लड्डू गोपाल की सेवा,,,,, एक नगर में दो वृद्ध स्त्रियां बिल्कुल पास पास रहा करती थी। उन दोनो में बहुत घनिष्ठता थी। उन दोनों का ही संसार में कोई नहीं था इसलिए एक दूसरे का सदा साथ देतीं और अपने सुख-दुःख आपस में बाँट लेती थीं। एक स्त्री हिन्दू थी तथा दूसरी जैन धर्म को मानने वाली थी। हिन्दू वृद्धा ने अपने घर में लड्डू गोपाल को विराजमान किया हुआ था। वह प्रतिदिन बड़े प्रेम से लड्डू गोपाल की सेवा किया करती थी। प्रतिदिन उनको स्नान कराना, धुले वस्त्र पहनाना, दूध व फल आदि भोग अर्पित करना उसका नियम था। वह स्त्री लड्डू गोपाल के भोजन का भी विशेष ध्यान रखती थी। सर्दी, गर्मी, बरसात हर मौसम का ध्यान उसको रहता था। वह जब भी कभी बाहर जाती लड्डू गोपाल के लिए कोई ना कोई खाने की वस्तु, नए वस्त्र खिलोने आदि अवश्य लाती थी। लड्डू गोपाल के प्रति उसके मन में आपार प्रेम और श्रद्धा का भाव था। उधर जैन वृद्धा भी अपनी जैन परम्परा के अनुसार भगवान् के प्रति सेवा भाव में लगी रहती थी। उन दोनों स्त्रिओं के मध्य परस्पर बहुत प्रेम भाव था, दोनों ही एक दूसरे के भक्ति भाव और धर्म की प्रति पूर्ण सम्मान की भावना रखती थी। । जब किसी को कोई समस्या होती तो दूसरी उसका साथ देती, दोनों ही वृद्धाएं स्वाभाव से भी बहुत सरल और सज्जन थी। भगवान की सेवा के अतिरिक्त उनका जो भी समय शेष होता था वह दोनों एक दूसरे के साथ ही व्यतीत करती थीं। एक बार हिन्दू वृद्धा को एक माह के लिए तीर्थ यात्रा का अवसर प्राप्त हुआ उसने दूसरी स्त्री से भी साथ चलने का आग्रह किया किन्तु वृद्धावस्था के कारण अधिक ना चल पाने के कारण उस स्त्री ने अपनी विवशता प्रकट की, हिन्दु वृद्धा ने कहा कोई बात नहीं मै जहां भी जाउंगी भगवान् से तुम्हारे लिए प्रार्थना करुँगी। फिर वह बोली मैं तो एक माह में लिए चली जाउंगी तब तक मेरे पीछे मेरे लड्डू गोपाल का ध्यान रखना। उस जैन वृद्धा ने सहर्ष ही उसका यह अनुरोध स्वीकार कर लिया। हिन्दू वृद्धा ने उस जैन वृद्धा को लड्डू गोपाल की सेवा के सभी नियम व आवश्यकताएँ बता दी उस जैन वृद्धा ने सहर्ष सब कुछ स्वीकार कर लिया। कुछ दिन बाद वह हिन्दू वृद्धा तीर्थ यात्रा के लिए निकल गई। उसके जाने के बाद लड्डू गोपाल की सेवा का कार्य जैन वृद्धा ने अपने हाथ में लिया। वह बहुत उत्त्साहित थी कि उसको लड्डू गोपाल की सेवा का अवसर प्राप्त हुआ। उस दिन उसने बड़े प्रेम से लड्डू गोपाल की सेवा की, भोजन कराने से लेकर रात्रि में उनके शयन तक के सभी कार्य पूर्ण श्रद्धा के साथ वैसे ही पूर्ण किए जैसे उसको बताए गए थे। लड्डू गोपाल के शयन का प्रबन्ध करके वह भी अपने घर शयन के लिए चली गई। अगले दिन प्रातः जब वह वृद्धा लड्डू गोपाल के सेवा के लिए हिन्दू स्त्री के घर पहुंची तो उसने सबसे पहले लड्डू गोपाल को स्नान कराने की तैयारी की,नियम के अनुरूप जब वह लड्डू गोपाल को स्नान कराने लगी तो उसने देखा की लड्डू गोपाल के पाँव पीछे की और मुड़े हुए हैं। उसने पहले कभी लड्डू गोपाल के पाँव नहीं देखे थे जब भी उनको देखा वस्त्रों में ही देखा था। वह नहीं जानती थी की लड्डू गोपाल के पाँव हैं ही ऐसे, घुटनों के बल बैठे हुए। लड्डू गोपाल के पाँव पीछे की और देख कर वह सोंचने लगी अरे मेरे लड्डू गोपाल को यह क्या हो गया इसके तो पैर मुड़ गए है। उसने उस हिन्दू वृद्धा से सुन रखा था की लड्डू गोपाल जीवंत होते हैं। उसने मन में विचार किया की मैं इनके पैरो की मालिश करुँगी हो सकता है इनके पाँव ठीक हो जाएं। बस फिर क्या था भक्ति भाव में डूबी उस भोली भाली वृद्धा ने लड्डू गोपाल के पैरों की मालिश आरम्भ कर दी। उसके बाद वह नियम से प्रति दिन पांच बार उनके पैरों की मालिश करने लगी। उस भोली वृद्धा की भक्ति और प्रेम देख कर ठाकुर जी का हृदय द्रवित हो उठा, भक्त वत्सल भगवान् ने अपनी करुणा अपना प्रेम उस वृद्धा पर उड़ेल दिया। एक दिन प्रातः उस जैन वृद्धा ने देखा की लड्डू गोपाल के पाँव ठीक हो गए हैं और वह सीधे खड़े हो गए हैं, यह देख कर वह बहुत प्रसन्न हुई और दूसरी स्त्री के आने की प्रतीक्षा करने लगी। कुछ दिन पश्चात् दूसरी स्त्री वापस लोटी तो उसने घर आकर सबसे पहले अपने लड्डू गोपाल के दर्शन किये, किन्तु जैसे ही वह लड्डू गोपाल के सम्मुख पहुंची तो देखा कि वह तो अपने पैरों पर सीधे खड़े हैं, यह देखकर वह अचंभित रह गई। वह तुरंत उस दूसरी स्त्री के पास गई और उसको सारी बात बताई और पूंछा कि मेरे लड्डू गोपाल कहा गए। यह सुनकर उस जैन स्त्री ने सारी बात बता दी उसकी बात सुनकर वह वृद्ध स्त्री सन्न रह गई और उसको लेकर अपने घर गई वहां जाकर उसने देखा तो लड्डू गोपाल मुस्करा रहे थे, वह लड्डू गोपाल के चरणों में गिर पड़ी और बोली है गोपाल आपकी लीला निराली है, मैंने इतने वर्षो तक आपकी सेवा की किन्तु आपको नहीं पहचान सकी। तब वह उस जैन वृद्धा से बोली की तू धन्य है, तुझको नहीं मालूम की हमारे लड्डू गोपाल के पाँव तो ऐसे ही हैं, पीछे की और किन्तु तेरी भक्ति और प्रेम ने तो लड्डू गोपाल के पाँव भी सीधे कर दिये l उस दिन के बाद उन दोनों स्त्रिओं के मध्य प्रेम भाव और अधिक बड़ गया दोनों मिल कर लड्डू गोपाल की सेवा करने लगी। वह दोनों स्त्री जब तक जीवित रही तब तक लड्डू गोपाल की सेवा करती रहीं। राधे राधे🙏🙏

