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🥀🥀 Apr 10, 2021

निगेटिव रिपोर्ट का कमाल... 10 दिन की जद्दोजहद के बाद एक आदमी अपनी कोरोना नेगटिव की रिपोर्ट हाथ में लेकर अस्पताल के रिसेप्शन पर खड़ा था। आसपास कुछ लोग तालियां बजा रहे थे, उसका अभिनंदन कर रहे थे। जंग जो जीत कर आया था वो। लेकिन उस शख्स के चेहरे पर बेचैनी की गहरी छाया थी। गाड़ी से घर के रास्ते भर उसे याद आता रहा "आइसोलेशन" नामक खतरनाक और असहनीय दौर का वो मंजर। न्यूनतम सुविधाओं वाला छोटा सा कमरा, अपर्याप्त उजाला, मनोरंजन के किसी साधन की अनुपलब्धता, कोई बात नही करता था और न ही कोई नजदीक आता था। खाना भी बस प्लेट में भरकर सरका दिया जाता था। कैसे गुजारे उसने वे 10 दिन, वही जानता था। घर पहुचते ही स्वागत में खड़े उत्साही पत्नी और बच्चों को छोड़ कर वह शख्स सीधे घर के एक उपेक्षित कोने के कमरे में गया, जहाँ माँ पिछले पाँच वर्षों से पड़ी थी । माँ के पावों में गिरकर वह खूब रोया और उन्हें लेकर बाहर आया। पिता की मृत्यु के बाद पिछले 5 वर्षों से एकांतवास (आइसोलेशन ) भोग रही माँ से कहा कि माँ आज से आप हम सब एक साथ एक जगह पर ही रहेंगे। माँ को भी बड़ा आश्चर्य लगा कि आख़िर बेटे ने उसकी पत्नी के सामने ऐसा कहने की हिम्मत कैसे कर ली ? इतना बड़ा हृदय परिवर्तन एकाएक कैसे हो गया ? बेटे ने फिर अपने एकांतवास की सारी परिस्थितियाँ माँ को बताई और बोला अब मुझे अहसास हुआ कि एकांतवास कितना दुखदायी होता है ? बेटे की नेगटिव रिपोर्ट उसकी जिंदगी की पॉजिटिव रिपोर्ट बन गयी। इसी का नाम जिंदगी...शायद किसी को बुरा भी लगे...🙏🏻

निगेटिव रिपोर्ट का कमाल...

10 दिन की जद्दोजहद के बाद एक आदमी अपनी कोरोना नेगटिव की रिपोर्ट हाथ में लेकर अस्पताल के रिसेप्शन पर खड़ा था।

आसपास कुछ लोग तालियां बजा रहे  थे, उसका अभिनंदन कर रहे थे।

जंग जो जीत कर आया था वो।

लेकिन उस शख्स के चेहरे पर बेचैनी की गहरी छाया थी।

गाड़ी से घर के रास्ते भर उसे याद आता रहा "आइसोलेशन" नामक खतरनाक और असहनीय दौर का वो मंजर।

न्यूनतम सुविधाओं वाला छोटा सा कमरा, अपर्याप्त उजाला, मनोरंजन के किसी साधन की अनुपलब्धता, कोई बात नही करता था और न ही कोई नजदीक आता था। खाना भी बस प्लेट में भरकर सरका दिया जाता था।

कैसे गुजारे उसने वे 10 दिन, वही जानता था।

घर पहुचते ही स्वागत में खड़े उत्साही पत्नी और बच्चों को छोड़ कर वह शख्स सीधे घर के एक उपेक्षित कोने के कमरे में गया, जहाँ माँ पिछले पाँच वर्षों से पड़ी थी ।

माँ के पावों में गिरकर वह खूब रोया और उन्हें लेकर बाहर आया।

पिता की मृत्यु के बाद पिछले 5 वर्षों से एकांतवास  (आइसोलेशन ) भोग रही माँ से कहा कि माँ आज से आप हम सब एक साथ एक जगह पर ही रहेंगे।

माँ को भी बड़ा आश्चर्य लगा कि आख़िर बेटे ने उसकी पत्नी के सामने ऐसा कहने की हिम्मत कैसे कर ली ?

 इतना बड़ा हृदय परिवर्तन एकाएक कैसे हो गया ?  बेटे ने फिर अपने एकांतवास की सारी परिस्थितियाँ माँ को बताई और बोला अब मुझे अहसास हुआ कि एकांतवास कितना दुखदायी होता है ? 

बेटे की नेगटिव रिपोर्ट उसकी जिंदगी की पॉजिटिव रिपोर्ट बन गयी।
इसी का नाम जिंदगी...शायद किसी को बुरा भी लगे...🙏🏻

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babulal Apr 10, 2021
radhe radhe ji nice post ji

Gajendrasingh kaviya Apr 11, 2021
Radhe Radhe good morning have a nice day my sweet sis 🌹🌷🌹🌹 very nice post thanks 🙏🌹🌺🌸

