श्रीमद्देवीभागवत (तीसरा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 16 (भाग 2) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ राजकुमार सुदर्शन को मारने के लिये युधाजित् का भरद्वाजाश्रम पर जाना, मुनि से मनोरमा तथा सुदर्शन को बलपूर्वक छीन ले जाने की बात कहना तथा मुनि का रहस्यभरा उत्तर देना, ... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ प्रभो! मैं एक प्राचीन इतिहास सुन चुकी हूँ-पाण्डव वन में रहते थे। मुनियों का पावन आश्रम ही उनका स्थान था। साथ में देवी द्रौपदी थी। पाँचों भाई पाण्डव एक दिन शिकार खेलने चले गये। केवल द्रौपदी मुनियों के उस पावन आश्रम पर रह गयी। वहाँ धौम्य, अत्रि, गालव, पैल, जाबालि, गौतम, भृगु, च्यवन, अत्रि के वंशज कण्व, जतु, क्रतु, वीतिहोत्र, सुमन्तु, यज्ञदत्त, वत्सल, राशासन, कहोड, यवक्रीत, यज्ञकृत् तथा इनके अतिरिक्त भी बहुत-से पुण्यात्मा मुनि उस पावन आश्रम पर विराजमान थे उन सबने वेदध्वनि आरम्भ कर दी थी। मुनिजी! वह आश्रम मुनियों से खचाखच भरा था। अपनी दासियों के साथ सुन्दरी द्रौपदी निर्भय होकर समय व्यतीत कर रही थी। उसी समय सिन्धुदेश का समृद्धिशाली नरेश राजा जयद्रथ अपनी सेना के सहित उसी मार्ग से कहीं जा रहा था। वेदध्वनि सुनकर वह मुनि के आश्रम के पास आ गया। पुण्यात्मा मुनियों की वेदध्वनि सुनते ही राजा जयद्रथ रथ से तुरंत उतरा और उनके दर्शन करने की अभिलाषा से वहाँ आ पहुँचा। जब राजा जयद्रथ आश्रम में आया तब उसके साथ दो नौकर थे। मुनियों को वेद पाठमें संलग्न देखकर वह वहीं बैठ गया। प्रभो! मुनिमण्डली से भरे-पूरे उस आश्रम में वह राजा जयद्रथ हाथ जोड़कर कुछ समय तक बैठा रहा। इतने में वहाँ बैठे हुए उस नरेश को देखने के लिये बहुत-सी स्त्रियाँ तथा मुनिभार्याएँ भी चली आयीं। उनके मुंह से 'यह कौन है'- निकल रहा था। उन स्त्रियों के समाज में देवी द्रौपदी भी थी। वह सुन्दरता के कारण एक दूसरी लक्ष्मी के समान जान पड़ती थी। उस पर जयद्रथ की दृष्टि पड़ गयी। किसी देवकन्या की भाँति शोभा पानेवाली उस सुन्दरी द्रौपदी को देखकर जयद्रथ ने धौम्य मुनि से पूछा-'यह सुन्दर मुखवाली तथा श्यामवर्ण से सुशोभित कौन स्त्री है? यह सुकुमारी किसकी पत्नी है, इसके पिता कौन हैं और इसका क्या नाम है? द्विजदेव! यह राजरानी-जैसी जान पड़ती है; मुनि-पत्नी ऐसी नहीं हो सकती। धौम्य बोले-सिन्धुदेश पर शासन करने वाले महाराज! यह पाण्डवों की प्रेयसी भार्या देवी द्रौपदी है। इस पांचाल-राजकुमारी में सभी शुभ लक्षण विद्यमान हैं। इस समय यह इसी उत्तम आश्रम पर रहती है। जयद्रथ ने पूछा-विख्यात पराक्रमी वे शूरवीर पाँचों पाण्डव कहाँ गये हैं? क्या इस समय वे महाबली योद्धा निश्चिन्त होकर इसी वन में ठहरे हैं? धौम्यजी ने कहा-वे पाँचों पाण्डव वन में गये हैं। शीघ्र ही यहाँ पधारेंगे। धौम्यमुनि की बात सुनकर राजा जयद्रथ उठा और द्रौपदी के पास जाकर उसे उसने प्रणाम किया और यह वचन बोला-'सुन्दरी! तुम्हारा कल्याण हो। इस समय वे तुम्हारे पतिदेव कहाँ गये? निश्चय ही आज तुम्हें वन में ग्यारह वर्ष व्यतीत हो गये हैं।' तब द्रौपदी ने उत्तर दिया-'राजकुमार! आपका कल्याण हो। आश्रम के पास ठहरिये। अभी पाण्डव आ रहे हैं।' द्रौपदी के इस प्रकार कहने पर अत्यन्त लोभ से आक्रान्त उस पापी नरेश ने मुनियों का अपमान करके देवी द्रौपदी को हर लेना चाहा। अत: बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि सर्वथा किसी के विश्वास पर निर्भर न हो जाय। हर किसी पर विश्वास करने वाला जन दुःख पाता है। क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

श्रीमद्देवीभागवत (तीसरा स्कन्ध) 
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अध्याय 16 (भाग 2)

॥श्रीभगवत्यै नमः ॥

राजकुमार सुदर्शन को मारने के लिये युधाजित् का भरद्वाजाश्रम पर जाना, मुनि से मनोरमा तथा सुदर्शन को बलपूर्वक छीन ले जाने की बात कहना तथा मुनि का रहस्यभरा उत्तर देना, ...
