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Krishna Singh
Krishna Singh Nov 13, 2017

जब भगवान कृष्ण ने इस मंदिर से बाहर आकार दिए थे अपने भक्त को दर्शन

जब भगवान कृष्ण ने इस मंदिर से बाहर आकार दिए थे अपने भक्त को दर्शन
जब भगवान कृष्ण ने इस मंदिर से बाहर आकार दिए थे अपने भक्त को दर्शन
जब भगवान कृष्ण ने इस मंदिर से बाहर आकार दिए थे अपने भक्त को दर्शन

दक्षिण भारत में भगवान कृष्ण के कई अनोखे और सुंदर मंदिर है, जिनमें से एक है उडुपी का कृष्ण मंदिर। उडुपी कर्नाटक का एक गांव है। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इस मंदिर में अपने भक्त को दर्शन देने के लिए भगवान कृष्ण खुद ही मंदिर की खिड़की तक चले गए थे।

इस मंदिर के निर्माण के पीछे एक कथा प्रसिद्ध है। कथा के अनुसार, एक बार यहां भयंकर समुद्री तूफान आया। उसी दौरान संत माधवाचार्य समुद्र के किनारे खड़े थे। उन्होंने देखा कि एक जहाज समुद्र के बीच में फंस गया है। यह देखकर वे अपनी शक्तियों से जहाज को सुरक्षित किनारे तक ले आए। जहाज पर सवार लोगों ने संत को धन्यवाद कहते हुए, भेंट के रूप में भगवान कृष्ण और बलराम की दो मूर्तियों दी। संत ने भगवान कृष्ण की मूर्ति को उडुपी में और भगवान बलराम की मूर्ति को यहां से 5 कि.मी. दूर मालपी नाम की जगह पर स्थापित कर दिया। मालपी के बलराम मंदिर को वदंबेदेश्वरा मंदिर और उडुपी के कृष्ण मंदिर को कृष्ण मठ कहा जाता है।

कहा जाता है कि एक बार यहां पर भगवान कृष्ण के दर्शन करने के लिए कनकदास नाम का एक भक्त आया। ब्राह्मण न होने की वजह से उसे मंदिर में प्रवेश करने की आज्ञा नहीं दी गई। उदास होकर कमकदास मंदिर की खिड़की के पास जा खड़ा हुआ और वहीं से भगवान के दर्शन करने की कोशिश करने लगा। उसकी भक्ति देखकर भगवान कृष्ण की मूर्ति खुद ही चलकर मंदिर की खिड़की के पास आ गई और कनकदास को दर्शन दिए।

उस दिन से लेकर आज तक भगवान कृष्ण की मूर्ति मंदिर में पीछे की ओर देखते हुई ही स्थापित है। जिस खिड़की के पास यह मूर्ति स्थापित है, उसे कनकाना किंदी के नाम से जाना जाता है। कनकाना किंदी खिड़की को मीनाकारी से सजाया गया है। इस खिड़की में 9 छोटे-छोटे छेद हैं, जिनमें से अंदर झांकने पर भगवान कृष्ण के दर्शन होते हैं।

यहां पर भगवान कृष्ण की युवावस्था की एक सुंदर मूर्ति है, जिसमें वे अपने दाएं हाथ में एक मथानी और बाएं हाथ में रस्सी पकड़े हुए हैं। यहां की कृष्ण मूर्ति का स्वरूप बहुत ही सुदंर और मनमोहक है।

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कामेंट्स

Tarun Mishra Nov 13, 2017
भगवान की लीला अपरंपार है

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Sunil upadhyaya Jul 19, 2019

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Swami Lokeshanand Jul 18, 2019