Arun Kumar Sharma May 16, 2021

https://youtu.be/ZQiyfMhFSwU *मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है..* 👉 *"स्वावलंबी व्यक्ति अपनी परिस्थितियों का उत्तरदायी स्वयं अपने को मानता है ।"* इस कारण वह उनके निवारण के लिए अपने अंदर ही सुधार और विकास करता है । अपनी इस ठीक नीति के कारण वह जल्दी ही अपनी अवांछित परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर लेता है और आगे की ओर बढ़ चलता है । *"चूंकि "परावलंबी" अपनी प्रतिकूलताओं और कठिनाइयों का कारण दूसरों को मानता है,* इसलिए वह उनके निवारण के लिए भी *"परमुखापेक्षी"* बना रहता है । सोचता है कि *"दूसरे सुधरें, अच्छे बनें और उसके साथ सहयोग करें तो उसकी कठिनाइयाँ दूर हो और वह आगे बढ़ सके ।"* इस परावलम्बन का फल यह होता है कि अपने को उत्तरदायी न समझने के कारण *"वह अपना सुधार नहीं करता और परिस्थितियों में ही उलझा रहता है ।"* 👉 *"मनुष्य को चाहिए कि वह भाग्य का निर्माता स्वयं अपने को माने ।"* सौभाग्य के लिए सत्कर्म करे और कर्तव्य पथ पर जो भी बाधाएँ आएँ उन्हें स्वावलंबी भावना से दूर करता हुआ आगे बढ़ता जाए । संसार में अपने किए ही अपने काम पूरे होते हैं, अपने चले ही यात्रा पूरी होती है और अपना पसीना बहाने पर ही उन्नति तथा श्रेय का सौभाग्य मिलता है । यह कभी भी नहीं भूलना चाहिए । *"ईश्वर ने मनुष्य को सर्वथा योग्य और समर्थ बनाया है ।"* वह अपना विकास किसी भी सीमा तक कर सकता है और उन्नति के कितने ही उच्च शिखर पर पहुँच सकता है ।

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Arun Kumar Sharma May 16, 2021

https://youtu.be/6Jb2gtkKnRM *कुसंगति का परिणाम...* *एक बार एक शिकारी शिकार करने गया, शिकार नहीं मिला, थकान हुई और एक वृक्ष के नीचे आकर सो गया। पवन का वेग अधिक था, तो वृक्ष की छाया कभी कम-ज्यादा हो रही थी, डालियों के यहाँ-वहाँ हिलने के कारण वृक्ष की छाया उसपर नहीं पड़ रही थी।* वहीं से एक अतिसुन्दर हंस उड़कर जा रहा था, उस हंस ने देखा की वह व्यक्ति बेचारा परेशान हो रहा हैं, धूप उसके मुँह पर आ रही हैं तो ठीक से सो नहीं पा रहा हैं, तो वह हंस पेड़ की डाली पर अपने पंख खोल कर बैठ गया ताकि उसकी छाँव में वह शिकारी आराम से सोयें। जब शिकारी सो रहा था तभी एक कौआ आकर उसी डाली पर बैठा, इधर-उधर देखा और बिना कुछ सोचे-समझे शिकारी के ऊपर अपना मल विसर्जन कर वहाँ से उड़ गया। तभी शिकारी उठ गया और गुस्से से यहाँ-वहाँ देखने लगा और उसकी नज़र हंस पर पड़ी और उसने तुरंत धनुष बाण निकाला और उस हंस को मार दिया। हंस नीचे गिरा और मरते-मरते हंस ने कहा:- मैं तो आपकी सेवा कर रहा था, मैं तो आपको छाँव दे रहा था, आपने मुझे ही मार दिया? इसमें मेरा क्या दोष? उस शिकारी ने कहा: यद्यपि आपका जन्म उच्च परिवार में हुआ, आपकी सोच आपके तन की तरह ही सुंदर हैं, आपके संस्कार शुद्ध हैं, यहाँ तक की आप अच्छे इरादे से मेरे लिए पेड़ की डाली पर बैठ मेरी सेवा कर रहे थे, लेकिन आपसे एक गलती हो गयी, की जब आपके पास कौआ आकर बैठा तो आपको उसी समय उड़ जाना चाहिए था। उस दुष्ट कौए के साथ एक घड़ी की संगत ने ही आपको मृत्यु के द्वार पर पहुँचाया हैं। *#शिक्षा:* संसार में संगति का सदैव ध्यान रखना चाहिये। जो मन, कार्य और बुद्धि से परमहंस हैं उन्हें कौओं की सभा से दूरी बनायें रखना चाहिये।

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Arun Kumar Sharma May 16, 2021

