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Manoj Prasadh
Manoj Prasadh Dec 12, 2017

जानिए सफला एकादशी की व्रतकथा, व्रतविधि और महत्व।

जानिए सफला एकादशी की व्रतकथा, व्रतविधि और महत्व।

सफला एकादशी पारंपरिक हिंदू कैलेंडर में 'पॉश' महीने के दौरान कृष्ण पक्ष के 'एकादशी' (11 वें दिन) पर मनाया जाने वाला शुभ उपवास है। इस एकादशी को 'पॉसा कृष्ण एकदशी' भी कहा जाता है। यदि आप ग्रेगोरीयन कैलेंडर का पालन करते हैं तो इसे दिसंबर से जनवरी के महीनों के बीच मनाया जाता है।

सफला एकादशी का दिन हिंदुओं के लिए पवित्र है क्योंकि यह माना जाता है कि इस दिन ईमानदारी से उपवास करके भक्त अपने पापों को दूर कर सकते हैं और आनंदित जीवन का आनंद उठा सकते हैं। एकादशी एक श्रद्धेय दिन है जो हर चंद्र हिंदू माह में दो बार आती है और इस दिन विश्व के संरक्षक भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।

सफला एकादशी व्रत कथा:
चम्पावती नगरी में एक महिष्मान नाम का राजा राज्य करता था। उसके चार पुत्र थे। उन सबमें लुम्पक नामवाला बड़ा राजपुत्र महापापी था। वह पापी सदा परस्त्री और वेश्यागमन तथा दूसरे बुरे कामों में अपने पिता का धन नष्ट किया करता था। सदैव ही देवता, बाह्मण, वैष्णवों की निंदा किया करता था। जब राजा को अपने बड़े पुत्र के ऐसे कुकर्मों का पता चला तो उन्होंने उसे अपने राज्य से निकाल दिया। तब वह विचारने लगा कि कहाँ जाऊँ? क्या करूँ?

अंत में उसने चोरी करने का निश्चय किया। दिन में वह वन में रहता और रात्रि को अपने पिता की नगरी में चोरी करता तथा प्रजा को तंग करने और उन्हें मारने का कुकर्म करता। कुछ समय पश्चात सारी नगरी भयभीत हो गई। वह वन में रहकर पशु आदि को मारकर खाने लगा। नागरिक और राज्य के कर्मचारी उसे पकड़ लेते किंतु राजा के भय से छोड़ देते।

वन के एक अतिप्राचीन विशाल पीपल का वृक्ष था। लोग उसकी भगवान के समान पूजा करते थे। उसी वृक्ष के नीचे वह महापापी लुम्पक रहा करता था। इस वन को लोग देवताओं की क्रीड़ास्थली मानते थे। कुछ समय पश्चात पौष कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन वह वस्त्रहीन होने के कारण शीत के चलते सारी रात्रि सो नहीं सका। उसके हाथ-पैर अकड़ गए।

सूर्योदय होते-होते वह मूर्छित हो गया। दूसरे दिन एकादशी को मध्याह्न के समय सूर्य की गर्मी पाकर उसकी मूर्छा दूर हुई। गिरता-पड़ता वह भोजन की तलाश में निकला। पशुओं को मारने में वह समर्थ नहीं था अत: पेड़ों के नीचे गिर हुए फल उठाकर वापस उसी पीपल वृक्ष के नीचे आ गया। उस समय तक भगवान सूर्य अस्त हो चुके थे। वृक्ष के नीचे फल रखकर कहने लगा- हे भगवन! अब आपके ही अर्पण है ये फल। आप ही तृप्त हो जाइए। उस रात्रि को दु:ख के कारण रात्रि को भी नींद नहीं आई।

उसके इस उपवास और जागरण से भगवान अत्यंत प्रसन्न हो गए और उसके सारे पाप नष्ट हो गए। दूसरे दिन प्रात: एक ‍अतिसुंदर घोड़ा अनेक सुंदर वस्तुअओं से सजा हुआ उसके सामने आकर खड़ा हो गया।

