🌹🌹🌹🌹🌹जय श्री कृष्ण🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌹

🌹🌹🌹🌹🌹जय श्री कृष्ण🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌹

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कामेंट्स

Archana Singh Apr 11, 2021
🙏🌹ओम सूर्य देवाय नमः 🌹🙏मंगल सुप्रभात जी🙏🌹 आपका दिन शुभ व मंगलमय हो🙏🌹🌹

Ram.kr.Singh Apr 11, 2021
Bin.Tufan.ke.bhi.dub.gayi.bokasti.jisme.Aham.Sabar.tha.🎉🙏

arvind sharma Apr 11, 2021
जय श्रीराम जय श्रीनाथ जी⚓🚩 🌷🙏🌷🙏🌷🙏 *अगर आप जीवन में* *निर्भीक होकर* *चलना चाहते है* 💫💫💫💫💫 *तो जीवन के हर मोड़ पर* *सत्य को साथी बना लीजिये।* 💫💫💫💫💫 💦शुभ रात्री --आपका आने वाला समय मंगलमय हो -- श्री--हरि कुन्जबिहारी बाके बिहारीजी की कृपा दृष्टी आप और आपके परिवार पर सदैव बनी रहे!! खुश रहो- स्वस्थ रहो मुस्कुराते रहो !!💦 💥जय मंगल नाथ 💥🙏🙏🙏🚩

Renu Singh Apr 11, 2021
Shubh Ratri Bhai Ji 🙏 Radhe Radhe Ji Thakur Ji ki kripa Aap aur Aàpke Samast Pariwar pr Sadaiv Bni rhe Bhai Ji 🙏🌹

Ratna Nankani Apr 11, 2021
🌹🙏 JAY shiri Radhe Krishna 🙏 hari om 🙏 Shubh Kamanao ke sath aapka har pal magalmay rhe 🙏 Good Night bhaeiya ji 🙏

Ragni Dhiwar Apr 11, 2021
🥀शुभ रात्रि वंदन भैया जी 🌼आप सदैव प्रसन्न रहें 🥀 आपका हरपल सुंदर व मंगलमय हो 🌼 राधे-राधे 🥀🙏🥀

Mrs. Seema Valluvar Apr 12, 2021
राम राम दादाजी 🙏, सोमवती अमावस्या की असीम शुभकामनाएं दादाजी, ॐ नमः शिवाय 🙏🌺🌺🌺🌺🌺🚩

Ravi Kumar Taneja Apr 12, 2021
सुप्रभात वंदना जी🙏🌹🙏 *देवों के देव महादेव जी की कृपा आप और आपके परिवार पर हमेशा बनीं रहें।* 🙏🌼🙏 ओम नमो शिवाय🕉🏹🌲🙏🌸🙏🌸🙏🌲🏹🕉

BK WhatsApp STATUS Apr 12, 2021
जय श्री राधे कृष्ण शुभ प्रभात स्नेह वंदन धन्यवाद 🌹🌹🙏🙏

Pinu Dhiman Jai Shiva 🙏 Apr 12, 2021
जय भोले नाथ जी हर हर महादेव जी शिव प्रभात वंदन भाई जी 🙏🔱🙏भोलेनाथ जी आप के जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ लाऐ आप की आयु और यश में वृद्धि करे आप की सभी मनोकामनाएं पूरी हो आप हमेशा हंसते मुस्कुराते रहे भाई जी 🙏🙌🔔🌿🔔🌿🔔🌿🔔🌿🔔🌿🔔🌿🔔🌿🔔🌿

Mamta Chauhan Apr 12, 2021
Har har mahadev ji🌷🙏shubh ratri vandan bhai ji aapka har pal khushion bhara ho bholenath ki kripa sda aap or aapke priwar pr bni rhe somvati amavasya ki hardik shubhkamnaye🌷🌷🙏🙏

Renu Singh Apr 12, 2021
Shubh Ratri Bhai Ji 🙏🌹 Jai Mata Di 🌹🙏 Aàpko aur Aàpke Samast Pariwar ko Navratri ki Hardik Shubh Kamnayein Bhai ji 🙏🌹