. *पिता का उपहार* एक बहुत ही बड़े उद्योगपति का पुत्र कॉलेज में अंतिम वर्ष की परीक्षा की तैयारी में लगा रहता है, तो उसके पिता उसकी परीक्षा के विषय में पूछते है तो वो जवाब में कहता है कि हो सकता है कॉलेज में अव्वल आऊँ, अगर मै अव्वल आया तो मुझे वो महंगी वाली कार ला कर दोगे जो मुझे बहुत पसन्द है.. तो पिता खुश होकर कहते हैं क्यों नहीं अवश्य ला दूंगा. ये तो उनके लिए आसान था. उनके पास पैसो की कोई कमी नहीं थी। जब पुत्र ने सुना तो वो दो गुने उत्साह से पढाई में लग गया। रोज कॉलेज आते जाते वो शो रुम में रखी कार को निहारता और मन ही मन कल्पना करता की वह अपनी मनपसंद कार चला रहा है। दिन बीतते गए और परीक्षा खत्म हुई। परिणाम आया वो कॉलेज में अव्वल आया उसने कॉलेज से ही पिता को फोन लगाकर बताया की वे उसका इनाम कार तैयार रखे मै घर आ रहा हूं। घर आते आते वो ख्यालो में गाडी को घर के आँगन में खड़ा देख रहा था। जैसे ही घर पंहुचा उसे वहाँ कोई कार नही दिखी. *वो बुझे मन से पिता के कमरे में दाखिल हुआ.* उसे देखते ही पिता ने गले लगाकर बधाई दी और उसके हाथ में कागज में लिपटी एक वस्तु थमाई और कहा लो यह तुम्हारा गिफ्ट। *पुत्र ने बहुत ही अनमने दिल से गिफ्ट हाथ में लिया और अपने कमरे में चला गया। मन ही मन पिता को कोसते हुए उसने कागज खोल कर देखा उसमे सोने के कवर में रामायण दिखी ये देखकर अपने पिता पर बहुत गुस्सा आया..* लेकिन उसने अपने गुस्से को संयमित कर एक चिठ्ठी अपने पिता के नाम लिखी की पिता जी आपने मेरी कार गिफ्ट न देकर ये रामायण दी शायद इसके पीछे आपका कोई अच्छा राज छिपा होगा.. लेकिन मै यह घर छोड़ कर जा रहा हु और तब तक वापस नही आऊंगा जब तक मै बहुत पैसा ना कमा लू और चिठ्ठी रामायण के साथ पिता के कमरे में रख कर घर छोड कर चला गया। समय बीतता गया.. पुत्र होशियार था होनहार था जल्दी ही बहुत धनवान बन गया. शादी की और शान से अपना जीवन जीने लगा कभी कभी उसे अपने पिता की याद आ जाती तो उसकी चाहत पर पिता से गिफ्ट ना पाने की खीज हावी हो जाती, वो सोचता माँ के जाने के बाद मेरे सिवा उनका कौन था इतना पैसा रहने के बाद भी मेरी छोटी सी इच्छा भी पूरी नहीं की. यह सोचकर वो पिता से मिलने से कतराता था। एक दिन उसे अपने पिता की बहुत याद आने लगी. उसने सोचा क्या छोटी सी बात को लेकर अपने पिता से नाराज हुआ अच्छा नहीं हुआ. ये सोचकर उसने पिता को फोन लगाया बहुत दिनों बाद पिता से बात कर रहा हूँ . ये सोच धड़कते दिल से रिसीवर थामे खड़ा रहा. तभी सामने से पिता के नौकर ने फ़ोन उठाया और उसे बताया की मालिक तो दस दिन पहले स्वर्ग सिधार गए और अंत तक तुम्हे याद करते रहे और रोते हुए चल बसे. *जाते जाते कह गए की मेरे बेटे का फोन आया तो उसे कहना की आकर अपना व्यवसाय सम्भाल ले.* तुम्हारा कोई पता नही होनेे से तुम्हे सूचना नहीं दे पाये। यह जानकर पुत्र को गहरा दुःख हुआ और दुखी मन से अपने पिता के घर रवाना हुआ. घर पहुच कर पिता के कमरे जाकर उनकी तस्वीर के सामने रोते हुए रुंधे गले से उसने पिता का दिया हुआ गिफ्ट रामायण को उठाकर माथे पर लगाया और उसे खोलकर देखा. *पहले पन्ने पर पिता द्वारा लिखे वाक्य पढ़ा जिसमे लिखा था "मेरे प्यारे पुत्र, तुम दिन दुनी रात चौगुनी तरक्की करो और साथ ही साथ मै तुम्हे कुछ अच्छे संस्कार दे पाऊं.. ये सोचकर ये रामायण दे रहा हूँ ",* पढ़ते वक्त उस रामायण से एक लिफाफा सरक कर नीचे गिरा जिसमे उसी गाड़ी की चाबी और नगद भुगतान वाला बिल रखा हुआ था। ये देखकर उस पुत्र को बहुत दुख हुआ और धड़ाम से जमींन पर गिर रोने लगा। *हम हमारा मनचाहा उपहार हमारी पैकिंग में ना पाकर उसे अनजाने में खो देते है।* ईश्वर भी हमे अपार गिफ्ट देते है, लेकिन हम अज्ञानी हमारे मन पसन्द पैकिंग में ना देखकर, गिफ्ट पा कर भी उसे खो देते है। हमे अपने माता पिता के प्रेम से दिये ऐसेे अन गिनत उपहारों का प्रेम से सम्मान करना चाहिए और उनका धन्यवाद करना चाहिए। https://youtu.be/W0H5GTwfqQI 😊 *Please take care & keep smiling* 😊

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Arun Kumar Sharma May 16, 2021

https://youtu.be/MYsFvIS76Xs ।। भक्ति रस ।। शबरी बोली - यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो राम तुम यहाँ कहाँ से आते राम गंभीर हुए कहा, भ्रम में न पड़ो माता राम क्या रावण का वध करने आया है ? अरे रावण का वध तो लक्ष्मण अपने पैर से वाण चला भी कर सकता है.. राम वन में बस इसलिए आया है ताकि जब युगों का इतिहास लिखा जाय तो उसमें अंकित हो कि सत्ता जब पैदल चल कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे तभी वह रामराज्य है राम वन में इसलिए आया है ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतिक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं शबरी एकटक राम को निहारती रहीं राम ने फिर कहा- राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता राम की यात्रा प्रारंभ हुई है भविष्य के लिए आदर्श की स्थापना के लिए राम आया है ताकि भारत को बता सके कि अन्याय का अंत करना ही धर्म है राम आया है ताकि युगों को सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाय और खर-दूषणो का घमंड तोड़ा जाये और राम आया है ताकि युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी शबरी के आशीर्वाद से जीते जाते हैं शबरी की आँखों में जल भर आया था उसने बात बदलकर कहा - कन्द खाओगे राम ? राम मुस्कुराए, "बिना खाये जाऊंगा भी नहीं माता" शबरी अपनी कुटिया से झपोली में कन्द ले कर आई और राम के समक्ष रख दिया राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा - मीठे हैं न प्रभु ? यहाँ आ कर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ माता बस इतना समझ रहा हूँ कि यही अमृत है शबरी मुस्कुराईं, बोली - "सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो राम, गुरुदेव ने ठीक कहा था" 🌺सियापति रामचन्द्र की जय🌺

