Acharya Rajesh
Acharya Rajesh Apr 22, 2021

☀️ *कामदा एकादशी, 23.04.2021* *एकादशी तिथि आरंभ:-22 अप्रैल 11:35 pm* *एकादशी तिथि समाप्त:-23 अप्रैल 9:47 pm* *सफला एकादशी पारणा मुहूर्त:-* *24 अप्रैल 5:47 am से 08:24 am तक* हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रतिवर्ष चौबीस एकादशी आती हैं। हर महीने शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में एक-एक एकादशी तिथि होती है। चैत्र शुक्ल पक्ष एकादशी को कामदा एकादशी भी कहते हैं। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार कामदा एकादशी मार्च या अप्रैल के महीने में आती है। इस दिन भगवान विष्णु जी सहित मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि कामदा एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु भक्तों को मनचाहा वरदान देते हैं, व्रती तथा भक्तों को पुण्य की प्राप्ति होती है तथा उनके समस्त इच्छाएं पूर्ण होती हैं। भगवान विष्णु की कृपा से भक्तो के समस्त पाप मिट जाते हैं, यहां तक कि पिशाच योनि से भी मुक्ति प्राप्त होती है। ऐसा माना जाता है कि यदि कोई निःसंतान दंपति इस व्रत का पालन करता है, तो उन्हें पुत्र संतान की प्राप्ति होती है। कामदा एकादशी के अवसर पर भक्त पूर्ण श्रद्धा के साथ भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और उनके आशीर्वाद की कामना करते हैं। कामदा शाब्दिक अर्थों में 'इच्छाओं की पूर्ति' को दर्शाता है। इस प्रकार, कामदा एकादशी उस दिन के रूप में मानी जाती है जब भक्तों को दिव्य आशीर्वाद मिलता है और उनकी सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति भी होती है। *कामदा एकादशी पूजन विधि:-* कामदा एकादशी पर, भक्तों को प्रातःकाल जल्दी उठकर पवित्र स्नान करने का विधान हैं। भगवान विष्णु की पूजा और प्रार्थना करने के लिए मण्डप तैयार किया जाता है। भगवान विष्णु की मूर्ति की पंचोपचार से लेकर षोडशोपचार से की जाती है, तथा कामदा एकादशी व्रत कथा सुनी जाती है । एकादशी के दिन भक्त पवित्र मंत्रों का जाप करते हैं, तथा सात्विकता पूर्ण दिन व्यतीत करते हैं । लोग भगवान विष्णु के दिव्य आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए 'विष्णु सहस्त्रनाम' का पाठ भी करते हैं। भक्त दिन में एक ही बार भोजन का सेवन कर सकते हैं जिसमें केवल सात्विक भोजन शामिल होता है। व्रत 24 घंटे की अवधि तक रहता है अर्थात् अगले एकादशी के दिन सूर्योदय तक। व्रत का पारण ब्राह्मण को भोजन, कपड़े और अन्य आवश्यक चीजें दान करने के बाद ही उपवास सम्पूर्ण होता है। *कामदा एकादशी व्रत कथा:-* हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, कामदा एकादशी की कथा भगवान कृष्ण ने राजा युधिष्ठिर को सुनाई थी। एक युग में ललिता नाम की अप्सरा और ललित नाम के गंधर्व एक जोड़ी थी। ये दोनों राजा पुण्डरीक जो रत्नपुरा शहर पर शासन करते थे, के दरबार में अपनी सेवाएँ देते थे । एक बार, सभी गंधर्व राजा के दरबार में गायन के लिए गए, ललित भी उनके साथ गया। लेकिन उस समय, ललिता दरबार में प्रस्तुत नहीं थी और इस तरह ललित अपनी पत्नी ललिता के विचारों में खो गया जिससे उसके प्रदर्शन पर असर पड़ा। यह सब एक नाग ने देख लिया जिसने तब राजा पुंडरीक को इस सब के बारे में सूचित कर दिया। यह सुन कर राजा आगबबूला हो गया और उसने ललित को एक बदसूरत दानव में बदलने के लिए शाप दिया, ताकि ललिता उसे और उसके प्यार को त्याग दे। ललित को तुरंत एक भूतिया और भयानक दिखने वाले दानव में बदल दिया गया। जब ललिता को यह सब पता चला, तो वह बहुत उदास हो गई। दोनों एक समाधान प्राप्त करने के लिए निकल पड़े और इस तरह विभिन्न स्थानों पर भटकने लगे। एक दिन वे विंध्याचल पर्वत पर पहुँचे जहाँ उन्होंने ऋषि श्रृंगी का आश्रम देखा। ललिता ने ऋषि से मदद और मार्गदर्शन मांगा ताकि ललित को उसके अभिशाप से राहत मिल सके। इसके लिए, ऋषि श्रृंगी ने उन्हें कामदा एकादशी का व्रत रखने को कहा जो एकादशी पर शुक्ल पक्ष के दौरान चैत्र महीने में आता है। ललिता ने सभी अनुष्ठानों के साथ व्रत का पालन किया और देवता से उनके शाप से मुक्त होकर अपने पति ललित को इस व्रत का आशीर्वाद देने के लिए कहा। व्रत पूरा होने के तुरंत बाद, ललित को एक बार फिर से अपना असली रूप मिला। उस दिन के बाद से, भक्त अपनी सभी इच्छाओं को पूरा करने के लिए कामदा एकादशी का व्रत रखते हैं। *(समाप्त)* _________________________ *आगामी लेख:-* *1. 23 अप्रैल को "कामदा" एकादशी पर लेख ।* *2. 24 अप्रैल को "वैशाख मास" विषय पर लेख ।* *3. शीघ्र ही हनुमान जयंती पर लेख ।* _________________________ ☀️ *जय श्री राम* *आज का पंचांग 🌹🌹🌹* *शुक्रवार,23.4.2021* *श्री संवत 2078* *शक संवत् 1943* *सूर्य अयन- उत्तरायण, गोल-उत्तर गोल* *ऋतुः- वसन्त-ग्रीष्म ऋतुः ।* *मास- चैत्र मास।* *पक्ष- शुक्ल पक्ष ।* *तिथि- एकादशी तिथि 9:50 pm तक* *चंद्रराशि- चंद्र सिंह राशि मे ।* *नक्षत्र- मघा 7:42 am तक* *योग- वृद्धि योग 2:39 pm तक (शुभ है)* *करण- वणिज करण 10:49 am तक* *सूर्योदय 5:48 am, सूर्यास्त 6:51 pm* *अभिजित् नक्षत्र- 11:53 am से 12:45 pm* *राहुकाल - 10:41 am से 12:19 pm* (अशुभ कार्य वर्जित,दिल्ली )* *दिशाशूल- पश्चिम दिशा ।* *अप्रैल माह -शुभ दिन:-* शुभ दिन : 23 (11 am तक), 24, 25, 26 (1 pm तक), 28 (सायंकाल 5 उपरांत), 29 (12 pm तक), 30 (12 pm उपरांत) *अप्रैल माह-अशुभ दिन:-* 27. *भद्रा :- 23 अप्रैल 10:42 am to 23 अप्रैल 9:48 pm तक* ( भद्रा मे मुण्डन, गृहारंभ, गृहप्रवेश, विवाह, रक्षाबंधन आदि शुभ काम नही करने चाहिये , लेकिन भद्रा मे स्त्री प्रसंग, यज्ञ, तीर्थस्नान, आपरेशन, मुकद्दमा, आग लगाना, काटना, जानवर संबंधी काम किए जा सकतें है । ______________________ *विशेष:- जो व्यक्ति दिल्ली से बाहर अथवा देश से बाहर रहते हो, वह ज्योतिषीय परामर्श हेतु paytm या Bank transfer द्वारा परामर्श फीस अदा करके, फोन द्वारा ज्योतिषीय परामर्श प्राप्त कर सकतें है* ________________________ *आगामी व्रत तथा त्यौहार:-* 23 अप्रैल:- कामदा एकादशी। 24 अप्रैल:- शनि प्रदोष। 26 अप्रैल:- चैत्र पूर्णिमा। 30 अप्रैल:- संकष्टी चतुर्थी आपका दिन मंगलमय हो . 💐💐💐 *आचार्य राजेश ( रोहिणी, दिल्ली )* *9810449333, 7982803848*

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*कामदा एकादशी, 23.04.2021*

*एकादशी तिथि आरंभ:-22 अप्रैल 11:35 pm*
*एकादशी तिथि समाप्त:-23 अप्रैल 9:47 pm*
*सफला एकादशी पारणा मुहूर्त:-*
*24 अप्रैल 5:47 am से 08:24 am तक*

