हरि ऊँ

#प्रवचन हरि ऊँ

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Omprakash Dubey Apr 13, 2021

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.108 : काम करते हुए भी भजन करो* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 108)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* प्यारे लोगो! शरीर में जीवात्मा का निवास है, इसीलिए शरीर जीवित मालूम होता है। *शरीर जड़ है अर्थात्‌ ज्ञानहीन पदार्थ है और जीवात्मा-चेतन अर्थात्‌ ज्ञानमय पदार्थ है।* दोनों का संग ऐसा है कि साधारणतः: इसको कोई भिन्न नहीं कर सकता। शरीर में रहने का जीवन थोड़ा है और शरीर छोड़ने के बाद का जीवन अनंत है। क्योंकि *जीवात्मा अविनाशी है। अनंत जीवन बहुत जीवन है*, एक शरीर का जीवन बहुत कम है। अवश्य ही वर्तमान शरीर के बाद के जीवन में स्थूल शरीर अनेक हो सकते हैं - शरीर बहुत हो सकते हैं। उन जन्म-मरणशील जीवन को जोड़ो तो बहुत हैं। इस शरीर से छूटने पर केवल जीवात्मा नहीं रहता। वह तीन जड़ शरीरों के अंदर रहता है। बारम्बार जनमने-मरने में केवल स्थूल शरीर छूटता है और तीन शरीर रह जाते हैं। इन तीनों शरीरों में रहने का जीवन बहुत है। इन्हीं शरीरों में रहते हुए स्वर्गादि परलोक का भोग होता है। वहाँ के भोग के समाप्त होने पर फिर कर्मानुसार किसी के यहाँ जन्म लेता है। लेकिन यह चक्र कबतक चलता रहेगा, कोई ठिकाना नहीं। इतना ठिकाना है कि *जबतक शरीर और संसार से छुटकारा नहीं हो जाय - मुक्ति नहीं प्राप्त कर ले, तबतक लगा रहेगा। सबसे उत्तम जीवन यही है कि किसी शरीर में नहीं रहना।* किसी शरीर में रहना, पुण्य के अनुकूल स्वर्गादि में रहो फिर वहाँ से नीचे गिरो, यह जीवन कोई अच्छा जीवन नहीं है। हमलोग वर्तमान शरीर में हैं, इसमें कितने दिन रहेंगे, ठिकाना नहीं। उस अनंत जीवन के समक्ष यह जीवन अत्यन्त स्वल्प है। लोग दुःख में एक सेकेण्ड के लिए लिए रहना नहीं चाहते। *सुख की ओर दौड़ता हुआ, दुःख से भागता हुआ यह जीव चलता है। किंतु जो सुख यह चाहता है, वह कहीं नहीं मिलता।* साधु-सन्त लोग कहते हैं कि थोड़े-से जीवन के लिए तुम दौड़े-दौड़े फिरते हो और डरते हो कि आज यह काम नहीं किया जाएगा तो यह हानि होगी। डर के मारे ठीक-ठीक नौकरी, वाणिज्य-व्यापार, खेती आदि करते रहते हो। ऐसा नहीं करो तो कोई हर्ज नहीं। बहुत धनी आदमी भी धन को सम्हालने और बढ़ाने में रहता है। धन के सम्हालने और बढ़ाने में भी कष्ट होता है। गरीब आदमी देखता है कि आज खाने के लिए है कल के लिए यत्न नहीं करो तो क्या खाओगे? उससे विशेष जो कृषक हैं, सोचते हैं कि इस साल के लिए खाने को है, आगे वर्ष क्या खाएँगे, इस डर के मारे खेती करते हैं। तो एक शरीर के जीवन के लिए डरते हो और काम करते हो। और इसके लिए नहीं डरते कि इस शरीर के जीवन के बाद का जो जीवन है उससे क्या होगा? चाहिए कि ऐसा काम करो कि शरीर छोड़ने के बाद भी तुम सुखी रहो। इसके लिए क्या करना होगा? *ईश्वर का नाम जपो।