*🌹जैसी करनी वैसा फल💐 *एक भिखारी रोज एक दरवाजें पर जाता और भिख के लिए आवाज लगाता, पर जब घर मालिक बाहर आता तो भिखारी को गंदी_गंदी गालिया और ताने देता, मर जाओ, काम क्यूं नही करतें, जीवन भर भीख मांगतें रहोगे,* *कभी_कभी गुस्सें में उसे धकेल भी देता, पर भिखारी बस इतना ही कहता, ईश्वर तुम्हारें पापों को क्षमा करें,* *एक दिन सेठ बड़े गुस्सें में था, शायद व्यापार में घाटा हुआ था, वो भिखारी उसी वक्त भीख मांगने आ गया, सेठ ने आव देखा ना ताव, सीधा उसे पत्थर से दे मारा,* *भिखारी के सर से खून बहने लगा, फिर भी उसने सेठ से कहा ईश्वर तुम्हारें पापों को क्षमा करें, और वहां से जाने लगा,* *सेठ का थोड़ा गुस्सा कम हुआ, तो वह सोचने लगा मैंने उसे पत्थर से भी मारा पर उसने बस दुआ दी, इसके पीछे क्या रहस्य है जानना पड़ेगा, और वह भिखारी के पीछे पीछे चलने लगा,* *भिखारी जहाँ भी जाता सेठ उसके पीछे जाता, कही कोई उस भिखारी को भीख दे देता तो कोई उसे मारता, जलील करता गालियाँ देता, पर भिखारी इतना ही कहता, ईश्वर तुम्हारे पापों को क्षमा करें,* *अब अंधेरा हो चला था, भिखारी अपने घर लौट रहा था, सेठ भी उसके पीछे था, भिखारी जैसे ही अपने घर लौटा, एक टूटी फूटी खाट पे, एक बुढिया सोई थी,* *जो भिखारी की पत्नी थी, जैसे ही उसने अपने पति को देखा उठ खड़ी हुई और भीख का कटोरा देखने लगी, उस भीख के कटोरे मे मात्र एक आधी बासी रोटी थी,* *उसे देखते ही बुढिया बोली बस इतना ही और कुछ नही, और ये आपका सर कहा फूट गया*? *भिखारी बोला, हाँ बस इतना ही किसी ने कुछ नही दिया सबने गालिया दी, पत्थर मारें, इसलिए ये सर फूट गया,* *भिखारी ने फिर कहा सब अपने ही पापों का परिणाम हैं,* *याद है ना तुम्हें, कुछ वर्षो पहले हम कितने रईस हुआ करते थे, क्या नही था हमारे पास, पर हमने कभी दान नही किया,* *याद है तुम्हें वो अंधा भिखारी, बुढिया की ऑखों में ऑसू आ गये और उसने कहा हाँ, कैसे हम उस अंधे भिखारी का मजाक उडाते थे,* *कैसे उसे रोटियों की जगह खाली कागज रख देते थे, कैसे हम उसे जलील करते थे, कैसे हम उसे कभी_कभी मार या धकेल देते थे,* *अब बुढिया ने कहा हाँ सब याद है मुझे, कैसे मैंने भी उसे राह नही दिखाई और घर के बनें नालें में गिरा दिया था,* *जब भी वह रोटिया मांगता मैंने बस उसे गालियाँ दी, एक बार तो उसका कटोरा तक फेंक दिया था,* *और वो अंधा भिखारी हमेशा कहता था, तुम्हारे पापों का हिसाब ईश्वर करेंगे, मैं नही,* *आज उस भिखारी की बद्दुआ और हाय हमें ले डूबी* *फिर भिखारी ने कहा, पर मैं किसी को बद्दुआ नही देता हूँ,* *चाहे मेरे साथ कितनी भी ज्यादती क्यू ना हो जाए, मेरे लब पर हमेशा दुआ रहती हैं, मैं अब नही चाहता, की कोई और इतने बुरे दिन देखे,* *मेरे साथ अन्याय करने वालों को भी मैं दुआ देता हूं, क्यूकि उनको मालूम ही नही, वो क्या पाप कर रहें है, जो सीधा ईश्वर देख रहा हैं, जैसी हमने भुगती है, कोई और ना भुगते,* *इसलिए मेरे दिल से बस अपना हाल देख दुआ ही निकलती हैं,* *सेठ चुपके_चुपके सब सुन रहा था, उसे अब सारी बात समझ आ गयी थी,* *बुढे_बुढिया ने आधी रोटी को दोनो मिलकर खाया, और प्रभु की महिमा है बोल कर सो गयें,* *अगले दिन, वह भिखारी भीख मांगने सेठ के यहाँ गया, सेठ ने पहले से ही रोटिया निकल के रखी थी, उसने भिखारी को दी और हल्की से मुस्कान भरे स्वर में कहा, माफ करना बाबा, गलती हो गयी,* *भिखारी ने कहा, ईश्वर तुम्हारा भला करे, और वो वहाँ से चला गया,* *सेठ को एक बात समझ आ गयी थी, कि इंसान तो बस दुआ_बद्दुआ देते है* *पर पूरी वो ईश्वर वो जादूगर कर्मो के हिसाब से करता हैं,* *हो सके तो बस अच्छा करें, वो दिखता नही है तो क्या हुआ, सब का हिसाब पक्का रहता है उसके पास* *जैसी करनी वैसा फल* *आज नही तो निश्चय कल* 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 *🙏जय श्री राम ~जय श्री कृष्णा🙏

