नमः । ॐ स्फें वायुपुत्राय मध्यमाभ्यां नमः । ॐ स्फें अञ्जनीगर्भाय अनामिकाभ्यां नमः । ॐ स्फें रामदूताय कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ॐ ह्रौं ब्रह्मास्त्रादिनिवारणाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । ॐ ह्रौं आञ्जनेयाय हृदयाय नमः । ॐ स्फें रुद्रमूर्तये शिरसे स्वाहा । ॐ स्फें वायुपुत्राय शिखायै वषट् । ॐ ह्रौं अञ्जनीगर्भाय कवचाय हुम् । ॐ स्फें रामदूताय नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ ह्रौं ब्रह्मास्त्रादिनिवारणाय अस्त्राय फट् । इति न्यासः । अथ ध्यानम् । ॐ ध्यायेद्रणे हनुमन्तमेकादशमुखाम्बुजम् । ध्यायेत्तं रावणोपेतं दशबाहुं त्रिलोचनं हाहाकारैः सदर्पैश्च कम्पयन्तं जगत्त्रयम् । ब्रह्मादिवन्दितं देवं कपिकोटिसमन्वितं एवं ध्यात्वा जपेद्देवि कवचं परमाद्भुतम् ॥ दिग्बन्धाः ॐ इन्द्रदिग्भागे गजारूढहनुमते ब्रह्मास्त्रशक्तिसहिताय चौरव्याघ्रपिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ॐ अग्निदिग्भागे मेषारुढहनुमते अस्त्रशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र- पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ यमदिग्भागे महिषारूढहनुमते खड्गशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र- पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ निऋर्तिदिग्भागे नरारूढहनुमते खड्गशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र- पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ वरुणदिग्भागे मकरारूढहनुमते प्राणशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ वायुदिग्भागे मृगारूढहनुमते अङ्कुशशक्तिसहिताय चौरव्याघ्रपिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ कुबेरदिग्भागे अश्वारूढहनुमते गदाशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ ईशानदिग्भागे राक्षसारूढहनुमते पर्वतशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ अन्तरिक्षदिग्भागे वर्तुलहनुमते मुद्गरशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ भूमिदिग्भागे वृश्चिकारूढहनुमते वज्रशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा । ॐ वज्रमण्डले हंसारूढहनुमते वज्रशक्तिसहिताय चौरव्याघ्र- पिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिनीवेतालसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा । मालामन्त्रः। । । ॐ ह्रीं यीं यं प्रचण्डपराक्रमाय एकादशमुखहनुमते हंसयतिबन्ध-मतिबन्ध-वाग्बन्ध-भैरुण्डबन्ध-भूतबन्ध- प्रेतबन्ध-पिशाचबन्ध-ज्वरबन्ध-शूलबन्ध- सर्वदेवताबन्ध-रागबन्ध-मुखबन्ध-राजसभाबन्ध- घोरवीरप्रतापरौद्रभीषणहनुमद्वज्रदंष्ट्राननाय वज्रकुण्डलकौपीनतुलसीवनमालाधराय सर्वग्रहोच्चाटनोच्चाटनाय ब्रह्मराक्षससमूहोच्चाटानाय ज्वरसमूहोच्चाटनाय राजसमूहोच्चाटनाय चौरसमूहोच्चाटनाय शत्रुसमूहोच्चाटनाय दुष्टसमूहोच्चाटनाय मां रक्ष रक्ष स्वाहा ॥ १ ॥ ॐ वीरहनुमते नमः । ॐ नमो भगवते वीरहनुमते पीताम्बरधराय कर्णकुण्डलाद्या- भरणालङ्कृतभूषणाय किरीटबिल्ववनमालाविभूषिताय कनकयज्ञोपवीतिने कौपीनकटिसूत्रविराजिताय श्रीवीररामचन्द्रमनोभिलषिताय लङ्कादिदहनकारणाय घनकुलगिरिवज्रदण्डाय अक्षकुमारसंहारकारणाय ॐ यं ॐ नमो भगवते रामदूताय फट् स्वाहा ॥ ॐ ऐं ह्रीं ह्रौं हनुमते सीतारामदूताय सहस्रमुखराजविध्वंसकाय अञ्जनीगर्भसम्भूताय शाकिनीडाकिनीविध्वंसनाय किलिकिलिचुचु कारेण विभीषणाय वीरहनुमद्देवाय ॐ ह्रीं श्रीं ह्रौ ह्रां फट् स्वाहा ॥ ॐ श्रीवीरहनुमते हौं ह्रूं फट् स्वाहा । ॐ श्रीवीरहनुमते स्फ्रूं ह्रूं फट् स्वाहा । ॐ श्रीवीरहनुमते ह्रौं ह्रूं फट् स्वाहा । ॐ श्रीवीरहनुमते स्फ्रूं फट् स्वाहा । ॐ ह्रां श्रीवीरहनुमते ह्रौं हूं फट् स्वाहा । ॐ श्रीवीरहनुमते ह्रैं हुं फट् स्वाहा । ॐ ह्रां पूर्वमुखे वानरमुखहनुमते लं सकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ आग्नेयमुखे मत्स्यमुखहनुमते रं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ दक्षिणमुखे कूर्ममुखहनुमते मं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ नैऋर्तिमुखे वराहमुखहनुमते क्षं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ पश्चिममुखे नारसिंहमुखहनुमते वं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ वायव्यमुखे गरुडमुखहनुमते यं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ उत्तरमुखे शरभमुखहनुमते सं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ ईशानमुखे वृषभमुखहनुमते हूं आं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ ऊर्ध्वमुखे ज्वालामुखहनुमते आं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ अधोमुखे मार्जारमुखहनुमते ह्रीं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ सर्वत्र जगन्मुखे हनुमते स्फ्रूं सकलशत्रुसकलशत्रुसंहारकाय हुं फट् स्वाहा । ॐ श्रीसीतारामपादुकाधराय महावीराय वायुपुत्राय कनिष्ठाय ब्रह्मनिष्ठाय एकादशरुद्रमूर्तये महाबलपराक्रमाय भानुमण्डलग्रसनग्रहाय चतुर्मुखवरप्रसादाय महाभयरक्षकाय यं हौं । ॐ हस्फें हस्फें हस्फें श्रीवीरहनुमते नमः एकादशवीरहनुमन् मां रक्ष रक्ष शान्तिं कुरु कुरु तुष्टिं कुरु करु पुष्टिं कुरु कुरु महारोग्यं कुरु कुरु अभयं कुरु कुरु अविघ्नं कुरु कुरु महाविजयं कुरु कुरु सौभाग्यं कुरु कुरु सर्वत्र विजयं कुरु कुरु महालक्ष्मीं देहि हुं फट् स्वाहा ॥ फलश्रुतिः इत्येतत्कवचं दिव्यं शिवेन परिकीर्तितम् । यः पठेत्प्रयतो भूत्वा सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥ द्विकालमेककालं वा त्रिवारं यः पठेन्नरः । रोगान् पुनः क्षणात् जित्वा स पुमान् लभते श्रियम् ॥ मध्याह्ने च जले स्थित्वा चतुर्वारं पठेद्यदि । क्षयापस्मारकुष्ठादितापत्रयनिवारणम् ॥ यः पठेत्कवचं दिव्यं हनुमद्ध्यानतत्परः । त्रिःसकृद्वा यथाज्ञानं सोऽपि पुण्यवतां वरः ॥ देवमभ्यर्च्य विधिवत्पुरश्चर्यां समारभेत् । एकादशशतं जाप्यं दशांशहवनादिकम् ॥ यः करोति नरो भक्त्या कवचस्य समादरम् । ततः सिद्धिर्भवेत्तस्य परिचर्याविधानतः ॥ गद्यपद्यमया वाणी तस्य वक्त्रे प्रजायते । ब्रह्महत्यादिपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ॥ *Jai Shree Mahakal🙏*

