Vijay Lakhani
Vijay Lakhani Jan 17, 2017

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Deepak Sahu Jan 17, 2017
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Neha Sharma Sep 26, 2020

*जय श्री शनिदेव*🙏🌹🌹 *शुभ प्रभात् नमन*🙏🌹🌹 *आज शनिवार है, आज हम आपको बतायेगें कि,शनिदेव - कैसे हुआ जन्म और कैसे टेढ़ी हुई नजर?????? *अक्सर शनि का नाम सुनते ही शामत नजर आने लगती है, सहमने लग जाते हैं, शनि के प्रकोप का खौफ खा जाते हैं। कुल मिलाकर शनि को क्रूर ग्रह माना जाता है लेकिन असल में ऐसा है नहीं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार शनि न्यायधीश या कहें दंडाधिकारी की भूमिका का निर्वहन करते हैं। *वह अच्छे का परिणाम अच्छा और बूरे का बूरा देने वाले ग्रह हैं। अगर कोई शनिदेव के कोप का शिकार है तो रूठे हुए शनिदेव को मनाया भी जा सकता है। शनि जयंती का दिन तो इस काम के लिये सबसे उचित माना जाता है। आइये जानते हैं शनिदेव के बारे में, क्या है इनके जन्म की कहानी और क्यों रहते हैं शनिदेव नाराज। *शनिदेव जन्मकथा...... *शनिदेव के जन्म के बारे में स्कंदपुराण के काशीखंड में जो कथा मिलती वह कुछ इस प्रकार है। राजा दक्ष की कन्या संज्ञा का विवाह सूर्यदेवता के साथ हुआ। सूर्यदेवता का तेज बहुत अधिक था जिसे लेकर संज्ञा परेशान रहती थी। *वह सोचा करती कि किसी तरह तपादि से सूर्यदेव की अग्नि को कम करना होगा। जैसे तैसे दिन बीतते गये संज्ञा के गर्भ से वैवस्वत मनु, यमराज और यमुना तीन संतानों ने जन्म लिया। संज्ञा अब भी सूर्यदेव के तेज से घबराती थी फिर एक दिन उन्होंने निर्णय लिया कि वे तपस्या कर सूर्यदेव के तेज को कम करेंगी लेकिन बच्चों के पालन और सूर्यदेव को इसकी भनक न लगे इसके लिये उन्होंने एक युक्ति निकाली उन्होंने अपने तप से अपनी हमशक्ल को पैदा किया जिसका नाम संवर्णा रखा। *संज्ञा ने बच्चों और सूर्यदेव की जिम्मेदारी अपनी छाया संवर्णा को दी और कहा कि अब से मेरी जगह तुम सूर्यदेव की सेवा और बच्चों का पालन करते हुए नारीधर्म का पालन करोगी लेकिन यह राज सिर्फ मेरे और तुम्हारे बीच ही बना रहना चाहिये। *अब संज्ञा वहां से चलकर पिता के घर पंहुची और अपनी परेशानी बताई तो पिता ने डांट फटकार लगाते हुए वापस भेज दिया लेकिन संज्ञा वापस न जाकर वन में चली गई और घोड़ी का रूप धारण कर तपस्या में लीन हो गई। उधर सूर्यदेव को जरा भी आभास नहीं हुआ कि उनके साथ रहने वाली संज्ञा नहीं सुवर्णा है। संवर्णा अपने धर्म का पालन करती रही उसे छाया रूप होने के कारण उन्हें सूर्यदेव के तेज से भी कोई परेशानी नहीं हुई। सूर्यदेव और संवर्णा के मिलन से भी मनु, शनिदेव और भद्रा (तपती) तीन संतानों ने जन्म लिया। *एक अन्य कथा के अनुसार शनिदेव का जन्म महर्षि कश्यप के अभिभावकत्व में कश्यप यज्ञ से हुआ। छाया शिव की भक्तिन थी। जब शनिदेव छाया के गर्भ में थे तो छाया ने भगवान