श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पूजा बनगाँव

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पूजा बनगाँव

#कृष्णजन्माष्टमी
श्रीकृष्णजन्माष्टमी पूजा वैसे तो बनगाँव में सन्त लक्ष्मीनाथ गोस्वामी के पूर्व से ही बनगाँव के सेरसेवे वंश के यहाँ मनाया जाता था, लेकिन जब गोस्वामीजी को इस बात की पता चली तो वे इनलोगो के घर जाकर इस पूजा को ग्रामीण स्तर पर करने को कहा। वैसे तो गोस्वामीजी के बात ही बनगाँव के लिये आदेश समान था, पर उनलोगों को भी ये बात बहुत पसंद आया। तब गोस्वामीजी इस पूजा को उठाकर अपने कुटी पर ले आया।और ग्रामीण से इस पूजा को सम्पन करने की आग्रह किया।जिन्हें ग्रामीणों ने सहर्ष स्वीकार इस पूजा की शुरुआत कर दी। गोस्वामीजी ने इस पूजा में खर्च होने वाली राशि के लिये प्रत्येक घर से कुछ राशि की सहयोग बांध दी जिन्हें पनचित कहा जाता है। एक पैसे की सहयोग राशि आज की तारीख में 25 रुपये पर पहुच चुका है। जिनकी वसूली की भार टोल दर टोल आदमी की नियुक्ति कर दी गयी। आज भी उन्ही के वंसज द्वारा इस पनचित कि वसूली की जाती है जिनका काम गाँव के प्रत्येक घर जाकर इस पनचित को लेना है और इस राशि को पूजा समिति तक पहुचाना है। आज भी इन्ही राशि के बल पर इतने बड़े पूजा का खर्च वहन किया जाता है

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Gd Bansal Mar 5, 2021

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sarla rana Mar 5, 2021

*🌹🌹राजा दशरथ के मुकुट का एक अनोखा राज, पहले कभी नही सुनी होगी यह कथा आपने🌹🌹* अयोध्या के राजा दशरथ एक बार भ्रमण करते हुए वन की ओर निकले वहां उनका समाना बाली से हो गया। राजा दशरथ की किसी बात से नाराज हो बाली ने उन्हें युद्ध के लिए चुनोती दी। राजा दशरथ की तीनो रानियों में से कैकयी अश्त्र शस्त्र एवं रथ चालन में पारंगत थी। अतः अक्सर राजा दशरथ जब कभी कही भ्रमण के लिए जाते तो कैकयी को भी अपने साथ ले जाते थे इसलिए कई बार वह युद्ध में राजा दशरथ के साथ होती थी। जब बाली एवं राजा दशरथ के मध्य भयंकर युद्ध चल रहा था उस समय संयोग वश रानी कैकयी भी उनके साथ थी। युद्ध में बाली राजा दशरथ पर भारी पड़ने लगा वह इसलिए क्योकि बाली को यह वरदान प्राप्त था की उसकी दृष्टि यदि किसी पर भी पद जाए तो उसकी आधी शक्ति बाली को प्राप्त हो जाती थी। अतः यह तो निश्चित था की उन दोनों के युद्ध में हार राजा दशरथ की ही होगी। राजा दशरथ के युद्ध हारने पर बाली ने उनके सामने एक शर्त रखी की या तो वे अपनी पत्नी कैकयी को वहां छोड़ जाए या रघुकुल की शान अपना मुकुट यहां पर छोड़ जाए। तब राजा दशरथ को अपना मुकुट वहां छोड़ रानी कैकेयी के साथ वापस अयोध्या लौटना पड़ा। रानी कैकयी को यह बात बहुत दुखी, आखिर एक स्त्री अपने पति के अपमान को अपने सामने कैसे सह सकती थी। यह बात उन्हें हर पल काटे की तरह चुभने लगी की उनके कारण राजा दशरथ को अपना मुकुट छोड़ना पड़ा। वह राज मुकुट की वापसी की चिंता में रहतीं थीं। जब श्री रामजी के राजतिलक का समय आया तब दशरथ जी व कैकयी को मुकुट को लेकर चर्चा हुई। यह बात तो केवल यही दोनों जानते थे। कैकेयी ने रघुकुल की आन को वापस लाने के लिए श्री राम के वनवास का कलंक अपने ऊपर ले लिया और श्री राम को वन भिजवाया। उन्होंने श्री राम से कहा भी था कि बाली से मुकुट वापस लेकर आना है। श्री राम जी ने जब बाली को मारकर गिरा दिया। उसके बाद उनका बाली के साथ संवाद होने लगा। प्रभु ने अपना परिचय देकर बाली से अपने कुल के शान मुकुट के बारे में पूछा था। तब बाली ने बताया- रावण को मैंने बंदी बनाया था। जब वह भागा तो साथ में छल से वह मुकुट भी लेकर भाग गया। प्रभु मेरे पुत्र को सेवा में ले लें। वह अपने प्राणों की बाजी लगाकर आपका मुकुट लेकर आएगा। जब अंगद श्री राम जी के दूत बनकर रावण की सभा में गए। वहां उन्होंने सभा में अपने पैर जमा दिए और उपस्थित वीरों को अपना पैर हिलाकर दिखाने की चुनौती दे दी। रावण के महल के सभी योद्धा ने अपनी पूरी ताकत अंगद के पैर को हिलाने में लगाई परन्तु कोई भी योद्धा सफल नहीं हो पाया। जब रावण के सभा के सारे योद्धा अंगद के पैर को हिला न पाए तो स्वयं रावण अंगद के पास पहुचा और उसके पैर को हिलाने के लिए जैसे ही झुका उसके सर से वह मुकुट गिर गया। अंगद वह मुकुट लेकर वापस श्री राम के पास चले आये। यह महिमा थी रघुकुल के राज मुकुट की। राजा दशरथ के पास गया तो उन्हें पीड़ा झेलनी पड़ी। बाली से जब रावण वह मुकुट लेकर गया तो तो बाली को अपने प्राणों को आहूत देनी पड़ी। इसके बाद जब अंगद रावण से वह मुकुट लेकर गया तो रावण के भी प्राण गए। तथा कैकयी के कारण ही रघुकुल के लाज बच सकी यदि कैकयी श्री राम को वनवास नही भेजती तो रघुकुल सम्मान वापस नही लोट पाता। कैकयी ने कुल के सम्मान के लिए सभी कलंक एवं अपयश अपने ऊपर ले लिए अतः श्री राम अपनी माताओ में सबसे ज्यादा प्रेम कैकयी को करते थे। जय श्री राम l

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Rani Mar 5, 2021

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pandey ji Mar 5, 2021

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