* इसी को कबीर साहब ने कहा है – *निधड़क बैठा नाम बिनु, चेति न करै पुकार। यह तन जल का बुदबुदा, बिनसत नाहीं बार।।* यदि समझ लो तो फिर आज कल के लिए बहाना नहीं करो कि आज नहीं कल करूँगा। क्योंकि गुरु नानकदेवजी ने कहा है – *नहँ बालक नहँ यौवने, नहिं बिरधी कछु बंध। वह औसर नहिं जानिये, जब आय पड़े जम फंद।।* *अनंत जीवन में दुःखी न होओ, इसके लिए ईश्वर का नाम-भजन करो। आजकल करते हुए समय बर्बाद मत करो।* बल्कि – *काल करै सो आज कर, आज करै से अब्ब। पल में परलै होयगा, बहुरि करैगा कब्ब।।* भर दिन, भर रात बैठकर भजन नहीं करने कहा जाता। *समय बांध-बांधकर भजन करो। काम करते हुए भी भजन करो और काम छोड़-छोड़कर भी भजन करो।* ब्राह्ममुहुर्त्त में मुँह-हाथ धोकर, निरालस होकर भजन करो। दिन में स्नान के बाद भजन किया करो। *तन काम में मन राम में’ हमारे यहाँ प्रसिद्ध है, इसको काम में लाओ।* फिर सायंकाल भी बैठकर भजन करो। रात में सोते समय भजन करते हुए सोओ, तो खराब स्वप्न नहीं होगा। नाम-भजन को लोग जानते हैं कि गुरु ने जो मंत्र दिया है, वही नाम-भजन है। वह नाम-भजन है किंतु और भी नाम-भजन है। जो शब्द लोग बोल सकते हैं, सुन सकते हैं, वह वर्णात्मक नाम-भजन है। ध्वन्यात्मक नाम-भजन भी होता है। वह ध्वनि तुम्हारे अंदर है। उस ब्रह्म ध्वनि में जो अपने मन को लगाता है, तो वह शब्द से खींचकर ब्रह्म तक पहुँचा देता है। *नाम का जप और नाम का ध्यान भी होता है। वर्णात्मक नाम का जप होता है। जिसकी युक्ति गुरु बताते हैं और ध्वन्यात्मक नाम का ध्यान होता है। इसकी भी युक्ति गुरु बताते हैं।* इस साधन के लिए भला चरित्र से रहना होगा। जिसका चरित्र भला नहीं है, जो सदाचार का अवलम्ब नहीं लेता है, वह विषयों में - भोगों में बँधा रहता है। जब वह भजन करने लगता है तो उसका मन गिर-गिर जाता है। इसलिए *अपने को पवित्र आचरण में रखो।* *जाकी जिभ्या बंध नहीं, हिरदे नाहीं साँच। ताके संग न चालिये, घाले बटिया काँच।।* जिभ्या पर खाने और बोलने का बंधन रखो। झूठ और कड़वा बोलना खराब है। झूठ बोलना सब *पापों की जड़ है। कड़वा बोलना आपस में फूट पैदा करता है। इसलिए सत्य बोलो और नम्र होकर रहो।* *साधू सोई सराहिये, साँची कहे बनाय। कै टूटै कै फिर जुरै, कहे बिन भरम न जाय।।* जो साँच बोलते हैं और कड़वा बोलते हैं तो उसको भी लोग सहन नहीं कर सकते। *जो भोजन तुम्हारी बुद्धि को नीचा करे, शरीर में रोग पैदा करे, वह मत खाओ।* इसके लिए संतों ने कहा - *मांस मछरिया खात है, सुरा पान से हेत। सो नर जड़ से जाहिंगे, ज्यों मूरी की खेत।। यह कूकर को खान है, मानुष देह क्‍यों खाय। मुख में आमिख मेलता, नरक पड़े सो जाय।।* मांस, मछली तथा नशा आदि खाने-पीने से पाशविक वृत्ति रहती है। इसमें राजस-तामस वृत्ति रहती है। सात्तिक वृत्ति से भजन होता है। *इस प्रकार के भोजन से सात्त्विक बुद्धि दमन हो जाती है और राजस-तामस की प्रधानता हो जाती है। जिससे भजन में चंचलता और आलस आता रहता है।