My Mandir
My Mandir Jan 29, 2021

🙏🕉️ मोहन का अर्थ - मुग्ध होना 🕉️🙏

🙏🕉️ मोहन का अर्थ - मुग्ध होना 🕉️🙏

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कामेंट्स

RAJ RATHOD Jan 29, 2021
🚩🚩🔱🔱🏹🏹🍀🌿🌾🌱🌷🌻🌺🌹🌲🌳💐🌸🐅🐅🐆🐆👣👣🙏जय माता दी 🙏🙏💐💐💐🌷🌷 शुभ रात्रि वंदन 🌷🌷🌷🌷🌺🌺🌺 🌹🌹माता रानी की कृपा से आपका हर पल शुभ हो 🌹🌹🌹🌹जय माता दी 🌹🌹🙏🌹🌺🐆🐅🐯💐🌸🌻🌼🌷🌱🌲🌳🌴🌾🌿🍀🍁🍂🍃

JAI MAA VAISHNO Jan 29, 2021
जय माता दी बोल सच्चे दरबार की जय वैष्णो माता की जय कालिका माता की जय मनसा माता की जय कांगड़ा माता की जय चिंतपूर्णी माता की जय ज्वाला माता की जय नैना माता की जय चामुंडा माता की जय मां शाकुंभरी देवी की जय सीता क्षी माता की जय धरती माता की जय गायत्री माता की जय श्री ब्रह्मा जी की जय श्री विष्णु जी की जय श्री महेश्वर जी की जय श्री महाकाली की जय श्री महालक्ष्मी जी की जय श्री महारानी सरस्वती जी की जय बोल सच्चे दरबार की जय श्री आशापुरा माता की जय श्री बगला माता की जय श्री बगला पूरी माता की जय बोल सच्चे दरबार की जय बोल सच्चे दरबार की जय गणपति बप्पा मोरिया मंगल मूर्ति मोरिया रे तू आजा

sunita yadav Jan 29, 2021
राधे राधे सा 🙏🙏💐💐💐

suchit sinha Jan 29, 2021
जय जय श्री राधे कृष्ण जी जय हो जय

घनश्याम गुप्ता Feb 5, 2021
घनश्याम गुप्ता :शुभ संध्या ।मोहन शब्द की बहुत ही सुन्दर व्याख्या। सदैव और सभी के लिए जीवनोपयोगी एवं प्रेरणादायी रचना।

My Mandir Apr 11, 2021

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Udit Sagar Apr 9, 2021

*हृदय की इच्छाएं शांत नहीं होती हैं। क्यों???* *एक राजमहल के द्वार पर बड़ी भीड़ लगी थी।* *किसी फकीर ने सम्राट से भिक्षा मांगी थी। सम्राट ने उससे कहा,''जो भी चाहते हो, मांग लो।''* *दिवस के प्रथम याचक की कोई भी इच्छा पूरी करने का उसका नियम था।* *उस फकीर ने अपने छोटे से भिक्षापात्र को आगे बढ़ाया और कहा,''बस इसे स्वर्ण मुद्राओं से भर दें।''सम्राट ने सोचा इससे सरल बात और क्या हो सकती है! लेकिन जब उस भिक्षा पात्र में स्वर्ण मुद्राएं डाली गई, तो ज्ञात हुआ कि उसे भरना असंभव था।* *वह तो जादुई था। जितनी अधिक मुद्राएं उसमें डाली गई, वह उतना ही अधिक खाली होता गया!* *सम्राट को दुखी देख वह फकीर बोला,''न भर सकें तो वैसा कह दें। मैं खाली पात्र को ही लेकर चला जाऊंगा!* *ज्यादा से ज्यादा इतना ही होगा कि लोग कहेंगे कि सम्राट अपना वचन पूरा नहीं कर सके !* *''सम्राट ने अपना सारा खजाना खाली कर दिया, उसके पास जो कुछ भी था, सभी उस पात्र में डाल दिया गया, लेकिन अद्भुत पात्र न भरा, सो न भरा।* *तब उस सम्राट ने पूछा,''भिक्षु, तुम्हारा पात्र साधारण नहीं है। उसे भरना मेरी सामर्थ्य से बाहर है। क्या मैं पूछ सकता हूं कि इस अद्भुत पात्र का रहस्य क्या है?''* *वह फकीर हंसने लगा और बोला,''कोई विशेष रहस्य नहीं। यह पात्र मनुष्य के हृदय से बनाया गया है।* *क्या आपको ज्ञात नहीं है कि मनुष्य का हृदय कभी भी भरा नहीं जा सकता*? *धन से, पद से, ज्ञान से- किसी से भी भरो, वह खाली ही रहेगा, क्योंकि इन चीजों से भरने के लिए वह बना ही नहीं है। इस सत्य को न जानने के कारण ही मनुष्य जितना पाता है, उतना ही दरिद्र होता जाता है।* *हृदय की इच्छाएं कुछ भी पाकर शांत नहीं होती हैं। क्यों?* *क्योंकि, हृदय तो परमात्मा को पाने के लिए बना है।''* *शांति चाहिए ? संतृप्ति चाहिए ? तो अपने संकल्प को कहिए कि "भगवान श्रीकृष्ण" के सेवा के अतिरिक्त और मुझे कुछ भी नहीं चाहिए।* *"कृष्ण से कृष्ण को ही मांगिए ।"*

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Suchitra Singh Apr 9, 2021

*गुरु का आदेश* एक शिष्य था समर्थ गुरु जी का जो भिक्षा लेने के लिए गांव में गया और घर-घर भिक्षा की मांग करने लगा। *समर्थ गुरु की जय ! भिक्षा देहिं....* *समर्थ गुरु की जय ! भिक्षा देहिं....* एक घर के भीतर से जोर से दरवाजा खुला ओर एक बड़ी-बड़ी दाढ़ी वाला तान्त्रिक बाहर निकला और चिल्लाते हुए बोला - मेरे दरवाजे पर आकर किसी दूसरे का गुणगान करता है। कौन है ये समर्थ?? शिष्य ने गर्व से कहा-- *मेरे गुरु... जो सर्व समर्थ है।* तांत्रिक ने सुना तो क्रोध में आकर बोला कि इतना दुःसाहस कि मेरे दरवाजे पर आकर किसी और का गुणगान करे .. तो देखता हूँ कितना सामर्थ्य है तेरे गुरु में ! *मेरा श्राप है कि तू कल का उगता सूरज नही देख पाएगा अर्थात् तेरी मृत्यु हो जाएगी।* शिष्य ने सुना तो देखता ही रह गया और आस-पास के भी गांव वाले कहने लगे कि इस तांत्रिक का दिया हुआ श्राप कभी भी व्यर्थ नही जाता.. बेचारा युवावस्था में ही अपनी जान गवा बैठा.... शिष्य उदास चेहरा लिए वापस आश्रम की ओर चल दिया और सोचते-सोचते जा रहा था कि आज मेरा अंतिम दिन है, लगता है मेरा समय खत्म हो गया है। आश्रम में जैसे ही पहुँचा। गुरुजी हँसते हुए बोले -- *ले आया भिक्षा?* बेचार शिष्य क्या बोले---! गुरुदेव हँसते हुए बोले कि भिक्षा ले आया। *शिष्य--* जी गुरुदेव! भिक्षा में मैं अपनी मौत ले आया हूँ ! और सारी घटना सुना दी और एक कोने में चुप-चाप बैठ गया। गुरुदेव बोले अच्छा चल भोजन कर ले। *शिष्य--* गुरुदेव! आप भोजन करने की बात कर रहे है और यहाँ मेरा प्राण सूख रहा है। भोजन तो दूर एक दाना भी मुँह में न जा पाएगा। *गुरुदेव बोले---* अभी तो पूरी रात बाकी है अभी से चिंता क्यों कर रहा है, चल ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा। ओर यह कहकर गुरुदेव भोजन करने चले गए। फिर सोने की बारी आई तब गुरुदेव शिष्य को बुलाकर आदेश किया - *हमारे चरण दबा दे!* शिष्य मायूस होकर बोला! जी गुरुदेव जो कुछ क्षण बचे है जीवन के, वे क्षण मैं आपकी सेवा कर ही प्राण त्याग करूँ यहिं अच्छा होगा। ओर फिर गुरुदेव के चरण दबाने की सेवा शुरू की। *गुरुदेव बोले--* चाहे जो भी हो जाय चरण छोड़ कर कहीं मत जाना । *शिष्य--* जी गुरुदेव कही नही जाऊँगा। *गुरुदेव ने अपने शब्दों को तीन बार दोहराया कि *चरण मत छोड़ना, चाहे जो हो जाए।* यह कह कर गुरुदेव सो गए। शिष्य पूरी भावना से चरण दबाने लगा। रात्रि का पहला पहर बीतने को था अब तांत्रिक अपनी श्राप को पूरा करने के लिए एक देवी को भेजा जो धन से सोने-चांदी से, हीरे-मोती से भरी थाली हाथ में लिए थी। शिष्य चरण दबा रहा था। तभी दरवाजे पर वो देवी प्रकट हुई और कहने लगी - कि इधर आओ ओर ये थाली ले लो। शिष्य भी बोला-- जी मुझे लेने में कोई परेशानी नही है लेकिन क्षमा करें! मैं वहाँ पर आकर नही ले सकता। अगर आपको देना ही है तो यहाँ पर आकर रख दीजिए। तो वह देवी कहने लगी कि-- नही !! नही!! तुम्हे यहाँ आना होगा। देखो कितना सारा माल है। शिष्य बोला-- नही। अगर देना है तो यही आकर रख दो। *तांत्रिक ने अपना पहला पासा असफल देख दूसरा पासा फेंका रात्रि का दूसरा पहर बीतने को था तब तांत्रिक ने भेजा....* शिष्य गुरु जी के चरण दबाने की सेवा कर रहा था तब रात्रि का दूसरा पहर बीता और तांत्रिक ने इस बार उस शिष्य की माँ का रूप बनाकर एक नारी को भेजा। शिष्य गुरु के चरण दबा रहा था तभी दरवाजे पर आवाज आई -- बेटा! तुम कैसे हो? शिष्य ने अपनी माँ को देखा तो सोचने लगा अच्छा हुआ जो माँ के दर्शन हो गए, मरते वक्त माँ से भी मिल ले। वह औरत जो माँ के रूप को धारण किये हुए थी बोली - आओ बेटा गले से लगा लो! बहुत दिन हो गए तुमसे मिले। शिष्य बोला-- क्षमा करना मां! लेकिन मैं वहाँ नही आ सकता क्योंकि अभी गुरुचरण की सेवा कर रहा हूँ। मुझे भी आपसे गले लगना है इसलिए आप यही आ कर बैठ जाओ। फिर उस औरत ने देखा कि चाल काम नही आ रहा है तो वापिस चली गई। रात्रि का तीसरा पहर बीता ओर इस बार तांत्रिक ने यमदूत रूप वाला राक्षस भेजा। राक्षस पहुँच कर उस शिष्य से बोला कि चल तुझे लेने आया हूँ तेरी मृत्यु आ गई है। उठ ओर चल... शिष्य भी झल्लाकर बोला-- काल हो या महाकाल मैं नही आने वाला ! अगर मेरी मृत्यु आई है तो यही आकर मेरे प्राण ले लो,लेकिन मैं गुरु के चरण नही छोडूंगा! फिर राक्षस भी उसका दृढ़। निश्चय देख कर वापिस चला गया। सुबह हुई चिड़ियां अपनी घोसले से निकलकर चिचिहाने लगी। सूरज भी उदय हो गया। गुरुदेव जी नींद से उठे और शिष्य से पूछा कि - सुबह हो गई क्या ? शिष्य बोला-- जी! गुरुदेव सुबह हो गई गुरुदेव - अरे! तुम्हारी तो मृत्यु होने वाली थी न, तुमने ही तो कहा था कि तांत्रिक का श्राप कभी व्यर्थ नही जाता। लेकिन तुम तो जीवित हो...!! गुरुदेव ने मुस्कराते हुए ऐसा बोला। शिष्य भी सोचते हुए कहने लगा - जी गुरुदेव, लग तो रहा हूँ कि जीवित ही हूँ। अब शिष्य को समझ में आई कि गुरुदेव ने क्यों कहा था कि --- *चाहे जो भी हो जाए चरण मत छोड़ना।* शिष्य गुरुदेव के चरण पकड़कर खूब रोने लगा बार बार मन ही मन यही सोच रहा था - *जिसके सिर उपर आप जैसे गुरु का हाथ हो तो उसे काल भी कुछ नही कर सकता है। *मतलब कि गुरु की आज्ञा पर जो शिष्य चलता है उससे तो स्वयं मौत भी आने से एक बार नही अनेक बार सोचती है।* *करता करें न कर सके, गुरु करे सो होय* *तीन-लोक,नौ खण्ड में गुरु से बड़ा न कोय* पूर्ण सद्गुरु में ही सामर्थ्य है कि वो प्रकृति के नियम को बदल सकते है जो ईश्वर भी नही बदल सकते, क्योंकि ईश्वर भी प्रकृति के नियम से बंधे होते है लेकिन पूर्ण सद्गुरु नही..!!

