Meena Sharma
Meena Sharma Mar 31, 2020

🍁🍃🍁Jai Mata Di 🍁🍃🍁🍃🍁🍃🍁🍃🍁🍃🍁🍃🍁🍃

🍁🍃🍁Jai Mata Di 🍁🍃🍁🍃🍁🍃🍁🍃🍁🍃🍁🍃🍁🍃

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कामेंट्स

Satyanarayan Agarwal Mar 31, 2020
जय माता दी जय श्री माता वैष्णो देवी की

Kamala Maheshwari Apr 1, 2020
जय श्री माँता रानी की जय🚩🚩🌻 जयश्री कृष्णाजी 🚩🚩🚩🌻🌻🌻 very sweet good morning ji🚩,, 🌻🚩🌻🚩🌻🚩🌻🚩🌻🚩🌹

DARSHAN Apr 1, 2020
JAI MATA DI JAI SHRI GANESH JI GOOD MORNING JI 🙏🙏🙏🙏🙏

🔆💥 शुभप्रभात 🔆💥 🌺🙏जय माता दी 🌺🙏 *अहंकार का बोझ* एक बार एक राजा के राज्य में एक पहुंचे हुए महात्मा जी का आगमन हुआ. महात्मा जी की कीर्ति राजा ने सुन रखी थी अतैव पूरे राजसी अंदाज़ में हीरे-जवाहरात और उत्तम भोग से भरे भेंट के कई थाल लिए हुए वह उनके दर्शन को पहुंचा. . महात्मा जी उस समय कुछ लोगों से बातचीत कर रहे थे. उन्होंने राजा को संकेत में बैठने का निर्देश दिया. महात्मा जी सबसे विदा लेकर राजा के पास पहुंचे तो राजा ने भेंट के थाल महात्मा जी की ओर बढ़ा दिए. . महात्मा जी थोड़े से मुस्कुराए. हीरे-जवाहरातों को भरे थालों को उन्होंने छुआ तक नहीं. हां बदले में एक सूखी रोटी अपने पास से निकाली और राजा को देकर कहा- इसे खा लीजिए. . राजा ने सूखी रोटी देखी तो उसका मन कुछ बिदका पर लगा कि महात्मा का दिया प्रसाद है, खा ही लेना चाहिए. उसने रोटी खाई पर रोटी सख्त थी. राजा से चबायी नहीं गई. . *तब महात्मा जी ने कहा- जैसे आपकी दी हुई वस्तु मेरे काम की नहीं है उसी तरह मेरी दी हुई वस्तु आपके काम की नहीं. हमें वही लेना चाहिए जो हमारे काम का हो. अपने काम का श्रेय भी नहीं लेना चाहिए बिना आवश्यकता लिया किसी से लिया हुआ एक कंकड-पत्थर भी बहुत भारी चट्टान के बोझ जैसा हो जाता है. परमार्थ के लिए लिया गया विपुल धन भी फूलों के हार जैसा है जिसे धारण करना चाहिए.* . मुझे यदि किसी धार्मिक प्रयोजन के लिए धन की आवश्यकता होगी तो मैं स्वयं याचक की तरह आपके पास आउंगा. उस समय मैं आवश्यकता अनुसार दान स्वीकार करूंगा परंतु आज तो यह मेरे लिए बोझ जैसा ही है. . राजा इन बातों को सुनकर काफी प्रभावित हुआ. राजा जब जाने को हुआ तो महात्मा जी उसे दरवाजे तक छोड़ने आए. . राजा ने पूछा- महात्मन मैं जब आया था तब आपने मेरी ओर देखा तक नहीं था, अब बाहर तक छोड़ने आ रहे हैं. ऐसा परिवर्तन क्यों ? . *महात्मा जी बोले- बेटा जब तुम आए थे तब तुम्हारे साथ अहंकार का बोझ था. अब तो चोला तुमने उतार दिया है तुम इंसान बन गए हो. हम ऐसे सद्गुणों का आदर करते हैं. साधु मान-अपमान से ऊपर होता है. उसे तो सदगुण प्रिय हैं.* *राजा नतमस्तक हो गया. कितनी बड़ी बात कही महात्मा जी ने. हम अनावश्यक जीवन में लोगों के उपकार का बोझ लेते रहते हैं. हम समझते हैं कि यह कोई कार्य थोड़े ही था. यकीन मानिए हर उपकार एक बोझ जैसा ही होता है जिसे कभी न कभी चुकाना ही होगा.* *धर्म में आस्था रखें. धर्मकार्यों में आस्था रखें. किसी अन्य धर्म का अनादर करना, उसकी अवहेलना करना धर्म नहीं. सनातन तो जीवन जीने की आदर्श कला है.* *घर पर रहिए,दूरी बनाये रखिये,कोरोना से बचे रहिए,अभी लड़ाई बाकी है, अपनी जीत निश्चित है* *ज्ञानरहित भक्ति-अंधविश्वास* *भक्तिरहित ज्ञान-नास्तिकता* *जय श्री राम* *सदैव प्रसन्न रहिये* *जो प्राप्त है-पर्याप्त है* आपका आजका दिन शुभ हो

