श्री गुरवायुरप्पन - श्री कृष्ण

श्री गुरवायुरप्पन - श्री कृष्ण
श्री गुरवायुरप्पन - श्री कृष्ण

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गुरुवायुर मन्दिर

गुरुवायुर अपने मंदिर के लिए सर्वाधिक प्रसिद्ध है, जो कई शताब्दियों पुराना है और केरल में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। मंदिर के देवता भगवान गुरुवायुरप्पन हैं जो बालगोपालन (कृष्ण भगवान का बालरूप) के रूप में हैं। हालांकि गैर-हिन्दुओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं है, तथापि कई धर्मों को मानने वाले भगवान गुरूवायूरप्पन के परम भक्त हैं।

एक विख्यात शास्त्रीय प्रदर्शन कला कृष्णनट्टम कली, जोकि विश्व स्तर पर प्रसिद्ध नाट्य-नृत्य कथकली के प्रारंभिक विकास में सहायक थी, उसका गुरुयावूर में काफी प्रचलन है क्यूंकि मंदिर प्रशासन (गुरुयावूर देवास्वोम) एक कृष्णट्टम संस्थान का संचालन करता है। इसके अतिरिक्त, गुरुयावूर मंदिर दो प्रसिद्ध साहित्यिक कृतियों के लिए भी विख्यात है: मेल्पथूर नारायण भट्टाथिरी के नारायणीयम और पून्थानम के ज्नानाप्पना, दोनों (स्वर्गीय) लेखक गुरुवायुरप्पन के परम भक्त थे। जहां नारायणीयम संस्कृत में, दशावतारों (महाविष्णु के दस अवतार) पर डाली गयी एक सरसरी दृष्टि है, वहीं ज्नानाप्पना स्थानीय मलयालम भाषा में, जीवन के नग्न सत्यों का अवलोकन करती है और क्या करना चाहिए व क्या नहीं करना चाहिए, इसके सम्बन्ध में उपदेश देती है।

गुरुवायुर मंदिर प्रवेश

गुरुवायुर दक्षिण भारतीय शास्त्रीय कर्नाटकीय संगीत का एक प्रमुख स्थल है, विशेषकर यहां के शुभ एकादसी दिवस के दौरान जोकि सुविख्यात गायक चेम्बाई वैद्यनाथ भगावतार की स्मृति में मनाया जाता है, यह भी गुरुवायुरप्पन के दृढ़ भक्त थे। मंदिर वार्षिक समारोह (उल्सवम) भी मनाता है जो कुम्भ के मलयाली महीने (फरवरी-मार्च) में पड़ता है इसके दौरान यह शास्त्रीय नृत्य जैसे कथकली, कूडियट्टम, पंचवाद्यम, थायाम्बका और पंचारिमेलम आदि का आयोजन करता है। इस स्थान ने कई प्रसिद्ध थाप वाले वाद्यों जैसे चेन्दा, मद्दलम, तिमिला, इलाथलम और इडक्का आदि के वादकों को जन्म दिया है।

मंदिर का संचालन गुरुवायुर देवास्वोम प्रबंधन समिति के द्वारा, केरल सरकार के निर्देशन में किया जा रहा है। समिति के अस्थायी सदस्यों का "नामांकन" राज्य सरकार के सत्तारूढ़ दल द्वारा समय-समय पर किया जाता है। स्थायी सदस्य, चेन्नास माना (मंदिर के परंपरागत तंत्री), सामुथिरी और मल्लिस्सेरी माना, परिवारों के वर्तमान मुखिया होते हैं।

टीपू सुल्तान के आक्रमण के दौरान श्री गुरुवायुरप्पन की पवित्र प्रतिमा को अम्बलाप्पुज्हा मंदिर में स्थानांतरित कर दिया गया था और फिर मवेलिक्कारा श्री कृष्णास्वामी मंदिर में स्थानांतरित कर दिया गया था।

