🌹Ranjit chavda🌹
🌹Ranjit chavda🌹 Mar 5, 2021

Om namoh shivay Har har mahadev Good night ji

Om namoh shivay 
Har har mahadev 
Good night ji

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कामेंट्स

Deepa Binu Mar 5, 2021
HARE KRISHNA 🙏 Good Night JI 🌹 Sweet Dreams 🌹 Take care 🌷🌷🌷

sanjay choudhary Mar 5, 2021
जय श्री कृष्णा।।।। जय श्री राधे राधे.....*🙏🏻� आपकी रात्रि शुभ रहे।।।🙏🙏

🌹Ranjit chavda🌹 Mar 5, 2021
@deepabinu hare krishna very good night ji sweet dreams ji god bless you radhe radhe ji Thankyu jiii 👍☺️🎇💐🌹🌹💐🙏

radhika Mar 5, 2021
*🌹🌹🌹🌹🙏🙏🙏🌹🌹🌹🌹रिश्ते काँच सरीख़े हैं टूट कर बिखर ही जाते हैं* *समेटने की ज़हमत कौन करेलोग काँच ही नया ले आते हैं*🌹🙏✍ शुभ रात्रि जी 🤗🤗 💐💐 माता रानी आपकी मनोकामना पूरी करें जय माता दी💐😴😴😴🥰🥰

🌹Ranjit chavda🌹 Mar 5, 2021
@radikha 👍👍👍 💐 सही बात है जी आपकी बहोत सुन्दर कमेंट है जी शुभ रात्रि जी 🙏धन्यवाद जी 🙏☺️🌹🌷🌺🍀🌻🥀💐🙏

JAI MAA VAISHNO Mar 5, 2021
SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHESHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHESHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE SHREE RADHE

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Mamta Chauhan Apr 16, 2021

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Archana Singh Apr 16, 2021

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Jai Mata Di Apr 16, 2021

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Archana Singh Apr 16, 2021

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Sarita Choudhary Apr 16, 2021