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Neha Sharma, Haryana Apr 11, 2021

✳️✳️*श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली*✳️✳️ ✳️✳️*पोस्ट - 148*✳️✳️ ✳️✳️*श्री रघुनाथदास जी का गृह त्याग*✳️✳️ *गुरुर्न स स्यात् स्वजनो न स स्यात् *पिता न स स्याज्जननी न सा स्यात्। *दैवं न तत् स्यान्न पतिश्च स *स्यान्न मोचयेद्य: समुपेतमृत्युम्॥ *सप्तग्राम के भूम्यधिकारी श्री गोवर्धनदास मजूमदार के पुत्र श्री रघुनाथदास जी को पाठक भूले न होंगे। शान्तिपुर में अद्वैताचार्य जी के घर पर ठहरे हुए प्रभु के उन्होंने दर्शन किये थे और प्रभु ने उन्हें मर्कट वैराग्य त्याग कर घर में ही रहते हुए भगवत-भजन करने का उपदेश दिया था और उनके गृहत्याग के अत्यन्त आग्रह करने पर प्रभु ने कह दिया था- 'अच्छा देखा जायगा। अब तो तुम घर चले आओ, हम शीघ्र ही वृन्दावन को जायँगे, यहाँ से लौटकर जब हम आ जायँ, तब जैसा उचित हो वैसा करना।' *अब जब रघुनाथ जी ने सुना की प्रभु व्रजमण्डल की यात्रा करके पुरी लौट आये हैं, तब तो वे चैतन्य चरणों के दर्शनों के लिये अत्यन्त ही लालायित हो उठे। उनका मन-मधुप प्रभु के पादप का मकरन्द पान करने के निमित्त पागल-सा हो गया, वे गौरांग का चिन्तन करते हुए ही समय को व्यतीत लगे। ऊपर से तो सभी संसारी कामों को करते रहते, किन्तु भीतर उनके हृदय में चैतन्य विरहजनित अग्नि जलती रहती। वे उसी समय सब कुछ छोड़-छाड़कर चैतन्य चरणों का आश्रय ग्रहण कर लेते, किन्तु उस समय उनके परिवार में एक विचित्र घटना हो गयी! *सप्तग्राम का ठेका पहले एक मुसलमान भूम्यधिकारी पर था। वही उस मण्डल का चौधरी था, उस पर से ही इन्हें इस इलाके का अधिकार प्राप्त हुआ था। वह प्रतिवर्ष आमदनी का चतुर्थांश अपने पास रखकर तीन अंश बादशाह के दरबार में जमा करता था। उस मण्डल की समस्त आमदनी बीस लाख रूपये सालना की थी। हिसाब से इन मजूमदार भाइयों को पंद्रह लाख राजदरबार में जमा करने चाहिये और पांच लाख अपने पास रखने चाहिये, किन्तु ये अपने कायस्थप ने के बुद्धि कौशल से बारह ही लाख जमा करते और आठ लाख स्वयं रख लेते। चिरकाल से ठेका इन्हीं पर रहने से इन्हें भूम्यधिकारी होने का स्थायी अधिकार प्राप्त हो जाना चाहिये था, क्योंकि बारह वर्ष में ठेका स्थायी हो जाता है, इस बात से उस पुराने चौधरी को चिढ़ हुई। उसने राजदरबार में अपना अधिकार दिखाते हुए इन दोनों भाइयों पर अभियोग चलाया और राजमन्त्री को अपनी ओर मिला लिया। इसीलिये इन्हें पकड़ने के लिये राजकर्मचारी आये। अपनी गिरफ्तारी समाचार सुनकर हिरण्यदास और गोवर्धनदास- दोनों भाई घर छोड़कर भाग गये। घर पर अकेले रघुनाथदास जी ही रह गये, चौधरी ने इन्हें ही गिरफ्तार करा लिया और कारावास में भेज दिया। *यहाँ इन्हें इस बात के लिये रोज डराया और धमकाया जाता था कि ये अपने ताऊ (पिता के बड़े भाई) और पिता का पता बता दें, किन्तु इन्हें उनका क्या पता था, इसलिये वे कुछ भी नहीं बता सकते थे। इससे क्रुद्ध होकर चौधरी इन्हें भाँति-भाँति की यातनाएँ देने की चेष्टा करता, बुद्धिमान और प्रत्युत्पन्नमति रघुनाथदास जी ने सोचा- 'ऐसे काम नहीं चलेगा। किसी-न-किसी प्रकार इस चौधरी को ही वश में करना चाहिये।' *ऐसा निश्चय करके वे मन-ही-मन उपाय सोचने लगे। एक दिन जब चौधरी इन्हें बहुत तंग करना चाहता था, तब इन्होंने स्वाभाविक स्नेह दर्शाते हुए अत्यन्त ही कोमल स्वर से कहा- 'चौधरी जी! आप मुझे क्यों तंग करते हैं? मेरे ताऊ, पिता और आप-तीनों भाई-भाई हैं। मैं अब तक तो आप तीनों को भाई ही समझता हूँ। आप तीनों भाई आपस में चाहे लड़ें या प्रेम से रहें, मुझे बीचे में क्यों तंग करते है? आप तो आज लड़ रहे हैं, कल फिर सभी भाई एक हो जायंगे। मैं तो जैसा उनका लड़का वैसा ही आपका लड़का। मैं तो आपको भी अपना बड़ा ताऊ ही समझता हूँ। आप कोई अनपढ़ तो हैं ही नहीं, सभी बातें जानते हैं। मेरे साथ ऐसा बर्ताव आपको शोभा नहीं देता।' *गुलाब के समान खिले हुए मुख से स्नेह और सरलता के ऐसे शब्द सुनकर चौधरी का कठोर हृदय भी पसीज गया। उसने अपनी मोटी-मोटी भुजाओं से रघुनाथदास जी को छाती से लगाया और आँखों में आंसू भरकर गद्गद कण्ठ से कहने लगा- 'बेटा ! सचमुच धन के लोभ से मैंने बड़ा पाप किया। तुम तो मरे सगे पुत्र के समान हो, आज से तुम मेरे पुत्र हुए। मैं अभी राजमन्त्री से कहकर तुम्हें छुड़वाये देता हूँ। तुम्हारे ताऊ और पिता जहाँ भी हों उन्हें खबर कर देना कि अब डर करने का कोई काम नहीं है। वे खुशी से अपने घर आकर रहें। 'यह कहकर उन्होंने राजमन्त्री से रघुनाथदास जी को मुक्त करा दिया। वे अपने घर आकर रहने लगे। अब तो उन्हें इस संसार का यथार्थ रूप मालूम पड़ गया। अब तक वे समझते थे कि इस संसार में सम्भवतया थोड़ा-बहुत सुख भी हो, किन्तु इस घटना से उन्हें पता चल गया कि संसार दु:ख और कलह का घर है। कहीं तो दीनता के दु:ख से दु:खी होकर लोग मर रहे हैं, कामपीड़ित हुए कामीजन कामिनियों के पीछे कुत्तों की भाँति घूम रहे हैं। कहीं कोई भाई से लड़ रहा है, तो किसी जगह पिता-पुत्र से कलह हो रहा है। कहीं किसी को दस-बीस गांवों की ज़मींदारी मिल गयी है या कोई अच्छी राजनौकरी या राजपदवी प्राप्त हो गयी है तो वह उसी के मद में चूर हुआ लोगों को तुच्छ समझ रहा है। *किसी की कविता की कलाकोविदों ने प्रशंसा कर दी है, तो वह अपने को ही उशना और वेदव्यास समझता है। कोई विद्या के मद में, कोई धन के मद में, कोई सम्पत्ति, अधिकार और प्रतिष्ठा के मद में चूर है। किसी का पुत्र मूर्ख है तो वह उसी की चिन्ता में सदा दु:खी बना रहता है। इसके विपरीत किसी का सर्वगुण सम्पन्न पुत्र है, तो उसे थोड़ा भी रोग होने से पिता का हृदय धड़कने लग जाता है, यदि कहीं वह मर गया तो फिर प्राणान्त के ही समान दु:ख होता है। ऐसे संसार में सुख कहाँ, शान्ति कहाँ, आनन्द तथा उल्लास कहाँ? यहाँ तो चारों ओर घोर विषण्णता, भयंकर दु:ख और भाँति-भाँति की चिन्ताओं का साम्राज्य है। सच्चा सुख तो शरीरधारी श्री गुरु के चरणों में ही है। उन्हीं के चरणों में जाकर परमशान्ति प्राप्त हो सकती है। जो प्रतिष्ठा नहीं चाहते, नेतृत्व नहीं चाहते, मान, सम्मान, बड़ाई और गुरुपने की जिनकी कामना नहीं है, जो इस संसार में नामी पुरुष बनने की वासना को एकदम छोड़ चुके हैं, उनके लिये गुरु चरणों के अतिरिक्त कोई दूसरा सुखकर, शान्तिकर, आनन्दकर तथा शीतलता प्रदान करने वाला स्थान नहीं है। इसलिये अब मैं संसारी भोगों से पूर्ण इस घर में नहीं रहूँगा। अब मैं श्रीचैतन्य चरणों का ही आश्रय ग्रहण करूँगा, उन्हीं की शान्तिदायिनी सुखमयी क्रोड में बालक की भाँति क्रीड़ा करूंगा। उनके अरुण रंगवाले सुन्दर तलुओं को अपनी जिह्वा से चाटूँगा और उसी अमृतोपम माधुरी से मेरी तृप्ति हो सकेगी। *चैतन्यचरणाम्बुजों की पावन पराग के सिवा सुख का कोई भी दूसरा साधन नहीं। यह सोचकर वे कई बार पुरी की ओर भगे भी, किन्तु धनी पिता ने अपने सुचतुर कर्मचारियों द्वारा इन्हें फिर से पकड़वा मंगवाया और सदा इनकी देख-रेख रखने के निमित्त दस-पांच पहरेदार इनके ऊपर बिठा दिये। अब ये बन्दी की तरह पहरों के भीतर रहने लगे। लोगों की आँख बचाकर ये क्षण भर को भी कहीं अकेले नहीं जा सकते। इससे इनकी विरह-व्यथा और भी अधिक बढ़ गयी। ये 'हा गौर! हा प्राणवल्लभ! 'कह-कहकर जोरों से रुदन करने लगते। कभी-कभी जोरों से रुदन करते हुए कहने लगते- 'हे हृदयरमण! इस वेदनापूर्ण सागर से कब उबारोगे? कब अपने चरणों की शरण दोगे? कब इस अधम को अपनाओगे? कब इसे अपने पास बुलाओगे ? किस समय अपनी मधुमयी अमृतवाणी से भक्ति-तत्त्व के सुधासिक्त वचनों इस हृदय की दहकती हुई ज्वाला को बुझाओगे। *हे मेरे जीवनसर्वस्व! हे मेरी बिना डाँड़की नौका के पतवार! मेरी जीर्ण-शीर्ण तरीके कैवर्तक प्रभो! मुझे इस अन्धकूप से बाँह पकड़कर बाहर निकालो।' इनके ऐसे बे-सिर-पैर के प्रलाप को सुनकर प्रेममयी माता को इनके लिये अपार दु:ख होने लगा। उन्होंने अपने पति, इनके पिता गोवर्धनदास मजूमदार से कहा- 'हमारे कुल का एकमात्र सहारा एक रघु पागल हो गया है। इसे बांधकर रखिये, ऐसा न हो यह कहीं भाग जाय।' *पिता ने मार्मिक स्वर में आह भरते हुए कहा- 'रघु को दूसरे प्रकार का पागलपन है। वह संसारी बन्धन को छिन्न-भिन्न करना चाहता है। रस्सी से बाँधने से यह नहीं रुकने का। जिसे कुबेर के समान अतुल सम्पत्ति, राजा के समान अपार सुख, अप्सरा के समान सुन्दर स्त्री और भाग्यहीनों को कभी प्राप्त न होने वाला अतुलनीय ऐश्वर्य ही जब घर में बांध ने को समर्थ नहीं है, उसे बेचारी रस्सी कितने दिनों बांधकर रख सकती है?' माता अपने पति के उत्तर से और पुत्र के पागलपन से अत्यन्त ही दु:खी हुई। पिता भलीभाँति रघुनाथ पर दृष्टि रखने लगे। *उन्हीं दिनों श्रीपाद नित्यानन्द जी ग्रामों में घूम-घूमकर संकीर्तन की धूम मचा रहे थे। वे चैतन्य प्रेम में पागल बने अपने सैकड़ों भक्तों को साथ लिये इधर-उधर घूम रहे थे। उनके उद्दण्ड नृत्य को देखकर लोग आश्चर्यचकित हो जाते, चारों ओर उनके यश और कीर्ति की धूम मच गयी। हजारों, लाखों मनुष्य नित्यानन्द प्रभु के दर्शनों के लिये आने लगे। उन दिनों गौड़ देश में 'निताई' के नाम की धूम थी। अच्छे-अच्छे सेठ-साहूकार और भूम्यधिपति इनके चरणों में आकर लोटते और ये उनके मस्तकों पर निर्भय होकर अपना चरण रखते, वे कृतकृत्य होकर लौट जाते। लाखों रूपये भेंट में आने लगे। नित्यानन्द जी खूब उदारतापूर्वक उन्हें भक्तों में बांटने लगे और सत्कर्मों में द्रव्य को व्यय करने लगे। पानीहाटी संकीर्तन का प्रधान केन्द्र बना हुआ था। वहाँ के राघव पण्डित महाप्रभु तथा नित्यानन्द जी के अनन्य भक्त थे। नित्यानन्द जी उन्हीं के यहाँ अधिक ठहरते थे। रघुनाथ जी जब नित्यानन्द जी का समाचार सुना तो वे पिता की अनुमति लेकर बीसों सेवकों के साथ पानीहाटी में उनके दर्शनों के लिये चल पड़े। उन्होंने दूर से ही गंगा जी के किनारे बहुत-से भक्तों से घिरे हुए देवराज इन्द्र के समान देदीप्यमान उच्चासन पर बैठे हुए नित्यानन्द जी को देखा। उन्हें देखते ही इन्होंने भूमि पर लोटकर साष्टांग प्रणाम किया। किसी भक्त ने कहा- श्रीपाद! हिरण्य मजूमदार के कुँवर शाह रघुनाथदास जी आये हैं, वे प्रणाम कर रहे हैं।' *'खिलखिलाते हुए नित्यानन्द जी ने कहा- 'अहा! रघु आया है? आज यह चोर जेल में से कैसे निकल भागा? इसे यहाँ आने की आज्ञा कैसे मिल गयी? फिर रघुनाथदास जी की ओर देखकर कहने लगे- 'रघु! आ, यहाँ आकर मेरे पास बैठ।' *हाथ जोड़े हुए अत्यन्त ही विनीत भाव से डरते-से सिकुड़े हुए रघुनाथदास जी सभी भक्तों के पीछे जूतियों में बैठ गये। नित्यानन्द जी ने अब रघुनाथदास जी पर अपनी कृपा की। महापुरुष धनिकों को यदि किसी काम के करने की आज्ञा दें, तो उसे उनकी परम कृपा ही समझनी चाहिये। क्योंकि धन अनित्य पदार्थ है और फिर यह एक के पास सदा स्थायी भी नहीं रहता। महापुरुष ऐसी अस्थिर वस्तु को अपनी अमोघ आज्ञा प्रदान कर स्थिर और सार्थक बना देते हैं। धन का सर्वश्रेष्ठ उपयोग ही यह है कि उसका व्यय महापुरुषों की इच्छा से हो, किन्तु सुयोग सभी के भाग्य में नहीं होता। किसी भाग्यशाली को ऐसा अमूल्य और दुर्लभ अवसर प्राप्त हो सकता है। *नित्यानन्द जी के कहने से रघुनाथदास जी ने दो-चार हजार रूपये ही खर्च किये होंगे, किन्तु इतने ही खर्च से उनका वह काम अमर हो गया और आज भी प्रतिवर्ष पानीहाटी में 'चूराउत्सव उनके इस काम की स्मृति दिला रहा है। लाखों मनुष्य उन दिनों रघुनाथदास जी के चिउरों का स्मरण करके उनकी उदारता और त्यागवृत्ति को स्मरण करके गद्गद कण्ठ से अश्रु बहाते हुए प्रेम में विभोर होकर नृत्य करते हैं। महामहिम रघुनाथदास जी सौभाग्यशाली थे, तभी तो नित्यानन्द जी ने कहा- 'रघु! आज तो तुम बुरे फंसे, अब यहाँ से सहज में ही नहीं निकल सकते। मेरे सभी साथी भक्तों को आज दही-चिउरा खिलाना होगा। 