शंख का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व

शंख का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व
शंख का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व
शंख का आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व

पुराणों में बताया गया है कि शंख की उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई थी, जिसके बाद उसे भगवान विष्णु ने धारण किया था।
शंख के आगे के हिस्से में सूर्य और वरूण देव का वास होता है जो घर में सकारात्मक उर्जा फैलाते हैं. साथ ही उसके पिछले हिस्से को गंगा का रूप माना जाता है जो शुद्धता का प्रतीक होता है।
शंखनाद करने से जो ध्वनी उत्पन्न होती है उससे कई तरह के लाभ है।

आइये जानते हैं कि पूजा में शंख बजाने और इसके इस्तेमाल से क्या-क्या फायदे होते हैं:

1. ऐसी मान्यता है कि जिस घर में शंख होता है, वहां लक्ष्मी का वास होता है. धार्मिक ग्रंथों में शंख को लक्ष्मी का भाई बताया गया है, क्योंकि लक्ष्मी की तरह शंख भी सागर से ही उत्पन्न हुआ है. शंख की गिनती समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों में होती है।

2. शंख को इसलिए भी शुभ माना गया है, क्योंकि माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु, दोनों ही अपने हाथों में इसे धारण करते हैं।

3. पूजा-पाठ में शंख बजाने से वातावरण पवित्र होता है. जहां तक इसकी आवाज जाती है, इसे सुनकर लोगों के मन में सकारात्मक विचार पैदा होते हैं. अच्छे विचारों का फल भी स्वाभाविक रूप से बेहतर ही होता है।

4. शंख के जल से श‍िव, लक्ष्मी आदि का अभि‍षेक करने से ईश्वर प्रसन्न होते हैं और उनकी कृपा प्राप्त होती है।

‍5. ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि शंख में जल रखने और इसे छ‍िड़कने से वातावरण शुद्ध होता है।

6. शंख की आवाज लोगों को पूजा-अर्चना के लिए प्रेरित करती है. ऐसी मान्यता है कि शंख की पूजा से कामनाएं पूरी होती हैं. इससे दुष्ट आत्माएं पास नहीं फटकती हैं।

7. वैज्ञानिकों का मानना है कि शंख की आवाज से वातावरण में मौजूद कई तरह के जीवाणुओं-कीटाणुओं का नाश हो जाता है. कई टेस्ट से इस तरह के नतीजे मिले हैं।

8. आयुर्वेद के मुताबिक, शंखोदक के भस्म के उपयोग से पेट की बीमारियां, पथरी, पीलिया आदि कई तरह की बीमारियां दूर होती हैं. हालांकि इसका उपयोग एक्सपर्ट वैद्य की सलाह से ही किया जाना चाहिए।

9. शंख बजाने से फेफड़े का व्यायाम होता है. पुराणों के जिक्र मिलता है कि अगर श्वास का रोगी नियमि‍त तौर पर शंख बजाए, तो वह बीमारी से मुक्त हो सकता है।

10. शंख में रखे पानी का सेवन करने से हड्डियां मजबूत होती हैं. यह दांतों के लिए भी लाभदायक है. शंख में कैल्श‍ियम, फास्फोरस व गंधक के गुण होने की वजह से यह फायदेमंद है।

11. वास्तुशास्त्र के मुताबिक भी शंख में ऐसे कई गुण होते हैं, जिससे घर में पॉजिटिव एनर्जी आती है. शंख की आवाज से 'सोई हुई भूमि' जाग्रत होकर शुभ फल देती है।


शंखनाद करते वक़्त कुछ बातों का ध्यान रखना काफ़ी महत्वपूर्ण होता है:

1. जिस शंख को बजाया जाता है उसे पूजा के स्थान पर कभी नहीं रखा जाता ।

2. जिस शंख को बजाया जाता है उससे कभी भी भगवान को जल अर्पण नहीं करना चाहिए।

3. एक मंदिर में या फ़िर पूजा स्थान पर कभी भी दो शंख नहीं रखने चाहिए।

4. पूजा के दौरान शिवलिंग को शंख से कभी नहीं छूना चाहिए।

5. भगवान शिव और सूर्य देवता को शंख से जल अर्पण कभी भी नहीं करना चाहिए।

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कामेंट्स

Chandralata Tiwari Sep 16, 2017
बहुत हीलाभ कारी जानकारी हे राधे राधेजी

मैं भगवान का हूँ। Sep 16, 2017
@chandralata.tiwari धन्यवाद। हमारे पूर्वजों द्वारा अर्जित ज्ञान आज भी उतना ही प्रासंगिक है, इसलिए इसे घर घर पहुचना उचित प्रतीत होता है। इस कार्य को आगे बढ़ाने हेतु mymandir team ने एक बहुत ही सुंदर मंच दिया है।