Shanti Pathak Apr 12, 2021
🌷🙏जय माता दी 🙏शुभरात्रि वंदन भाई जी🌷मातारानी की कृपा आप एवं आपके परिवार पर सदैव बनी रहे 🌷आपका हर पल शुभ एवं मंगलमय हो🌷आप एवं आपके समस्त परिवार को हिंदू नववर्ष एवं चैत्र नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं जी🌷🙏🌷

saumya sharma Apr 12, 2021
ओम् नमः शिवाय 🙏शुभ रात्रि वंदन जी🌹भोले भंडारी की कृपा से आपके जीवन की नाँव खुशियों के समुंदर में लहराती रहे 🙏आप स्वस्थ रहें, हँसते मुस्कुराते रहें 🌹😊👍

🙋🅰NJALI😊ⓂISH®🅰🙏 Apr 12, 2021
*श्री शिवाय नमस्तुभ्यं*🙏ॐ नमः शिवाय*🔱 शुभ रात्रि मेरे आदरणीय काका जी 🙏आपका हर पल शुभ हो👌भगवान् शंकर जी की कृपा दृष्टि सदा आप पर बनी रहें.. 🌹बाबा श्री महाकाल जी आपको एवं आपके समस्त परिवार को सदा सुखी एवं स्वास्थ्य रखें 🙌🙏🌿☆ हर हर महादेव☆🌿🙏🚩🌿🌿🌿🌿💐

Balraj sethi Apr 16, 2021
🙏Jai Shree Radhe Krishna ji ki 🙏🌹🌹🌷🌷🍁

devilakshmi May 5, 2021

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varsha gupta May 5, 2021

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Sunil Kumar Saini May 5, 2021

. 🌺ॐ🌺 🌹ॐ गं गंणपतये नमो नमः 🌹 🐚🌴सुप्रभात🌴🐚 🌄🌄🍵🍵🌄🌄 🌸🌸प्रभात पुष्प🌸🌸 🌹 राधे राधे जी 🙏🌹 🙏 *नमक*.... मां ने पड़ोसी के दरवाज़े पे दस्तक दी और उनसे थोड़ा सा नमक मांगा। पास ही बैठा बेटा ये नज़ारा देख रहा था। मां के अंदर आने पर बेटा कहने लगा मां कल ही तो बाजार से नमक लाया मैं, तो फिर अपने पड़ोसी से मांगने की क्या ज़रूरत थी ? मां कहने लगी, बेटा हमारे पड़ोसी ग़रीब हैं, वो कभी कभी हमसे कुछ मांगती रहती है। मुझे मालूम है कि हमारे किचन में नमक रखा है, फिर भी मैंने उनसे नमक इसलिए मांगा, ताकि वो हमसे कुछ मांगते वक़्त कभी भी हिचकिचाहट या शर्मिन्दगी महसूस न करे, बल्कि वो ये समझे कि पड़ोसियों से ज़रूरत की चीज़ें मांगी जा सकती है और ये पड़ोसी का अधिकार है। *धन्य है ऐसे सद्विचारों वाली भारतीय मां, खूबसूरत समाज ऐसी मां के सदविचार से ही बनता है। जो परिवार का ही नहीं, अपितु अपने पड़ोसियों के खान-पान और मान-सम्मान का भी ध्यान रखना जानती है ।* लाकडाउन का समय है, किसी भी ज़रूरतमंद पड़ोसी या रिश्तेदार की सहायता करने में बिल्कुल भी मत हिचकिचाना। 🙏

