Anilkumar Tailor
Anilkumar Tailor Mar 8, 2021

🙏गीता सार 🙏

🙏गीता सार 🙏

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कामेंट्स

prem trivedi Mar 8, 2021
जय श्री राम जय श्री हनुमान

🌹 champalal🌹🌹M🌹 Kadela🌹 Mar 8, 2021
Om Namho bhagvate vashudevay Namah Jii Bhagwan Vishnu JI Maa Lakshmi or Hanuman Jii Aapki Sabhi Manokamna puri Kareni Ji Aap sabhi ko Vijaya Ekadashi ki Hardik Shubhkamnaye Ji

Ganesh.kumar Mar 9, 2021
राम राम जी राधे राधे

Ganesh.kumar Mar 9, 2021
राम राम जी राधे राधे

Gopal Jalan Apr 19, 2021

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Neha Sharma, Haryana Apr 18, 2021

✳️✳️*श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली*✳️✳️ ✳️✳️*पोस्ट - 159*✳️✳️ ✳️✳️*जगदानन्द जी के साथ प्रेम-कलह*✳️✳️ *अनिर्दयोपभोगस्य रूपस्य मृदुनः कथम्। *कठिनं खलु ते चेतः शिरीषसयेव बन्धनम्॥ *प्रेम कलह में कितना मिठास है, इसका अनुभव प्रेमी हृदय ही कर सकता है। यदि प्रेम में कलह पृथक की दी जाय जो उसका स्वाद उसी प्रकार का होगा जिस प्रकार चीनी निकालकर भाँति-भाँति के मेवा डालकर बनाये हुए हलुवे का। चीनी के बिना जिस प्रकार खूब घी डालकर बनाया हुआ हलवा स्वादिष्ट और चित्त को प्रसन्नता प्रदान करने वाला नहीं होता उसी प्रकार जब तक बीच बीच में मधुर मधुर कलह का सम्पुट न लगता रहे, तब तक उसमें निरन्तर रस नहीं आता। प्रणय-कलह प्रेम को नित्य नूतन बनाती रहती है। कलह प्रेमरूपी कभी न फटने वाली चद्दर की सज्जी है, वह उसे समय समय पर धोकर खूब साफ बनाती रहती है। किन्तु यह कलह मधुर भाव के उपासकों में ही भूषण समझी जाती है; अन्य भावों में तो इसे दूषण कहा है। *पण्डित जगदानन्द जी को पाठक भूले न होंगे, वे नवद्वीप में श्री निवास पण्डित के यहाँ प्रभु के साथ सदाकीर्तन में सम्मिलित होते थे। संन्यास ग्रहण करके जब प्रभु पुरी में पधारे तो ये भी प्रभु दण्ड लिये एक साधारण सेवक की भाँति उनके पीछे पीछे चले और रास्ते भर ये स्वर्य भिक्षा माँगकर प्रभु तथा अन्य सभी साथियों को भोजन बनाकर खिलाते थे। प्रभु के पहले वृन्दावन ताने पर ये भी साथ चले थे और फिर रामकेलि से ही उनके साथ लौट भी आये थे। प्रभु के नीलाचल में स्थायी रहने पर ये भी वहाँ स्थायी रूप से रहने लगे। बीच बीच में प्रभु की आज्ञा से शची माता के लिये भगवान का प्रसादी वस्त्र और महाप्रसाद लेकर ये नवद्वीप आया जाया भी करते थे। प्रभु के प्रति इनका अत्यन्त ही मधुर भाव था। भक्त इनके अत्यन्त ही कोमल मधुर भाव को देखकर इन्हें सत्यभामा का अवतार बताया करते थे और सचमुच इनकी उपासना थी भी इसी भाव की। ये प्रभु के संन्यास की कुछ भी परवा नहीं करते थे। ये चाहते थे, प्रभु खूब अच्छे अच्छे पदार्थ खायें, सुन्दर सुन्दर वस्त्र पहनें और अच्छे अच्छे स्वच्छ और सुन्दर आसनों पर शयन करें। प्रभु यतिधर्म के विरुद्ध इन वस्तुओं का सेवन करना चाहते नहीं थे। बस, इसी बात पर कलह होती ! कलह का प्रधान कारण यही था कि जगदानन्द प्रभु के शरीर की तनिक सी भी पीड़ा को सहन नहीं कर सकते थे और प्रभु शरीर-पीड़ा की कभी परवा ही नहीं करते थे। जगदानन्द जी अपने प्रेम के उद्रेक में प्रभु से कड़ी बातें भी कह देते और प्रभु भी इनसे सदा डरते-से रहते। *एक बार ये महाप्रसाद और वस्त्र लेकर नवद्वीप में शचीमाता के समीप गये। माता इन्हें देखकर अपने निमाई के दर्शनों का अनुभव करती थी और सभी गौरभक्त भी इनके दर्शनों से श्रीचैतन्य चरणों के दर्शनों का सा आनन्द प्राप्त करते। ये जाते तो सभी भक्तों से मिलकर ही आते। नवद्वीप से आचार्य के घर शान्तिपुर होते हुए ये शिवानन्द जी सेन के घर भी गये। वहाँ से ये एक कलश सुगन्धित चन्दनादि तैल प्रभु के निमित्त लेते आये। प्रभु सदा भाव में विभोर से रहते। उनके अंग प्रत्यंगों की नसें ढीली हो जातीं और सम्पूर्ण शरीर में पीड़ा होने लगती। इन्होंने सोचा के इस तैल से प्रभु की वात-पित्तजन्य सभी व्याधियाँ शान्त हो जाया करेंगी। *प्रेम के आवेश में पण्डित होकर भी ये इस बात को भूल गये कि संन्यासी के लिये तैल लगाना शास्त्रों में निषेध है। प्रेम में युक्तायुक्त विचारणा रहती ही नहीं। प्रेमी के लिये कोई लौकिक नियम नहीं, उसकी मथुरा तो तीन लोक से न्यारी हैं। जगदानन्द जी ने तैल लाकर गोविन्द को दे दिया और उससे कह दिया कि इसे प्रभु के अंगों में मल दिया करना। *गोविन्द ने प्रभु से निवेदन किया- ‘प्रभो ! जगदानन्द पण्डित गौड़देश से यह चन्दनादि तैल लाये हैं और शरीर में मलने के लिये कह गये हैं। अब जैसी आज्ञा हो वैसा ही मैं करूँ।’ प्रभु ने कहा- ‘एक तो जगदानन्द पागल है, उसके साथ तू भी पागल हो गया। भला, संन्यासी होकर कहीं तैल लगाया जाता है, फिर तिस पर भी सुगन्धित तैल, जो रास्ते में जाते हुए देखेंगे, वे ही कहेंगे- यह शौकीन संन्यासी कैसा श्रृंगार करता है। सभी विषयी कहकर मेरी निन्दा करेंगे। मुझे ऐसा तैल लगाना ठीक नहीं है।’ गोविन्द इस उत्तर को सुनकर चुप हो गया। *दो चार दिन के पश्चात् जगदानन्द जी ने गोविन्द से पूछा- ‘गोविन्द ! तुमने वह तैल प्रभु के शरीर में लगाया नहीं?, *गोविन्द ने कहा- ‘वे लगाने भी दें तब तो लगाऊँ ? वे तो मुझे डाँटते थे।’ जगदानन्द जी ने धीरे से कहा-‘अरे ! तैने भी उनके डाँटने का खूब खयाल किया ! वे तो ऐसे ही कहते ही रहेंगे, तू लगा देना। मेरा नाम ले देना।’ *गोविन्द ने कहा- ‘पण्डित जी ! ऐसे लगाने का तो मेरा साहस नहीं है। हाँ, आप कहते हैं तो एक बार फिर निवेदन करूँगा।’ *दो चार दिन के पश्चात् एकान्त में अत्यन्त ही दीनता के साथ गोविन्द ने कहा- ‘प्रभो ! वे बेचारे कितना परिश्रम करके इतनी दूर से तैल लाये हैं, थोड़ा सा लगा लीजिये। उनका भी मन रह जायगा और फिर यह ता औषधि है, रोग के लिये औषधि लगाने में क्या दोष ?’ *प्रभु ने प्रेम के रोष में कहा- ‘तुम सब तो मिलकर मुझे अपने धर्म से च्युत करना चाहते हो। आज सुगन्धित तैल लगाने को कह रहे हो, कल कहोगे कि एक मालिश करने वाला रख लो। जगदानन्द की तो बुद्धि बिगड़ गई है, पण्डित होकर उन्हें इतना भी ज्ञान नहीं कि संन्यासी के लिये सुगन्धित तैल छूना भी महापाप है। वे यदि परिश्रम करके लाये हैं तो इसे जगन्नाथ जी के मन्दिर में दे आओ। वहाँ दीपक में जल जायेगा।’ *गोविन्द प्रभु की मीठी फटकार सुनकर एकदम चुप हो गया, फिर उसने एक भी शब्द तैल के सम्बन्ध में नहीं कहा। गोविन्द ने सभी बातें जाकर जगदानन्द जी से कह दीं। *दूसरे दिन जगदानन्द जी मुँह फुलाये हुए कुछ रोष में भरे हुए प्रभु के समीप आये। प्रभु उनके हाव-भाव को ही देखकर समझ गये कि ये जरूर कुछ खरी खोटी सुनाने आये हैं, इसलिये उन्होंने पहले से पहले ही प्रसंग छेड़ दिया। *वे अत्यन्त ही स्नेह प्रकट करते हुए धीरे धीरे मधुर वचनों में जगदानन्द जी से कहने लगे- ‘जगदानन्द जी ! आप गौड़देश से बड़ा सुन्दर तैल लाये हैं। मेरी तो इच्छा होती है, थोड़ा सा इसमें से लगाऊँ, किन्तु क्या करूँ, संन्यास धर्म से विवश हूँ। आप स्वयं पण्डित हैं, यह बात आपसे छिपी थोड़े ही है कि संन्यासी के लिये सुगन्धित तैल लगाना महापाप है। इसीलिये मैं लगा नहीं सकता। आप एक काम करें, इस तैल को जगन्नाथ जी भेंट कर आइये, वहाँ इसके दीपक जल जायँगे, आपका सभी परिश्रम सफल हो जायगा।’ *जगदानन्द जी ने कुछ रोष के स्वर में कहा- ‘आपसे यह बिना सिर पैर की बात कह किसने दी। मैं कब तैल लाया हूँ ?’ *प्रभु ने हँसते हँसते कहा- ‘आप सच्चे, मैं झूठा। इस तैल के कलश को मेरे यहाँ कोई देवदूत रख गया।’ *यह सुनकर जगदानन्द जी रोष में उठे और उस तैल के कलश को उठाकर जोर से आँगन में दे मारा। कलश आँगन में गिरते ही चकनाचूर हो गया। सम्पूर्ण तैल आँगन में बहने लगा। कलश को फोड़कर जगदानन्द जी जल्दी से अपने घर को चले गये और भीतर से किवाड़ बंद करके पड़ रहे। दो दिन तक न तो अन्न जल ग्रहण किया और न बाहर निकले। प्रणयकोप में भीतर ही पड़े रहे। *तीसरे दिन प्रभु स्वयं उनके घर पहुँचे और किवाड़ खटखटाकर बोले- ‘पण्डित ! पण्डित ! भीतर क्या कर रहे हैं, बाहर तो आइये, आपसे एक बात कहनी है।’ किन्तु पण्डित किसकी सुनते हैं, वे तो खटपाटी लिये पड़े हैं। *तब प्रभु ने उसी स्वर में बाहर खड़े ही खड़े कहा- ‘देखिये, मैं आपके द्वार पर भिक्षा के लिये खड़ा हूँ और आप किवाड़ भी नहीं खोलते। अतिथि जिसके आरम से निराश लौट जाता है, वह उस मनुष्य के सभी पुण्यों को लेकर चला जाता है। देखिये, आज मेंरी आपके यहाँ भिक्षा है, जल्दी से तैयार कीजिये, मैं समुद्र स्नान और भगवान के दर्शन करके अभी आता हूँ।’ *प्रभु इतना कहकर चले गये। अब जगदानन्द जी का क्रोध कितनी देर रह सकता था। प्रभु के लिये भिक्षा बनानी है, बस, इस विचार के आते ही, न जाने उनका क्रोध कहाँ चला गया। वे जल्दी से उठे। उठकर शौचादि से निवृत्त होकर स्नान किया और रघुनाथ, रमाई पण्डित तथा और भी अपने साथी दो चार गौड़ीय विरक्त भक्तों को बुलाकर वे प्रभु की भिक्षा का प्रबन्ध करने लगे। भोजन बनाने में तो वे परम प्रवीण थे ही, भाँति-भाँति के बहुत-से-सुन्दर सुन्दर पदार्थ उन्होंने प्रभु के लिये बना डाले। अभी वे पूरे पदार्थ को बना भी नहीं पाये थे कि इतने में ही मुसकराते हुए प्रभु स्वयं आ उपस्थित हुए। मन में अत्यन्त ही प्रसन्न होते हुए और ऊपर से हास्य से युक्त किंचित रोषयुक्त मुख से उन्होंने एक बार प्रभु की ओर देखा और फिर शाक को उलटने पल्टने लगे। *प्रभु जल्दी से एक आसन स्वयं ही लेकर बैठ गये। अब तो जगदानन्द जी उठे। उन्होंने नीची दृष्टि किये हुए वहीं बैठे-ही-बैठे एक थाल में प्रभु के पादपद्मों को पखारा। प्रभु ने इसमें तनिक भी आपत्ति नहीं की। फिर उन्होंने भाँति-भाँति के पदार्थों को सजाकर प्रभु के सामने परोसा। प्रभु चुपचाप बैठे रहे। जगदानन्द जी का अब मौन भंग हुआ। उन्होंने अपनी हँसी को भीतरी ही भीतर रोकते हुए लज्जायुक्त मधुर वाणी से अपनापन प्रकट करते हुए कहा- ‘प्रसाद पाते क्यों नहीं’ *जगदानन्द जी ने उसी भाव से हँसकर कहा- ‘तब आये क्यों थे, कोई बुलाने भी तो नहीं गया था।’ *प्रभु ने कहा- ‘अपनी इच्छा से आया था, अपनी इच्छा से ही नहीं पाता।’ *जगदानन्द जी ने हँसकर कहा- ‘पाइये पाइये, देखिये भात ठण्डा हुआ जाता है।’ *प्रभु ने कहा- ‘चाहे ठण्डा हो या गरम जब तक आप मेेरे साथ बैठकर न पावेंगे तब तक मैं भी न पाऊँगा। अपने लिये भी एक पत्तल और परोसिये’। *जगदानन्द जी ने मानमिश्रित हास्य के स्वर में कहा- ‘पाइये भी मेरी क्या बात है, मैं तो पीछे ही पाता हूँ, सो आपके पा लेने पर पाऊँगा।’ *प्रभु ने कहा- ‘चाहे सदा पीछे ही क्यों न पाते हैं, आज तो मेरे साथ ही पाना पड़ेगा।’ "जगदानन्द जी ने कुछ गम्भीरता के स्वर में कहा- ‘प्रभो ! मैंने और रमाई, रघुनाथ आदि सभी ने तो बनाया है। इन्हें प्रसाद देकर तब मैं पा सकता हूँ। अब आपकी आज्ञा को टाल थोड़े ही सकता हूँ। अवश्य पा लूँगा।’ *यह सुनकर प्रभु प्रसाद पाने लगे। जो पदार्थ चुक जाता उसे ही जगदानन्द जी उतना ही परोस देते। इस भय से कि जगदानन्द जी नाराज हो जायँगे, प्रभु मना भी नहीं करते और उनकी प्रसन्नता के निमित्त खाते ही जाते। और दिनों की अपेक्षा कई गुना अधिक खा गये, तो भी जगदानन्द मानते नहीं हैं, तब प्रभु ने दीनता के स्वर में कहा- ‘बाबा, अब दया भी करोगे या नहीं। अन्य दिनों की अपेक्षा दस गुना खा गया, अब कब तक और खिलाते जाओगे?’ *इतना कहकर प्रभु ने भोजन समान्त किया। जगदानन्द जी ने मुखशुद्धि के लिये लौंग, इलायची और हीरत की के टुकड़े दिये। *प्रभु उन्हें खाते हुए फिर वहीं बैठ गये और कहने लगे- ‘जब तक आप मेरे सामने प्रसाद न पा लेंगे तब तक मैं यहाँ से न हटूँगा।’ *जगदानन्द जी ने हँसकर कहा- ‘अब आप इतनी चिन्ता क्यों करते हैं, अब तो सबके साथ मुझे प्रसाद पाना ही है, आप चलकर आराम करें।’ *यह सुनकर प्रभु गोविन्द से कहने लगे- ‘गोविन्द ! तू यहीं रह और जब तक ये प्रसाद न पा लें तब तक मेरे पास मत आना।’ यह कहकर प्रभु अकेले ही कमण्डलु उठाकर अपने निवास स्थान पर चले गये। *प्रभु के चले जाने पर जगदानन्द जी ने गोविन्द से कहा- ‘तुम जल्दी जाकर प्रभु के पैरों को दबाओ। मैं तुम्हारे लिसे प्रसाद रख छोड़ूंगा। सम्भव है प्रभु सो जायँ।’ यह सुनकर गोविन्द चला गया और लेटे हुए प्रभु के पैर दबाने लगा। *प्रभु ने पूछा- ‘जगदानन्द ने प्रसाद पाया?’, *गोविन्द ने कहा- ‘प्रभो ! वे पा लेंगे, उन्हें अभी थोड़ा कृत्य शेष है।’ यह कहकर वह धीरे धीरे प्रभु के तलुओं को दबाने लगे। *प्रभु कुछ झपकी-सी लेने लगे। थोड़ी देर बाद जल्दी से आँख मलते-मलते कहने लगे- ‘गोविन्द ! जा देख तो सही, जगदानन्द ने प्रसाद पाया या नहीं। यदि पा लिया हो या पा रहे हों तो मुझे आकर फौरन सूचना देना।’ *प्रभु की आज्ञा से गाविन्द फिर गया। उसने आकर देखा सब भक्तों को प्रभु का उच्छिष्ट महाप्रसाद देकर उसी पत्तल पर जगदानन्द जी खाने को बैठे हैं। *गोविन्द को देखते ही वे कहने लगे- ‘गोविन्द ! तुम्हारे लिये मैंने अलग से परोसकर रख दिया है, आओ, तुम भी बैठ जाओ।’ *गोविन्द ने कहा- ‘मैं पहले प्रभु को सूचना दे आऊँ, तब प्रसाद पाऊँगा।’ *यह कहकर वह प्रभु को सुचना देने चला गया। जगदानन्द जी प्रसाद पा रहे हैं, यह सुनकर प्रभु को सन्तोष हुआ और उन्होंने गोविन्द को भी प्रसाद पाने के लिये भेज दिया। गोविन्द ने आकर सभी भक्तों के साथ बैठकर प्रसाद पाया और फिर सभी भक्त अपने अपने स्थानों को चले गये। इसी प्रकार की प्रेम कलह महाप्रभु और जगदानन्द जी के बीच में प्रायः होती रहती थी। इसमें दोनों ही आनन्द का अनुभव करते थे। *श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::----------