'बंगाल तथा बिहार में चिउरा को सर्वश्रेष्ठ भोजन समझते हैं! पता नहीं, वहाँ के लोगों को उनमें क्या स्वाद आता है? चिउरा कच्चे धानों को कूटकर बनाये जाते हैं और उन्हें दही में भिगोकर खाते हैं। बहुत-से लोग दूध में भी चिउरा खाते हैं। दही-चिउरा ही सर्वश्रेष्ठ भोजन है। इसके दो भेद हैं- दही-चिउरा और 'चिउरा-दही'। जिसमें चिउरा के साथ यथेष्ट दही-चीनी दी जाय उसे तो 'दही-चिउरा' कहते हैं और जहाँ दही-चीनी का संकोच हो और चिउरा अधिक होने के कारण पानी में भिगोकर दही-चीनी में मिलाये जायँ वहाँ उन्हें 'चिउरा-दही' कहते हैं। बहुत-से लोग तो पहले चिउरों को दूध में भिगो लेते हैं, फिर उन्हें दही-चीनी से खाते हैं। अजीब स्वाद है। भिन्न-भिन्न प्रान्तों के भिन्न-भिन्न पदार्थों के साथ स्वाद भी भिन्न-भिन्न हैं। एक बात और। चिउरों में छूत-छात नहीं। जो ब्राह्मण किसी के हाथ की बनी पूड़ी तो क्या फलाहारी मिठाई तक नहीं खाते वे भी 'दही-चिउरा, अथवा' चिउरा-दही' को मजे में खा लेते हैं। *नित्यानन्द जी की आज्ञा पाते ही रघुनाथदास जी ने फौरन आदमियों को इधर-उधर भेजा। बोरियों में भरकर मनों बढिया चिउरा आने लगे। इधर-उधर से दूध-दही के सैकड़ों घड़ों को सिर पर रखे हुए सेवक आ पहुँचे। जो भी सुनता वही चिउरा-उत्सव देखने के लिये दौड़ा आता। इस प्रकार थोड़ी ही देर में वहाँ एक बड़ा भारी मेला-सा लग गया। चारों ओर मनुष्यों के सिर-ही-सिर दीखते थे। सामने सैकड़ों घड़ों में दूध-दही भरा हुआ रखा था। हजारों बड़े-बड़े मिट्टी के कुल्हड़ दही-चिउरा खाने के लिये रखे थे। दूध और दही के अलग-अलग चिउरा भिगोये गये। दही में कपूर, केसर आदि सुगन्धित द्रव्य मिलाये गये; केला, सन्देश, नारिकेल आदि भी बहुत-से मंगाये गये। जो भी वहाँ आया सभी को दो-दो कुल्हड़ दिये गये। नित्यानंद ने महाप्रभु का आह्वान किया किया। नित्यानंद जी ऐसा प्रतीत हुआ, मानो प्रत्यक्ष श्रीचैतन्य चिउरा-उत्सव देखने के लिए आये हैं। उन्होंने उनके के लिए अलग पात्रों में चिउरा परोसे और 'हरि-हरि' ध्वनि के साथ सभी को प्रसाद पाने की आज्ञा दी। पचासों आदमी परोस रहे थे। जिसे जहाँ जगह मिली, वह वहीं बैठकर प्रसाद पाने लगा, सभी को उस दिन के चिउरों में एक प्रकार के दिव्य स्वाद का अनुभव हुआ, सभी ने खूब तृप्त हो कर प्रसाद पाया। शाम तक जो भी आता रहा, उसे ही प्रसाद देते रहे। रघुनाथदास जी को नित्यानंद जी का उच्छिष्ट प्रसाद मिला। उस दिन राघव पण्डित के यहाँ नित्यानंद जी का भोजन बना था। उसे सभी भक्तों ने मिलकर शाम को पाया। रघुनाथदास उस दिन वहीं राघव पण्डित के घर रहे। *दूसरे दिन उन्होंने नित्यानंदजी के चरणों मे प्रणाम करके उनसे आज्ञा माँगी। नित्यानन्द जी ने 'चैतन्यचरणप्राप्ति' का आशीर्वाद दिया। इस आशीर्वाद को पाकर रघुनाथदास जी को परम प्रसन्नता हुई। उन्होंने राघव पण्डित को बुलाया और भक्तों को कुछ भेंट करने की इच्छा प्रकट की। राघव पण्डित ने उन्हें सहर्ष सम्मति दे दी। तब रघुनाथ जी ने नित्यानंद जी के भण्डारी को बुलाकर सौ रुपये और सात तौला सोना नित्यानन्द जी के लिए दे दिया और उसे कहे दिया कि हम चले जायँ, तब प्रभु यह बात प्रकट हो। फिर सभी भक्तों को बुलाकर यथायोग्य उन्हें दस, पाँच, बीस या पचास रुपये भेंट दे-देकर सभी की चरणवंदना की। चलते समय राघव पण्डित को भी वे सौ रुपये और दो तौला सोना दे गये। इस प्रकार यथायोग्य पूजा करके रघुनाथदास जी अपने घर लौट आये। *वे शरीर से तो लौट आये, किंतु उनका मन नीलाचल में प्रभु के पास पहुँच गया। अब उन्हें नीलाचल के सिवा कुछ सुझता ही नही था। जब उन्होंने सुना कि गौड़ देश के सैकड़ों भक्त सदा की भाँति रथ यात्रा के उपलक्ष्य से श्रीचैतन्य-चरणों में चार महीने निवास करने के निमित्त नीलाचल जा रहे हैं, तब तो उनकी उत्सुकता परिधि को पार कर गयी, किंतु वे सबके साथ प्रकटरूप से नीलाचल जा ही कैसे सकते थे? इसलिये वे किसी दिन एकान्त में छिपकर घर से भागने का उद्योग करने लगे। समय आने पर प्रारब्ध सभी सुरोगों को स्वयं ही लाकर उपस्थित कर देता है। एक दिन अरुणोदय के समय रघुनाथ जी के गुरु तथा आचार्य यदुनंदन जी उनके पास आये। *प्रभु ने हंसकर कहा-'कहीं अपने दुष्कर्म का फल भोग रहा होगा।' तब उन्होंने उस वैष्णव के मुख से जो बात सुनी थी, वह कह सुनायी। इसके पूर्व ही भक्तों को हरिदास जी की आवाज एकान्त में प्रभु के समीप सुनायी दी थी, मानो वे सूक्ष्म-श्रीर से प्रभु को गायन सुना रहे हों। तब बहुतों ने यही अनुमान किया था कि हरिदास ने विष खाकर या और किसी भाँति आत्मघात कर लिया है और उसी के परिणामस्वरूप उसे प्रेतयोनि प्राप्त हुई है या ब्रह्मराक्षस हुआ है, उसी शरीर से वह प्रभु को गायन सुनाता है। किन्तु कई भक्तों ने कहा- 'जो इतने दिन प्रभु की सेवा में रहा हो और नित्य श्री कृष्ण कीर्तन करता रहा हो, उसकी ऐसी दुर्गति होना सम्भव नहीं। अवश्य ही वह गन्धर्व बनकर अलक्षित भाव से प्रभु को गायन सुना रहा है। 'आज श्रीवास पण्डित से निश्चित रूप से हरिदास जी की मृत्यु का समाचार सुनकर सभी को परम आश्चर्य हुआ और सभी उनके गुणों का बखान करने लगे। प्रभु ने दृढ़ता युक्त प्रसन्नता के स्वर में कहा-'साधु होकर स्त्रियों से संसर्ग रखने वालों को ऐसा ही प्रायश्चित ठीक भी हो सकता है। हरिदास ने अपने पाप के उपयुक्त ही प्रायश्चित किया।' *नित्यानन्द ने महाप्रभु का आह्मन किया! नित्यानन्द जी को ऐसा प्रतीत हुआ, मानो प्रत्यक्ष श्री चैतन्य चिउरा-उत्सव देखने के लिये आये हैं। उन्होंने उनके लिये अलग पात्रों में चिउरा परोसे और 'हरि-हरि' ध्वनि के साथ सभी को प्रसाद पाने की आज्ञा दी। पचासों आदमी परोस रहे थे। जिसे जहाँ जगह मिली, वही वहीं बैठकर प्रसाद पाने लगा, सभी को उस दिन के चिउरों में एक प्रकार के दिव्य स्वाद का अनुभव हुआ, सभी ने खूब तृप्त होकर प्रसार पाया। शाम तक जो भी आता रहा, उसे ही प्रसाद देते रहे। रघुनाथदास जी को नित्यानन्द जी का उच्छिष्ट प्रसार मिला। उस दिन राघव पण्डित के यहाँ नित्यानन्द जी का भोजन बना था। उसे सभी भक्तों ने मिलकर शाम को पाया। रघुनाथदास उस दिन वहीं राघव पण्डित के घर रहे। *दूसरे दिन उन्होंने नित्यानन्द जी के चरणों में प्रणाम करके उनसे आज्ञा मांगी। नित्यानन्द जी ने 'चैतन्यचरणप्राप्ति' का आशीर्वाद दिया। इन आशीर्वाद को पाकर रघुनाथदास जी को परम प्रसन्नता हुई। उन्होंने राघव पण्डित को बुलाया और भक्तों को कुछ भेंट करने की इच्छा प्रकट की। राघव पण्डित उन्हें सहर्ष सम्मति दे दी। तब रघुनाथदास जी ने नित्यानन्द के भण्डारी को बुलाकर सौ रूपये और सात तोला सोना नित्यानन्द जी के लिये दिया और उससे कह दिया कि हम चले जाये, तब प्रभु पर यह बात प्रकट हो। फिर सभी भक्तों को बुलाकर यथायोग्य उन्हें दस, पांच, बीस या पचास रूपये भेंट दे-देकर सभी की चरणवन्दना की। चलते समय राघव पण्डित को भी वे सौ रूपये और दो तोला सोना दे गये। इस प्रकार सभी की यथायोग्य पूजा करके रघुनाथदास जी अपने घर लौट आये। *वे शरीर से तो लौटा आये, किन्तु उनका मन नीलाचल में प्रभु के पास पहुँच गया। अब उन्हें नीलाचल के सिवा कुछ सूझता नहीं था। जब उन्होंने सुना कि गौड़ देश के सैकड़ों भक्त सदा की भाँति रथ यात्रा के उपलक्ष्य से श्रीचैतन्य-चरणों में चार महीने निवास करने के निमित्त नीलाचल जा रहे हैं, तब तो उनकी उत्सुकता परिधि को पार कर गयी, किन्तु वे सबके साथ प्रकट रूप से नीलाचल जा ही कैसे सकते थे? इसलिये वे किसी दिन एकान्त में छिपकर घर से भागने का उद्योग करने लगे। *समय आने पर प्रारब्ध सभी सुयोगों को स्वयं ही लाकर उपस्थित कर देता है। एक दिन अरुणोदय के समय रघुनाथ जी के गुरु तथा आचार्य यदुनन्दन जी उनके पास आये। उन्हें देखते ही रघुनाथदास जी ने उन्हें भक्ति भाव से प्रणाम किया। आचार्य ने स्नेह के साथ इनके कन्धे पर हाथ रखकर कहा- 'भैया रघु! तुम उस पुजारी को क्यों नही समझाते? वह चार-पांच दिन से हमारे यहाँ पूजा करने आया ही नहीं। यदि वह नहीं कर सकता तो किसी दूसरे ही आदमी को नियुक्त कर दो' *धीरे-धीरे रघुनाथदास जी ने कहा- 'नहीं, मैं उसे समझा दूंगा।' यह कहकर वे धीरे-धीरे आचार्य के साथ चलने लगे। उनके साथ-ही-साथ वे बड़े फाटक से बाहर आ गये। प्रात:काल समझकर रात्रि जगे हुए पहरेदार सो गये थे। रघुनाथदास जी को बाहर जाते हुए किसी ने नहीं देखा। जब वे बातें करते-करते यदुनन्दनाचार्य जी के घर के समीप पहुँच गये तब उन्होंने धीरे से कहा- 'अच्छा, तो मैं अब जाऊं?' *कुछ सम्भ्रम के साथ आचार्य ने कहा- 'हाँ, हाँ, तुम जाओ। लो, मुझे पता भी नहीं, तुम बातों-ही-बातों में यहाँ तक चले आये! तुम अब जाकर जो करने योग्य कार्य हों, उन्हें करो। 'बस, इसे ही वे गुरु-आज्ञा समझकर और अपने आचार्य महाराज की चरणवन्दना करके रास्ते को बचाते हुए एक जंगल की ओर हो लिये। *जो शरीर पर पहने थे, वही एक वस्त्र था। पास में न पानी पीने को पात्र था और न मार्गव्यय के लिये एक पैसा। बस, चैतन्यचरणों का आश्रय ही उनका पावन पाथेय था। उसे ही कल्पतरु समझकर वे निश्चिन्त भाव से पगडण्डी के रास्ते से चल पड़े। धूप-छांह की कुल भी परवा न करते हुए वे बिना खाये-पीये 'गौर-गौर' कहकर रुदन करते हुए जा रहे थे। जो घर के पास के बगीचे में भी पालकी से ही जाते थे, जिन्होंने कभी कोस भर भी मार्ग पैदल तय नहीं किया था, वे ही गोवर्धनदास मजूमदार के इकलौते लाड़िले लड़ैते लड़के कुवँर रघुनाथदास आज पंद्रह कोस- 30 मील शाम तक चले और शाम को एक ग्वाले के घर में पड़ रहे। भूख-प्यास का इन्हें ध्यान नहीं था। ग्वाले ने थोड़ा-सा दूध लाकर इन्हें दे दिया, उसे ही पीकर ये सो गये और प्रात:काल बहुत ही सवेरे फिर चल पड़े। वे सोचते थे, यदि पुरी जाने वाले वैष्णवों ने भी हमें देख लिया तो फिर हम पकड़े जायँगे। इसीलिये वे गांवों में न होकर पगडण्डी के रास्ते से जा रहे थे। *इधर प्रात:काल होते ही रघुनाथदास जी खोज होने लगी। रघुनाथ यहाँ, रघुनाथ वहाँ, यही आवाज चारों ओर सुनायी देने लगी। किन्तु रघुनाथ यहाँ वहाँ कहाँ? वह तो जहाँ का था वहाँ ही पहुँच गया। अब झींखते रहो। माता छटपटाने लगी, स्त्री सिर पीटने लगी, पिता आँखें मलने लगे, ताऊ बेहोश होकर भूमि पर गिर पड़े। उसी समय गोवर्धनदास मजूमदार ने पांच घुड़सवारों को बुलाकर उनके हाथों शिवानन्द सेन के पास एक पत्री पठायी कि 'रघु घर से भागकर तुम्हारे साथ पुरी जा रहा है। उसे फौरन इन लोगों के साथ लौटा दो।' घुड़सवार पत्री लेकर पुरी जाने वाले वैष्णवों के पास रास्ते में पहुँचे। पत्र पढ़कर सेन महाशय ने उत्तर लिख दिया- रघुनाथदास जी हमारे साथ नहीं आये हैं, न हमसे उनका साक्षात्कार ही हुआ। यदि वे हमें पुरी मिलेंगे तो हम आपको सूचित करेंगे।' उत्तर लेकर नौकर लौट आये। पत्र को पढ़कर रघुनाथदास जी के सभी परिवार के प्राणी शोकसागर में निमग्न हो गये। *इधर रघुनाथदास जी मार्ग की कठिनाईयों की कुछ परवा न करते हुए भूख-प्यास और सर्दी-गर्मी से उदासीन होते हुए पचीस-तीन दिन के मार्ग को केवल बारह दिनों में ही तय करके प्रभुसेवित श्री नीलाचंलपुरी में जा पहुँचे। उस समय महाप्रभु श्री स्वरूपादि भक्तों के सहित बैठे हुए कृष्ण कथा कर रहे थे। उसी समय दूर से ही भूमि पर लेटकर रघुनाथदास जी ने प्रभु के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया। सभी भक्त सम्भ्रम के सहित उनकी ओर देखने लगे। किसी ने उन्हें पहचाना ही नहीं। रास्ते की थकान और सर्दी-गर्मी के कारण उनका चेहरा एकदम बदल गया था। मुकुन्द ने पहचाकर जल्दी से कहा- प्रभो! रघुनाथदास जी हैं।' *प्रभु ने अत्यन्त ही उल्लास के साथ कहा-'हां, रघु आ गया? बड़े आनन्द की बात है।' यह कहरक प्रभु ने उठकर रघुनाथदास जी का आलिंगन किया। प्रभु का प्रेमालिंगन पाते ही रघुनाथदास जी की सभी रास्ते की थकान एकदम मिट गयी। वे प्रेम में विभोर होकर रुदन करने लगे, प्रभु अपने कोमल करों से उनके अश्रु पोंछते हुए धीरे-धीरे उनके सिर पर हाथ फेरने लगे। प्रभु के सुखद स्पर्श से सन्तुष्ट होकर रघुनाथदास जी ने उपस्थित सभी भक्तों के चरणों में श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया और सभी ने उनका आलिंगन किया। रघुनाथदास जी के उतरे हुए चेहरे को देखकर प्रभु ने स्वरूप दामोदर जी से कहा-'स्वरूप! देखते हो न, रघुनाथ कितने कष्ट से यहाँ आया है। इसे पैदल चलने का अभ्यास नहीं है। बेचारे को क्या काम पड़ा होगा? इनके पिता और ताऊ को तो तुम जानते ही हो। चक्रवर्ती जी (प्रभु के पूर्वाश्रम के नाना श्री नीलाम्बर चक्रवर्ती)-के साथ उन दोनों का भ्रातृभाव का व्यवहार था, इसी सम्बन्ध से ये दोनों भी हमें अपना देवता करके ही मानते हैं। घोर संसारी हैं। वैसे साधु-वैष्णवों की श्रद्धा के साथ सेवा भी करते हैं, किन्तु उनके लिये धन-सम्पत्ति ही सर्वश्रेष्ठ वस्तु है। वे परमार्थ से बहुत दूर हैं। रघुनाथ के ऊपर भगवान ने परम कृपा की, जो इसे उस अन्धकूप से निकालकर यहाँ ले आये। *रघुनाथदास जी ने धीरे-धीरे कहा- 'मैं तो इसे श्रीचरणों की ही कृपा समझता हूँ, मेरे लिये तो ये ही युगलचरण सर्वस्व हैं।' *महाप्रभु ने स्नेह के स्वर में स्वरूप गोस्वामी से कहा-'रघुनाथ को आज से मैं तुम्हें ही सौंपता हूँ। तुम्हीं आज से इनके पिता, माता, भाई, गुरु और सखा सब कुछ हो। आज से मैं इस 'स्वरूप का रघु' कहा करूंगा।' *यह कहकर प्रभु ने रघुनाथदास जी का हाथ पकड़कर स्वरूप के हाथ में दे दिया। रघुनाथदास जी ने फिर से स्वरूप दामोदर जी के चरणों में प्रणाम किया और स्वरूप गोस्वामी ने भी उन्हें आलिंगन किया। *उसी समय गोविन्द ने धीरे से रघुनाथ को बुलाकर कहा-'रास्ते में न जाने कहाँ पर कब खाने को मिला होगा, थोड़ा प्रसाद पा लो।' रघुनाथ जी ने कहा,'समुद्रस्नान और श्री जगन्नाथ जी के दर्शनों के अनन्तर प्रसाद पाऊंगा।' *यह कहकर वे समुद्रस्नान करने चले गये और वहीं से श्री जगन्नाथ जी के दर्शन करते हुए प्रभु के वासस्थान पर लौटा आये। महाप्रभु के भिक्षा कर लेने पर गोविन्द प्रभु का उच्छिष्ट महाप्रसाद रघुनाथदास जी को दिया। प्रभु का प्रसादी महाप्रसाद पाकर रघुनाथ जी वहीं निवास करने लगे। गोविन्द उन्हें नित्य महाप्रसाद दे देता था और ये उसे भक्ति-भाव से पा लेते थे। इस प्रकार ये घर छोड़कर विरक्त-जीवन बिताने लगे। *श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::----------