+4 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 9 शेयर

*एक पाँच छ: साल का मासूम सा बच्चा अपनी छोटी बहन को लेकर गुरुद्वारे के एक तरफ कोने में बैठा हाथ जोडकर भगवान से न जाने क्या मांग रहा था ।* *कपड़े में मैल लगा हुआ था मगर निहायत साफ, उसके नन्हे नन्हे से गाल आँसूओं से भीग चुके थे।* *बहुत लोग उसकी तरफ आकर्षित थे और वह बिल्कुल अनजान अपने भगवान से बातों में लगा हुआ था ।* *जैसे ही वह उठा एक अजनबी ने बढ़ के उसका नन्हा सा हाथ पकड़ा और पूछा : -* *"क्या मांगा भगवान से"* *उसने कहा : -* *"मेरे पापा चल बसे हैं उनके लिए स्वर्ग मांगा,* *मेरी माँ रोती रहती है उनके लिए सब्र मांगा,* और *मेरी बहन माँ से कपडे व अन्य सामान मांगती है उसके लिए पैसे मांगे"* *अजनबी का सवाल स्वाभाविक सा सवाल था ।* *तुम स्कूल जाते हो"..?* *हां जाता हूं, उसने कहा ।* *किस क्लास में पढ़ते हो ?* *नहीं अंकल में पढ़ने नहीं जाता, मेरी मां मुझे चने बना देती है वह चने स्कूल के बच्चों को बेचने जाता हूँ ।* *बहुत सारे बच्चे मुझसे चने खरीदते हैं, हमारा यही काम धंधा है ।* *बच्चे का एक एक शब्द मेरी रूह में उतर रहा था ।* *"तुम्हारा कोई रिश्तेदार"* *न चाहते हुए भी अजनबी बच्चे से पूछ बैठा ।* *पता नहीं, माँ कहती है गरीब का कोई रिश्तेदार नहीं होता,* *माँ झूठ नहीं बोलती, पर अंकल* *मुझे लगता है मेरी माँ कभी कभी झूठ बोलती है,* *जब हम खाना खाते हैं वो हमें देखती रहती है ।* *जब कहता हूँ माँ तुम भी खाओ, तो कहती है मैने खा लिया था, उस समय लगता है झूठ बोलती है ।* *बेटा अगर तुम्हारे घर का खर्च मिल जाय तो पढाई करोगे ?* *"बिल्कुलु नहीं"* "क्यों" *क्योंकि पढ़ाई करने वाले, गरीबों से नफरत करते हैं अंकल,* *हमें किसी पढ़े लिखे हुए ने कभी हमारा हालचाल नहीं पूछा - सब पास से गुजर जाते हैं ।* *अजनबी हैरान भी था और शर्मिंदा भी ।* *फिर उसने कहा "हर दिन में इसी इस गुरुद्वारे में आता हूँ,* *कभी किसी ने नहीं पूछा - यहाँ आने वाले सब मेरे पिताजी को जानते थे - मगर हमें कोई नहीं जानता ।* *"बच्चा जोर-जोर से रोने लगा"* *अंकल जब बाप मर जाता है तो सब अजनबी क्यों हो जाते हैं ?* *मेरे पास इसका कोई जवाब नही था...* *ऐसे कितने मासूम होंगे जो हसरतों से घायल हैं ।* *बस एक कोशिश कीजिये और अपने आसपास ऐसे ज़रूरतमंद यतीमों, बेसहाराओ को ढूंढिये और उनकी मदद करने का प्रयास किजिए .