पौराणिक कथा संपादित करें

मंदिर के भगवान के सम्बन्ध में सर्वाधिक प्रसिद्ध पौराणिक कथा गुरु बृहस्पति और वायु (पवन देवता) से सम्बंधित है।

वर्तमान युग के आरम्भ में, बृहस्पति को भगवान कृष्ण की एक तैरती हुई मूर्ति मिली। उन्होंने और वायु देवता ने, इस युग में मानवों की सहायता हेतु इस मंदिर में भगवान की स्थापना की। यह पौराणिक कथा ही दोनों लघु प्रतिमाओं के नाम गुरुवायुरप्पन और इस नगर के नाम गुरुवायुर का आधार है।[2]

यह माना जाता है कि यह मूर्ति जो अब गुरुवायुर में है, वह द्वापर युग में श्री कृष्ण द्वारा प्रयोग की गयी थी।

मुख्य लेख :

अन्य आकर्षणों में मंदिर के पास एक प्रसिद्ध गज अभयारण्य (पुन्नाथुर कोट्टा) है जहां मंदिर के कार्यों हेतु विशाल हाथियों को प्रशिक्षित किया जाता है। वर्तमान में इस अभयारण्य में 60 से भी अधिक हाथी हैं, यह सभी भगवान गुरुवायुर के भक्तों द्वारा समर्पित हैं। मंदिर से जुड़े प्रमुख हाथियों में से एक अग्रणी हाथी का नाम गुरुवायुर केसवन है जो एक सुविख्यात हाथी था। इसे मंदिर के पौराणिक साहित्य में स्थान दिया गया है।

यह मंदिर केरल में हिन्दू विवाहों का प्रमुख स्थल है। मंदिर में प्रतिदिन अत्यधिक संख्या में विवाह होते हैं- कभी-कभी एक ही दिन में 100 से भी अधिक. भगवान गुरुवायुरप्पन के भक्त यह मानते हैं कि भगवान के सामने वैवाहिक जीवन शुरू करना अत्यंत शुभ है।

यदि आप गुरुयावूर मंदिर देखने आये हैं तो पास ही स्थित माम्मियूर के शिव मंदिर के दर्शन के बिना इसका भ्रमण अधूरा है। यदि आपके पास एक अतिरिक्त दिन का समय है तो और भी कई मंदिर देखने योग्य हैं। आप भगवान वडक्कनाथन के दर्शन के लिए थ्रिसुर (या त्रिचूर) जा सकते हैं। प्रसिद्ध थ्रिसुर पूरम, इसी मंदिर के पास स्वराज घेरे में आयोजित होता है। पास ही में आप परमेलकावु (भगवती) मंदिर और थुरुवाम्पादी कृष्ण मंदिर के भी दर्शन कर सकते हैं। इसके बाद कूदाल्मानिक्यम मंदिर में संगमेश्वरर के दर्शन के लिए इरिन्जलाक्कुडा जा सकते हैं (यहां से पेरुवानाम (भगवान शिव) और फिर थ्रिप्रयर (भगवान राम) जाया जा सकता है। इसके बाद वापस गुरुवायुर.

श्री कृष्ण चेतना अंतर्राष्ट्रीय संस्थान (ISKCON) ने हाल ही में यहां एक केंद्र और नगर आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए एक अतिथि भवन की शुरुआत की है। यहां कई होटल, सराय, रेस्तरां और विवाह हाल हैं और यह फलता-फूलता बाज़ार केंद्र है।