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Neha Sharma, Haryana Apr 11, 2021

✳️✳️*श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली*✳️✳️ ✳️✳️*पोस्ट - 146*✳️✳️ ✳️✳️*प्रभु का पुरी में भक्तों से पुनर्मिलन*✳️✳️ *अद्यास्मांक सफलमभवज्जन्म नेत्रे कृतार्थे *सर्वस्ताप: सपदि वरितो निर्वृतिं प्राप चेत:। *किं वा ब्रूमो बहुलमपरं पश्य जन्मान्तरं नो *वृन्दारण्यात् पुनरूपगतो नीलशैलं यतीन्द्र:॥ *'संन्यासिचूडामणि श्रीचैतन्य वृन्दावन से लौटकर पुन: नीलाचल आ गये हैं- इस सुखद संवाद के श्रवणमात्र से ही गौर भक्तों में अपार आनन्द छा गया। वे परस्पर प्रसन्नता प्रकट करते हुए एक-दूसरे का आलिंगन करने लगे। कोई जल्दी से दौड़कर कानों में अमृत का सिंचन करने वाले इस प्रिय समाचार को दूसरे से कहता, वह तीसरे के पास दौड़ा जाता। इसी प्रकार क्षण भर में यह संवाद सम्पूर्ण जगन्नाथपुरी में फैल गया। महाप्रभु जब वृन्दावन को जा रहे थे, तभी सब भक्तों ने समझ लिया था कि प्रभु के अन्तिम दर्शन हैं। जो वृन्दावन का नाम सुनते ही मूर्च्छित हो जाते हैं, जिनकी दृष्टि में वृन्दावन से बढ़ाकर विश्व ब्रह्माण्ड में कोई उत्तम स्थान ही नहीं हैं, वे वृन्दावन पहुँचकर फिर वहाँ से क्यों लोटने लगे? अब तो प्रभु वृन्दावनवास करते हुए उस बाँकेविहारी के साथ निरन्तर आनन्दविहार में ही निमग्न रहेंगे, किन्तु जब भक्तों ने सुना, प्रभु वृन्दावन से लौट आये हैं, तब तो उनके आनन्द की सीमा नहीं रही और सभी प्रेमोन्मत्त होकर संकीर्तन करते हुए एक स्थान पर एकत्रित होने लगे। सभी मिलकर प्रभु को लेने चले। सार्वभौम भट्टाचार्य और राय रामानन्द जी उन सभी भक्तों के अग्रणी थे। उन्होंने दूर से देखा, काषायाम्बर धारण किये हुए प्रभु श्री हरि के मधुर नामों का उच्चारण करते-करते मत्त गजेन्द्र की भाँति आनन्द में विभोर हुए श्री मन्दिर की ओर चले आ रहे हैं, तब तो सभी ने भूमि में लोटकर प्रभु के पादपद्मों में प्रणाम किया। अपने पैरों के नीचे पड़े सभी भक्तों को प्रभु ने अपने कोमल करों से स्वयं उठाया और सभी को एक-एक करके छाती से लगाया। आज चिरकाल के अनन्तर प्रभु का प्रेमालिंगन प्राप्त करके सभी को परम प्रसन्नता हुई और सभी अपने सौभाग्य की सराहना करने लगे। *भक्तों को साथ लेकर प्रभु श्री जगन्नाथ जी के दर्शनों के लिये गये। पुजारी ने प्रभु को देखते ही उनके चरणों में प्रणाम किया और उन्हें जगन्नाथ जी की प्रसादी माला पहनायी तथा उनके सम्पूर्ण शरीर पर प्रसादी चन्दन का दर्शन करके भक्त लेप किया। आज चिरकाल में जगन्नाथ जी के दर्शन करके भक्त-चूड़ामणि श्री गौरांग प्रेम में विह्वल होकर जोरों से रुदन करने लगे। भक्तों ने मन्दिर के श्री आँगन में ही संकीर्तन आरम्भ कर दिया। नर्तकों के अग्रणी श्री चैतन्य देव दोनों हाथों को ऊपर उठा-उठाकर नृत्य करने लगे। *महाप्रभु के नृत्य को देखने के लिये लोगो की अपार भीड़ वहाँ आकर एकत्रित हो गयी। सभी प्रभु के उद्दण्ड नृत्य को देखकर अपने आपेको भूल गये और भावावेश में आकर सभी- *हरिहरये नम: कृष्णयादवाय नम:। *गोपाल गोविन्द राम श्री मधुसूदन॥ *कह कहकर नृत्य करने लगे। कुछ काल के अनन्तर प्रभु ने संकीर्तन बंद कर दिया और आप श्री मन्दिर की प्रदक्षिणा करते हुए भक्तों के सहित काशी मिश्र के घर अपने पूर्व के निवास स्थान पर आये। मिश्र जी ने प्रभु के पादपद्मों में प्रणाम किया इतने में ही परमानन्दपुरी प्रभु का आगमन सुनकर भीतर से बाहर निकल आये। प्रभु ने श्रद्धा पूर्वक पुरी के चरणों में प्रणाम किया। पुरी महाराज ने प्रभु का आलिंगन किया और वे हाथ पकड़कर भीतर ले गये। सभी के बैठ जाने पर प्रभु अपनी यात्रा का वृत्तान्त बताने लगे। व्रजमण्डल की बातें करते-करते उनका गला भर आया, नेत्रों से अश्रु धारा बहने लगी। तब सार्वभौम ने प्रभु से अपने यहाँ भिक्षा करने की प्रार्थना की। *प्रभु ने कहा- ‘भट्टाचार्य महाशय! आज चिरकाल में तो मेरी भक्तों से भेंट हुई हैं, तिस पर भी मैं अकेला ही भिक्षा करूँ, यह मुझे अच्छा नहीं प्रतीत होता। आज तो मेरी इच्छा है कि अपने सभी भक्तों के सहित यहीं भगवान का प्रसाद पाऊं।’ इस बात से भट्टाचार्य बड़ी प्रसन्नता हुई। वे काशी मिश्र, वाणीनाथ तथा और भी दो-चार भक्तों को साथ लेकर महाप्रसाद लेने चले। सभी भक्तों के खाने योग्य बहुत बढ़िया-बढ़िया बहुत-सी प्रसादी-वस्तुएं भट्टाचार्य जी ने वहाँ लाकर उपस्थित कर दीं। प्रभु ने भक्तों को साथ लेकर बड़े ही स्नेह के सहित भगवान का प्रसाद पाया। प्रभु के पास प्रसाद पाने से सभी को परम प्रसन्नता प्राप्त हुई, सभी अपने-अपने भाग्य की प्रशंसा करने लगे। प्रसाद पाकर प्रभु विश्राम करने लगे और भक्त अपने-अपने घरों को चले गये। *इधर स्वरूप गोस्वामी ने दामोदर पण्डित के हाथों प्रभु के आगमन का सुखद संवाद नवद्वीप में शची माता, विष्णुप्रिया तथा अन्यान्य सभी भक्तों के समीप पठाया। प्रभु के आगमन का संवाद सुनकर गौर भक्त आनन्द के सहित नृत्य करने लगे। वे जल्दी-जल्दी रथयात्रा के समय की प्रतीक्षा करने लगे। श्री शिवानन्द सेन समाचार सुनते ही यात्रा की तैयारियाँ करने लगे। शान्तिपुराधीश श्री अद्वैताचार्य अपने सभी भक्तों के सहित नीलाचल के लिये तैयार हुए। श्रीखण्ड, कुलियाग्राम, कांचनापाड़ा, कुमारहट्ट, शान्तिपुर तथा नवद्वीप के सैकड़ो भक्त प्रभुदर्शनों की लालसा से चले। सदा की भाँति श्री शिवानन्द सेन जी ने ही सबकी यात्रा का प्रबन्ध किया। सभी भक्त तथा भक्तों की स्त्रियाँ प्रभु के निमित्त भाँति-भाँति के पदार्थ लेकर और विष्णुप्रिया तथा शचीमाता से आज्ञा आज्ञा माँगकर प्रभु के दर्शनों के निमित्त रथयात्रा को उपलक्ष्य बनाकर पैदल ही पुरी की ओर चल दिये। *अब के शिवानन्द जी के साथ उनका कुत्ता भी चला। उन्होंने उसे बहुत रोका, किन्तु वह किसी प्रकार भी न रुका, तब तो सेन महाशय उसे भोजन कराते हुए साथ-ही-साथ ले चले। रास्ते में घाट वालों ने कुत्ते को पार उतारने में कई जगह आपत्ति भी की, किन्तु सेन महाशय प्रचुर द्रव्य देकर उसे जिस किसी भाँति उसे पार करा ही ले गये। एक दिन उन्हें घाट वालों से उतराई का हिसाब करते-करते बहुत देर हो गयी। उनके नौकर कुत्ते को भात देना भूल ही गये। इससे कुत्ता क्रद्ध होकर और इन सबका साथ छोड़कर न जाने किधर चला गया। जब शिवानन्द जी ने कुत्ते की खोज करायी तो उसका कहीं भी पता नहीं चला, इससे उन्हें अपार दु:ख हुआ। *दूसरे दिन सभी भक्त प्रभु के समीप पहुँचे। भक्तों ने देखा कि वही कुत्ता प्रभु के समीप बैठा और प्रभु उसे अपने हाथ से खीर खिला रहे हैं, और हंसते-हंसते उससे कह रहे हैं- *कृष्ण कहो, राम कहो, हरि भजो बावरे। *हरिे के भजन बिनु खाओगे क्या पामरे॥ *प्रभु की मधुर वाणी को सुनकर कुत्ता प्रेमपूर्वक पूँछ हिलाता हुआ अपनी भाषा में राम, कृष्ण, हरि आदि भगवान के सुमधुर नामों का कीर्तन कर रहा था। शिवानन्द सेन उस कुत्ते को प्रभु के पास बैठ देखकर परम आश्चर्य करे लगे। वह कुत्ता पहले सभी जगन्नाथपुरी में नहीं आया था और न उसने प्रभु का निवास स्थान देखा था, फिर यह अकेला ही यहाँ कैसे आ गया? सेन महाशय समझ गये कि यह कोई पूर्व जन्म का सिद्ध हैं, किसी कारणवश इसे कुत्ते की योनि प्राप्त हो गयी है। तभी तो प्रभु इसे इतना अधिक प्यार कर रहे हैं, यह सोचकर उन्होंने कुत्ते को साष्टांग प्रणाम किया। कुत्ता पूँछ हिलाता हुआ वहाँ से कही अन्यत्र चला गया। इसके अनन्तर फिर किसी ने उस कुत्ते को नहीं देखा। *महाप्रभु सभी भक्तों से मिले। भक्तों की पत्नियों ने प्रभु को दूरे से ही प्रणाम किया। प्रभु स्त्रियों की ओर न तो कभी देखते थे, न उनका स्पर्श करते थे और न स्त्रियों के सम्बन्ध की बातें ही सुनते थे। स्त्रियों का प्रसंग छिड़ते ही प्रभु अत्यन्त ही संकुचित हो जाते और प्रसंग को जल्दी-से-जल्दी समाप्त कर देते। *नवद्वीप में प्रभु के घर के समीप परमेश्वर नाम का एक भक्त रहता था। वह लड्डू बेचकर अपने परिवार का निर्वाह करता था। बाल्याकाल से ही वह प्रभु के प्रति अत्यन्त ही स्नेह रखता था। जब महाप्रभु बहुत ही छोटे थे, तभी परमेश्वर उन्हें गोद में बिठाकर उनसे 'हरि' 'हरि' बुलवाया करता था और खाने के लिये रोज लडडू देता था। प्रभु भी उससे बहुत स्नेह करते थे। अब वह बूढ़ा हो गया था, अब के वह भी अपनी पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू के सहित प्रभु के दर्शनों को आया था। प्रभु के पास भीतर स्त्रियाँ नहीं जाती थीं, वे दूर से ही प्रभु का दर्शन करती थीं। भक्त परमेश्वर को इस बात का क्या पता था। उसने अपने कांपते हुए हाथों से भूमि में लोटकर प्रभु को प्रणाम किया और प्रेम के साथ कहने लगा- 'प्रभो! अपने परमेश्वर को तो भूल ही गये होंगे। मुझे अब शायद न पहचान सकेंगे।' *प्रभु ने उसका आलिंगन करते हुए अत्यन्त ही स्नेह से कहा- 'परमेश्वर! भला, तुम्हें मैं कभी भूल सकता हूँ? तुम्हारे लड्डू तो अभी तक मेरे गले में ही अटके हुए हैं, वे नीचे भी नही उतरे! तुम मुझे पुत्र की तरह प्यार करते थे।' *परमेश्वर ने बड़े ही उल्लास के साथ कहा- 'प्रभो! आपका पुत्र, पुत्रवधू तथा घर से सभी आपके दर्शनों के लिये आये हैं। वे सभी आपके दर्शनों को उत्सुक हैं।' *यह कहकर भक्त ने सभी से प्रभु के पाद-स्पर्श कराये। भक्त वत्सल प्रभु संकोच के कारण कुछ भी न कह सके। वे लज्जित भाव से नीचा सिर किये हुए चुपचाप बैठे रहे। परमेश्वर के चले जाने पर भक्तों ने उसे समझाया कि प्रभु के समीप सपरिवार नहीं जाया जाता। बेचारा सरल भक्त इस बात को क्या समझे। उसकी समझ में कुछ भी नहीं आया। तब भक्तों ने उसे समझा दिया। इस प्रकार सभी भक्त प्रभु के समीप रहकर पूर्व की भाँति सत्संग सुख का अनुभव करने लगे। भक्तों की पत्नियाँ बारी-बारी से रोज प्रभु का निमन्त्रण करतीं और उन्हें अपने निवास स्थान पर बुलाकर भिक्षा करातीं। *इधर प्रभु के दर्शनों की लालसा से श्री रूपजी