लड्डू गोपाल की सेवा,,,,,

एक नगर में दो वृद्ध स्त्रियां बिल्कुल पास पास रहा करती थी। उन दोनो में बहुत घनिष्ठता थी। उन दोनों का ही संसार में कोई नहीं था इसलिए एक दूसरे का सदा साथ देतीं और अपने सुख-दुःख आपस में बाँट लेती थीं। एक स्त्री हिन्दू थी तथा दूसरी जैन धर्म को मानने वाली थी। हिन्दू वृद्धा ने अपने घर में लड्डू गोपाल को विराजमान किया हुआ था। वह प्रतिदिन बड़े प्रेम से लड्डू गोपाल की सेवा किया करती थी। प्रतिदिन उनको स्नान कराना, धुले वस्त्र पहनाना, दूध व फल आदि भोग अर्पित करना उसका नियम था। वह स्त्री लड्डू गोपाल के भोजन का भी विशेष ध्यान रखती थी। सर्दी, गर्मी, बरसात हर मौसम का ध्यान उसको रहता था। वह जब भी कभी बाहर जाती लड्डू गोपाल के लिए कोई ना कोई खाने की वस्तु, नए वस्त्र खिलोने आदि अवश्य लाती थी। लड्डू गोपाल के प्रति उसके मन में आपार प्रेम और श्रद्धा का भाव था। उधर जैन वृद्धा भी अपनी जैन परम्परा के अनुसार भगवान् के प्रति सेवा भाव में लगी रहती थी। उन दोनों स्त्रिओं के मध्य परस्पर बहुत प्रेम भाव था, दोनों ही एक दूसरे के भक्ति भाव और धर्म की प्रति पूर्ण सम्मान की भावना रखती थी। । जब किसी को कोई समस्या होती तो दूसरी उसका साथ देती, दोनों ही वृद्धाएं स्वाभाव से भी बहुत सरल और सज्जन थी। भगवान की सेवा के अतिरिक्त उनका जो भी समय शेष होता था वह दोनों एक दूसरे के साथ ही व्यतीत करती थीं।
एक बार हिन्दू वृद्धा को एक माह के लिए तीर्थ यात्रा का अवसर प्राप्त हुआ उसने दूसरी स्त्री से भी साथ चलने का आग्रह किया किन्तु वृद्धावस्था के कारण अधिक ना चल पाने के कारण उस स्त्री ने अपनी विवशता प्रकट की, हिन्दु वृद्धा ने कहा कोई बात नहीं मै जहां भी जाउंगी भगवान् से तुम्हारे लिए प्रार्थना करुँगी। फिर वह बोली मैं तो एक माह में लिए चली जाउंगी तब तक मेरे पीछे मेरे लड्डू गोपाल का ध्यान रखना। उस जैन वृद्धा ने सहर्ष ही उसका यह अनुरोध स्वीकार कर लिया। हिन्दू वृद्धा ने उस जैन वृद्धा को लड्डू गोपाल की सेवा के सभी नियम व आवश्यकताएँ बता दी उस जैन वृद्धा ने सहर्ष सब कुछ स्वीकार कर लिया।
कुछ दिन बाद वह हिन्दू वृद्धा तीर्थ यात्रा के लिए निकल गई। उसके जाने के बाद लड्डू गोपाल की सेवा का कार्य जैन वृद्धा ने अपने हाथ में लिया। वह बहुत उत्त्साहित थी कि उसको लड्डू गोपाल की सेवा का अवसर प्राप्त हुआ। उस दिन उसने बड़े प्रेम से लड्डू गोपाल की सेवा की, भोजन कराने से लेकर रात्रि में उनके शयन तक के सभी कार्य पूर्ण श्रद्धा के साथ वैसे ही पूर्ण किए जैसे उसको बताए गए थे। लड्डू गोपाल के शयन का प्रबन्ध करके वह भी अपने घर शयन के लिए चली गई।
अगले दिन प्रातः जब वह वृद्धा लड्डू गोपाल के सेवा के लिए हिन्दू स्त्री के घर पहुंची तो उसने सबसे पहले लड्डू गोपाल को स्नान कराने की तैयारी की,नियम के अनुरूप जब वह लड्डू गोपाल को स्नान कराने लगी तो उसने देखा की लड्डू गोपाल के पाँव पीछे की और मुड़े हुए हैं। उसने पहले कभी लड्डू गोपाल के पाँव नहीं देखे थे जब भी उनको देखा वस्त्रों में ही देखा था। वह नहीं जानती थी की लड्डू गोपाल के पाँव हैं ही ऐसे, घुटनों के बल बैठे हुए। लड्डू गोपाल के पाँव पीछे की और देख कर वह सोंचने लगी अरे मेरे लड्डू गोपाल को यह क्या हो गया इसके तो पैर मुड़ गए है। उसने उस हिन्दू वृद्धा से सुन रखा था की लड्डू गोपाल जीवंत होते हैं। उसने मन में विचार किया की मैं इनके पैरो की मालिश करुँगी हो सकता है इनके पाँव ठीक हो जाएं। बस फिर क्या था भक्ति भाव में डूबी उस भोली भाली वृद्धा ने लड्डू गोपाल के पैरों की मालिश आरम्भ कर दी। उसके बाद वह नियम से प्रति दिन पांच बार उनके पैरों की मालिश करने लगी। उस भोली वृद्धा की भक्ति और प्रेम देख कर ठाकुर जी का हृदय द्रवित हो उठा, भक्त वत्सल भगवान् ने अपनी करुणा अपना प्रेम उस वृद्धा पर उड़ेल दिया। एक दिन प्रातः उस जैन वृद्धा ने देखा की लड्डू गोपाल के पाँव ठीक हो गए हैं और वह सीधे खड़े हो गए हैं, यह देख कर वह बहुत प्रसन्न हुई और दूसरी स्त्री के आने की प्रतीक्षा करने लगी।
कुछ दिन पश्चात् दूसरी स्त्री वापस लोटी तो उसने घर आकर सबसे पहले अपने लड्डू गोपाल के दर्शन किये, किन्तु जैसे ही वह लड्डू गोपाल के सम्मुख पहुंची तो देखा कि वह तो अपने पैरों पर सीधे खड़े हैं, यह देखकर वह अचंभित रह गई। वह तुरंत उस दूसरी स्त्री के पास गई और उसको सारी बात बताई और पूंछा कि मेरे लड्डू गोपाल कहा गए। यह सुनकर उस जैन स्त्री ने सारी बात बता दी उसकी बात सुनकर वह वृद्ध स्त्री सन्न रह गई और उसको लेकर अपने घर गई वहां जाकर उसने देखा तो लड्डू गोपाल मुस्करा रहे थे, वह लड्डू गोपाल के चरणों में गिर पड़ी और बोली है गोपाल आपकी लीला निराली है, मैंने इतने वर्षो तक आपकी सेवा की किन्तु आपको नहीं पहचान सकी। तब वह उस जैन वृद्धा से बोली की तू धन्य है, तुझको नहीं मालूम की हमारे लड्डू गोपाल के पाँव तो ऐसे ही हैं, पीछे की और किन्तु तेरी भक्ति और प्रेम ने तो लड्डू गोपाल के पाँव भी सीधे कर दिये l
उस दिन के बाद उन दोनों स्त्रिओं के मध्य प्रेम भाव और अधिक बड़ गया दोनों मिल कर लड्डू गोपाल की सेवा करने लगी। वह दोनों स्त्री जब तक जीवित रही तब तक लड्डू गोपाल की सेवा करती रहीं।

 राधे राधे🙏🙏

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कामेंट्स

Naresh Kumar Kashyp Jan 18, 2020
जय श्री राधे राधे कृष्ण‌‌‌ जी

Pukhraj Purohit Jan 18, 2020
Vishwas sabse Badi taqat Hoti he.Radhe Radhe ji👌🙏🌹🌹

Uday kant mishra Jan 18, 2020
Jay shri bhakt vatsal ki🕉🕉🍋🍋🌻🌻🚩🇲🇰🇲🇰🇲🇰🇲🇰🇲🇰🇲🇰🇲🇰🇲🇰🇲🇰🇲🇰🇲🇰🇲🇰🇲🇰🇲🇰🇲🇰🇲🇰🇲🇰🇲🇰🇲🇰🇲🇰🇲🇰🚩