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🇮🇳जय हिन्द 🇮🇳 !! श्री राम !! 🇮🇳 वंदे मातरम 🇮🇳 💜💜💜 जगत जननी माता जी की कृपा और              आशीर्वादों से सजे दिन शुक्रवार का        💜💜🙏🏻आपको स्नेह वंदन जी 🙏🏻💜💜💜 ❤⚜❤ श्री महालक्ष्मी माता जी की कृपा और आशीर्वाद सदैव आप पर बना रहे ❤⚜❤            💛💥💛 जय श्री राम 💛💥💛      💝💚💝 जय श्री संतोषी माता 💝💚💝 💫💫💫💫💫💫💫    -••○💥○●🌻●⚜●🌻●○💥○••- 🌞😷💥शुभ मंगल कामनाओ सहित💥😷🌞 देवर्षि नारद धर्म के प्रचार तथा लोक-कल्याण हेतु सदैव प्रयत्नशील रहते हैं। शास्त्रों में इन्हें भगवान का मन कहा गया है। इसी कारण सभी युगों में, सभी लोकों में, समस्त विद्याओं में, समाज के सभी वर्गो में नारद जी का सदा से एक महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। मात्र देवताओं ने ही नहीं, वरन् दानवों ने भी उन्हें सदैव आदर किया है। समय-समय पर सभी ने उनसे परामर्श लिया है। श्रीमद्भगवद्गीता के दशम अध्याय के २६वें श्लोक में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने इनकी महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा है - देवर्षीणाम् च नारद:। देवर्षियों में मैं नारद हूं। श्रीमद्भागवत महापुराणका कथन है, सृष्टि में भगवान ने देवर्षि नारद के रूप में तीसरा अवतार ग्रहण किया और सात्वततंत्र (जिसे नारद-पांचरात्र भी कहते हैं) का उपदेश दिया जिसमें सत्कर्मो के द्वारा भव-बंधन से मुक्ति का मार्ग दिखाया गया है। नारद जी मुनियों के देवता थे। वायुपुराण में देवर्षि के पद और लक्षण का वर्णन है- देवलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करने वाले ऋषिगण देवर्षि नाम से जाने जाते हैं। भूत, वर्तमान एवं भविष्य-तीनों कालों के ज्ञाता, सत्यभाषी, स्वयं का साक्षात्कार करके स्वयं में सम्बद्ध, कठोर तपस्या से लोकविख्यात, गर्भावस्था में ही अज्ञान रूपी अंधकार के नष्ट हो जाने से जिनमें ज्ञान का प्रकाश हो चुका है, ऐसे मंत्रवेत्ता तथा अपने ऐश्वर्य (सिद्धियों) के बल से सब लोकों में सर्वत्र पहुँचने में सक्षम, मंत्रणा हेतु मनीषियों से घिरे हुए देवता, द्विज और नृपदेवर्षि कहे जाते हैं। इसी पुराण में आगे लिखा है कि धर्म, पुलस्त्य, क्रतु, पुलह, प्रत्यूष, प्रभास और कश्यप - इनके पुत्रों को देवर्षि का पद प्राप्त हुआ। धर्म के पुत्र नर एवं नारायण, क्रतु के पुत्र बालखिल्यगण, पुलह के पुत्र कर्दम, पुलस्त्य के पुत्र कुबेर, प्रत्यूष के पुत्र अचल, कश्यप के पुत्र नारद और पर्वत देवर्षि माने गए, किंतु जनसाधारण देवर्षि के रूप में केवल नारद जी को ही जानता है। उनकी जैसी प्रसिद्धि किसी और को नहीं मिली। वायुपुराण में बताए गए देवर्षि के सारे लक्षण नारदजी में पूर्णत:घटित होते हैं। महाभारत