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varsha gupta May 4, 2021

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*इंद्री द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना॥ आवत देखहिं बिषय बयारी। ते हठि देहिं कपाट उघारी॥ भावार्थ:-इंद्रियों के द्वार हृदय रूपी घर के अनेकों झरोखे हैं। वहाँ-वहाँ (प्रत्येक झरोखे पर) देवता थाना किए (अड्डा जमाकर) बैठे हैं। ज्यों ही वे विषय रूपी हवा को आते देखते हैं, त्यों ही हठपूर्वक किवाड़ खोल देते हैं॥ मित्रो, देहधारी जीवात्मा नौ द्वारों वाले नगर में वास करता है, शरीर अथवा नगर रूपी शरीर के कार्य प्राकृतिक गुणों द्वारा स्वतः सम्पन्न होते हैं, शरीर की परिस्थतियों के अनुसार रहते हुये भी जीव इच्छानुसार इन परिस्थतियों के परे भी हो सकता है, अपनी परा प्रकृति को विस्तृत करने के ही कारण वह अपने को शरीर समझ बैठता है और इसीलिये कष्ट पाता है। भगवद्भक्ति के द्वारा वह अपनी वास्तविक स्थिति को पुनः प्राप्त कर सकता है और इस देह-बन्धन से मुक्त हो सकता है, अतः ज्योंही कोई भगवद्भक्ति को प्राप्त होता है तुरन्त ही वह शारीरिक कार्यों से सर्वथा विलग हो जाता है, ऐसे संयमित जीवन में, जिसमें उसकी कार्यप्रणाली में परिवर्तन आ जाता है, वह नौ द्वारों वाले नगर में सुखपूर्वक निवास करता है, ये नौ द्वार श्वेताश्वतर उपनिषद् 3/18 के अनुसार इस प्रकार है - नवद्वारे पुरे देही हंसो लेलायते बहिः। वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च।। यानी, जीव के शरीर के भीतर वास करने वाले भगवान् ब्रह्माण्ड के समस्त जीवों के नियन्ता है, यह शरीर नौ द्वारों (दो आँखे, दो नथुने, दो कान, एक मुँह, गुदा तथा उपस्थ) से युक्त है, बद्धावस्था में जीव अपने आपको शरीर मानता है, किन्तु जब वह अपनी पहचान अपने अन्तर के भगवान् से करता है तो वह शरीर में रहते हुये भी भगवान् की भाँति मुक्त हो जाता है, अतः भगवद्भक्तिभावित व्यक्ति शरीर के बाह्य तथा आन्तरिक दोनों कर्मों से मुक्त रहता है। न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः। न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ।।14।। शरीर रूपी नगर का स्वामी देहधारी जीवात्मा न तो कर्म का सृजन करता है, न लोगों को कर्म करने के लिये प्रेरित करता है और न ही कर्मफल की रचना करता है, यह सब तो प्रकृति के गुणों द्वारा ही किया जाता है। सज्जनों! जैसा कि गीता के सातवें अध्याय में बताया गया है, कि जीव तो परमेश्वर की शक्तियों में से एक है, किन्तु वह भगवान् की अपरा प्रकृति है जो पदार्थ से भिन्न है, संयोगवश परा प्रकृति या जीव अनादिकाल से प्रकृति (अपरा) के सम्पर्क में रहा है, जिस नाशवान शरीर या भौतिक आवास को वह प्राप्त करता है वह अनेक कर्मों और उनके फलों का कारण है, ऐसे बद्ध वातावरण में रहते हुये मनुष्य अपने आपको (अज्ञानवश) शरीर मानकर शरीर के कर्मफलों का भोग करता है, अनन्त काल से उपार्जित यह अज्ञान ही शारीरिक सुख-दुख का कारण है। ज्योंही जीव शरीर के कार्यों से पृथक् हो जाता है त्योंही वह कर्मबन्धन से भी मुक्त हो जाता है, जब तक वह शरीर रूपी नगर में