A. A Jan 18, 2020
Jai shree Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe🙏🙏🙏🙏🙏 Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe Radhe 🙏🙏👣👣

kamlesh Jan 19, 2020
क्या बात है 🙏🏻🙏🏻

Ajay Tiwari Jan 21, 2020
जय श्री राधे कृष्णा, जय हो प्रभु।

संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌼🌼🌼〰️〰️ ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ★ब्राह्म पर्व★ (एक सौ सत्ताईसवाँ दिन) सौरधर्म का वर्णन... 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ गतांक से आगे... राजा शतानीक ने पूछा-मुने! भगवान् सूर्य का महात्म्य कीर्तिवर्धक और सभी पापों का नाशक है। मैंने भगवान् सूर्यनारायण के समान लोक में किसी अन्य देवताको नहीं देखा। जो भरण-पोषण और संहार भी करने वाले हैं वे भगवान् सूर्य किस प्रकार प्रसन्न होते हैं, उस धर्म को आप अच्छी तरह जानते हैं। मैंने वैष्णव, शैव, पौराणिक आदि धर्मों का श्रवण किया है। अब मैं सौरधर्म को जानना चाहता हूँ। इसे आप मुझे बतायें। सुमन्तु मुनि बोले-राजन्! अब आप सौरधर्म के विषय में सुनें। यह सौरधर्म सभी धर्मों में श्रेष्ठ और उत्तम है। किसी समय स्वयं भगवान् सूर्य ने अपने सारथि अरुण से इसे कहा था। सौरधर्म अन्धकार रूपी दोष को दूरकर प्राणियों को प्रकाशित करता है। और यह संसार के लिये महान् कल्याणकारी है। जो व्यक्ति शान्तचित्त होकर सूर्य की भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह सुख और धन-धान्यसे परिपूर्ण हो जाता है। प्रात:, मध्याह्न और सायं-त्रिकाल अथवा एक ही समय सूर्य की उपासना अवश्य करनी चाहिये। जो व्यक्ति सूर्यनारायण का भक्ति पूर्वक अर्चन, पूजन और स्मरण करता है, वह सात जन्मों में किये गये सभी प्रकार के पापों से मुक्त हो जाता है। जो भगवान् सूर्य की सदा स्तुति, प्रार्थना और आराधना करते हैं, वे प्राकृत मनुष्य न होकर देवस्वरूप ही हैं। षोडशाङ्ग-पूजन-विधि को स्वयं सूर्यनारायण ने कहा है, वह इस प्रकार है- प्रांत: स्रान कर शुद्ध वस्त्र धारण करना चाहिये। जप, हवन, पूजन, अर्चनादि कर सूर्य को प्रणाम करके भक्तिपूर्वक ब्राह्मण, गाय, पीपल आदि की पूजा करनी चाहिये। भक्तिपूर्वक इतिहास-पुराण का श्रवण और ब्राह्मणों को वेदाभ्यास करना चाहिये। सबसे प्रेम करना चाहिये। स्वयं पूजनकर लोगों को पुराणादि ग्रन्थों की व्याख्या सुनानी चाहिये। मेरा नित्य-प्रति स्मरण करना चाहिये। इस प्रकार के उपचारों से जो अर्चन-पूजन-विधि बतायी गयी है, वह सभी प्रकार के लोगों के लिये उत्तम है। जो कोई इस प्रकार से भक्तिपूर्वक मेरा पूजन करता है, वही मुनि, श्रीमान्, पण्डित और अच्छे कुल में उत्पन्न है। जो कोई पत्र, पुष्प, फल, जल आदि जो भी उपलब्ध हो उससे मेरी पूजा करता है उसके लिये न में अदृश्य हूँ और न वह मेरे लिये अदृश्य है । मुझे जो व्यक्ति जिस भावना से देखता है, मैं भी उसे उसी रूप में दिखायी पड़ता हूँ। जहाँ मैं स्थित हूँ, वहीं मेरा भक्त भी स्थित होता है । जो मुझ सर्वव्यापी को सर्वत्र और सम्पूर्ण प्राणियों में स्थित देखता है, उसके लिये मैं उसके हृदय में स्थित हूँ और वह मेरे हृदय में स्थित है । सूर्य की पूजा करने वाला व्यक्ति बड़े-बड़े राजाओं पर विजय प्राप्त कर लेता है। जो व्यक्ति मन से मेरा निरन्तर ध्यान करता रहता है, उसकी चिन्ता मुझे बराबर बनी रहती है कि कहीं उसे कोई दु:ख न होने पाये। मेरा भक्त मुझको अत्यन्त प्रिय है। मुझमें अनन्य निष्ठा ही सब धर्मो का सार है। क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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vinodkumar mahajan Jan 26, 2020

जय जगन्नाथ 🌹🙏 राजा विक्रमादित्य की मृत्यु *कैसे हुई, उनकी मृत्यु के बाद उनके स्वर्ण सिंहासन का क्या हुआ❓* क्या वह आज भी धरती के अन्दर दबा हुआ है...... ‘राजा विक्रमादित्य जब वृद्ध हो गए थे तथा अपने योगबल से उन्होंने यह भी जान लिया था कि उनका अन्त अब काफी निकट ही है । वह राज-काज और धर्म कार्य दोनों में अपने को लगाए रखते थे । उन्होंने वन में भी साधना के लिए एक कुटिया बना रखी थी । एक दिन उसी कुटिया में एक रात उन्हें अलौकिक प्रकाश कहीं दूर से आता मालूम पड़ा । उन्होंने ध्यान से देखा तो पता चला कि सारा प्रकाश सामने वाली पहाड़ियों से आ रहा था । इस प्रकाश के बीच उन्हें एक दमकता हुआ सुन्दर सा भवन दिखाई पड़ा । उनके मन में भवन देखने की जिज्ञासा हुई और उन्होंने माँ काली द्वारा प्रदत्त दोनों बेतालों का स्मरण किया । उनके आदेश पर दोनों बेताल उन्हें पहाड़ी पर ले आए और उनसे बोले कि वह इसके आगे नहीं जा सकते । कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि उस भवन के चारों ओर एक योगी महात्मा ने तंत्र शक्ति का घेरा डाल रखा है तथा उस भवन में उनका निवास है । उन घेरों के भीतर वही प्रवेश कर सकता है जिसका पुण्य उन योगी से अधिक हो । विक्रमादित्य जी ने वास्तविकता जानकर भवन की ओर कदम बढ़ा दिया । वह देखना चाहते थे कि उनका पुण्य उन योगी से अधिक है या नहीं । चलते-चलते वह भवन के प्रवेश द्वार तक आ गए । तभी एकाएक कहीं से चलकर एक अग्नि पिण्ड आया और उनके पास स्थिर हो गया । उसी समय महल के भीतर से किसी का आज्ञा भरा स्वर सुनाई पड़ा । वह अग्निपिण्ड लगभग फिसलता हुआ पीछे चला गया और प्रवेश द्वार साफ़ हो गया । विक्रम अन्दर घुसे तो वही आवाज़ उनसे उनका परिचय पूछने लगी । उन्होंने कहा कि सब कुछ साफ़-साफ़ बताया जाए नहीं तो वह आने वाले को श्राप से भस्म कर देंगे । विक्रमादित्य तब तक कक्ष में पहुँच चुके थे और उन्होंने देखा कि एक योगी उन्हें देख कर उठ खड़े हुए । उन्होंने जब उन योगी को बताया कि वह विक्रमादित्य हैं तो योगी ने अपने को भाग्यशाली बताया । योगी महात्मा ने बताया कि विक्रमादित्य के दर्शन होंगे यह आशा उन्हें नहीं थी । योगी ने उनका खूब आदर-सत्कार किया तथा विक्रमादित्य जी से कुछ माँगने को बोले । राजा विक्रमादित्य ने उनसे तमाम सुविधाओं सहित वह भवन माँग लिया । विक्रमादित्य को वह भवन प्रसन्नता पूर्वक सौंपकर वह योगी महात्मा उसी वन में कहीं चले गए । चलते-चलते वह योगी काफी दूर पहुंचे तो उनकी भेंट उनके गुरु से हुई । उनके गुरु ने उनसे इस तरह भटकने का कारण जानना चाहा तो वह बोले कि भवन उन्होंने राजा विक्रमादित्य को दान कर दिया है। उनके गुरु को हँसी आ गई । उन्होंने कहा कि इस पृथ्वी के सर्वश्रेष्ठ दानवीर को वह क्या दान करेंगे और उन्होंने उन्हें विक्रमादित्य के पास जाकर ब्राह्मण रूप में अपना भवन फिर से माँग लेने को कहा । वह योगी वेश बदलकर उस कुटिया में विक्रमादित्य जी से मिले जिसमें वह साधना करते थे । उन योगी ने रहने की जगह की याचना की । विक्रम ने उनसे अपनी इच्छित जगह माँगने को कहा तो उन्होंने वह भवन माँगा । विक्रमदित्य ने मुस्कुराकर कहा कि वह भवन ज्यों का त्यों छोड़कर वह उसी समय आ गए थे । उन्होंने बस उनकी परीक्षा लेने के लिए उनसे वह भवन मांग लिया था । राजा विक्रमादित्य भले ही देवताओं से बढ़कर गुण वाले थे और इन्द्रासन के अधिकारी माने जाते थे, किन्तु वह थे तो मानव ही । मृत्युलोक में जन्म लिया था, इसलिए एक दिन उन्होंने इहलीला त्याग दी । उनके मरते ही सर्वत्र हाहाकार मच गया । उनकी प्रजा शोकाकुल होकर रोने लगी । जब उनकी चिता सजी तो उनकी चिता पर देवताओं ने फूलों की वर्षा की । उनके बाद उनके सबसे बड़े पुत्र को राजा घोषित किया गया । उसका धूमधाम से तिलक हुआ । मगर वह उनके सिंहासन पर नहीं बैठ सका । उसको पता नहीं चला कि पिता के सिंहासन पर वह क्यों नहीं बैठ सकता है । वह उलझन में पड़ा था कि एक दिन स्वप्न में विक्रमादित्य जी खुद आए । उन्होंने पुत्र को उस सिंहासन पर बैठने के लिए पहले देवत्व प्राप्त करने को कहा । उन्होंने उसे कहा कि जिस दिन वह अपने पुण्य-प्रताप तथा यश से उस सिंहासन पर बैठने लायक होगा तो वह खुद उसे स्वप्न में आकर बता देंगे । किन्तु विक्रमादित्य उसके सपने में नहीं आए तो उसे नहीं सूझा कि इस सिंहासन का किया क्या जाए । पंडितों और विद्वानों के परामर्श पर वह एक दिन पिता का स्मरण करके सोया तो विक्रम उसके सपने में आए । सपने में उन्होंने उससे उस सिंहासन को ज़मीन में गड़वा देने के लिए कहा तथा उसे उज्जैन छोड़कर अम्बावती में अपनी नई राजधानी बनाने की सलाह दी । *उन्होंने कहा कि जब भी पृथ्वी पर सर्वगुण सम्पन्न कोई राजा कालान्तर में पैदा होगा, यह सिंहासन खुद-ब-खुद उसके अधिकार में चला जाएगा ।* पिता के स्वप्न वाले आदेश को मानकर उसने सुबह में श्रमिकों को बुलवाकर एक खूब गहरा गड्ढा खुदवाया तथा उस सिंहासन को उसमें समाहित करवा दिया । इसके बाद वह खुद अम्बावती को अपनी नई राजधानी बनवाकर शासन करने लगा । सोचिऐ यह लगभग २०७६ वर्ष पूर्व की घटना है। यह है भारत के सनातनी कुलवंशी। हरि ॐ🌹🙏