हिंदू पंचांग के अनुसार,  प्रतिवर्ष चौबीस एकादशी  आती हैं। हर महीने शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष में एक-एक एकादशी तिथि होती है। 

चैत्र शुक्ल पक्ष एकादशी को कामदा एकादशी भी कहते हैं। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार कामदा एकादशी मार्च या अप्रैल के महीने में आती है।

इस दिन भगवान विष्णु जी सहित मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि कामदा एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु भक्तों को मनचाहा वरदान देते हैं, व्रती तथा भक्तों को पुण्य की प्राप्ति होती है तथा उनके समस्त इच्छाएं पूर्ण होती हैं। भगवान विष्णु की कृपा से भक्तो के समस्त पाप मिट जाते हैं, यहां तक कि पिशाच योनि से भी मुक्ति प्राप्त होती है।

 ऐसा माना जाता है कि यदि कोई निःसंतान दंपति इस व्रत का पालन करता है, तो उन्हें पुत्र संतान की प्राप्ति होती है।

 कामदा एकादशी के अवसर पर भक्त पूर्ण श्रद्धा के साथ भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और उनके आशीर्वाद की कामना करते हैं। कामदा शाब्दिक अर्थों में 'इच्छाओं की पूर्ति' को दर्शाता है। इस प्रकार, कामदा एकादशी उस दिन के रूप में मानी जाती है जब भक्तों को दिव्य आशीर्वाद मिलता है और उनकी सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति भी होती है।


*कामदा एकादशी पूजन विधि:-*

कामदा एकादशी पर, भक्तों को प्रातःकाल जल्दी उठकर पवित्र स्नान करने का विधान हैं।

भगवान विष्णु की पूजा और प्रार्थना करने के लिए मण्डप तैयार किया जाता है।

भगवान विष्णु की मूर्ति की पंचोपचार से लेकर षोडशोपचार से की जाती है, तथा कामदा एकादशी व्रत कथा सुनी जाती है ।

एकादशी के दिन भक्त पवित्र मंत्रों का जाप करते हैं, तथा सात्विकता पूर्ण दिन व्यतीत करते हैं ।

लोग भगवान विष्णु के दिव्य आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए 'विष्णु सहस्त्रनाम' का पाठ भी करते हैं।

भक्त दिन में एक ही बार भोजन का सेवन कर सकते हैं जिसमें केवल सात्विक भोजन शामिल होता है।

व्रत 24 घंटे की अवधि तक रहता है अर्थात् अगले एकादशी के दिन सूर्योदय तक।

व्रत का पारण ब्राह्मण को भोजन, कपड़े और अन्य आवश्यक चीजें दान करने के बाद ही उपवास सम्पूर्ण होता है।


*कामदा एकादशी व्रत कथा:-*
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, कामदा एकादशी की कथा भगवान कृष्ण ने राजा युधिष्ठिर को सुनाई थी। 

एक युग में ललिता नाम की अप्सरा और ललित नाम के गंधर्व एक जोड़ी थी। ये दोनों राजा पुण्डरीक जो रत्नपुरा शहर पर शासन करते थे, के दरबार में अपनी सेवाएँ देते थे ।

एक बार, सभी गंधर्व राजा के दरबार में गायन के लिए गए, ललित भी उनके साथ गया। लेकिन उस समय, ललिता दरबार में प्रस्तुत नहीं थी और इस तरह ललित अपनी पत्नी ललिता के विचारों में खो गया जिससे उसके प्रदर्शन पर असर पड़ा। यह सब एक नाग ने देख लिया जिसने तब राजा पुंडरीक को इस सब के बारे में सूचित कर दिया। यह सुन कर राजा आगबबूला हो गया और उसने ललित को एक बदसूरत दानव में बदलने के लिए शाप दिया, ताकि ललिता उसे और उसके प्यार को त्याग दे।

ललित को तुरंत एक भूतिया और भयानक दिखने वाले दानव में बदल दिया गया। जब ललिता को यह सब पता चला, तो वह बहुत उदास हो गई। दोनों एक समाधान प्राप्त करने के लिए निकल पड़े और इस तरह विभिन्न स्थानों पर भटकने लगे। एक दिन वे विंध्याचल पर्वत पर पहुँचे जहाँ उन्होंने ऋषि श्रृंगी का आश्रम देखा। ललिता ने ऋषि से मदद और मार्गदर्शन मांगा ताकि ललित को उसके अभिशाप से राहत मिल सके। इसके लिए, ऋषि श्रृंगी ने उन्हें कामदा एकादशी का व्रत रखने को कहा जो एकादशी पर शुक्ल पक्ष के दौरान चैत्र महीने में आता है।

ललिता ने सभी अनुष्ठानों के साथ व्रत का पालन किया और देवता से उनके शाप से मुक्त होकर अपने पति ललित को इस व्रत का आशीर्वाद देने के लिए कहा। व्रत पूरा होने के तुरंत बाद, ललित को एक बार फिर से अपना असली रूप मिला। उस दिन के बाद से, भक्त अपनी सभी इच्छाओं को पूरा करने के लिए कामदा एकादशी का व्रत रखते हैं।

*(समाप्त)*
_________________________

*आगामी लेख:-*
*1. 23 अप्रैल को "कामदा" एकादशी पर लेख ।*
*2. 24 अप्रैल को "वैशाख मास" विषय पर लेख ।*
*3. शीघ्र ही हनुमान जयंती पर लेख ।*
_________________________
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*जय श्री राम*
*आज का पंचांग 🌹🌹🌹*
*शुक्रवार,23.4.2021*
*श्री संवत 2078*
*शक संवत् 1943*
*सूर्य अयन- उत्तरायण, गोल-उत्तर गोल*
*ऋतुः- वसन्त-ग्रीष्म ऋतुः ।*
*मास- चैत्र मास।*
*पक्ष- शुक्ल पक्ष ।*
*तिथि- एकादशी तिथि 9:50 pm तक*
*चंद्रराशि- चंद्र सिंह राशि मे ।*
*नक्षत्र- मघा 7:42 am तक*
*योग- वृद्धि योग 2:39 pm तक (शुभ है)*
*करण- वणिज करण 10:49 am तक* 
*सूर्योदय 5:48 am, सूर्यास्त 6:51 pm*
*अभिजित् नक्षत्र- 11:53 am से 12:45 pm*
*राहुकाल - 10:41 am से 12:19 pm* (अशुभ कार्य वर्जित,दिल्ली )*
*दिशाशूल- पश्चिम दिशा ।*

*अप्रैल माह -शुभ दिन:-*
शुभ दिन : 23 (11 am तक), 24, 25, 26 (1 pm तक), 28 (सायंकाल 5 उपरांत), 29 (12 pm तक), 30 (12 pm उपरांत)

*अप्रैल माह-अशुभ दिन:-* 27.

*भद्रा :- 23 अप्रैल 10:42 am to 23 अप्रैल 9:48 pm तक* ( भद्रा मे मुण्डन, गृहारंभ, गृहप्रवेश, विवाह, रक्षाबंधन आदि शुभ काम नही करने चाहिये , लेकिन भद्रा मे स्त्री प्रसंग, यज्ञ, तीर्थस्नान, आपरेशन, मुकद्दमा, आग लगाना, काटना, जानवर संबंधी काम किए जा सकतें है ।
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*विशेष:- जो व्यक्ति दिल्ली से बाहर अथवा देश से बाहर रहते हो, वह ज्योतिषीय परामर्श हेतु paytm या Bank transfer द्वारा परामर्श फीस अदा करके, फोन द्वारा ज्योतिषीय परामर्श प्राप्त कर सकतें है*
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*आगामी व्रत तथा त्यौहार:-*  23 अप्रैल:- कामदा एकादशी। 24 अप्रैल:- शनि प्रदोष। 26 अप्रैल:- चैत्र पूर्णिमा। 30 अप्रैल:- संकष्टी चतुर्थी

आपका दिन मंगलमय हो . 💐💐💐
*आचार्य राजेश ( रोहिणी, दिल्ली )*
*9810449333, 7982803848*