उसी समय आकाशवाणी हुई कि हे राजपुत्र! श्रीनारायण की कृपा से तेरे पाप नष्ट हो गए। अब तू अपने पिता के पास जाकर राज्य प्राप्त कर। ऐसी वाणी सुनकर वह अत्यंत प्रसन्न हुआ और दिव्य वस्त्र धारण करके ‘भगवान आपकी जय हो’ कहकर अपने पिता के पास गया। उसके पिता ने प्रसन्न होकर उसे समस्त राज्य का भार सौंप दिया और वन का रास्ता लिया।

अब लुम्पक शास्त्रानुसार राज्य करने लगा। उसके स्त्री, पुत्र आदि सारा कुटुम्ब भगवान नारायण का परम भक्त हो गया। वृद्ध होने पर वह भी अपने पुत्र को राज्य का भार सौंपकर वन में तपस्या करने चला गया और अंत समय में वैकुंठ को प्राप्त हुआ।

अत: जो मनुष्य इस परम पवित्र सफला एकादशी का व्रत करता है उसे अंत में मुक्ति मिलती है। जो नहीं करते वे पूँछ और सींगों से रहित पशुओं के समान हैं। इस सफला एकादशी के माहात्म्य को पढ़ने से अथवा श्रवण करने से मनुष्य को अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।

सफला एकादशी व्रत विधि:

पद्म पुराण के अनुसार सफला एकादशी के दिन भगवान विष्णु का विधि- विधान व विशेष मंत्रों के साथ पूजन किया जाता है। सफला एकादशी के दिन उपवास करना चाहिए। दीप, धूप, नारियल, फल, सुपारी, बिजौरा, नींबू, अनार, सुंदर आंवला, लौंग, बेर, आम आदि से भगवान श्रीहरि की आराधना करनी चाहिए।

पूजा करने बाद भगवान विष्णु की आरती कर भगवान को भोग लगाना चाहिए। भोग लगाने व प्रसाद वितरण के बाद ब्राह्मण को भोजन करना चाहिए। पद्म पुराण के अनुसार सफला एकादशी के दिन दीप दान करने का विशेष विधान है।

सफला एकादशी का व्रत अपने नाम के अनुसार फल देता है। हिन्दू धर्मानुसार इस व्रत के पुण्य से मनुष्य के सभी कार्य सफल होते हैं और उसके पाप खत्म हो जाते हैं।

सफला एकादशी का महत्व:

सफला एकादशी का महत्व ‘ब्रह्मांडा पुराण' में धर्मराज युधिष्ठिर और भगवान कृष्ण के बीच बातचीत के रूप में वर्णित है। हिंदू ग्रंथों के मुताबिक यह कहा जाता है कि 100 राजसूया यज्ञ और 1000 अश्वमेधि यज्ञ मिल कर भी इतना लाभ नहीं दे स्सकते जितना सफला एकादशी का व्रत रख कर मिल सकता हैं।

सफला एकादशी का दिन एक ऐसे दिन के रूप में वर्णित है जिस दिन व्रत रखने से दुःखों की समाप्ति होती है और भाग्य खुल जाता है। सफला एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति को अपनी साड़ी इच्छाओं और सपनों को पूरा करने में मदद मिलती हैं।

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कामेंट्स

murari pandit Dec 13, 2017
, भगवते वासुदेवाय ओम नमो भगवते वासुदेवाय

sudhirRay Dec 30, 2017
एकादशी का व्रत किस दिन किया जाता है कब और कैसे

gajrajraj Jan 14, 2018
✨✨✨✨✨✨✨✨✨ हर पतंग जानती है, अंत में कचरे मे जाना है लेकिन उसके पहले हमे, आसमान छूकर दिखाना है । ​" बस ज़िंदगी भी यही चाहती है "​ ✨✨✨✨✨✨✨✨✨✨ 🌸 ​इस मकर सक्रान्ति🏵✨🌟🌟 के पावन पर्व पर आपको व् आपके परिवारजनो को हार्दिक मंगल शुभकामनाऍ ... ✨✨💐🙏🏻मकर सक्रांन्ति✨🙏🏻💐✨

Gajrajg Jan 29, 2018
उम्र में चाहे कोई बड़ा या छोटा हो,* *लेकिन वास्तव में बड़ा तो वही है,* *जिसके दिल में सबके लिए प्रेम,स्नेह* *और सम्मान की भावना हो॥ 🙏 शुभदिवस 🙏

