कार्तिक मास में बरसेगा धन, बटोरने के लिए करें ये काम

कार्तिक मास में नियम से स्नान, जप, तप, व्रत, ध्यान और तर्पण करने से मनुष्य को अक्षय फलों की प्राप्ति होती है। यह अक्षय पुण्य लाभ प्राप्त करने का महीना है। कार्तिक पुण्यमय वस्तुओं में श्रेष्ठ पुण्यतम, पावन पदार्थों में अधिक पावन है। स्कंदपुराण के अनुसार सत्युग के समान कोई युग नहीं वेदों के समान कोई शास्त्र ज्ञान नहीं, गंगा जी के समान कोई नदी नहीं और कलयुग में कार्तिक के समान कोई मास नहीं है। भगवान विष्णु को जैसे तिथियों में एकादशी प्रिय है वैसे ही मासों में कार्तिक मास अति प्रिय है, इसी कारण इस माह में किए गए धर्म-कर्म से भगवान प्रसन्न होकर कृपा करते हुए मनुष्य के सभी प्रकार के दैहिक, दैविक एवं भौतिक तापों का हरण कर लेते हैं व उसकी सभी कामनाओं की पूर्ति कर देते हैं।
ज्योतिष गणना से जानें, कब से आरंभ होगा कार्तिक मास

इस मास में क्या करें- कार्तिक मास में जो लोग संकल्प करके प्रतिदिन प्रात: सूर्य निकलने से पूर्व उठकर किसी तीर्थ स्थान, किसी नदी अथवा पोखरे पर जाकर स्नान करते हैं यां घर में ही गंगाजल युक्त जल से स्नान करते हुए भगवान का ध्यान करते हैं, उन पर प्रभु प्रसन्न होते हैं। स्नान के पश्चात पहले भगवान विष्णु और बाद में सूर्य भगवान को अर्घ्य प्रदान करते हुए विधिपूर्वक अन्य देवी-देवताओं, ऋषियों दिव्य मनुष्यों को अर्घ्य देते हुए पितरों का तर्पण करना चाहिए। पितृ तर्पण के समय हाथ में तिल अवश्य लेने चाहिए क्योंकि मान्यता है कि जितने तिलों को हाथ में लेकर कोई अपने पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण करता है, उतने ही वर्षों तक उनके पितर स्वर्गलोक में वास करते हैं। इस मास में अधिक से अधिक प्रभु नाम का चिंतन करना चाहिए।

स्नान के पश्चात नए एवं सफेद या पीले रंग के पवित्र वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु जी का धूप, दीप, नेवैद्य, पुष्प एवं मौसम के फलों के साथ विधिवत सच्चे मन से पूजन करें। भगवान को मस्तक झुकाकर बारम्बार प्रणाम करते हुए किसी भी गलती के लिए क्षमा याचना करें। कार्तिक मास की कथा स्वयं सुने तथा दूसरों को भी सुनाएं। कुछ लोग कार्तिक मास में व्रत करने का भी संकल्प करते हैं। जिसमें वह केवल फलाहार करते हैं जबकि कुछ लोग पूरा मास एक समय भोजन करके कार्तिक मास के नियम का पालन करते हैं। इस मास में श्रीमद्भागवत कथा, श्री रामायण पाठ, श्री श्रीमद्भागवत पाठ, श्री विष्णुसहस्त्रनाम आदि स्त्रोतों का पाठ करना उत्तम कर्म है। जो व्यक्ति एक महीने तक कार्तिक माह के नियमों का पालन करता है वह मनचाहा धन, मान-सम्मान और तरक्की हासिल करता है।

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Anilkumar Tailor Oct 30, 2020