तुलसीदासजी ने विचित्र चौपाइयाँ लिखीं। "मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा" और "भवन एक पुनि दीख सुहावा" एक विभीषण के ही घर को घर कहा, रावण सहित शेष राक्षसों के घरों को घर नहीं कहा, मंदिर कह दिया। जब लंका में आग लग गयी, तब- "जारा नगर निमिष एक माहीं। एक विभीषण कर गृह नाहीं॥" वह "घर" तो छूट गया,"मंदिर" सभी जल गए। विचार करें, मंदिर वह है जो प्रीति का केन्द्र हो। घर उपयोग के लिए है, रहने के लिए है, प्रीत लगाने के लिए नहीं है। भवन से प्रीत लगाने वाला ही तो प्रेत बनता है। जिसे भवन से प्रीत है, उसे घर में ही आसक्ति है, गृहासक्ति है, तो घर ही उसके जीवन का लक्ष्य हो गया, मंदिर हो गया। जबकि विभीषण जिस घर में रहता है, उसमें उसे आसक्ति नहीं है। मंदिर तो वहाँ भी है, पर अलग से बना है- "हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा" इसे समझें, मंदिर दो प्रकार के हैं, देव मंदिर और देह मंदिर। विभीषण के मंदिर में देव पूजा होती है, वहाँ श्रीसीतारामजी विराजते हैं, वह तो देव मंदिर है। शेष सबमें देह की पूजा होती थी, वे देह मंदिर हैं। देखो, देह संभालो, पर उसे भी तो देखो जिससे यह जीवित है, उसी से इसकी कीमत है। हिसाब लगाओ! कितने टिन तेल, साबुन, पाउडर, क्रीम इस पर मले, कितना घी, गेहूँ, चावल, दाल, फल, सब्जी, मिठाइयाँ, पापड़, पकोड़े, अचार, चटनी, मुरब्बे इसे खिलाए, इसकी पूजा का कोई अंत है? देव को न जाने, देह को ही पूजे, इसी के सुख के लिए जीवन बिता दे, कमाना खाना और पैखाना ही जिसके जीवन का लक्ष्य है, वही तो असली राक्षस है। तुलसीदासजी का संकेत है कि अ दुनियावालों! इस देह की कितनी ही पूजा कर लो, सज़ा लो, संवार लो, इसे तो जलना ही पड़ेगा, जलना ही पड़ेगा। अब यह विडियो देखें- हनुमानजी ने देह मंदिरों में आग लगा दी- https://youtu.be/_DW_XzDxzQk

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Pt Vinod Pandey 🚩 Jul 18, 2019