+3 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 5 शेयर

0️⃣1️⃣❗1️⃣2️⃣❗2️⃣0️⃣2️⃣1️⃣ *✍️🙏प्रभु भोग का फल हैं।* {एक धार्मिक एवं प्रेरणादायक कहानी} *********** एक सेठजी बड़े कंजूस थे। *एक दिन दुकान पर बेटे को बैठा दिया और बोले कि बिना पैसा लिए किसी को कुछ मत देना, मैं अभी आया।* अकस्मात एक संत आये जो अलग-अलग जगह से एक समय की भोजन सामग्री लेते थे। *लड़के से कहा: बेटा जरा नमक दे दो। लड़के ने सन्त को डिब्बा खोल कर एक चम्मच नमक दिया। सेठजी आये तो देखा कि एक डिब्बा खुला पड़ा था।* सेठजी ने कहा: क्या बेचा बेटा? *बेटा बोला: एक सन्त, जो तालाब के किनारे रहते हैं, उनको एक चम्मच नमक दिया था।* *सेठ का माथा ठनका और बोला: अरे मूर्ख! इसमें तो जहरीला पदार्थ है।* अब सेठजी भाग कर संतजी के पास गए, सन्तजी भगवान् के भोग लगाकर थाली लिए भोजन करने बैठे ही थे कि.. सेठजी दूर से ही बोले: महाराज जी रुकिए, आप जो नमक लाये थे, वो जहरीला पदार्थ था, आप भोजन नहीं करें। *संतजी बोले: भाई हम तो प्रसाद लेंगे ही, क्योंकि भोग लगा दिया है और भोग लगा भोजन छोड़ नहीं सकते। हाँ, अगर भोग नहीं लगता तो भोजन नही करते और कहते-कहते भोजन शुरू कर दिया।* सेठजी के होश उड़ गए, वो तो बैठ गए वहीं पर। रात हो गई, सेठजी वहीं सो गए कि कहीं संतजी की तबियत बिगड़ गई तो कम से कम बैद्यजी को दिखा देंगे तो बदनामी से बचेंगे। *सोचते सोचते उन्हें नींद आ गई। सुबह जल्दी ही सन्त उठ गए और नदी में स्नान करके स्वस्थ दशा में आ रहे हैं।* *सेठजी ने कहा: महाराज तबियत तो ठीक है।* सन्त बोले: भगवान की कृपा है! इतना कह कर मन्दिर खोला तो देखते हैं कि भगवान् के श्री विग्रह के दो भाग हो गए हैं और शरीर काला पड़ गया है। *अब तो सेठजी सारा मामला समझ गए कि अटल विश्वास से भगवान ने भोजन का ज़हर भोग के रूप में स्वयं ने ग्रहण कर लिया और भक्त को प्रसाद का ग्रहण कराया।* सेठजी ने घर आकर बेटे को घर दुकान सम्भला दी और स्वयं भक्ति करने सन्त शरण में चले गए! *इसलिए रोज ही भगवान् को निवेदन करके भोजन का भोग लगा करके ही भोजन करें, भोजन अमृत बन जाता है। अत: आज से ही यह नियम लें कि भोजन बिना भोग लगाएं नहीं करेंगे..!!* *🙏🏽🙏🏾🙏🏼जय जय श्री राधे*🙏🏻🙏🙏🏿

+2 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 16 शेयर
devilakshmi Jan 16, 2022