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हिन्दू १६ संस्कारो के मुहूर्त 〰〰〰〰〰〰〰〰〰 अन्न प्राशन्न मुहूर्त 🔸🔸🔸🔸🔸🔸 अन्न प्राशन्न संस्कार के बाद माँ बच्चे को दूध के साथ खाना देना आरम्भ कर देती है। यह संस्कार लड़के लिए 6, 8 व 10 वें महीने में किया जाता है। और लड़की के के लिए 5 ,7 ,9 व 11वें महीने में किया जाता है। सभी स्थिर नक्षत्र उत्तराफाल्गुनी उत्तराषाढ़ा एवं रोहणी इसके अतिरिक्त सभी चर नक्षत्र स्वाति पुनर्वसु श्रवण शतभिषा धनिष्ठा इन नक्षत्रो में अन्न प्रशन्न संस्कार करना चाहिए। इसके अतिरिक्त निम्न 1,2,3,5,7,10,11,13 व 15 तिथि में एवं शुभ वार भी इस संस्कार के लिए अच्छे है। कर्ण भेदन मुहूर्त 🔸🔸🔸🔸🔸 पुराने जमानो में बच्चों को महामारी होने की अधिक आशंका हुआ करती थी इन सबसे निजात पाने के लिए कान छेदन का विधान था। कान छेदन से आँख और अंडकोषों की बीमारी से बचाव हो जाता है। इस संस्कार के लिए मुहूर्त 3, 5, 7 व 8 वें वर्ष में किया जाता है। मृगशिरा रेवती चित्रा या अनुराधा अथवा हस्त अश्विनी पुष्य नक्षत्र में भी कान छेदन कर सकते है। इसके लिए निम्न तिथियाँ 1, 2, 3, 5, 7, 10, 13 व 15 एवं शुभ वार भी अच्छे होते है। चूड़ाकरण अर्थात मुण्डन मुहूर्त 🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸 इस मुहूर्त में बच्चे के बाल उतारे जाते है तथा चोला पहनाया जाता है और बीच में छोटी सी चोटी भी छोड़ दी जाती है। इसे मुण्डन संस्कार भी कहा जाता है। यह संस्कार पहले तीसरे या पाँचवे वर्ष में किया जाता है। दूसरे चौथे छठें वर्ष में नही करना चाहिए। स्वाति पुनर्वसु पुष्य श्रवण धनिष्ठा शतभिषा हस्त चित्रा अश्विनी मृगशिरा ज्येष्ठा नक्षत्र शुभ होते है। इस संस्कार के लिए जन्म राशि का लग्न और इसकी 8 वीं राशि का लग्न छोड़ दें। विद्यारम्भ करने का मुहूर्त 🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸 जब बच्चा पैदल चलने लगता है तो उसके पढ़ाई करने का समय शुरू हो जाता है। बच्चे को सूर्य उत्तरायण के समय पर ही विद्यालय में प्रवेश करवाना चाहिए। बच्चे को विद्यालय में प्रवेश के लिए द्वितीय तृतीय व पञ्चमी तिथि छठी दसवी एकादशी द्वादशी सोमवार बुधवार गुरुवार शुक्रवार शुभ होते है। 3 से 5 वर्ष के बीच बच्चों का स्कूल में प्रवेश कराना चाहिए। अश्विनी रोहणी मृगशिरा आर्द्रा पुनर्वसु चित्र हस्त अनुराधा व् रेवती नक्षत्रों में प्रवेश करवा सकते है। इसके लिए शुभ तिथि 2, 3, 5, 6,10,11 व 12 होती है । 🔸〰🔸〰🔸〰🔸〰🔸〰🔸〰🔸〰🔸〰🔸〰🔸

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Anita Sharma Oct 29, 2020

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आशुतोष Oct 29, 2020

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Neha Sharma, Haryana Oct 28, 2020