* जो भोजन शीघ्र नहीं पचे, वह भोजन भी मत करो। क्योंकि यह भी भजन नहीं होने देता। जितने नशे हैं, यहाँ तक कि तम्बाकू तक लेने योग्य नहीं। इसलिए कबीर साहब ने कहा – *भाँग तम्बाकू छूतरा, अफयूँ और शराब। कह कबीर इनको तजै, तब पावे दीदार।।* तम्बाकू को लोग साधारण समझते हैं, किंतु यह भी बहुत बुरी नशा है। नशाओं से, कुभोजन से, कड॒वी बात से और असत्य भाषण से बचो। इन्द्रियों में संयम रखो और भजन करो तो भजन बनेगा। केवल भाँग, तम्बाकू ही नशा नहीं है, बल्कि - *मद तो बहुतक भाँति का, ताहि न जाने कोय। तन मद मन मद जाति मद, माया मद सब लोय।। विद्या मद और गुनहु मद, राजमद्द उनमद्द। इतने मद को रद्द करें, तब पावे अनहद्द।।* इन सब नशाओं को भी छोड़ना चाहिए। यही संतों का उपदेश है। *जो संतों के उपदेश के अनुकूल रहते हैं, वे पवित्र हैं। जो संतों के उपदेश के अनुकूल नहीं चलते, वे किसी कारण पवित्र क्यों न कहे जाएँ, किंतु अपवित्र हैं। यथार्थ में हृदय पवित्र होना चाहिए।* शरीर पवित्रता के लिए क्या बात है? शिवजी के रूप को देखिए, अमंगल वेष रहने से अपवित्र नहीं है। हृदय की पवित्रता चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि स्नान नहीं करे, पवित्रता से नहीं रहे, शारीरिक पवित्रता भी चाहिए। *झूठ सब पापों का झोरा है। सत्य बोलनेवाले का झूठ का झोरा जल जाता है।* जो सत्य बोलता है, उससे कोई पाप नहीं हो सकता है। साँच बोलने की जिसकी प्रतिज्ञा रहेगी, वह चोरी नहीं करेगा, कोई पाप नहीं करेगा। चोरी करने से झूठ बोलकर छिपाता है। सत्य बोलो तो चोरी भी छूट जाएगी। हिंसा मत करो। हिंसा करोगे तो क्या होगा? संत कबीर साहब ने कहा - *कहता हूँ कहि जात हूँ, कहा जो मान हमार। जाका गर तू काटिहौं, सो फिर काट तोहार।।* कर्मफल किसी को नहीं छोड़ता। श्रीराम-सीता वन गए। वे गंगा नदी के किनारे ठहरे। पत्तों के बिछौना पर श्रीसीता-राम लेटे थे और लक्ष्मण पहरा दे रहे थे। वहाँ गुहनिषाद भी बैठा और कहा कि कैकेयी ने इनको बहुत दुःख दिया। तब लक्ष्मणजी ने कहा कि - *काहू न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत कर्म भोग सुनु भ्राता।।* युधिष्ठिर को थोड़ा-सा झूठ बोलने का फल भी मिला ही। यद्यपि वह भगवान के समक्ष और उनकी प्रेरणा से बोला था। भगवान श्रीकृष्ण को भी व्याधा ने तीर से मारा। यह भी कर्मफल ही था। इसलिए हिंसा से बचो। व्यभिचार मत करो। पर पुरुषगामिनी स्त्री व्यभिचारिणी है और परस्त्रीगामी पुरुष व्यभिचारी है। इन पंच पापों से बचो। एक ईश्वर पर विश्वास करो, उनका पूरा भरोसा करो। उनकी प्राप्ति पहले अपने अंदर होगी। उनकी प्राप्ति पहले अपने अंदर होगी, फिर सर्वत्र। *ध्यान करो, सत्संग करो और गुरु की सेवा करो। पहले कहे पंच निषेध कर्मों को नहीं करो और पीछे कहे पंच विधि कर्मों को करो।