.🚩 "स्वर्ग का द्वार",,,, 🚩 🧘एक दिन सुबह का समय था और स्वर्ग के द्वार पर चार आदमी खड़े थे। स्वर्ग का द्वार बन्द था। चारों इस इन्तजार में थे कि स्वर्ग का द्वार खुले और वे स्वर्ग के भीतर प्रवेश कर सकें। थोड़ी देर बाद द्वार का प्रहरी आया। उसने स्वर्ग का द्वार खोल दिया। द्वार खुलते ही सभी ने द्वार के भीतर जाना चाहा, लेकिन प्रहरी ने किसी को भीतर नहीं जाने दिया।🧘 🌹प्रहरी ने उन आदमियों से प्रश्र किया, "तुम लोग यहां क्यों खड़े हो ?" उन चारों आदमियों में से तीन ने उत्तर दिया, "हमने बहुत दान, पुण्य किए हैं। हम स्वर्ग में रहने के लिए आए हैं।" चौथा आदमी मौन खड़ा था। प्रहरी ने उससे भी प्रश्न किया, "तुम यहां क्यों खड़े हो ?" उस आदमी ने कहा, "मैं सिर्फ स्वर्ग को झांक कर एक बार देखना चाहता था। मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि मैं स्वर्ग में रहने के काबिल नहीं हूँ क्योंकि मैंने कोई दान, पुण्य नहीं किया।"🌹 🏵️प्रहरी ने चारों आदमियों की ओर ध्यान से देखा। फिर उसने पहले आदमी से प्रश्र किया, "तुम अपना परिचय दो और वह काम बताओ, जिससे तुम्हें स्वर्ग में स्थान मिलना चाहिए।" वह आदमी बोला, "मैं एक राजा हूँ। मैंने तमाम देशों को जीता। मैंने अपनी प्रजा की भलाई के लिए बहुत से मंदिर, मस्जिद, नहर, सड़क, बाग, बगीचे आदि का निर्माण करवाया तथा ब्राह्मणों को दान दिए।" प्रहरी ने प्रश्र किया, "दूसरे देशों पर अधिकार जमाने के लिए तुमने जो लड़ाइयाँ लड़ीं, उनमें तुम्हारा खून बहा कि तुम्हारे सैनिकों का ? उन लड़ाइयों में तुम्हारे परिवार के लोग मरे कि दोनों ओर की प्रजा मरी ?" "दोनों ओर की प्रजा मरी।" उत्तर मिला। "तुमने जो दान किए, प्रजा की भलाई के लिए सड़कें, कुएँ, नहरें आदि बनवाई, वह तुमने अपनी मेहनत की कमाई से किया या जनता पर लगाए गए ‘कर’ से ?" इस प्रश्र पर राजा चुप हो गया। उससे कोई उत्तर न देते बना। प्रहरी ने राजा से कहा, "लौट जाओ। यह स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए नहीं खुल सकता।"🏵️ ♓अब बारी आई दूसरे आदमी की। प्रहरी ने उससे भी अपने बारे में बताने को कहा। दूसरे आदमी ने कहा, "मैं एक व्यापारी हूँ। मैंने व्यापार में अपार धन संग्रह किया। सारे तीर्थ घूमे। खूब दान किए।" "तुमने जो दान किए, जो धन तुमने तीर्थों में जाने में लगाया, वह पाप की कमाई थी। इसलिए स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए भी नहीं खुलेगा।" प्रहरी ने व्यापारी से कहा।♓ 🪴अब प्रहरी ने तीसरे आदमी से अपने बारे में बताने को कहा, "तुम भी अपना परिचय दो और वह काम भी बताओ जिससे तुम स्वर्ग में स्थान प्राप्त कर सको।" तीसरे आदमी ने अपने बारे में बताते हुए कहा, "मैं एक धर्म गुरु हूँ। मैंने लोगों को अच्छे,अच्छे उपदेश दिए। मैंने हमेशा दूसरों को ज्ञान की बातें बताई एवं अच्छे मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित किया।"🪴 🌀प्रहरी ने धर्मगुरु से कहा, "तुमने अपनी नेक कमाई के होते हुए उसे पूजा स्थलों के निर्माण में नहीं लगाया बल्कि केवल चंदे के पैसों से पूजा स्थलों का निर्माण करवाया। चंदा केवल आवश्यकता पड़ने पर ही यानि आपके पास नहीं है तो लेना चाहिए ! इस प्रकार तुमने ऋषियों , संतो के बनाये "अपरिग्रह " के सिद्धांत की अवहेलना की थी !तुमने लोगों को ज्ञान और अच्छाई की बातें तो जरूर बताईं मगर तुम स्वयं उपदेशों के अनुरूप अपने आपको न बना सके। क्या तुमने स्वयं उन उपदेशों का पालन किया ? एक बार फिर पृथ्वी पर जन्म लो और अपने आचरण को अपने उपदेशों के अनुरूप बनाओ ! अतः स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए भी नहीं खुलेगा।"🌀 ♒अब चौथे आदमी की बारी आई। प्रहरी ने उससे भी उसका परिचय पूछा। उस आदमी ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया, "मैं एक गरीब किसान हूँ। मैं जीवन भर अपने परिवार के भरण,पोषण हेतु स्वयं पैसों के अभाव में तरसता रहा। मैंने कोई दान,पुण्य नहीं किया। इसलिए मैं जानता हूँ कि स्वर्ग का द्वार मेरे लिए नहीं खुल सकता।"♒ 💢प्रहरी ने कहा, "नहीं तुम भूल रहे हो। एक बार एक भूखे आदमी को तुमने स्वयं भूखे रह कर अपना पूरा खाना खिला दिया था, पक्षियों को दाना डाला और प्यासे लोगों के लिए पानी का इंतजाम किया था।" "हाँ मुझे याद है, लेकिन वे काम तो कोई बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं थे। मुझे बस थोड़ा सा स्वर्ग में झांक लेने दीजिए।" किसान ने विनती की।💢 ☀️प्रहरी ने किसान से कहा, "नहीं तुम्हारे ये काम बहुत ही महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये सब कुछ तुमने अपनी थोड़ी सी नेक कमाई से किया था ! यह तुम्हारी देविक प्रवृति के पर्याप्त परिचायक है और देवता ही स्वर्ग में रह सकते है ! अतः आओ ! स्वर्ग का द्वार तुम्हारे लिए ही खुला है।’☀️ ‼️अगर मृत्योपरांत परलोक में स्वर्ग / देवलोक/ मोक्ष चाहते है तो अपने महतत्व ( मन ) में देविक प्रवृतियों के निर्माण के लिए सात्विक आहार ही ग्रहण करे ! तामसिक आहार असुरलोक ( नरक ) ही ले जा सकता है स्वर्ग में नहीं ! *** बाकि जैसी इच्छा आपकी **** "जय जय श्री राधे कृष्ण " ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,, 🌸💦🌸💦🌸💦🌸💦🙏 🌹🌲🌿🙏👏🌹🌲🌿🌹