अपने भाई अनूप सहित गौड़ देश होते हुए पुरी को आने लगे। रास्ते में अनूप जी को ज्वर आ गया, दैव की गति, ज्वर-ही-ज्वर में वे इस नश्वर शरीर को परित्याग करके परलोकवासी बन गये। श्री रूप ने अत्यन्त ही दु:ख के साथ अपने कनिष्ठ भाई का शरीर गंगा जी के पावन प्रवाह में कर दिया और वे संसार की अनित्यता का विचार करते हुए पुर में आये। श्री वृन्दावन में ही उन्होंने श्रीकृष्ण लीला विषयक एक नाटक लिखना आरम्भ कर दिया था। रास्ते में वे नाटक के विषय को सोचते जाते थे और रात्रि को जहाँ ठहरते थे, वहीं उस सोचे हुए विषय को लिख लेते थे। उनकी इच्छा थी कि एक ही नाटक को दो भागों में विभक्त करेंगे, पूर्व भाग में तो श्रीकृष्ण की वृन्दावन-लीलाओं का सम्मिलित रूप से ही लिख रहे थे। रास्ते में चलते-चलते जब वे उड़िया देश में 'सत्यभामापुर' नामक ग्राम में आये, तो वहाँ स्वप्न में श्री सत्यभामा जी ने प्रत्यक्ष होकर इन्हें आदेश दिया कि 'तुम हमारी लीलाओं का पृथक ही वर्णन करो। *व्रज की लीलाओं के साथ हमारा वर्णन मत करो।' श्री सत्यभामा जी का आदेश पाकर आपने उसी समय द्वारा की लीलाओं का पृथक वर्णन करने का निश्चय किया और उसका वर्णन उन्होंने 'ललितमाधव' नामक नाटक में किया। उसी समय 'विदग्धमाधव' और ललितमाधव' इन दोनों नामों की उत्पत्ति हुई। *नीलाचल में पहुँचकर ये प्रभु के समीप नहीं गये। ये दोनों ही भाई नम्रता की तो सजीव मूर्ति ही थे, यवनों के संसर्ग में रहने के कारण ये अपने को अत्यन्त ही नीच समझते थे और यहाँ तक कि मन्दिर में घुसकर दर्शन भी नहीं करते थे, दूर से ही जगन्नाथ जी की ध्वजा को प्रणाम कर लेते थे। इसलिये रूप जी महात्मा हरिदास जी के स्थान पर जाकर ठहरे। हरिदास जी तो जाति के यवन थे, किन्तु गौर भक्त उनका चतुर्वेदी ब्राह्मणों से भी अधिक सम्मान करते थे, वे भी जगन्नाथ जी के मन्दिर में प्रवेश नहीं करते थे। यहाँ तक कि जिस रास्ते से मन्दिर के पुजारी और सेवक जाते थे, उस रास्ते से भी कभी नही निकलते थे। प्रभु नित्य प्रति समुद्रस्नान करके हरिदास जी के स्थान पर आते थे। दूसरे दिन जब प्रभु नित्य की भाँति हरिदास जी के आश्रम पर आये, तब श्री रूप जी ने भूमि पर लोटकर प्रभु के पादपद्मों में साष्टांग प्रणाम किया। प्रभु की दृष्टि ऊपर की ओर थी। हरिदास जी ने धीरे से कहा- 'प्रभो! रूप जी प्रणाम कर रहे है।' *रूप का नाम सुनते ही चौंककर प्रभु ने कहा- 'हैं! क्या कहा? रूप आये हैं क्या?' यह कहते-कहते प्रभु ने उनका आलिंगन किया और उन्हें वहीं रहने की आज्ञा दी। इसके अनन्तर प्रभु ने सभी गौड़ीय तथा पुरी के भक्तों के साथ श्रीरूप का परिचय करा दिया। श्री रामानन्दराय और सार्वभौम महाशय दोनों ही कवि थे। रूप जी का परिचय पाकर ये दोनों ही परम सन्तुष्ट हुए और प्रभु से इनकी कविता सुनने के लिये प्रार्थना करने लगे। *एक दिन प्रभु राय रामानन्द जी, सार्वभौम भट्टाचार्य, स्वरूप दामोदर तथा अन्यान्य भक्तों को साथ लेकर हरिदास जी के निवास स्थान पर श्री रूप जी के नाटकों को सुनने के लिये आये। सबके बैठ जाने पर प्रभु ने रूप जी से कहा- 'रूप! तुम अपने नाटकों को इन लोगों को सुनाओ। ये सभी काव्यमर्मज्ञ, रसज्ञ और कवि हैं।' *इतना सुनते ही रूप जी लज्जा के कारण पृथ्वी की ओर ताकने लगे। उनके मुख से एक भी शब्द नहीं निकला; तब प्रभु ने बड़े ही स्नेह के साथ कहा- 'वाह जी, यह अच्छी रही! हम यहाँ तुम्हारी कविता सुनने आये हैं, तुम शरमाते हो!! शरम की कौन-सी बात है? कविता का तो फल ही यह है कि वह रसिको के सामने सुनायी जाय। हाँ, सुनाओं, संकोच मत करो। देखे, ये राय बड़े भारी रसमर्मज्ञ हैं। इन्हें तो हम पकड़ लाये हैं। *राय ने कहा- 'हाँ जी, सुनाइये। इस प्रकार शरमा ने से का न चलेगा। पहले तो अपने नाटक का नाम बातइये, फिर विषय बातइये, तब उसके कहीं-कहीं के स्थलों को पढ़कर सुनाइये।' इस पर भी रूप ही रहे। तब प्रभु स्वयं कहने लगे- 'इन्होंने 'ललितमाधव' और विदग्धमाधव' -ये दो नाटक लिखे हैं। 'विदग्धमाधव' में तो भगवान की व्रज की लीलाओं का वर्णन है और 'ललितमाधव' में द्वारकापुरी की लीलाओं का। इनसे ही सुनिये। इन्होंने रथ के सम्मुख नृत्य करते समय जो मेरे भावों को समझकर श्लोक बनाया था, उसे तो मैंने आप लोगों को सुना ही दिया, अब इनके नाटक में से कुछ सुनिये।' *राय ने कुछ प्रेम पूर्वक भर्त्सना के स्वर में कहा- 'क्यों जी, सुनाते क्यों नहीं? देखे प्रभु भी कह रहे हैं। प्रभु की आज्ञा नहीं मानते? हाँ, पहले विदग्धमाधव का मंगलाचरण सुनाइये।' नान्दी के मुख से भगवान की धीरे 'विदग्धमाधव' का मंगलाचरण पढ़ने लगे- *सुधानां चान्द्रीनामपि मधुरिमोन्माददमनी *दधाना राधादिप्रणयघनसारै: सुरभिताम्। *समन्तात् सन्तापोदगमविषमसंसारसरणी- *प्रणीतां ते तृष्णां हरतु हरिलीलाशिखरिणी॥ *श्लोकों को सुनते ही सभी एक स्वर में 'वाह! वाह! करने लगे। श्री रूपजी का लज्जा के कारण मुख लाल पड़ गया, वे नीचें की ओर देख रहे थे। इस पर राय ने कहा- 'रूप जी! आप तो बहुत ही अधिक संकोच करते हैं। इसीलिये, लीजिये मैं आपके काव्य की प्रशंसा ही नहीं करता। अच्छा, तो यह तो भगवान की वन्दना हुई। अब भगवत-स्वरूप जो गुरुदेव हैं, जो कि प्राणियों के एकमात्र भजनीय और इष्ट हैं, भगवत-वन्दा के अनन्तर उनकी वन्दा में जो कुछ कहा हो, उसे और सुनाइये।' *यह सुनकर श्री रूप जी और भी अकिध सिकुड़ गये। महाप्रभु के सम्मुख उन्हीं के सम्बन्ध का श्लोक पढ़ने में उन्हें बड़ी घबड़ाहट-सी होने लगी। किन्तु, फिर भी राय महाशय के आग्रह से रुक-रूककर ये लजाते हुए पढ़ने लगे- *अनर्पितचरीं चिरात करुणयावतीर्ण: कलौ *समर्पयितुमुन्नतोज्जवलरसां स्वभक्तिश्रियम्। *हरि: पुरटसुन्दरद्युतिकदम्बसंदीपित: सदा "हृदयकन्दरें स्फुरतु व: शीचनन्दन:॥ *इसे सुनते ही प्रभु कहने लगे- 'भगवान जाने इन कवियों को राजा लोग दण्ड क्यों नहीं देते। किसी की प्रशंसा करने लगते हैं, तो आकाश-पाताल एक कर देते हैं। इनसे बढ़कर झूठा और कौन होगा? इस श्लोक में तो अतिशयोक्ति की हद कर डाली है।' *राय ने कहा- 'प्रभो! इसे तो हम ही समझ सकते हैं, यथार्थ वर्णन तो इसी श्लोंक में किया गया है। ऐसे स्वाभाविक गुणपूर्ण श्लोक की रचना सभी कवि नहीं कर सकते।' इतना कहर राय ने 'विदग्धमाधव'- के अन्य भी बहुत-से स्थलों को सुना और सुनकर उनके काव्य की हृदय से भूरि-भूरि प्रशंसा की। 'विदग्धमाधव' को सुन लेने पर राय रामानन्द जी कहने लगे- 'अपने दूसरे नाटक 'ललितमाधव' की माधुरी की बानगी भी इन सभी उपस्थित भक्तों को चखा दीजिये। हाँ, उसका भी पहले मंगलाचरण का श्लोक सुनाइये। यह सुनकर श्री रूपजी फिर उसी लहज के साथ श्लोक पढ़ने लगे- *सुररिपुसुदृशमुरोजकोकान् मुखकमलानि च खेदयन्नखण्ड:। *चिरमखिलसुहृच्चकोनन्दी दिशतु मुकुन्दयश:शशी मुदं व:॥ *धन्य है, धन्य है और साधु-साधु की ध्वनि समाप्त होने पर राय महाशय ने कहा- 'श्री भगवान की स्तुति के अनन्तर इष्टस्वरूप श्री गुरुदेव की स्तुति में जो श्लोक हो उसे भी सुनाइये। उसके श्रवण से यहाँ सभी उपस्थित भक्तों को अत्यन्त ही आह्लाद होगा। हाँ सुनाइये। प्रभु की ओर न देखते हुए धीरे-धीरे श्री रूप जी पढ़ने लगे- *निजप्रणयितां सुधामुदयमाप्नुवन् य: क्षितौ *किरत्यलमुरीकृतद्विजकुलाधिराजस्थिति:। *स लुंचिततमस्ततिर्मम शचीसुतासख्य: शशी *वशीकृतजगन्मना: किमपि शर्म विन्यस्यतु॥ *इस श्लोक को सुनते ही प्रभु कुछ बनावटी क्रोध के स्वर में कहने लगे- 'रूप ने और सम्पूर्ण काव्य तो बहुत ही सुन्दर बनाया। इनका एक-एक श्लोक अमूल्य रत्न के समान है, किन्तु जाने क्या समझकर इन्होंने ये दो-एक अतिशयोक्ति पूर्ण श्लोक मणियों में काँच के टुकड़ो के समान मिला दिये हैं? *इस पर भक्तों ने एक स्वर से कहा-' हमें तो यही श्लोक सर्वश्रेष्ठ प्रतीत हुआ है।' बात को यहीं समाप्त करने के लिये राय महाशय ने कहा-' अच्छा, छोड़िये इस प्रसंग को। आगे काव्य की मधुरिमा का पान कीजिये। हाँ, रूप जी! इस नाटक के भी भाव पूर्ण अच्छे-अच्छे स्थल पढ़कर सुनाइये।' *इतना सुनते ही श्री रूपजी नाटक के अन्यान्य स्थलों को बड़े स्वर के साथ सुनाने लगे। सभी रसमर्मज्ञ भक्त उनके भक्तिभाव पूर्ण काव्य की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। अन्त में प्रभु रूपजी का प्रेम से आलिंगन करके भक्तों को साथ लेकर अपने स्थान पर चले गये। *इस प्रकार भक्तों के साथ रथ यात्रा और चातुर्मास के सभी त्यौहारों तथा पर्वो को पहले की भाँति धूमधाम से मनाकर, क्वार के दशहरे के बाद भक्तों को गौड़ के लिये विदा किया। नित्यानन्द जी से प्रभु ने प्रतिवर्ष पुरी न आने का पुन: आग्रह किया; किन्तु उन्होंने प्रभु-प्रेम के कारण इसे स्वीकार नहीं किया। सभी भक्त गौड़ देश को लौट गये। श्री रूप कुछ दिनों प्रभु के पास और रहे। अन्त में कुछ समय के पश्चात प्रभु ने उन्हें वृन्दावन में ही जाकर निवास करने की आज्ञा दी। प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके वे गौड़ देख होते हुए वृन्दावन जाने के लिये उद्यत हुए। यही इनकी प्रभु से अन्तिम भेंट थी। यहाँ से जाकर ये अन्तिम समय तक श्री वृन्दावन की पवित्र भूमि में ही श्री कृष्ण-कीर्तन करते हुए निवास करते रहे। व्रज की परम पावन भूमि को छोड़कर ये एक रात्रि के लिए भी व्रज से बाहर नहीं गये। प्रभु ने जाते समय इनका प्रेम पूर्वक आलिंगन किया और भक्ति विषयक ग्रन्थों के प्रणयन की आज्ञा प्रदान की। इन्होंने प्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके श्री कृष्ण के गुणगान में ही अपना सम्पूर्ण समय बिताया। गौड़ में इनकी कुछ धन-सम्पत्ति थी, उसका परिवार वालों में यथारीति विभाग करने के निमित्त इन्हें गौड़ भी जाना था, इसलिये ये प्रभु से विदा होकर गौड़ देश को गये और वहाँ इन्हें लगभग एक वर्ष धन-सत्पत्ति की व्यवस्था करने के निमित्त ठहरना पड़ा। *श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::----------