* यही ‘विधि निषेधमय कलिमल हरनी। करम कथा रविनन्दिनी बरनी।।' है। इस तरह अपने जीवन को बिताने पर मुक्ति मिलेगी। मुक्ति होने से स्वयं मालूम होगा कि मुक्ति मेरी हो गई। जैसे भोजन करने से स्वयं मालूम होता है कि पेट भर गया। जो जीवन-मुक्ति प्राप्त कर लेता है, मरने पर उसे विदेह-मुक्ति हो जाती है। *यदि मुक्ति नहीं हुई तो भगवान श्रीकृष्ण के कहे अनुकूल बहुत वर्षों तक स्वर्गादि का भोग करके इस संसार में किसी पवित्र श्रीमान्‌ के घर में जन्म लेगा। अथवा योगियों के कुल में ही जन्म लेगा। इस प्रकार का जन्म इस लोक में बहुत दुर्लभ है। फिर वह पूर्व जन्म के संस्कार से प्रेरित होकर साधन-भजन करेगा और अनेक जन्मों के बाद मुक्ति को प्राप्त कर लेगा।* यह कभी नहीं भूलना चाहिए, सदा याद रखना चाहिए कि *सदाचार के धरातल पर भजन-रूप मकान बनता है।* यह प्रवचन रविदास सत्संगियों के संतमत सत्संग मंदिर, सिकन्दरपुर, भागलपुर में दिनांक 18.3.1955 ई० के सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.107 : कायारूप कपड़ों को धो डालो* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 107)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि जिस तरह मूँज से खींच-खींचकर सींक निकालते हैं, उसी तरह *योगी आत्मा से शरीर को भिन्न करके देखते हैं, तब अपने से अपनी पहचान होती है।* सींक के ऊपर कई खोल चढ़े होते हैं। एक-एक करके निकालने पर अंत में सींक मिलती है। इसी तरह *शरीर के अंदर जीवात्मा है।* उसके ऊपर पहला खोल जड़ का है, वह है महाकारण। महाकारण कहते हैं त्रगगुणों के सम्मिश्रण रूप को। वहाँ तीनों गुणों की शक्ति बराबर-बराबर रहती है। जहाँ तीनों गुणों की शक्ति बराबर रहती है, उसको कहते हैं साम्यावस्थाधारिणी जड़ात्मिका मूल प्रकृति। जड़ का पहला खोल यह है। इसके अंदर में दूसरा खोल है, जिसको कारण कहते हैं। *महाकारण का कोई भाग जब परमात्मा की मौज से कम्पित होता है अर्थात्‌ महाकारण के जिस भाग में तीनों गुणों की सम अवस्था छूटती है, तब कुछ रचना होती है।* वही कारण है, उसके ऊपर है सूक्ष्म, जिसको इन्द्रियों से नहीं देख सकते; किंतु रूप-रेखा बन जाती है। उसके ऊपर स्थूल शरीर है, जो हाड़, मांस, चाम से बना है। इस प्रकार जीवात्मा के ऊपर चार जड़ शरीर हैं। इसी के लिए संत कबीर साहब के वचन में - ‘घूँघट’ शब्द आया है। *इन चारों को खोल दें, तो फिर ईश्वर-दर्शन में कोई रुकावट नहीं।* इसी को गुरु नानक साहब दूसरी तरह से कहते हैं - *घरि महि घरु देखाइ देइ सो सतगुरु परखु सुजाणु।* स्थूल में सूक्ष्म, सूक्ष्म में कारण और कारण में महाकारण व्यापक है। इसी को संत दादू दयालजी ने कहा है - *घर माहैं घर निर्मल राखै, पंचौं धोवै काया कपरा।* *घर में घर को पवित्र रखो और पाँचों कायारूप कपड़ों को धो डालो। स्थूल की पवित्रता बाहरी शौच और अंतःकरण की शुद्धता से होती है। स्थूल की लपेट सूक्ष्म पर से उतर गया, सूक्ष्म पवित्र हो गया। इसी प्रकार कारण और महाकारण के संबंध में समझिए। चेतनमय शरीर तब धुल गया, जब महाकारण उस पर से उतर गया।* कहने का ढंग अलग-अलग है, किंतु सब हैं एक तरह। जैसे कई बाजाओं के तारों को एक समान कसकर रखिए, तो सबसे एक ही तरह की ध्वनि निकलेगी। मालूम होता है कि *इन सब संतों ने एक ही तरह की आत्मोन्नति की थी और एक ही तरह की साधना की थी।