🌸🙏*(मीरा चरित -)..... (25, 26)*🙏🌸 🌸🙏*क्रमशः से आगे........................🌿👣🌿 *मेड़ता से गये पुरोहित जी के साथ चित्तौड़ के राजपुरोहित *और उनकी पत्नी मीरा को देखने आये *राजमहल में उनका आतिथ्य सत्कार हो रहा है *पर मीरा को तो जैसे वह सब दीखकर भी दिखाई नहीं दे रहा *है *उसे न तो कोई रूचि है न ही कोई आकर्षण, *दूसरे दिन माँ सुन्दर वस्त्राभूषण लेकर एक दासी के साथ मीरा के पास आई आग्रह से स्थिति समझाते हुये मीरा को सब पहनने को कहा, मीरा ने बेमन से कहा- आज जी ठीक नहीं है भाबू रहने दीजिये.. किसी और दिन पहन लूँगी माँ खिन्न हो कर उठकर चली गई तो मीरा ने उदास मन से तानपुरा उठाया और गाने लगी....... *राम नाम मेरे मन बसियो, रसियो राम रिझाऊँ ए माय* *मीरा के प्रभु गिरधर नागर, रज चरणन की पाऊँ ए माय* भजन विश्राम कर वह उठी ही थी कि माँ और काकीसा के साथ चित्तौड़ के राजपुरोहित जी की पत्नी ने श्याम कुन्ज में प्रवेश किया मीरा उनको यथायोग्य प्रणाम कर बड़े संकोच के साथ एक ओर हटकर ठाकुर जी को निहारती हुईं खड़ी हो गई, पुरोहितानी जी ने तो ऐसे रूप की कल्पना भी न की थी वह, लज्जा से सकुचाई मीरा के सौंदर्य से विमोहित सी हो गई और उनसे प्रणाम का उत्तर, आशीर्वाद भी स्पष्ट रूप से देते न बना वे कुछ देर मीरा को एकटक निहारते ही बैठी रही दासियों ने आगे बढ़कर चरणामृत प्रसाद दिया कुछ समय और यूँ ही मन्त्रमुग्ध बैठी फिर काकीसा के साथ चली गई, माँ ने सबके जाने के बाद फिर मीरा से कहा- तेरा क्या होगा, यह आशंका ही मुझे मारे डालती है अरे विनोद में कहे हुये भगवान से विवाह करने की बात से क्या जगत का व्यवहार चलेगा...? साधु-संग ने तो मेरी कोमलांगी बेटी को बैरागन ही बना दिया है मैं अब किससे जा कर बेटी के सुख की भिक्षा माँगू...???? मीरा - माँ आप क्यों दुःखी होती है....? सब अपने भाग्य का लिखा ही पाते है यदि मेरे भाग्य में दुःख लिखा है तो क्या आप रो -रो कर उसे सुख में पलट सकती है....? तब जो हो रहा है उसी में संतोष मानिये मुझे एक बात समझ में नहीं आती माँ जो जन्मा है वह मरेगा ही, यह बात तो आप अच्छी तरह जानती है फिर जब आपकी पुत्री को अविनाशी पति मिला है तो आप क्यों दुःख मना रही है...???? आपकी बेटी जैसी भाग्यशालिनी और कौन है जिसका सुहाग अमर है....????? मीरा ने भाबू को बताया - ऐसे वर को क्या करूँ जो जन्मे अौर मर जाय... *वर बरिए गोपाल जी..म्हारो चूड़लो अमर होय जाये* वीरकुवंरी जी एक बार फिर मीरा के तर्क के आगे चुप हो चली गई मीरा श्याम कुन्ज में अकेली रह गई आजकल दासियों को भी कामों की शिक्षा दी जा रही है क्योंकि उन्हें भी मीरा के साथ चितौड़ जाना है मीरा ने एकान्त पा फिर आर्त मन से प्रार्थना आरम्भ की........ *तुम सुनो दयाल म्हाँरी अरजी* *भवसागर में बही जात हूँ..काढ़ो तो थाँरी मरजी* *या संसार सगो नहीं कोई...साँचा सगा रघुबर जी* *मात पिता अर कुटुम कबीलो...सब मतलब के गरजी* *मीरा की प्रभु अरजी सुण लो..चरण लगावो थाँरी मरजी* क्रमशः ................ (मीरा चरित - )......(26) क्रमशः से आगे..............🌿👣🌿 मीरा श्याम कुन्ज में एकान्त में गिरधर के समक्ष बैठी है आजकल दो ही भाव उस पर प्रबल होते है - या तो ठाकुर जी की करूणा का स्मरण कर उनसे वह कृपा की याचना करती है और या फिर अपने ही भाव- राज्य में खो अपने श्यामसुन्दर से बैठे बातें करती रहती है, इस समय दूसरा भाव अधिक प्रबल है- मीरा गोपाल से बैठे निहोरा (प्रार्थना) कर रही है--- *थाँने काँई काँई कह समझाऊँ...