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Neha Sharma, Haryana Apr 17, 2021

. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 157 महात्मा हरिदास जी का गोलोकगमन विनिश्चितं वदामि ते न चान्यथा वचंसि में। हरिं नरा भजन्ति ये अतिदुस्तरं तरन्ति ते॥ जिनकी भाग्यवती जिह्वा पर श्री हरि के मधुर नाम सदा विराजमान रहते हैं, नाम संकीर्तन के द्वारा जिनके रोम रोम में राम रम गया है, जिन्होंने कृष्ण-कीर्तन के द्वारा इस कलुषित कलेवर को चिन्मय बना लिया है, वे नाम प्रेमी संत समय समय पर संसार को शिक्षा देने के निमित्त इस अवति पर अवतरित होकर लोगों के सम्मुख नाम माहात्म्य पगकट करते हैं। वे नित्य सिद्ध और अनुग्रह सृष्टि के जीव होते हैं। न उनका जन्म है और न उनकी मृत्यु। उनकी कोई जाति नहीं, कुटुम्ब परिवार नहीं। वे वर्णाश्रम परे मत-मतान्तरों से रहित और यावतब भौतिक पदार्थों से संसर्ग रखने वाले सम्बन्ध हैं उन सभी से पृथक ही रहते हैं। अपने अलौकिक आचरण के द्वारा संसार को साधन पथ की ओर अग्रसर करने के निमित्त ही उनका अवतरण होता है। वे ऊपर से इसी कार्य के निमित्त उतरते हैं और कार्य समाप्त होने पर ऊपर चले जाते हैं। हम संसारी लोगों की दृष्टि में उनके जन्म मरण आदि सभी कार्य होते से दीखते हैं। वे जन्मते भी हैं, बढ़ते भी हैं, रहते भी हैं, खाते-पीते तथा उठते-बैठते से भी दीखते हैं, वृद्ध भी होते हैं और इस पांच भौतिक शरीर को त्यागकर मृत्यु को भी प्राप्त करते हैं। हम करें भी तो क्या करें, हमारी बुद्धि ही ऐसी बनी है। वह इन धर्मों से रहित व्यक्ति का अनुमान ही नहीं कर सकती। गोल छिद्र में तो गोल ही वस्तु आवेगी, यदि तुम उसमें उसी नाप की चौकोनी वस्तु डालोगे तो तुम्हारा परिश्रम व्यर्थ होगा। छिद्र की बनावट देखकर ही उसमें वस्तु डालनी चाहिये। इसीलिये कभी न मरने वाले अमर महात्माओं के भी शरीर त्याग का वर्णन किया जाता है। वास्तव में तो श्री हरिदास जी जैसे तब थे वैसे ही अब भी हैं, नमामृत ने उन्हें सदा के लिये जरा, व्याधि तथा मरण से रहित बनाकर अमर कर दिया। जो अमर हो गया उसकी मृत्यु कैसी ? उसके लिये शोक कैसा, उसकी मृत्यु भी एक प्रकार की लीला है और श्री चैतन्य उस लीला के सुचतुर सूत्रधार हैं। वे दृःख से रहित होकर भी दृःख करते से दीखते हैं, ममता मोह से पृथक होने पर भी वे उसमें सने से मालूम पड़ते हैं। शोक, उद्वेग और सन्ताप से अलग होने पर भी वे शोकयुक्त, उद्वेगयुक्त और संतापयुक्त से दृष्टिगोचर होते हैं। उनकी माया वे ही जानें। हम तो दर्शक हैं, जैसा देख रहे हैं, वैसा ही बतावेंगे, जैसा सुनेंगे, वैसा ही कहेंगे। लीला है, बनावट है, छद्म है, नाटक है या सत्य है, इसे वे ही जानें। दोपहर हो चुका था, प्रभु का सेवक गोविन्द नित्य की भाँति महाप्रसाद लेकर हरिदास के पास पहुँचा। रोज वह हरिदास जी को आसन पर बैठे हुए नाम-जप करते पाता था। उसदिन उसने देखा हरिदास जी सामने के तख्त पर आँख बंद किये हुए लेट रहे हैं। उनके श्रीमुख से आप ही आप निकल रहा था- हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥ गोविन्द ने धीर से कहा- हरिदास ! उठो, आज कैसे सुस्ती में पड़े हो।’ कुछ सम्भ्रम के साथ चौंककर आँखें खोलते हुए भर्राई आवाज में हरिदास जी ने पूछा- ‘कौन?’ गोविन्द ने कहा- ‘कोई नहीं, मैं हूँ गोविन्द। क्यों क्या हाल है? पड़े कैसे हो? प्रसाद लाया हूँ, ला प्रसाद पा लो।’ कुछ क्षीण स्वर में हरिदास जी ने कहा- ‘प्रसाद लाये हो? प्रसाद कैसे पाऊँ?’ गोविन्द ने कुछ ममता के स्वर में कहा- ‘क्यों, क्यों, बात क्या है, बताओं तो सही। तबीयत तो अच्छी है न?’ हरिदास जी ने फिर उसी प्रकार विषण्णतायुक्त वाणी में कहा- ‘हाँ, तबीयत अच्छी है, किन्तु आज नाम जप की संख्या पूरी नहीं हुई। बिना संख्या पूरी किये प्रसाद कैसे पाऊँ? तुम ले आये हो तो अब प्रसाद का अपमान करते भी नहीं बनता।’ यह कहकर उन्होंने प्रसाद को प्रणाम किया और उसमें से एक कण लेकर मुख में डाल लियो। गोविन्द चला गया, उसने सब हाल महाप्रभु से जाकर कहा। दूसरे दिन सदा की भाँति समुद्रस्नान करके प्रभु हरिदास जी के आश्रम में गये। उस समय भी हरिदास जी जमीन पर पड़े झपकी ले रहे थे। पास में ही मिट्टी के करवे में जल भरा रखा था। आज आश्रम सदा की भाँति झाड़ा-बुहारा नहीं गया था। इधर-उधर कूड़ा पड़ा था, मक्खियाँ भिनक रही थीं प्रभु ने आवाज देकर पूछा- 'हरिदास जी ! तबीयत कैसी है? शरीर तो स्वस्थ है न? हरिदास जी ने चौंककर प्रभु को प्रणाम किया और क्षीण स्वर में कहा-‘शरीर तो स्वस्थ है। मन स्वस्थ नहीं है।’ प्रभु ने पूछा- ‘क्यों मन को क्या क्लेश है, किस बात की चिंता है?’ उसी प्रकार दीनता के स्वर में हरिदास जी ने कहा- ‘यही चिन्ता है प्रभो ! कि नाम की संख्या अब पूरी नहीं होती।’ प्रभु ने ममता के स्वर में कुछ बात पर जोर देते हुए कहा- ‘देखो, अब तुम इतने वृद्ध हो गये हो। बहुत हठ ठीक नहीं होती। नाम की संख्या कुछ कम कर दो। तुम्हारे लिये क्या संख्या और क्या जप? तुम तो नित्यसिद्ध पुरुष हो, तुम्हारे सभी कार्य केवल लोकशिक्षा के निमित्त होते हैं।’ हरिदास जी ने कहा- ‘प्रभो ! अब उतना जप होता ही नहीं, स्वतः ही कम हो गया है। हाँ, मुझे आपके श्री चरणों में एक निवेदन करना था।’ प्रभु पास में ही एक आसन खींचकर बैठ गये और प्यार से कहने लगे- ‘कहो, क्या कहना चाहते हो? अत्यन्त ही दीनता के साथ हरिदास जी ने कहा- आपके लक्षणों से मुझे प्रतीत हो गया है कि आप शीघ्र ही लीलासंवरण करना चाहते हैं। प्रभो ! मेरी श्री चरणों में यही अन्तिम प्रार्थना है कि यह दुःख प्रद दृश्य मुझे अपनी आँखों से देखना न पड़े। प्रभो ! मेरा हृदय फट जायगा। मैं इस प्रकार हृदय फटकर मृत्यु नहीं चाहता। मेरी तो मनोकामना यही है कि नेत्रों के सामने आपकी मनमोहिनी मूरत हो, हृदय में आपके सुन्दर सुवर्णवर्ण की सलोनी सूरत हो, जिह्वा पर मधुरातिमधुर श्रीकृष्ण-चैतन्य यह त्रैलोक्यपावन नाम हो और आपके चारु चरित्रों का चिन्तन करते-करते मैं इस नश्वर शरीर को त्याग करूँ। यही मेरी साध है, यह मोर उत्कट अभिलाषा है। आप स्वतन्त्र ईश्वर हैं, सब कुछ करने में समर्थ हैं। इस भिक्षा को तो आप मुझे अवश्य ही दे दें।’ प्रभु ने डबडबायी आँखों से कहा- ‘ठाकुर हरिदास ! मालूम पड़ता है, अब तुम लीलासंवरण करना चाहते हो। देखो, यह बात ठीक नहीं। पुरी मेें मेरा और कौन है, तुम्हारी ही संगति से तो यहाँ पड़ा हुआ हूँ। हम तुम साथ ही रहे, साथ ही संकीर्तन किया, अब तुम मुझे अकेला छोड़कर जाओगे, यह ठीक नहीं है।’ धीरे-धीरे खिसककर प्रभु के पैरों में मस्तक रगड़ते हुए हरिदास कहने लगे- ‘प्रभो ! ऐसी बात फिर कभी अपने श्री मुख से न निकालें। मेरा जन्म म्लेच्छकुल में हुआ। जन्म का अनाथ, अनपढ़ और अनाश्रित, संसार से तिरस्कृत और श्री हीन कर्मों के कारण अत्यन्त ही अधम, तिसपर भी आपने मुझे अपनाया; नरक से लेकर स्वर्ग में बिठाया। बड़े-बड़े श्रोत्रिय, ब्राह्मणों से सम्मान कराया, त्रैलोक्यपावन पुरुषोत्त क्षेत्र का देवदुर्लभ वास प्रदान किया। प्रभो ! दीन हीन कंगाल को रंक से चक्रवर्ती बना दिया, यह आप की ही सामर्थ्य है। आप करनी न करनी सभी कुछ कर सकते हैं। आपकी महिमा का पार कौन पा सकता है? मेरी प्रार्थना को स्वीकार कीजिये और मुझे अपने मनोवांछित वरदान को दीजिये।’ प्रभु ने गदगद कण्ठ से कहा- ‘हरिदास ! तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध करने की भला सामर्थ्य ही किसकी है? जिसमें तुम्हें सुख हो, वही करो।’ प्रभु इतना कहकर अपने स्थान को चले गये। महाप्रभु ने गोविन्द से कह दिया कि- ‘हरिदास की खूब देख-रेख रखो, अब वे इस पाँच भौतिक शरीर को छोड़ना चाहते हैं। गोविन्द प्रसाद लेकर रोज जाता था, किन्तु हरिदास जी की भूख तो अब समाप्त हो गयी। फूटे हुए फोड़े में पुलटिस बाँधने से लाभ ही क्या? छिद्र हुए घड़े में जल रखने से प्रयोजन ही क्या? उसमें अब जल सुरक्षित न रहेगा।’ महाप्रभु नित्य हरिदास जी को देखने जाया करते थे। एक दिन उन्होंने देखा; हरिदास जी के शरीर की दशा अत्यन्त ही शोचनीय है। वे उसी समय अपने आश्रम पर गये और उसी समय गोविन्द के द्वारा अपने सभी अन्तरंग भक्तों को बुलाया। सबके आ जाने पर प्रभु उन्हें साथ लिये हुए हरिदास जी के आश्रम में जा पहुँचे। हरिदास जी पृथ्वी पर पड़े हुए धीरे-धीरे- हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥ इस महामन्त्र का जप कर हरे थे। प्रभु ने पूछा- ‘क्यों, हरिदास ! कहो, क्या हाल है?’ ‘सब आनन्द है प्रभो !’ कहकर हरिदास ने कष्ट के साथ करवट बदली। महाप्रभु उनके मस्तक पर धीरे-धीरे हाथ फिराने लगे। राय रामानन्द, सार्वभौम भट्टाचार्य, स्वरूप दामोदर, वक्रेश्वर पण्डित, गदाधर गोस्वामी, काशीश्वर, जगदानन्द पण्डित आदि सभी अन्तरंग भक्त हरिदास जी को चारों ओर से घेरकर बैठ गये। धीरे-धीरे भक्तों ने संकीर्तन आरम्भ किया। भट्टाचार्य जोश में आकर उठ खड़े हुए और जोरों से नृत्य करने लगे। अब तो सभी भक्त उठकर और हरिदास जी को घेरकर जोरों के साथ गाने-बजाने और नाचने लगे। संकीर्तन की कर्णप्रिय ध्वनि सुनकर सैकड़ों आदमी वहाँ एकत्रित हो गये। कुछ क्षण के अनन्तर प्रभु ने संकीर्तन बन्द करा दिया, भक्तों के सहित हरिदास जी को चारों ओर से घेरकर बैठ गये। प्रभु के दोनों कमल के समान कमल के समान नेत्रों में जल भरा हुआ था, कण्ठ शोक के कारण गदगद हो रहा था। उन्होंने कष्ट के साथ धीरे-धीरे रामानन्द तथा सार्वभौम आदि भक्तों से कहना आरम्भ किया- ‘हरिदास जी के भक्ति भाव का बखान सहस्र मुख वाले शेषनाग जी भी अनन्त वर्षों में नहीं कर सकते। इनकी सहिष्णुता-जागरूकता, तितिक्षा और भगवन्नाम में अनन्यभाव से निष्ठा आदि सभी बातें परम आदर्श और अनुकरणीय हैं। इनका जैसा वैराग्य था वैसा सभी मनुष्यों में नहीं हो सकता। कोटि-कोटि पुरुषों में कही खोजने से किसी में मिल सके तो मिले, नहीं तो इन्होंने अपना आचरण असम्भव सा ही बना लिया था।’ यह कहकर प्रभु बेंतों की घटना, वेश्या की घटना, नाग की घटना तथा इनके सम्बन्ध की और प्रलोभन-सम्बन्धी दैवी घटनाओं का वर्णन करने लगे। सभी भक्त इनके अनुपमेय गुणों को सुनकर इनके पैरों की धूलि को मस्तक पर मलने लगे। उसी समय बड़े कष्ट से हरिदास जी ने प्रभु को सामने आने का संकेत किया। भक्तवत्सल चैतन्य उन महापुरुष के सामने बैठ गये। अब तक उनकी आँखें बन्द थीं, अब उन्होंने दोनों आँखों को खोल लिया और बिना पलक मारे अनिमेषभाव से वे प्रभु के श्री मुख की ओर निहारने लगे। मानो वे अपने दोनों बड़े-बड़े नेत्रों द्वारा महाप्रभु के मनोहर मुखारविन्द के मकरन्द का तन्मयता के साथ पान कर रहे हों। उनकी दृष्टि महाप्रभु के श्री मुख की ओर से क्षणभर को भी इधर-उधर हटती नहीं थी। सभी मौन थे, चारों ओर नीरवता और स्तब्धता छायी हुई थी। हरिदास जी अत्यन्त ही पिपासु की तरह प्रभु की मकरन्द माधुरी को पी रहे थे। अब उन्होंने पास में बैठे हुए भक्तों की धीरे-धीरे पदधूलि उठाकर अपने काँपते हुए हाथों से शरीर पर मली। उनकी दोनों आँखों की कोरों में से अश्रुओं की बूँदें निकल-निकलकर पृथ्वी में विलीन होती जाती थीं। मानों वे नीचे के लोक में हरिदास-विजयोत्सव का संवाद देने जा रही हों। उनकी आँखों के पलक गिरते नहीं थे, जिह्वा से धीरे-धीरे ‘श्रीकृष्ण चैतन्य’ ‘श्रीकृष्ण चैतन्य’ इन नामों को उच्चारण कर रहे थे। देखते-ही-देखते उनके