हर कुछ मिनटों पर थ्रिसुर शक्तन थामपुरण बस अड्डे, एर्नाकुलम बोर जेट्टी केएसआरटीसी (KSRTC) अड्डे और कलूर से बसें चलती हैं। उत्तरी परावुर, कोझिकोड, पलक्कड़, कोडुन्गल्लुर, कोट्टायम, पथानाम्थित्ता, पाम्बा/सबरीमाला, मवेलिक्कारा और थिरुवनंतपुरम से भी बसें चलती हैं। प्रत्येक कुछ मिनटों पर गुरुवायुर केएसआरटीसी (KSRTC) अड्डे से कोडुन्गल्लुर, पारावुर होते हुए एर्नाकुलम बोट जेट्टी के लिए बसें चलती हैं, जो दक्षिण केरल पहुंचने का सबसे आसान रास्ता है। . गुरुवायुर स्टेशन से थ्रिसुर और एर्नाकुलम के लिए यात्री ट्रेनें चलती हैं, साथ ही साथ रात को चलकर सुबह पहुंचाने वाली एक एक्सप्रेस ट्रेन भी थिरुवनंतपुरम और आगे चेन्नई तक चलती है। सबसे नजदीकी हवाई अड्डा, कोचीन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, गुरुवायुर से लगभग 80 किलोमीटर की दूरी पर है। यदि आप कोझिकोड से आ रहे हैं, तो बस या कार द्वारा गुरुवायुर पहुंचने में लगभग 3.5 घंटे लगेंगे.

गुरुवायुर के नज़दीक चवक्कड़ से होते हुए 3 किलोमीटर की दूरी पर एन एच - 17 है और जो र त्रिप्रयर, कोडुन्गल्लुर, पारावुर जंक्शन से इडापल्ली जंक्शन की ओर बढ़ता है। यह थ्रिसुर शहर और व्यस्त एनएच - 47 (NH - 47) से बचते हुए कोच्ची, केंदीय केरल और दक्षिण केरल पहुंचने का सबसे सरल रास्ता है।

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S.B. Yadav Aug 14, 2017
JAI SHRI KRI SHNA JAI SHRI MADHAV JAI SHRI MADHAVAN JI