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Shanti Pathak Apr 16, 2021

*जय माता दी* *शुभरात्रि वंदन*. एक गरीब विधवा के पुत्र ने एक बार अपने राजा को देखा। राजा को देख कर उसने अपनी माँ से पूछा- माँ! क्या कभी मैं राजा से बात कर पाऊँगा? माँ हंसी और चुप रह गई। पर वह लड़का तो निश्चय कर चुका था। उन्हीं दिनों गाँव में एक संत आए हुए थे। तो युवक ने उनके चरणों में अपनी इच्छा रखी। संत ने कहा- अमुक स्थान पर राजा का महल बन रहा है, तुम वहाँ चले जाओ और मजदूरी करो। पर ध्यान रखना, वेतन न लेना। अर्थात् बदले में कुछ माँगना मत। निष्काम रहना। वह लड़का गया। वह मेहनत दोगुनी करता पर वेतन न लेता। एक दिन राजा निरीक्षण करने आया। उसने लड़के की लगन देखी। प्रबंधक से पूछा- यह लड़का कौन है, जो इतनी तन्मयता से काम में लगा है? इसे आज अधिक मजदूरी देना। प्रबंधक ने विनय की- महराज! इसका अजीब हाल है, दो महीने से इसी उत्साह से काम कर रहा है। पर हैरानी यह है कि यह मजदूरी नहीं लेता। कहता है मेरे घर का काम है। घर के काम की क्या मजदूरी लेनी? राजा ने उसे बुला कर कहा- बेटा! तूं मजदूरी क्यों नहीं लेता? बता तूं क्या चाहता है? लड़का राजा के पैरों में गिर पड़ा और बोला- महाराज! आपके दर्शन हो गए, आपकी कृपा दृष्टि मिल गई, मुझे मेरी मजदूरी मिल गई। अब मुझे और कुछ नहीं चाहिए। राजा उसे मंत्री बना कर अपने साथ ले गया। और कुछ समय बाद अपनी इकलौती पुत्री का विवाह भी उसके साथ कर दिया। राजा का कोई पुत्र था नहीं, तो कालांतर में उसे ही राज्य भी सौंप दिया। लोकेशानन्द कहता है कि भगवान ही राजा हैं। हम सभी भगवान के मजदूर हैं। भगवान का भजन करना ही मजदूरी करना है। संत ही मंत्री है। भक्ति ही राजपुत्री है। मोक्ष ही वह राज्य है। हम भगवान के भजन के बदले में कुछ भी न माँगें तो वे भगवान स्वयं दर्शन देकर, पहले संत बना देते हैं और अपनी भक्ति प्रदान कर, कालांतर में मोक्ष ही दे देते हैं। वह लड़का सकाम कर्म करता, तो मजदूरी ही पाता, निष्काम कर्म किया तो राजा बन बैठा। यही सकाम और निष्काम कर्म के फल में भेद है। "तुलसी विलम्ब न कीजिए, निश्चित भजिए राम। जगत मजूरी देत है, क्यों राखे भगवान॥" भक्त कैसा होता है.....? रसिकाचार्य कृपा-पूर्वक बता रहे थे कि यदि कोई संत प्रसन्न होकर कहे कि बोलो - "क्या चाहते हो? श्रीहरि का दर्शन अथवा श्रीहरि का विरह? सोचोगे, क्या पूछ बैठे? बड़ी सरल सी बात है कि श्रीहरि का दर्शन ! जब अभी दुर्लभ-दर्शन सुलभ है तो अब चिंतन को बचा क्या? किन्तु जो सच्चा भक्त होगा, जो वास्तव में ही बाबरा होगा, वही कह सकेगा कि विरह ! क्यों? अभी क्षुधा/भूख लगी ही नहीं तो देव-दुर्लभ भोग-पदार्थों में रस कैसे मिलेगा? तृप्ति कैसे होगी? पहले भूख तो लगे तब पदार्थ में रस आवेगा, तृप्ति होवेगी सो कृपया आप मुझे श्रीहरि का विरह दे दीजिये जो प्रतिक्षण बढ़ता ही रहे। एक दिन ऐसा आ जाये कि मैं उनकी प्रतिक्षण स्मृति के बिना जीवित ही न रह सकूँ। विरह और मिलन ! नदी हजारों किलोमीटर का रास्ता दौड़ते-भागते, बाधाओं से टकराते हुए करती है; यही विरह है ! एक ही धुन ! एक ही लक्ष्य ! हम बड़े चतुर हैं; श्रीहरि से मिलन तो चाहते हैं किन्तु बड़ी ही सावधानी बरतते हैं कि कही ऐसा न हो जावे कि हम खो जावें। दो नावों पर सवार को श्रीहरि-कृपा का दर्शन तो हो सकता है किन्तु प्राप्ति न हो सकेगी। हमें भौतिक संपदा और कुटुंबीजनों में आसक्ति अधिक है, श्रीहरि में कम। सब कुछ बना रहे और श्रीहरि भी मिल जावें तो सोने में सुहागा। सब चला जावे और वे मिल जावें तो क्या लाभ? यही कारण है कि प्रवचन करना, सुनना सरल है किन्तु उसे आचरण में लाना कठिन और जब तक आचरण में ही न उतरी तो कथा-सत्संग का कैसा लाभ? यही कहते हैं कि उन्होंने प्रवचन में बड़ी सुंदर बात कही। अरे बात सुंदर होती तो कहना न पड़ता; वह तो आचरण में उतरनी चाहिये। भक्ति सरल है, सरल के लिये किन्तु सरल होना बड़ा कठिन है ! प्राण-प्रियतम के अतिरिक्त अब किसी की सुधि नहीं; जगत में जो भी है, वह उन्हीं का। जब वे ही कर रहे हैं, वे ही कह रहे हैं तो मान-अपमान कैसा और किसका? खेल तो खेल है ! इसीलिये कहते हैं कि भक्ति करे कोई सूरमा, जाति-बरन-कुल खोय। अपने पास श्रीहरी की कृपा से जो कुछ है वह और स्वयं को जो श्रीहरि के श्रीचरणारविन्द में सहर्ष न्यौछावर करने को प्रस्तुत है, यह मार्ग उनके लिये है। इस मार्ग पर कोई भौतिक-संपदा प्राप्त होगी, इस भ्रम में मत रहना। यह तो जान-बूझकर लुटने वालों की गली है; यहाँ वे ही आवें जिन्हें सर्वस्व लुटाने/लुटने में परमानन्द आता हो ! सांकरी-खोर से कोई बिना लुटे चला जावे; असंभव! मैं तो छाया हूँ घनश्याम की न मैं राधा,न मैं मीरा,न गोपी ब्रजधाम की। न मैं भक्तिनि,न मैं दासी,न शोभा हूँ बाम की। रहूँ संग मैं,सँग-सँग राँचू ,संगिनि प्रात: शाम की। श्याम करे जो वही करूँ मैं,प्रति हूँ उसके काम की। मैं हूँ उसके आगे-पीछे चाह नहीं विश्राम की। रहूँ सदा उसके चरणों में, स्थिति यही प्रणाम की। जीव यही है मुक्ति जगत से,लीला यह हरि नाम की। जय जय श्यमाश्याम!

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