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शिव समान दाता नहीं विपत्ति विदारण हार,, लज्जा मेरी राखियो शिव वरदा के असवार,, विचारणीय विंदु, आजकल प्रतिदिन संदेश आ रहे हैं कि महादेव को दूध की कुछ बूंदें चढाकर शेष निर्धन बच्चों को दे दिया जाए। सुनने में बहुत अच्छा लगता है लेकिन हर हिन्दू त्योहार पर ऐसे संदेश पढ़कर थोड़ा दुख होता है। दीवाली पर पटाखे ना चलाएं, होली में रंग और गुलाल ना खरीदें, सावन में दूध ना चढ़ाएं, उस पैसे से गरीबों की मदद करें। लेकिन त्योहारों के पैसे से ही क्यों? ये एक साजिश है हमें अपने रीति-रिवाजों से विमुख करने की। हम सब प्रतिदिन दूध पीते हैं तब तो हमें कभी ये ख्याल नहीं आया कि लाखों गरीब बच्चे दूध के बिना जी रहे हैं। अगर दान करना ही है तो अपने हिस्से के दूध का दान करिए और वर्ष भर करिए। कौन मना कर रहा है। शंकर जी के हिस्से का दूध ही क्यों दान करना? आप अपने व्यसन का दान कीजिये दिन भर में जो आप सिगरेट, पान-मसाला, शराब, मांस अथवा किसी और क्रिया में जो पैसे खर्च करते हैं उसको बंद कर के गरीब को दान कीजिये | इससे आपको दान के लाभ के साथ साथ स्वास्थ्य का भी लाभ होगा। महादेव ने जगत कल्याण हेतु विषपान किया था इसलिए उनका अभिषेक दूध से किया जाता है। जिन महानुभावों के मन में अतिशय दया उत्पन्न हो रही है उनसे मेरा अनुरोध है कि एक महीना ही क्यों, वर्ष भर गरीब बच्चों को दूध का दान दें। घर में जितना भी दूध आता हो उसमें से ज्यादा नहीं सिर्फ आधा लीटर ही किसी निर्धन परिवार को दें। महादेव को जो 50 ग्राम दूध चढ़ाते हैं वो उन्हें ही चढ़ाएं। !!ॐ नम: शिवाय !! शिवलिंग की वैज्ञानिकता .... भारत का रेडियोएक्टिविटी मैप उठा लें, तब हैरान हो जायेगें ! भारत सरकार के नुक्लियर रिएक्टर के अलावा सभी ज्योतिर्लिंगों के स्थानों पर सबसे ज्यादा रेडिएशन पाया जाता है। शिवलिंग और कुछ नहीं बल्कि न्यूक्लियर रिएक्टर्स ही हैं, तभी तो उन पर जल चढ़ाया जाता है ताकि वो शांत रहे। महादेव के सभी प्रिय पदार्थ जैसे किए बिल्व पत्र, आक, आकमद, धतूरा, आदि सभी न्यूक्लिअर एनर्जी सोखने वाले है। क्यूंकि शिवलिंग पर चढ़ा पानी भी रिएक्टिव हो जाता है इसीलिए तो जल निकासी नलिका को लांघा नहीं जाता। भाभा एटॉमिक रिएक्टर का डिज़ाइन भी शिवलिंग की तरह ही है। शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल नदी के बहते हुए जल के साथ मिलकर औषधि का रूप ले लेता है। तभी तो हमारे पूर्वज हम लोगों से कहते थे कि महादेव शिवशंकर अगर नाराज हो जाएंगे तो प्रलय आ जाएगी। ध्यान दें, कि हमारी परम्पराओं के पीछे कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है। जिस संस्कृति की कोख से हमने जन्म लिया है, वो तो चिर सनातन है।विज्ञान को परम्पराओं का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन बन जाए और हम भारतवासी सदा वैज्ञानिक जीवन जीते रहें।.. हो सके तो शेयर भी कर दें, दूसरे भक्त भी बाबा के दर्शन का आनंद ले पाएंगे. जय बाबा अपना व्यवहार बदलो हमारे धर्म को बदलने का प्रयास मत करो 🙏🕉🙏