Gajrajg Feb 1, 2018
पूरे की ख्वाहिश में ये इंसान' बहुत कुछ खौत्ता है ! भूल जाता है कि आधा चाँद भी खूबसूरत होता है. सुप्रभात

Gajrajg Feb 17, 2018
*👉भरोसा उस पर करो* *जो आपके अंदर तीन* *बातें जान सके...* *मुस्कुराहट के पीछे दुःख,* *गुस्से के पीछे प्यार,* *चुप रहने के पीछे वजह ।*. *_" ʝa¥ ֆɦʀɛɛ kʀɨֆɦռa "_* 😘

Gajrajg Mar 6, 2018
ये महज एक दिन नहीं है, ये अपने सपनो को सच करने का एक और मौका है। गुड मॉर्निंग!

Gajrajg Mar 8, 2018
यदि आप उस व्यक्ति की खोज कर रहे हैं जो आपकी ज़िन्दगी बदल सकता है , तो एक बार शीशे में एक नज़र डालें। Good morning

Thakur Nechwani Mar 25, 2018
श्रीराम जिनका नाम है , अयोध्या जिनका धाम है , ऐसे रघुनंदन को प्रणाम है . आपको और आपके परिवार को श्रीराम नवमी की हार्दिक शुभकामनायें.

bebi singh Apr 22, 2018
jai laxmi narayena👃🙏🌷🌷🌷🌷

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मां लक्ष्मी जी की उत्पत्ति कैसे हुई । पुराणों में माता लक्ष्मी की उत्पत्ति के बारे में विरोधाभास पाया जाता है। एक कथा के अनुसार माता लक्ष्मी की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान निकले रत्नों के साथ हुई थी, लेकिन दूसरी कथा के अनुसार वे भृगु ऋषि की बेटी हैं। दरअसल, पुराणों की कथा में छुपे रहस्य को जानना थोड़ा मुश्किल होता है, इसे समझना जरूरी है। आपको शायद पता ही होगा कि शिवपुराण के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश के माता-पिता का नाम सदाशिव और दुर्गा बताया गया है। उसी तरह तीनों देवियों के भी माता-पिता रहे हैं। समुद्र मंथन से जिस लक्ष्मी की उत्पत्ति हुई थी, दरअसल वह स्वर्ण के पाए जाने के ही संकेत रहा हो। *जन्म समय :शास्त्रों के अनुसार देवी लक्ष्मी का जन्म शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। कार्तिकेय का जन्म भी शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। कार्तिक कृष्ण अमावस्या को उनकी पूजा की जाती है। *नाम :देवी लक्ष्मी। *नाम का अर्थ :'लक्ष्मी' शब्द दो शब्दों के मेल से बना है- एक 'लक्ष्य' तथा दूसरा 'मी' अर्थात लक्ष्य तक ले जाने वाली देवी लक्ष्मी। अन्य नाम :श्रीदेवी, कमला, धन्या, हरिवल्लभी, विष्णुप्रिया, दीपा, दीप्ता, पद्मप्रिया, पद्मसुन्दरी, पद्मावती, पद्मनाभप्रिया, पद्मिनी, चन्द्र सहोदरी, पुष्टि, वसुंधरा आदि नाम प्रमुख हैं। *माता-पिता :ख्याति और भृगु। *भाई :धाता और विधाता *बहन :अलक्ष्मी *पति :भगवान विष्णु। *पुत्र :18 पुत्रों में से प्रमुख 4 पुत्रों के नाम हैं- आनंद, कर्दम, श्रीद, चिक्लीत। *निवास :क्षीरसागर में भगवान विष्णु के साथ कमल पर वास करती हैं। *पर्व: दिवाली। *दिन :ज्योतिषशास्त्र एवं धर्मग्रंथों में शुक्रवार की देवी मां लक्ष्मी को माना गया है। *वाहन :उल्लू और हाथी। एक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु की पत्नी देवी लक्ष्मी का वाहन उल्लू है और धन की देवी महालक्ष्मी का वाहन हाथी है। कुछ के अनुसार उल्लू उनकी बहन अलक्ष्मी का प्रतीक है, जो सदा उनके साथ रहती है। देवी लक्ष्मी अपने वाहन उल्लू पर बैठकर भगवान विष्णु के साथ पृथ्वी भ्रमण करने आती हैं। *दो रूप :लक्ष्मीजी की अभिव्यक्ति को दो रूपों में देखा जाता है- 1. श्रीरूप और 2. लक्ष्मी रूप। श्रीरूप में वे