anita sharma May 26, 2019

🔔उपमन्यु 🔔 उपमन्यु महर्षि आयोद धौम्य के शिष्यों में से एक थे। इनके गुरु धौम्य ने उपमन्यु को अपनी गाएं चराने का काम दे रखा थ। उपमन्यु दिनभर वन में गाएं चराते और सायँकाल आश्रम में लौट आया करते थे। एक दिन गुरुदेव ने पूछा- "बेटा उपमन्यु! तुम आजकल भोजन क्या करते हो?" उपमन्यु ने नम्रता से कहा- "भगवान! मैं भिक्षा माँगकर अपना काम चला लेता हूँ।" महर्षि बोले- "वत्स! ब्रह्मचारी को इस प्रकार भिक्षा का अन्न नहीं खाना चाहिए। भिक्षा माँगकर जो कुछ मिले, उसे गुरु के सामने रख देना चाहिए। उसमें से गुरु यदि कुछ दें तो उसे ग्रहण करना चाहिए।" उपमन्यु ने महर्षि की आज्ञा स्वीकार कर ली। अब वे भिक्षा माँगकर जो कुछ मिलता उसे गुरुदेव के सामने लाकर रख देते। गुरुदेव को तो शिष्य कि श्रद्धा को दृढ़ करना था, अत: वे भिक्षा का सभी अन्न रख लेते। उसमें से कुछ भी उपमन्यु को नहीं देते। थोड़े दिनों बाद जब गुरुदेव ने पूछा- "उपमन्यु! तुम आजकल क्या खाते हो?" तब उपमन्यु ने बताया कि- "मैं एक बार की भिक्षा का अन्न गुरुदेव को देकर दुबारा अपनी भिक्षा माँग लाता हूँ।" महर्षि ने कहा- "दुबारा भिक्षा माँगना तो धर्म के विरुद्ध है। इससे गृहस्थों पर अधिक भार पड़ेगा और दूसरे भिक्षा माँगने वालों को भी संकोच होगा। अब तुम दूसरी बार भिक्षा माँगने मत जाया करो।" उपमन्यु ने कहा- "जो आज्ञा।" उसने दूसरी बार भिक्षा माँगना बंद कर दिया। जब कुछ दिनों बाद महर्षि ने फिर पूछा, तब उपमन्यु ने बताया कि- "मैं गायों का दूध पी लेता हूँ।" महर्षि बोले- "यह तो ठीक नहीं।" गाएं जिसकी होती हैं, उनका दूध भी उसी का होता है। मुझसे पूछे बिना गायों का दूध तुम्हें नहीं पीना चाहिए।" उपमन्यु ने दूध पीना भी छोडं दिया। थोड़े दिन बीतने पर गुरुदेव ने पूछा- "उपमन्यु! तुम दुबारा भिक्षा भी नहीं लाते और गायों का दूध भी नहीं पीते तो खाते क्या हो? तुम्हारा शरीर तो उपवास करने वाले जैसा दुर्बल नहीं दिखाई पड़ता।" उपमन्यु ने कहा- "भगवान! मैं बछड़ों के मुख से जो फैन गिरता है, उसे पीकर अपना काम चला लेता हूँ।" महर्षि बोले- "बछ्ड़े बहुत दयालु होते हैं। वे स्वयं भूखे रहकर तुम्हारे लिए अधिक फैन गिरा देते होंगे। तुम्हारी यह वृत्ति भी उचित नहीं है।" अब उपमन्यु उपवास करने लगे। दिनभर बिना कुछ खाए गायों को चराते हुए उन्हें वन में भटकना पड़ता था। अंत में जब भूख असह्य हो गई, तब उन्होंने आक के पत्ते खा लिए। उन विषैले पत्तों का विष शरीर में फैलने से वे अंधे हो गए। उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता था। गायों की पदचाप सुनकर ही वे उनके पीछे चल रहे थे। मार्ग में एक सूखा कुआँ था, जिसमें उपमन्यु गिर पड़े। जब अंधेरा होने पर सब गाएं लौट आईं और उपमन्यु नहीं लौटे, तब महर्षि को चिंता हुई। वे सोचने लगे- "मैंने उस भोले बालक का भोजन सब प्रकार से बंद कर दिया। कष्ट पाते-पाते दु:खी होकर वह भाग तो नहीं गया।" उसे वे जंगल में ढूँढ़ने निकले और बार-बार पुकारने लगे- "बेटा उपमन्यु! तुम कहाँ हो?" उपमन्यु ने कुएँ में से उत्तर दिया- "भगवान! मैं कुएँ में गिर पड़ा हूँ।" महर्षि समीप आए और सब बातें सुनकर ऋग्वेद के मंत्रों से उन्होंने अश्विनीकुमारों की स्तुति करने की आज्ञा दी। स्वर के साथ श्रद्धापूर्वक जब उपमन्यु ने स्तुति की, तब देवताओं के वैद्य अश्विनीकुमार वहाँ कुएँ में प्रकट हो गए। उन्होंने उपमन्यु के नेत्र अच्छे करके उसे एक पदार्थ देकर खाने को कहा। किन्तु उपमन्यु ने गुरुदेव को अर्पित किए बिना वह पदार्थ खाना स्वीकार नहीं किया। अश्विनीकुमारों ने कहा- "तुम संकोच मत करो। तुम्हारे गुरु ने भी अपने गुरु को अर्पित किए बिना पहले हमारा दिया पदार्थ प्रसाद मानकर खा लिया था।" उपमन्यु ने कहा- "वे मेरे गुरु हैं, उन्होंने कुछ भी किया हो, पर मैं उनकी आज्ञा नहीं टालूँगा।" इस गुरुभक्ति से प्रसन्न होकर अश्विनीकुमारों ने उन्हें समस्त विद्याएँ बिना पढ़े आ जाने का आशीर्वाद दिया। जब उपमन्यु कुएँ से बाहर निकले, महर्षि आयोद धौम्य ने अपने प्रिय शिष्य को हृदय से लगा लिया।🙏🙏