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Anju Mishra May 16, 2021

💐🙏जय श्री राधे कृष्णा 🙏💐 🥀परमात्मा ने जो किया वह अच्छा ही किया था🥀 👉एक अमीर व्यक्ति समुद्र में अकेले घूमने के लिए एक नाव बनवाई और छुट्टी के दिन वह नाव लेकर अकेले समुद्र की सैर करने निकल पड़ा। वह समुद्र में थोङा आगे पहुँचा ही था कि अचानक एक जोरदार तूफान आ गया। उसकी नाव पुरी तरह से तहस-नहस हो गइ लेकिन वह लाइफ जैकेट के साथ समुद्र में कूद गया। जब तूफान शान्त हुआ तब वह तैरता-तैरता एक टापू पर जा पहुँचा। मगर वहाँ भी कोई नहीं था। टापू के चारों ओर समुद्र के अलावा क़ुछ भी नजर नहीं आ रहा था। उस आदमी ने सोचा कि जब मैंने पूरी जिंदगी में किसी का कभी बुरा नहीं किया तो मेरे साथ बुरा नहीं होगा। उसको लगा कि ईश्वर ने मौत से बचाया है तो आगे का रास्ता भी वही दिखाएँगे। धीरे-धीरे वह वहाँ पर उगे झाङ-फल-पत्ते खाकर दिन बिताने लगा। मगर अब धीरे-धीरे उसे लगने लगा था कि वह इस टापू पर फंस गया है। मगर अब भी ईश्वर पर उसका भरोसा कायम था। उसने सोचा इतने दिनों से मैं इस टापू पर मारा-मारा फिर रहा हूँ, क्यों न यहाँ एक झोपड़ी बना लूं। पता नहीं अभी और कितने दिन यहाँ बिताने पड़ें। पूरे दिन लकडि़यां और पत्ते वगैरह इकट्ठा कर उसने झोंपड़ी बनानी शुरू की। रात होते-होते उसकी झोंपड़ी बनकर तैयार हो गई थी। अभी वह झोंपड़ी के बाहर खड़ा होकर उसे देखते हुए सोच रहा था कि आज से झोंपडी में सोने को मिलेगा। मगर अचानक से मौसम बदला और बिजली जोर-जोर से कड़कने लगी और एक बिजली उसकी झोंपड़ी पर गिर गई। उसके देखते ही देखते झोंपड़ी जलकर खाक हो गई। यह देखकर वह व्यक्ति टूट गया। उसने आसमान की तरफ देखकर बोला, हे ईश्वर ये तेरा कैसा इंसाफ है। तूने मुझ पर अपनी रहम की नजर क्यों नहीं की? मैंने हमेशा तुझ पर विश्वास बनाए रखा। फिर वह इंसान हताश और निराश होकर सर पर हाथ रखकर रोने लगा। अचानक ही एक नाव टापू के पास आई। नाव से उतर कर दो आदमी बाहर आए और बोले कि हम तुम्हें बचाने आए हैं। दूर से इस वीरान टापू में जलती हुई झोंपडी देखी तो लगा कि कोई उस टापू पर मुसीबत में है। अगर तुम अपनी झोंपडी नहीं जलाते तो हमें पता नहीं चलता कि टापू पर कोई है। उस आदमी की आंखों से आंसू गिरने लगे। उसने ईश्वर से माफी मांगी और बोला कि हे ईश्वर मुझे क्या पता था कि तूने मुझे बचाने के लिए मेरी झोंपडी जलाई थी। अब तो मुझे निश्चित हो गया कि आप अपने भक्त का हमेशा ख्याल रखते हैं। आपने मेरे सब्र का इम्तेहान लिया, लेकिन मैं उसमे फेल हो गया। मुझे माफ कर दें। इस कहानी से यही सीख मिलती है कि दिन चाहे सुख के हों या दुःख के, भगवान अपने भक्त के साथ हमेशा रहते हैं। हाँ हम एक बार ईश्वर से रूठ सकते हैं, लेकिन ईश्वर हमसे कभी नहीं वह हमेशा अच्छा ही करते है। अक्सर हमारे साथ भी ऐसे हालत बन जाते हैं, हम पूरी तरह निराश हो जाते हैं और अपने ईश्वर या नियति से रूठ जाते हैं और विश्वास खो देते हैं जिससे हमारे अर्थात आत्म विश्वास में भी गिरावट हो जाती है। लेकिन फिर बाद में हमें पता लगता है कि परमात्मा ने जो किया वह अच्छा ही किया था, नहीं तो आज मैं यहाँ न होता। इसलिए मुसीबत या दुःख के समय हार मानने की बजाय लगातार अपने कर्तव्य करते रहिए, और बाकी अपने परम पिता परमेश्वर छोड़ दीजिए, क्योंकि वह जो करेंगे निश्चित अच्छा ही करेंगे।