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गाय - पशु की अंतिम योनि गाय चेतना के लिए सीढी है, पशु से उपर उठकर मनुष्य बनने के लिये - सद्गुरु कहते हैं, कि चेतना अपनी अंतर्यात्रा में पेड़ -पौधे, कीट - पतंग और पशु - पक्षी की योनियों से गुजरती हुई, अंत में गाय की योनि में प्रवेश करती है। और गाय का जीवन जीती है। गाय की योनि में आकर चेतना की समझ इतनी विकसित हो चुकी होती है कि वह आसानी से मनुष्य योनि में छलांग लगा जाती है। गाय पशु और मनुष्य के बीच की एक कड़ी है। गाय चेतना के लिए एक सीढी है, पशु से उपर उठकर मनुष्य बनने के लिये। गाय में आकर चेतना उस तल पर आ खड़ी होती है, जहां से अगले जन्म में मनुष्य योनि में प्रवेश करना सहज ही घट जाता है। इसलिए हमारे हिंदू धर्म में गाय को इतना महत्व दिया जाता है। उसकी पूजा करके उसे धन्यवाद दिया जाता है, कि धन्य है तू, जो यहां तक आ पहुंची है। उसे संबल दिया जाता है, कि हम भी एक समय वहीं थे जहां आज तू खड़ी है। अब तेरा अगला जन्म मनुष्य का है, हम तेरी पूरी मदद करेंगे, ताकि तू मनुष्य में आकर स्वयं को मुक्त कर सके! गाय को रोटी देकर, रोटी के स्वाद से उसे अभी से ही परिचित करवाना शुरू कर दिया जाता है, ताकि रोटी का यह स्वाद उसे मनुष्य योनि में आने के लिए आकर्षित कर सके। रोटी का स्वाद, रोटी की खुश्बू उस चेतना को घर में खींचेगी और वह कोरी और पवित्र आत्मा हमारे घर मनुष्य रूप में जन्म ले सकेगी। इसीलिए हमारे धर्म में गाय को रोजाना रोटी देने का नियम है। वह चेतना विचारों से मुक्त होगी, क्योंकि विचार उसके लिए इस जन्म में ही संभव होगा। अभी तक उसने शरीर और भाव का तल ही जिया है, अब वह पहली बार मनुष्य योनि में विचार के तल पर आयेगी, क्योंकि पशु और पक्षी भाव में जीते हैं और हम भाव के साथ ही विचार के तल पर भी जीते हैं। विचार का तल सक्रिय न होने और भाव में जीने के कारण पशु पक्षियों को कोई तनाव नहीं होता है। जबकि हम विचारों में जीते हैं और विचार तनाव पैदा करते हैं जिससे हम तनावग्रस्त रहते हैं। पक्षी भाव में जीते हैं और मस्त रहते हैं, यही कारण है कि हमारे मन में भी अक्सर यह खयाल आता रहा है कि काश हम पक्षी होते औ खुले आसमान में स्वतंत्रता से उड़ान भरते? यहां मनुष्य योनि में गाय के लिए विचार करना नया होगा, इसलिए संभव है कि वह यहां आकर विचारों के प्रति होश से भर जाए और मुक्त हो जाए? लेकिन यह तभी संभव होगा, जब उसे अपना पूरा जीवन जीने दिया जाए, वह अपनी स्वाभाविक मृत्यु को प्राप्त हो, न कि उसकी हत्या हो! गाय तक आते - आते चेतना का जो विकास हुआ है, उसे गति देने के लिए गाय को हमें उसका पूरा जीवन जीने में उसकी मदद करनी होगी। उसकी उम्र पूरी हो, वह अधूरा जीवन नहीं जिये। उसकी हत्या करने से उसकी यात्रा बाधित होगी। वह फिर से पशु योनि में लौट जायेगी, और हो सकता है वह दूसरे हिंसक पशु में लौट जाये? इसलिए गाय की हत्या नहीं होनी चाहिए! गाय का वध करके हम एक चेतना का पशु से मनुष्य योनि में प्रवेश का मार्ग अवरूद्ध कर रहे होते हैं। दूसरे, गाय की हत्या करके