कमल पर विराजमान हैं और लक्ष्मी रूप में वे भगवान विष्णु के साथ हैं। महाभारत में लक्ष्मी के 'विष्णुपत्नी लक्ष्मी' एवं 'राज्यलक्ष्मी' दो प्रकार बताए गए हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार लक्ष्मी के दो रूप हैं- भूदेवी और श्रीदेवी। भूदेवी धरती की देवी हैं और श्रीदेवी स्वर्ग की देवी। पहली उर्वरा से जुड़ी हैं, दूसरी महिमा और शक्ति से। भूदेवी सरल और सहयोगी पत्नी हैं जबकि श्रीदेवी चंचल हैं। विष्णु को हमेशा उन्हें खुश रखने के लिए प्रयास करना पड़ता है। *बीज मंत्र :ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभ्यो नम:।। *व्रत-पूजा: लक्ष्मी चालीसा, लक्ष्मीजी की आरती, लक्ष्मी की महिमा, लक्ष्मी व्रत, लक्ष्मी पूजन आदि। दीपावली पर लक्ष्मीजी की पूजा गणेशजी के साथ की जाती है। देवी लक्ष्मी की पूजा भगवान विष्णु के साथ ही होती है। जहां ऐसा नहीं होता वहां लक्ष्मी की बड़ी बहन अलक्ष्मी निवास करती है। *अष्टलक्ष्मी क्या है? अष्टलक्ष्मी माता लक्ष्मी के 8 विशेष रूपों को कहा गया है। माता लक्ष्मी के 8 रूप ये हैं- आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी। *माता लक्ष्मी के प्रिय भोग :मखाना, सिंघाड़ा, बताशे, ईख, हलुआ, खीर, अनार, पान, सफेद और पीले रंग के मिष्ठान्न, केसर-भात आदि। *माता लक्ष्मी के प्रमुख मंदिर :पद्मावती मंदिर तिरुचुरा, लक्ष्मीनारायण मंदिर वेल्लूर, महालक्ष्मी मंदिर मुंबई, लक्ष्मीनारायण मंदिर दिल्ली, लक्ष्मी मंदिर कोल्हापुर, अष्टलक्ष्मी मंदिर चेन्नई, अष्टलक्ष्मी मंदिर हैदराबाद, लक्ष्मी-कुबेर मंदिर वडलूर (चेन्नई), लक्ष्मीनारायण मंदिर जयपुर, महालक्ष्मी मंदिर इंदौर, श्रीपुरम् का स्वर्ण मंदिर तमिलनाडु, पचमठा मंदिर जबलपुर आदि। *धन की देवी :देवी लक्ष्मी का घनिष्ठ संबंध देवराज इन्द्र तथा कुबेर से है। इन्द्र देवताओं तथा स्वर्ग के राजा हैं तथा कुबेर देवताओं के खजाने के रक्षक के पद पर आसीन हैं। देवी लक्ष्मी ही इन्द्र तथा कुबेर को इस प्रकार का वैभव, राजसी सत्ता प्रदान करती हैं। *समुद्र मंथन की लक्ष्मी :समुद्र मंथन की लक्ष्मी को धन की देवी माना जाता है। उनके हाथ में स्वर्ण से भरा कलश है। इस कलश द्वारा लक्ष्मीजी धन की वर्षा करती रहती हैं। उनके वाहन को सफेद हाथी माना गया है। दरअसल, महालक्ष्मीजी के 4 हाथ बताए गए हैं। वे 1 लक्ष्य और 4 प्रकृतियों (दूरदर्शिता, दृढ़ संकल्प, श्रमशीलता एवं व्यवस्था शक्ति) के प्रतीक हैं और मां महालक्ष्मीजी सभी हाथों से अपने भक्तों पर आशीर्वाद की वर्षा करती हैं। विष्णुप्रिया लक्ष्मी :ऋषि भृगु की पुत्री माता लक्ष्मी थीं। उनकी माता का नाम ख्याति था। (समु द्र मंथन के बाद क्षीरसागर से जो लक्ष्मी उत्पन्न हुई थीं, उसका इनसे कोई संबंध नहीं।) म‍हर्षि भृगु विष्णु के श्वसुर और शिव के साढू थे। महर्षि भृगु को भी सप्तर्षियों में स्थान मिला है। राजा दक्ष के भाई भृगु ऋषि थे। इसका मतलब वे राजा द‍क्ष की भतीजी थीं। माता लक्ष्मी के दो भाई दाता और विधाता थे। भगवान शिव की पहली पत्नी माता सती उनकी (लक्ष्मीजी की) सौतेली बहन थीं। सती राजा दक्ष की पुत्री थी। विवाह कथा :एक बार लक्ष्मीजी के लिए स्वयंवर का आयोजन हुआ। माता लक्ष्मी पहले ही मन ही मन विष्णुजी को पति रूप में स्वीकार कर चुकी थीं लेकिन नारद मुनि भी लक्ष्मीजी से विवाह करना