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Arun Kumar Sharma May 15, 2021

*🌻सही दिशा🌻* https://youtu.be/L2RxbpWSzpc *एक गांव में धर्मदास नामक एक व्यक्ति रहता था।बातें तो बड़ी ही अच्छी-अच्छी करता था पर था एकदम कंजूस।कंजूस भी ऐसा वैसा नहीं बिल्कुल मक्खीचूस।* चाय की बात तो छोड़ों वह किसी को पानी तक के लिए नहीं पूछता था।साधु-संतों और भिखारियों को देखकर तो उसके प्राण ही सूख जाते थे कि कहीं कोई कुछ मांग न बैठे।एक दिन उसके दरवाजे पर एक महात्मा आये और धर्मदास से सिर्फ एक रोटी मांगी।पहले तो धर्मदास ने महात्मा को कुछ भी देने से मना कर दिया।लेकिन तब वह वहीं खड़ा रहा तो उसे आधी रोटी देने लगा।आधी रोटी देखकर महात्मा ने कहा कि अब तो मैं आधी रोटी नहीं पेट भरकर खाना खाऊंगा। इस पर धर्मदास ने कहा कि अब वह कुछ नहीं देगा।महात्मा रात भर चुपचाप भूखा-प्यासा धर्मदास के दरवाजे पर खड़ा रहा।सुबह जब धर्मदास ने महात्मा को अपने दरवाजे पर खड़ा देखा तो सोचा कि अगर मैंने इसे भरपेट खाना नहीं खिलाया और यह भूख-प्यास से यहीं पर मर गया तो मेरी बदनामी होगी।बिना कारण साधु की हत्या का दोष लगेगा। धर्मदास ने महात्मा से कहा कि बाबा तुम भी क्या याद करोगे !! आओ पेट भरकर खाना खा लो। महात्मा भी कोई ऐसा वैसा नहीं था। धर्मदास की बात सुनकर महात्मा ने कहा कि अब मुझे खाना नहीं खाना,मुझे तो एक कुआं खुदवा दो।लो अब कुआं बीच में कहां से आ गया’ धर्मदास ने साधु महाराज से कहा।रामदयाल ने कुआं खुदवाने से साफ मना कर दिया। साधु महाराज अगले दिन फिर रात भर चुपचाप भूखा-प्यासा धर्मदास के दरवाजे पर खड़ा रहा।अगले दिन सुबह भी जब धर्मदास ने साधु महात्मा को भूखा-प्यासा अपने दरवाजे पर ही खड़ा पाया तो सोचा कि अगर मैने कुआं नहीं खुदवाया तो यह महात्मा इस बार जरूर भूखा-प्यास मर जायेगा और मेरी बदनामी होगी। धर्मदास ने काफी सोच-विचार किया और महात्मा से कहा कि साधु बाबा मैं तुम्हारे लिए एक कुआं खुदवा देता हूं और इससे आगे अब कुछ मत बोलना। नहीं,एक नहीं अब तो दो कुएं खुदवाने पड़ेंगे। महात्मा की फरमाइशें बढ़ती ही जा रही थीं।धर्मदास कंजूस जरूर था पर बेवकूफ नहीं। उसने सोचा कि अगर मैंने दो कुएं खुदवाने से मनाकर दिया तो यह चार कुएं खुदवाने की बात करने लगेगा।इसलिए धर्मदास ने चुपचाप दो कुएं खुदवाने में ही अपनी भलाई समझी। कुएं खुदकर तैयार हुए तो उनमें पानी भरने लगा। जब कुओं में पानी भर गया तो महात्मा ने धर्मदास से कहा - दो कुओं में से एक कुआं मैं तुम्हें देता हूं और एक अपने पास रख लेता हूं। मैं कुछ दिनों के लिए कहीं जा रहा हूं, लेकिन ध्यान रहे मेरे कुएं में से तुम्हें एक बूंद पानी भी नहीं निकालना है।साथ ही अपने कुएं में से सब गांव वालों को रोज पानी निकालने देना है। मैं वापस आकर अपने कुएं से पानी पीकर प्यास बुझाऊंगा।’धर्मदास ने महात्मा वाले कुएं के मुंह पर एक मजबूत ढक्कन लगवा दिया। सब गांव वाले रोज धर्मदास वाले कुएं से पानी भरने लगे। लोग खूब पानी निकालते पर कुएं में पानी कम न होता।शुद्ध शीतल जल पाकर गांव वाले निहाल हो गये थे और महात्मा जी का गुणगान करते न थकते थे। एक वर्ष के बाद महात्मा पुनः उस गांव में आये और धर्मदास से बोले कि उसका कुआं खोल दिया जाये। धर्मदास ने कुएं का ढक्कन हटवा दिया। लोग लोग यह देखकर हैरान रह गये कि कुएं में एक बूंद भी पानी नहीं था। महात्मा ने कहा - कुएं से कितना भी पानी क्यों न निकाला जाए वह कभी खत्म नहीं होता अपितु बढ़ता जाता है।कुएं का पानी न निकालने पर कुआं सूख जाता है इसका स्पष्ट प्रमाण तुम्हारे सामने है और यदि किसी कारण से कुएं का पानी न निकालने पर पानी नहीं भी सुखेगा तो वह सड़ अवश्य जायेगा और किसी काम में नहीं आयेगा। महात्मा ने आगे कहा - कुएं के पानी की तरह ही धन-दौलत की भी तीन गतियां होती हैं। *उपयोग,नाश अथवा दुरुपयोग।* धन-दौलत का जितना इस्तेमाल करोगे वह उतना ही बढ़ती जायेगी। धन-दौलत का इस्तेमाल न करने पर कुएं के पानी की वह धन-दौलत निरर्थक पड़ी रहेगी। उसका उपयोग संभव नहीं रहेगा या अन्य कोई उसका दुरुपयोग कर सकता है।अतः अर्जित धन-दौलत का समय रहते सदुपयोग करना अनिवार्य है।ज्ञान की भी कमोबेश यही स्थिति होती है।धन-दौलत से दूसरों की सहायता करने की तरह ही ज्ञान भी बांटते चलो। *हमारा समाज जितना अधिक ज्ञानवान,शिक्षित व सुसंस्कृत होगा उतनी ही देश में सुख- शांति और समृद्धि आयेगी।ज्ञान बांटने वाले अथवा शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने वाले का भी कुएं के जल की तरह ही कुछ नहीं घटता अपितु बढ़ता ही है।* *🌸हम बदलेंगे,युग बदलेगा।*🌸