म्हाँरा सांवरा गिरधारी* *पूरब जनम की प्रीति म्हाँरी...अब नहीं जात निवारी* *सुन्दर बदन जोवताँ सजनी..प्रीति भई छे भारी* *म्हाँरे घराँ पधारो गिरधर...मंगल गावें नारी* *मोती चौक पूराऊँ व्हाला...तन मन तोपर वारी* *म्हाँरो सगपण तो थांसूं साँवरिया...जग सूँ नहीं विचारी* *मीरा कहे गोपिन को व्हालो...हम सूँ भयो ब्रह्मचारी* *चरण शरण है दासी थाँरी...पलक न कीजे न्यारी* मीरा गाते गाते अपने भाव जगत में खो गई----वह सिर पर छोटी सी कलशी लिए यमुना जल लेकर लौट रही है उसके तृषित नेत्र इधर-उधर निहार कर अपना धन खोज रहे है वो यहीं कहीं होंगे -आयेंगे -नहीं आयेंगे....बस इसी ऊहापोह में धीरे-धीरे चल रही थी कि पीछे से किसी ने मटकी उठा ली उसने अचकचाकर ऊपर देखा तो - कदम्ब पर एक हाथ से डाल पकड़े और एक हाथ में कलशी लटकाये मनमोहन बैठे हँस रहे है लाज के मारे उसकी दृष्टि ठहर नहीं रही लज्जा नीचे और प्रेम उत्सुकता ऊपर देखने को विवश कर रही है वे एकदम वृक्ष से उसके सम्मुख कूद पड़े वह चौंककर चीख पड़ी....और साथ ही उन्हें देख लजा गई, *डर गई न....? श्यामसुंदर ने हँसते हुए पूछा और हाथ पकड़ कर कहा -चल आ, थोड़ी देर बैठकर बातें करें" सघन वृक्ष तले एक शिला पर दोनों बैठ गये मुस्कुरा कर बोले- तोको का लगो - कोई वानर कूद पड़ो है क्या..? अभी पानी भरने को समय है का....??? दोपहर में पता नहीं घाट नितान्त सूने रहते है जो कोई सचमुच वानर आ जातो तो.....??? मीरा - तुम हो न उसके मुख से निकला श्यामसुंदर -मैं का यहाँ ही बैठो रहूँ हूँ....? गईयाँ नहीं चरानी मोकू.....? मीरा -एक बात कहूँ.....??? मैने सिर नीचा किए हुये कहा श्यामसुंदर -एक नहीं सौ कह...पर माथा तो ऊँचा कर तेरो मुख ही नाय दिख रहो मोकू....उन्होंने मुख ऊँचा किया तो फिर लाज ने आ घेरा, श्यामसुंदर अच्छा अच्छा मुख नीचो ही रहने दे कह का बात है......? मीरा -तुम्हें कैसे प्रसन्न किया जा सकता है...? बहुत कठिनाई से मैंने कहा श्यामसुंदर -तो सखी....तोहे मैं अप्रसन्न दीख रह्यो हूँ का मीरा -नहीं मेरा वो मतलब नहीं था..सुना है...तुम प्रेम से वश में होते हो श्यामसुंदर- मोको वश में करके क्या करेगी सखी नाथ डालेगी कि पगहा बाँधेगी.....??? मेरे वश हुये बिना तेरो कहा काज अटक्यो है भला....??? मीरा - सो नहीं श्यामसुन्दर श्यामसुंदर - तो फिर क्या.....??? कब से पूछ रहो हूँ....तेरो मोहढों (मुख) तो पूरो खुले हु नायक एकहु बात पूरी नाय निकसै...अब मैं भोरो-भारो कैसे समझूँगो? मीरा -सुनो श्यामसुन्दर...मैंने आँख मूँदकर पूरा ज़ोर लगाकर कह दिया -मुझे तुम्हारे चरणों में अनुराग चाहिए" श्यामसुंदर - सो कहा होय सखी.....? उन्होंने अन्जान बनते हुये पूछा, अपनी विवशता पर मेरी आँखों में आँसू भर आये घुटनों में सिर दे मैं रो पड़ी....😥 श्यामसुंदर - सखी रोवै मति....उन्होंने मेरे आँसू पौंछते हुये पूछा और ऐसो अनुराग कैसो होवे री....??? मीरा - सब कहते हैं..उसमें अपने सुख की आशा - इच्छा नहीं होती तो और कहा होय....?.....श्यामसुन्दर ने पूछा, मीरा - बस तुम्हारे सुख की इच्छा" श्यामसुंदर -और कहा अब तू मोकू दुःख दे रही है....? ऐसा कह हँसते हुये मेरी मटकी लौटाते हुये बोले, ले अपनी कलशी.....बावरी कहीं की..... और वह वन की ओर दौड़ गये...मैं वहीं सिर पर मटकी ले ठगी सी बैठी रही....... क्रमशः ................