निवास करता है तब तक वह इसका स्वामी प्रतीत होता है, किन्तु वास्तव में वह न तो इसका स्वामी होता है और न इसके कर्मों तथा फलों का नियन्ता ही, यह तो इस भवसागर के बीच जीवन-संघर्ष में रत प्राणी है, सागर की लहरें उसे उछालती रहती है, किन्तु उन पर उसका वश नहीं चलता, उसके उद्धार का एकमात्र साधन है कि दिव्य भगवद्भक्ति द्वारा समुद्र के बाहर आये, इसी के द्वारा समस्त अशान्ति से उसकी रक्षा हो सकती है। नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः। अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ।।15।। परमेश्वर न तो किसी के पापों को ग्रहण करते हैं, न पुण्यों को, किन्तु सारे देहधारी जीव उस अज्ञान के कारण मोहग्रहस्त रहते हैं, जो उनके वास्तविक ज्ञान को आच्छादित किये रहता है। सज्जनों! विभु का अर्थ है परमेश्वर जो असीम ज्ञान, धन, बल, यश, सौन्दर्य तथा त्याग से युक्त है, वह सदैव आत्मतृप्त और पाप-पुण्य से अविचलित रहता है, वह किसी भी जीव के लिये विशिष्ट परिस्थिति उत्पन्न नहीं करता, अपितु जीव अज्ञान से मोहित होकर जीवन की ऐसी परिस्थिति की कामना करता है, जिसके कारण कर्म तथा फल की शृंखला आरम्भ होती है, जीव परा प्रकृति के कारण ज्ञान से पूर्ण है, तो भी वह अपनी सीमित शक्ति के कारण अज्ञान के वशीभूत हो जाता है। भगवान् सर्वशक्तिमान् है, किन्तु जीव नहीं है, भगवान् विभु अर्थात् सर्वज्ञ है, किन्तु जीव अणु है, जीवात्मा में इच्छा करने की शक्ति है, किन्तु ऐसी इच्छा की पूर्ति सर्वशक्तिमान् भगवान् द्वारा ही की जाती है, अतः जब जीव अपनी इच्छाओं से मोहग्रहस्त हो जाता है तो भगवान् उसे इच्छापूर्ति करने देते हैं, किन्तु किसी परिस्थिति विशेष में इच्छित कर्मों तथा फलों के लिये उत्तरदायी नहीं होते, इसलिये मोहग्रहस्त होने से देहधारी जीव अपने को परिस्थितिजन्य शरीर मान लेता है और जीवन के क्षणिक दुख तथा सुख को भोगता है। भगवान् परमात्मा रूप में जीव का चिरसंगी रहते हैं, अतः वे प्रत्येक जीव की इच्छाओं को उसी तरह समझते है जिस तरह फूल के निकट रहने वाला फूल की सुगन्ध को, इच्छा जीव को बद्ध करने के लिये सूक्ष्म बन्धन है, भगवान् मनुष्य की योग्यता के अनुसार उसकी इच्छा को पूरा करते हैं, "आपन सोची होत नहिं प्रभु सोची तत्काल" व्यक्ति अपनी इच्छाओं को पूरा करने में सर्वशक्तिमान् नहीं होता, किन्तु भगवान् इच्छाओं की पूर्ति कर सकते हैं। वे निष्पक्ष होने के कारण स्वतन्त्र अणुजीवों की इच्छाओं में व्यवधान नहीं डालते, किन्तु जब कोई श्रीकृष्ण की इच्छा करता है तो भगवान् उसकी विशेष चिन्ता करते हैं और उसे इस प्रकार प्रोत्साहित करते हैं कि भगवान् को प्राप्त करने की उसकी इच्छा पूरी हो और वह सदैव सुखी रहें, अतएव कौषीतकी उपनिषद् 3/8 का वैदिक मन्त्र पुकार कर कहते हैं - एष उ ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते। एष उ एवासाधु कर्म कारयति यमधो निनीषते।। यानी, भगवान् जीव को शुभ कर्मों में इसलिये प्रवृत्त करते हैं जिससे वह ऊपर उठे, एवम् भगवान् उसे अशुभ कर्मों में इसलिये प्रवृत्त करते हैं जिससे वह नरक जायें। जय श्री कृष्ण! ओऊम् नमो भगवते वासुदेवाय्

