LAYAK RAM khatana
LAYAK RAM khatana Sep 14, 2017

"सुमिरन में मन नही लगता..?"

"सुमिरन में मन नही लगता..?"

हम कहते हैं सुमिरन में मन नही लगता,
ठीक है नहीं लगता पर क्यों नही लगता?
कभी विचार जरुर करें.
सुमिरन मानो ऐसे है जैसे हमने कही जाने का पक्का विचार किया.
जब हम घर से निकलते हैं अपनी कार या बाईक निकालते हैं तो हमारी स्पीड 10से20 की रहती है. जैसे ही गली से बाहर निकले स्पीड बड़ जाती है मेन रोड तक 30से40 तक हो जाती है.
मेन रोड से हायवे तक 50से60 तक हो जाती है, और जब हायवे पर आये तो स्पीड और बड़ती ही जाती है.
इन सबकी वजह है ट्रेफिक!!
गली में बच्चे आदि होते हैं इसलिये स्पीड कम थी, मेन रोड तक छोटे मोटे वाहन की वजह से कम थी.
पर जब हायवे पर आये तो रोड भी चौड़ा और ट्रेफिक भी कम तभी हमारी स्पीड सबसे ज्यादा हो गई.

सुमिरन का भी ऐसा ही है जब हम सुमिरन में बैठते हैं तब छोटे छोटे विचार हमारे मन में रहते हैं, वो विचार ट्रेफिक बनकर हमारे मन को आगे बड़ने में बाधित करते हैं.

पर अगर हमारा इरादा पक्का हो कि हमे कैसे भी हो आगे बड़ना ही है, तो हम धीरे धीरे इन विचारों की ट्रेफिक से आगे बड़ते जायेंगे और आगे बड़ने की हमारी आत्मा की स्पीड और बड़ जायेगी..
हमारा मन लगने लगेगा.
हम जल्द ही मंजिल पा लेंगे.


........ ✍🏼खtana.