प्राण-पखेरू इस जीर्ण-शीर्ण कलेवर को परित्याग करके न जाने किस लोक की ओर चले गये। उनकी आँखें खुली-की-खुली ही रह गयीं, उनके पलक फिर गिरे नहीं। मीन की तरह मानो वे पलकहीन आँखें, निरन्तररूप से त्रैलोक्य को शीतलता प्रदान करने वाले चैतन्यरूपी जल का आश्रय ग्रहण करके उसी की ओर टकट की लगाये अविच्छिन्नभाव से देख रही हैं। सभी भक्तों ने एक साथ हरिध्वनि की। महाप्रभु उनके प्राणहीन कलेवर को अपनी गोदी में उठाकर जोरों के साथ नृत्य करने लगे। सभी भक्त रुदन करते हुए ‘हरि बोल’, ‘हरि बोल’ की हृदयविदारक ध्वनि से मानो आकाश के हृदय के भी टुकड़े-टुकड़े करने लगे। उस समय का दृश्य बड़ा ही करुणा जनक था। जहाँ श्री चैतन्य हरिदास के प्राणहीन शरीर को गोदी में लेकर रोते-रोते नृत्य कर रहे हों वहाँ अन्य भक्तों की क्या दशा हुई होगी, इसका पाठक ही अनुमान लगा सकते हैं। उसका कथन करना हमारी शक्ति के बाहर की बात है। इस प्रकार बड़ी देर तक भक्तों के सहित प्रभु कीर्तन करते रहे। अनन्तर श्री जगन्नाथ जी का प्रसादी वस्त्र मँगाया गया। उससे उनके शरीर को लपेटकर उनका बड़ा भारी विमान बनाया गया। सुन्दर कलाबे की डोरियों से कसकर उनका शरीर विमान पर रखा गया। सैकड़ों भक्त ढोल, करतार झाँझ, मृदंग और शंख, घडियाल तथा घण्टा बजाते हुए विमान के आगे-आगे चलने लगे। सभी भक्त बारी-बारी से हरिदास जी के विमान में कन्धा लगाते थे। महाप्रभु सबसे आगे विमान के सामने अपना उन्मत्त नृत्य करते जाते थे। वे हरिदास जी की गुणावली का निरन्तर गान कर रहे थे। इस प्रकार खूब धूम-धाम के साथ वे हरिदास जी के शव को लेकर समुद्र तट पर पहुँचे। समुद्रतट पर पहुँचकर भक्तों ने हरिदास जी के शरीर को समुद्र जल में स्नान कराया। महाप्रभु अश्रुविमोचन करते हुए गदगद कण्ठ से कहने लगे- ‘समुद्र आज से पवित्र हो गया, अब यह हरिदास जी के अंगस्पर्श से महातीर्थ बन गया।’ यह कहकर आपने हरिदास जी का पादोदक पान किया। सभी भक्तों ने हरिदास जी के पादोदक से अपने को कृतकृत्य समझा। बालू में एक गडढा खोदकर उसमें हरिदास जी के शरीर को समाधिस्थ किया गया। क्योंकि वे संन्यासी थे, संन्यासी के शरीर की शास्त्रों में ऐसी ही विधि बतायी है। प्रभु ने अपने हाथों से गडढे में बालू दी और उनकी समाधि पर सुन्दरसा एक चबूतरा बनाया। सभी ने शोकयुक्त प्रेम के आवेश में उन्मत्त होकर समाधि के चारों ओर संकीर्तन किया और समुद्र स्नान करके तथा हरिदास जी की समाधि की प्रदक्षिणा करके सभी ने पुरी की ओर प्रस्थान किया। पथ में प्रभु हरिदास जी की प्रशंसा करते-करते प्रेम में पागलों की भाँति प्रलाप करते जाते थे। सिंहद्वार पर पहुँच कर प्रभु रोते-रोते अपना अंचल पसार-पसारकर दुकानदारों से भिक्षा माँगने लगे। वे कहते थे- ‘भैया! मैं अपने हरिदास का विजयोत्सव मनाऊँगा, मुझे हरिदास के नाम पर भिक्षा दो।’ दुकानदार अपना-अपना सभी प्रसाद प्रभु की झोली में डालने लगे। तब स्वरूप दामोदर जी ने प्रभु का हाथ पकड़कर कहा- ‘प्रभो! यह आप क्या कर रहे हैं? भिक्षा माँगने के लिये हम आपके सेवक ही बहुत हैं, आपको इस प्रकार माँगते देखकर हमें दुःख हो रहा है, आप चलिये। जितना भी आप चाहेंगे उतना ही प्रसाद हम लोग माँग-माँगकर एकत्रित कर देंगे।’ इस प्रकार प्रभु को समझा-बुझाकर स्वरूप गोस्वामी ने उन्हें स्थान पर भिजवा दिया और आप चार-पाँच भक्तों को साथ लेकर दुकानों पर महाप्रसाद माँगने चले। उस दिन दुकानदारों ने उदारता की हद कर डाली। उनके पास जितना भी प्रसाद था, सभी दे डाला। इतने में ही वाणीनाथ, काशी मिश्र आदि बहुत-से भक्त मनों प्रसाद लेकर प्रभु के आश्रम पर आ उपस्थित हुए। चारों ओर महाप्रसाद का ढेर लग गया। जो भी सुनता वही हरिदास जी के विजयोत्सव में सम्मिलित होने के लिये दौड़ा आता। इस प्रकार हजारों आदमी वहाँ एकत्रित हो गये। महाप्रभु स्वयं अपने हाथों से सभी को परोसने लगे। महाप्रभु का परोसना विचित्र तो होता ही था। एक-एक पत्तल पर चार-चार, पाँच-पाँच आदमियों के योग्य भोजन और तारीफ की बात यह कि लोग सभी को खा जाते थे। भक्तों ने आग्रह पूर्वक कहा- ‘जब तक महाप्रभु प्रसाद न पा लेंगे, तब तक हममें से कोई एक ग्रास भी मुँह में न देगा।’ तब प्रभु ने परासना बंद कर दिया और पुरा तथा भारती आदि संन्यासियों के साथ काशी मिश्र के लाये हुए प्रसाद को पाने लगे, क्योंकि उस दिन प्रभु का उन्हीं के यहाँ निमन्त्रण था। महाप्रभु ने सभी भक्तों को खू्ब आग्रह पूर्वक भोजन कराया। सभी ने प्रसाद ना लेने के अनन्तर हरिध्वनि की। तब प्रभु ऊपर को हाथ उठाकर कहने लगे- ‘हरिदास जी का जिसने संग किया, जिसने उनके दर्शन किये, उनके गड्ढे में बालू दी, उनका पादोदक पान किया, उनके विजयोत्सव में प्रसाद पाया, वह कृतार्थ हो गया। उसे श्रीकृष्ण प्रेम की प्राप्ति अवश्य हो सकेगी। वह अवश्य ही भगवत्कृपा का भाजन बन सकेगा।’ यह कहकर प्रभु ने जारो से हरिदास जी की जय बोली।’ ‘हरिदास जी की जय’ के विशाल घोष से आकाश मण्डल गूँजने लगा। हरि-हरि ध्वनि के साथ हरिदास जी का विजयोत्सव समाप्त हुआ। श्री क्षेत्र जगन्नाथपुरी में टोटा गोपीनाथ जी के रास्ते में समुद्र तीर पर अब भी हरिदास जी की सुन्दर समाधि बनी हुई है। वहाँ पर एक बहुत पुराना बकुल (मौलसिर) का वृक्ष है, उसे ‘सिद्ध बकुल’ कहते हैं। ऐसी प्रसिद्धि है कि हरिदास जी ने दातौन करके उसे गाड़ दिया था, उसी से यह वृक्ष हो गया। अब भी वहाँ प्रतिवर्ष अनन्त चतुर्दशी के दिवस हरिदास जी का विजयोत्सव मनाया जाता है। उन महामना हरिदास जी के चरणों में हम कोटि कोटि प्रणाम करते हुए उनके इस विजयोत्सव प्रसंग को समाप्त करते हैं। श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::----------