शिव की कठोर तपस्या कि वे खाने-पीने की सुध तक उन्हें न रही। भूख-प्यास, धूप-गर्मी सहने के कारण उसका प्रभाव छाया के गर्भ मे पल रही संतान यानि शनि पर भी पड़ा और उनका रंग काला हो गया। *जब शनिदेव का जन्म हुआ तो रंग को देखकर सूर्यदेव ने छाया पर संदेह किया और उन्हें अपमानित करते हुए कह दिया कि यह मेरा पुत्र नहीं हो सकता। मां के तप की शक्ति शनिदेव में भी आ गई थी उन्होंने क्रोधित होकर अपने पिता सूर्यदेव को देखा तो सूर्यदेव बिल्कुल काले हो गये, उनके घोड़ों की चाल रूक गयी। *परेशान होकर सूर्यदेव को भगवान शिव की शरण लेनी पड़ी इसके बाद भगवान शिव ने सूर्यदेव को उनकी गलती का अहसास करवाया। सूर्यदेव अपने किये का पश्चाताप करने लगे और अपनी गलती के लिये क्षमा याचना कि इस पर उन्हें फिर से अपना असली रूप वापस मिला। लेकिन पिता पुत्र का संबंध जो एक बार खराब हुआ फिर न सुधरा आज भी शनिदेव को अपने पिता सूर्य का विद्रोही माना जाता है। *क्यों है शनिदेव की दृष्टि टेढ़ी..... *शनिदेव के गुस्से की एक वजह उपरोक्त कथा में सामने आयी कि माता के अपमान के कारण शनिदेव क्रोधित हुए लेकिन वहीं ब्रह्म पुराण इसकी कुछ और ही कहानी बताता है। ब्रह्मपुराण के अनुसार शनिदेव भगवान श्री कृष्ण के परम भक्त थे। *जब शनिदेव जवान हुए तो चित्ररथ की कन्या से इनका विवाह हुआ। शनिदेव की पत्नी सती, साध्वी और परम तेजस्विनी थी लेकिन शनिदेव भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में इतना लीन रहते कि अपनी पत्नी को उन्होंनें जैसे भुला ही दिया। एक रात ऋतु स्नान कर संतान प्राप्ति की इच्छा लिये वह शनि के पास आयी लेकिन शनि देव हमेशा कि तरह भक्ति में लीन थे। वे प्रतीक्षा कर-कर के थक गई और उनका ऋतुकाल निष्फल हो गया। *आवेश में आकर उन्होंने शनि देव को शाप दे दिया कि जिस पर भी उनकी नजर पड़ेगी वह नष्ट हो जायेगा। ध्यान टूटने पर शनिदेव ने पत्नी को मनाने की कोशिश की उन्हें भी अपनी गलती का अहसास हुआ लेकिन तीर कमान से छूट चुका था जो वापस नहीं आ सकता था अपने श्राप के प्रतिकार की ताकत उनमें नहीं थी। इसलिये शनि देवता अपना सिर नीचा करके रहने लगे। *शनि देव से जुड़ी महत्त्वपूर्ण बातें..... *शनि देव को न्याय का देवता माना जाता है। *शनि देव का वाहन गिद्ध, कुत्ता, भैंस आदि हैं। *शनिवार को तेल, काले तिल, काले कपड़े आदि दान करने से शनि देव प्रसन्न रहते हैं। *मान्यता है कि शनि देव की अपने पिता सूर्यदेव से अच्छे रिश्ते नहीं हैं। *एक कथानुसार हनुमान जी ने शनि देव को रावण की कैद से मुक्त कराया था। तभी से हनुमान जी की आराधना करने वाले जातकों को शनि देव नहीं सताते। *शनि देव की गति मंद यानि बेहद धीमी है। इसी कारण एक राशि में वह करीब साढ़ेसात साल तक रहते हैं। !! जय शनिदेव !! *न्याय देवता शनि सदा,सच की रखते लाज। *यही गिराते हैं सदा ,झूठे जन पर गाज।। !! जय शनिदेव वन्दन अभिन्द्न !! 🌹🙏🌹🙏🙏🌹🙏🌹