हम उससे कहीं ज्यादा नुकसान अपनी चेतना का कर लेते हैं। वह चेतना तो दूसरा शरीर खोज लेगी, गाय का शरीर उसे आसानी से उपलब्ध हो सकेगा, लेकिन हिंसा करके हम अपना अगला जीवन हिंसक पशु में परिवर्तित कर लेते हैं। सद्गुरु कहते हैं, कि रात सोते समय जो हमारा अंतिम विचार होता है, वही सुबह हमारा पहला विचार बन जाता है। ठीक उसी तरह, जिस तरह परिक्षा के दिनों में रात सोते समय, सुबह चार बजे उठने का विचार होता है और ठीक चार बजे वह विचार घट जाता है और हमारी नींद टूट जाती है। वैसे ही इस जन्म में जो हमारा अंतिम विचार होगा, अगला जन्म उसी पर आधारित होगा। वे कहते हैं, यदि हिंसा में हमारा रस है, और हमारा स्वभाव हिंसक हो गया है, तो अंतिम समय में प्रकृति हिंसक पशु योनि में हमारा प्रवेश करवा देती है, बिल्ली जैसे मांसाहारी पशु योनि में प्रवेश करवा देती है जहां हमें खुलकर हिंसा करने की सुविधा रहती है। यदि हम मोह- माया से ज्यादा ग्रसित हो जाते हैं, और अंतिम समय तक यही विचार प्रगाढ़ हो गया है, कि "क्या होगा घर - परिवार का? क्या होगा जमीन - जायदाद का? क्या होगा कारोबार का?" तो जीने की आकांक्षा के कारण मृत्यु के समय हम शरीर को छोड़ना नहीं चाहेंगे। और यदि हम मोहवश शरीर को जकड़ कर रखेंगे तो प्रकृति हमारे प्राण को खींचेगी, क्योंकि अब शरीर क्षीण हो गया है, शरीर इस योग्य नहीं रहा कि प्राण उसमें टिक सके, इसी उहापोह में हमारे प्राण मल-मूत्र के रास्ते से निकलेंगे और प्रकृति हमारी अंतिम इच्छा के अनुसार हमें कुत्ते जैसे पशु के गर्भ में प्रवेश करवा देगी, ताकि हम फिर से घर - परिवार, जमीन - जायदाद और अपने कारोबार की रखवाली कर सकें। सद्गुरु कहते हैं कि जिस व्यक्ति ने अपनी संपत्ति जमीन में गाड़ दी है। वह किसी को बता नहीं पाया है और अंतिम समय में उसका ध्यान उस गड़ी हुई संपत्ति में ही अटका है तो प्रकृति उसे सांप के गर्भ में प्रवेश करवा देती है ताकि वह अपने गड़े हुए धन पर फन काढ़कर बैठा रहे और अपने धन की रक्षा कर सके। यही कारण है कि वे माया-मोह और वासना छोड़ने को कहते हैं। यह पतन हो गया चेतना का! यह है असली पतन.. पीछे की योनि में वापिस लौटना! चरित्र का पतन इतना नुकसान नहीं करता है, जितना नुकसान चेतना का पतन करता है। इसलिए हमारे हिंदू धर्म में पीछे लौट गई चेतना का भी ख्याल रखा जाता है। गाय के साथ ही कुत्ते को भी रोटी के स्वाद की अनुभूति करवाई जाती है। ताकि रोटी का वह स्वाद, रोटी की वह खुश्बू, मनुष्य जीवन की याद दिला सके। और वह आसानी से मनुष्य के गर्भ में प्रवेश कर सके। अपने बचे हुए भोजन को गाय और कुत्ते को खिलाना इसी नियम का एक हिस्सा है। यह हमारे उपर निर्भर करता है, कि ध्यान करके स्वयं को मुक्त करना है या वापिस पिछली योनियों में लौट जाना है! 'वहां' पर लौट जाना है, जहां पर से 'यहां' आये थे? कुछ न कर सकें तो हम ध्यान अवश्य करें जिससे कि हमारा 'पतन' न हो! हम पिछली योनियों में नहीं जा सकें, यानी फिर से मनुष्य योनि में प्रवेश कर सकें, ताकि ध्यान करके मुक्त होने का ख्याल आ सके! स्वामी ध्यान उत्सव