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माघ मास महात्म्य पंद्रहवाँ अध्याय 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ दत्तात्रेयजी कहने लगे कि हे राजन! प्रजापति ने पापों के नाश के लिए प्रयाग तीर्थ की रचना की. सफेद (गंगाजी) और काली(यमुनाजी) के जल की धारा में स्नान का माहात्म्य भली प्रकार सुनो. जो इस संगम में माघ मास में स्नान करता है वह गर्भ योनि में नहीं आता. भगवान विष्णु की दुर्गम माया माघ में प्रयाग तीर्थ पर सब नष्ट कर देती है. माघ मास में प्रयाग में स्नान करने से मनुष्य अच्छे भोगों को भोगकर ब्रह्म को प्राप्त होता है. माघ मास तथा मकर के सूर्य में जो प्रयाग में स्नान करता है उसके पुण्यों की गिनती चित्रगुप्त भी नहीं कर सकता. सौ वर्ष तक निराहार रहकर जो पुण्य प्राप्त होता है वही फल माघ मास में तीन दिन प्रयाग में स्नान करने से होता है, जो फल सौ वर्ष तक योगाभ्यास करने से मिलता है. जैसे सर्प पुरानी केंचुली को छोड़कर नया रुप ग्रहण कर लेता है वैसे ही माघ मास में स्नान करने से मनुष्य पापों को छोड़कर स्वर्ग को प्राप्त होता है परंतु गंगा-यमुना के संगम में स्नान करने से हजारों गुना फल मिलता है. हे राजन! जिसको अमृत कहते हैं वह यह त्रिवेणी ही है. ब्रह्मा, शिव, रुद्र, आदित्य, मरुतगण, गंधर्व, लोकपाल, यक्ष, गुह्यक, किन्नर, अणिमादि गुणों से सिद्ध, तत्वज्ञानी, ब्रह्माणी, पार्वती, लक्ष्मी, शची, नैना, दिति, अदिति, सम्पूर्ण देव पत्नियाँ तथा नागों की स्त्रियों, घृताचीं, मेनका, उर्वशी, रम्भा, तिलोत्तमा, अप्सरा गण और सब पितर, मनुष्य गण कलियुग में गुप्त और सतयुगादि में प्रत्यक्ष सब देवता माघ मास में स्नान करने के लिए आते हैं. इन दिनों माघ मास में प्रयाग में स्नान करने से जो फल मिलता है वह ईश्वर ही कह सकता है, मनुष्य में कहने की शक्ति नहीं है. हजारों अश्वमेघ यज्ञ करने से भी यह फल प्राप्त  नहीं होता. पूर्व समय में कांचन मालिनी ने इस स्नान का फल राक्षस को दिया था और इससे वह पापी मुक्त हो गया था. क्रमशः.. 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (उत्पत्ति-प्रकरण) (पंचम दिवस) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः मन के स्वरूप का विवेचन, मन एवं मनकल्पिलत दृश्य जगत की असत्ता का निरूपण तथा महाप्रलय काल में समस्त जगत को अपने मे लीन करके एकमात्र परमात्मा ही शेष रहते है और वे ही सबके मूल है, इसका प्रतिपादन...(भाग 2) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ गतांक से आगे... श्रीवसिष्ठजी ने कहा-रधुनन्दन ! जिस वस्तु की सत्ता है, उसका कभी नाश नहीं होता। यह जो कुछ आकाश आदि भूत और अहंकार के रूप में लक्षित होता है, वह सब व्यवहार दर्शा में जगत् है, किंतु परमार्थ दशा में ब्रह्म है । बह्म के सिवा 'जगत्' शब्द का दूभरा कोई वास्तविक अर्थ है ही नहीं । हमारे सामने यह जो कुछ दृश्य-प्रपश्च दृष्टिगोचर होता है, वह सब अजर, अमर एवं अव्यय पर ब्रह्म ही है। सर्वत्र पूर्ण का प्रसार हो रहा है। शान्त परब्रह्म में शान्त जगत् स्थित है । आकाश में ही आकाश का उदय हुआ है तथा ब्रह्म में ही ब्रह्म प्रतिष्ठित है। वास्तव में न तो दश्य सत्-रूप है, न द्रष्टी, न दर्शन, न शून्य, न जड और न चित् ही सद्रूप है। केवल शान्त स्वरूप ब्रह्म ही सद्रूप है, जो सर्वत्र व्याप्त है । यह जगत् सृष्टि के आदि में उस्पन्न नहीं हुआ था, इसलिये इसका अस्तित्व सर्वथा नहीं है । जैसे स्वप्न आदि में मन से ही नगर की प्रतीति होती है, उसी प्रकार यह जगत् भी मन से ही उत्पन्न होकर प्रतीति का विषय हो रहा है । स्वयं मन ही सृष्टि के आदि में उत्पन्न न होने के कारण असत्-स्वरूप है, उस असत्-रूप मन से कल्पित होने के कारण भी यह जगत् असत् ही है। फिर जिस प्रकार इसका अनुभव होता है, वह बता रहा हूँ, सुनो । मन निरन्तर क्षीण होने वाले इस दश्य रूपी दोष का विस्तार करता है । वह स्व्रयं असत्-रूप ही है, तो भी सत्-सा प्रतीत होने वाले जगत् की सृष्टि करता है-ठीक उसी तरह, जैसे स्वप्न असत् होता हुआ भी सत्-सा प्रतीत होने वाले जगत् की सृष्टि करता है । मन ही अपनी इच्छा के अनुसार स्वयं शीघ्र ही शरीर की कल्पना कर लेता है । वही चिरकाल की भावना से विस्तार को प्राप्त होकर इस ऐन्द्रजालिक वैभव रूप दृश्य जगत् का विस्तार करता है । चञ्चल शक्ति से युक्त होने के कारण केवल यह मन ही स्वयं स्फुरित होता, उछलता, कूदता; जाता, आता, याचना करता, धूमता, गोते लगाता, संहार करता और अपकर्षको प्राप्त होता है। श्रीराम ! महाप्रळय होने पर जब जगत् अति सूक्ष्म रूप से स्थित होने के कारण अपने कार्य में असमर्थ हो जाता है, उस समय वह सम्पूर्ण भावी दृश्यवर्ग की सृष्टि से पहले विक्षेप रहित शान्तावस्था में ही शेष रहता है। उस प्रलयकाल में केवल कभी अस्त न होनेवाले सूर्यदेव स्वयंज्योति, अजन्मा, रोग-शोक से रहित, सदा सर्वशक्तिमान् , सर्वस्वरूप, परमात्मा महेश्वर ही विराजमान होते हैं। जहाँ से वाणी उन्हें न पाकर लौट आती है अर्थात् जहाँ वाणी की पहुँच नहीं हो पाती, जो जीवन् मुक्त महात्माओ के द्वारा जाने जाते हैं, सांख्यदर्शन के अनुयायी जिन्हें 'पुरुष' कहते हैं, वेदान्तवादी 'ब्रह्म' नाम से जिनका चिन्तन करते हैं, ज्ञानवेत्ताओं की दृष्टि में जो परम निर्मल विद्यमान हैं, जिन्हें शून्यवादी शून्य कहते हैं, सूर्य के प्रकाश के भी प्रकाशक हैं; जैसे नदी-नाले आदि के जल अन्ततोगत्वा महासागरमें ही गिरते हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण दश्यसमूह महाप्रलयकाल में जिनमें ही विलीन होते है; जो आकाश में, विभिन्न शरीरों में, प्रस्तरों में, जल में, लताओं में, धूलिकणों में, पर्वतों में, वायु में और पाताल आदि सभी देश, काल एवं वस्तुओं में समान भाव से स्थित हैं; जिन्होंने आकाश को शून्य पर्वतों को वनीभूत और जल को द्रवीभूत बनाया है, जगत् को दीपक की भाँति प्रकाशित करने वाले सूर्य जिनके अधीन हैं; जैसे मरुभूमि में सूर्य की तपती हुई किरणों के भीतर जलराशि लहराती दिखायी देती है, उसी प्रकार जिन अत्यन्त व्यापक परमात्मारूपी महासाग रमें आविर्भाव और तिरोभाव (उत्पत्ति और प्रलय ) से युक्त त्रिलोक रूपिणी तरङ्गे उठती रहती हैं, जो सम्पूर्ण व्यावहारिक सत्ताओं से ऊँचे उठे हुए-सर्वविलक्षण पारमार्थिक सत्ता से सम्पन्न हैं, जिनसे ही नियति, देश, काल, चलन, चेष्टा और क्रिया आदि समस्त भावों को कार्य निर्वाह की क्षमता प्राप्त दुई है- वे एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही उक्त महाप्रलय के समय शेष रहते हैं । वे परमात्मा उत्पत्ति-स्थिति आदि से रहित, कभी अस्त न होने वाले, निस्य प्रकाशमान ज्ञान से परिपूर्ण एवं विकारशून्य अपने स्वरूप में ही स्थित हैं । वे एकमात्र- अद्वितीय ही हैं। अतएव वे माया से अनेक विशाल संसारों - अगणित ब्रह्माण्डों की रचना करते हुए भी वास्तव में न कोई कार्य करते हैं और न उनसे कोई चेष्टाएँ ही बनती हैं। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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दुःख ईश्वर का प्रसाद है 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔸 जब भगवान सृष्टि की रचना कर रहे तो उन्होंने जीव को कहा कि तुम्हे मृतुलोक जाना पड़ेगा,मैं सृष्टि की रचना करने जा रहा हूँ. ये सुन जीव की आँखों मे आंसू आ गए.वो बोला प्रभु कुछ तो ऐसा करो की मे लौटकर आपके पास ही आऊ. भगवान को दया आ गई. उन्होंने दो बाते की जीव के लिए. पहला संसार की हर चीज़ मे अतृप्ति मिला दी, कि तुझे दुनिया मे कुछ भी मिल जाये तू तृप्त नहीं होगा. तृप्ति तुझे तभी मिलेगी जब तू मेरे पास आएगा और दूसरा सभी के हिस्से मे थोडा-थोडा दुःख मिला दिया कि हम लौट कर ईश्वर के पास ही पहुचे. इस तरह हर किसी के जीवन मे थोडा दुःख है. जीवन मे दुःख या विषाद हमें ईश्वर के पास ले जाने के लिए है, लेकिन हम चूक जाते है. हमारी समस्या क्या है कि हर किसी को दुःख आता है, हम भागते है ज्योतिष के पास,अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के पास. कुछ होने वाला नहीं. थोड़ी देर का मानसिक संतोष बस. यदि दुखो से घबराये नहीं और ईश्वर का प्रसाद समझ कर आगे बढे तो बात बन जाती है. यदि हम ईश्वर से विलग होने के दिनों को याद कर ले तो बात बन जाती है और जीव दुखो से भी पार हो जाता है. दुःख तो ईश्वर का प्रसाद है. दुखो का मतलब है, ईश्वर का बुलावा है. वो हमें याद कर रहा है पहले भी ये विषाद और दुःख बहुत से संतो के लिए ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बन चुका है. हमें ये बात अच्छे से समझनी चाहिए कि संसार मे हर चीज़ मे अतृप्ति है और दुःख और विषाद ईश्वर प्राप्ति का साधन है. "जय जय श्री राधे " 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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Vijay Yadav Jan 26, 2020