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Acharya Rajesh May 12, 2021

☀️ *विस्तृत लेखमाला:-मनोरथ पूर्ण करने हेतु मंत्र, भाग-15* *मनोरथ पूर्ण करने हेतु मंत्र की इस धारावाहिक लेखमाला मे प्रतिदिन अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा तथा महामंत्र के जाप से अभीष्ट की प्राप्ति की जा सकती हैं । आज के इस लेख मे "माता काली अर्थात कालिका माता" की साधना तथा मंत्र शक्ति द्वारा रोग तथा पापो का शमन करते हुए मोक्ष की प्राप्ति तथा धन संबंधी आर्थिक परेशानियों को दूर करते हुए सभी प्रकार की सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है । *कालिका महामंत्र* काली अर्थात कालिका, भगवान शिव की शक्ति पार्वती का भयंकरतम रूप है। भगवान शिव को काल कहते हैं, अतः भगवान शिव की शक्ति को ही काली कहते हैं । असुरों का काल (मृत्यु) होने के कारण काली। इसके अलग अलग गुणधर्मों के द्योतक इसके अनेक नाम हैं। जैसे भद्रकाली इसका कुछ दयालु रूप है। कपालिनी इस कारण कि इसे एक हाथ में कपाल लिए दिखाते हैं जिसमें दूसरे हाथ में पकड़े नरमुंड का रक्त टपक रहा होता है। इसके सर्वाधिक प्रचलित रूपों में से एक रूप चार भुजा वाला और दूसरा रूप दस भुजाओं वाला है। *महाकाली महामंत्र:-* *काली काली महाकाली कालिके पापनाशिनी* *सर्वत्र मोक्षदा देहि नारायणी नमस्तेऽस्तु।* *ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी* *दुर्गा क्षमा शिवाधात्री स्वाहा स्वधा नमस्तेऽस्तु।* *मंत्र जाप विधि:-* इस मंत्र का लालचंदन की माला से प्रतिदिन कम से कम तीन माला का जाप अवश्य करना चाहिए कालिका का यह मंत्र रोग-शोक-दुख निवारक, सुख-समृद्धि तथा मोक्ष को देने वाला, तथा अचानक आये हुए संकटो का निवारण करने हेतु अचूक मंत्र है । माता इससे शीघ्र ही प्रसन्न हो जाती हैं, परन्तु इसके लिए साधक को पूर्ण रूप से शुद्ध, सावधान तथा सात्विक रहना आवश्यक हैं । मंत्र जाप के दौरान शनिवार शाम के समय काली माता के मंदिर जाकर तिल के तेल का दीपक जलाये तथा माता को पानी वाला एक नारियल अवश्य चढाये तथा पंद्रह दिन में एक बार किसी भी शुक्रवार के दिन काली माता को मीठा पान व मिठाई का भोग लगाते रहें। *(समाप्त)* _________________________ *आगामी लेख:-* *1. शीघ्र ही "पंचक" विषय पर लेख ।* *2. शीघ्र ही "मोहिनी एकादशी" विषय पर लेख ।* *3. शीघ्र ही "वैशाख मास के अंतिम तीन दिन" विषय पर लेख ।* *4. शीघ्र ही "वैशाख पूर्णिमा" विषय पर लेख ।* _________________________ ☀️ *जय श्री राम* *आज का पंचांग 🌹🌹🌹* *वृहस्पतिवार,13.5.2021* *श्री संवत 2078* *शक संवत् 1943* *सूर्य अयन- उत्तरायण, गोल-उत्तर गोल* *ऋतुः- ग्रीष्म ऋतुः ।* *मास- वैशाख मास।* *पक्ष- शुक्ल पक्ष ।* *तिथि- द्वितीय तिथि अगले दिन 5:45 am तक* *चंद्रराशि- चंद्र वृष राशि मे ।* *नक्षत्र- रोहिणी अगले दिन 5:45 am तक* *योग- अतिगण्ड योग अगले दिन 00:49 am तक (शुभ है)* *करण- बालव करण 4:24 pm तक* *सूर्योदय 5:31 am, सूर्यास्त 7:03 pm* *अभिजित् नक्षत्र- 11:50 am से 12:44 pm* *राहुकाल - 1:59 pm से 3:40 pm* (अशुभ कार्य वर्जित,दिल्ली )* *दिशाशूल- दक्षिण दिशा ।* *मई माह -शुभ दिन:-* शुभ दिन :- 14, 15, 16 (सवेरे 10 उपरांत), 17, 18, 19 (दोपहर 1 तक), 20, 21, 22, 24 (सवेरे 11 उपरांत), 26, 28, 30, 31 *मई माह-अशुभ दिन:-* 13, 23, 25, 27, 29. ______________________ *विशेष:- जो व्यक्ति दिल्ली से बाहर अथवा देश से बाहर रहते हो, वह ज्योतिषीय परामर्श हेतु paytm या Bank transfer द्वारा परामर्श फीस अदा करके, फोन द्वारा ज्योतिषीय परामर्श प्राप्त कर सकतें है* ________________________ *आगामी व्रत तथा त्यौहार:-* 15 मई:- विनायक चतुर्थी। 22 मई:- मोहिनी एकादशी। 24 मई:- सोम प्रदोष व्रत। 26 मई:- बुद्ध पूर्णिमा/वैशाख पूर्णिमा। 29 मई:- संकष्टी चतुर्थी आपका दिन मंगलमय हो . 💐💐💐 *आचार्य राजेश ( रोहिणी, दिल्ली )* *9810449333, 7982803848*