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Deepak Oct 29, 2020

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Neha Sharma, Haryana Oct 28, 2020

🌸🙏*(मीरा चरित -)..... (23, 24)*🙏🌸 🌸🙏*क्रमशः से आगे.........................🌿👣🌿 *श्याम कुन्ज में मीरा और जयमल दोनों भाई बहन एक दूसरे *के कण्ठ लगे रूदन कर रहे है *जयमल स्वयं को अतिशय असहाय मान रहे है जो बहन की *कैसे भी सहायता करने में असमर्थ पा रहेे है, *भोजराज श्याम कुन्ज के द्वार पर खड़े उन दोनों की बातें आश्चर्य से सुन रहे थे वे थोड़ा समीप आये और सीधे मीरा को ही सम्बोधित करते हुए बोले -"देवी" उनका स्वर सुनते ही दोंनो ही चौंक कर अलग हो गये एक अन्जान व्यक्ति की उपस्थिति से बेखबर मीरा ने मुँह फेर कर उघड़ा हुआ सिर ढक लिया पलक झपकते ही वह समझ गई कि यह अन्जान तनिक दुःख और गरिमा युक्त स्वर और किसी का नहीं मेवाड़ के राजकुमार का है थोड़े संकोच के साथ उसने उनकी ओर पीठ फेर ली, कुँवर भोजराज - "देवी"....आत्महत्या महापाप है और फिर बड़ों की आज्ञा का उल्लंघन भी इससे कम नहीं आपने जिस चित्तौड़ के राजकुवंर का नाम लिया है वह अभागा अथवा सौभाग्यशाली जन आपके सामने उपस्थित है, मुझ भाग्यहीन के कारण ही आप जैसी भक्तिमती कुमारी को इतना परिताप सहना पड़ रहा है उचित तो यह है कि मैं ही देह छोड़ दूँ ताकि सारा कष्ट ही कट जाये, किन्तु क्या इससे आपकी समस्या सुलझ जायेगी....??? मैं नहीं तो मेरा भाई - या फिर कोई ओर..राजपूतों में वरों की क्या कमी....? हम लोगों का अपने गुरूजनों पर बस नहीं चलता वे भी क्या करें....??? क्या कभी किसी ने सुना है कि बेटी बाप के घर कुंवारी बैठी रह गई हो...? पीढ़ियों से जो होता आया है उसी के लिए तो सब प्रयत्नशील है" भोजराज ने अत्यंत विनम्रता से अपनी बात समझाते हुये कहा हे देवी....कभी किसी के घर आप जैसी कन्याएँ उत्पन्न हुई है कि कोई अन्य मार्ग उनके लिए निर्धारित हुआ हो...??? मुझे तो इस उलझन का एक ही हल समझ में आया है और वो यह कि माता-पिता और परिवार के लोग जो करे, सो करने दीजिए और अपना विवाह आप ठाकुर जी के साथ कर लीजिए यदि ईश्वर ने मुझे निमित्त बनाया है तो....... मैं वचन देता हूँ कि केवल दुनिया की दृष्टि में बींद बनूँगा आपके लिए नहीं, जीवन में कभी भी आपकी इच्छा के विपरीत आपकी देह को स्पर्श भी नहीं करूँगा..आराध्य मूर्ति की तरह............ भोजराज का गला भर आया...एक क्षण रूककर वे बोले आराध्य मूर्ति की भाँति आपकी सेवा ही मेरा कर्तव्य रहेगा आपके पति गिरधर गोपाल मेरे स्वामी और आप.....आप....मेरी स्वामिनी" भीष्म प्रतिज्ञा कर...भोजराज पल्ले से आँसू पौंछते हुये पलट करके मन्दिर की सीढ़ियाँ उतर गये एक हारे हुये जुआरी की भाँति पाँव घसीटते हुये वे पानी की नाली पर आकर बैठे दोनों हाथों से अंजलि भर भर के मुँह पर पानी के छींटे मारने लगे ताकि आते हुये जयमल से अपने आँसु और उनकी वज़ह छुपा पायें पर मन ने तो आज नेत्रों की राह से बह जाने की ठान ही ली थी वे अपनी सारी शक्ति समेट उठे और चल पड़े, जयमल शीघ्रतापूर्वक उनके समीप पहुँचे उन्होंने देखा - आते समय तो भोजराज प्रसन्न थे, परन्तु अब तो उदासी मुख से झर रही है उसने सोचा -संभवतः जीजी के दुःख से दुःखी हुए है तभी तो ऐसा वचन दिया कुछ भी हो..