Vijay Yadav
Vijay Yadav Apr 20, 2019

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Ramprakash Pal Apr 21, 2019
good morning g jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di jay mata di

poonam aggarwal May 20, 2019

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Anjana Gupta May 19, 2019

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Pawan Saini May 19, 2019

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Pawan Saini May 19, 2019

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Rameshanand Guruji May 20, 2019

देवर्षि नारद जयंती । संगीत व पत्रकारिता में रुचि रखने वालों के लिए खास है।प्रथम प्रवर्तक संगीत व पत्रकारिता के देवर्षि नारद की शिवा और पद्म नाम के योग में जयंती मनाई जाएगी संक्षिप्त जीवन परिचय, व पूजन विधि। संकलित;---रमेशानन्द गुरूजी नारद जी ऐतरेय ब्राह्मण प्रकटोत्सव जयेष्ठ कृष्ण पक्ष दिव्तीय पर हार्दिक शुभकामनाए। संकलित--रमेशानंद गुरूजी अन्य नामदेवर्षि नारदवंश-गोत्रहिन्दू शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एकधर्म-संप्रदायये स्वयं वैष्णव हैं और वैष्णवों के परमाचार्य तथा मार्गदर्शक हैं।रचनाएँनारद पांचरात्र, नारद भक्ति सूत्र, नारद पुराण, नारद स्मृतिवाद्यवीणासंदर्भ ग्रंथवैदिक साहित्य, रामायण, महाभारत, पुराण, स्मृतियाँ, अथर्ववेद, ऐतरेय ब्राह्मणजयंतीज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की द्वितीयाव्यक्तित्वनारद आत्मज्ञानी, नैष्ठिक ब्रह्मचारी, त्रिकाल ज्ञानी, वीणा द्वारा निरंतर प्रभु भक्ति के प्रचारक, दक्ष, मेधावी, निर्भय, विनयशील, जितेन्द्रिय, सत्यवादी, स्थितप्रज्ञ, तपस्वी, चारों पुरुषार्थ के ज्ञाता, परमयोगी, सूर्य के समान, त्रिलोकी पर्यटक, वायु के समान सभी युगों, समाजों और लोकों में विचरण करने वाले, वश में किये हुए मन वाले नीतिज्ञ, अप्रमादी, आनंदरत, कवि, प्राणियों पर नि:स्वार्थ प्रीति रखने वाले, देव, मनुष्य, राक्षस सभी लोकों में सम्मान पाने वाले देवता तथापि ऋषित्व प्राप्त देवर्षि थे।अन्य जानकारीभक्ति तथा संकीर्तन के ये आद्य-आचार्य हैं। इनकी वीणा भगवन जप 'महती' के नाम से विख्यात है। श्रीमुख से 'नारायण-नारायण' की ध्वनि निकलती रहती है। नारद मुनि हिन्दू शास्त्रों के अनुसार, ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एक माने गये हैं। ये भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक माने जाते है। ये स्वयं वैष्णव हैं और वैष्णवों के परमाचार्य तथा मार्गदर्शक हैं। ये प्रत्येक युग में भगवान की भक्ति और उनकी महिमा का विस्तार करते हुए लोक-कल्याण के लिए सर्वदा सर्वत्र विचरण किया करते हैं। भक्ति तथा संकीर्तन के ये आद्य-आचार्य हैं। इनकी वीणा भगवन जप 'महती' के नाम से विख्यात है। उससे 'नारायण-नारायण' की ध्वनि निकलती रहती है। इनकी गति अव्याहत है। ये ब्रह्म-मुहूर्त में सभी जीवों की गति देखते हैं और अजर-अमर हैं। भगवद-भक्ति की स्थापना तथा प्रचार के लिए ही इनका आविर्भाव हुआ है। उन्होंने कठिन तपस्या से ब्रह्मर्षि पद प्राप्त किया है। देवर्षि नारद धर्म के प्रचार तथा लोक-कल्याण हेतु सदैव प्रयत्नशील रहते हैं। इसी कारण सभी युगों में, सब लोकों में, समस्त विद्याओं में, समाज के सभी वर्गो में नारद जी का सदा से प्रवेश रहा है। मात्र देवताओं ने ही नहीं, वरन् दानवों ने भी उन्हें सदैव आदर दिया है। समय-समय पर सभी ने उनसे परामर्श लिया है। "अहो! ये देवर्षि नारद हैं, जो वीणा बजाते हैं, हरिगुण गाते, मस्त दशा में तीनों लोकों में घूम कर दु:खी संसार को आनंदित करते हैं।" [1] जन्म कथा पूर्व कल्प में नारद 'उपबर्हण' नाम के गंधर्व थे। उन्हें अपने रूप पर अभिमान था। एक बार जब ब्रह्मा की सेवा में अप्सराएँ और गंधर्व गीत और नृत्य से जगत्स्रष्टा की आराधना कर रहे