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Acharya Rajesh May 11, 2021

☀️ *विस्तृत लेखमाला:-मनोरथ पूर्ण करने हेतु मंत्र, भाग-14* *मनोरथ पूर्ण करने हेतु मंत्र की इस धारावाहिक लेखमाला मे प्रतिदिन अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा तथा महामंत्र के जाप से अभीष्ट की प्राप्ति की जा सकती हैं । आज के इस लेख मे भगवान भास्कर जी की साधना (चाक्षुष्मती विद्या) शक्ति द्वारा नेत्र रोगों के शमन तथा सूर्यदेव की असीम कृपा की प्राप्ति हेतु प्रयोग । *चाक्षुष्मती विद्या* *साधना विधि:-* चाक्षुष्मती विद्या, भगवान सूर्यदेव को प्रसन्न करने हेतु, नेत्रों के अंधेपन से लेकर नेत्रों के अन्य गंभीर से गंभीर रोगो के शमनार्थ चाक्षुष्मती विद्या से बढ़कर कोई अन्य विद्या नही है, ऐसा कहा गया है कि चाक्षुष्मती साधना करने वाले मनुष्य को नेत्र सम्बन्धी कोई रोग नहीं होता। उसके कुल में भी कोई अंधा नहीं होता। इस विद्या की साधना के लिए मनुष्य को ब्रहामुहूर्त मे स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर संभव हो तो खुले स्थान मे पूर्व दिशा की ओर मुंह करके सर्वप्रथम विनियोग करके निम्नलिखित पाठ करना चाहिए, इसके उपरांत भगवान सूर्यदेव को अर्ध्य अवश्य देना चाहिए । यदि साधक चाहे तो जीवन भर चाक्षुष्मती विद्या को किया जा सकता है, अथवा इसे शुरू करके रोग निवारण तक अवश्य करना चाहिए । इस साधना के दौरान भक्त को अपने तन तथा आत्मा को पूर्ण रूप से शुद्ध रखे, पिता तथा गुरूओं का सम्मान तथा सेवा करे, गाय तथा बंदरो को गुड खिलाये । रविवार को ब्राह्मण गेहूं का दान करे । कार्य सिद्धि के बाद चालीस किलो दून की खीर बनाकर बांटे । *चाक्षुष्मती विद्या* *ॐ अस्याश्चाक्षुषीविद्याया अहिर्बुध्न्य ऋषिः, गायत्री छन्दः, सूर्यो देवता, ॐ बीजम्, नमः शक्तिः, स्वाहा कीलकम्, चक्षूरोगनिवृत्तये जपे विनियोगः।* *ॐ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव। मां पाहि पाहि। त्वरितं चक्षुरोगान् शमय शमय। मम जातरूपं तेजो दर्शय दर्शय। यथाहम् अन्धो न स्यां तथा कल्पय कल्पय। कल्याणं कुरू कुरू। यानि मम पूर्वजन्मोपरर्जितानि चक्षुःप्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मूलय निर्मूलय। ॐ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय। ॐ नमः करूणाकरायामृताय। ॐ नमः सूर्याय। ॐ नमः भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नमः। ॐ खेचराय नमः। ॐ महते नमः। ॐ रजसे नमः। ॐ तमसे नमः। ॐ असतो मा सद्गम्य। ॐ तमसो मा ज्योतिर्गमय। ॐ मृत्योर्मा अमृतं गमय। उष्णो भगवांछुचिरूपः। हंसो भगवान् शुचिर प्रतिरूपः।* *ॐ विश्वरूपं घृणिनं जातवेद संहिरण्मयं ज्योतिरूपं तपन्तम्।* *सहस्त्ररश्मिः शतधा वर्तमानः पुरः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः।।* *ॐ नमो भगवते* *श्रीसूर्यायादित्यायाऽक्षितेजसेऽहोवाहिनिवाहिनि स्वाहा।।* *ॐ वयः सुपर्णा उपसेदुरिन्द्रं प्रियमेधा ऋषयो नाधमानाः।* *अप ध्वान्तमूर्णुहि पूर्धि-चक्षुर्मुग्ध्यस्मान्निधयेव बद्धान्।।* *ॐ पुण्डरीकाक्षाय नमः। ॐ पुष्करेक्षणाय नमः। ॐ कमलेक्षणाय नमः। ॐ विश्वरूपाय नमः। ॐ श्री महाविष्णवे नमः। ॐ सूर्यनारायणाय नमः।। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।* *य इमां चाक्षुष्मतीविद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्याक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अन्धो भवति। अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति।।* *भावार्थ:-* *हे सूर्य भगवान् ! हे चक्षु के अभिमानी सूर्यदेव !आप चक्षु में चक्षु के तेजरूप् से स्थिर हो जायंँ। मेरी रक्षा करें, रक्षा करें। मेरी आँख के रोगों का शीघ्र शमन करें, शमन करें। मुझे अपना सुवर्ण जैसा तेज दिखला दें, दिखला दें। जिससे मैं अन्धा न होऊँ, कृपया वैसे ही उपाय करें, उपाय करें। मेरा कल्याण करें, कल्याण करें। दर्शन शक्ति का अवरोध करने वाले मेरे पूर्वजन्मार्जित जितने भी पाप हैं, सबको जड़ से उखाड़ दें, जड़ से उखाड़ दें। ॐ नेत्रों के प्रकाश भगवान् सूर्यदेव को नमस्कार है। ॐ आकाश विहारी को नमस्कार है। ॐ परम श्रेष्ठ स्वरूप को नमस्कार है। ॐ (सब में क्रिया शक्ति उत्पन्न करने वाले) रजोगुणरूप भगवान् सूर्य को नमस्कार है। (अन्धकार को सर्वथा अपने भीतर लीन करने वाले) तमोगुण के आश्रयभूत भगवान् सूर्य को नमस्कार है। हे भगवान् ! आप मुझे असत् से सत् की ओर ले चलिये। मृत्यु से अमृत की ओर ले चलिये। उष्ण स्वरूप भगवान् शुचिरूप हैं। हंस स्वरूप भगवान् सूर्य शुचि तथा अप्रतिरूप हैं - उनके तेजोमय स्वरूप की समता करने वाला कोई भी नहीं है। ॐ जो सच्चिदानन्दस्वरूप हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, जो किरणों में सुशोभित एवं जातवेदा (भूत आदि तीनों कालों की बात जानने वाला) हैं, जो ज्योतिःस्वरूप, हिरण्मय (स्वर्ण के समान कान्तिवान्) पुरूष के रूप में तप रहे हैं, इस सम्पूर्ण विश्व के जो एकमात्र उत्पत्ति स्थान हैं, उन प्रचण्ड प्रतापवाले भगवान् सूर्य को हम नमस्कार करते हैं। वे सूर्यदेव समस्त प्रजाओं के समक्ष उदित हो रहे हैं। ॐ षड्विध ऐश्वर्यसम्पन्न भगवान् आदित्य को नमस्कार है। उनकी प्रभा दिन का भार वहन करने वाली है, हम उन भगवान् के लिये उत्तम आहुति देते हैं। जिन्हें मेधा अत्यन्त प्रिय है, वे ऋषिगण उत्तम पंखों वाले पक्षी के रूप में भगवान् सूर्य के पास गये और इस प्रकार प्रार्थना करने लगे - ‘भगवन् ! इस अन्धकार को छिपा दीजिये, हमारे नेत्रों को प्रकाश से पूर्ण कीजिये तथा अपना दिव्य प्रकाश देकर मुक्त कीजिये। ॐ पुण्डरीकाक्षाय नमः। ॐ पुष्करेक्षणाय नमः। ॐ कमलेक्षणाय नमः। ॐ विश्वरूपाय नमः। ॐ श्री महाविष्णवे नमः। ॐ सूर्यनारायणाय नमः।। जो ब्राह्मण इस चाक्षुष्मतीविद्या का नित्य पाठ करता है, उसे नेत्र सम्बन्धी कोई रोग नहीं होता। उसके कुल में कोई अंधा नहीं होता। आठ ब्राह्मणों को इस विद्या का दान करने पर - इसका ग्रहण करा देने पर इस विद्या की सिद्धि होती है। *(क्रमशः)* *कल लेख के पंद्रहवे भाग में "काली माता महामंत्र"* _________________________ *आगामी लेख:-* *1. शीघ्र ही "पंचक" विषय पर लेख ।* *2. शीघ्र ही "मोहिनी एकादशी" विषय पर लेख ।* *3. शीघ्र ही "वैशाख मास के अंतिम तीन दिन" विषय पर लेख ।* *4. शीघ्र ही "वैशाख पूर्णिमा" विषय पर लेख ।* _________________________ ☀️ *जय श्री राम* *आज का पंचांग 🌹🌹🌹* *बुधवार,12.5.2021* *श्री संवत 2078* *शक संवत् 1943* *सूर्य अयन- उत्तरायण, गोल-उत्तर गोल* *ऋतुः- ग्रीष्म ऋतुः ।* *मास- वैशाख मास।* *पक्ष- शुक्ल पक्ष ।* *तिथि- प्रतिपदा तिथि अगले दिन 3:07 am तक* *चंद्रराशि- चंद्र मेष राशि मे 6:18 am तक तदोपरान्त वृष राशि।* *नक्षत्र- कृतिका अगले दिन 2:40 am तक* *योग- शोभन योग 11:45 pm तक (शुभ है)* *करण- किस्तुध्न करण 1:49 pm तक* *सूर्योदय 5:32 am, सूर्यास्त 7:02 pm* *अभिजित् नक्षत्र- कोई नहीं* *राहुकाल - 12:17 pm से 1:58 pm* (अशुभ कार्य वर्जित,दिल्ली )* *दिशाशूल- उत्तर दिशा ।* *मई माह -शुभ दिन:-* शुभ दिन :- 14, 15, 16 (सवेरे 10 उपरांत), 17, 18, 19 (दोपहर 1 तक), 20, 21, 22, 24 (सवेरे 11 उपरांत), 26, 28, 30, 31 *मई माह-अशुभ दिन:-* 12, 13, 23, 25, 27, 29. *सर्वार्थ सिद्ध योग :- 12 मई 5:32 am to 13 मई 5:32 am तक*,  ( यह एक शुभयोग है, इसमे कोई व्यापारिक या कि राजकीय अनुबन्ध (कान्ट्रेक्ट) करना, परीक्षा, नौकरी अथवा चुनाव आदि के लिए आवेदन करना, क्रय-विक्रय करना, यात्रा या मुकद्दमा करना, भूमि , सवारी, वस्त्र आभूषणादि का क्रय करने के लिए शीघ्रतावश गुरु-शुक्रास्त, अधिमास एवं वेधादि का विचार सम्भव न हो, तो ये सर्वार्थसिद्धि योग ग्रहण किए जा सकते हैं। ______________________ *विशेष:- जो व्यक्ति दिल्ली से बाहर अथवा देश से बाहर रहते हो, वह ज्योतिषीय परामर्श हेतु paytm या Bank transfer द्वारा परामर्श फीस अदा करके, फोन द्वारा ज्योतिषीय परामर्श प्राप्त कर सकतें है* ________________________ *आगामी व्रत तथा त्यौहार:-* 12 मई:- ईद-उल- फितर। 15 मई:- विनायक चतुर्थी। 22 मई:- मोहिनी एकादशी। 24 मई:- सोम प्रदोष व्रत। 26 मई:- बुद्ध पूर्णिमा/वैशाख पूर्णिमा। 29 मई:- संकष्टी चतुर्थी आपका दिन मंगलमय हो . 💐💐💐 *आचार्य राजेश ( रोहिणी, दिल्ली )* *9810449333, 7982803848*