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Arun Kumar Sharma May 15, 2021

https://youtu.be/ZQiyfMhFSwU *🌷आज की अमृत कथा...🌷* *एक बार कालिदास को प्यास लगी थी तो एक स्त्री से बोले :-* माते पानी पिला दीजिए बङा पुण्य होगा. *स्त्री बोली :-* बेटा मैं तुम्हें जानती नहीं. अपना परिचय दो। मैं अवश्य पानी पिला दूंगी। *कालीदास ने कहा :-* मैं पथिक हूँ, कृपया पानी पिला दें। *स्त्री बोली :-* तुम पथिक कैसे हो सकते हो, पथिक तो केवल दो ही हैं सूर्य व चन्द्रमा, जो कभी रुकते नहीं हमेशा चलते रहते। तुम इनमें से कौन हो सत्य बताओ। *कालिदास ने कहा :-* मैं मेहमान हूँ, कृपया पानी पिला दें। *स्त्री बोली :-* तुम मेहमान कैसे हो सकते हो ? संसार में दो ही मेहमान हैं। पहला धन और दूसरा यौवन। इन्हें जाने में समय नहीं लगता। सत्य बताओ कौन हो तुम ? . (अब तक के सारे तर्क से पराजित हताश तो हो ही चुके थे) *कालिदास बोले :-* मैं सहनशील हूं। अब आप पानी पिला दें। *स्त्री ने कहा :-* नहीं, सहनशील तो दो ही हैं। पहली, धरती जो पापी-पुण्यात्मा सबका बोझ सहती है। उसकी छाती चीरकर बीज बो देने से भी अनाज के भंडार देती है, दूसरे पेड़ जिनको पत्थर मारो फिर भी मीठे फल देते हैं। तुम सहनशील नहीं। सच बताओ तुम कौन हो ? (कालिदास लगभग मूर्च्छा की स्थिति में आ गए और तर्क-वितर्क से झल्लाकर बोले) *कालिदास बोले :-* मैं हठी हूँ । . *स्त्री बोली :-* फिर असत्य. हठी तो दो ही हैं- पहला नख और दूसरे केश, कितना भी काटो बार-बार निकल आते हैं। सत्य कहें ब्राह्मण कौन हैं आप ? (पूरी तरह अपमानित और पराजित हो चुके थे) *कालिदास ने कहा :- फिर तो मैं मूर्ख ही हूँ।* . *स्त्री ने कहा :-नहीं तुम मूर्ख कैसे हो सकते हो।* *मूर्ख दो ही हैं। पहला राजा जो बिना योग्यता के भी सब पर शासन करता है, और दूसरा दरबारी पंडित जो राजा को प्रसन्न करने के लिए ग़लत बात पर भी तर्क करके उसको सही सिद्ध करने की चेष्टा करता है।* (कुछ बोल न सकने की स्थिति में कालिदास वृद्धा के पैर पर गिर पड़े और पानी की याचना में गिड़गिड़ाने लगे) *वृद्धा ने कहा :-* उठो वत्स ! (आवाज़ सुनकर कालिदास ने ऊपर देखा तो साक्षात माता सरस्वती वहां खड़ी थी, कालिदास पुनः नतमस्तक हो गए) *माता ने कहा :-* शिक्षा से ज्ञान आता है न कि अहंकार । तूने शिक्षा के बल पर प्राप्त मान और प्रतिष्ठा को ही अपनी उपलब्धि मान लिया और अहंकार कर बैठे इसलिए मुझे तुम्हारे चक्षु खोलने के लिए ये स्वांग करना पड़ा। . कालिदास को अपनी गलती समझ में आ गई और भरपेट पानी पीकर वे आगे चल पड़े। शिक्षा :- विद्वत्ता पर कभी घमण्ड न करें, यही घमण्ड विद्वत्ता को नष्ट कर देता है।