जीजी इनसे विवाह कर सुखी ही होंगी, और भोजराज? वे चलते हुये जयमल से बीच से ही विदा ले मुड़ गये ताकि कहीं एकान्त पा अपने मन का अन्तर्दाह बाहर निकालें....😥 क्रमशः ............. (मीरा चरित- )......(24) क्रमशः से आगे...........🌿👣🌿 भोजराज श्याम कुन्ज से प्रतिज्ञा कर अपने डेरे लौट आये वहाँ आकर कटे वृक्ष की भाँति पलंग पर जा पड़े पर चैन नहीं पड़ रहा था कमर में बंधी कटार चुभी..तो म्यान से बाहर निकाल धार देखते हुये अनायास ही अपने वक्ष पर तान ली..... एक क्षण........में ही लगा जैसे बिजली चमकी हो अंतर में मीरा आ खड़ी हुईं उदास मुख...कमल- पत्र पर ठहरे ओस-कण से आँसू गालों पर चमक रहे है जलहीन मत्स्या (मछली ) सी आकुल दृष्टि मानो कह रही हो आप ऐसा करेंगे -तो मेरा क्या होगा...? भोजराज ने तड़पकर कटार दूर फैंक दी मेवाड़ का उत्तराधिकारी, लाखों वीरों का अग्रणी, जिसका नाम सुनकर ही शत्रुओं के प्राण सूख जाते है और दीन -दुखी श्रद्धा से जय-जयकार कर उठते है, जिसे देख माँ की आँखों में सौ- सौ सपने तैर उठते है वही मेदपाट का भावी नायक आज घायल शूर की भाँति धरा पर पड़ा है, आशा -अभिलाषा और यौवन की मानों अर्थी उठ गई हो उनका धीर -वीर ह्रदय प्रेम पीड़ा से कराह उठा उन्हें इस दुःख में भाग बाँटने वाला कोई दिखाई नहीं देता, उनके कानों में मीरा की गिरधर को करूण पुकार ....... *म्हाँरा सेठ बोहरा..ब्याज मूल काँई जोड़ो* *गिरधर लाल प्रीति मति तोड़ो* गूँज रही है...... कुँवर भोजराज -हाय.. कैसा दुर्भाग्य है इस अभागे मन का....? कहाँ जा लगा यह.....? जहाँ इसकी रत्ती भर भी परवाह नहीं....पाँव तले रूँदने का भाग्य लिखाकर आया बदनसीब "मीरा"...........कितना मीठा नाम है यह जैसे अमृत से सिंचित हो अच्छा इसका अर्थ क्या है भला....? किससे पूछूँ...???? अब तो....उन्हीं से पूछना होगा उनके .......चित्तौड़ आने पर उनके होंठों पर मुस्कान, ह्रदय में विद्युत तरंग थिरक गई वे मीरा से मानों प्रत्यक्ष बात करने लगे - मुझे केवल तुम्हारे दर्शन का अधिकार चाहिए......तुम प्रसन्न रहो.......तुम्हारी सेवा का सुख पाकर यह भोज निहाल हो जायेगा मुझे और कुछ नहीं चाहिए ...... कुछ भी नहीं" अगले दिन ही भोजराज ने गिरिजा बुआ से और वीरमदेव जी से घर जाने की आज्ञा माँगी गिरिजा जी ने भतीजे का मुख थोड़ा मलिन देख पूछा तो भोजराज ने हँस कर बात टाल दी हाँलाकि वे मेड़ता में सबका सम्मान करते पर अब उनका यहाँ मन न लग रहा था, भोजराज चित्तौड़ आ गये पर उनका मन अब यहाँ भी नहीं लगता था न जाने क्यों अब उन्हें एकान्त प्रिय लगने लगा एकान्त मिलते ही उनका मन श्याम कुन्ज में पहुँच जाता रोकते- रोकते भी वह उन बड़ी -बड़ी झुकी आँखों स्वर्ण गौर वर्ण, कपोलों पर ठहरी अश्रु बूँदों, सुघर नासिका, उसमें लगी हीरक कील, कानों में लटकती झूमर, वह आकुल व्याकुल दृष्टि, उस मधुर कंठ-स्वर के चिन्तन में खो जाता, वे सोचते- एक बार भी तो उसने आँख उठाकर नहीं देखा मेरी ओर पर क्यों देखे....??? क्या पड़ी है उसे.....??? उसका मन तो अपने अराध्य गिरधर में लगा है यह तो तू ही है...जो अपना ह्रदय उनके चरणों में पुष्प की तरह चढ़ा आया है, जहाँ स्वीकृति के कोई आसार भी नहीं और न ही आशा" क्रमशः ................