चाहते थे। नारदजी ने सोचा कि यह राजकुमारी हरि रूप पाकर ही उनका वरण करेगी। तब नारदजी विष्णु भगवान के पास हरि के समान सुन्दर रूप मांगने पहुंच गए। विष्णु भगवान ने नारद की इच्छा के अनुसार उन्हें हरि रूप दे दिया। हरि रूप लेकर जब नारद राजकुमारी के स्वयंवर में पहुंचे तो उन्हें विश्वास था कि राजकुमारी उन्हें ही वरमाला पहनाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राजकुमारी ने नारद को छोड़कर भगवान विष्णु के गले में वरमाला डाल दी। नारदजी वहां से उदास होकर लौट रहे थे तो रास्ते में एक जलाशय में उन्होंने अपना चेहरा देखा। अपने चेहरे को देखकर नारद हैरान रह गए, क्योंकि उनका चेहरा बंदर जैसा लग रहा था। 'हरि' का एक अर्थ विष्णु होता है और एक वानर होता है। भगवान विष्णु ने नारद को वानर रूप दे दिया था। नारद समझ गए कि भगवान विष्णु ने उनके साथ छल किया। उनको भगवान पर बड़ा क्रोध आया। नारद सीधे बैकुंठ पहुंचे और आवेश में आकर भगवान को श्राप दे दिया कि आपको मनुष्य रूप में जन्म लेकर पृथ्वी पर जाना होगा। जिस तरह मुझे स्त्री का वियोग सहना पड़ा है उसी प्रकार आपको भी वियोग सहना होगा। इसलिए राम और सीता के रूप में जन्म लेकर विष्णु और देवी लक्ष्मी को वियोग सहना पड़ा। *पुराणानुसार लक्ष्मीजी के 8 अवतार :महालक्ष्मी, जो वैकुंठ में निवास करती हैं। स्वर्गलक्ष्मी, जो स्वर्ग में निवास करती हैं। राधाजी, जो गोलोक में निवास करती हैं। दक्षिणा, जो यज्ञ में निवास करती हैं। गृहलक्ष्मी, जो गृह में निवास करती हैं। शोभा, जो हर वस्तु में निवास करती हैं। सुरभि (रुक्मणी), जो गोलोक में निवास करती हैं और राजलक्ष्मी (सीता) जी, जो पाताल और भूलोक में निवास करती हैं। समुद्र मंथन वाली लक्ष्मी : समुद्र मंथन से कुल 14 तरह के रत्न आदि उत्पन्न हुए थे। उनको सुरों (देव) और असुरों ने आपस में बांट लिया था। पहले हलाहल विष निकला, फिर क्रमश: कामधेनु गाय, उच्चै:श्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पद्रुम ग्रंथ, रम्भा नामक अप्सरा, अप्सरा के बाद महालक्ष्मी निकलीं। कहते हैं कि महालक्ष्मी के रूप में सोना निकला था जिसे भगवान विष्णु ने धारण कर लिया। इसके बाद वारुणी नामक मदिरा, फिर चन्द्रमा, फिर पारिजात का वृक्ष, फिर पांचजञ्य शंख, धन्वंतरि वैद्य (औषधि) और अंत में अमृत निकला था। समुद्र मंथन के दौरान लक्ष्मी की उत्पत्ति भी हुई। 'लक्ष्मी' अर्थात श्री और समृद्धि की उत्पत्ति। कुछ लोग इसे सोने (गोल्ड) से जोड़ते हैं, लेकिन कुछ लोग इसे देवी मानते हैं। समुद्र मंथन से उत्पन्न लक्ष्मी को 'कमला' कहते हैं, जो 10 महाविद्याओं में से अंतिम महाविद्या है। अध्ययन से पता चलता है कि समुद्र मंथन से निकली लक्ष्मी को वैभव और समृद्धि से जोड़कर देखा गया जिसमें सोना-चांदी आदि कीमती धातुएं थीं, जो कि लक्ष्मी का प्रतीक है। लक्ष्मी-विष्णु विवाह कथा :कहते हैं कि समुद्र की पुत्री लक्ष्मी देवी थीं। जब लक्ष्मीजी बड़ी हुईं तो वे भगवान नारायण के गुण-प्रभाव का वर्णन सुनकर उनमें ही अनुरक्त हो गईं और उनको पाने के लिए तपस्या करने लगीं। उसी तरह, जिस तरह पार्वतीजी ने शिव को पाने के लिए तपस्या की थी। वे समुद्र तट पर घोर तपस्या करने लगीं। तदनंतर लक्ष्मीजी की इच्छानुसार भगवान विष्णु ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।