* केवल कहने का ढंग अलग-अलग है। इन शरीर-रूपी कपड़ों से - घूँघट से जो अपने को नहीं निकालता, वह घर में घर को नहीं देखता तथा वह ईश्वर को नहीं पा सकता। *घमण्डी बनकर संसार में मत रहो।* यह शरीर पंचरंगा चोल है। पाँच तत्त्वों के पाँच रंग हैं। पृथ्वी का रंग पीला, जल का रंग लाल, अग्नि का रंग काला, हवा का रंग हरा और आकाश का रंग उजला है। इसके अंदर के शरीर भी प्रलयकाल में नष्ट होनेवाले हैं और बहुत बाधक हैं। जिस तरह फल खा लो और बीज रह गया, तो फिर उससे गाछ हो जाता है, उसी तरह *स्थूल शरीर-रूप गूदा तो नष्ट हो जाता है और बीजरूप सूक्ष्मादि शरीर रह जाते हैं, तो फिर स्थूल शरीर हो जाता है। घमण्डी की सुरत फैली हुई होती है और नम्रता से रहनेवाले की सुरत सिमटती है।* मन के सारे संकल्पों को छोड़ दो, तो शून्य महल में दियना जलेगा। एक ऐसी वस्तु पर अपने को लगाओ, जो बाहर में नहीं है और जिसे कभी देखा नहीं है। वह शून्य है, उपनिषद्‌ का अणोरणीयाम्‌ है। जो यत्न से युक्तिपूर्वक दृष्टिधारों को गुरु के बताए हुए अनुकूल रखता है यानी ऐसा रखता है कि *दोनों दृष्टियों की नोक मिलकर एक हो जाती है, तब विन्दु उदय होता है। यह केवल समझाने और कहने की बात नहीं है। अभ्यास करके देखने की बात है।* जिस तरह से हाइड्रोजज और ऑक्सीजन को मिलाने से पानी हो जाता है (मिलाकर देख लो), उसी तरह दोनों दृष्टियों की धारों को मिलाओ, देख लोगे कि अणोरणीयाम्‌ है। जो प्रयोग कर लेता है, वह देख लेता है। *उसकी साधना करो, अवश्य होगा। आशा से मत डोलो। निराशा गिराती है, आशा ऊपर चढ़ाती है। होने योग्य काम भी निराशा होने से नहीं होता है। कठिन-से-कठिन काम भी आशा से धीरे-धीरे करते-करते पूरा होता है। यह योग की युक्ति है। प्रयोग करो, पाओगे।* अपने अंदर में जैसे-जैसे कोई प्रवेश करता है, वेसे-वैसे अंतर्नाद सुनता है और शब्द के साथ उसके उद्गम स्थान तक पहुँच जाता है, परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। इसी तरह गुरु नानकदेवजी ने भी कहा है - *पंच शबदु धुनिकार धुन, तहँ बाजै सबदु निसाणु।। सुखमन कै घरि राग सुनि सुन मंडल लिव लाइ। अकथ कथा वीचारीअै मनसा मनहि समाइ।। सभि सखिया पंचे मिलै, गुरुमुखि निज घरि वासु। सबदु खोजि इहु घरु लहै, नानकु ताका दासु।।* गुरु नानक साहब के दर्जे के जितने संत हुए, सभी को ‘पंच सबदु धुनिकार धुन’ मिले। जिनको ये शब्द मिलते हैं, उनका परमात्म-घर में वासा होता है। संत दादू दयालजी घर में घर को पवित्र रखने के लिए कहते हैं। पवित्र कैसे होगा, सो पहले कहा जा चुका है। *त्रिवेणी तट पर अपनी वृति को रखकर शम-दम की साधना करो, तो पाँचों शरीर-रूप कपड़े धुलेंगे।* और जहाँ सुरत की बैठक है, उसके सामने ही उसकी स्थिति बन जाएगी। वह ईश्वरीय आकर्षण से उधर को खींच जाएगा। सुरत सम्मुख जगेगी और वह पकड़ा जाएगा। इस तरह भक्ति करते हुए अपना उद्धार होगा। यह भक्ति का सार है। साथ-ही-साथ यह रास्ता सँकरा है। यह हाथी-घोड़ा ले जाने का रास्ता नहीं है। इसमें सुरत जाती है। इसके लिए तंग रास्ता है। इसी तरह - ’रघुपति भगति करत कठिनाई’ गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा है। *घबराओ नहीं, कठिन काम है तो यह समझो कि जो जिस कला में पारंगत हो जाता है, विशेष अभ्यस्त हो जाता है तो वह विद्या उसके वास्ते सुगम और सुख देनेवाली हो जाती है। अभ्यास किए बिना कोई अभ्यस्त नहीं होता।