के सभापर्व के पांचवें अध्याय में नारद जी के व्यक्तित्व का परिचय इस प्रकार दिया गया है - देवर्षि नारद वेद और उपनिषदों के मर्मज्ञ, देवताओं के पूज्य, इतिहास-पुराणों के विशेषज्ञ, पूर्व कल्पों (अतीत) की बातों को जानने वाले, न्याय एवं धर्म के तत्त्‍‌वज्ञ, शिक्षा, व्याकरण, आयुर्वेद, ज्योतिष के प्रकाण्ड विद्वान, संगीत-विशारद, प्रभावशाली वक्ता, मेधावी, नीतिज्ञ, कवि, महापण्डित, बृहस्पति जैसे महाविद्वानोंकी शंकाओं का समाधान करने वाले, धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के यथार्थ के ज्ञाता, योगबल से समस्त लोकों के समाचार जान सकने में समर्थ, सांख्य एवं योग के सम्पूर्ण रहस्य को जानने वाले, देवताओं-दैत्यों को वैराग्य के उपदेशक, क‌र्त्तव्य-अक‌र्त्तव्य में भेद करने में दक्ष, समस्त शास्त्रों में प्रवीण, सद्गुणों के भण्डार, सदाचार के आधार, आनंद के सागर, परम तेजस्वी, सभी विद्याओं में निपुण, सबके हितकारी और सर्वत्र गति वाले हैं। अट्ठारह महापुराणों में एक नारदोक्त पुराण; बृहन्नारदीय पुराण के नाम से प्रख्यात है। मत्स्यपुराण में वर्णित है कि श्री नारद जी ने बृहत्कल्प-प्रसंग में जिन अनेक धर्म-आख्यायिकाओं को कहा है, २५,००० श्लोकों का वह महाग्रन्थ ही नारद महापुराण है। वर्तमान समय में उपलब्ध नारदपुराण २२,००० श्लोकों वाला है। ३,००० श्लोकों की न्यूनता प्राचीन पाण्डुलिपि का कुछ भाग नष्ट हो जाने के कारण हुई है। नारदपुराण में लगभग ७५० श्लोक ज्योतिषशास्त्र पर हैं। इनमें ज्योतिष के तीनों स्कन्ध-सिद्धांत, होरा और संहिता की सर्वांगीण विवेचना की गई है। नारदसंहिता के नाम से उपलब्ध इनके एक अन्य ग्रन्थ में भी ज्योतिषशास्त्र के सभी विषयों का सुविस्तृत वर्णन मिलता है। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि देवर्षिनारद भक्ति के साथ-साथ ज्योतिष के भी प्रधान आचार्य हैं। आजकल धार्मिक चलचित्रों और धारावाहिकों में नारद जी का जैसा चरित्र-चित्रण हो रहा है, वह देवर्षि की महानता के सामने एकदम बौना है। नारद जी के पात्र को जिस प्रकार से प्रस्तुत किया जा रहा है, उससे आम आदमी में उनकी छवि लडा़ई-झगडा़ करवाने वाले व्यक्ति अथवा विदूषक की बन गई है। यह उनके प्रकाण्ड पांडित्य एवं विराट व्यक्तित्व के प्रति सरासर अन्याय है। नारद जी का उपहास उडाने वाले श्रीहरि के इन अंशावतार की अवमानना के दोषी है। भगवान की अधिकांश लीलाओं में नारद जी उनके अनन्य सहयोगी बने हैं। वे भगवान के पार्षद होने के साथ देवताओं के प्रवक्ता भी हैं। नारद जी वस्तुत: सही मायनों में देवर्षि हैं।

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Deepak Chaudhari May 8, 2020

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