+9 प्रतिक्रिया 11 कॉमेंट्स • 23 शेयर
Sharda Dubey Jan 16, 2022

🪔🛕🙏🏻दुष्कृतं हि मनुष्याणामन्नमाश्रित्य तिष्ठति।।🚩🔔🐚🚩यो यस्यान्नं समश्नाति स तस्याश्नाति किल्विषम् ।। 🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾 धर्म शास्त्र ने अन्न के दोष पर गहरा विचार व्यक्त किया है,*अन्न से ही हमारा तन मन बनता है,*।जैसा अन्न वैसा हमारा संस्कार बनेगा।**पराया अन्न बहुत ही भयप्रद होता है*क्यों कि मनुष्य का कर्मफल ही उसके अन्न में निवास करता है**अतः ऐसे व्यक्ति का अन्न जो ग्रहण करता है*वह उसके पाप को ही ग्रहण करता है----ये👆(आंगिरसस्मृति५८)। राजा का अन्न अधिक दूषित होता है*क्यों कि राजा के पास समस्त प्राणियों का अन्न किसी-न -किसी तरह पहुंचता ही रहता है।**इसीलिए (आंगिरसस्मृति ७२)_मेंकहा गया है*,कि राजा का अन्न तेज को खा डालता है ---राजान्नं हरते तेज:। ,🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼 कश्मीर के कैयट नाम काएक 🌼 बहुत विद्वान व्यक्ति थे______शेषदृष्टांत____क्रमश:💮💮💮💮🌾🌾🌾🌾🌾🌾🚩🚩🌾🌾🪔🪔🛕🛕 सांयकाल नमन आप सभी को 👏🌹🌹🌹🙏🙏🙏🌹🌹🌹

+13 प्रतिक्रिया 6 कॉमेंट्स • 3 शेयर
Deepak Jan 16, 2022

+2 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 3 शेयर

+6 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 1 शेयर

+9 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 23 शेयर
Jasbir Singh nain Jan 14, 2022

मकर संक्रांति क्यों मनाते हैं? 14 जनवरी, 2021 (शुक्रवार) शुभ प्रभात जी 🪔🪴🙏🙏🙏 मकर संक्रांति का त्योहार नए वर्ष का पहला त्यौहार है जिसका हर किसी को बेसब्री से इंतजार रहता है। मकर संक्रान्ति हिन्दुओं का एक प्रमुख पर्व है। मकर संक्रांति मुख्य रूप में भारत और नेपाल में मनाई जाती है। पौष मास में जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते है तब इस पर्व को मनाया जाता है। वर्तमान शताब्दी में यह त्योहार अधिकतर जनवरी माह के चौदहवें दिन ही पड़ता है, इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करते है।यह पर्व भगवान सूर्य के पूजन का सबसे बड़ा पर्व है। देशभर में इसे बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। आइए अब जानते है मकर संक्रांति में पूजा और दान का शुभ मुहूर्त कब है। इस वर्ष मकर संक्रांति का पर्व 14 जनवरी को मनाया जाएगा। 14 जनवरी पुण्य काल का मुहूर्त 2 बजकर 12 मिनट से शाम 5 बजकर 45 मिनट तक रहेगा। वहीं महापुण्य काल मुहूर्त की बात करें तो यह 2 बजकर 12 मिनट से 2 बजकर 36 मिनट तक रहेगा। तो मित्रों ये था मकर संक्रांति का शुभ मुहूर्त, हमारे ज्योतिषाचार्य के अनुसार मकर संक्रांति शांतिदायक कार्यों को प्रारंभ करने के लिए ब्रह्म योग और अन्य सभी कार्यों के लिए आनंदादि योग शुभ होता है। वहीं, आनंदादि योग सभी प्रकार की असुविधाओं को दूर करता है। इस योग में किया गया प्रत्येक कार्य बाधाओं और चिंताओं से मुक्त रहता है। आइए अब जानते है कि मकर संक्रांति मनाने के पीछे का का कारण। वैसे देखा जाए तो हर त्योहार को मनाने के पीछे एक कहानी एक परंपरा होती है, लेकिन मकर संक्रांति के पीछे कोई एक विशेष कारण नहीं है। इसका एक कारण ये है कि इस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और दूसरा है किसानों से जुड़ा। मकर संक्रांति किसानों के लिए भी बहुत ही महत्वपूर्ण त्योहार है, क्योंकि इस दिन किसान अपनी फसल की कटाई करते है और इसी खुशी में इस त्योहार को मनाया जाता है। तो मित्रों ये था मकर संक्रांति मनाने के पीछे का कारण, आइए अब जानते है मकर संक्रांति के दिन की जाने वाली पूजा विधि के बारे में। मकर संक्रांति की पूजा के लिए सबसे पहले पूण्य काल मुहूर्त और महापुण्य काल मुहूर्त निकाल ले, और अपने पूजा करने के स्थान को साफ़ और शुद्ध कर ले। वैसे संक्रांति की पूजा भगवान सूर्य को समर्पित होती है। इसके बाद एक थाली में 4 काली और 4 सफेद तीली के लड्डू रखे जाते हैं। इसके बाद थाली में चावल का आटा और हल्दी का मिश्रण, सुपारी, पान के पत्ते, शुद्ध जाल, फूल और अगरबत्ती रख दिजिए। अब भगवान सूर्यदेव को प्रसाद का भोग लगाएं और उसके बाद आरती उतारें और सूर्य मंत्र ‘ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सह सूर्याय नमः’ का कम से कम 21 या 108 बार जाप करें। तो मित्रों ये थी मकर संक्रांति पर दान करने से आपको मकर संक्रांति का शुभ फल प्राप्त होगा। मकर संक्रांति को दान करना चाहिए