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anita sharma Jul 18, 2019

जब नारद जी का मोह भंग करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण में तराजू में विराजे थे। एक सोने के पतरे पर तुलसी रखकर पलड़ें में रखा तब भगवान के बराबर भार बैठा!!!!!! एक बार देवर्षि नारद के मन में आया कि भगवान् के पास बहुत महल आदि है है, एक- आध हमको भी दे दें तो यहीं आराम से टिक जायें, नहीं तो इधर-उधर घूमते रहना पड़ता है। भगवान् के द्वारिका में बहुत महल थे। नारद जी ने भगवान् से कहा- भगवन ! आपके बहुत महल हैं, एक हमको दो तो हम भी आराम से रहें। आपके यहाँ खाने- पीने का इंतजाम अच्छा ही है । भगवान् ने सोचा कि यह मेरा भक्त है, विरक्त संन्यासी है। अगर यह कहीं राजसी ठाठ में रहने लगा तो थोड़े दिन में ही इसकी सारी विरक्ति भक्ति निकल जायेगी। हम अगर सीधा ना करेंगे तो यह बुरा मान जायेगा, लड़ाई झगड़ा करेगा कि इतने महल हैं और एकमहल नहीं दे रहे हैं। भगवान् ने चतुराई से काम लिया, नारद से कहा जाकर देख ले, जिस मकान में जगह खाली मिले वही तेरे नाम कर देंगे। नारद जी वहाँ चले। भगवान् की तो १६१०८ रानियाँ और प्रत्येक के ११- ११ बच्चे भी थे। यह द्वापर युग की बात है। सब जगह नारद जी घूम आये लेकिन कहीं एक कमरा भी खाली नहीं मिला, सब भरे हुए थे। आकर भगवान् से कहा वहाँ कोई जगह खाली नहीं मिली। भगवान् ने कहा फिर क्या करूँ , होता तो तेरे को दे देता। नारद जी के मन में आया कि यह तो भगवान् ने मेरे साथ धोखाधड़ी की है, नहीं तो कुछ न कुछ करके, किसी को इधर उधर शिफ्ट कराकर, खिसकाकर एक कमरा तो दे ही सकते थे। इन्होंने मेरे साथ धोखा किया है तो अब मैं भी इन्हे मजा चखाकर छोडूँगा। नारद जी रुक्मिणी जी के पास पहुँचे, रुक्मिणी जी ने नारद जी की आवभगत की, बड़े प्रेम से रखा। उन दिनों भगवान् सत्यभामा जी के यहाँ रहते थे। एक आध दिन बीता तो नारद जी ने उनको दान की कथा सुनाई, सुनाने वाले स्वयं नारद जी। दान का महत्त्व सुनाने लगे कि जिस चीज का दान करोगे वही चीज आगे तुम्हारे को मिलती है। जब नारद जी ने देखा कि यह बात रुक्मिणी जी को जम गई है तो उनसे पूछा आपको सबसे ज्यादा प्यार किससे है ? रुक्मिणी जी ने कहा यह भी कोई पूछने की बात है, भगवान् हरि से ही मेरा प्यार है। कहने लगे फिर आपकी यही इच्छा होगी कि अगले जन्म में तुम्हें वे ही मिलें। रुक्मिणी जी बोली इच्छा तो यही है। नारद जी ने कहा इच्छा है तो फिर दान करदो, नहीं तो नहीं मिलेंगे। आपकी सौतें भी बहुत है और उनमें से किसी ने पहले दान कर दिया उन्हें मिल जायेंगे। इसलिये दूसरे करें, इसके पहले आप ही कर दे। रुक्मिणी जी को बात जँच गई कि जन्म जन्म में भगवान् मिले तो दान कर देना चाहियें। रुक्मिणी से नारद जी ने संकल्प करा लिया। अब क्या था, नारद जी का काम बन गया। वहाँ से सीधे सत्यभामा जी के महल में पहुँच गये और भगवान् से कहा कि उठाओ कमण्डलु, और चलो मेरे साथ। भगवान् ने कहा कहाँ चलना है, बात क्या हुई ? नारद जी ने कहा बात कुछ नहीं, आपको मैंने दान में ले लिया है। आपने एक कोठरी भी नहीं दी तो मैं अब आपको भी बाबा बनाकर पेड़ के नीचे सुलाउँगा। सारी बात कह सुनाई। भगवान् ने कहा रुक्मिणी ने दान कर दिया है तो ठीक है। वह पटरानी है, उससे मिल तो आयें। भगवान् ने अपने सारे गहने गाँठे, रेशम के कपड़े सब खोलकर सत्यभामा जी को दे दिये और बल्कल वस्त्र पहनकर, भस्मी लगाकर और कमण्डलु लेकर वहाँ से चल दिये। उन्हें देखते ही रुक्मिणी के होश उड़ गये। पूछा हुआ क्या ? भगवान् ने कहा पता नहीं, नारद कहता है कि तूने मेरे को दान में दे दिया। रुक्मिणी ने कहा लेकिन वे कपड़े, गहने कहाँ गये, उत्तम केसर को छोड़कर यह भस्मी क्यों लगा ली ? भगवान् ने कहा जब दान दे दिया तो अब मैं उसका हो गया। इसलिये अब वे ठाठबाट नहीं चलेंगे। अब तो अपने भी बाबा जी होकर जा रहे हैं । रुक्मिणी ने कहा मैंने इसलिये थोड़े ही दिया था कि ये ले जायें। भगवान् ने कहा और काहे के लिये दिया जाता है ? इसीलिये दिया जाता है कि जिसको दो वह ले जाये । अब रुक्मिणी को होश आया कि यह तो गड़बड़ मामला हो गया। रुक्मिणी ने कहा नारद जी यह आपने मेरे से पहले नहीं कहा, अगले जन्म में तो मिलेंगे सो मिलेंगे, अब तो हाथ से ही खो रहे