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Neha Sharma, Haryana Apr 17, 2021

. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 158 भक्त कालिदास पर प्रभु की परम कृपा नैषां मतिस्ताव्दुरुक्रमाङघ्रिं स्पृशत्य नर्थापगमो यदर्थ: महीयसां पादरजोअभिषेकं निष्किंचनानां न वृणीत यावत्॥ वैष्णव ग्रन्थों में ‘भक्त-पद-रज’, ‘भक्त-पादोदक’ और ‘भक्तोच्छिष्ट द्रव्य’ इन तीनों का अत्यधिक माहात्म्य वर्णन किया गया है। श्रद्धालु भक्तों ने इन तीनो को ही साधन बल बताया है। सचमुच जिन्हें इन तीनों वस्तुऔं में श्रद्धा हो गयी, जिनकी बुद्धि में से भक्तों के प्रति भेदभाव मिट गया, जो भगवत्स्वरूप समझकर सभी भक्तो की पदधूलि को श्रद्धा पूर्वक सिर पर चढ़ाने लगे तथा भक्तों के पादोदक को भक्ति से पान करने लगे, वे निहाल हो गये, उनके लिये भगवान फिर दूर नहीं रह जाते। उनकी पदधूलि की लालसा से भगवान उनके पीछे-पीछे घूमते रहते हैं, किन्तु इन तीनों में पूर्ण श्रद्धा होना ही तो महाकठिन है। महाप्रसाद, गोविन्द, भगवन्नाम और वैष्णवों के श्री विग्रह में पूर्ण विश्वास भगवत-कृपापात्र किसी विरले ही महापुरुष को होता है। यों दूध पीने वाले बनावटी मजनू तो बहुत से घूमते हैं। उनकी परीक्षा तो कटोरा भर खून माँगने पर ही हो सकती है। वे महापुरुष धन्य हैं, जो भक्तों की जाति-पाँति नहीं पूछते। भगवान में अनुराग रखने वाले सच्चे भगवत भक्त को वे ईश्वर तुल्य ही समझकर उनकी सेवा पूजा करते हैं। भक्त प्रवर श्री कालिदास ऐसे ही परम भागवत भक्तों में से एक जगद्वन्द्य श्रद्धालु भक्त थे। उनकी अद्वितीय भक्तिनिष्ठा सुनकर सभी को परम आश्चर्य होगा। कालिदास जी जाति के कायस्थ थे। इनका घर श्रीरघुनाथदास जी के गाँव से कोस, डेढ़ कोस भेदा या भदुआ नामक ग्राम में था। जाति सम्बन्ध से वे रघुनाथदास जी के समीपी और सम्बन्धी थे। भगवन्नाम में इनकी अनन्य निष्ठा थी। उठते बैठते, सोते जागते, हँसते-खेलते तथा बातें करते करते भी सदा इनकी जिह्वा पर भगवन्नाम ही विराजमान रहता। हरे कृष्ण हरे राम बिना ये किसी बात को कहते ही नहीं थे। भगवत-भक्तों के प्रति इनकी ऐसी अद्भुत निष्ठा थी कि जहाँ भी किसी भगवत भक्त का पता पाते वहीं दौड़े जाते और यथाशक्ति उनकी सेवा करते। भक्तों को अच्छे अच्छे पदार्थ खिलाने में उन्हें परमानन्द का अनुभव प्राप्त होता। भक्तों को जब ये श्रद्धा पूर्वक सुस्वादु पदार्थ खिलाते तो उनके दिव्य स्वादों का ये स्वयं भी अनुभव करते। स्वयं खाने से इन्हें इतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी कि भक्तों को खिलाने से। भक्तों को खिलाकर ये स्वयं उनका उच्छिष्ट महाप्रसाद पाते, कोई कोई भक्त संकोचवश इन्हें अपना उच्छिष्ट नहीं देता तो से उसके बर्तनों को ही चाटते। उसी महाप्रसाद को पाकर ये अपने को कृतार्थ समझते। निरन्तर भगवन्नामों का जप करते रहना, भक्तों का पादोदक पान करना, उनकी पदधूलि को मस्तक पर चढ़ाना और उनके अच्छिष्ट महाप्रसाद को पूर्ण श्रद्धा के साथ पाना ही-ये इनके साधनबल थे। इनके अतिरिक्त ये योग, यज्ञ, तप, पूजा, पाठ, अध्ययन और अभ्यास आदि कुछ भी नहीं करते थे। इनका विश्वास था कि हमें इन्हीं साधनों के द्वारा प्रभुपादपद्मों की प्रीति प्राप्त हो जायगी। ऐसा दृढ़ विश्वास था, इसमें बनावटी गन्ध तक भी नहीं थी। इनके गाँव ही एक झा नाम के भूमि माली जाति के शूद्र भगवत-भक्त थे। उनकी पत्नी भी अत्यन्त ही पतिपरायणा सती साध्वी नारी थी। दोनों की खूब भक्ति भाव से श्रीकृष्ण-कीर्तन किया करते थे। एक दिन भक्त कालिदास जी उन दोनों भक्त दम्पति के दर्शनों के निमित्त उनके घर पर गये। उन दिनों आमों की फसल थी, इसलिये वे उनकी भेंट के लिये बहुत बढ़िया बढ़िया सुन्दर आम ले गये थे। प्रतिष्ठित कुलोद भूत कालिदास को अपनी टूटी झोंपड़ी में आया देखकर उस भक्त दम्पति के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। उन दोनों ने उठकर कालिदास जी की अथ्यर्थना की और उन्हें बैठने के लिये एक फटा सा आसन दिया। कालिदास जी के सुख पूर्वक बैठ जाने पर कुछ लज्जित भाव से अत्यन्त की कृतज्ञता प्रकट करते हुए झाड़ू भक्त कहने लगे-‘महाराज ! आपने अपनी पदधूलि से इस शूद्राधम की कुटी को परम पावन बना दिया। आप-जैसे श्रेष्ठ पुरुषों का हम-जैसे नीच जाति के पुरुषों के यहाँ आना साक्षात भगवान के पधारने के समान है। हम एक जो वैसे ही शूद्र हैं दूसरे धनहीन हैं, फिर आपकी किस प्रकार सेवा करें। आप-जैसे अतिथि हमारे यहाँ काहे को आने लगे, हम आपका सत्कार किस वस्तु से करें। आज्ञा हो तो किसी ब्राह्मण के यहाँ से कोई वस्तु बनवा लावें।’ कालिदास जी ने कृतज्ञता प्रकट करते हुए कहा- ‘आप दोनों के शुभ दर्शनों से ही मेरा सर्वश्रेष्ठ सत्कार हो चुका। यदि आप कृपा करके कुछ करना ही चाहते हैं, तो यही कीजिये कि अपने चरणों को मेरे मस्तक पर रखकर उनकी पावन पराग से मेरे मस्तक को पवित्र बना दीजिये। यही मेरी आपसे प्रार्थना है, इसी के द्वारा मुझे सब कुछ मिल जायेगा।’ अत्यन्त ही दीनता के साथ गिड़गिड़ाते हुए झाड़ू भक्त ने कहा- ‘स्वामी ! आप यह कैसी भूली-भूली सी बातें कर रहे हैं। भला, हम जाति के शूद्र, धर्म कर्म से हीन, आपके शरीर को स्पर्श करने तक के भी अधिकारी तीे नहीं हैं, फिर हम आपको अपने पैर कैसे छुआ सकते हैं। हमारी यही आपसे प्रार्थना है कि ऐसी पाप चढ़ाने वाली बात फिर कभी भी अपने मुँह से न निकालें। इससे हमारें सर्वनाश होने की सम्भावना है।’ कालिदास जी ने कहा- ‘जो भगवान का भक्त है, उसकी कोई जाति नहीं होती। वह तो जातिबन्धनों से परे होता है। उससे श्रेष्ठ कोई नहीं होता, वही सबसे श्रेष्ठ होता है। इसलिये आप जाति-कुल का भेदभाव न करें। आप परम भागवत हैं, आपकी पदधूलि से मैं पावन हो जाऊँगा, आप मेरे ऊपर अवश्य कृपा करें।’ झाड़ू भक्त ने कहा- ‘मालिक ! आपकी इस बात को मैं मानता हूँ कि भगवद्भक्त वर्ण और आश्रमों से परे होता है। वह सबका गुरु और पूजनीय होता है, उससे बढ़कर कोई भी नहीं होता, किन्तु वह भक्त होना चाहिये। मैं अधम भला भक्तिभाव क्या जानूँ। मुझे तो भगवान में तनिक भी प्रीति नहीं। मैं तो संसारी गर्त में फँसा हुआ नीच विषयी पुरुष हूँ।’ कालिदास जी ने कहा- ‘सचमुच सच्चे भक्त तो आप ही हैं। जो अपने को भक्त मानकर सबसे अपनी पूजा कराता है, अपने भक्तिभाव का विज्ञापन बाँटता फिरता है, वह तो भक्त नहीं दुकानदार है, भक्ति के नाम पर पूजा प्रतिष्ठा खरीदने वाला बनिया है। सच्चा भक्त तो आपकी तरह सदा अमानी, अहंकार रहित, सदा दूसरों को मान प्रदान करने वाला होता है, उसे इस बात का स्वप्न में भी अभिमान नहीं होता कि मैं भक्त हूँ। यही तो उनकी महत्ता है। आप छिपे हुए सच्चे भगवद्भक्त हैं। हीन कुल में उत्पन्न होकर आपने बपने को छिपा रखा है, फिर भी ऐसी अलौकिक कस्तूरी है कि वह कितनी भी क्यों न छिपायी जाय, सच्चे पारखी तो उसे पहचान ही लेते हैं। कृपा करके अपनी चरण धूलि से मेरे अंग को पवित्र बना दीजिये।’ इस प्रकार कालिदास जी बहुत देर तक उनसे आग्रह करते रहे, किन्तु झाड़ू भक्त ने उसे स्वीकार नहीं किया। अन्त में वे दोनों पति पत्नी को श्रद्धापूर्वक प्रणाम करके उनसे विदा र्हुए झाड़ू भक्त शिष्टाचार के अनुसार उन्हें थोड़ी दूर घर से बाहर तक पहुँचाने के लिये उनके पीछे-पीछे आये। जब कालिदास जी ने उनसे आग्रह पूर्वक लौट जाने को कहा तो वे लौट गये। कालिदास जी वहीं खड़े रहे। झाड़ू भक्त जब अपनी कुटिया में घुस गये तब जिस स्थान पर उनके चरण पड़े थे, उस स्थान की धूलि को उठाकर उन्होंने अपने सम्पूर्ण शरीर पर लगाया और एक ओर घर के बाहर छिप कर बैठ गये। रात्रि का समय था। झाड़ू भक्त की स्त्री ने अपने पति से कहा- ‘कालिदास जी ये प्रसादी आम दे गये हैं, इन्हें भगवत-अर्पण करके पा लो। भक्त का दिया हुआ प्रसाद है- इसके पाने से कोटि जन्मों के पाप कटते हैं।’ झाडू भक्त ने उल्लास के साथ कहा- ‘हाँ, हाँ, उन आमों को अवश्य लाओ। उनके पाने से तो श्रीकृष्ण प्रेम की प्राप्ति होगी। पति की आज्ञा पाते ही पतिपरायणा पत्नी उन आमों की टोकरी को उठा लायी। झाड़ू ने मन से आमों का भगवत अर्पण किया और फिर उन्हें प्रसाद समझकर पाने लगे। उनके चूस लेने पर जो बचता उसे उनकी पतिव्रता स्त्री चूसती जाती और गुठली तािा छिलकों को बाहर की ओर फेंकती जाती। पीछे छिपे हुए कालिदास जी उन गुठलियों को उठा उठाकर चूसते और उनमें वे अमृत के समान स्वाद का अनुभव करतें इस प्रकार भक्तों के अच्छिष्ट प्रसाद को पाकर अपने को कृतार्थ समझकर वे बहुत रात्रि बीते अपने घर आये। इस प्रकार की इनकी भक्तों के प्रति अनन्य श्रद्धा थी। एक बार गौड़ीय भक्तों के साथ वे भी नीलाचंल में प्रभु के दर्शन के लिये पधारे। इनके ऐसे भक्ति भाव की बातें सुनकर प्रभु इनसे अत्यणिक सन्तुष्ट हुए ओर इन्हें बड़े ही सम्मान के साथ अपने पास रखा। महाप्रभु जब जगन्नाथ जी के मन्दिर में दर्शनों के लिये जाते, तब सिंहासन के समीप वे एक गड़ढे में पैर धोया करते थे। गोविन्द उनके साथ ही जाता था। प्रभु ने कठोर आज्ञा दे रखी थी कि यहाँ हमारे पादोदक को कोई भी पान न करे इसलिये वहाँ जाकर प्रभु के पादोदक पान करने का साहस किसी को भी नहीं होता था। किन्तु भक्तों का पादोदक और भक्तभुक्त अन्न ही जिनके साधन का एकमात्र बल है, वे कालिदास जी भला कब मानने वाले थे। वे निर्भीक होकर प्रभु के समीप चले गये और उनके पैर धोये हुए जल को पीने लगे। एक चुल्लू पीया, प्रभु चुपचाप उनके मुख की ओर देखते रहे। दूसरा चुल्लू पीया, प्रभु थोड़े से मुसकराये, तीसरा चुल्लू पीया, प्रभु जोरों से हँस पड़े। चौथे चुल्लू के लिये ज्यों ही उन्होंने हाथ बढ़ाया त्यों ही प्रभु ने उनका हाथ पकड़ लिया और कहने लगे- ‘बस, बहुत हुआ। अब फिर कभी ऐसा न करना।’ इस प्रकार अपने को बड़भागी समझते हुए कालिदास जी जगन्नाथ जी के दर्शन करते हुए प्रभु के साथ-ही-साथ अपने निवास स्थान पर आये। महाप्रभु ने भिक्षा पायी और भिक्षा पाने के अनन्तर संकेत से गोविन्द को आज्ञा दे दी कि कालिदास जी को हमारा उच्छिष्ट प्रसाद दे दो। प्रभु का संकेत समझकर गोविन्द ने कालिदास जी को प्रभु का उच्छिष्ट महाप्रसाद दे दिया। पादोदक के अनन्तर प्रभु के अधरामृत सिंचित उच्छिष्ठ प्रसाद को पाकर उनकी प्रसन्नता का वारावार नहीं रहा। धन्य है ऐसे भक्तिभाव को और धन्य है उनके ऐसे देवदुर्लभ सौभाग्य को, जिनके लिये महाप्रभु ने स्वयं उच्छिष्ट प्रसाद देने की आज्ञा प्रदान की। श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::----------

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