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Anita Sharma Apr 11, 2021

।। सुखों की परछाई ।। . एक रानी अपने गले का हीरों का हार निकाल कर खूंटी पर टांगने वाली ही थी कि एक बाज आया और झपटा मारकर हार ले उड़ा. . चमकते हीरे देखकर बाज ने सोचा कि खाने की कोई चीज हो. वह एक पेड़ पर जा बैठा और खाने की कोशिश करने लगा. . हीरे तो कठोर होते हैं. उसने चोंच मारा तो दर्द से कराह उठा. उसे समझ में आ गया कि यह उसके काम की चीज नहीं. वह हार को उसी पेड़ पर लटकता छोड़ उड़ गया. . रानी को वह हार प्राणों सा प्यारा था. उसने राजा से कह दिया कि हार का तुरंत पता लगवाइए वरना वह खाना-पीना छोड़ देगी. राजा ने कहा कि दूसरा हार बनवा देगा लेकिन उसने जिद पकड़ ली कि उसे वही हार चाहिए. सब ढूंढने लगे पर किसी को हार मिला ही नहीं. रानी तो कोप भवन में चली गई थी. हारकर राजा ने यहां तक कह दिया कि जो भी वह हार खोज निकालेगा उसे वह आधे राज्य का अधिकारी बना देगा. . अब तो होड़ लग गई. राजा के अधिकारी और प्रजा सब आधे राज्य के लालच में हार ढूंढने लगे. . अचानक वह हार किसी को एक गंदे नाले में दिखा. हार दिखाई दे रहा था, पर उसमें से बदबू आ रही थी लेकिन राज्य के लोभ में एक सिपाही कूद गया. . बहुत हाथ-पांव मारा, पर हार नहीं मिला. फिर सेनापति ने देखा और वह भी कूद गया. दोनों को देख कुछ उत्साही प्रजा जन भी कूद गए. फिर मंत्री कूदा. . इस तरह जितने नाले से बाहर थे उससे ज्यादा नाले के भीतर खड़े उसका मंथन कर रहे थे. लोग आते रहे और कूदते रहे लेकिन हार मिला किसी को नहीं. . जैसे ही कोई नाले में कूदता वह हार दिखना बंद हो जाता. थककर वह बाहर आकर दूसरी तरफ खड़ा हो जाता. आधे राज्य का लालच ऐसा कि बड़े-बड़े ज्ञानी, राजा के प्रधानमंत्री सब कूदने को तैयार बैठे थे. सब लड़ रहे थे कि पहले मैं नाले में कूदूंगा तो पहले मैं. अजीब सी होड़ थी. . इतने में राजा को खबर लगी. राजा को भय हुआ कि आधा राज्य हाथ से निकल जाए, क्यों न मैं ही कूद जाऊं उसमें ? राजा भी कूद गया. . एक संत गुजरे उधर से. उन्होंने राजा, प्रजा, मंत्री, सिपाही सबको कीचड़ में सना देखा तो चकित हुए. . वह पूछ बैठे- क्या इस राज्य में नाले में कूदने की कोई परंपरा है ? लोगों ने सारी बात कह सुनाई. . संत हंसने लगे, भाई ! किसी ने ऊपर भी देखा ? ऊपर देखो, वह टहनी पर लटका हुआ है. नीचे जो तुम देख रहे हो, वह तो उसकी परछाई है. राजा बड़ा शर्मिंदा हुआ. हम सब भी उस राज्य के लोगों की तरह बर्ताव कर रहे हैं. हम जिस सांसारिक चीज में सुख-शांति और आनंद देखते हैं दरअसल वह उसी हार की तरह है जो क्षणिक सुखों के रूप में परछाई की तरह दिखाई देता है। . हम भ्रम में रहते हैं कि यदि अमुक चीज मिल जाए तो जीवन बदल जाए, सब अच्छा हो जाएगा. लेकिन यह सिलसिला तो अंतहीन है. . सांसारिक चीजें संपूर्ण सुख दे ही नहीं सकतीं. सुख शांति हीरों का हार तो है लेकिन वह परमात्मा में लीन होने से मिलेगा. बाकी तो सब उसकी परछाई है।

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Neha Sharma, Haryana Apr 11, 2021

✳️✳️*श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली*✳️✳️ ✳️✳️*पोस्ट - 145*✳️✳️ ✳️✳️*श्री सनातन वृन्दावन को और प्रभु पुरी को*✳️✳️ *कालेन वृन्दावनकेलिवार्ता लुप्तेति तां ख्यापयितुं विशिष्य। *कृपामृतेनाभिषिषेच देव- स्तत्रैव रूपंच सनातनंच॥ *लगभग दो मास काशी जी में निवास करके महाप्रभु ने दो प्रधान कार्य किये। एक तो सनातन जी को शास्त्रीय शिक्षा दी और दूसरे श्री पाद प्रकाशानन्द जी प्रेमदान दिया। प्रकाशानन्द जी-जैसे प्रकाण्ड पण्डित के भाव परिवर्तन के कारण प्रभु की ख्याति सम्पूर्ण काशी नगरी में फैल गयी। बहुत-से लोग प्रभु के दर्शनों के लिये आने-जाने लगे। बहुत-से वेदान्ती पण्डित प्रभु को शास्त्रार्थ के लिये ललकारते। प्रभु नम्रता पूर्वक कह देते- 'मैं शास्त्रार्थ क्या जानूँ? जिन्हें, शास्त्रों के वाक्यों के ही बाल की खाल निकालनी हो वे निकालते रहें, मैंने तो सभी शास्त्रों का सार यही समझा है कि सब समय, सर्वत्र, सदा भगवान नारायण का ही ध्यान करना चाहिये। जो आस्तिक पुरुष मेरी इस बात का खण्डन करें, वह मेरे सामने आवें। *प्रभु के इस उत्तर को सुनकर सभी चुप हो जाते और अपना-सा मुख लेकर लौट जाते। बहुत भीड़-भाड़ और लोगों के गमनागमन से प्रभु का चित्त ऊब-सा गया। प्रभु को बहुत बातें करना प्रिय नहीं था। वे श्रीकृष्ण कथा के अतिरिक्त एक शब्द सुनना भी नहीं चाहते थे, संसारी लोगों के सम्पर्क से सांसारिक बातें छिड़ ही जाती हैं, यह बात प्रभु को पसंद नहीं थी। इसीलिये उन्होंने ही पुरी जाने का निश्चत कर लिया। प्रभु के निश्चय को समझकर दीन भाव से हाथ जोड़े हुए श्री सनातन जी ने पूछा- 'प्रभो! मेरे लिये क्या आज्ञा होती है?' *प्रभु ने कहा- 'तुम भी अपने भाई के ही पथ का अनुसरण करो। वृन्दावन में रहकर तुम दोनों भाई व्रजमण्डल के लुप्त तीर्थो का फिर से उद्धार करो और भगवान की अप्रकट लीलाओं का भक्ति ग्रन्थों द्वारा प्रचार करो। तुम दोनों ही भाई वैराग्यवान हो, पण्डित हो, रसमर्मज्ञ हो, कवि हृदय के हो, तुम्हारे द्वारा जिन ग्रन्थों का प्रणयन होगा उनसे लोगों का बहुत अधिक कल्याण होगा। व्रजमण्डल में आये हुए गौड़ीय भक्तों की देख-रेख का कार्य भी मैं तुम्हीं लोगों को सौंपता हूँ।' *हाथ जोड़े हुए विवशता के स्वर में सनातन जी ने कहा- 'प्रभो! हम अधम भला इस इतने बड़े कार्य के योग्य कैसे हो सकते हैं? किन्तु हमें इससे क्या? हम तो यन्त्र है, यन्त्री जिस प्रकार घुमायेगा, घूमेंगे, जो करावेगा, करेंगे। हमारा इसमें अपना पुरुषार्थ तो कुछ काम देगा ही नहीं।' *प्रभु ने कहा- 'तुम इस कार्य में प्रवृत्त तो हो, श्री हरि स्वत: ही तम्हारे हृदय में शक्ति का संचार करेंगे। तम्हारे हृदय में स्वत: ही श्री कृष्ण लीलाओं की स्फुरणा होने लगेगी। 'इस प्रकार सनातन को समझा-बुझाकर प्रभु ने उन्हें वृन्दावन जाने के लिये राजी कर लिया। *दूसरे दिन प्रात: काल ही प्रभु ने गंगा स्नान करके पुरी की ओर प्रस्थान कर दिया। तपन मिश्र, चन्द्रशेखर, रघुनाथ, परमानन्द कीर्तनिया, महाराष्ट्रीय ब्राह्मण तथा सनातन आदि प्रभु के अन्तरंग भक्त उनके पीछे-पीछे चले। प्रभु ने सभी को समझा-बुझाकर लौटा दिया, वे सभी को प्रेमपूर्वक आलिंगन करके बलभद्र भट्टाचार्य के सहित आगे बढ़े। भक्तगण मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। श्री सनातन जी को प्रभु वियोग से अपार दु:ख हुआ। चन्द्रशेखर वैद्य उन्हें जैसे-तैसे उठाकर अपने घर लाये। दूसरे दिन वे भी सबसे विदा लेकर राजपथ से वृन्दावन की ओर चले। *इधर श्री रूपजी ने सुबुद्धिराय जी के साथ सभी वनों की यात्रा की। वे एक महीने तक व्रज में भ्रमण करते रहे। फिर उन्हें अपने भाई सनातन की चिन्ता हुई, इसलिये उनकी खोज में वे अपने छोटे भाई अनूप के सहित सारों होकर गंगा जी के किनारे-किनारे प्रयाग होते हुए काशी आये। काशी जी में आकर उन्हें सनातन जी का और प्रभु का सभी समाचार मिला। श्री सनातन जी मथुरा में जाकर अपने दोनों भाइयों की खोज करने लगे। सहसा इनकी सुबुद्धिराय जी से भेट हो गयी। उनसे पता चाल कि रूप और अनूप तो काशी होते हुए आपकी ही खोज में गौड़ देश को गये हैं। रूपजी गंगाजी के किनारे- किनारे आये थे और सनातन जी सड़क-सड़क गये थे, इसीलिये रास्तें में इन दोनों भाइयों की भेट नहीं हुई। सनातन जी अब परम वैरागी संन्यासी की भाँति 'मथुरा माहात्म्य' नाकी पुस्तक मिल गयी। उसी के अनुसार वे व्रजमण्डल के सभी वनों और कुंजो में घूम-घूमकर लुप्त तीर्थो का पता लगाने लगे। वे घर-घर से टुकड़े मांगकर खाते थे और रात्रि में किसी पेड़ के नीचे पड़ रहते थे। इसी प्रकार ये अपने जीवन को बिताने लगे। इधर महाप्रभु भक्तों से विदा होकर झाड़ी खण्ड के रास्ते से पुरी की ओर चलने लगे। रास्ते मे‌ भिक्षा का प्रबन्ध उसी प्रकार बलभद्र भट्टाचार्य करते। कभी-कभी तो केवल साग और वन के कच्चे-पक्के फलों के ही ऊपर निर्वाह करना पड़ता। प्रभु रास्ते मे- *राम राघव राम राघव राम राघव रक्ष माम्। *कृष्ण केशव कृष्ण केशव कृष्ण केशव पाहि माम्॥ *इस पद का बड़े ही स्तर के सहित उच्चारण करते जाते थे। रास्ते में चलते-चलते प्रभु को बड़े जोरों की प्यास लगी। सामनेसे उन्हें आता हुआ एक ग्वाले का लड़का दीखा। उसके सिर पर एक मटकी थी। *प्रभु ने उससे पूछा -'क्यों भाई ! इसमें क्या है?' उस बच्चे ने बड़ी नम्रता के साथ कहा- 'स्वामी जी! इसमें मट्ठा है, मैं अपने पिता को देने के लिये जाता हूँ।' *प्रभु ने कहा -'मुझे बड़ी प्यास लग रही है। क्या तुम मुझे यह मट्ठा पिला सकते हो?' *लड़के ने कहा-' महाराज! मैं पिला तो देता, किन्तु मेरे पिता मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे।' *प्रभु ने कहा- 'अच्छी बात है, तो तुम उन्हीं के पास इसे ले जाओ। 'इतना कहकर प्रभु आगे चलने लगे। थोड़ी देर में उस लड़के ने कुछ सोचकर कहा- 'स्वामी जी! लौट आइये, आप इस मट्ठे को पी लीजिये।' *प्रभु ने कहा- 'तुम्हारे पिता नाराज होंगे, तब तुम क्या कहोगे?' *उसने कहा- 'महाराज! उनके लिये तो मैं और भी ला सकता हूँ। देर हो जायगी तो थोड़े नाराज हो जायंगे, किन्तु आपको न जाने आगे कहाँ पानी मिलगा? धूप तेज पड़ रही है। आप प्यासे जायँगे, इससे मेरा दिल धड़क रहा है। चाहे कुछ भी क्यों न हो, मैं आपको प्यासा न जाने दूंगा।' प्रभु ने कहा-' नहीं भाई! तुम्हारे पिता तुमसे नारज हों, यह ठीक नहीं है। मुझे तो कहीं-न-कहीं आगे जल मिल ही जायगा।' *प्रभु की इस बात को सुनकर उस बच्चे ने आकर प्रभु के पैर पकड़ लिये और रोते-रोते उनसे मट्ठा पीने की प्रार्थना करने लगा। दयालु प्रभु, उसके आग्रह को टाल न सके और उसके कहने से उस मिट्टी के बड़े बर्तन के सम्पूर्ण मट्ठे को पी गये। मट्ठे को पीकर प्रभु ने जोरों से उस लड़के को आलिंगन किया। प्रभु का आलिंगन पाते ही वह प्रेम में उन्मत्त होकर 'हरि हरि' कहकर नृत्य करने लगा उस समय उसकी दशा बड़ी ही विचित्र हो गयी थी। उसके शरीर में सात्त्विक भाव उदय होने लगे। इस प्रकार प्रभु उस बालक को प्रेमदान देकर आगे बढ़े। कई दिनों के पश्चात प्रभु पुरी के समीप पहुँच गये। दूर से ही उन्हें श्री जगन्नाथ जी की पताका दिखायी दी। श्री मन्दिर की पताका दर्शन होती ही, प्रभु ने भूमि में लोटकर जगन्नाथ जी की फहराती हुई विशाल पताका को प्रणाम किया और वे अठारह नाला पर पहुँचे, अठारह नालापर पहुँचकर आपने भक्तो को खबर देने के निमित्त बलभद्र भट्टाचार्य को भेजा और आप वहीं थोड़ी देर तक बैठकर रास्ते की थकान मिटाने लगे। *श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::----------