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Anju Mishra May 25, 2019

गरूड़ पुराण की एक खास बात जय श्री राधे कृष्णा 🙏🌹 जय श्री सीताराम गरुड़ पुराण में स्वर्ग, नरक, पाप, पुण्य के अलावा भी बहुत कुछ है। उसमें ज्ञान, विज्ञान, नीति, नियम और धर्म की बाते हैं। गरुड़ पुराण में एक ओर जहां मौत का रहस्य है जो दूसरी ओर जीवन का रहस्य छिपा हुआ है। गरुड़ पुराण की हजारों बातों में से एक बात यह भी है कि यदि आप अमीर, धनवान या सौभाग्यशाली बनना चाहते हैं तो जरूरी है कि आप साफ-सुथरे, सुंदर और सुगंधित कपड़े पहनें। गरुण पुराण के अनुसार उन लोगों का सौभाग्य नष्ट हो जाता है जो गंदे वस्त्र पहनते हैं। जिस घर में ऐसे लोग होते हैं जो गंदे वस्त्र पहनते हैं उस घर में कभी भी लक्ष्मी नहीं आती है। जिसके कारण उस घर से सौभाग्य भी चला जाता है और दरिद्रता का निवास हो जाता है। देखा गया है कि जो लोग धन और सभी सुख-सुविधाओं से संपन्न हैं, लेकिन फिर भी वह लोग गंदे कपड़े पहनते हैं उनका धन धीरे धीरे नष्ट हो जाता है। इसलिए हमें साफ एवं सुगंधित कपड़े पहननें चाहिए जिससे हम पर महालक्ष्मी की कृपा बनी रहे।