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Acharya Rajesh May 10, 2021

☀️ *विस्तृत लेखमाला:-मनोरथ पूर्ण करने हेतु मंत्र, भाग-13* *मनोरथ पूर्ण करने हेतु मंत्र की इस धारावाहिक लेखमाला मे प्रतिदिन अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा तथा महामंत्र के जाप से अभीष्ट की प्राप्ति की जा सकती हैं । आज के इस लेख मे भगवान श्री हनुमान जी साधना तथा मंत्र शक्ति द्वारा रोग शमन, शत्रु नाश तथा वशीकरण की प्राप्ति हेतु मंत्र । *हनुमान साधना द्वारा रोग शमन, शत्रु नाश तथा वशीकरण की प्राप्ति हेतु मंत्र* *मंत्र जाप तथा साधना विधि:-* हनुमान साधना तथा मंत्रजाप हेतु साधक को पूर्ण शुद्धि तथा निर्मल भक्ति की आवश्यकता होती हैं । जो भी भक्त भगवान श्री हनुमानजी से इस प्रकार की कामना करते हो । उन्हें शुक्लपक्ष के प्रथम मंगलवार को प्रातःकाल स्नानादि के उपरांत शांत मन से साफ़-सफाई के साथ, बिना कुछ खाए-पिए, ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए भगवान हनुमान को स्मरण करते हुए शुद्धतापूर्वक लाल रंग के वस्त्र धारण करके लाल रंग के ऊनी आसन पर बैठकर, लकडी के पटरे पर कपडा बिछाकर उसपर हनुमान जी नया चित्र रखकर सिंदूर-धी का तिलक लगाकर, गो घृत की ज्योत जलाकर, उनके सम्मुख रूद्राक्ष अथवा मूंगे की माला से सामर्थ्य के अनुसार अधिक से अधिक या फिर कम से कम पांच माला का जाप कार्य सिद्ध होने तक प्रतिदिन अवश्य करना चाहिए । हनुमान जी के इस मंत्र जाप से साधक के समस्त प्रकार के दुःख व संकट हमेशा के लिये नष्ट हो जाते हैं । शत्रुओं का विनाश हो जाता है, रोगो से मुक्ति मिलती हैं, और विरोधी तथा मित्र भी वश में हो जाते हैं । *मंत्र:-* *ओम नमो हनुमते रुद्रावताराय सर्वशत्रुसहांरणाय* *सर्वरोगाय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा* हनुमान जी की साधना तथा मंत्र शक्ति द्वारा घोर विरोधी तथा शत्रु भी वश में हो जाते हैं अथवा शत्रुता समाप्त होती हैं, रोगो का शमन होता है । जाप के दौरान लगातार चालीस दिन तक ब्रह्मचर्य तथा पूर्ण शुद्धियो का पालन करते हुए, प्रतिदिन मंदिर जाकर हनुमानजी के समक्ष दीपदान करते रहे, (यदि संभव हो तो प्रतिदिन मंदिर नंगे पाँव ही जाये) नित्य लाल गाय की सेवा करते रहे, मामा तथा भाईयों की सेवा करे, वृद्ध ब्राह्मण को दूध मे शहद डालकर पिलाते रहे । चालीसवे दिन मंत्रजाप का दशांश हवन मे आहुति देकर साधना को सम्पूर्ण करे और हनुमानजी को सिंदूर का चौला चढाकर किसी भी त्रुटि के लिए क्षमा प्रार्थना करे । *(क्रमशः)* *कल लेख के चौदहवे भाग में गंभीर से गंभीर नेत्ररोग के निवारणार्थ चाक्षुष्मती विद्या का प्रयोग* _________________________ *आगामी लेख:-* *1. शीघ्र ही "पंचक" विषय पर लेख ।* *2. शीघ्र ही "मोहिनी एकादशी" विषय पर लेख ।* *3. शीघ्र ही "वैशाख मास के अंतिम तीन दिन" विषय पर लेख ।* *4. शीघ्र ही "वैशाख पूर्णिमा" विषय पर लेख ।* _________________________ ☀️ *जय श्री राम* *आज का पंचांग 🌹🌹🌹* *मंगलवार,11.5.2021* *श्री संवत 2078* *शक संवत् 1943* *सूर्य अयन- उत्तरायण, गोल-उत्तर गोल* *ऋतुः- ग्रीष्म ऋतुः ।* *मास- वैशाख मास।* *पक्ष- कृष्ण पक्ष ।* *तिथि- अमावस्या तिथिअगले दिन 00:31 am तक* *चंद्रराशि- चंद्र मेष राशि मे ।* *नक्षत्र- भरणी 11:31 pm तक* *योग- सौभाग्य योग 10:40 pm तक (शुभ है)* *करण- चतुष्पाद करण 11:13 am तक* *सूर्योदय 5:33 am, सूर्यास्त 7:02 pm* *अभिजित् नक्षत्र- 11:50 am से 12:44 pm* *राहुकाल - 3:39 am से 5:21 am* (अशुभ कार्य वर्जित,दिल्ली )* *दिशाशूल- उत्तर दिशा ।* *मई माह -शुभ दिन:-* शुभ दिन :- 14, 15, 16 (सवेरे 10 उपरांत), 17, 18, 19 (दोपहर 1 तक), 20, 21, 22, 24 (सवेरे 11 उपरांत), 26, 28, 30, 31 *मई माह-अशुभ दिन:-* 11, 12, 13, 23, 25, 27, 29. ______________________ *विशेष:- जो व्यक्ति दिल्ली से बाहर अथवा देश से बाहर रहते हो, वह ज्योतिषीय परामर्श हेतु paytm या Bank transfer द्वारा परामर्श फीस अदा करके, फोन द्वारा ज्योतिषीय परामर्श प्राप्त कर सकतें है* ________________________ *आगामी व्रत तथा त्यौहार:-* 12 मई:- ईद-उल- फितर। 15 मई:- विनायक चतुर्थी। 22 मई:- मोहिनी एकादशी। 24 मई:- सोम प्रदोष व्रत। 26 मई:- बुद्ध पूर्णिमा/वैशाख पूर्णिमा। 29 मई:- संकष्टी चतुर्थी आपका दिन मंगलमय हो . 💐💐💐 *आचार्य राजेश ( रोहिणी, दिल्ली )* *9810449333, 7982803848*