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कामेंट्स

संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-पूर्वार्ध) (उनतालीसवां दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः संसार-चक्र के अवरोध का उपाय, शरीर की नश्वरता और आत्मा की अविनाशिता एवं अहंकाररूपी चित्त के त्याग का वर्णन तथा श्रीमहादेवजी के द्वारा श्रीवसिष्ठजी के प्रति निर्गुण निराकार परमात्मा की पूजा का प्रतिपादन...(भाग 2) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीवशिष्ठ जी कहते है निष्पाप श्रीराम:- अज्ञानरूपी चक्र के ऊपर स्थित हुआ जीवात्मा जिस देह के जन्म-मरण रूपी चक्र को देखता रहता है, वह उत्तरोत्तर अधिक भ्रान्ति को देने वाला, स्वयं भ्रान्तिरूप, पतनोन्मुख स्वरूप से ग्रस्त, भली प्रकार अनर्थ-गर्तों में गिराया गया, हत एवं हन्यमान ही दीख पड़ता है। इसलिये मनुष्य को उत्तम धैर्य का भली प्रकार आश्रय लेकर इस अनादि दृढीभूत भ्रम का परित्याग कर देना चाहिये । मिथ्या अज्ञान के द्वारा एकमात्र संकल्प से उत्पन्न हुआ यह शरीर सत्य-सा होने पर भीवास्तव में असत्य ही है; क्योंकि जो वस्तु अज्ञान से उत्पन्न हुई है, वह किसी समय भी सत्य नहीं हो सकती । श्रीराम ! जड पदार्थ के द्वारा जो कुछ किया जाता वह किया हुआ नहीं माना जाता; इसलिये यह देह कार्य करता हुआ भी कहीं कुछ भी नहीं करता। जड़ देह तो इच्छा से रहित है और इस निर्विकार आत्मा में इच्छा रहती नहीं; इसलिये कोई कर्ता है ही नहीं । आत्मा शरीर का द्रष्टामात्र है। अपने शरीररूपी घर से चित्तरूपताल को हटा देने पर इस संसाररूपी शून्य नगर में पुरुष कभी भी नहीं डरता । विशद बुद्धि से अहंकार की दासता छोड़कर और अहंकार को सर्वथा भूलकर शीघ्रातिशीघ्र अपनी आत्मा का ही अवलम्बन करना चाहिये । अहंकार से युक्त बुद्धि जो क्रिया की जाती है, विषवल्ली के सदृश उसका फल मरणरूप ही होता है । विवेक एवं धैर्य से रहित जिस मूर्ख ने अपने अहंकाररूपी महोत्सव अवलम्बन किया, उसे तुम तत्काल विनष्ट हुआ ही समझो। राघव ! जिन बेचारों को अहंकाररूपी पिशाच ने अपने अधीन बना लिया, वे सब नरकरूपी अग्नियों के इन्धन ही चन गये अर्थात् वे नरक की ज्वाला से जलते रहते हैं । पापशून्य राघव ! 'हा ! हा ! मैं मर गया हूँ', 'मैं जल गया हूँ' इत्यादि जो दुःखवृत्तियाँ हैं, वे अहंकाररूपी पिशाच की ही शक्तियाँ हैं, दूसरे की नहीं । जिस प्रकार सर्वत्र व्यापक आकाश यहाँ किसी से लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सर्वत्र व्यापक आत्मा भी अहंकार से लिप्त नहीं होता । श्रीराम ! प्राणवायु से युक्त यह चञ्चल देहरूपी यन्त्र जो कुछ करता एवं जो कुछ है वह सब अहंकार की ही चेष्टा है। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-पूर्वार्ध) (अड़तीसवां दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः संसार-चक्र के अवरोध का उपाय, शरीर की नश्वरता और आत्मा की अविनाशिता एवं अहंकाररूपी चित्त के त्याग का वर्णन तथा श्रीमहादेवजी के द्वारा श्रीवसिष्ठजी के प्रति निर्गुण निराकार परमात्मा की पूजा का प्रतिपादन...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीवसिष्ठजी कहते हैं रघुनन्दन ! जब केवल संकल्प रूपी नाभि का भली प्रकार अवरोध कर दिया जाता है, तभी यह संसाररूपी चक्र घूमने से रुक जाता है। किंतु संकल्पात्मक मनोरूप नाभि को राग-द्वेष आदि से क्षोभित करने पर यह संसाररूपी चक्र रोकने की चेष्टा करने पर भी वेग के कारण चलता ही रहता है । इसलिये परम पुरुषार्थ का आश्रय लेकर श्रवण, मनन, निदिध्यासन की युक्तियों के द्वारा ज्ञानरूपी बल से चित्तरूपी संसार-चक्र की नाभि का अवश्य अवरोध करना चाहिये । क्योंकि कहीं पर ऐसी कोई वस्तु उपलब्ध है ही नहीं, जो उत्तम बुद्धि तथा सौजन्य से परिपूर्ण शास्त्र सम्मत परम पुरुषार्थ से प्राप्त न की जा सके । श्रीराम ! आधि और व्याधि से निरन्तर दुःखित, अधु आदि से भिन्न तथा स्वयं विनाशशील इस शरीर में उस प्रकार की भी स्थिरता नहीं रहती, जिस प्रकार की चित्रलिखित पुरुष में रहती है । चित्रित मनुष्य की यदि भलीभाँति रक्षा की जाय तो वह दीर्घ - कालतक सुशोभित रहता है; किंतु उसका बिम्बरूप शरीर तो अनेक यत्नों से रक्षित होने पर भी शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। स्वप्न आदि का शरीर स्वप्नकालीन संकल्प से जनित होने के कारण दीर्घकालीन सुख-दु:खों से आक्रान्त नहीं होता । यह शरीर तो दीर्घकालीन संकल्प से उत्पन्न होने के कारण दीर्घकाल के दुःखों से आक्रान्त रहता है । संकल्पमय यह शरीर स्वयं भी नहीं है और न आत्मा के साथ इसका सम्बन्ध ही है; अतः इस शरीर के लिये यह अज्ञानी जीव निरर्थक क्लेश का भाजन क्यों बनता है ! अर्थात् इसमें एकमात्र अज्ञान ही हेतु है। जिस प्रकार चित्रलिखित पुरुष का क्षय या विनाश हो जाने पर बिम्बरूप देह की हानि नहीं होती, उसी प्रकार संकल्प जनित पुरुष का क्षय या विनाश हो जाने पर आत्मा की कुछ भी हानि नहीं होती । जिस प्रकार मनोराज्य में उत्पन्न शरीर आदि पदार्थों का क्षय या विनाश हो जाने पर आत्मा की कुछ भी हानि नहीं होती, जिस प्रकार स्वप्न में उत्पन्न पदार्थों का क्षय या विनाश हो जाने पर आत्मा की हानि नहीं होती अथवा जिस प्रकार मृगतृष्णि का-नदी के जल का क्षय या विनाश हो जाने पर चास्तविक जल की कुछ भी हानि नहीं होती, उसी प्रकार एकमात्र संकल्प से उत्पन्न स्वभावतः विनाशशील इस शरीररूपी यन्त्र का क्षय या विनाश हो जाने पर आत्मा की कुछ भी हानि नहीं होती । अतः शरीर के लिये शोक करना निरर्थक ही है । चित्त संकल्प से कल्पित तथा दीर्घकालीन स्वप्नमय इस देह अलंकारों से भूषित या आधि-व्याधि से दूषित हो जाने पर चेतन आत्मा की कुछ भी हानि नहीं है । श्रीराम ! देह का विनाश होने पर चेतन आत्मा विनष्ट नहीं होता । ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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