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anita sharma May 25, 2019

🔔अद्भूत प्रेम🔔 एक बार गायों को चराते हुए भगवान श्री कृष्ण और बलराम जी को भूख लगीं तो उन्होंने अपने सखाओं से कहा -हे मित्र ! यहाँ पास ही में कुछ ब्राह्मण यज्ञ कर रहे हैं तुम उनसे हम सबके लिए कुछ भोजन माँग लाओ । ग्वाल-बाल गए और बड़े विनम्र भाव से प्रार्थना कर भोजन सामग्री माँगी परंतु ब्राह्मण लोग स्वर्ग-आदि लोक के सुख की कामनाओं की पूर्ति के लिए उस यज्ञ में इतने खो चुके थे कि उन्होंने इस बात की तरफ़ ग़ौर ही नहीं किया कि *यह अन्न स्वयं भगवान श्री कृष्ण माँग रहे हैं । ग्वाल बाल ख़ाली हाथ जब लौटकर आए तो प्रभु ने कहा अब तुम उनकी पत्नियों से जाकर माँगना । ग्वाल बाल गए और जैसे ही ब्राह्मणों की पत्नियों ने सुना कि श्री कृष्ण पास ही हैं और उन्हें भूख भी लगी है । तो इतने समय से जिन नंदलाल की लीला-कथा वे सुनतीं आयीं ,”आज उनका दर्शन होगा “, ऐसा सोचकर वे लोक लाज का त्याग कर अपने भाई-बंधुओं और पति ( ब्राह्मणों) की आज्ञा को छोडकर प्रभु के पास आयीं और उन्हें मीठे दही- भात का भोग लगाया । ब्राह्मणों ने उन्हें यहाँ तक कह दिया था कि अगर आज तुम चलीं गयीं तो हम से नाता तोड़कर ही जाना , वे फ़र भी आ गयीं । ब्राह्मण की पत्नियों ने केवल भगवान की लीला-कथा को सुना था , अभी तक दर्शन नहीं किया था और उसी साधन के ही प्रभाव से देखिए आज प्रभु स्वयं उनसे भोजन माँगकर अपने दर्शन का आनंद देना चाह रहे हैं । धन्य हैं वो लोग जिनका जीवन ही प्रभु की कथा है । हमें भी प्रभु की कथा ही प्राप्त है , बस उसी को नित्य साधन समझ हमें उनके दर्शन को पाने में रत रहना है । भगवान श्री कृष्ण के सम्मुख आज ब्राह्मण-पत्नियाँ हाथ में दही-भात और चारों प्रकार के व्यंजन लिए खड़ी हैं । ग्वाल-वालों के साथ जैसे ही उन्हें पेड़ की छांव में उस कृष्ण बलराम की युगल छवि का दर्शन हुआ तो एक क्षण को तो मानो समय ही रुक गया । उनके मुख से अनायास ही निकल पड़ा , ” प्रभु ! कितने सुंदर हैं ।” प्रभु अपनी पूर्ण छटा के साथ उन्हें दर्शन दे रहे हैं । मानो आज उन स्त्रियों की जन्म-जन्म की साधना सफल हो गयी । भगवान ने उनका स्वागत कर उनका धन्यवाद किया और कहा , ” धन्य हैं आप ! जो हमारी अन्न की याचना स्वीकार की ( सबका पेट भरने वाले ये बात बोल रहे हैं , देखिए उनकी लीला) और आपको मेरे दर्शन की लालसा थीं , अब आप दर्शन कर चुकी हैं , इसलिए घर लौट जाइए । आपके पति ब्राह्मण देव आपके बिना यज्ञ पूरा नहीं कर सकते । ” यज्ञ-पत्नियों ने कहा प्रभु हम उनसे लड़कर, सब बंधनों का त्याग करके आपके पास आयीं हैं । और एक बार जो आपका हो जाता है , जिसे आप एक बार स्वीकार कर लेते हैं उसे संसार में दोबारा नहीं जाना पड़ता न प्रभु , तो आप हमें ऐसी आज्ञा मत दीजिए । प्रभु बोले , ” जो मेरा हो जाता है , मैं जिसे स्वीकार कर लेता हूँ , उसे संसार के लोग चाह कर भी नहीं त्याग सकते , आप अपने-अपने घर लौट जाइए , आपके साथ कोई दुर्व्यवहार और आपका किसी भी प्रकार से त्याग नहीं होगा । ” भगवान श्री कृष्ण ने पहले सभी ग्वाल बालों को वो प्रेम से लाया गया भोजन खिलाया और फिर स्वयं खाया । हमें प्रभु से यह भी सीखना है कि सामूहिक भोजन करने का तरीक़ा यही है । इधर यज्ञ-पत्नियाँ जब घर पहुँची तो ब्राह्मणों ने उन्हें कुछ नहीं कहा , बल्कि सत्कार करके उन्हें यज्ञ में बैठने को कहा , यज्ञ-पत्नियों ने सारा वृतांत सुनाया और बताया की नंद के लाला साक्षात भगवान हैं । जब उन्हें इस बात का बोध हुआ कि हाँ ! ग्वाल-बाल आए थे और हमसे अन्न की याचना भी की थी और हम कर्म-कांड लेकर बैठे रहे तो ब्राह्मणों को अत्यंत क्षोभ हुआ । वे अपने आप को कोसने लगे – हाय रे विधाता ! ये हम से कैसा गुनाह हो गया । प्रभु ने सामने से अपना हाथ बढ़ा कर हमें दर्शन देना चाहा और हम ही मुँह फेर कर बैठे रहे । वे उनके चरणों में गिर पड़े और चरण धूल लगाने लगे । धन्य हैं आप ! बोल-बोलकर उनका सत्कार किया और पछताने लगे । ये प्रसंग हमें समझाता है कि किस प्रकार घर रहकर भी प्रभु को साक्षात पाया जा सकता हैं । यज्ञ-पत्नियों को प्रभु ने घर छोड़ने के लिए आदेश नहीं दिया है आप दर्शन कर सकते हैं लीला में , बल्कि घर में रहकर भजन करने की आज्ञा दी है । और यह जो ब्राह्मण पछता रहें हैं ना , यह हम जीव हैं जो प्रभु के दर्शन की दस्तख को पहचान नहीं पा रहे हैं । उनसे मुँह फेर कर बैठे हैं । उनकी प्राप्ति हर जगह हर अवस्था में सम्भव है , चाहिए तो केवल उनके लिए प्रेम-समर्पण और बरसती हुई अनवरत कृपा का अनुभव ।