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Anita Sharma Oct 28, 2020

Mahabharat: पौराणिक मान्यता है कि पवनपुत्र हनुमान अजर-अमर हैं। वे लंका युद्ध के समय अपने प्रभु श्रीराम की सेवा के लिए त्रेतायुग में उपस्थि​त थे। श्रीराम ने जब जल समाधि ली, तो हनुमान जी को यहीं पृथ्वी पर रुकने का आदेश दिया। तब से माना जाता है कि हनुमान जी पृथ्वी पर ही वास करते हैं। द्वापर युग में जब उनको पता चला था ​कि उनके ही प्रभु श्री कृष्ण अवतार में पृथ्वी पर दोबारा अवतरित हुए हैं, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण की इच्छा के अनुरुप बजरंगबली अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजमान रहे। इससे जुड़ा एक प्रसंग आनंद रामायण में मिलता है, जिसमें हनुमान जी अर्जुन के घमंड को तोड़ते हैं। एक बार रामेश्वरम में अर्जुन की मुलाकात हनुमान जी से होती है। दोनों लोगों में लंका युद्ध को लेकर चर्चा होने लगी। अर्जुन को उस समय स्वयं पर संसार का सबसे बड़ा धनुर्धर होने का अभिमान था। बातचीत में उन्होंने हनुमान जी से कहा कि आपके प्रभु राम तो बड़े वीर योद्धा और धनुर्धर थे, तो उन्होंने लंका जाने के लिए बाणों से ही सेतु निर्माण क्यों नहीं कर दिया। इस पर हनुमान जी ने कहा कि बाणों का पुल वानर सेना के भार को सहन नहीं कर पाता। तब अर्जुन ने घमंड से कहा कि वे तो बाणों की ऐसा पुल बना देते, जो टूटता ही नहीं अर्जुन ने हनुमान जी से कहा कि सामने तालाब में वह बाणों का पुल तैयार करके दिखाते हैं, वह आपका भार सहन कर लेगा। उस समय हनुमान जी अपने सामान्य रुप में थे। अभिमान से चूर अर्जुन ने अपने बाणों से तालाब पर एक सेतु बना दिया और हनुमान जी को चुनौती दी। अर्जुन के बनाए सेतु को देखकर हनुमान जी ने कहा कि यदि यह सेतु उनका वजन सहन कर लेगा, तो वे अग्नि में प्रवेश कर जाएंगे और यह टूट जाता है तो तुमको अग्नि में प्रवेश करना होगा। अर्जुन ने शर्त स्वीकार कर ली। हनुमान जी ने विशाल रुप धारण किया और जैसे ही पहला पग उस सेतु पर रखा। वह सेतु डगमगाने लगा। दूसरा पैर रखते हुए सेतु चरमराने लगा। उस पुल की हालात देखकर अर्जुन का सिर घमंड से नीचे हो गया। हनुमान जी ने जैसे ही तीसरा पग रखा, तो वह तालाब खून से लाल हो गया। यह देखकर हनुमान जी सेतु से नीचे आ गए और अर्जुन को अग्नि प्रज्वलित करने को कहा। अग्नि प्रज्वलित होते ही हनुमान जी उसमें प्रवेश करने वाले ​थे, तभी भगवान श्रीकृष्ण प्रकट हुए और बजरंगबली को ऐसा करने से रोका। उन्होंने कहा कि हे भक्त श्रेष्ठ! आपके पहले ही पग के रखते यह सेतु टूट गया होता, अगर मैं कछुआ बनकर अपनी पीठ पर आपका भार सहन नहीं करता। तीसरा पग रखते ही मेरी पीठ से खून निकलने लगा। यह सुनकर हनुमान जी दुखी हो गए और उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी। उन्होंने कहा कि वे अपराधी हैं, उनके कारण उनके प्रभु को दुख पहुंचा है। इस श्रीकृष्ण बोले कि यह सब उनकी ही इच्छा से हुआ है। उन्होंने हनुमान जी से कहा कि आप महाभारत युद्ध में अर्जुन की रथ पर लगी ध्वजा पर विराजमान रहें। जब महाभारत का युद्ध हुआ तो अर्जुन की रथ पर हनुमान जी शिखर पर लगे ध्वज पर विराजमान हो गए।

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संकल्प Oct 28, 2020

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