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शाखाहार द ग्रेट 🌹👏🚩 खीरा शरीर में पानी की कमी को पूरा करने में मदद करता है। साथ ही यह बढ़े हुए यूरिक एसिड को कंट्रोल करने में कारगर है। ऐसे में आप खीरे के जूस का सेवन कर सकते हैं। आज की अनहेल्दी लाइफस्टाइल के कारण जो समस्याएं पहले बड़े-बुजुर्गों को हुआ करती थीं, वह अब युवाओं को होने लगी हैं। ऐसी ही एक समस्या है यूरिक एसिड की। शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा तब बढ़ती है, जब किडनी की फिल्टर करने की क्षमता कम हो जाती है। इसके कारण यूरिक एसिड हड्डियों के बीच में इक्ट्ठा होने लगता है, जिससे जोड़ों में दर्द, गठिया-बाय, गाउट, हाथों-पैरों की उंगलियों में दर्द, उठने-बैठने में तकलीफ जैसी शारिरिक परेशानियां होने लगती हैं। बता दें, खून में यूरिक एसिड बढ़ने के कारण इसके छोटे-छोटे टुकड़े जोड़ों, टेंडन, मांसपेशियों और टिश्यूज में क्रिस्टल के रूप में जमा होने लगते हैं। केवल इतना ही नहीं यूरिक एसिड के मरीजों को किडनी फेलियर और हार्ट अटैक जैसी जानलेवा दिक्कतें हो सकती हैं। बता दें, शरीर में बढ़े हुए यूरिक एसिड की स्थिति को हाइपरयूरिसेमिया कहा जाता है। हालांकि, घरेलू उपायों के जरिए यूरिक एसिड की मात्रा को नियंत्रित किया जा सकता है। इसके लिए आप घर में बनें ऐसे जूस का सेवन कर सकते हैं, जो यूरिक एसिड की मात्रा को कंट्रोल करने में कारगर हैं। -टमाटर का सूप: शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा को नियंत्रित करने के लिए विटामिन-सी युक्त चीजों का सेवन करना चाहिए। विटामिन-सी उन चीजों में होता है, जो खाने में खट्टी लगती हैं। ऐसे में आप टामाटर के सूप का सेवन कर सकते हैं। इसके लिए टमाटर का मिक्सी में जूस निकाल लें। फिर इसमें हल्का काला नमक डालकर नियमित तौर पर सेवन करें। -खीरे का जूस: खीरा शरीर में पानी की कमी को पूरा करने में मदद करता है। साथ ही यह बढ़े हुए यूरिक एसिड को कंट्रोल करने में कारगर है। इसके लिए खीरे को काट लें फिर इसे मिक्सी में डालें। उसमें एक गिलास पानी और काला नमक मिलाएं। इस मिश्रण को पीसने के बाद जूस को पिएं। -धनिये का जूस: धनिये में कई तरह के पोषक तत्व मौजूद होते हैं। इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट्स शरीर में फ्री रैडिकल्स से लड़ने में मदद करते हैं। ऐसे में धनिये के जूस का सेवन करने से शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा को नियंत्रित किया जा सकता है। जय श्री गुरुदेव जय श्री गजानन जय श्री भोलेनाथ जय श्री पार्वती माता की 🌹 नमस्कार 🙏 शुभ प्रभात वंदन 👣 🌹 🌅👏🚩शुभ बुधवार ॐ गं गणपतये नमः 👏 मांस मच्छी मत खाओ शाखाहारी बनो धर्म का हर पल पालण करो धष्टपुष्ट बनो अपना सनातन धर्म ☸ बढायें रोग भगाओ जय हिंद जय भारत वंदेमातरम 💐 🚩 आप का हर पल शुभ रहे मस्त रहे सदा स्वस्थ रहे नमस्कार 🙏 आपको सादर प्रणाम 🌹 👏 🌿 🚩 जय श्री गजानन 🙏 🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻

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varsha gupta May 3, 2021

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Manoj sahu May 3, 2021

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. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 168 लोकातीत दिव्योन्माद स्वकीयस्य प्राणार्बुदसदृशगोष्ठस्य विरहात् प्रलापानुन्मादात् सततमतिकुर्वन विकलधी:। दधद्भित्तौ शश्वद्वदनविधुघर्षेण रुधिरं क्षतोत्थं गौरांगो हृदय उदयन्मां मदयति॥ महाप्रभु की दिव्योन्माद की अवस्था का वर्णन करना कठिन तो है ही, साथ ही बड़ा ही हृदयविदारक है। हम वज्र-जैसे हृदय रखने वालों की बात छोड़ दीजिये, किन्तु जो सहृदय हैं, भावुक है, सरस हैं, परपीडानुभवी हैं, मधुर रति के उपासक हैं, कोमल हृदय के हैं, जिनका हृदय परपीड़ाश्रवण से ही भर आता है, जिनका अन्त:करण अत्यन्त लुजलुजा- शीघ्र ही द्रवित हो जाने वाला है, वे तो इन प्रकरणों को पढ़ भी नहीं सकते। सचमुच इन अपठनीय अध्यायों का लिखना हमारे ही भाग्य में बदा था। क्या करें, विवश हैं हमारे हाथ में बलपूर्वक यह लौह की लेखनी दे दी गयी है। इतना ग्रन्थ लिखने पर भी यह डाकिनी अभी ज्यों-की त्यों ही बनी है, घिसती भी नहीं। न जाने किस यंत्रालय में यह खास तौर से हमारे ही लिये बनायी गयी थी। हाय ! जिसके मुखकलम के संघर्षण की करुण कहानी इसे लिखनी पड़ेगी। जिस श्रीमुख की शोभा को स्मरण करके लेखनी अपने लौहपने को भूल जाती थी, वही अब अपने काले मुंह से उस रक्त रंजित मुख का वर्णन करेगी। इस लेखनी का मुख ही काला नहीं है। किन्तु इसके पेट में भी काली स्याही भर रही है और स्वयं भी काली ही है। इसे मोह कहाँ, ममता कैसी, रुकना तो सीखी ही नहीं। लेखनी ! तेरे इस क्रूर कर्म को बार-बार धिक्कार है। महाप्रभु की विरह-वेदना अब अधिकाधिक बढ़ती ही जाती थी। सदा राधाभाव में स्थित होकर आप प्रलाप करते रहते थे। कृष्ण को कहाँ पाऊँ, श्याम कहाँ मिलेंगे, यही उनकी टेक थी। यही उनका अहर्निश का व्यापार था। एक दिन राधाभाव में ही आपको श्रीकृष्ण के मथुरागमन की स्फूर्ति हो आयी, आप उसी समय बड़े ही करुणस्वर में राधा जी के समान इस श्लोक को रोते-रोते गाने लगे– क्व नन्दकुलचन्द्रमा: क्व शिखिचन्द्रिकालंकत: क्व मन्दमुरलीरव: क्व नु सुरेन्द्रनीलद्युति:। क्व रासरसताण्डवी क्व सखि जीवरक्षौषधि र्निधिर्मम सुहृत्तम: क्व बत हन्त हा धिग्विधिम्॥ इस प्रकार विधाता को बार-बार धिक्कार देते हुए प्रभु उसी भावावेश में श्रीमद्भागवत के श्लोकों को पढ़ने लगे। इस प्रकार आधी रात तक आप अश्रु बहाते हुए गोपियों के विरहसम्बन्धी श्लोकों की ही व्याख्या करते रहे। अर्धरात्रि बीत जाने पर नियमानुसार स्वरूप गोस्वामी ने प्रभु को गम्भीरा के भीतर सुलाया और राय रामानन्द अपने घर को चले गये। महाप्रभु उसी प्रकार जोरों से चिल्ला-चिल्लाकर नाम-संकीर्तन करते रहे। आज प्रभु की वेदना पराकाष्ठा को पहुँच गयी। उनके प्राण छटपटाने लगे। अंग किसी प्यारे के आलिंगन के लिये छटपटाने लगे। मुख किसी के मुख को अपने ऊपर देखने के लिये हिलने लगा। ओष्ठ किसी के मधुमय, प्रेममय शीतलतापूर्ण अधरों के स्पर्श के लिये स्वत: ही कँपने लगे। प्रभु अपने आवेश को रोकने में एकदम असमर्थ हो गये। वे जोरों से अपने अति कोमल सुन्दर श्रीमुख को दीवार में घिसने लगे। दीवार की रगड़ के