+164 प्रतिक्रिया 42 कॉमेंट्स • 724 शेयर
devilakshmi Jan 15, 2022

*आज की अमृत कथा* *लालच की दुनिया* 〰️〰️🌼〰️〰️ एक दिन गाँव की एक बहू सफाई कर रही थी, मुँह में सुपारी थी पीक आया तो उसने गलती से यज्ञवेदी में थूक दिया। उसे आश्चर्य तब हुआ जब उसका थूक स्वर्ण में बदल गया। अब तो वह प्रतिदिन जान बूझकर वेदी में थूकने लगी और उसके पास धीरे-धीरे स्वर्ण बढ़ने लगा। महिलाओं में बात तेजी से फैलती है, इसलिए कई और महिलाएं भी अपने-अपने घर में बनी यज्ञवेदी में थूक-थूक कर सोना उत्पादन करने लगीं। धीरे-धीरे पूरे गाँव में यह सामान्य चलन हो गया। सिवाय एक महिला के, उस महिला को भी अनेक दूसरी महिलाओं ने उकसाया, समझाया, अरी ! तू क्यों नहीं थूकती ? जी, बात यह है कि मैं अपने पति की अनुमति बिना यह कार्य हर्गिज नहीं करूँगी और जहाँ तक मुझे ज्ञात है वह अनुमति नहीं देंगे। किन्तु ग्रामीण महिलाओं ने ऐसा वातावरण बनाया कि आखिर उसने एक रात डरते-डरते अपने पति को पूछ ही लिया। खबरदार जो ऐसा किया तो, यज्ञवेदी क्या थूकने की चीज़ है ? पति की गरजदार चेतावनी के आगे बेबस वह महिला चुप हो गई पर जैसा वातावरण था और जो चर्चाएँ होती थी, उनसे वह साध्वी स्त्री बहुत व्यथित रहने लगी। खास कर उसके सूने गले को लक्ष्य कर अन्य स्त्रियाँ अपने नए-नए कण्ठ-हार दिखाती तो वह अन्तर्द्वन्द में घुलने लगी। पति की व्यस्तता और स्त्रियों के उलाहने उसे धर्मसंकट में डाल देते। यह शायद मेरा दुर्भाग्य है, अथवा कोई पूर्वजन्म का पाप कि एक सती स्त्री होते हुए भी मुझे एक रत्ती सोने के लिए भी तरसना पड़ रहा है। शायद यह मेरे पति का कोई गलत निर्णय है, ओह ! इस धर्माचरण ने मुझे दिया ही क्या है ? जिस नियम के पालन से दिल कष्ट पाता रहे उसका पालन क्यों करूँ ? और हुआ यह कि वह बीमार रहने लगी। पतिदेव इस रोग को ताड़ गए और उन्होंने एक दिन ब्रह्म मुहूर्त में ही सपरिवार ग्राम त्यागने का निश्चय किया। गाड़ी में सारा सामान डालकर वे रवाना हो गए। सूर्योदय से पहले-पहले ही वे बहुत दूर निकल जाना चाहते थे। किन्तु ! अरे ! यह क्या ? ज्यों ही वे गाँव की कांकड़ (सीमा) से बाहर निकले ! पीछे भयानक विस्फोट हुआ। पूरा गांव धू-धू कर जल रहा था। सज्जन दम्पत्ति अवाक् रह गए। अब उस स्त्री को अपने पति का महत्त्व समझ आ गया। वास्तव में, इतने दिन गाँव बचा रहा, तो केवल इस कारण कि उसका परिवार गाँव की परिधि में था। शिक्षा:- *धर्मांचरण करते रहें, कुछ पाने के लालच में इंसान बहुत कुछ खो बैठता है। इसलिए लालच से बचें..!!* *🙏🏽🙏🏿🙏जय जय श्री राम*🙏🏼🙏🏻🙏🏾