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Neha Sharma, Haryana Apr 11, 2021

✳️✳️*श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली*✳️✳️ ✳️✳️*पोस्ट - 147*✳️✳️ ✳️✳️*नीलाचल में सनातन जी*✳️✳️ *वृन्दावनात् पुन: प्राप्तं श्रीगौर: श्रीसनातनम्। *देहपातादवन् स्नेहाच्छुद्धं चक्रे परीक्षया॥ *श्री रूप तो सम्पत्ति की व्यवस्था करने के निमित्त गौड़ देश में ठहरे हुए हैं, अब इनके भाई श्री सनातन जी का समाचार सुनिये। सनात जी ने 'मथुरामाहात्म्य' हस्तगत करके उसी के अनुसार व्रजमण्डल के समस्त तीर्थो की यात्रा की। यात्रा के अनन्तर उन्हें अपने भाई से भेंट करने तथा प्रभु के दर्शनों की इच्छा हुई। अपने भाइयों का समाचार जानने के लिये वे व्रज से नीलाचल की ओर चल पड़े। गौड़ तो उन्हें जाना ही नहीं था, क्योंकि ये जेलर को इस बात का वचन दे आये थे। अत: प्रयाग से काशी होते हुए झाड़ीखण्ड के विकट रास्ते से ये जंगल के कण्टकाकीर्ण भयंकर पंथ के ही पथिक बने। रास्ते में जंगल की झाड़ियों की विषैली वायु लगने से इनके सम्पूर्ण अंग में भयंकर खुजली हो गयी। खुजली पक भी गयी और उससे पीब बहने लगा। जैसे-तैसे ये पुरी में पहुँचे। पुर में ये कहाँ ठहरें? पहले कभी आये नहीं थे। इतना उन्होंने सुन रखा था कि प्रभु कहीं मन्दिर के ही समीप में रहते हैं, किन्तु यवनों के संसर्गी होने के कारण ये अपने को मन्दिर के समीप जाने का अधिकारी ही नहीं समझते थे, इसलिये ये महात्मा हरिदास जी का स्थान पूछते-पूछते वहाँ पहुँचे। *हरिदास जी इन्हें देखते ही खिल उठे इनकी यथो योग्य अभ्यर्चना की। सनातन प्रभु के दर्शनों के लिये बड़े उत्सुक हो रहे थे किन्तु मन्दिर के समीप न जाने के लिये विवश थे, तब हरिदास जी ने इन्हें धैर्य बंधाते हुए कहा- 'आप घबड़ाइये नहीं, प्रभु यहाँ नित्य प्रति आते हैं, वे अभी आते ही होंगे।' इतने में ही दोनों ने श्री हरि के मधुर नामो का संकीर्तन करते हुए प्रभु को दूर से आते हुए देखा। प्रभु को देखते ही एक ओर हटकर श्री सनातन जी भूमि पर लोटकर साष्टांग प्रणाम करने लगे। हरिदास जी ने कहा- 'प्रभो! सनातन साष्टांग कर रहे हैं।' 'सनातन यहाँ कहां।' इतना कहते हुए प्रभु जल्दी से सनातन का आलिंगन करने के लिये दौडे़। प्रभु को अपनी ओर आते देखकर सनातन जी जल्दी से उठकर एक ओर दौडे़ और कातर स्वर से कहते जाते थे- 'प्रभो मैं नीच एक तो वैसे ही अधम, नीच और यवन-संसर्गी था, तिस पर भी मेरे सम्पूर्ण शरीर में खाज हो रही है। आप मेरा स्पर्श न करें।' किन्तु प्रभु कब सुनने वाले थे। जल्दी से दौड़कर उन्होंने बलपूर्वक सनातन जी को पकड़ लिया और उनका गाढ़ालिंगन करते हुए वे कहने लगे- 'आज हम कृतार्थ हो गये। सनातन के शरीर की सुन्दर सुगन्धित को सूंघकर हमारे लोक-परलोक दोनों ही सुधर गये।' *'सचमुच प्रभु ने सनातन जी के दिव्य शरीर में की खाज मे से एक प्रकार की दिव्य सुगन्धित का अनुभव किया। सनातन जी संकोच के कारण किंकर्तव्यविमूढ़ हो ये। महाप्रभु की अपार अनुकम्पा के भार से दबे हुए वे विवश होकर पृथ्वी की ओर दखने लगे। महाप्रभु की अहैतु की कृपा के स्मरण से उनका हृदय पिघल रहा था और वह पानी बन-बनकर आँखों के द्वारा निकल कर प्रभु के काषाय रंग वाले वस्त्रों को भिगो रहा था। *थोड़ी देर के अनन्तर प्रभु वहीं एक आसन पर बैठ गये। नीचे सिर किये हुए भूमि पर सनातन जी और हरिदास जी बैठ गये। प्रभु ने धीरे-धीरे रूप के आने का और उनके मिलने आदि का सभी वृत्तान्त सुना दिया। इसी प्रसंग में प्रभु ने श्री अनूप के परलोकगमन का समाचार भी सुना दिया। भाई के वैकुण्ठवास का समाचार सुनकर वीतराग महात्मा सनातन जी का भी हृदय उमड़ आया। वे अपने अश्रुओं के प्रवाह को रोक नहीं सके। प्रभु के कमल मुख पर भी विषण्णता के भाव प्रतीत होने लगे। *प्रभु ने धीरे-धीरे भर्राई हुई आवाज से कहा- 'सनातन! तुम्हारे भाई ने सदगति पायी। वे परम भागवत पुरुषों के लोक में परमानन्द-सुख का अनुभव करते होंगे, उनसे बढ़कर सौभाग्यशाली हो ही कौन सकता है, जिन्होंने देहत्याग के पूर्व अपना घरबार त्याग दिया, व्रजमण्डल के सभी तीर्थो की यथाविधि यात्रा की और अन्तिम समय में अपने परम भागवत गुरु स्वरूप जयेष्ठ भ्राता श्री रूपजी की गोद में सिर रखकर भगवती भागीरथी के रम्य तट पर इस नश्वर शरीर को त्याग दिया और वैकुण्ठवासी बन गये, उन महाभाग के निमित्त तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। ऐसी मृत्यु के लिये तो इन्द्रादि देवता भी तरसते हैं।' *रूंधे हुए कण्ठ से आंसू पोंछते हुए श्री सनातनजी ने कहा- 'प्रभो! मैं उन महाभाग के शरीर के लिये रुदन नहीं कर रहा हूँ। वे तो नित्य हैं, शाश्वत धाम में जाकर अपने इष्टदेव श्री सीता-राम जी के चरणाश्रित बन गये होंगे, किन्तु मुझे इसी बात का सोच हो रहा है कि अन्तिम समय मैं उनके दर्शन नहीं कर सका। मैं अभागा उनके निधन काल के दर्शनों से वंचित ही रहा।' *प्रभु ने करूण स्वर में कहा-' रूप कहते थे, उनकी निष्ठा अलौकिक थी, अन्तिम समय में उन्होंने श्री सीताराम जी का ध्यान और स्मरण करते हुए प्रसन्नता पूर्वक ही शरीर त्याग किया।' *सनातन जी ने पश्चात्ताप के स्वर में कहा- प्रभो! मैं उनकी निष्ठा आपके सम्मुख क्या बताऊँ। कहने को तो वे हमारे छोटे भाई थे, किन्तु निष्ठा में वे हम दोनों से बढ़कर थे। उनकी-जैसी निष्ठा मैनें आज तक किसी में भी नहीं देखी। हमारी तो निष्ठा ही क्या, उनके सामने हमारी निष्ठा तो नहीं के ही समान है। वे सदा हमारे साथ रहते और तीनों ही मिलकर श्रीमद्भागवत की कथा सुना करते। उनके इष्टदेव श्री सीता-राम जी थे। हम दोनों ने एक दिन परीक्षा से निमित्त उनसे कहा- 'अनूप! तुम स्वयं समझदार हो, श्री रामचन्द्र जी की लीलाओं की अपेक्षा श्री कृष्णचन्द्र जी की लीलाओं में अधिक माधुर्य है, इसलिये तुम श्री कृष्ण को ही अपना उपास्यदेव क्यों नहीं बना लेते। इससे तीनों ही भाई श्री कृष्णोपासक होकर साथ-ही-साथ उपसना-भजन और कीर्तन किया करेंगे।' वे हम दोनों का अत्यधिक आदर करते थे; हमारी बात को उन्होंने कभी नहीं टाला। हमारे ऐसे कथन को उन्होंने स्वीकार कर लिया और कहा- 'आप दोनों भाई ही मेरे गुरु, माता-पिता तथा शिक्षक हैं। आप जैसा कहेंगे वैसा ही करुँगा। कल मुझे कृष्णमन्त्र की ही दीक्षा दे देना। 'इतना कहकर वे सोने चले गये। हमने देखा, वे रात्रि भर हाय-हाय करते रहे, एक क्षण को भी नहीं सोये। प्रात: काल उन्होंने आकर हमसे कहा- 'भाइयो! मैं क्या करूँ, यह सिर तो मैं श्री सीताराम जी के में चढ़ा चुका। रात्रि को मैंने बहुत चेष्टा की कि उस चढ़ाये हुए सिर को फिर से लौटा लूँ, किन्तु मेरी हिम्मत नही पड़ी। मैं इस शरीर को प्रसन्नता पूर्वक त्याग सकता हूँ, किन्तु मुझसे श्री सीताराम जी की उपासना न छोड़ी जायगी।' *उनकी ऐसी ऐकान्तिक निष्ठा को देखकर हमें परम आश्चर्य हुआ और अपनी निष्ठा को बार-बार धिक्कार ने लगे। सो, प्रभो! वे मेरे भाई सचमुच ही अनूप थे, उनकी उपमा किसी से दी ही नहीं जा सकती।' *प्रभु ने कहा- 'यथार्थ निष्ठा तो इसी का नाम है। ठीक इसी प्रकार मैंने श्री रामोपासक मुरारी गुप्त से भी यही बात कही थी और उन्होंने भी यही उत्तर दिया था। सेव्य- सेवक का भाव इसी प्रकार ऐकान्तिक और दृढ़ होना चाहिये, जो किसी प्रकार के भी प्रलोभन आने पर हिल न सके। तभी प्रभु प्रेम की प्राप्ति हो सकती है।' इस प्रकार प्रभु बहुत देर तक श्री सनातन जी से बातें करते रहे। अन्त में उन्हें वहीं हरिदास जी के ही समीप रहने का आदेश देकर आप अपने स्थान के लिये चले गये और गोविन्द के हाथों दोनों के ही लिये श्री जगन्नाथ जी का महाप्रसाद भिजवाया। इस प्रकार सनातन जी पुरी में ही हरिदास जी के समीप रहने लगे। प्रभु नियमित रूप से इन दोनों को देखने के लिये आया करते थे। *श्री सनातन जी लगभग चैत्रमास में पुरी पधारे थे। वे भीतर मन्दिर में दर्शनों के लिये न जाकर दूर से ही मन्दिर की पताका को प्रणाम कर लेते थे। शरीर का भोग अच्छे-अच्छे महापुरुषों को भी भोगना पड़ता है, सनातन जी की भंयकर खाज अभी अच्छी नहीं हुई। खुजाते-खुजाते उनके सम्पूर्ण शरीर में बड़-बड़े घाव हो गये और उनमें से निरन्तर पीब बहता रहता था। *ज्येष्ठ का महीना था। प्रभु पुरी से चार-पांच मील की दूरी पर यमेश्वर टोटा में गये हुए थे। बाहर बजे उन्होंने सनातन को भी भिक्षा के लिये वहीं बुलाया। यमेश्वर जाने के लिये दो मार्ग थे- एक तो सिंहद्वार होकर सीधे सड़क-सड़क जाना होता है, दूसरे समुद्र के किनारे-किनारे भी यमेश्वर जा सकते हैं। ज्येष्ठ की प्रखर धूप के कारण समुद्र-किनारे की बालू जल रही थी। यदि उसमें कच्चा चना डाल दिया जाय तो क्षणभर में भुनकर खिल जाये। उस बालू में मनुष्य की तो बात ही क्या, बारह बजे पशु भी जाने में हिचकता हैं, किन्तु जब सनातन जी ने सुना कि प्रभु ने मुझे बुलाया है, तब तो ये अपने भाग्य की सराहना करते हुए उसी बालुकामय पथ से नंगे पैरों ही प्रभु के समीप पहुँचे। शरीर को सर्दी-गर्मी का सुख-दु:ख व्यपता ही है। सनातन जी के पैरों में बड़े-बड़े छाले पड़ गये। *प्रभु ने उन्हें देखते ही पूछा- 'अरे! तुम इतनी