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।। पुण्यों का मोल।। . दान से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है और साथ ही जाने-अनजाने में किए गए पाप कर्मों के फल भी नष्ट हो जाते हैं। . शास्त्रों में दान का विशेष महत्व बताया गया है। इस पुण्य कर्म में समाज में समानता का भाव बना रहता है और जरुरतमंद व्यक्ति को भी जीवन के लिए उपयोगी चीजें प्राप्त हो पाती है। . एक व्यापारी जितना अमीर था उतना ही दान-पुण्य करने वाला. वह सदैव यज्ञ-पूजा आदि कराता रहता था. . एक यज्ञ में उसने अपना सबकुछ दान कर दिया. अब उसके पास परिवार चलाने लायक भी पैसे नहीं बचे थे. . व्यापारी की पत्नी ने सुझाव दिया कि पड़ोस के नगर में एक बड़े सेठ रहते हैं. वह दूसरों के पुण्य खरीदते हैं. . आप उनके पास जाइए और अपने कुछ पुण्य बेचकर थोड़े पैसे ले आइए जिससे फिर से काम-धंधा शुरू हो सके. . पुण्य बेचने की व्यापारी की बिलकुल इच्छा नहीं थी लेकिन पत्नी के दबाव और बच्चों की चिंता में वह पुण्य बेचने को तैयार हुआ. पत्नी ने रास्ते में खाने के लिए चार रोटियां बनाकर दे दीं. . व्यापारी चलता-चलता उस नगर के पास पहुंचा जहां पुण्य के खरीदार सेठ रहते थे. उसे भूख लगी थी. . नगर में प्रवेश करने से पहले उसने सोचा भोजन कर लिया जाए. उसने जैसे ही रोटियां निकालीं एक कुतिया तुरंत के जन्मे अपने तीन बच्चों के साथ आ खड़ी हुई. . कुतिया ने बच्चे जंगल में जन्म दिए थे. बारिश के दिन थे और बच्चे छोटे थे इसलिए वह उन्हें छोड़कर नगर में नहीं जा सकती थी. . व्यापारी को दया आ गई. उसने एक रोटी कुतिया को खाने के लिए दे दिया. . कुतिया पलक झपकते रोटी चट कर गई लेकिन वह अब भी भूख से हांफ रही थी. . व्यापारी ने दूसरी रोटी, फिर तीसरी और फिर चारो रोटियां कुतिया को खिला दीं. खुद केवल पानी पीकर सेठ के पास पहुंचा. . व्यापारी ने सेठ से कहा कि वह अपना पुण्य बेचने आया है. सेठ व्यस्त था. उसने कहा कि शाम को आओ. . दोपहर में सेठ भोजन के लिए घर गया और उसने अपनी पत्नी को बताया कि एक व्यापारी अपने पुण्य बेचने आया है. उसका कौन सा पुण्य खरीदूं. . सेठ की पत्नी बहुत पतिव्रता और सिद्ध थी. उसने ध्यान लगाकर देख लिया कि आज व्यापारी ने कुतिया को रोटी खिलाई है. . उसने अपने पति से कहा कि उसका आज का पुण्य खरीदना जो उसने एक जानवर को रोटी खिलाकर कमाया है. वह उसका अब तक का सर्वश्रेष्ठ पुण्य है. . व्यापारी शाम को फिर अपना पुण्य बेचने आया. सेठ ने कहा- आज आपने जो यज्ञ किया है मैं उसका पुण्य लेना चाहता हूं. . व्यापारी हंसने लगा. उसने कहा कि अगर मेरे पास यज्ञ के लिए पैसे होते तो क्या मैं आपके पास पुण्य बेचने आता! . सेठ ने कहा कि आज आपने किसी भूखे जानवर को भोजन कराकर उसके और उसके बच्चों के प्राणों की रक्षा की है. मुझे वही पुण्य चाहिए. . व्यापारी वह पुण्य बेचने को तैयार हुआ. सेठ ने कहा कि उस पुण्य के बदले वह व्यापारी को चार रोटियों के वजन के बराबर हीरे-मोती देगा. . चार रोटियां बनाई गईं और उसे तराजू के एक पलड़े में रखा गया. दूसरे पलड़े में सेठ ने एक पोटली में भरकर हीरे-जवाहरात रखे. . पलड़ा हिला तक नहीं. दूसरी पोटली मंगाई गई. फिर भी पलड़ा नहीं हिला. . कई पोटलियों के रखने पर भी जब पलड़ा नहीं हिला तो व्यापारी ने कहा- सेठजी, मैंने विचार बदल दिया है. मैं अब पुण्य नहीं बेचना चाहता. . व्यापारी खाली हाथ अपने घर की ओर चल पड़ा. उसे डर हुआ कि कहीं घर में घुसते ही पत्नी के साथ कलह न शुरू हो जाए. . जहां उसने कुतिया को रोटियां डाली थीं वहां से कुछ कंकड़-पत्थर उठाए और साथ में रखकर गांठ बांध दी. . घर पहुंचने पर पत्नी ने पूछा कि पुण्य बेचकर कितने पैसे मिले तो उसने थैली दिखाई और कहा इसे भोजन के बाद रात को ही खोलेंगे. इसके बाद गांव में कुछ उधार मांगने चला गया. . इधर उसकी पत्नी ने जबसे थैली देखी थी उसे सब्र नहीं हो रहा था. पति के जाते ही उसने थैली खोली. . उसकी आंखे फटी रह गईं. थैली हीरे-जवाहरातों से भरी थी. . व्यापारी घर लौटा तो उसकी पत्नी ने पूछा कि पुण्यों का इतना अच्छा मोल किसने दिया ? इतने हीरे-जवाहरात कहां से आए ? . व्यापारी को अंदेशा हुआ कि पत्नी सारा भेद जानकर ताने तो नहीं मार रही लेकिन उसके चेहरे की चमक से ऐसा लग नहीं रहा था. . व्यापारी ने कहा- दिखाओ कहां हैं हीरे-जवाहरात. पत्नी ने लाकर पोटली उसके सामने उलट दी. उसमें से बेशकीमती रत्न गिरे. व्यापारी हैरान रह गया. . फिर उसने पत्नी को सारी बात बता दी. पत्नी को पछतावा हुआ कि उसने अपने पति को विपत्ति में पुण्य बेचने को विवश किया. . दोनों ने तय किया कि वह इसमें से कुछ अंश निकालकर व्यापार शुरू करेंगे. व्यापार से प्राप्त धन को इसमें मिलाकर जनकल्याण में लगा देंगे. . ईश्वर आपकी परीक्षा लेता है. परीक्षा में वह सबसे ज्यादा आपके उसी गुण को परखता है जिस पर आपको गर्व हो. . अगर आप परीक्षा में खरे उतर जाते हैं तो ईश्वर वह गुण आपमें हमेशा के लिए वरदान स्वरूप दे देते हैं. . अगर परीक्षा में उतीर्ण न हुए तो ईश्वर उस गुण के लिए योग्य किसी अन्य व्यक्ति की तलाश में लग जाते हैं. . इसलिए विपत्तिकाल में भी भगवान पर भरोसा रखकर सही राह चलनी चाहिए. आपके कंकड़-पत्थर भी अनमोल रत्न हैं।।