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https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=977895939416429&id=100015880957664&sfnsn=scwspmo 🙏 हरिॐ सदाशिवशक्ति🔥 **यहां पोस्ट सिर्फ केवल भारतीय ब्राह्मण समाज के लिए है, आवश्यक जानकारी एवं सूचना है,*** ब्राह्मण वंशावली (गोत्र प्रवर परिचय) 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 सरयूपारीण ब्राह्मण या सरवरिया ब्राह्मण या सरयूपारी ब्राह्मण सरयू नदी के पूर्वी तरफ बसे हुए ब्राह्मणों को कहा जाता है। यह कान्यकुब्ज ब्राह्मणो कि शाखा है। श्रीराम ने लंका विजय के बाद कान्यकुब्ज ब्राह्मणों से यज्ञ करवाकर उन्हे सरयु पार स्थापित किया था। सरयु नदी को सरवार भी कहते थे। ईसी से ये ब्राह्मण सरयुपारी ब्राह्मण कहलाते हैं। सरयुपारी ब्राह्मण पूर्वी उत्तरप्रदेश, उत्तरी मध्यप्रदेश, बिहार छत्तीसगढ़ और झारखण्ड में भी होते हैं। मुख्य सरवार क्षेत्र पश्चिम मे उत्तर प्रदेश राज्य के अयोध्या शहर से लेकर पुर्व मे बिहार के छपरा तक तथा उत्तर मे सौनौली से लेकर दक्षिण मे मध्यप्रदेश के रींवा शहर तक है। काशी, प्रयाग, रीवा, बस्ती, गोरखपुर, अयोध्या, छपरा इत्यादि नगर सरवार भूखण्ड में हैं। एक अन्य मत के अनुसार श्री राम ने कान्यकुब्जो को सरयु पार नहीं बसाया था बल्कि रावण जो की ब्राह्मण थे उनकी हत्या करने पर ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए जब श्री राम ने भोजन ओर दान के लिए ब्राह्मणों को आमंत्रित किया तो जो ब्राह्मण स्नान करने के बहाने से सरयू नदी पार करके उस पार चले गए ओर भोजन तथा दान समंग्री ग्रहण नहीं की वे ब्राह्मण सरयुपारीन ब्राह्मण कहे गए। सरयूपारीण ब्राहमणों के मुख्य गाँव : 🔸🔸🔹🔸🔸🔸🔸🔹🔸🔸 गर्ग (शुक्ल- वंश) 🔸🔸🔹🔸🔸 गर्ग ऋषि के तेरह लडके बताये जाते है जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शुक्ल बंशज कहा जाता है जो तेरह गांवों में बिभक्त हों गये थे| गांवों के नाम कुछ इस प्रकार है| (१) मामखोर (२) खखाइज खोर (३) भेंडी (४) बकरूआं (५) अकोलियाँ (६) भरवलियाँ (७) कनइल (८) मोढीफेकरा (९) मल्हीयन (१०) महसों (११) महुलियार (१२) बुद्धहट (१३) इसमे चार गाँव का नाम आता है लखनौरा, मुंजीयड, भांदी, और नौवागाँव| ये सारे गाँव लगभग गोरखपुर, देवरियां और बस्ती में आज भी पाए जाते हैं। उपगर्ग (शुक्ल-वंश): 🔸🔸🔹🔸🔸 उपगर्ग के छ: गाँव जो गर्ग ऋषि के अनुकरणीय थे कुछ इस प्रकार से हैं| (१)बरवां (२) चांदां (३) पिछौरां (४) कड़जहीं (५) सेदापार (६) दिक्षापार यही मूलत: गाँव है जहाँ से शुक्ल बंश का उदय माना जाता है यहीं से लोग अन्यत्र भी जाकर शुक्ल बंश का उत्थान कर रहें हैं यें सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं। गौतम (मिश्र-वंश): 🔸🔸🔹🔸🔸 गौतम ऋषि के छ: पुत्र बताये जातें हैं जो इन छ: गांवों के वाशी थे| (१) चंचाई (२) मधुबनी (३) चंपा (४) चंपारण (५) विडरा (६) भटीयारी इन्ही छ: गांवों से गौतम गोत्रीय, त्रिप्रवरीय मिश्र वंश का उदय हुआ है, यहीं से अन्यत्र भी पलायन हुआ है ये सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं। उप गौतम (मिश्र-वंश): 🔸🔸🔹🔹🔸🔸 उप गौतम यानि गौतम के अनुकारक छ: गाँव इस प्रकार से हैं| (१) कालीडीहा (२) बहुडीह (३) वालेडीहा (४) भभयां (५) पतनाड़े (६) कपीसा इन गांवों से उप गौतम की उत्पत्ति मानी जाति है। वत्स गोत्र (मिश्र- वंश): 🔸🔸🔹🔹🔸🔸 वत्स ऋषि के नौ पुत्र माने जाते हैं जो इन नौ गांवों में निवास करते थे| (१) गाना (२) पयासी (३) हरियैया (४) नगहरा (५) अघइला (६) सेखुई (७) पीडहरा (८) राढ़ी (९) मकहडा बताया जाता है की इनके वहा पांति का प्रचलन था अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है। कौशिक गोत्र (मिश्र-वंश): 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔸 तीन गांवों से इनकी उत्पत्ति बताई जाती है जो निम्न है। (१) धर्मपुरा (२) सोगावरी (३) देशी वशिष्ठ गोत्र (मिश्र-वंश): 🔸🔸🔹🔹🔸🔸 इनका निवास भी इन तीन गांवों में बताई जाती है। (१) बट्टूपुर मार्जनी (२) बढ़निया (३) खउसी शांडिल्य गोत्र ( तिवारी,त्रिपाठी वंश) 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 शांडिल्य ऋषि के बारह पुत्र बताये जाते हैं जो इन बाह गांवों से प्रभुत्व रखते हैं। (१) सांडी (२) सोहगौरा (३) संरयाँ (४) श्रीजन (५) धतूरा (६) भगराइच (७) बलूआ (८) हरदी (९) झूडीयाँ (१०) उनवलियाँ (११) लोनापार (१२) कटियारी, लोनापार में लोनाखार, कानापार, छपरा भी समाहित है। इन्ही बारह गांवों से आज चारों तरफ इनका विकास हुआ है, यें सरयूपारीण ब्राह्मण हैं। इनका गोत्र श्री मुख शांडिल्य त्रि प्रवर है, श्री मुख शांडिल्य में घरानों का प्रचलन है जिसमे राम घराना, कृष्ण घराना, नाथ घराना, मणी घराना है, इन चारों का उदय, सोहगौरा गोरखपुर से है जहाँ आज भी इन चारों का अस्तित्व कायम है। उप शांडिल्य ( तिवारी- त्रिपाठी, वंश): 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 इनके छ: गाँव बताये जाते हैं जी निम्नवत हैं। (१) शीशवाँ (२) चौरीहाँ (३) चनरवटा (४) जोजिया (५) ढकरा (६) क़जरवटा भार्गव गोत्र (तिवारी या त्रिपाठी वंश): भार्गव ऋषि के चार पुत्र बताये जाते हैं जिसमें चार गांवों का उल्लेख मिलता है| (१) सिंघनजोड़ी (२) सोताचक (३) चेतियाँ (४) मदनपुर। भारद्वाज गोत्र (दुबे वंश): 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔸 भारद्वाज ऋषि के चार पुत्र बाये जाते हैं जिनकी उत्पत्ति इन चार गांवों से बताई जाती है| (१) बड़गईयाँ (२) सरार (३) परहूँआ (४) गरयापार कन्चनियाँ और लाठीयारी इन दो गांवों में दुबे घराना बताया जाता है जो वास्तव में गौतम मिश्र हैं लेकिन इनके पिता क्रमश: उठातमनी और शंखमनी गौतम मिश्र थे परन्तु वासी (बस्ती) के राजा बोधमल ने एक पोखरा खुदवाया जिसमे लट्ठा न चल पाया, राजा के कहने पर दोनों भाई मिल कर लट्ठे को चलाया जिसमे एक ने लट्ठे सोने वाला भाग पकड़ा तो दुसरें ने लाठी वाला भाग पकड़ा जिसमे कन्चनियाँ व लाठियारी का नाम पड़ा, दुबे की गादी होने से ये लोग दुबे कहलाने लगें। सरार के दुबे के वहां पांति का प्रचलन रहा है अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है। सावरण गोत्र ( पाण्डेय वंश) 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 सावरण ऋषि के तीन पुत्र बताये जाते हैं इनके वहां भी पांति का प्रचलन रहा है जिन्हें तीन के समकक्ष माना जाता है जिनके तीन गाँव निम्न हैं| (१) इन्द्रपुर (२) दिलीपपुर (३) रकहट (चमरूपट्टी) सांकेत गोत्र (मलांव के पाण्डेय वंश) 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 सांकेत ऋषि के तीन पुत्र इन तीन गांवों से सम्बन्धित बाते जाते