धूप में किधर होकर आये हो?' *सरलता के साथ सनातन जी ने कहा- 'प्रभो! समुद्र तट के रास्ते से ही आया हूँ।' *प्रभु ने उनके पैरों के छालों को देखते हुए कहा- 'देखे, नंगे पैरों तप्त बालू में आने से तुम्हारे पैरों में छाले पड़ गये। तुम सिंहद्वार के रास्ते होकर क्यों नहीं आये?' *सनातन जी ने दीनता के साथ कहा- प्रभो! सिंहद्वार होकर श्री जगन्नाथ जी के सेवक तथा दर्शनार्थी आते-जाते रहते है, उनसे कहीं भूल में स्पर्श हो जाय तो मैं ही पाप का भागी बनूँगा। इसी भय से मैं सिंहद्वार होकर नहीं आया।' *प्रभु इनकी ऐसी मर्यादा, दीनता और सरलता को देखकर मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए और उनका जोरों से गाढ़ालिंगन करते हुए कहने लगे- 'सनातन! तुम धन्य हो, तुम्हीं वैष्णवता के सच्चे रहस्य को समझे हो। यद्यपि तुम्हारे लिये स्वयं कोई विधि-निषेध नहीं है, फिर भी तुम लोक मर्यादा के निमित्त ऐसा व्यवहार करते हो, यह सर्वश्रेष्ठ है। मुनष्य चाहे कितनी भी उन्नति क्यों न कर ले फिर भी उसे मर्यादा का उल्लंघन न करना चाहिये। क्योंकि मर्यादा भंग करने से लोकनिन्दा होती है और लोकनिन्दा से सदा पतन का भय बना रहता है।' *सनातन के आलिंगन से प्रभु के सुवर्ण के समान सुन्दर शरीर में कई जगह पीब लग गया, इससे सनातन जी को अपार दु:ख हुआ, वे सोचने लगे 'क्या करूं, प्रभु तो मेरा आलिंगन बिना किये मानते ही नहीं! इसीलिये अब इस भंयकर शरीर को रखकर क्या करूंगा। प्रभु के दर्शन तो हो ही गये। रथ यात्रा के दिन जगन्नाथ जी के दर्शन और करके उन्हीं के रथ के नीचे पिचकर मर जाऊंगा!' *महाप्रभु इनके मनोभाव को समझ गये। वे एक दिन भक्तों के सहित आकर सनातन जी से बातें करने लगे। *उन्होंने बातों-ही बातों में कहा- 'सनातन! शरीर त्याग ने से तुमने क्या लाभ सोचा है? मनुष्य का अन्तिम पुरुषार्थ प्रभु प्राप्ति है, यदि शरीर त्याग ने से प्रभु प्राप्ति हो सके, तो मैं तो हजारों बार शरीर धारण करके उन्हें त्याग ने को तैयार हूँ। इस प्रकार शरीर त्यागना तामसी प्रवृति है। जो संसारी तापों से खिन्न होकर किसी कारण से शरीर से ऊबकर प्राण त्याग देते हैं, उनकी सदगति नहीं होती। उन्हें फिर कर्मों के भोग के निमित्त आसुरी प्रकृति के शरीर धारण करने होते हैं। शरीर का सदप्रयोग श्रीकृष्ण संकीर्तन करने में ही है। यदि आसुरी प्रकृति के शरीर धारण करने होते हैं। शरीर का सदुपयोग श्री कृष्ण संकीर्तन करने में ही है। यदि भगवन्नामचिन्तन और स्मरण बना रहता है तो फिर शरीर कैसी भी दशा में रहे, विवेकी पुरुषो को शरीर की कुछ भी परवा न करनी चाहिये।' *प्रभु की बात सुनकर नीचा सिर किये हुए सनातन जी ने कहा- 'प्रभो! इस बेकार और अपवित्र शरीर को रखवाकर आप इससे क्या कराना चाहते हैं? इससे तो अब दूसरों को दु:ख के सिवा किसी प्रकार का लाभ नहीं पहुँचता।' *प्रभु ने कहा- 'तुम्हें हानि-लाभ से क्या? तुम तो अपने शरीर को मुझे सौंप चुके। दान की हुई वस्तु को लौटाकर कोई उसका मनमाना उपयोग कर सकता है? तुम्हारे जाने मैं इसका कुछ भी उपयोग करूँ, तुम्हें इसे नष्ट करने का अधिकार नहीं है। इससे मुझे बड़े -बड़े काम कराने हैं।' *सनातन जी ने धीरे से कहा- 'प्रभो! आपकी आज्ञा का उल्लंघन करने की शक्ति ही किसमें है? जैसी आप आज्ञा करेंगे, वही मैं करूँगा। इस प्रकार सनातन जी को समझा-बुझाकर प्रभु भक्तों के सहित स्थान के लिये चले गये। *सनातन जी ने आत्मघात का विचार तो परित्याग कर दिया, किन्तु प्रभु के आलिंगन करने के कारण उन्हें सदा सकोंच बना रहता। वे सदा प्रभु से बचे ही रहते किन्तु प्रभु उन्हें खोजकर आलिंगन करते। इससे वे सदा व्यथित-से बने रहते। एक दिन उन्होंने अपनी मनोव्यथा पुरी में ही प्रभु के समीप निवास करने वाले जगदानन्द पण्डित से कही। *जगदानन्द जी ने कहा- 'आपका पुरी में ही रहना ठीक नहीं है। आषाढ़ में रथ यात्रा के दर्शन करके यहाँ से सीधे वृन्दावन चले जाइये। आपके लिये प्रभु ने वही देश दिया है, उस प्रभुदत्त देश में जाकर भगवन्नाम-जप करते हुए समय व्यतीत कीजिये।' *सनातन जी ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा- 'पण्डित जी! आपने यह बड़ी ही उत्तम सम्मति दी। आषाढ़ के पश्चात मैं यहाँ से अवश्य ही चला जाऊँगा।' ऐसा निश्चय करके वे रथ यात्रा की प्रतीक्षा करने लगे। एक दिन बातों-ही-बातों में उन्होंने प्रभु से कहा- 'प्रभो! मुझे पण्डित जगदानन्द जी ने बड़ी सुन्दर सम्मति दी है। रथ यात्रा करके मैं वृन्दावन चला जाऊँगा और वहीं रहूँगा। 'प्रभु जगदानन्द के ऐसे भाव को समझकर उनके ऊपर प्रेम का क्रोध प्रकट करते हुए कहने लगे- जगदानन्द अपने को अब बड़ा भारी पण्डित समझने लगा, जो सनातन जी को भी शिक्षा देने लगा। हमें शिक्षा दे तो ठीक भी है, सनातन जी तो अभी इसे सैकड़ों वर्षों तक पढ़ा सकते हैं। मूर्ख कहीं का, कलका छोकड़ा होकर इतने बड़े लोगों को सम्मति देने चला है।' *इस बात को सुनकर जगदानन्द जी तो सन्न पड़ गये, काटो तो शरीर में रक्त नहीं! वे डबडबायी आँखों से पृथ्वी की ओर देखने लगे। तब सनातन जी ने अत्यन्त ही विनम्र भाव से प्रभु के पैर पकड़े हुए कहा- 'प्रभो! जगदानन्द जी ने तो मेरे हितकी ही बात कही है। आप मुझ पतित को स्पर्श करते हैं, इस बात से किसे दु:ख न होगा? मैं स्वयं संकुचित बना रहता हूँ। *प्रभु ने फिर उसी स्वर में कहा- 'इसे मेरे शरीर की इतनी चिन्ता क्यों? यह शरीर ही सब कुछ समझता है। इसे वैष्णवों के माहात्म्य का पता नहीं। सनातन जी के शरीर को यह अन्य साधारण लोगों के शरीर के समान समझता है। इसे पता नहीं, सनातन जी का शरीर चिन्मय है। उसे खुजली और कुष्ठ कहाँ? यह तो उन्होंने मेरे प्रेम की परीक्षा के निमित्त अपने शरीर में उत्पन्न कर ली है कि मैं घृणा करके इनके शरीर को स्पर्श न करूँ। कोई भाग्यवान पुरुष सनातन जी के शरीर को सूँघे तो सही, उसमें से दिव्य सुगन्ध निकलती रहती है। मैं कुछ सनातन जी के ऊपर कृपा करने के निमित्त उनका आलिंगन थोड़े ही करता हूँ, मैं तो उनके शरीर-स्पर्श से अपने देह को पावन बनाता हूँ।' *प्रभु के मुख से अपनी इतनी भारी प्रशंसा सुनकर सनातन जी रोते-रोते कहने लगे- 'प्रभो! मैंने ऐसा कौन-सा घोर अपराध किया है, मेरे किन जन्मों के अनन्त पाप आज आकर उदय हुए हैं, जो आप मुझे यह प्रशंसारूपी हलाहल विष पिला रहे हैं। जगदानन्द जी का आज भाग्य उदय हुआ। आज त्रिलोकी में इनसे बढ़कर भाग्यवान कौन होगा, जिनकी वात्सल्य स्नेह से पुत्र की भाँति प्रभु भर्त्सना कर रहे हैं। हाय ऐसी प्रेममयी भर्त्सना जिनके भाग्य में बदी है, वे महानुभाव धन्य हैं! गुरुजन जिनकी नित्य आलोचना करते रहते हैं, वे परम सौभाग्यशाली पुरुष हैं। हे करुणा के सागर प्रभो! इस अधम को किस अपराध से अपनेपन से पृथक करके आपने यह प्रशंसा रूपी सर्पिणी बलपूर्वक मेरे गले से लपेट दी। नाथ! मैं अब अधिक सहन न कर सकूँगा। 'सनातन जी की ऐसी कातर वाणी सुनकर प्रभु कुछ लज्जित-से हो गये और अत्यन्त ही प्रेम के स्वर में जगदानन्द जी की ओर देखकर कहने लगे- 'जगदानन्द ने मरे शरीर के स्नेह से और तुम्हारे आग्रह से ही ऐसी सम्मति दे दी होगी। मैंने अपने क्रोध के आवेश में ऐसी बातें इनके लिये कह दीं होगी। इसका कारण मेरा तुम्हारे ऊपर सहज स्नेह ही है। तुम इस वर्ष यहीं मेरे पास ही रहो, अगले वर्ष वृन्दावन जाना।' इतना कहकर प्रभु ने सनातन जी का फिर जोरों से आलिंगन किया। बस, फिर क्या था! न जाने वह खुजली और उसकी पीड़ा कहाँ चली गयी! उसी समय उनकी खाज अच्छी हो गयी और दो-चार दिन में उनके घाव अच्छे होकर उनका शरीर सुवर्ण के समान कान्ति वाला बन गया। *रथ यात्रा के समय अद्वैताचार्य, नित्यानन्द आदि सभी गौड़ीय भक्त प्रतिवर्ष की भाँति अपने स्त्री-बच्चों के सहित पुरी में आये। प्रभु ने उन सबसे सनातन जी का परिचय कराया। सनातन जी प्रभु के परम कृपा पात्र इन सभी प्रेमी भक्तों का परिचय पाकर परम प्रसन्न हुए और उन्होंने सभी की चरणवन्दना की। सभी ने सनातन जी की श्रद्धा, दीनता और तितिक्षा की भूरि-भूरि प्रशंसा की। बरसात के चार महीने रहकर सभी भक्त देश के लिये लौट गये, किन्तु सनातन जी वहीं रह गये। वे दूसरे वर्ष प्रभु से विदा होकर और उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके पुरी से सीधे ही काशी होते हुए वृन्दावन पहुँचे। पुरी से चलते समय वे बलभद्र भट्टाचार्य से उस रास्ते के सभी स्थानों के नाम लिख ले गये थे, जिस रास्ते से प्रभु वृन्दावन गये थे, उन सभी स्थानों का दर्शन करते हुए और प्रभु की लीलाओं का स्मरण करते हुए उसी रास्ते से सनातन जी वृन्दावन पहुँचे। तब तक श्री रूप जी वृन्दावन में नहीं पहुचे थे। सनातन जी वहीं वृन्दावन वृक्षों के नीचे अपना समय बिताने लगे। कुछ दिनों के अनन्तर गौड़ देश से श्री रूप जी भी वृन्दावन पहुँच गये और दोनों भाई साथ ही श्री कृष्ण कथा कीर्तन करते हुए कालयापन करने लगे। *श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::----------

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Gopal Jalan Apr 11, 2021

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