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Jasbir Singh nain Jun 15, 2019

/ वट पूर्णिमा का व्रत 16 जून को, इसकी कथा, पूजा विधि और महत्व जीवन मंत्र डेस्क.हिन्दू धर्म में ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा महत्त्वपूर्ण है। ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन स्त्रियाँ वट वृक्ष की पूजा कर के पूरे दिन व्रत रखती हैं। इसे वट सावित्री व्रत कहा जाता है। स्कंद पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण के अनुसार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को यह व्रत करने का विधान है। सौभाग्य और संतान प्राप्ति के लिए महिलाओं द्वारा ये व्रत किया जाता है। इसी दिन यानी ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा पर गंगा स्नान कर के पूजा-अर्चना करने से मनोकामना पूरी होती है। इसी दिन से ही लोग गंगा जल लेकर अमरनाथ यात्रा के लिए भी निकलते हैं। वट सावित्री व्रत वट पूर्णिमा व्रत विवाहित महिलाएं अपने पति की सलामती और लंबी उम्र के लिए रखती हैं। पूर्णिमांत कैलेंडर यानी पूर्णिमा से शुरू होने वाल हिन्दू महीने में वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ माह की अमावस्या पर मनाया जाता है, जो शनि जयंती के साथ पड़ता है। वहीं अमांत कैलेंडर यानी अमावस्या से हिन्दू महीने की शुरुआत वाले कैलेंडर में वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ पूर्णिमा पर मनाया जाता है, जिसे वट पूर्णिमा व्रत भी कहा जाता है। इसलिए महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिणी भारतीय राज्यों में विवाहित महिलाएं उत्तर भारतीय महिलाओं की तुलना में 15 दिन बाद वट सावित्री व्रत मनाती हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, सावित्री ने अपने तप और सतीत्व की ताकत से मृत्यु के स्वामी भगवान यम को अपने पति सत्यवान के जीवन को वापस करने के लिए मजबूर किया। इसलिए विवाहित महिलाएं अपने पति की सलामती और लंबी आयु के लिए वट सावित्री व्रत का पालन करती हैं। वट पूर्णिमा व्रत की कथा सावित्री भारतीय संस्कृति में ऐतिहासिक चरित्र माना जाता है। सावित्री का अर्थ वेद माता गायत्री और सरस्वती भी होता है। सावित्री का जन्म भी विशिष्ट परिस्थितियों में हुआ था। पौराणिक कथा के अनुसार मद्र देश के राजा अश्वपति की कोई संतान नहीं थी। उन्होंने संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ किया और मंत्रोच्चार के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियां दीं। अठारह सालों तक यह चलता रहा। इसके बाद सावित्री देवी ने प्रकट होकर वर दिया कि हे राजन तम्हें शीघ्र ही एक तेजस्वी कन्या प्राप्त होगी। सावित्री देवी की कृपा से जन्म लेने की वजह से कन्या का नाम सावित्री रखा गया। बड़ी होने पर कन्या सावित्री बेहद सुंदरता से पूर्ण हुईं। योग्य वर न मिलने की वजह से सावित्री के पिता दुःखी थे। उन्होंने कन्या को स्वयं वर तलाशने भेजा। सावित्री तपोवन में भटकने लगी। वहां साल्व देश के राजा द्युमत्सेन रहते थे, क्योंकि उनका राज्य किसी ने छीन लिया था। उनके पुत्र सत्यवान को देखकर सावित्री ने पति के रूप में उनका वरण किया। कहते हैं कि साल्व देश पूर्वी राजस्थान या अलवर अंचल के इर्द-गिर्द था। सत्यवान अल्पायु थे। वे वेद ज्ञाता थे। नारद मुनि ने सावित्री से मिलकर सत्यवान से विवाह न करने की सलाह दी थी, परंतु सावित्री ने सत्यवान से ही विवाह किया। पति की मृत्यु की तिथि में जब कुछ ही दिन शेष रह गए, तब सावित्री ने घोर तपस्या की थी, जिसका फल उन्हें बाद में मिला था। वट पूर्णिमा कामहत्त्व वट पूर्णिमा का व्रत करने से महिलाओं को सौभाग्य मिलता है। संतान और पति की उम्र बढ़ती है। इस व्रत के प्रभाव से अनजाने में किए गए पाप भी खत्म् हो जाते हैं। ये व्रत ज्येष्ठ माह में पड़ता है। इसलिए इस व्रत का महत्व और ज्यादा है। हिन्दू धर्म में ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा महत्त्वपूर्ण है। इस दिन गंगा स्नान कर पूजा करने से मनोकामना पूरी होती है। इस दिन से ही लोग गंगा जल लेकर अमरनाथ यात्रा के लिये निकलते हैं शुभ प्रभात जी राधे राधे जी