हैं| (१) मलांव (२) नचइयाँ (३) चकसनियाँ कश्यप गोत्र (त्रिफला के पाण्डेय वंश) 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 इन तीन गांवों से बताये जाते हैं। (१) त्रिफला (२) मढ़रियाँ (३) ढडमढीयाँ ओझा वंश 🔸🔹🔸 इन तीन गांवों से बताये जाते हैं। (१) करइली (२) खैरी (३) निपनियां चौबे चतुर्वेदी, वंश (कश्यप गोत्र) 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔹🔸🔸 इनके लिए तीन गांवों का उल्लेख मिलता है। (१) वंदनडीह (२) बलूआ (३) बेलउजां एक गाँव कुसहाँ का उल्लेख बताते है जो शायद उपाध्याय वंश का मालूम पड़ता है। ब्राह्मणों की वंशावली 🔸🔸🔹🔹🔸🔸 भविष्य पुराण के अनुसार ब्राह्मणों का इतिहास है की प्राचीन काल में महर्षि कश्यप के पुत्र कण्वय की आर्यावनी नाम की देव कन्या पत्नी हुई। ब्रम्हा की आज्ञा से दोनों कुरुक्षेत्र वासनी सरस्वती नदी के तट पर गये और कण् व चतुर्वेदमय सूक्तों में सरस्वती देवी की स्तुति करने लगे एक वर्ष बीत जाने पर वह देवी प्रसन्न हो वहां आयीं और ब्राम्हणो की समृद्धि के लिये उन्हें वरदान दिया। वर के प्रभाव कण्वय के आर्य बुद्धिवाले दस पुत्र हुए जिनका क्रमानुसार नाम था👉 उपाध्याय, दीक्षित, पाठक, शुक्ला, मिश्रा, अग्निहोत्री, दुबे, तिवारी, पाण्डेय, और चतुर्वेदी। इन लोगो का जैसा नाम था वैसा ही गुण। इन लोगो ने नत मस्तक हो सरस्वती देवी को प्रसन्न किया। बारह वर्ष की अवस्था वाले उन लोगो को भक्तवत्सला शारदा देवी ने अपनी कन्याए प्रदान की। वे क्रमशः उपाध्यायी, दीक्षिता, पाठकी, शुक्लिका, मिश्राणी, अग्निहोत्रिधी, द्विवेदिनी, तिवेदिनी पाण्ड्यायनी, और चतुर्वेदिनी कहलायीं। फिर उन कन्याआं के भी अपने-अपने पति से सोलह-सोलह पुत्र हुए हैं वे सब गोत्रकार हुए जिनका नाम - कष्यप, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्रि, वसिष्ठ, वत्स, गौतम, पराशर, गर्ग, अत्रि, भृगडत्र, अंगिरा, श्रंगी, कात्याय, और याज्ञवल्क्य। इन नामो से सोलह-सोलह पुत्र जाने जाते हैं। मुख्य 10 प्रकार ब्राम्हणों ये हैं (1) तैलंगा, (2) महार्राष्ट्रा, (3) गुर्जर, (4) द्रविड, (5) कर्णटिका, यह पांच "द्रविण" कहे जाते हैं, ये विन्ध्यांचल के दक्षिण में पाय जाते हैं। तथा विंध्यांचल के उत्तर मं पाये जाने वाले या वास करने वाले ब्राम्हण (1) सारस्वत, (2) कान्यकुब्ज, (3) गौड़, (4) मैथिल, (5) उत्कलये, उत्तर के पंच गौड़ कहे जाते हैं। वैसे ब्राम्हण अनेक हैं जिनका वर्णन आगे लिखा है। ऐसी संख्या मुख्य 115 की है। शाखा भेद अनेक हैं । इनके अलावा संकर जाति ब्राम्हण अनेक है। यहां मिली जुली उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हणों की नामावली 115 की दे रहा हूं। जो एक से दो और 2 से 5 और 5 से 10 और 10 से 84 भेद हुए हैं, फिर उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हण की संख्या शाखा भेद से 230 के लगभग है। तथा और भी शाखा भेद हुए हैं, जो लगभग 300 के करीब ब्राम्हण भेदों की संख्या का लेखा पाया गया है। उत्तर व दक्षिणी ब्राम्हणां के भेद इस प्रकार है 81 ब्राम्हाणां की 31 शाखा कुल 115 ब्राम्हण संख्या, मुख्य है - (1) गौड़ ब्राम्हण, (2)गुजरगौड़ ब्राम्हण (मारवाड,मालवा) (3) श्री गौड़ ब्राम्हण, (4) गंगापुत्र गौडत्र ब्राम्हण, (5) हरियाणा गौड़ ब्राम्हण, (6) वशिष्ठ गौड़ ब्राम्हण, (7) शोरथ गौड ब्राम्हण, (8) दालभ्य गौड़ ब्राम्हण, (9) सुखसेन गौड़ ब्राम्हण, (10) भटनागर गौड़ ब्राम्हण, (11) सूरजध्वज गौड ब्राम्हण(षोभर), (12) मथुरा के चौबे ब्राम्हण, (13) वाल्मीकि ब्राम्हण, (14) रायकवाल ब्राम्हण, (15) गोमित्र ब्राम्हण, (16) दायमा ब्राम्हण, (17) सारस्वत ब्राम्हण, (18) मैथल ब्राम्हण, (19) कान्यकुब्ज ब्राम्हण, (20) उत्कल ब्राम्हण, (21) सरवरिया ब्राम्हण, (22) पराशर ब्राम्हण, (23) सनोडिया या सनाड्य, (24)मित्र गौड़ ब्राम्हण, (25) कपिल ब्राम्हण, (26) तलाजिये ब्राम्हण, (27) खेटुवे ब्राम्हण, (28) नारदी ब्राम्हण, (29) चन्द्रसर ब्राम्हण, (30)वलादरे ब्राम्हण, (31) गयावाल ब्राम्हण, (32) ओडये ब्राम्हण, (33) आभीर ब्राम्हण, (34) पल्लीवास ब्राम्हण, (35) लेटवास ब्राम्हण, (36) सोमपुरा ब्राम्हण, (37) काबोद सिद्धि ब्राम्हण, (38) नदोर्या ब्राम्हण, (39) भारती ब्राम्हण, (40) पुश्करर्णी ब्राम्हण, (41) गरुड़ गलिया ब्राम्हण, (42) भार्गव ब्राम्हण, (43) नार्मदीय ब्राम्हण, (44) नन्दवाण ब्राम्हण, (45) मैत्रयणी ब्राम्हण, (46) अभिल्ल ब्राम्हण, (47) मध्यान्दिनीय ब्राम्हण, (48) टोलक ब्राम्हण, (49) श्रीमाली ब्राम्हण, (50) पोरवाल बनिये ब्राम्हण, (51) श्रीमाली वैष्य ब्राम्हण (52) तांगड़ ब्राम्हण, (53) सिंध ब्राम्हण, (54) त्रिवेदी म्होड ब्राम्हण, (55) इग्यर्शण ब्राम्हण, (56) धनोजा म्होड ब्राम्हण, (57) गौभुज ब्राम्हण, (58) अट्टालजर ब्राम्हण, (59) मधुकर ब्राम्हण, (60) मंडलपुरवासी ब्राम्हण, (61) खड़ायते ब्राम्हण, (62) बाजरखेड़ा वाल ब्राम्हण, (63) भीतरखेड़ा वाल ब्राम्हण, (64) लाढवनिये ब्राम्हण, (65) झारोला ब्राम्हण, (66) अंतरदेवी ब्राम्हण, (67) गालव ब्राम्हण, (68) गिरनारे ब्राम्हण ब्राह्मण गौत्र और गौत्र कारक 115 ऋषि 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 (1). अत्रि, (2). भृगु, (3). आंगिरस, (4). मुद्गल, (5). पातंजलि, (6). कौशिक,(7). मरीच, (8). च्यवन, (9). पुलह, (10). आष्टिषेण, (11). उत्पत्ति शाखा, (12). गौतम गोत्र,(13). वशिष्ठ और संतान (13.1). पर वशिष्ठ, (13.2). अपर वशिष्ठ, (13.3). उत्तर वशिष्ठ, (13.4). पूर्व वशिष्ठ, (13.5). दिवा वशिष्ठ, (14). वात्स्यायन,(15). बुधायन, (16). माध्यन्दिनी, (17). अज, (18). वामदेव, (19). शांकृत्य, (20). आप्लवान, (21). सौकालीन, (22). सोपायन, (23). गर्ग, (24). सोपर्णि, (25). शाखा, (26). मैत्रेय, (27). पराशर, (28). अंगिरा, (29). क्रतु, (30. अधमर्षण, (31). बुधायन, (32). आष्टायन कौशिक, (33). अग्निवेष भारद्वाज, (34). कौण्डिन्य, (34). मित्रवरुण,(36). कपिल, (37). शक्ति, (38). पौलस्त्य, (39). दक्ष, (40). सांख्यायन कौशिक, (41). जमदग्नि, (42). कृष्णात्रेय, (43). भार्गव, (44). हारीत, (45). धनञ्जय, (46). पाराशर, (47). आत्रेय, (48). पुलस्त्य, (49). भारद्वाज, (50). कुत्स, (51). शांडिल्य, (52). भरद्वाज, (53). कौत्स, (54). कर्दम, (55). पाणिनि गोत्र, (56). वत्स, (57). विश्वामित्र, (58). अगस्त्य, (59). कुश, (60). जमदग्नि कौशिक, (61). कुशिक, (62). देवराज गोत्र, (63). धृत कौशिक गोत्र, (64). किंडव गोत्र, (65). कर्ण, (66). जातुकर्ण, (67). काश्यप, (68). गोभिल, (69). कश्यप, (70). सुनक, (71). शाखाएं, (72). कल्पिष, (73). मनु, (74). माण्डब्य, (75). अम्बरीष, (76). उपलभ्य, (77). व्याघ्रपाद, (78). जावाल, (79). धौम्य, (80). यागवल्क्य, (81). और्व, (82). दृढ़, (83). उद्वाह, (84). रोहित, (85). सुपर्ण, (86). गालिब, (87). वशिष्ठ, (88). मार्कण्डेय, (89). अनावृक, (90). आपस्तम्ब, (91). उत्पत्ति शाखा, (92). यास्क, (93). वीतहब्य, (94). वासुकि, (95). दालभ्य, (96). आयास्य, (97). लौंगाक्षि, (98). चित्र, (99). विष्णु, (100). शौनक, (101).