हैं । नारद जी ने कहा अब तो जो हो गया सो हो गया, अब मैं ले जाऊँगा। रुक्मिणी जी बहुत रोने लगी। तब तक हल्ला गुल्ला मचा तो और सब रानियाँ भी वहा इकठ्ठी हो गई। सत्यभामा, जाम्बवती सब समझदार थीं। उन्होंने कहा भगवान् एक रुक्मिणी के पति थोड़े ही हैं, इसलिये रुक्मिणी को सर्वथा दान करने का अधिकार नहीं हो सकता, हम लोगों का भी अधिकार है। नारद जी ने सोचा यह तो घपला हो गया। कहने लगे क्या भगवान् के टुकड़े कराओगे ? तब तो 16108 हिस्से होंगे। रानियों ने कहा नारद जी कुछ ढंग की बात करो। नारद जी ने विचार किया कि अपने को तो महल ही चाहिये था और यही यह दे नहीं रहे थे, अब मौका ठीक है, समझौते पर बात आ रही है। नारद जी ने कहा भगवान् का जितना वजन है, उतने का तुला दान कर देने से भी दान मान लिया जाता है । तुलादान से देह का दान माना जाता है। इसलिये भगवान् के वजन का सोना, हीरा, पन्ना दे दो। इस पर सब रानियाँ राजी हो गई। बाकी तो सब राजी हो गये लेकिन भगवान् ने सोचा कि यह फिर मोह में पड़ रहा है । इसका महल का शौक नहीं गया। भगवान् ने कहा तुलादान कर देना चाहिये, यह बात तो ठीक हे । भगवान् तराजु के एक पलड़े के अन्दर बैठ गये। दूसरे पलड़े में सारे गहने, हीरे, पन्ने रखे जाने लगे। लेकिन जो ब्रह्माण्ड को पेट में लेकर बैठा हो, उसे द्वारिका के धन से कहाँ पूरा होना है। सारा का सारा धन दूसरे पलड़े पर रख दिया लेकिन जिस पलड़े पर भगवान बैठे थे वह वैसा का वैसा नीचे लगा रहा, ऊपर नहीं हुआ । नारद जी ने कहा देख लो, तुला तो बराबर हो नहीं रहा है, अब मैं भगवान् को ले जाऊँगा । सब कहने लगे अरे कोई उपाय बताओ । नारद जी ने कहा और कोई उपाय नहीं है । अन्य सब लोगों ने भी अपने अपने हीरे पन्ने लाकर डाल दिये लेकिन उनसे क्या होना था । वे तो त्रिलोकी का भार लेकर बैठे थे। नारद जी ने सोचा अपने को अच्छा चेला मिल गया, बढ़िया काम हो गया । उधर औरते सब चीख रही थी। नारद जी प्रसन्नता के मारे इधर ऊधर टहलने लगे । भगवान् ने धीरे से रुक्मिणी को बुलाया। रुक्मिणी ने कहा कुछ तो ढंग निकालिये, आप इतना भार लेकर बैठ गये, हम लोगों का क्या हाल होगा ? भगवान् ने कहा ये सब हीरे पन्ने निकाल लो, नहीं तो बाबा जी मान नहीं रहे हैं। यह सब निकालकर तुलसी का एक पत्ता और सोने का एक छोटा सा टुकड़ा रख दो तो तुम लोगों का काम हो जायगा। रुक्मिणी ने सबसे कहा कि यह नहीं हो रहा है तो सब सामान हटाओ । सारा सामान हटा दिया गया और एक छोटे से सोने के पतरे पर तुलसी का पता रखा गया तो भगवान् के वजन के बराबर हो गया । सबने नारद जी से कहा ले जाओ तूला दान। नारद जी ने खुब हिलाडुलाकर देखा कि कहीं कोई डण्डी तो नहीं मार रहा है । नारद जी ने कहा इन्होंने फिर धोखा दिया । फिर जहाँ के तहाँ यह लेकर क्या करूँगा ? उन्होंने कहा भगवन्। यह आप अच्छा नहीं कर रहे हैं, केवल घरवालियों की बात सुनते हैं, मेरी तरफ देखो। भगवान् ने कहा तेरी तरफ क्या देखूँ ? तू सारे संसार के स्वरूप को समझ कर फिर मोह के रास्ते जाना चाह रहा है तो तेरी क्या बात सुनूँ। तब नारद जी ने समझ लिया कि भगवान् ने जो किया सो ठीक किया । नारद जी ने कहा एक बात मेरी मान लो। आपने मेरे को तरह तरह के नाच अनादि काल से नचाये और मैंने तरह तरह के खेल आपको दिखाये। कभी मनुष्य, कभी गाय इत्यादि पशु, कभी इन्द्र, वरुण आदि संसार में कोई ऐसा स्वरूप नहीं जो चैरासी के चक्कर में किसी न किसी समय में हर प्राणी ने नहीं भोग लिया। अनादि काल से यह चक्कर चल रहा है, सब तरह से आपको खेल दिखाया आप मेरे को ले जाते रहे और मैं खेल करता रहा । अगर आपको मेरा कोई खेल पसंद आगया हो तो आप राजा की जगह पर हैं और मैं ब्राह्मण हूँ तो मेरे को कुछ इनाम देना चाहिये । वह इनाम यही चाहता हूँ कि मेरे शोक मोह की भावना निवृत्त होकर मैं आपके परम धाम में पहुँच जाऊँ । और यदि कहो कि तूने जितने खेल किये सब बेकार है, तो भी आप राजा हैं । जब कोई बार बार खराब खेल करता है तो राजा हुक्म देता है कि इसे निकाल दो । इसी प्रकार यदि मेरा खेल आपको पसन्द नहीं आया है तो फिर आप कहो कि इसको कभी संसार की नृत्यशाला में नहीं लाना है । तो भी मेरी मुक्ति है । भगवान् बड़े प्रसन्न होकर तराजू से उठे और नारद जी को छाती से लगाया और कहा तेरी मुक्ति तो निश्चित है।