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌼🌼🌼〰️〰️ ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ★ब्राह्म पर्व★ (एक सौ छब्बीसवाँ दिन) भगवान आदित्य की सप्तावरण-पूजन-विधि... 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ गतांक से आगे... भगवान् श्रीकृष्ण बोले-वत्स! अब मैं दिवाकर भगवान् सूर्यनारायण की पूजा विधि बतलाता हूँ। एक वेदी पर अष्टदल कमलयुक्त मण्डल बनाकर उसमें कालचक्र की कल्पना करनी चाहिये। उसे बारह अरों से युक्त होना चाहिये। ये ही सर्वात्मा, सभी देवताओं में श्रेष्ठ, उज्ज्वल किरणों से युक्त खखोल्क नामक भगवान् सूर्यदेव हैं। इसमें हजार किरणों से युक्त चतुर्बाहु भगवान् सूर्य की पूजा करनी चाहिये। इनके पश्चिम में अरुण, दक्षिण में निक्षुभा देवी, दक्षिण में ही रेवन्त तथा उत्तर में पिंगल की पूजा करनी चाहिये और वहीं संज्ञा की भी पूजा करनी चाहिये। अग्नि कोण में लेखक की, नैर्ऋत्य में अश्विनीकुमारों की और वायव्यकोण में वैवस्वत मनु की तथा ईशान कोण में लोकपावनी देवी यमुना की पूजा करनी चाहिये। द्वितीय आवरण में पूर्व में आकाश की, दक्षिण में देवी की, पश्चिम में गरुड की और उत्तर में नागराज ऐरावत की पूजा शुभ होती है। अग्निकोण में हेलि, नै्ऋत्यकोण में प्रहेलि, वायव्य में उर्वशी और ईशानकोण में विनता देवी की पूजा करनी चाहिये। तृतीयावरण में पूर्व में शुक्र, पश्चिम में शनि, उत्तर में बृहस्पति, ईशान में बुध और मण्डल के अग्निकोण में चन्द्रमा की पूजा करनी चाहिये। नैरऋत्य कोण में राहु तथा वायव्यकोण में केतु की पूजा करनी चाहिये। चौथे आवरण में लेखक, शाण्डिली पुत्र, यम, विरूपाक्ष, वरुण, वायुपुत्र, ईशान तथा कुबेर आदि की उन -उनकी दिशाओं में पूजा करनी चाहिये। पाँचवें आवरण में पूर्वादि क्रम से महाश्वेता, श्री, ऋद्धि, विभूति, धृति, उन्नति, पृथ्वी तथा महाकीर्ति आदि देवियों की पूजा करनी चाहिये तथा इन्द्र, विष्णु, अर्यमा, भग, पर्जन्य,विवस्वान्, अर्क, त्वष्टा आदि द्वादश आदित्यों की पूजा छठे आवरण में करनी चाहिये। सिर, नेत्र, अस्त्र-शस्त्र से युक्त रथ सहित सूर्य की सातवें आवरण में पूजा करनी चाहिये। यक्ष, गन्धर्व, मासाधिपति तथा संवत्सर आदि की भी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद भगवान् भास्कर का पुष्प, गन्ध आदि से विधिपूर्वक पूजन कर-'ॐ खखोल्काय नम: ' इस मूल मन्त्र से अपने अङ्गों का स्पर्श अर्थात हृदयादिन्यास करते हुए पूजन करना चाहिये। जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक इस विधि से सूर्य की नित्य अथवा दोनों पक्षों की सप्तमी के दिन पूजन करता है, वह परमपद को प्राप्त कर लेता है। क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (उत्पत्ति-प्रकरण) (चतुर्थ दिवस) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः मन के स्वरूप का विवेचन, मन एवं मनकल्पिलत दृश्य जगत की असत्ता का निरूपण तथा महाप्रलय काल में समस्त जगत को अपने मे लीन करके एकमात्र परमात्मा ही शेष रहते है और वे ही सबके मूल है, इसका प्रतिपादन...(भाग 1) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ गतांक से आगे... श्रीरामचन्द्रजी ने पूछा- भगवन् ! मन का स्वरूप कैसा है, यह मुझे स्पष्ट रूप से बताइये; क्योंकि मन ही इस सम्पूर्ण लोकंमञ्जरी का विस्तार करता है। श्रीवसिष्ठजी ने कहा--श्रीराम ! जैसे शून्य तथा जड कोई आकार वाले आकाश का नाममात्र के अतिरिक्त दूसरा रूप दृष्टिगोचर नहीं होता, उसी प्रकार शून्य एवं जड रूप इस संकल्पात्मक मन का नाम के सिवा कोई भी वास्तविक रूप नहीं दिखायी देता। यह जगत् क्षणिक संकल्परूपी मन से उत्पन्न हुआ है। मृगतृष्णा में प्रतीत होने वाले जल तथा चन्द्रमा में भ्रम से दीखने वाले द्वितीय चंद्रमा के समान ही इस मनःकल्पित जगत् का स्वरूप है। रघुनन्दन ! संकल्प को ही मन समझो। जैसे द्रवस्व (द्रवरूपता) से जल का भेद नहीं है और जैसे वायु से स्पन्दन (चेष्टा या गतिशीलता) भिन्न नहीं है, उसी प्रकार संकल्प से मन भिन्न नहीं है । प्रियवर श्रीराम ! जिस विषय के लिये सङ्कल्प होता है, उसमें मन सङ्कल्प रूप से स्थित रहता है । तात्पर्य यह कि जो सङ्कल्प है वही मन है। सङ्कल्प और मन को कभी कोई पृथक् नहीं कर पाया है (इन दोनों के पार्थक्य का अनुभव किसी को नहीं हुआ है)। मन को सङ्कल्प मात्र समझो। वह समष्टिगत मन ही पितामह ब्रह्मा है। अतिवाहिक देह (सङ्कल्पमय शरीर) रूपी ब्रह्मा को लोक में समष्टिगत मन कहा गया है। अतिद्या, संसार, चित्त, मन, बन्धन, मळ और तम-इन्हें श्रेष्ठ विद्वानों ने दृश्य के पर्यायवाची नाम माना है । संकल्प रूप दृश्य से अतिरिक्त मन का कुछ भी स्वरूप नहीं हैं । यह दृश्य-प्रपञ्च वास्तव में उत्पन्न ही नहीं हुआ है, यह बात में आगे चलकर फिर बताऊँगा। जैसे प्रकाश का आलोक स्वभाव है, जैसे चपलता वायु का स्वभाव है और जिस प्रकार द्रवीभूत होना जल का स्वभाव है, उसी प्रकार द्रष्टा में दृश्यव्व स्वभाव से ही विद्यवान है (अर्थात् द्रष्टा से दृश्य मिन्न नहीं है), जैसे सुवर्ण में बाजूबंद और कटक-कुण्डल आदि की स्थिति है जैसे मृगतृष्णा की नदी में जल की स्थिति है और जैसे सपने की नगरी में उठायी गयी दीवारकी स्थिति है, उसी प्रकार द्रष्टा में दश्य की स्थिति मानी गयी है। अर्थात् जैसे उपर्युक्त वस्तुएँ अपने अधिष्ठान से मिन्न नहीं हैं, उसी प्रकार द्रष्टा से दृश्य की पृथक् सत्ता नहीं है द्रष्टा से दृश्य की पृथक् सत्ता न होने के कारण दृश्य का अभाव हो जाने पर जो द्रष्टा में बलात् द्रष्टपन को अभाव प्राप्त होता है, उसी को तुम असत् (मिथ्या दृश्य) के बाधित होने से सन्मात्र चिन्मयरूप में अवशिष्ट हुए आत्मा का केवली भाव ( या कैवल्य ) समझो । जब चित्त आत्मा के कैवल्य ( अद्वितीय चिन्मात्रस्वरूपता ) के बोध से तदाकार ( कैवल्यभाव को प्राप्त ) हो जाता है, तब उसकी राग-द्वेष आदि वासनाएँ उसी तरह शान्त हो जाती हैं, जैसे हवा के न चलने पर वृक्षों में कम्पन और जलाशय आदि में लहरों का उठना बंद हो जाता है । दिशा, भूमि और आकाश रूपी सभी प्रकाशनीय पदार्थों के न रहने पर जिस तरह प्रकाश का शुद्ध रूप ही अवशिष्ट रहता है, उसी प्रकार तीनों लोक, तू और मैं इश्यादि दृश्य-प्रपन्च की सत्ता न होने पर शुद्ध रूप से अवशिष्ट चिन्मय द्रष्टा का केवली भाव (कैश्ल्य) ही रह् जाता है । श्रीरामजी ने पूछा--ब्रह्मन् ! यदि दृश्य सत् है, तब तो यह शान्त या निवृत्त नहीं हो सकता; क्योंकि सत् का कभी अभाव नही होता और यदि यह दोष प्रदान करने वाला दृश्य असत् है, तब यह बात हमारी समझ में आती नहीं। इसलिये यह दृश्यरूपिणी बिषूचिका (हैजा) , जो मन से जन्म आदि के भ्रम को उत्पन्न करने वाली और दुःख की परम्परा को देनेवाली है, कैसे शान्त होगी ? ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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🌹🌹🌹🌹शीतला माता🌹🌹🌹🌹 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏 एक बार शीतला माता ने सोचा कि चलो आज देखु कि धरती पर मेरी पूजा कौन करता है, कौन मुझे मानता है। यही सोचकर शीतला माता धरती पर राजस्थान के डुंगरी गाँव में आई और देखा कि इस गाँव में मेरा मंदिर भी नही है, ना मेरी पुजा है। माता शीतला गाँव कि गलियो में घूम रही थी, तभी एक मकान के ऊपर से किसी ने चावल का उबला पानी (मांड) निचे फेका। वह उबलता पानी शीतला माता के ऊपर गिरा जिससे शीतला माता के शरीर में (छाले) फफोले पड गये। शीतला माता के पुरे शरीर में जलन होने लगी। शीतला माता गाँव में इधर उधर भाग भाग के चिल्लाने लगी अरे में जल गई, मेरा शरीर तप रहा है, जल रहा हे। कोई मेरी मदद करो। लेकिन उस गाँव में किसी ने शीतला माता कि मदद नही करी। वही अपने घर के बहार एक कुम्हारन (महिला) बेठी थी। उस कुम्हारन ने देखा कि अरे यह बूढी माई तो बहुत जल गई है। इसके पुरे शरीर में तपन है। इसके पुरे शरीर में (छाले) फफोले पड़ गये है। यह तपन सहन नही कर पा रही है। तब उस कुम्हारन ने कहा है माँ तू यहाँ आकार बैठ जा, मैं तेरे शरीर के ऊपर ठंडा पानी डालती हूँ। कुम्हारन ने उस बूढी माई पर खुब ठंडा पानी डाला और बोली है माँ मेरे घर में रात कि बनी हुई राबड़ी रखी है थोड़ा दही भी है। तू दही-राबड़ी खा लें। जब बूढी माई ने ठंडी (जुवार) के आटे कि राबड़ी और दही खाया तो उसके शरीर को ठंडक मिली। तब उस कुम्हारन ने कहा आ माँ बेठ जा तेरे सिर के बाल बिखरे हे ला में तेरी चोटी गुथ देती हु और कुम्हारन माई कि चोटी गूथने हेतु (कंगी) कागसी बालो में करती रही। अचानक कुम्हारन कि नजर उस बुडी माई के सिर के पिछे पड़ी तो कुम्हारन ने देखा कि एक आँख बालो के अंदर छुपी हैं। यह देखकर वह कुम्हारन डर के मारे घबराकर भागने लगी तभी उसबूढी माई ने कहा रुक जा बेटी तु डर मत। मैं कोई भुत प्रेत नही हूँ। मैं शीतला देवी हूँ। मैं तो इस घरती पर देखने आई थी कि मुझे कौन मानता है। कौन मेरी पुजा करता है। इतना कह माता चारभुजा वाली हीरे जवाहरात के आभूषण पहने सिर पर स्वर्णमुकुट धारण किये अपने असली रुप में प्रगट हो गई। माता के दर्शन कर कुम्हारन सोचने लगी कि अब में गरीब इस माता को कहा बिठाऊ। तब माता बोली है बेटी तु किस सोच मे पड गई। तब उस कुम्हारन ने हाथ जोड़कर आँखो में आसु बहते हुए कहा- है माँ मेरे घर में तो चारो तरफ दरिद्रता है बिखरी हुई हे में आपको कहा बिठाऊ। मेरे घर में ना तो चौकी है, ना बैठने का आसन। तब शीतला माता प्रसन्न होकर उस कुम्हारन के घर पर खड़े हुए गधे पर बैठ कर एक हाथ में झाड़ू दूसरे हाथ में डलिया लेकर उस कुम्हारन के घर कि दरिद्रता को झाड़कर डलिया में भरकर फेक दिया और उस कुम्हारन से कहा है बेटी में तेरी सच्ची भक्ति से प्रसन्न हु अब तुझे जो भी चाहिये मुझसे वरदान मांग ले। कुम्हारन ने हाथ जोड़ कर कहा है माता मेरी इक्छा है अब आप इसी (डुंगरी) गाँव मे स्थापित होकर यही रहो और जिस प्रकार आपने आपने मेरे घर कि दरिद्रता को अपनी झाड़ू से साफ़ कर दूर किया ऐसे ही आपको जो भी होली के बाद कि सप्तमी को भक्ति भाव से पुजा कर आपको ठंडा जल, दही व बासी ठंडा भोजन चढ़ाये उसके घर कि दरिद्रता को साफ़ करना और आपकी पुजा करने वाली नारि जाति (महिला) का अखंड सुहाग रखना। उसकी गोद हमेशा भरी रखना। साथ ही जो पुरुष शीतला सप्तमी को नाई के यहा बाल ना कटवाये धोबी को पकड़े धुलने ना दे और पुरुष भी आप पर ठंडा जल चढ़कर, नरियल फूल चढ़ाकर परिवार सहित ठंडा बासी भोजन करे उसके काम धंधे व्यापार में कभी दरिद्रता ना आये। तब माता बोली तथाअस्तु है बेटी जो तुने वरदान मांगे में सब तुझे देती हु । है बेटी तुझे आर्शिवाद देती हूँ कि मेरी पुजा का मुख्य अधिकार इस धरती पर सिर्फ कुम्हार जाति का ही होगा। तभी उसी दिन से डुंगरी गाँव में शीतला माता स्थापित हो गई और उस गाँव का नाम हो गया शील कि डुंगरी। शील कि डुंगरी भारत का एक मात्र मुख्य मंदिर है। शीतला सप्तमी वहाँ बहुत विशाल मेला भरता है। इस कथा को पड़ने से घर कि दरिद्रता का नाश होने के साथ सभी मनोकामना पुरी होती है।

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*श्रीलड्डूगोपाल की पूजा की सरल विधि!!!!!!!!*🙏🏻🌹 घर-घर में विराजित श्रीलड्डूगोपाल या गोपालजी ‘योगी जिन्हें ‘आनन्द’ कहते हैं, ऋषि-मुनि ‘परमात्मा’ कहते हैं, संत ‘भगवान’ कहते हैं, उपनिषद् ‘ब्रह्म’ कहते हैं, वैष्णव ‘श्रीकृष्ण’ कहते हैं और माताएं व बहनें प्यार से ‘गोपाल’, ‘लाला’ ‘बालकृष्ण’ या ‘श्रीलड्डूगोपाल’ कहती हैं, वह एक ही तत्त्व है । ये सब अनेक नाम एक ही परब्रह्म के हैं।’ ब्रजमण्डल ही नहीं देश-विदेश के अधिकांश वैष्णवों के घर में भगवान श्रीकृष्ण का बालस्वरूप ‘श्रीलड्डूगोपाल’ या ‘गोपालजी’ के रूप में विराजमान है । स्त्रियां इनकी सेवा-लाड़-मनुहार गोपी या यशोदा के भाव से करती हैं, तो कई लोग श्रीलड्डूगोपाल की सेवा स्वामी, सखा, पुत्र या भाई के भाव से करते हैं । भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है—‘जो मेरी जिस रूप में आराधना या उपासना करता है, मैं भी उसे उसी रूप में उसी भाव से प्राप्त होता हूँ और उसे संतुष्ट कर देता हूँ।‘ वैष्णवों के कारण ही है भगवान की शोभा भक्ति करने का अर्थ है भगवान की मूर्ति में, भगवान के मंत्र में मन को पिरो देना । भगवान के बालस्वरूप को घर में प्रतिष्ठित कर देने के बाद उन्हें घर का स्वामी मानते हुए घर का प्रत्येक काम उन्हीं की प्रसन्नता के लिए करना भक्ति है । मीराबाई के लिए कहा जाता है कि वह अपने गोपाल का सुन्दर श्रृंगार करतीं और उनके सम्मुख कीर्तन व नृत्य करती थीं । भगवान को श्रृंगार की जरुरत नहीं है । श्रृंगार से भगवान की शोभा नहीं बढ़ती वरन् आभूषणों की शोभा भगवान के पहनने से बढ़ती है । साधक जितने समय तक भगवान का श्रृंगार करता है उसकी आंखें व मन भगवान पर ही टिकी रहती हैं जिससे उसका मन शुद्ध होता है और भगवान से प्रेम बढ़ता है । बालकृष्ण के स्वरूप के श्रृंगार में आंखें फंस जाएं तो मनुष्य की नैया पार हो जाती है । विदुरजी और विदुरानी प्रतिदिन बालकृष्ण का तीन घंटे तक ध्यान फिर पुष्पों से श्रृंगार करते थे । वे विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करते हुए भगवान के श्रीचरणों में तुलसी अर्पित करते थे । कीर्तन से बालकृष्ण को प्रसन्न करके भगवान की कथा भगवान को ही सुनाते थे । बालकृष्ण का दर्शन करते हुए उनकी आंखों में आंसू बहने लगते व शरीर में रोमांच होने लगता था । इस प्रकार सेवा, ध्यान, जप, कीर्तन, कथा आदि में निमग्न रहकर वे मन को भगवान से दूर जाने ही नहीं देते थे । विदुर-विदुरानी की भक्ति से आकर्षित होकर द्वारिकानाथ उनके घर खिंचे चले आए व उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिए । श्रीलड्डूगोपाल की पूजा की सरल विधि प्रभु सेवा को खरच न लागे । अपनों जन्म सुफल कर मूरख क्यों डरपे जो अभागे ।। उदर भरन को करी रसोइ सोइ भोग धरे । महाप्रसाद होय घटे न किनको अपनो उदर भरे ।। मीठो जल पीवन को लावे तामें झारी भरे । अंग ढांकनकूं चहिये कपड़ा तामें साज करे ।। जो मन होय उदार तुमारो वैभव कछु बढ़ावो । नहिं तो मोरचंद्रिका गुंजा यह सिंगार धरावो ।। अत्तर फूल फल जो कछु उत्तम प्रभु पहिलेहि धरावो । जो मन चले वस्तु उत्तम पे प्रभु को धर सब खावो ।। कर सम्बन्ध स्वामी सेवक को चल मारग की रीति । पूरन प्रभु भाव के भूखे देखें अंतर की प्रीति ।। यामें कहा घट जाय तिहारो घर की घर में रहिहे । वल्लभदास होय गति अपनी भलो भलो जग कहिहे।। इस पद में यह बताया गया है कि ठाकुरजी (व्रज में श्रीलड्डूगोपाल को ठाकुरजी कहते हैं) की सेवा में कोई अलग से खर्च नहीं होता है । वे अभागे हैं जो खर्चे के डर से उनकी पूजा नहीं करते और अपना जन्म सफल करने से वंचित रह जाते हैं । घर के सदस्यों के लिए जो भोजन बने उसी से पहिले ठाकुरजी को भोग लगा दो, वह महाप्रसाद बन जाएगा किन्तु उसमें से एक किनका भी कम नहीं होगा । घर में अपने पीने के लिए जो जल है, उसी से ठाकुरजी के पीने के लिए झारी भर दो । अपने शरीर को ढकने के लिए आप वस्त्र लाते हैं, उसी से उनका पीताम्बर बना दो । यदि श्रद्धा और सामर्थ्य हो तो कुछ वैभव (सोना-चांदी के श्रृंगार) की वस्तुएं उनके लिए ले आओ, नहीं तो केवल मोरमुकुट और गुंजामाला से भी ठाकुरजी प्रसन्न हो जाते हैं । इत्र, फल-फूल घर में हों तो पहिले ठाकुरजी को अर्पण कर दो । अगर तुम्हारा मन कुछ अच्छा खाने को करे तो पहिले ठाकुरजी को अर्पण करके खाओ । ठाकुरजी के साथ स्वामी का सम्बन्ध रखते हुए उन्हीं के बताए मार्ग पर चलें । वे तो केवल भाव के भूखे हैं और साधक के मन के भाव ही देखते हैं । इस तरह ठाकुरजी की सेवा करने से कुछ घटता भी नहीं, सब कुछ घर का घर में ही रहता है और मनुष्य का लोक-परलोक दोनों सुधर