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S. K. Jethwa May 26, 2019

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anita sharma May 25, 2019

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reena tuteja May 25, 2019

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anita sharma May 24, 2019

एक बार श्रीचैतन्य महाप्रभु रास्ते में से जा रहे थे ...... उनके पीछे भक्त वृन्द भी थे. महाप्रभु हरे कृष्णा का कीर्तन करते हुए जा रहे थे.. हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे। हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे॥ कीर्तन करते करते महाप्रभु थोडा सा आगे निकल गए, उन्हें बड़ी जोर की प्यास लगी, परन्तु कही पानी नहीं मिला l एक व्यापारी सिर पर मिट्टी का घड़ा रखे सामने से चला आ रहा था l महाप्रभु ने उसे देखते ही कहा 'भईया बड़ी प्यास लगी है थोडा सा जल मिल जायेगा'? व्यापारी ने कहा - 'मेरे पास जल तो नहीं है, हाँ इस घडे में छाछ जरुर है' इतना कहकर उसने छाछ का घड़ा नीचे उतारा.. महाप्रभु बहुत प्यासे थे इसलिए सारी की सारी छाछ पी गए और बोले 'भईया बहुत अच्छी छाछ थी, प्यास बुझ गई'. व्यापारी बोला - 'अब छाछ के पैसे लाओ'! महाप्रभु - 'भईया पैसे तो मेरे पास नहीं है'? व्यापारी महाप्रभु के रूप और सौंदर्य को देखकर इतना प्रभावित हुआ कि उसने सोचा इन्होने नहीं दिया तो कोई बात नहीं इनके पीछे जो इनके साथ वाले आ रहे है इनसे ही मांग लेता हूँ. महाप्रभु ने उसे खाली घड़ा दे दिया उसे सिर पर रखकर वह आगे बढ़ गया. पीछे आ रहे नित्यानंद जी और भी भक्तों से उसने पैसे मांगे तो वे कहने लगे 'हमारे मालिक तो आगे चल रहे है जब उनके पास ही नहीं है तो फिर हम तो उनके सेवक है हमारे पास कहाँ से आयेगे'? उन सब को देखकर वह बड़ा प्रभावित हुआ और उसने कुछ नहीं कहा l जब घर आया और सिर से घड़ा उतारकर देखा तो क्या देखता है कि घड़ा हीरे मोतियों से भरा हुआ है. एक पल के लिए तो बड़ा प्रसन्न हुआ पर अगले ही पल दुखी हो गया, मन में तुरंत विचार आया उन प्रभु ने इस मिट्टी के घड़े को छुआ तो ये हीरे मोती से भर गया, जब वे मिट्टी को ऐसा बना सकते है तो मुझे छू लेने से मेरा क्या ना हो गया होता? अर्थात प्रभु की भक्ति मेरे अन्दर आ जाती.... झट दौडता हुआ उसी रास्ते पर गया जहाँ प्रभु को छाछ पिलाई थी. अभी प्रभु ज्यादा दूर नहीं गए थे. तुरंत उनके चरणों में गिर पड़ा 'प्रभु मुझे प्रेम का दान दीजिये. प्रभु ने उठाकर उसे गले से लगा लिया और उसका जीवन बदल गया. हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे.. हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे🙏

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reena tuteja May 24, 2019

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Ravi pandey May 24, 2019

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