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🕉️🕉️जय श्री सच्चिदानंद स्वरूपाय नमः 🕉️🕉️ 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 सतसंग वाणी 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 एक समय ऋषभदेव के पुत्र नौ योगी ऋषियों के साथ चौमासा व्यतीत करने के लिए महाराज जनक जी के यहाँ ठहरने के लिए आये हुए थे। तब वही पर महाराज जनक जी ने योगीश्वर से हाथ जोड़कर पूछा हे-- महात्मन ! भक्ति किस प्रकार हो सकती है। ***** योगी सुखद और सुहावने वचन के साथ बोला ---हे विदेहराज जनक मै उसके सुन्दर लक्षण बतलाता हू सुनो- कभी हँसते हुए जब चित प्रसन्न हो जाता है, तो उसी को कभी क्रोध के लक्षण भी हो जाते हैं। इसलिए तुम भगवान् से स्नेह कर सकने के लिए भक्ति धारण करो।सगुण ज्ञान से ही सब भवसागर से तर जाते हैं। **** हमारी आयु बड़ी बीत गई , हम ममता में फसे रहे आयु रोती है कि बिना हरि भक्ति के इतनी आयु बीत गई। **** भक्ति के तीन लक्षण बताये गए हैं--उत्तम, मध्यम और निष्कृत । जो सारे चराचर जगत में उस एक ही परब्रम्ह को देखता है वही भक्ति का सर्वोत्तम लक्षण है। *** संतजनों की संगति से सत्यमार्ग पर चलना मध्यम भक्ति के लक्षण है। ***** जो रज के बराबर भी एक को नही समझते हैं उस निष्कृत लक्षण में तो सारी दुनिया मोह माया में फँसी हुयी है। जब तक तृष्णा नही मिटती तब तक विरक्त नही होता है। ******************************************* सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। अर्थात :- सर्वदा सत्य की विजय और असत्य की पराजय और सत्य से ही विद्वानों व् महर्षियो का मार्ग विस्तृत होता है। ।।। 🌷🌷🕉️ जय श्री गुरुदेवाय नमः 🕉️🌷🌷 🔲✔️ सत्य सनातन धर्म की सदा जय हो।👏 🔲✔️ धर्म की जय हो। 🔲✔️अधर्म का नाश हो। 🔲✔️मानव समाज का कल्याण हो। 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 🕉️जय श्री राम🕉️

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