* छोटी मछली नाले में भाठे से सिरे की ओर जिसकी धारा तेज होती है, चली जाती है। किंतु गंगा की चौड़ी धारा में हाथी नहीं जा सकता, वह बह जाता है। बालू और चीनी का मिश्रण करने से बुद्धिमान प्राणी जो मनुष्य है, वह उसको अलग-अलग नहीं कर सकता; किंतु छोटी चींटी चीनी को चुन लेती है और बालू को छोड़ देती है। *सिमटी हुई सुरत सफरी है, चींटी है और फैली हुई सुरत हाथी है। जिसकी सुरत सिमटती है, वह पिण्ड से ब्रह्माण्ड की ओर चला जाता है।* वह जाग्रत, स्वन और सुषुप्ति अवस्था में नहीं रहता, तुरीय अवस्था में रहता है। वह संसार के ख्यालों से ऊपर उठा हुआ होता है; इसीलिए वह बाहर संसार से सोया हुआ है; लेकिन अंदर में जगा हुआ है। गोस्वामीजी ने कहा है - *मोह निसा सब सोवनिहारा। देखिय सपन अनेक प्रकारा।। यहि जब जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच वियोगी।।* वह अपने अन्दर सारे विश्व को देखता है। गोया सारे दृश्य को अपने अन्दर घुसाकर देखता है। वह हरि-पद का अनुभव करता है, द्वैत से हटा रहता है और अद्वैत पद में स्थित रहता है। वह अद्वैत पद कैसा है? तो कहा – *सोक मोह भय हरष दिवस निसि, देस काल तहँ नाहीं।* गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि *इस दशा से जो हीन है, उसका संशय निर्मूल नहीं होता है।* यह सूक्ष्म भक्ति है। हाँ, कुछ मोटी बात भी है - जप करो, कीर्तन करो। किंतु *जबतक कोई यहाँ नहीं आता, देश-काल से परे नहीं हो जाता, तबतक भक्ति समाप्त नहीं होती।* यह अन्तस्साधना के विषय की बात है। अभ्यासी शून्य में आरूढ़ रहता है, जहाँ एक शून्य से दूसरे शून्य में जाता है। ऐसे द्वार पर चढ़ो, जिससे अंधकार के आकाश से प्रकाश के आकाश में जा सको। इसी के लिए राधास्वामी साहब कहते हैं - *सखी री क्‍यों देर लगाई, चटक चढ़ो नभ द्वार।* मन और दृष्टि को दसवें द्वार पर स्थिर करके रखो। स्थिर रखना ही चलना है - *बैठे ने रास्ता काटा। चलते ने बाट न पाई।। है कुछ रहनि गहनि की बाता। बैठा रहे चला पुनि जाता।। कहै को तात्पर्य है ऐसा। जस पंथी वोहित चढ़ि बैठा।।* *इस नगरी में अंधकार समाया हुआ है। इसलिए भूल-भ्रम हर बार होते रहते हैं।* अपने अंदर की ज्योति की खोज करो। अपने अंदर-अंदर चलो। चलने के लिए जो जहाँ बैठा रहता है, पहले वहीं से चलता है। *तुम अंदर में जहाँ बैठे हुए हो, अंदर-अंदर वहाँ से चलो। संतों ने अंदर-अंदर चलने का आदेश दिया है।* यह प्रवचन भागलपुर जिलान्तर्गत कहलगाँव के धर्मशाला में दिनांक 12.3.1955 ई० को रात्रिकालीन सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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Dharampal Singh35678 Apr 11, 2021

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