+38 प्रतिक्रिया 8 कॉमेंट्स • 114 शेयर

सारे तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार जाने क्यों गंगा सागर को तीर्थों का पिता कहा जाता है, कहने का तात्पर्य है कि गंगा सागर का अन्य तीर्थों की अपेक्षा अत्यधिक महत्व है। शायद यही कारण है कि जन साधारण में यह कहावत बहुत प्रचलित है कि- ''सब तीरथ बार-बार, गंगा सागर एक बार।' ' गंगा जिस स्थान पर समुद्र में मिलती है, उसे गंगा सागर कहा गया है। गंगा सागर एक बहुत सुंदर वन द्वीप समूह है जो बंगाल की दक्षिण सीमा में बंगाल की खाड़ी पर स्थित है। प्राचीन समय में इसे पाताल लोक के नाम से भी जाना जाता था। कलकत्ते से यात्री प्रायः जहाज में गंगा सागर जाते हैं। यहां मेले के दिनों में काफी भीड़-भाड़ व रौनक रहती है। लेकिन बाकी दिनों में शांति एवं एकांकीपन छाया रहता है। तीर्थ स्थान-सागर द्वीप में केवल थोड़े से साधु ही रहते हैं। यह अब वन से ढका और प्रायः जनहीन है। इस सागर द्वीप में जहां गंगा सागर मेला होता है, वहां से एक मील उत्तर में वामनखल स्थान पर एक प्राचीन मंदिर है। इस समय जहां गंगा सागर पर मेला लगता है, पहले यहीं गंगाजी समुद्र में मिलती थी, किंतु अब गंगा का मुहाना पीछे हट गया है। अब गंगा सागर के पास गंगाजी की एक छोटी धारा समुद्र से मिलती है। आज यहां सपाट मैदान है और जहां तक नजर जाती है वहां केवल घना जंगल। मेले के दिनों में गंगा के किनारे पर मेले के स्थान बनाने के लिए इन जंगलों को कई मीलों तक काट दिया जाता है। गंगा सागर का मेला मकर संक्रांति को लगता है। खाने-पीने के लिए होटल, पूजा-पाठ की सामग्री व अन्य सामानों की भी बहुत-सी दुकानें खुल जाती हैं। सारे तीर्थों का फल अकेले गंगा सागर में मिल जाता है। संक्रांति के दिन गंगा सागर में स्नान का महात्म्य सबसे बड़ा माना गया है। प्रातः और दोपहर स्नान और मुण्डन-कर्म होता है। यहां पर लोग श्राद्ध व पिण्डदान भी करते हैं। कपिल मुनि के मंदिर में जाकर दर्शन करते हैं, इसके बाद लोग लौटते हैं ओर पांचवें दिन मेला समाप्त हो जाता है। गंगा सागर से कुछ दूरी पर कपिल ऋषि का सन् 1973 में बनाया गया नया मंदिर है जिसके बीच में कपिल ऋषि की मूर्ति है। उस मूर्ति के एक तरफ राजा भगीरथ को गोद में लिए हुए गंगाजी की मूर्ति है तथा दूसरी तरफ राजा सगर तथा हनुमान जी की मूर्ति है। इसके अलावा यहां सांखय योग के आचार्य कपिलानंद जी का आश्रम, महादेव मंदिर, योगेंद्र मठ, शिव शक्ति-महानिर्वाण आश्रम और भारत सेवाश्रम संघ का विशाल मंदिर भी हैं। रामायण में एक कथा मिलती है जिसके अनुसार कपिल मुनि किसी अन्य स्थान पर तपस्या कर रहे थे। ऐसे ही समय में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा सगर एक अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करने लगे। उनके अश्वमेध यज्ञ से डरकर इंद्र ने राक्षस रूप धारण कर यज्ञ के अश्व को चुरा लिया और पाताल लोक में ले जाकर कपिल के आश्रम में बांध दिया। राजा सगर की दो पत्नियां थीं- केशिनी और सुमति। केशिनी के गर्भ से