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Subhash Singh Sep 26, 2020

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M.S.Chauhan Sep 26, 2020

*शुभ दिन शनिवार* *जय शनिदेव महाराज* 🌷🌷🌿🙏🌿🌷🌷 *जानिए क्यों चढ़ाया जाता है शनि देव को सरसों का तेल* ? ✍शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए शनिवार को शनिदेव पर तेल चढ़ाया जाता है और सरसों के तेल का दीपक भी जलाया जाता है. सरसों तेल और शनि देव के बीच संबंध दरअसल इसके पीछे एक पौराणिक कथा बताई जाती है. जिसके अनुसार रामायण काल यानी त्रेता युग में शनि देव को अपने बल और पराक्रम पर अहंकार हो था. इस दौर में शनि देव ने हनुमान जी के बल और पराक्रम की प्रशंसा सुनी तो वे बजरंग बली से युद्ध करने के लिए निकल पड़े. लेकिन उस समय हनुमान जी अपने प्रभु श्रीराम की भक्‍ति में लीन थे. तभी अपने बल के घमंड में चूर शनिदेव आ पहुंचे और उन्‍होंने हनुमान जी को युद्ध के लिए ललकारना शुरु किया. रामभक्त हनुमान जी को शनिदेव के क्रोध और घमंड का कारण समझ आ चुका था इसलिए उन्‍होंने युद्ध को स्‍वीकार करने की बजाय उन्‍हें शांत करना उचित समझा। मजबूरी में किया बजरंग बली ने युद्ध लेकिन शनि देव माने नहीं और लगातार हनुमान जी को युद्ध के लिए ललकारते रहे. जिसके बाद मजबूर होकर हनुमान जी को युद्ध करने के लिए आगे आना ही पड़ा. शनिदेव और बजरंग बली के बीच घमासान युद्ध हुआ. स्वयं शिव के अंशावतार और श्रीहरि के अवतार राम जी के भक्त हनुमान के आगे भला कौन टिक सकता था. इस युद्ध का अंजाम वही हुआ जो होना था. शनि देव को हनुमान जी ने परास्‍त कर दिया. शनिदेव को सरसों तेल से मिली राहत लेकिन इस युद्ध के दौरान शनि देव बेहद घायल हो गए. बजरंग बली की गदा के भीषण प्रहारों से उन्हें बेहद चोट लगी और शरीर पर कई जगह घाव बन गए. जिसकी पीड़ा से शनिदेव व्याकुल हो गए. हालांकि शनिदेव ने हनुमान जी से दुश्मनी साधी थी और उन्हें युद्ध के लिए ललकारा था, लेकिन भक्त शिरोमणि हनुमान जी से उनकी पीड़ा नहीं देखी गई. हनुमान जी ने शनि देव पर कृपा करते हुए उन्‍हें पीड़ा से मुक्‍त करने के लिए उनके शरीर पर सरसों का तेल लगाया. जिससे उन्हें आराम मिला. तभी से शनि देव को तेल चढ़ाने की पंरपरा की शुरुआत हुई. तेल चढ़ाने से भक्तों की पीड़ा करते हैं शनिदेव दूर मान्‍यता है कि शनि देव को तेल चढ़ाने से उनकी पीड़ा कम हो जाती है और फिर वे अपने भक्‍त की पीड़ा को भी कम कर देते हैं. शनि देव को तेल चढ़ाने से जीवन की सभी परेशानियों से छुटकारा मिलता है. आर्थिक समस्‍याओं से जूझ रहे लोगों को भी शनिवार के दिन शनि देव को सरसों का तेल चढ़ाना चाहिए. कहा जाता कि शनिदेव की पूजा में तेल के साथ तिल का भी बहुत महत्व है. काली चीजें हैं शनिदेव को बेहद प्रिय काला तिल, तेल, काला वस्त्र, काली उड़द शनि देव को अत्यंत प्रिय है. मान्यता है कि काला तिल और तेल से शनिदेव जल्द ही प्रसन्न हो जाते हैं. यदि शनिदेव की पूजा इन वस्तुओं से की जाए तो ऐसी पूजा सफल मानी जाती है. ऐसी मान्यता है कि शनिदेव अपने भक्तों पर शीघ्र ही नाराज और प्रसन्न हो जाते है. शनिदेव की यदि विधिवत पूजा की जाए, तो वे अपने भक्तों को कभी दुखी नहीं रखते हैं. यदि कोई व्‍यक्‍ति शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या से गुज़र रहा है तो उसे भी शनिवार के दिन शनि देव की पूजा करनी चाहिए और उन्‍हें शनि देव को सरसों का तेल चढ़ाना चाहिए. 🌷🌷🌿🙏🌿🌷🌷

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*🛑🛑🛑🛑🛑🛑🛑🛑🛑🛑🛑⛔ 🧩जय बोलने से मन को शांति मिलती हैं🍀 🌹श्री बोलने से शक्ति मिलती है🌹 💐राधे बोलने से पापो से मुक्ति मिलती हैं💐 🍧और निरंतरराधेबोलने सेभक्ति मिलती हैं🍧 💠भक्ति से क्या मिलता हैं जानते हो आप💠 🎾भक्ति से मेरे कन्हैंया मिलते हैं🎾 🌹तो प्यार से बोलो जय श्रीराधे🌹 🌀🌀🌀🌀🌀🌀🌀🌀🌀🌀🌀🌀 ♻🙏🏻जय जय श्री राधेश्याम🙏🏻♻ ✅✅✅✅✅✅✅✅✅✅✅✅ 💰ईमानदार लोग💰 🧭अकलमंद होने के बावजूद भी🧭 🍫धोखे क्यों खा जाते हैं🍫 ✳ क्योंकि✳ 🧁वो अपनी तरह दूसरों के भी🧁 🍛ईमानदार होने का विश्वास कर बैठते हैं🍛 🌐🌐🌐🌐🌐🌐🌐🌐🌐🌐🌐🌐 🧬कलयुग के अवतार की जय⛳लीले के अस्वार की जय💚हारे के सहारे की जय🥏आपका आज का दिन शुभ एवं मंगलमय हो🈯 🍩🍩🍩🍩🍩🍩🍩🍩🍩🍩🍩🍩

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