कारण उसमें से रक्त बह चला। प्रभु का गला रुँधा हुआ था, श्वास कष्ट से बाहर निकलता था। कण्ठ घर-घर शब्द कर रहा था। रक्त के बहने से वह स्थान रक्तवर्ण का हो गया। वे लम्बी–लम्बी सांस लेकर गों-गों ऐसा शब्द कर रहे थे। उस दिन स्वरूप गोस्वामी को भी रात्रिभर नींद नहीं आयी। उन्होंने प्रभु का दबा हुआ ‘गों-गों’ शब्द सुना। अब इस बात को कविराज गोस्वामी के शब्दों में सुनिये– विरहे व्याकुल प्रभुर उद्वेग उठिला। गम्भीरा-भितरे मुख घर्षिते लागिला॥ मुखे, गण्डे, नाके, क्षत हइल अपार। भावावेश ना जानेन प्रभु पड़े रक्तधार॥ सर्वरात्रि करने भावे मुखसंघर्षण। गों-गों शब्द करने, स्वरूप सुनिल तखन॥ गों-गों शब्द सुनकर स्वरूप गोस्वामी उसी क्षण उठकर प्रभु के पास आये। उन्होंने दीपक जलाकर जो देखा उसे देखकर वे आश्चर्यचकित हो गये। महाप्रभु अपने मुख को दीवार में घिस रहे हैं। दीवार लाल हो गयी है, नीचे रुधिर पड़ा है। गेरुए रंग के वस्त्र रक्त में सराबोर हो रहे हैं। प्रभु की दोनों आँखें चढ़ी हुई हैं। वे बार-बार जोरों से मुख को उसी प्रकार रगड़ रहे हैं। नाक छिल गयी है। उनकी दशा विचित्र थी– रोमकूपे रक्तोद्गम दंत सब हाले। क्षणे अंग क्षीण हाय क्षणे अंग फूले॥ जिस प्रकार सेही नाम के जानवर के शरीर पर लम्बे-लम्बे काँटे होते हैं और क्रोध में वे एकदम खड़े हो जाते हैं, उसी प्रकार प्रभु के अंग के सम्पूर्ण रोम सीधे खड़े हुए थे, उनमें रक्त की धारा बह रही थी। दाँत हिल रहे थे और कड़-कड़ शब्द कर रहे थे। अंग कभी तो फूल जाता था और कभी क्षीण हो जाता था। स्वरूप गोस्वामी ने इन्हें पकड़कर उस कर्म से रोका। तब प्रभु को कुछ बाह्य ज्ञान हुआ। स्वरूप गोस्वामी ने दु:खित चित्त से पूछा– ‘प्रभो ! यह आप क्या कर रहे हैं? मुँह को क्यों घिस रहे हैं?’ महाप्रभु उनके प्रश्न को सुनकर स्वस्थ हुए और कहने लगे– ‘स्वरूप ! मैं तो एकदम पागल हो गया हूँ। न जाने क्यों रात्रि मेरे लिये अत्यन्त ही दु:खदायी हो जाती है। मेरी वेदना रात्रि में अत्यधिक बढ़ जाती है। मैं विकल होकर बाहर निकलना चाहता था। अँधेरे में दरवाजा नहीं मिला। इसीलिये दीवार में दरवाजा करने के निमित्त मुँह घिसने लगा। यह रक्त निकला या घाव हो गया, इसका मुझे कुछ पता नहीं।’ इस बात से स्वरूप दामोदर को बडी चिन्ता हुई। उन्होंने अपनी चिन्ता भक्तों पर प्रकट की, उनमें से शंकर जी ने कहा– ‘यदि प्रभु को आपत्ति न हो, तो में उनके चरणों को हृदय पर रखकर सदा शयन किया करूँगा, इससे वे कभी ऐसा काम करेंगे भी तो मैं रोक दूँगा।’ उन्होंने प्रभु से प्रार्थना की, प्रभु ने कोई आपत्ति नहीं की। इसलिये उस दिन से शंकर जी सदा प्रभु के पादपद्मों को अपने वक्ष:स्थल पर धारण करके सोया करते थे। प्रभु इधर से उधर करवट भी लेते, तभी उनकी आँखें खुल जातीं और वे सचेष्ट हो जाते। रात्रि-रात्रिभर जाकर प्रभु के चरणों को दबाते रहते थे। इस भये से प्रभु अब बाहर नहीं भाग सकते थे। उसी दिन से शंकर जी का नाम पड़ गया ‘प्रभुपादोपाधान’। सचमुच वे प्रभु के पैरों के तकिया ही थे। उन तकिया लगाने वाले महाराज के और तकिया बने हुए सेवक के चरणों में हमारा बार-बार प्रणाम हैं। श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधेकृष्णा" 🌸🌸🙏🌸🙏🌸🌸 *******************************************

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