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Sajjan Singhal Dec 14, 2019

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YASH kky Dec 14, 2019

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*🚩तन्त्रोक्त लक्ष्मी कवच🚩* *💡आज शुक्रवार को केवल गूगल जलाकर इस "तन्त्रोक्त लक्ष्मी कवच" का इक्कीस बार श्रद्धापूर्वक परायण करें* *🌹श्रीगणेशाय नमः ।।🌹*  ॐ अस्य श्रीलक्ष्मीकवचस्तोत्रस्य, श्री‍ईश्वरो देवता, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीलक्ष्मीप्रीत्यर्थे पाठे विनियोगः ।।  ॐ लक्ष्मी मे चाग्रतः पातु कमला पातु पृष्ठतः । नारायणी शीर्षदेशे सर्वाङ्गे श्रीस्वरूपिणी ॥ १॥ रामपत्‍नी तु प्रत्यङ्गे  सदाऽवतु शमेश्वरी। विशालाक्षी योगमाया कौमारी चक्रिणी तथा ॥ २॥ जयदात्री धनदात्री पाशाक्षमालिनी शुभा । हरिप्रिया हरिरामा जयङ्करी महोदरी ॥ ३॥ कृष्णपरायणा देवी श्रीकृष्णमनमोहिनी । जयङ्करी महारौद्री सिद्धिदात्री शुभङ्करी ॥ ४॥ सुखदा मोक्षदा देवी चित्रकूटनिवासिनी । भयं हरतु भक्‍तानां भवबन्धं विमुच्यतु ॥ ५॥ कवचं तन्महापुण्यं यः पठेद्भक्‍तिसंयुतः । त्रिसन्ध्यमेकसन्ध्यं वा मुच्यते सर्वसङ्कटात् ॥ ६॥ एतत्कवचस्य पठनं धनपुत्रविवर्धनम् । भीतिर्विनाशनञ्‍चैव त्रिषु लोकेषु कीर्तितम् ॥ ७॥ भूर्जपत्रे समालिख्य रोचनाकुङ्कुमेन तु । धारणाद्गलदेशे च सर्वसिद्धिर्भविष्यति ॥ ८॥ अपुत्रो लभते पुत्र धनार्थी लभते धनम् । मोक्षार्थी मोक्षमाप्नोति कवचस्य प्रसादतः ॥ ९॥ गर्भिणी लभते पुत्रं वन्ध्या च गर्भिणी भवेत् । धारयेद्यपि कण्ठे च अथवा वामबाहुके ॥ १०॥ यः पठेन्नियतं भक्‍त्या स एव विष्णुवद्भवेत् । मृत्युव्याधिभयं तस्य नास्ति किञ्‍चिन्महीतले ॥ ११॥ पठेद्वा पाठयेद्वाऽपि शृणुयाच्छ्रावयेद्यदि । सर्वपापविमुक्‍तस्तु लभते परमां गतिम् ॥ १२॥ सङ्कटे विपदे घोरे तथा च गहने वने । राजद्वारे च नौकायां तथा च रणमध्यतः ॥ १३॥ पठनाद्धारणादस्य जयमाप्नोति निश्चितम् । अपुत्रा च तथा वन्ध्या त्रिपक्षं शृणुयाद्यदि ॥ १४॥ सुपुत्रं लभते सा तु दीर्घायुष्कं यशस्विनम् । शृणुयाद्यः शुद्धबुद्ध्या द्वौ मासौ विप्रवक्‍त्रतः ॥ १५॥ सर्वान्कामानवाप्नोति सर्वबन्धाद्विमुच्यते । मृतवत्सा जीववत्सा त्रिमासं श्रवणं यदि ॥ १६॥ रोगी रोगाद्विमुच्येत पठनान्मासमध्यतः । लिखित्वा भूर्जपत्रे च अथवा ताडपत्रके ॥ १७॥ स्थापयेन्नियतं गेहे नाग्निचौरभयं क्वचित् । शृणुयाद्धारयेद्वापि पठेद्वा पाठयेदपि ॥ १८॥ यः पुमान्सततं तस्मिन्प्रसन्नाः सर्वदेवताः । बहुना किमिहोक्‍तेन सर्वजीवेश्वरेश्वरी ॥ १९॥ आद्या शक्‍तिर्महालक्ष्मीर्भक्‍तानुग्रहकारिणी । धारके पाठके चैव निश्चला निवसेद् ध्रुवम् ॥ २०॥ *🌞॥ इति तन्‍त्रोक्‍तं लक्ष्मीकवचं सम्पूर्णम् ॥🌞*  *🎂Jai Shree Mahakal🎂*

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Kumdesh Chand Dec 13, 2019

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