पंचशाखा, (102).सावर्णि, (103).कात्यायन, (104).कंचन, (105).अलम्पायन, (106).अव्यय, (107).विल्च, (108). शांकल्य, (109). उद्दालक, (110). जैमिनी, (111). उपमन्यु, (112). उतथ्य, (113). आसुरि, (114). अनूप और (110). आश्वलायन। कुल संख्या 108 ही हैं, लेकिन इनकी छोटी-छोटी 7 शाखा और हुई हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर इनकी पूरी सँख्या 115 है। ब्राह्मण कुल परम्परा के 11 कारक 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 (1) गोत्र👉 व्यक्ति की वंश-परम्परा जहाँ और से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता गया है। इन गोत्रों के मूल ऋषि :– विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप। इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्त्य की संतान गोत्र कहलाती है। यानी जिस व्यक्ति का गौत्र भारद्वाज है, उसके पूर्वज ऋषि भरद्वाज थे और वह व्यक्ति इस ऋषि का वंशज है। (2) प्रवर👉 अपनी कुल परम्परा के पूर्वजों एवं महान ऋषियों को प्रवर कहते हैं। अपने कर्मो द्वारा ऋषिकुल में प्राप्‍त की गई श्रेष्‍ठता के अनुसार उन गोत्र प्रवर्तक मूल ऋषि के बाद होने वाले व्यक्ति, जो महान हो गए, वे उस गोत्र के प्रवर कहलाते हें। इसका अर्थ है कि कुल परम्परा में गोत्रप्रवर्त्तक मूल ऋषि के अनन्तर अन्य ऋषि भी विशेष महान हुए थे। (3) वेद👉 वेदों का साक्षात्कार ऋषियों ने लाभ किया है। इनको सुनकर कंठस्थ किया जाता है। इन वेदों के उपदेशक गोत्रकार ऋषियों के जिस भाग का अध्ययन, अध्यापन, प्रचार प्रसार, आदि किया, उसकी रक्षा का भार उसकी संतान पर पड़ता गया, इससे उनके पूर्व पुरूष जिस वेद ज्ञाता थे, तदनुसार वेदाभ्‍यासी कहलाते हैं। प्रत्येक का अपना एक विशिष्ट वेद होता है, जिसे वह अध्ययन-अध्यापन करता है। इस परम्परा के अन्तर्गत जातक, चतुर्वेदी, त्रिवेदी, द्विवेदी आदि कहलाते हैं। (4) उपवेद👉 प्रत्येक वेद से सम्बद्ध विशिष्ट उपवेद का भी ज्ञान होना चाहिये। (5) शाखा👉 वेदों के विस्तार के साथ ऋषियों ने प्रत्येक एक गोत्र के लिए एक वेद के अध्ययन की परंपरा डाली है। कालान्तर में जब एक व्यक्ति उसके गोत्र के लिए निर्धारित वेद पढने में असमर्थ हो जाता था, तो ऋषियों ने वैदिक परम्परा को जीवित रखने के लिए शाखाओं का निर्माण किया। इस प्रकार से प्रत्येक गोत्र के लिए अपने वेद की उस शाखा का पूर्ण अध्ययन करना आवश्यक कर दिया। इस प्रकार से उन्‍होंने जिसका अध्‍ययन किया, वह उस वेद की शाखा के नाम से पहचाना गया। 6) सूत्र👉 प्रत्येक वेद के अपने 2 प्रकार के सूत्र हैं। श्रौत सूत्र और ग्राह्य सूत्र यथा शुक्ल यजुर्वेद का कात्यायन श्रौत सूत्र और पारस्कर ग्राह्य सूत्र है। (7) छन्द 👉 उक्तानुसार ही प्रत्येक ब्राह्मण को अपने परम्परा सम्मत छन्द का भी ज्ञान होना चाहिए। (8) शिखा👉 अपनी कुल परम्परा के अनुरूप शिखा-चुटिया को दक्षिणावर्त अथवा वामावार्त्त रूप से बाँधने की परम्परा शिखा कहलाती है। (9)पाद👉 अपने-अपने गोत्रानुसार लोग अपना पाद प्रक्षालन करते हैं। ये भी अपनी एक पहचान बनाने के लिए ही, बनाया गया एक नियम है। अपने-अपने गोत्र के अनुसार ब्राह्मण लोग पहले अपना बायाँ पैर धोते, तो किसी गोत्र के लोग पहले अपना दायाँ पैर धोते, इसे ही पाद कहते हैं। (10) देवता👉 प्रत्येक वेद या शाखा का पठन, पाठन करने वाले किसी विशेष देव की आराधना करते हैं, वही उनका कुल देवता यथा भगवान् विष्णु, भगवान् शिव, माँ दुर्गा, भगवान् सूर्य इत्यादि देवों में से कोई एक आराध्‍य देव हैं। (11)द्वार👉 यज्ञ मण्डप में अध्वर्यु (यज्ञकर्त्ता) जिस दिशा अथवा द्वार से प्रवेश करता है अथवा जिस दिशा में बैठता है, वही उस गोत्र वालों की द्वार या दिशा कही जाती है। सभी ब्राह्मण बंधुओ को मेरा नमस्कार बहुत दुर्लभ जानकारी है जरूर पढ़े। और समाज में सेयर करे हम क्या है इस तरह ब्राह्मणों की उत्पत्ति और इतिहास के साथ इनका विस्तार अलग अलग राज्यो में हुआ और ये उस राज्य के ब्राह्मण कहलाये। ब्राह्मण बिना धरती की कल्पना ही नहीं की जा सकती इसलिए ब्राह्मण होने पर गर्व करो और अपने सत्यकर्म ज्ञानस्मृति भक्तिभाव और धर्म का पालन कर सनातन संस्कृति ओर हिन्दूत्व सभ्यता हमारी मूल भाषा दैविक संस्कृतभाषा आदि की रक्षा करते रहे। ब्राह्मण गुण - सत्य, क्षमा,दान,दया,विधा विनय विवेक,सत्व चित्त आनन्द, कुण्डलिनी आन्तारिक चक्रशक्ति पराविधा, मर्यादा,त्याग,वैराग्य विनम्रता,सहजभाव, सरलता ,निष्कामभाव अहिंसा,समता,योग, विश्वास,अन्त:करण पवित्र व स्वास्थ्य,सत्विक शाकाहारी भोज्यपदार्थ,नशीले पदार्थों का सेवन ओर क्रय-विक्रय प्रतिबंध, शान्ति ,न्याय, ब्राह्मणधर्म ,तत्वज्ञान, ब्रह्मचार्य ब्रह्मविधा, ब्रह्मसूत्र, उपनिषद्,रामयाण महाभारत मनुस्मृति वेदान्त ,व्यासवाणी, वेदस्मृति,उत्तम पुस्तक,। ब्रह्ममूर्हत ,ब्रह्मनिष्ठा ब्रह्मचिंतनस्मृति, ब्रह्ममंत्र ,गीतानुभाव सत्यसंग, सत्कर्मयोग ज्ञानस्मृतियोग, आन्तारिक, ध्यानयोग, नवधाभक्तियोग, जप तप व्रत पूजा, दिव्य संकल्प विकल्प, दैवीय आचार विचार, सतोगुण विचारधारा, आध्यात्मिक शिक्षा, आयुर्वेदिक स्वास्थ्य, सम्पदा परमार्थ पुरुषार्थ समाजसेवा राष्ट्रहित मानवधर्म आदर्शचरित्र कर्त्तव्यनिष्टा गृहस्थधर्मनीति समाजिक व्यवस्थासेवा ओर आवश्यकता आज्ञाधर्म का संचालन,नैतिक मूल्यों आदि वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत लागू करना व करवाना। संकलन आशीष कुमार प्यासी मोबाइल नंबर 🇮🇳-9669938129 [email protected] मुकाम सलैयाप्यासी 1km उत्तमपुरा 2km निवासस्थान हनुमंतटोला हनुमंतबाबामंदिर आटाचाकी शासकीय जलहैंडपंप श्रीआशीषभवन मकान नं34/2 वार्ड क्रमांक 02 पोस्टआफिस पिपरियापरौहा 2.5km विकासकेन्द्र तेवरी 5km *तहसील/थानाक्षेत्र स्लीमनाबाद 6km -*विकासखण्ड/विधानसभा- बहोरीबंद 22km जिला कटनी 25km संभाग जबलपुर 75km लोकसभाक्षेत्र खुजराहों 385km राज्य मध्यप्रदेश देश भारत महाद्वीप दक्षिणएशिया स्थान पिन कोड 483440 राष्ट्रीय मार्ग 07/30 कन्याकुमारी 2500km वाराणसी 300km मुख्य मार्ग कटनीनदी पुल पुलिसथाना आफिस बाजू उत्तरदिशा से बिलहरी 11km रोड़ 6 किलोमीटर दूर तलाब सलईयाप्यासी से ढुगराई रोड़ 1 किलोमीटर दूर 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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