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प्रभो! मैं एक प्राचीन इतिहास सुन चुकी हूँ-पाण्डव वन में रहते थे। मुनियों का पावन आश्रम ही उनका स्थान था। साथ में देवी द्रौपदी थी। पाँचों भाई पाण्डव एक दिन शिकार खेलने चले गये। केवल द्रौपदी मुनियों के उस पावन आश्रम पर रह गयी। वहाँ धौम्य, अत्रि, गालव, पैल, जाबालि, गौतम, भृगु, च्यवन, अत्रि के वंशज कण्व, जतु, क्रतु, वीतिहोत्र, सुमन्तु, यज्ञदत्त, वत्सल, राशासन, कहोड, यवक्रीत, यज्ञकृत् तथा इनके अतिरिक्त भी बहुत-से पुण्यात्मा मुनि उस पावन आश्रम पर विराजमान थे उन सबने वेदध्वनि आरम्भ कर दी थी। मुनिजी! वह आश्रम मुनियों से खचाखच भरा था। अपनी दासियों के साथ सुन्दरी द्रौपदी निर्भय होकर समय व्यतीत कर रही थी। उसी समय सिन्धुदेश का समृद्धिशाली नरेश राजा जयद्रथ अपनी सेना के सहित उसी मार्ग से कहीं जा रहा था। वेदध्वनि सुनकर वह मुनि के आश्रम के पास आ गया। पुण्यात्मा मुनियों की वेदध्वनि सुनते ही राजा जयद्रथ रथ से तुरंत उतरा और उनके दर्शन करने की अभिलाषा से वहाँ आ पहुँचा। जब राजा जयद्रथ आश्रम में आया तब उसके साथ दो नौकर थे। मुनियों को वेद पाठमें संलग्न देखकर वह वहीं बैठ गया। प्रभो! मुनिमण्डली से भरे-पूरे उस आश्रम में वह राजा जयद्रथ हाथ जोड़कर कुछ समय तक बैठा रहा। इतने में वहाँ बैठे हुए उस नरेश को देखने के लिये बहुत-सी स्त्रियाँ तथा मुनिभार्याएँ भी चली आयीं। उनके मुंह से 'यह कौन है'- निकल रहा था। उन स्त्रियों के समाज में देवी द्रौपदी भी थी। वह सुन्दरता के कारण एक दूसरी लक्ष्मी के समान जान पड़ती थी। उस पर जयद्रथ की दृष्टि पड़ गयी। किसी देवकन्या की भाँति शोभा पानेवाली उस सुन्दरी द्रौपदी को देखकर जयद्रथ ने धौम्य मुनि से पूछा-'यह सुन्दर मुखवाली तथा श्यामवर्ण से सुशोभित कौन स्त्री है? यह सुकुमारी किसकी पत्नी है, इसके पिता कौन हैं और इसका क्या नाम है? द्विजदेव! यह राजरानी-जैसी जान पड़ती है; मुनि-पत्नी ऐसी नहीं हो सकती।

धौम्य बोले-सिन्धुदेश पर शासन करने वाले महाराज! यह पाण्डवों की प्रेयसी भार्या देवी द्रौपदी है। इस पांचाल-राजकुमारी में सभी शुभ लक्षण विद्यमान हैं। इस समय यह इसी उत्तम आश्रम पर रहती है।

जयद्रथ ने पूछा-विख्यात पराक्रमी वे शूरवीर पाँचों पाण्डव कहाँ गये हैं? क्या इस समय वे महाबली योद्धा निश्चिन्त होकर इसी वन में ठहरे हैं?

धौम्यजी ने कहा-वे पाँचों पाण्डव वन में गये हैं। शीघ्र ही यहाँ पधारेंगे।

धौम्यमुनि की बात सुनकर राजा जयद्रथ उठा और द्रौपदी के पास जाकर उसे उसने प्रणाम किया और यह वचन बोला-'सुन्दरी! तुम्हारा कल्याण हो। इस समय वे तुम्हारे पतिदेव कहाँ गये? निश्चय ही आज तुम्हें वन में ग्यारह वर्ष व्यतीत हो गये हैं।' तब द्रौपदी ने उत्तर दिया-'राजकुमार! आपका कल्याण हो। आश्रम के पास ठहरिये। अभी पाण्डव आ रहे हैं।' द्रौपदी के इस प्रकार कहने पर अत्यन्त लोभ से आक्रान्त उस पापी नरेश ने मुनियों का अपमान करके देवी द्रौपदी को हर लेना चाहा। अत: बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि सर्वथा किसी के विश्वास पर निर्भर न हो जाय। हर किसी पर विश्वास करने वाला जन दुःख पाता है।

क्रमश...