असमंजस पैदा हुआ और सुमति के गर्भ से साठ हजार पुत्र। असमंजस बड़ा ही उद्धत प्रकृति का था। वह प्रजा को बहुत पीड़ा देता था। अतः सगर ने उसे अपने राज्य से निकाल दिया था। अश्वमेध का घोड़ा चुरा लिये जाने के कारण सगर बड़ी चिंता में पड़ गये। उन्होंने अपने साठ हजार पुत्रों को अश्व ढूंढने के लिए कहा। साठों हजार पुत्र अश्व ढूंढते ढूंढते-ढूंढते पाताल लोक में पहुंच गये। वहां उन लोगों ने कपिल मुनि के आश्रम में यज्ञीय अश्व को बंधा देखा। उन लोगों ने मुनि कपिल को ही चोर समझकर उनका काफी अपमान कर दिया। अपमानित होकर ऋषि कपिल ने सभी को शाप दिया- 'तुम लोग भस्म हो जाओ। ' शाप मिलते ही सभी भस्म हो गये। पुत्रों के आने में विलंब देखकर राजा सगर ने अपने पौत्र अंशुमान, जो असमंजस का पुत्र था, को पता लगाने के लिए भेजा। अंशुमान खोजते-खोजते पाताल लोक पहुंचा। वहां अपने सभी चाचाओं को भस्म रूप में परिणत देखा तो सारी स्थिति समझ गया। उन्होंने कपिल मुनि की स्तुति कर प्रसन्न किया। कपिल मुनि ने उसे घोड़ा ले जाने की अनुमति दे दी और यह भी कहा कि यदि राजा सगर का कोई वंशज गंगा को वहां तक ले आये तो सभी का उद्धार हो जाएगा। अंशुमान घोड़ा लेकर अयोध्या लौट आया। यज्ञ समाप्त करने के बाद राजा सगर ने 30 हजार वर्षों तक राज्य किया और अंत में अंशुमान को राजगद्दी देकर स्वर्ग सिधार गये। अंशुमान ने गंगा को पृथ्वी पर लाने का काफी प्रयत्न किया, लेकिन सफल नहीं हो पाया। अंशुमान के पुत्र दिलीप ने दीर्घकाल तक तपस्या की। लेकिन वह भी सफल नहीं हो पाया। दिलीप के पुत्र भगीरथ ने घोर तपस्या की। गंगा ने आश्वासन दिया कि मैं जरूर पृथ्वी पर आऊंगी, लेकिन जिस समय मैं स्वर्गलोक से पृथ्वी पर आऊंगी, उस समय मेरे प्रवाह को रोकने के लिए कोई उपस्थित होना चाहिए। भगीरथ ने इसके लिए भगवान शिव को प्रसन्न किया। भगवान शिव ने गंगा को अपनी जटा में धारण कर लिया। भगीरथ ने उन्हें पुनः प्रसन्न किया तो शिवजी ने गंगा को छोड़ दिया। गंगा शिवजी के मस्तक से सात स्रोतों में भूमि पर उतरी। ह्रानिदी, पावनी और नलिनी नामक तीन प्रवाह पूर्व की ओर चल गये, वड.क्ष, सीता तथा सिंधु नामक तीन प्रवाह पश्चिम की ओर चले गये और अंतिम एक प्रवाह भगीरथ के बताए हुए मार्ग से चलने लगा। भगीरथ पैदल गंगा के साथ नहीं चल सकते थे, अतः उन्हें एक रथ दिया गया। भगीरथ गंगा को लेकर उसी जगह आये जहां उनके प्रपितामह आदि भस्म हुए थे। गंगा सबका उद्धार करती हुई सागर में मिल गयी। भगीरथ द्वारा लाये जाने के कारण गंगा का एक नाम भागीरथी भी पड़ा। जहां भगीरथ के पितरों का उद्धार हुआ, वही स्थान सागर द्वीप या गंगासागर कहलाता है। गंगा सागर से कुछ दूरी पर कपिल ऋषि का सन् 1973 में बनाया गया नया मंदिर है जिसके बीच में कपिल ऋषि की मूर्ति है। उस मूर्ति के एक तरफ राजा भगीरथ को गोद में लिए हुए गंगाजी की मूर्ति है तथा दूसरी तरफ राजा सगर तथा हनुमान जी की मूर्ति है। जय मांँ गंगे🙏🙏

+34 प्रतिक्रिया 12 कॉमेंट्स • 41 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB