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Krishna Singh
Krishna Singh Nov 13, 2017

जब भगवान कृष्ण ने इस मंदिर से बाहर आकार दिए थे अपने भक्त को दर्शन

जब भगवान कृष्ण ने इस मंदिर से बाहर आकार दिए थे अपने भक्त को दर्शन
जब भगवान कृष्ण ने इस मंदिर से बाहर आकार दिए थे अपने भक्त को दर्शन
जब भगवान कृष्ण ने इस मंदिर से बाहर आकार दिए थे अपने भक्त को दर्शन

दक्षिण भारत में भगवान कृष्ण के कई अनोखे और सुंदर मंदिर है, जिनमें से एक है उडुपी का कृष्ण मंदिर। उडुपी कर्नाटक का एक गांव है। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इस मंदिर में अपने भक्त को दर्शन देने के लिए भगवान कृष्ण खुद ही मंदिर की खिड़की तक चले गए थे।

इस मंदिर के निर्माण के पीछे एक कथा प्रसिद्ध है। कथा के अनुसार, एक बार यहां भयंकर समुद्री तूफान आया। उसी दौरान संत माधवाचार्य समुद्र के किनारे खड़े थे। उन्होंने देखा कि एक जहाज समुद्र के बीच में फंस गया है। यह देखकर वे अपनी शक्तियों से जहाज को सुरक्षित किनारे तक ले आए। जहाज पर सवार लोगों ने संत को धन्यवाद कहते हुए, भेंट के रूप में भगवान कृष्ण और बलराम की दो मूर्तियों दी। संत ने भगवान कृष्ण की मूर्ति को उडुपी में और भगवान बलराम की मूर्ति को यहां से 5 कि.मी. दूर मालपी नाम की जगह पर स्थापित कर दिया। मालपी के बलराम मंदिर को वदंबेदेश्वरा मंदिर और उडुपी के कृष्ण मंदिर को कृष्ण मठ कहा जाता है।

कहा जाता है कि एक बार यहां पर भगवान कृष्ण के दर्शन करने के लिए कनकदास नाम का एक भक्त आया। ब्राह्मण न होने की वजह से उसे मंदिर में प्रवेश करने की आज्ञा नहीं दी गई। उदास होकर कमकदास मंदिर की खिड़की के पास जा खड़ा हुआ और वहीं से भगवान के दर्शन करने की कोशिश करने लगा। उसकी भक्ति देखकर भगवान कृष्ण की मूर्ति खुद ही चलकर मंदिर की खिड़की के पास आ गई और कनकदास को दर्शन दिए।

उस दिन से लेकर आज तक भगवान कृष्ण की मूर्ति मंदिर में पीछे की ओर देखते हुई ही स्थापित है। जिस खिड़की के पास यह मूर्ति स्थापित है, उसे कनकाना किंदी के नाम से जाना जाता है। कनकाना किंदी खिड़की को मीनाकारी से सजाया गया है। इस खिड़की में 9 छोटे-छोटे छेद हैं, जिनमें से अंदर झांकने पर भगवान कृष्ण के दर्शन होते हैं।

यहां पर भगवान कृष्ण की युवावस्था की एक सुंदर मूर्ति है, जिसमें वे अपने दाएं हाथ में एक मथानी और बाएं हाथ में रस्सी पकड़े हुए हैं। यहां की कृष्ण मूर्ति का स्वरूप बहुत ही सुदंर और मनमोहक है।

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कामेंट्स

Tarun Mishra Nov 13, 2017
भगवान की लीला अपरंपार है

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Swami Lokeshanand Jun 17, 2019

आज मन बड़ी विचित्र परिस्थिति में फंसा है। चारों ओर दुख के घनघोर अंधकार ने डेरा जमा रखा है। यहाँ जब से सूर्यवंश के सूर्य पिताजी को वनवास हुआ, तब से आँसुओं की धारा सबकी आँखों से अनवरत बह रही है। दादाजी के देहावसान के बाद, बड़ी दादी खोई खोई रहती है, मुख पर तो है ही, आँखों में भी मौन उतर आया है। मंझोली दादी भी आवश्यकता अनुसार कम ही बोलती है, चुपचाप रनिवास की सब व्यवस्था संभालती है। छोटी दादी का तो पूछो ही मत, लाख बार सबने समझा कर देख लिया, पर मालूम नहीं सारी परिस्थिति का बोझ अपने सिर पर क्यूं रखे है? तीनों चाची साढ़े तेरह वर्षों से देह की सुधि भूलकर दिनरात माँ पिताजी की कुशलता की कामना करतीं हैं। बड़े चाचा को तो देखे हुए भी उतना ही समय हो गया, सुनते हैं कि नंदिग्राम में सूख कर अस्थिमात्र ही बचे हैं। छोटे चाचा जरूर कभी कभी राज्यावस्था संभालते दृष्टि में आ जाते हैं। इधर जब से आततायी पापाचारी अनाचारी दुराचारी अत्याचारी पापपुंज दुष्ट रावण, माँ को अपहृत कर ले गया, आनन्दस्वरूप पिताजी को भी वरवश, लीलावश दुख ने घेर लिया। मंझले चाचा अपने कष्ट को भुलाकर, दिन रात पिताजी को कष्ट न हो ऐसा असफल प्रयास करते हैं। उधर लंका में माँ का भी तन सूख गया है। भूख प्यास की कौन कहे, श्वास भी बमुश्किल आ जा रही है। वे तो अकेली ही नहीं हैं, अति अकेली हैं। इस परिस्थिति से उबरने का तो एक ही मार्ग है, बस एकबार किसी तरह से हमारे बड़े भैया आ जाएँ। उनके आने में देरी है, अंधेरा छंटने में देरी नहीं है। फिर तो प्रकाश हुआ ही समझो, दुख मिटा ही समझो, कष्ट कटा ही समझो। बस भैया आ जाएँ, हनुमानजी आ जाएँ। कल कथा में हनुमानजी का प्रवेश॥ अब विडियो देखें-हनुमानजी का जन्म- https://youtu.be/zMEUN8Gm0jY हनुमानजी की महिमा- https://youtu.be/iGGA-YmoUmE

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सीख: 1.हमेशा अच्छे कर्म करें। 2. जीवन में हमेशा सही रास्ते का चयन करें जब पार्वती ने बनाया भोजन तो शिवजी ने उन्हें बताई ये अनोखी बात एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा की प्रभु मैंने पृथ्वी पर देखा है कि जो व्यक्ति पहले से ही अपने प्रारब्ध से दुःखी है आप उसे और ज्यादा दुःख प्रदान करते हैं और जो सुख में है आप उसे दुःख नहीं देते है। भगवान ने इस बात को समझाने के लिए माता पार्वती को धरती पर चलने के लिए कहा और दोनों ने इंसानी रूप में पति-पत्नी का रूप लिया और एक गावं के पास डेरा जमाया । शाम के समय भगवान ने माता पार्वती से कहा की हम मनुष्य रूप में यहां आए है इसलिए यहां के नियमों का पालन करते हुए हमें यहां भोजन करना होगा। इसलिए मैं भोजन कि सामग्री की व्यवस्था करता हूं, तब तक तुम भोजन बनाओ। जब भगवान के जाते ही माता पार्वती रसोई में चूल्हे को बनाने के लिए बाहर से ईंटें लेने गईं और गांव में कुछ जर्जर हो चुके मकानों से ईंटें लाकर चूल्हा तैयार कर दिया। चूल्हा तैयार होते ही भगवान वहां पर बिना कुछ लाए ही प्रकट हो गए। माता पार्वती ने उनसे कहा आप तो कुछ लेकर नहीं आए, भोजन कैसे बनेगा। भगवान बोले - पार्वती अब तुम्हें इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। भगवान ने माता पार्वती से पूछा की तुम चूल्हा बनाने के लिए इन ईटों को कहा से लेकर आई तो माता पार्वती ने कहा - प्रभु इस गावं में बहुत से ऐसे घर भी हैं जिनका रख रखाव सही ढंग से नहीं हो रहा है। उनकी जर्जर हो चुकी दीवारों से मैं ईंटें निकाल कर ले आई। भगवान ने फिर कहा - जो घर पहले से ख़राब थे तुमने उन्हें और खराब कर दिया। तुम ईंटें उन सही घरों की दीवार से भी तो ला सकती थीं।माता पार्वती बोली - प्रभु उन घरों में रहने वाले लोगों ने उनका रख रखाव बहुत सही तरीके से किया है और वो घर सुंदर भी लग रहे हैं ऐसे में उनकी सुंदरता को बिगाड़ना उचित नहीं होता।भगवान बोले - पार्वती यही तुम्हारे द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर है। जिन लोगो ने अपने घर का रख रखाव अच्छी तरह से किया है यानि सही कर्मों से अपने जीवन को सुंदर बना रखा है उन लोगों को दुःख कैसे हो सकता है।मनुष्य के जीवन में जो भी सुखी है वो अपने कर्मों के द्वारा सुखी है, और जो दुखी है वो अपने कर्मों के द्वारा दुखी है । इसलिए हर एक मनुष्य को अपने जीवन में ऐसे ही कर्म करने चाहिए की, जिससे इतनी मजबूत व खूबसूरत इमारत खड़ी हो कि कभी भी कोई भी उसकी एक ईंट भी निकालने न पाए। प्रिय बंधुओ व मित्रो, यह काम जरा भी मुश्किल नहीं है। केवल सकरात्मक सोच और निः स्वार्थ भावना की आवश्यकता है । इसलिए जीवन में हमेशा सही रास्ते का ही चयन करें और उसी पर चलें। सीख: 1.हमेशा अच्छे कर्म करें। 2. जीवन में हमेशा सही रास्ते का चयन करें

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