शेष अगले अंक में
जय माता जी की
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KAPIL DEV Mar 1, 2021
मुझे माता दी की जय जय मां आदिशक्ति की जय

श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ पञ्चम स्कन्ध: अथैकोनविंशोऽध्यायः किम्पुरुष और भारतवर्ष का वर्णन...(भाग 3) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ एतासामपो भारत्यः प्रजा नामभिरेव पुनन्तीनामात्मना चोपस्पृशन्ति ॥ १७ ॥ चन्द्रवसा ताम्रपर्णी अवटोदा कृतमाला वैहायसी कावेरी वेणी पयस्विनी शर्करावर्ता तुङ्गभद्रा कृष्णा वेण्या भीमरथी गोदावरी निर्विन्ध्या पयोष्णी तापी रेवा सुरसा नर्मदा चर्मण्वती सिन्धुरन्धः शोणश्च नदौ महानदी वेदस्मृतिऋषिकुल्या त्रिसामा कौशिकी मन्दाकिनी यमुना सरस्वती दृषद्वती गोमती सरयू रोधस्वती सप्तवती सुषोमा" शतद्रश्चन्द्रभागा मरुद्द्धा वितस्ता असिक्नी विश्वेति महानद्यः ॥ १८ ॥ अस्मिन्नेव वर्षे पुरुषैर्लब्धजन्मभिः शुक्ललोहितकृष्णवर्णेन स्वारब्धेन कर्मणा दिव्यमानुषनारकगतयो बह्वय आत्मन आनुपूर्व्येण सर्वा ह्येव सर्वेषां विधीयते यथावर्णविधानमपवर्गश्चापि भवति ॥ १९ ।। योऽसौ भगवति सर्वभूतात्मन्यनाम्येऽनिरुक्ते अनिलयने परमात्मनि वासुदेवेऽनन्यनिमित्तभक्ति योगलक्षणो नानागतिनिमित्ताविद्याग्रन्थिरन्धन द्वारेण यदा हि महापुरुषपुरुषप्रसङ्गः ॥ २० ॥ एतदेव हि देवा गायन्ति - अहो अमीषां किमकारि शोभनं प्रसन्न एषां स्विदुत स्वयं हरिः । यैर्जन्म लब्धं नृषु भारताजिरे मुकुन्दसेवौपयिकं स्पृहा हि नः ॥ २१ किं दुष्करैर्नः क्रतुभिस्तपोव्रतै र्दानादिभिर्वा ह्युजयेन फल्गुना । न यत्र नारायणपादपङ्कज स्मृतिः प्रमुष्टातिशयेन्द्रियोत्सवात् ॥ २२ कल्पायुषां स्थानजयात्पुनर्भवात् क्षणायुषां भारतभूजयो वरम् । क्षणेन मर्त्येन कृतं मनस्विनः संन्यस्य संयान्त्यभयं पदं हरेः ॥ २३ न यत्र वैकुण्ठकथासुधापगा न साधवो भागवतास्तदाश्रयाः । न यत्र यज्ञेशमखा महोत्सवाः सुरेशलोकोऽपि न वै स सेव्यताम् ॥ २४ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ ये नदियाँ अपने नामों से ही जीवको पवित्र कर देती हैं और भारतीय प्रजा इन्हीं के जल में स्नानादि करती हैं ।। १७ ।। उनमें से मुख्य-मुख्य नदियाँ ये हैं— चन्द्रवसा, ताम्रपर्णी, अवटोदा, कृतमाला, वैहायसी, कावेरी, वेणी, पयस्विनी, शर्करावर्ता, तुङ्गभद्रा, कृष्णा, वेण्या, भीमरथी, गोदावरी, निर्विन्ध्या, पयोष्णी, तापी, रेवा, सुरसा, नर्मदा, चर्मण्वती, सिन्धु, अन्ध और शोण नामके नद, महानदी, वेदस्मृति, ऋषिकुल्या, त्रिसामा, कौशिकी, मन्दाकिनी, यमुना, सरस्वती, दृषद्वती, गोमती, सरयू, रोधस्वती, सप्तवती, सुषोमा, शतद्रू, चन्द्रभागा, मरुद्द्धा, वितस्ता, असिनी और विश्वा ॥ १८ ॥ इस वर्ष में जन्म लेने वाले पुरुषों को ही अपने किये हुए सात्त्विक, राजस और तामस कर्मों के अनुसार क्रमशः नाना प्रकार की दिव्य, मानुष और नारकी योनियाँ प्राप्त होती हैं; क्योंकि कर्मानुसार सब जीवों को सभी योनियाँ प्राप्त हो सकती हैं। इसी वर्ष में अपने-अपने वर्ण के लिये नियत किये धर्मों का विधिवत् अनुष्ठान करने से मोक्षतक की प्राप्ति हो सकती है ॥ १९ ॥ परीक्षित् ! सम्पूर्ण भूतों के आत्मा, रागादि दोषोंसे रहित, अनिर्वचनीय, निराधार परमात्मा भगवान् वासुदेव अनन्य एवं अहैतुक भक्तिभाव ही यह मोक्षपद है। यह भक्तिभाव तभी प्राप्त होता है, जब अनेक प्रकारकी गतियों को प्रकट करने वाली अविद्यारूप हृदय की ग्रन्थि कट जाने पर भगवान्‌ के प्रेमीभक्तों का सङ्ग मिलता है ।। २० ।। देवता भी भारतवर्ष में उत्पन्न हुए मनुष्यों की इस प्रकार महिमा गाते हैं- 'अहा! जिन जीवों ने भारतवर्ष में भगवान् की सेवा के योग्य मनुष्य जन्म प्राप्त किया है, उन्होंने ऐसा क्या पुण्य किया है ? अथवा इनपर स्वयं श्रीहरि ही प्रसन्न हो गये हैं ? इस परम सौभाग्य के लिये तो निरन्तर हम भी तरसते रहते हैं ॥ २१ ॥ हमें बड़े कठोर यज्ञ, तप, व्रत और दानादि करके जो यह तुच्छ स्वर्ग का अधिकार प्राप्त हुआ है— इससे क्या लाभ है ? यहाँ तो इन्द्रियों के भोगों की अधिकता के कारण स्मृतिशक्ति छन जाती है, अतः कभी श्रीनारायण के चरणकमलों की स्मृति होती ही नहीं ॥ २२ ॥ यह स्वर्ग तो क्या - जहाँ के निवासियों की एक-एक कल्प की आयु होती है किन्तु जहाँ से फिर संसारचक्र में लौटना पड़ता है, उन ब्रह्मलोकादि की अपेक्षा भी भारतभूमि में थोड़ी आयुवाले होकर जन्म लेना अच्छा है; क्योंकि यहाँ धर पुरुष एक क्षण में ही अपने इस मर्त्यशरीर से किये हुए सम्पूर्ण कर्म श्रीभगवान्‌ को अर्पण करके उनका अभयपद प्राप्त कर सकता है ॥ २३ ॥ 'जहाँ भगवत्कथा की अमृतमयी सरिता नहीं बहती, जहाँ उसके उद्गमस्थान भगवद्भक्त साधुजन निवास नहीं करते और जहाँ नृत्य-गीतादि के साथ बड़े समारोह से भगवान् यज्ञपुरुष की पूजा-अर्चा नहीं की जाती —वह चाहे ब्रह्मलोक ही क्यों न हो, उसका सेवन नहीं करना चाहिये ॥ २४ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्रीमद्देवीभागवत (चौथा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 9 (भाग 1) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ प्रह्लाद के साथ नारायण का युद्ध... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ व्यासजी कहते हैं- प्रह्लाद की बात सुनकर मुनिवर नर ने कहा – 'अच्छी बात है; तुम्हारी ऐसी ही इच्छा है तो आज युद्ध में मेरे सामने डट जाओ।' व्यासजी कहते हैं- दैत्यराज प्रह्लाद महाभाग नर के वचन सुनकर क्रोध से तमतमा उठे। प्रह्लाद अप्रतिम बलशाली वीर थे। उन्होंने प्रतिज्ञा की – 'यद्यपि नर और नारायण सदा तपस्या में लगे रहते हैं, उन्होंने इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है, तथापि मैं इन दोनों ऋषियों को जिस किसी भी उपाय से अवश्य पराजित कर दूँगा।' व्यासजी कहते हैं- इस प्रकार कहकर प्रह्लाद ने हाथ में धनुष उठा लिया। उसपर डोरी चढ़ाकर तुरंत खींचा, जिससे बड़े जोर की टंकार फैल गयी। नरने भी धनुष उठाया और चिकने किये हुए बहुत-से तीखे तीर उस पर चढ़ाये। राजन्! क्रोध में भरकर उन्होंने वे सभी बाण प्रह्लाद पर चला दिये। प्रह्लाद ने अपने चमकीले पंखवाले बाणों से नर के बाणों को आते ही काट डाला। अपने छोड़े हुए बाणों को खण्ड-खण्ड हुए देखकर नर ने उसी क्षण अन्य अनेक तीरों को चलाना आरम्भ कर दिया। मुनिवर नर के वे सभी सायक प्रह्लाद के तीव्रगामी बाणों द्वारा छिन्न-भिन्न हो गये, साथ ही प्रह्लाद ने नर की छाती में चोट पहुँचायी। नर ने भी कुपित होकर शीघ्रगामी पाँच बाणों से दैत्यराज की भुजा पर आघात किया। उस समय उनका युद्ध देखने के लिये इन्द्रसहित बहुत-से देवता विमान पर चढ़कर आकाश में आ गये और समरांगण में विराजमान मुनिवर नर और दैत्यराज प्रह्लाद के पराक्रम की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। प्रह्लाद के पैने बाण इस प्रकार बरस रहे थे, मानो मेघ जल की धारा गिरा रहा हो। उस अवसर पर नारायण ने अपना अप्रतिम शार्ङ्गधनुष हाथ में उठा लिया और सुनहरे पंखवाले बाणों की झड़ी लगा दी। अब प्रह्लाद ने धर्मनन्दन नारायण पर अत्यन्त तीव्रगामी बहुसंख्यक बाण चलाये। साथ ही नारायण के धनुषसे भी सुतीक्ष्ण धार वाले बहुत बाण छूटे, जिनसे टकराकर प्रह्लाद के बाण टुकड़े-टुकड़े हो गये। उस समय सनातन भगवान् श्रीहरि धर्म के यहाँ पुत्ररूप से अवतरित थे । वे वीर बनकर समरांगण में खड़े थे और दैत्यराज प्रह्लाद के प्रयास से तीखे तीरों की वर्षा उनपर हो रही थी। फिर नारायण ने तीक्ष्ण धारवाले अपने बाण चलाये और उनसे प्रह्लाद को- जो सामने ही डटे थे-गहरी चोट पहुँचायी। दोनों पक्षों की बाण-वर्षा से आकाश आच्छन्न हो गया था। क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (अस्सीसीवां दिन) ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय आशादशमी व्रत कथा विधान और फल...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भगवान् श्रीकृष्ण बोले- पार्थ! अब मैं आपसे। आशादशमी व्रत कथा एवं उसके विधान का वर्णन कर रहा हूँ। प्राचीन काल में निषध देश में नल नामक एक राजा थे। उनके भाई पुष्कर ने द्यूत में जब उन्हें पराजित कर दिया, तब नल अपनी भार्या दमयन्ती के साथ राज्य से बाहर चले गये। वे प्रतिदिन एक वन से दूसरे वन में भ्रमण करते रहते थे, केवल जलमात्र से अपना जीवन निर्वाह करते थे और जनशून्य भयंकर वनों में घूमते रहते थे। एक बार राजा ने वन में स्वर्ण-सी कान्तिवाले कुछ पक्षियों को देखा। उन्हें पकड़ने की इच्छा से राजने उनके ऊपर वस्त्र फैलाया, परंतु वे सभी उस वस्त्र को लेकर आकाश में उड़ गये। इससे राजा बड़े दुःखी हो गये। वे दमयन्ती को गाढ़ निद्रा में देखकर उसे उसी स्थिति में छोड़कर चले गये। दमयन्ती ने निद्रा से उठकर देखा तो नल को न पाकर वह उस घोर वन में हाहाकार करते हुए रोने लगी। महान् दुःख और शोक से संतप्त होकर वह नल