जाते हैं । श्रीलड्डूगोपाल को प्रसन्न करने के विशेष उपाय बालरूप श्रीलड्डूगोपाल से जैसा प्रेम आप करेंगें, उससे हजारगुना प्रेम वह आपके साथ करेंगे । जो श्रीलड्डूगोपाल की सेवा-ध्यान में तन्मय रहता है उसके ऊपर संसार के सुख-दु:ख का प्रभाव नहीं पड़ता है । उसके अनेक जन्मों के पाप एक ही जन्म में जल जाते हैं और दारिद्रय दूर होकर घर में स्थिर लक्ष्मी का वास होता है क्योंकि श्रीलड्डूगोपाल का एक नाम है—‘भक्तदारिद्रयदमनो’ । श्रीलड्डूगोपाल को प्रसन्न करने के लिए उनकी सेवा इस प्रकार कर— —शंख में जल भरकर ‘ॐ नमो नारायणाय’ या ‘गोपीजनवल्लभाय नम:’ या ‘श्रीकृष्णाय नम:’ का उच्चारण करते हुए बालकृष्ण को नहलाना चाहिए । इससे मनुष्य के सारे पाप दूर हो जाते हैं। —संभव हो तो प्रतिदिन अन्यथा द्वादशी और पूर्णिमा को श्रीलड्डूगोपाल को गाय के दूध से स्नान कराकर चंदन अर्पित करना चाहिए। —स्कन्दपुराण के अनुसार प्रतिदिन प्रात:काल में जो श्रीलड्डूगोपाल को माखन-मिश्री, दूध-दही व तुलसी की मंजरियां, चंदन का इत्र व कमल का पुष्प अर्पण कर प्रसन्न करता है, वह इस लोक में समस्त वैभव प्राप्त करके मृत्यु के बाद उनके परम धाम को प्राप्त करता है। —भगवान बालकृष्ण को श्यामा तुलसी की श्याम मंजरी अति प्रिय है । —श्रीलड्डूगोपाल की सेवा करने वाले वैष्णव को गले में तुलसी की कण्ठी पहननी चाहिए । गले में तुलसी माला धारण करने का अर्थ है कि यह शरीर कृष्णार्पण कर दिया है, यह शरीर अब परमात्मा का हुआ । —श्रीलड्डूगोपाल को माखन-मिश्री अत्यन्त प्रिय है । माखन दूध का सारतत्त्व है । बालकृष्ण की सेवा करने वाले वैष्णव सार-भोगी बनते हैं । —भगवान को अर्पित भोग की वस्तु में तुलसी रखते हैं, तब वह वस्तु कृष्णार्पण होती है । जिस घर में भगवान को भोग लगाया जाता है उस घर में लक्ष्मीजी और अन्नपूर्णा अखण्डरूप से विराजमान रहती हैं । उस पवित्र अन्न को खाने से मनुष्य की बुद्धि सात्विक रहती है और शरीर में रोग उत्पन्न नहीं होते हैं । —श्रीलड्डूगोपाल का प्रिय मन्त्र दामोदर-मन्त्र है—‘श्रीदामोदराय नम:’ । इस मन्त्र को दामोदरमास (कार्तिक मास) में करने से भगवान बालगोपाल शीघ्र ही प्रसन्न होकर सिद्धि प्रदान करते हैं । भगवान का कथन है कि अपने दामोदर नाम से मुझे ऐसी प्रसन्नता होती है जिसकी कहीं तुलना नहीं है । —श्रीलड्डूगोपाल की पूजा करने वाले वैष्णवों को प्रतिदिन गोपालसहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए । इसके अतिरिक्त श्रीमद्भागवतपुराण के दशम स्कन्ध का प्रतिदिन पाठ (चाहे एक श्लोक का ही क्यों न हो) और गीता का पाठ भी बालकृष्ण को बहुत प्रिय है । —श्रीलड्डूगोपाल की प्रतिदिन प्रदक्षिणा व साष्टांग प्रणाम करने से भी उनकी कृपा शीघ्र ही प्राप्त हो जाती है । —श्रीगोपालजी के सहस्त्रों नामों में से कुछ नाम हैं–’नित्योत्सवो नित्यसौख्यो, नित्यश्रीर्नित्यमंगल:।’ (श्रीगोपालसहस्त्रनाम) अर्थात् वे नित्य उत्सवमय, सदा सुखसौख्यमय, शोभामय और मंगलमय हैं । श्रीकृष्ण के लिए माता यशोदा नित्य ही उत्सव मनाती थीं । बालकृष्ण ने जब पहली बार करवट ली तो उस दिन माता ने कटि-परिवर्तन उत्सव मनाया था और गरीब ग्वालों और गोपियों की पूजाकर उन्हें दान दिया था । इसी कारण व्रजमण्डल में भगवान श्रीकृष्ण के नित्य कोई-न-कोई उत्सव होते रहते हैं । घर में ठाकुरजी को प्रतिष्ठित करने के बाद जब भी संभव हो, उनकी प्रसन्नता के लिए उत्सव किए जाने चाहिए । उत्सव भगवान को स्मरण करने और जगत को भुलाने के लिए हैं । उत्सव के दिन भूख-प्यास भुलाई जाती है, देह का बोध भुलाया जाता है । उत्सव में धन गौण है, मन मुख्य है । विभिन्न उत्सवों पर भगवान को ऋतु अनुकूल सुन्दर पोशाक व श्रृंगार धारण कराकर दर्पण दिखाना चाहिए क्योंकि बालकृष्ण अपने रूप पर ही मोहित होकर रीझ जाते हैं । बच्चे की भांति उन्हें सुन्दर खिलौने—गाय, मोर, हंस, बतख, झुनझना, फिरकनी, गेंद-बल्ला, झूला आदि सजाकर प्रसन्न करना चाहिए । —श्रीलड्डूगोपाल को प्रतिदिन कोमल नर्म बिस्तर पर शयन करानी चाहिए । प्रेम-बंधन से ही बंधते हैं भगवान!!!!!!!! यदि वैष्णव भगवान की अपेक्षा जगत से अधिक प्रेम करता है तो यह बात ठाकुरजी को नहीं सुहाती । वे सोचते हैं प्रेम करने योग्य मैं हूँ, यह मुझे क्यों नहीं भजता ? मनुष्य जब भगवान का नाम-जप-सेवा-अर्चना करता है, तो उन्हें उसके योगक्षेम की चिन्ता होती है । ‘मैं भगवान का हूँ और भगवान मेरे हैं’—ऐसा भाव रखकर जो बालगोपाल की सेवा करते हैं तथा भगवान के सिवाय किसी और वस्तु की कामना नहीं करते हैं, उन्हें भगवान अपने स्वरूप का दर्शन कराकर अपने धाम में भेज देते हैं।

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