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Arun Kumar Sharma May 15, 2021

https://youtu.be/6Jb2gtkKnRM स्नेह के आँसू ======= गली से गुजरते हुए सब्जी वाले ने तीसरी मंजिल की घंटी का बटन दबाया। ऊपर से बालकनी का दरवाजा खोलकर बाहर आई महिला ने नीचे देखा। "बीबी जी ! सब्जी ले लो । बताओ क्या- क्या तोलना है। कई दिनों से आपने सब्जी नहीं खरीदी मुझसे, कोई और देकर जा रहा है?" सब्जी वाले ने चिल्लाकर कहा। "रुको भैया! मैं नीचे आती हूँ।" उसके बाद महिला घर से नीचे उतर कर आई और सब्जी वाले के पास आकर बोली - "भैया ! तुम हमारी घंटी मत बजाया करो। हमें सब्जी की जरूरत नहीं है।" "कैसी बात कर रही हैं बीबी जी ! सब्जी खाना तो सेहत के लिए बहुत जरूरी होता है। किसी और से लेती हो क्या सब्जी ?" सब्जीवाले ने कहा। "नहीं भैया! उनके पास अब कोई काम नहीं है। और किसी तरह से हम लोग अपने आप को जिंदा रखे हुए हैं। जब सब ठीक होने लग जाएगा, घर में कुछ पैसे आएंगे, तो तुमसे ही सब्जी लिया करूंगी। मैं किसी और से सब्जी नहीं खरीदती हूँ। तुम घंटी बजाते हो तो उन्हें बहुत बुरा लगता है, उन्हें अपनी मजबूरी पर गुस्सा आने लगता है। इसलिए भैया अब तुम हमारी घंटी मत बजाया करो।" महिला कहकर अपने घर में वापिस जाने लगी। "ओ बहन जी ! तनिक रुक जाओ। हम इतने बरस से तुमको सब्जी दे रहे हैं । जब तुम्हारे अच्छे दिन थे, तब तुमने हमसे खूब सब्जी और फल लिए थे। अब अगर थोड़ी-सी परेशानी आ गई है, तो क्या हम तुमको ऐसे ही छोड़ देंगे ? सब्जी वाले हैं, कोई नेता जी तो है नहीं कि वादा करके छोड़ दें। रुके रहो दो मिनिट।" और सब्जी वाले ने एक थैली के अंदर टमाटर , आलू, प्याज, घीया, कद्दू और करेले डालने के बाद धनिया और मिर्च भी उसमें डाल दिया । महिला हैरान थी। उसने तुरंत कहा – "भैया ! तुम मुझे उधार सब्जी दे रहे हो, कम से कम तोल तो लेते, और मुझे पैसे भी बता दो। मैं तुम्हारा हिसाब लिख लूंगी। जब सब ठीक हो जाएगा तो तुम्हें तुम्हारे पैसे वापस कर दूंगी।" महिला ने कहा। "वाह..... ये क्या बात हुई भला ? तोला तो इसलिए नहीं है कि कोई मामा अपने भांजी -भाँजे से पैसे नहीं लेता है। और बहिन ! मैं कोई अहसान भी नहीं कर रहा हूँ । ये सब तो यहीं से कमाया है, इसमें तुम्हारा हिस्सा भी है। गुड़िया के लिए ये आम रख रहा हूँ, और भाँजे के लिए मौसमी । बच्चों का खूब ख्याल रखना। ये बीमारी बहुत बुरी है। और आखिरी बात सुन लो .... घंटी तो मैं जब भी आऊँगा, जरूर बजाऊँगा।" और सब्जी वाले ने मुस्कुराते हुए दोनों थैलियाँ महिला के हाथ में थमा दीं। अब महिला की आँखें मजबूरी की जगह स्नेह के आंसुओं से भरी हुईं थीं। *🌷सारांश🌷* कहीं और न जाकर अपने आसपास के लोगों की सेवा यदि प्रत्येक व्यक्ति करले तो यह मुश्किल घड़ी भी आसानी से गुजर जाएगी और रिश्ते भी मज़बूत होगें 🙏🙏🙏

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