Neha Sharma,Haryana Dec 11, 2019

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yogeshraya Dec 10, 2019

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*जय वीर बजरंग बली की*🌹🌹🙏 *शुभ प्रभात् वंदन*🌹🌹🙏 *हनुमान जी को सिंदूर क्यों चढ़ाया जाता है?* *हिंदू शास्त्रों में इस प्रसंग की जानकारी दी गई है कि जब लंकापति रावण को मारकर भगवान राम जी माता सीता जी को लेकर अयोध्या आए थे। तब हनुमान जी ने भी भगवान राम और माता सीता के साथ अयोध्या आने की जिद की थी। भगवान राम ने अपने प्रिय भक्त हनुमान जी को बहुत समझाया पर वह नहीं माने। क्योंकि बजरंगबली अपने जीवन को प्रभु श्रीराम की सेवा करने में बिताना चाहते थे। श्री हनुमान जी दिन रात यही प्रयास करते रहते थे। कि कैसे अपने आराध्य प्रभु श्रीराम को खुश रखा जाए। *एक बार बजरंगबली ने माता सीता को मांग में सिंदूर भरते हुए देखा। तो यह माता सीता से इसका कारण पूछा की माता आप अपने मांग में सिंदूर क्यों लगा रही हैं? माता सीता ने हनुमान जी को उत्तर दिया कि वह प्रभु श्रीराम को प्रसन्न करने के लिए सिंदूर लगाती हैं। श्री हनुमान जी को अपने आराध्य प्रभु श्रीराम को प्रसन्न करने का यह युक्ति बहुत ही अच्छी लगी। उन्होंने सिंदूर का एक बड़ा बक्सा लिया और स्वयं के ऊपर उसे उड़ेल दिया। और अपने आराध्य भगवान श्री राम के सामने पहुंच गए।* *जब भगवान श्रीराम ने अपने प्रिय भक्त हनुमान को इस स्थिति में देखा तो यह आश्चर्य में पड़ गए। और उन्होंने हनुमान से इसका कारण पूछा,तो हनुमान जी ने भगवान श्रीराम से कहा कि प्रभु मैंने आपकी प्रसन्नता के लिए ऐसा किया है। सिंदूर लगाने के कारण ही आप माता सीता से बहुत प्रसन्न रहते हैं। अब आप भी मुझ पर उतना ही प्रसन्न रहिएगा। भगवान श्रीराम को अपने भोले भाले भक्त हनुमान जी की युक्ति पर बहुत हंसी आई। और भगवान श्री राम के हृदय में अपने भक्त हनुमान जी जगह और गहरी हो गई। हमारे धर्म और पुराण बतलाते हैं, की उसी दिन से हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाया जाता है।* *महिलाओं को हनुमान जी की पूजा क्यों नहीं करनी चाहिए?*......*हमारे धर्म और पुराण के अनुसार हनुमान जी सदा ब्रह्मचारी रहे थे। कुछ शास्त्रों में हनुमान जी की शादी होने का वर्णन भी मिलता है। लेकिन हनुमान जी ने यह शादी वैवाहिक सुख प्राप्त करने की इच्छा से नहीं की थी। बल्कि उन चार प्रमुख विद्याओं की प्राप्ति हेतु किया था। जिन विद्याओं का ज्ञान केवल एक विवाहित को ही दिया जा सकता था। *इस कथा के अनुसार हनुमान जी ने अपना गुरु सूर्य देवता को बनाया था। सूर्य देवता ने अपने शिष्य हनुमान जी को 5 विद्या सिखा दी। लेकिन बाकी बची 4 विद्याओं का ज्ञान सिखाने से पहले सूर्य देवता ने अपने शिष्य हनुमान जी को शादी कर लेने के लिए कहा। क्योंकि इन 4 विद्याओं का ज्ञान केवल एक विवाहित को ही दिया जा सकता था। हनुमान जी अपने गुरु सूर्य देवता की आज्ञा मानकर विवाह करने के लिए तैयार हो गए। तब समस्या उत्पन्न हुई की हनुमान जी से विवाह के लिए किस कन्या का चयन किया जाए।