थे, उपबर्हण स्त्रियों के साथ श्रृंगार भाव से वहाँ आया। उपबर्हण का यह अशिष्ट आचरण देख कर ब्रह्मा कुपित हो गये और उन्होंने उसे 'शूद्र योनि' में जन्म लेने का शाप दे दिया। शाप के फलस्वरूप वह 'शूद्रा दासी' का पुत्र हुआ। माता पुत्र साधु संतों की निष्ठा के साथ सेवा करते थे। पाँच वर्ष का बालक संतों के पात्र में बचा हुआ झूठा अन्न खाता था, जिससे उसके हृदय के सभी पाप धुल गये। बालक की सेवा से प्रसन्न हो कर साधुओं ने उसे नाम जाप और ध्यान का उपदेश दिया। शूद्रा दासी की सर्पदंश से मृत्यु हो गयी। अब नारद जी इस संसार में अकेले रह गये। उस समय इनकी अवस्था मात्र पाँच वर्ष की थी। माता के वियोग को भी भगवान का परम अनुग्रह मानकर ये अनाथों के नाथ दीनानाथ का भजन करने के लिये चल पड़े। एक दिन वह बालक एक पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान लगा कर बैठा था कि उसके हृदय में भगवान की एक झलक विद्युत रेखा की भाँति दिखायी दी और तत्काल अदृश्य हो गयी। उसके मन में भगवान के दर्शन की व्याकुलता बढ़ गई, जिसे देख कर आकाशवाणी हुई - हे दासीपुत्र! अब इस जन्म में फिर तुम्हें मेरा दर्शन नहीं होगा। अगले जन्म में तुम मेरे पार्षद रूप में मुझे पुन: प्राप्त करोगे।' समय बीतने पर बालक का शरीर छूट गया और कल्प के अंत में वह ब्रह्म में लीन हो गया। समय आने पर नारद जी का पांचभौतिक शरीर छूट गया और कल्प के अन्त में ये ब्रह्मा जी के मानस पुत्र के रूप में अवतीर्ण हुआ। नारद को ब्रह्मदेव के 7 मानस पुत्रों में से एक माना जाता है। इनका जन्‍म ब्रह्मा जी की गोद से हुआ था। ब्रह्मा जी ने नारद को सृष्टि कार्य का आदेश दिया था, लेकिन नारद ने ब्रह्मा जी का ये आदेश मानने से इनकार कर दिया। क्यों कहते हैं देवर्षि देवर्षि नारद व्यास, बाल्मीकि तथा महाज्ञानी शुकदेव आदि के गुरु हैं। देवर्षि नारदजी की कृपा से ही रामायण और महाभारत जैसे महाग्रंथ मनुष्यों को प्राप्त हो सके हैं। इन्होंने ही प्रह्लाद, ध्रुव, राजा अम्बरीष आदि महान् भक्तों को भक्ति मार्ग में प्रवृत्त किया। इस तरह नारद, देवताओं के ऋषि हैं, इसी कारण उनको देवर्षि नाम से भी पुकारा जाता है। कहा जाता है कि कठिन तपस्या के बाद नारद को ब्रह्मर्षि पद प्राप्त हुआ था। नारद बहुत ज्ञानी थे, इसी कारण दैत्‍य हो या देवी-देवता सभी वर्गों में उनका आदर और सत्‍कार किया जाता था। संगीत व पत्रकारिता वालों के लिए खास हैं नारद जी नारद जी श्रुति-स्मृति, इतिहास, पुराण, व्याकरण, वेदांग, संगीत, खगोल-भूगोल, ज्योतिष, योग आदि अनेक शास्त्रों में पारंगत थे। ये वीणा द्वारा भगवान विष्णु की भक्ति के प्रचारक थे। मां सरस्वती की कृपा इन पर होने से ये अत्यंत बुद्धिमान और संगीत में निपुण थे। नारद जी का सम्मान हर लोक में होता था। देवताओं के अलावा ज्ञानी, बुद्धिमान और चतुर होने के कारण दैत्य भी नारद जी का सम्मान करते थे। नारद जी वृतांतों का वहन करने वाले एक विचारक थे। इसलिए संगीत व पत्रकारिता में रुचि रखने वालों को खासतौर से नारद जी की पूजा करनी चाहिए। अन्य हिंदू त्योहारों के समान, इस दिन सूर्योदय से पहले स्नान करने का बहुत महत्व है।स्नान करने के बाद, साफ वस्त्र पहनें। नारद जी भगवान विष्णु के अनन्य भक्त हैं, इसलिए उनकी जयंती पर भगवान विष्णु की पूजा खासतौर से की जातीहै। इस दिन भगवान विष्णु को चंदन, तुलसी के पत्ते, कुमकुम, अगरबत्ती, फूल और मिठाई अर्पित करें। दिनभर उपवास रखें। दाल व अनाज का सेवन न करें। केवल दूध और फलों का सेवन करें। रात्रि जागरण करना चाहिए। विष्णु सहस्त्रनाम का जाप करें और ज्यादा से ज्यादा समय उनके अन्य मंत्रों का पाठ करें। इसके बाद भगवान विष्णु की आरती करें। ब्राह्मणों को भोजन, कपड़े और पैसे दान करने चाहिए

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Pawan Saini May 19, 2019

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