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Nitin Jariwala Jun 16, 2019

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Raj Jun 16, 2019

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Anju Mishra Jun 14, 2019

शुक्र प्रदोष व्रत विशेष 👇 🌹🙏🌹हर हर महादेव 🚩🙏जय माता दी 🌹🙏🌹 शुक्रवार को पड़ने वाले व्रत को शुक्र प्रदोष व्रत कहते हैं। इस दिन किए जाने वाले प्रदोष व्रत से सुख-समृद्धि और सौभाग्य का वरदान मिलता है। प्रदोष व्रत की पूजा शाम के समय प्रदोषकाल में की जाती है। यह प्रदोष सूर्यास्त से लगभग 1 घंटा पहले का समय होता है, जो प्रदोषकाल कहलाता है।  शुक्र प्रदोष व्रत की कथा-  एक नगर में 3 मित्र रहते थे- राजकुमार, ब्राह्मण कुमार और तीसरा धनिक पुत्र। राजकुमार और ब्राह्मण कुमार विवाहित थे। धनिक पुत्र का भी विवाह हो गया था, लेकिन गौना शेष था। एक दिन तीनों मित्र स्त्रियों की चर्चा कर रहे थे। ब्राह्मण कुमार ने स्त्रियों की प्रशंसा करते हुए कहा- 'नारीहीन घर भूतों का डेरा होता है।' धनिक पुत्र ने यह सुना तो तुरंत ही उसने अपनी पत्‍नी को लाने का निश्‍चय कर लिया। तब धनिक पुत्र के माता-पिता ने समझाया कि अभी शुक्र देवता डूबे हुए हैं। ऐसे में बहू-बेटियों को उनके घर से विदा करवा लाना शुभ नहीं माना जाता लेकिन धनिक पुत्र ने एक नहीं सुनी और ससुराल पहुंच गया। ससुराल में भी उसे मनाने की कोशिश की गई लेकिन वो जिद पर अड़ा रहा और कन्या के माता-पिता को उनकी विदाई करनी पड़ी। विदाई के बाद पति-पत्‍नी शहर से निकले ही थे कि बैलगाड़ी का पहिया निकल गया और बैल की टांग टूट गई। दोनों को चोट लगी लेकिन फिर भी वो चलते रहे। कुछ दूर जाने पर उनका पाला डाकुओं से पड़ा। जो उनका धन लूटकर ले गए। दोनों घर पहूंचे। वहां धनिक पुत्र को सांप ने डंस लिया। उसके पिता ने वैद्य को बुलाया तो वैद्य ने बताया कि वो 3 दिन में मर जाएगा। जब ब्राह्मण कुमार को यह खबर मिली तो वो धनिक पुत्र के घर पहुंचा और उसके माता-पिता को शुक्र प्रदोष व्रत करने की सलाह दी और कहा कि इसे पत्‍नी सहित वापस ससुराल भेज दें। धनिक ने ब्राह्मण कुमार की बात मानी और ससुराल पहुंच गया, जहां उसकी हालत ठीक होती गई यानी शुक्र प्रदोष के माहात्म्य से सभी घोर कष्ट दूर हो गए।  इस दिन कथा सुनें अथवा सुनाएं तथा कथा समाप्ति के बाद हवन सामग्री मिलाकर 11 या 21 या 108 बार 'ॐ ह्रीं क्लीं नम: शिवाय स्वाहा' मंत्र से आहुति दें। उसके बाद शिवजी की आरती तथा प्रसाद वितरित करें, उसके बाद भोजन करें। कहा जाता है कि शुक्रवार को प्रदोष व्रत सौभाग्य और दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि भर देता है। यही कारण है कि आज के प्रदोष व्रत का काफी खास माना जा रहा है। शुक्रवार के दिन पड़ने वाले इस प्रदोष व्रत से सुख-समृद्धि मिलती है।

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Prince Trivedi Jun 15, 2019

*🌞🌞पूर्णिमा और रविवार के संयोग से करनी चाहिए सूर्य देव की उपासना - 16 जून 2019 रविवार*🙏🙏 *16 जून 2019, रविवार को ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा है। हिंदू धर्म में पूर्णिमा और अमावस्या को विशेष तिथि माना गया है। इस बार पूर्णिमा रविवार के दिन पड़ रही है। इसके साथ ही वट सावित्री का व्रत भी रखा जाएगा। ज्योतिषाचार्यो के अनुसार इस बार पूर्णिमा रविवार के दिन पड़ने से इसका महत्व काफी बढ़ गया है। ज्योतिष में अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य गलत भाव में है उसके मान-सम्मान में गिरावट आती है। जबकि इसके विपरीत सूर्य की शुभ स्थिति में यश बढ़ता है। सूर्य का शुभ फल प्राप्त करने के लिए पूर्मिणा पर सूर्य की विशेष पूजा करनी चाहिए।* *🚩 सूर्य देव की उपासना🚩* - 🌞पूर्णिमा वाले दिन जल्दी उठे और सभी देवी-देवता की पूजा करने के बाद सूर्य देव को तांबे के पात्र में जल भर अर्घ्य दें। - 🌞चांबे के पात्र में जल के साथ चावल और लाल फूल भी रखना चाहिए। - 🌞जल चढ़ाते समय ऊँ सूर्याय नम: मंत्र का जाप जरूर करना चाहिए। - 🌞पूर्णिमा पर सूर्य देव को जल देने के बाद किसी गरीब को दान भी करना शुभफलदायक होता है। *🎄सूर्य देवता का व्रत*🌞 *भगवान भास्कर की शुभ ऊर्जा को पाने के लिए १२ रविवार, ३० रविवार, या एक वर्ष तक व्रत रखा जा सकता है। व्रत के दिन स्नान—ध्यान के प्रश्चात तांबे की लोटे में शुद्ध जल, लाल रोली या चंदन, अक्षत, लाल पुष्प आदि डालकर 🔻‘ॐ घृणि सूर्याय नमः’ 🔻मंत्र बोलते हुए अघ्र्य दें। साथ ही इस मंत्र का कम से कम ३ माला जप अवश्य करें। इस व्रत के प्रभाव से शुभ फल में वृद्धि, आरोग्य, शत्रु शमन तथा तेज प्राप्त होता है।* *🎉आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ शुक्ल पक्ष के रविवार का दिन शुभ माना गया है।*🎈🙏 *💗Jai Shree Mahakal💗* https://youtu.be/cXzEo3a95FU

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Pt Vinod Pandey 🚩 Jun 15, 2019

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