* *तब सूर्य देव ने अपनी परम तेजस्वी पुत्री सुवर्चला से अपने शिष्य हनुमान जी को शादी करने के लिए कहा। हनुमान जी तैयार हो गए हनुमान जी और सुवर्चला की शादी हो गई। सूर्य देवता की बेटी और हनुमान जी की पत्नी देवी सुवर्चला परम तपस्वी थी। विवाह होने के बाद ही सुवर्चला तपस्या में मग्न हो गई। और उधर हनुमान जी अपने गुरु सूर्य देवता से अपनी बाकी बची 4 विद्याओं का ज्ञान को हासिल करने में लग गए। इस प्रकार श्री हनुमान जी विवाहित होने के बाद भी उनका ब्रह्मचर्य व्रत नहीं टूटा।* *पुराणों के अनुसार श्री हनुमान जी ने प्रत्येक स्त्री को मां के समान दर्जा दिया है। यही कारण है कि किसी भी स्त्री को श्री हनुमानजी अपने सामने प्रणाम करते हुए नहीं देख सकते। बल्कि वह खुद स्त्री शक्ति को नमन करते हैं। यदि महिलाएं चाहे तो हनुमान जी की सेवा में दीपक अर्पित कर सकती हैं। हनुमान जी की स्तुति कर सकती हैं। हनुमान जी को प्रसाद अर्पित कर सकती हैं। लेकिन शास्त्रों के अनुसार श्री हनुमानजी के 16 उपचार जिनमें मुख्य है:- स्नान,वस्त्र,चोला चढ़ाना आते हैं यह सब सेवाएं किसी महिला के द्वारा किया जाना श्री हनुमान जी स्वीकार नहीं करते। इसीलिए महिलाओं को हनुमानजी की पूजा नहीं करनी चाहिए। *कैसे बाल मारुती का नाम हनुमान रख दिया गया?*.....*श्री हनुमान जी की माता अंजनी और केसरी के पुत्र थे। कथा के अनुसार, अंजनी और केसरी को विवाह के बहुत समय बाद तक संतान की प्राप्ति नहीं हुई थी। तब दोनों पति-पत्नी ने मिलकर पवन देव की तपस्या की थी। पवन देव जी के आशीर्वाद से श्री हनुमान जी का जन्म हुआ था। हनुमान जी बचपन से ही बहुत अधिक ताकतवर नटखट और विशाल शरीर वाले थे। हनुमान जी के बचपन का नाम मारुती Maruti था। एक बार Maruti ने सूर्य देवता को फल समझकर उन्हें खाने के लिए सूर्यदेव के आगे बढ़े,और उनके पास पहुंचकर सूर्यदेव को निगलने के लिए अपना मुंह बड़ा कर लिया। इंद्रदेव ने Maruti को ऐसा करते देखा तो इंद्रदेव ने Maruti पर अपने बज्र से प्रहार कर दिया। इंद्र देव का बज्र Maruti की हनु यानी कि ठोड़ी पर लगी। इंद्र देव का बज्र नन्हे Maruti को लगते ही Maruti बेहोश हो गए। यह देख उनके पालक पिता पवनदेव को बहुत ही गुस्सा आ गया। पवन देव अपने पुत्र Maruti की हालत देखकर इतने गुस्से में आ गए कि उन्होंने सारे संसार में पवन का बहना रोक दिया। प्राण वायु के बिना सारे पृथ्वी लोक के वासी त्राहि-त्राहि करने लगे। यह सब देख कर इंद्रदेव ने पवनदेव को तुरंत मनाया। और Maruti को पहले जैसा कर दिया।  सभी देवताओं ने नन्हे Maruti को बहुत सारी शक्तियां प्रदान की। सूर्य देव के तेज अंश प्रदान करने के कारण ही श्री हनुमान जी का बुद्धि संपन्न हुआ। इंद्रदेव का बज्र Maruti के हनु पर लगा था जिसके कारण ही नन्हे Maruti का नाम हनुमान हुआ।*

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simran Dec 10, 2019

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