के दर्शनों की इच्छा से इधर-उधर भटकने लगी। इसी प्रकार कई दिन बीत गये और भटकते हुए वह चेदिदेश में पहुँची। वहाँ वह उन्मत्त-सी रहने लगी। छोटे-छोटे शिशु उसे कौतुकवश घेरे रहते थे। किसी दिन मनुष्यों से घिरी हुई उसे चेदिदेश के राजा की माता ने देखा। उस समय दमयन्ती चन्द्रमा की रेखा के समान भूमिपर पड़ी हुई थी। उसका मुखमण्डल प्रकाशित था। राजमाता ने उसे अपने भवन में बुलाकर पूछा- 'वरानने ! तुम कौन हो ?' इसपर दमयन्ती लज्जित होते हुए कहा–'मैं सैरन्ध्री हूँ। मैं न किसी के चरण धोती हूँ और न किसी का उच्छिष्ट भक्षण करती हूँ। यहाँ रहते हुए कोई मुझे प्राप्त करेगा तो वह आपके द्वारा दण्डनीय होगा। देवि! इस प्रतिज्ञा के साथ मैं यहाँ रह सकती हूँ।' राजमाता ने कहा 'ठीक है ऐसा ही होगा।' तब दमयन्ती ने वहाँ रहना स्वीकार किया और इसी प्रकार कुछ समय व्यतीत हुआ और फिर एक ब्राह्मण दमयन्ती को उसके माता-पिता के घर ले आया। पर माता-पिता तथा भाइयों का स्नेह पाने पर भी पति के बिना वह अत्यन्त दुःखी रहती थी। एक बार दमयन्ती ने एक श्रेष्ठ ब्राह्मण को बुलाकर उससे पूछा- 'हे ब्राह्मण देवता! आप कोई ऐसा दान एवं व्रत बतलायें, जिससे मेरे पति मुझे प्राप्त हो जायँ।' इसपर उस बुद्धिमान् ब्राह्मण ने कहा— 'भद्रे! तुम मनोवाञ्छित सिद्धि प्रदान करने वाले आशादशमी व्रतको करो।' तब दमयन्ती ने पुराणवेत्ता उस दमन नामक पुरोहित ब्राह्मण के द्वारा ऐसा कहे जाने पर आशादशमी-व्रत का अनुष्ठान किया। उस व्रत के प्रभाव से दमयन्ती ने अपने पति को पुनः प्राप्त किया। जय श्री राम क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-पूर्वार्ध) (अड़तीसवां दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः संसार-चक्र के अवरोध का उपाय, शरीर की नश्वरता और आत्मा की अविनाशिता एवं अहंकाररूपी चित्त के त्याग का वर्णन तथा श्रीमहादेवजी के द्वारा श्रीवसिष्ठजी के प्रति निर्गुण निराकार परमात्मा की पूजा का प्रतिपादन...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीवसिष्ठजी कहते हैं रघुनन्दन ! जब केवल संकल्प रूपी नाभि का भली प्रकार अवरोध कर दिया जाता है, तभी यह संसाररूपी चक्र घूमने से रुक जाता है। किंतु संकल्पात्मक मनोरूप नाभि को राग-द्वेष आदि से क्षोभित करने पर यह संसाररूपी चक्र रोकने की चेष्टा करने पर भी वेग के कारण चलता ही रहता है । इसलिये परम पुरुषार्थ का आश्रय लेकर श्रवण, मनन, निदिध्यासन की युक्तियों के द्वारा ज्ञानरूपी बल से चित्तरूपी संसार-चक्र की नाभि का अवश्य अवरोध करना चाहिये । क्योंकि कहीं पर ऐसी कोई वस्तु उपलब्ध है ही नहीं, जो उत्तम बुद्धि तथा सौजन्य से परिपूर्ण शास्त्र सम्मत परम पुरुषार्थ से प्राप्त न की जा सके । श्रीराम ! आधि और व्याधि से निरन्तर दुःखित, अधु आदि से भिन्न तथा स्वयं विनाशशील इस शरीर में उस प्रकार की भी स्थिरता नहीं रहती, जिस प्रकार की चित्रलिखित पुरुष में रहती है । चित्रित मनुष्य की यदि भलीभाँति रक्षा की जाय तो वह दीर्घ - कालतक सुशोभित रहता है; किंतु उसका बिम्बरूप शरीर तो अनेक यत्नों से रक्षित होने पर भी शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। स्वप्न आदि का शरीर स्वप्नकालीन संकल्प से जनित होने के कारण दीर्घकालीन सुख-दु:खों से आक्रान्त नहीं होता । यह शरीर तो दीर्घकालीन संकल्प से उत्पन्न होने के कारण दीर्घकाल के दुःखों से आक्रान्त रहता है । संकल्पमय यह शरीर स्वयं भी नहीं है और न आत्मा के साथ इसका सम्बन्ध ही है; अतः इस शरीर के लिये यह अज्ञानी जीव निरर्थक क्लेश का भाजन क्यों बनता है ! अर्थात् इसमें एकमात्र अज्ञान ही हेतु है। जिस प्रकार चित्रलिखित पुरुष का क्षय या विनाश हो जाने पर बिम्बरूप देह की हानि नहीं होती, उसी प्रकार संकल्प जनित पुरुष का क्षय या विनाश हो जाने पर आत्मा की कुछ भी हानि नहीं होती । जिस प्रकार मनोराज्य में उत्पन्न शरीर आदि पदार्थों का क्षय या विनाश हो जाने पर आत्मा की कुछ भी हानि नहीं होती, जिस प्रकार स्वप्न में उत्पन्न पदार्थों का क्षय या विनाश हो जाने पर आत्मा की हानि नहीं होती अथवा जिस प्रकार मृगतृष्णि का-नदी के जल का क्षय या विनाश हो जाने पर चास्तविक जल की कुछ भी हानि नहीं होती, उसी प्रकार एकमात्र संकल्प से उत्पन्न स्वभावतः विनाशशील इस शरीररूपी यन्त्र का क्षय या विनाश हो जाने पर आत्मा की कुछ भी हानि नहीं होती । अतः शरीर के लिये शोक करना निरर्थक ही है । चित्त संकल्प से कल्पित तथा दीर्घकालीन स्वप्नमय इस देह अलंकारों से भूषित या आधि-व्याधि से दूषित हो जाने पर चेतन आत्मा की कुछ भी हानि नहीं है । श्रीराम ! देह का विनाश होने पर चेतन आत्मा विनष्ट नहीं होता । ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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जनक ने सीता स्वयंवर में अयोध्या नरेश दशरथ को आमंत्रण क्यों नहीं भेजा ? 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰 रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोइ।* *संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ॥ भावार्थ:-श्री रामजी अपार गुणों के समुद्र हैं, क्या उनकी कोई थाह पा सकता है? संतों से मैंने जैसा कुछ सुना था, वही आपको सुनाया॥ राजा जनक के शासनकाल में एक व्यक्ति का विवाह हुआ। जब वह पहली बार सज-सँवरकर ससुराल के लिए चला, तो रास्ते में चलते-चलते एक जगह उसको दलदल मिला, जिसमें एक गाय फँसी हुई थी, जो लगभग मरने के कगार पर थी। उसने विचार किया कि गाय तो कुछ देर में मरने वाली ही है तथा कीचड़ में जाने पर मेरे कपड़े तथा जूते खराब हो जाएँगे, अतः उसने गाय के ऊपर पैर रखकर आगे बढ़ गया। जैसे ही वह आगे बढ़ा गाय ने तुरन्त दम तोड़ दिया तथा शाप दिया कि जिसके लिए तू जा रहा है, उसे देख नहीं पाएगा, यदि देखेगा तो वह मृत्यु को प्राप्त हो जाएगी। वह व्यक्ति अपार दुविधा में फँस गया और गौ-शाप से मुक्त होने का विचार करने लगा। ससुराल पहुँचकर वह दरवाजे के बाहर घर की ओर पीठ करके बैठ गया और यह विचार कर कि यदि पत्नी पर नजर पड़ी, तो अनिष्ट नहीं हो जाए। परिवार के अन्य सदस्यों ने घर के अन्दर चलने का काफी अनुरोध किया, किन्तु वह नहीं गया और न ही रास्ते में घटित घटना के बारे में किसी को बताया। उसकी पत्नी को जब पता चला, तो उसने कहा कि चलो, मैं ही चलकर उन्हें घर के अन्दर लाती हूँ। पत्नी ने जब उससे कहा कि आप मेरी ओर क्यों नहीं देखते हो, तो भी चुप रहा। काफी अनुरोध करने के उपरान्त उसने रास्ते का सारा वृतान्त कह सुनाया। पत्नी ने कहा कि मैं भी पतिव्रता स्त्री हूँ। ऐसा कैसे हो सकता है? आप मेरी ओर अवश्य देखो। पत्नी की ओर देखते ही उसकी आँखों की रोशनी चली गई और वह गाय के शापवश पत्नी को नहीं देख सका। पत्नी पति को साथ लेकर राजा जनक के दरबार में गई और सारा कह सुनाया। राजा जनक ने राज्य के सभी विद्वानों को सभा में बुलाकर समस्या बताई और गौ-शाप से निवृत्ति का सटीक उपाय पूछा। सभी विद्वानों ने आपस में मन्त्रणा करके एक उपाय सुझाया कि, यदि कोई पतिव्रता स्त्री छलनी में गंगाजल लाकर उस जल के छींटे इस व्यक्ति की दोनों आँखों पर लगाए, तो गौ-शाप से मुक्ति मिल जाएगी और इसकी आँखों की रोशनी पुनः लौट सकती है। राजा ने पहले अपने महल के अन्दर की रानियों सहित सभी स्त्रियों से पूछा, तो राजा को सभी के पतिव्रता होने में संदेह की सूचना मिली। अब तो राजा जनक चिन्तित हो गए। तब उन्होंने आस-पास के सभी राजाओं को सूचना भेजी कि उनके राज्य में यदि कोई पतिव्रता स्त्री है, तो उसे सम्मान सहित राजा जनक के दरबार में भेजा जाए। जब यह सूचना राजा दशरथ (अयोध्या नरेश) को मिली, तो उसने पहले अपनी सभी रानियों से पूछा। प्रत्येक रानी का यही उत्तर था कि राजमहल तो क्या आप राज्य की किसी भी महिला यहाँ तक कि झाडू लगाने वाली, जो कि उस समय अपने कार्यों के कारण सबसे निम्न श्रेणि की मानी जाती थी, से भी पूछेंगे, तो उसे भी पतिव्रता पाएँगे। राजा दशरथ को इस समय अपने राज्य की महिलाओं पर आश्चर्य हुआ और उसने राज्य की सबसे निम्न मानी जाने वाली सफाई वाली को बुला भेजा और उसके पतिव्रता होने के बारे में पूछा। उस महिला ने स्वीकृति में गर्दन हिला दी। तब राजा ने यह दिखाने कर लिए कि अयोध्या का राज्य सबसे उत्तम है, उस महिला को ही राज-सम्मान के साथ जनकपुर को भेज दिया। राजा जनक ने उस महिला का पूर्ण राजसी ठाठ-बाट से सम्मान किया और उसे समस्या बताई। महिला ने कार्य करने की स्वीकृति दे दी। महिला छलनी लेकर गंगा किनारे गई और प्रार्थना की कि, ‘हे गंगा माता! यदि मैं पूर्ण पतिव्रता हूँ, तो गंगाजल की एक बूँद भी नीचे नहीं गिरनी चाहिए।’ प्रार्थना करके उसने गंगाजल को छलनी में पूरा भर लिया और पाया कि जल की एक बूँद भी नीचे नहीं गिरी। तब उसने यह सोचकर कि यह पवित्र गंगाजल कहीं रास्ते में छलककर नीचे नहीं गिर जाए, उसने थोड़ा-सा गंगाजल नदी में ही गिरा दिया और पानी से भरी छलनी को लेकर राजदरबार में चली आयी। राजा और दरबार में उपस्थित सभी नर-नारी यह दृश्य देक आश्चर्यचकित रह गए तथा उस महिला को ही उस व्यक्ति की आँखों पर छींटे मारने का अनुरोध किया और पूर्ण राजसम्मान देकर काफी पारितोषिक दिया। जब उस महिला ने अपने राज्य को वापस जाने की अनुमति माँगी, तो राजा जनक ने अनुमति देते हुए जिज्ञाशावश उस महिला से उसकी जाति के बारे में पूछा। महिला द्वारा बताए जाने पर, राजा आश्चर्यचकित रह गए। सीता स्वयंवर के समय यह विचार कर कि जिस राज्य की सफाई करने वाली इतनी पतिव्रता हो सकती है, तो उसका पति कितना शक्तिशाली होगा? यदि राजा दशरथ ने उसी प्रकार के किसी व्यक्ति को स्वयंवर में भेज दिया, तो वह तो धनुष को आसानी से संधान कर सकेगा और कहीं राजकुमारी किसी निम्न श्रेणी के व्यक्ति को न वर ले, अयोध्या नरेश को राजा जनक ने निमन्त्रण नहीं भेजा, किन्तु विधाता की लेखनी को कौन मिटा सकता है? अयोध्या के राजकुमार वन में विचरण करते हुए अपने गुरु के साथ जनकपुर पहुँच ही गए और धनुष तोड़कर राजकुमार राम ने सीता को वर लिया । 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ पञ्चम स्कन्ध: अथैकोनविंशोऽध्यायः किम्पुरुष और भारतवर्ष का वर्णन...(भाग 2) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भारतेऽपि वर्षे भगवान्नरनारायणाख्य आकल्पान्तमुपचितधर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्योपशमो परमात्मोपलम्भनमनुग्रहायात्मवतामनुकम्पया तपोऽव्यक्तगतिश्चरति ॥ ९ ॥ तं भगवान्नारदो वर्णाश्रमवतीभिर्भारतीभिः प्रजाभिर्भगवत्प्रोक्ताभ्यां सांख्ययोगाभ्यां भगवदनुभावोपवर्णनं सावर्णेरुपदेक्ष्यमाणः परमभक्तिभावेनोपसरति इदं चाभिगृणाति ॥ १० ॥ ॐ नमो भगवते उपशमशीलायोपरतानात्याय नमोऽकिञ्चनवित्ताय ऋषिऋषभाय नरनारायणाय परमहंसपरमगुरवे आत्मारामाधिपतये नमो नम इति ॥ ११॥ गायति चेदम् कर्तास्य सर्गादिषु यो न बध्यते न हन्यते देहगतोऽपि दैहिकैः। द्रष्टुर्न दृग्यस्य गुणैर्विदूष्यते तस्मै नमोऽसक्तविविक्तसाक्षिणे ॥ १२ इदं हि योगेश्वर योगनैपुणं हिरण्यगर्भो भगवाञ्जगाद यत् । यदन्तकाले त्वयि निर्गुणे मनो भक्त्या दधीतोज्झितदुष्कलेवरः ॥ १३ यथैहिकामुष्पिककामलम्पटः सुतेषु दारेषु धनेषु चिन्तयन् । शङ्केत विद्वान् कुकलेवरात्ययाद् यस्तस्य यत्नः श्रम एव केवलम् ॥ १४ तन्नः प्रभो त्वं कुकलेवरार्पितां त्वन्माययाहंममतामधोक्षज भिन्द्याम येनाशु वयं सुदुर्भिदां विधेहि योगं त्वयि नः स्वभावमिति ॥ १५ भारतेऽप्यस्मिन् वर्षे सरिच्छैलाः सन्ति बहवो मलयो मङ्गलप्रस्थो मैनाकस्त्रिकूट ऋषभः कूटकः कोल्लक:' सह्यो देवगिरिर्ऋष्यमूकः श्रीशैलो महेन्द्रो वारिधारो विन्ध्यः शुक्तिमानृक्षगिरिः पारियात्रो द्रोणश्चित्रकूटो गोवर्धनो रैवतकः ककुभो नीलो गोकामुख इन्द्रकीलः कामगिरिरिति चान्ये च शतसहस्त्रशः शैलास्तेषां नितम्बप्रभवा नदा नद्यश्च सन्त्यसङ्ख्याताः ॥ १६ ॥ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ भारतवर्ष में भी भगवान् दयावश नर-नारायणरूप धारण करके संयमशील पुरुषों पर अनुग्रह करने के लिये अव्यक्तरूप से कल्प के अन्त तक तप करते रहते हैं। उनकी यह तपस्या ऐसी है कि जिससे धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, शान्ति और उपरति की उत्तरोत्तर वृद्धि होकर अन्त में आत्मस्वरूप की उपलब्धि हो सकती है ॥ ९ ॥ वहाँ भगवान् नारदजी स्वयं श्रीभगवान् के ही कहे हुए सांख्य और योगशास्त्र के सहित भगवन्महिमा को प्रकट करने वाले पाञ्चरात्रदर्शन का सावर्णि मुनि को उपदेश करने के लिये भारतवर्ष की वर्णाश्रमधर्मावलम्बिनी प्रजा के सहित अत्यन्त भक्तिभाव से भगवान् श्रीनर-नारायण की उपासना करते और इस मन्त्र का जप तथा स्तोत्र को गाकर उनकी स्तुति करते हैं ॥ १० ॥ 'ओङ्कारस्वरूप, अहङ्कार से रहित, निर्धनों के धन, शान्तस्वभाव ऋषिप्रवर भगवान् नर-नारायण को नमस्कार है। वे परमहंसों के परम गुरु और आत्मारामों के अधीश्वर हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है ॥ ११ ॥ यह गाते हैं 'जो विश्व की उत्पत्ति आदि में उनके कर्त्ता होकर भी कर्तृत्व के अभिमान से नहीं बँधते, शरीर में रहते हुए भी उसके धर्म भूख-प्यास आदि के वशीभूत नहीं होते तथा द्रष्टा होने पर भी जिनकी दृष्टि दृश्य के गुण-दोषों से दूषित नहीं होती उन असङ्ग एवं विशुद्ध साक्षिस्वरूप भगवान् नर-नारायण को नमस्कार है ॥ १२ ॥ योगेश्वर ! हिरण्यगर्भ भगवान् ब्रह्माजी ने योगसाधन की सबसे बड़ी कुशलता यही बतलायी है कि मनुष्य अन्तकाल में देहाभिमान को छोड़कर भक्तिपूर्वक आपके प्राकृत जैसे पुत्र, गुणरहित स्वरूप में अपना मन लगावे ॥ १३ ॥ लौकिक और पारलौकिक भोगों के लालची मूढ पुरुष स्त्री और धन की चिन्ता करके मौत से डरते हैं उसी प्रकार यदि विद्वान्‌ को भी इस निन्दनीय शरीर के छूटने का भय ही बना रहा, तो उसका ज्ञानप्राप्ति के लिये किया हुआ सारा प्रयत्न केवल श्रम ही है ॥ १४ ॥ अतः अधोक्षज! आप हमें अपना स्वाभाविक प्रेमरूप भक्तियोग प्रदान कीजिये, जिससे कि प्रभो इस निन्दनीय शरीर में आपकी माया के कारण बद्धमूल हुई दुर्भेद्य अहंता-ममता को हम तुरन्त काट डालें ॥ १५॥ राजन् ! इस भारतवर्ष में भी बहुत-से पर्वत और नदियाँ हैं- जैसे मलय, मङ्गलप्रस्थ, मैनाक, त्रिकूट, ऋषभ, कूटक, कोल्लक, सह्य, देवगिरि, ऋष्यमूक, श्रीशैल, वेङ्कट, महेन्द्र, वारिधार, विन्ध्य, शुक्तिमान् ऋक्षगिरि, पारियात्र, द्रोण, चित्रकूट, गोवर्धन, रैवतक, ककुभ, नील, गोकामुख, इन्द्रकील और कामगिरि आदि। इसी प्रकार और भी सैकड़ों-हजारों पर्वत हैं। उनके तटप्रान्तों से निकलने वाले नद और नदियाँ भी अगणित हैं ॥ १६ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-पूर्वार्ध) (सैनतीसवां दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः शरीर और संसार की अनिश्चितता तथा भ्रान्तिरूपता का वर्णन...(भाग 3) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीराम ! जिस प्रकार डरपोक मनुष्य भी अपने कल्पित मनोराज्य के हाथी, बाघ आदि को देखकर भयभीत नहीं होता, क्योंकि वह समझता है कि यह मेरी कल्पना के सिवा और कुछ नहीं है, वैसे ही यथार्थ ज्ञानी पुरुष इस संसार को कल्पित समझकर भयभीत नहीं होता; क्योंकि ये भूत, भविष्य, वर्तमान-- तीनों जगत् प्रतीतिमात्र ही हैं। वे वास्तव में नहीं हैं, इसलिये सत् नहीं है और उनकी प्रतीति होती है, इसलिये उनको सर्वथा असत् भी नहीं कह सकते; अतएव अन्य कल्पनाओं का अभाव ही परमात्मा का यथार्थ ज्ञान है । इस संसार में व्यवहार करने वाले सभी मनुष्यों को अनेक प्रकार की आपदाएँ स्वाभाविक ही प्राप्त हुआ करती हैं। क्योंकि यह जगत्-समूह वैसे ही उत्पन्न होता है, बढ़ता है और विकसित होता है, जैसे समुद्र में बुद्बुदों = का समूह; फिर इस विषय में शोक ही क्या । परमात्मा जो सत्य वस्तु है, वह सदा सत्य ही है और यह दृश्य जो असत्य वस्तु है, वह सदा असत्य ही है; इसलिये ■ मायारूप विकृति के वैचित्र्य से प्रतीयमान इस प्रपञ्च में ऐसी दूसरी कौन वस्तु है, जिसके विषय में शोक किया जाय ! इसलिये असत्यभूत इस संसार में तनिक भी आसक्ति नहीं रखनी चाहिये; क्योंकि जैसे रज्जु से बैल दृढ़ बैंध जाता है, वैसे ही आसक्ति से यह मनुष्य दृढ़ बँध जाता है अतः निष्पाप श्रीराम ! 'यह सब ब्रह्मरूप ही है? इस प्रकार समझकर तुम आसक्तिरहित हुए इस संसार में विचरण करो । मनुष्य को विवेक-बुद्धि से आसक्ति और अनासक्ति का परित्याग करके अनायास ही शास्त्रविहित कर्मो का अनुष्ठान करना चाहिये, शास्त्रनिषिद्ध कर्मों का कभी नहीं । अर्थात् उनकी सर्वथा उपेक्षा कर देनी चाहिये । यह दृश्यमान प्रपश्च केवल प्रतीतिमात्र है, वास्तव में कुछ नहीं है—यों जिस मनुष्य को भलीभाँति अनुभव हो जाता है, वह अपने भीतर परम शान्ति को प्राप्त कर लेता है । अथवा 'मैं और यह सारा प्रपञ्च चैतन्यात्मक परब्रह्मस्वरूप ही है' – इस प्रकार अनुभव करने पर अनर्थकारी यह व्यर्थ जगद्रूपी आडम्बर प्रतीत नहीं होता । श्रीराम ! जो कुछ भी आकाश में या स्वर्ग में या इस संसार में सर्वोत्तम परमात्म-वस्तु है, वह एकमात्र राग-द्वेष आदि के विनाश से ही प्राप्त हो जाती है। किंतु राग-द्वेष आदि दोषों से आक्रान्त हुई बुद्धि के द्वारा जैसा जो कुछ किया जाता है, वह सब कुछ मूढों के लिये तत्काल ही विपरीत रूप ( दुःखरूप ) हो जाता है। जो पुरुष शास्त्रों में निपुण, चतुर एवं बुद्धिमान् होकर भी राग-द्वेष आदि से परिपूर्ण हैं, वे संसार में शृगाल के तुल्य है। उन्हें धिक्कार है । धन, बन्धुवर्ग, मित्र- ये सब बार-बार आते और जाते रहते हैं; इसलिये उनमें बुद्धिमान् पुरुष क्या अनुराग करेगा । कभी नहीं, उत्पत्ति-विनाशशील भोग-पदार्थों से परिपूर्ण संसार की रचनारूप यह परमेश्वर की माया आसक्त पुरुषों को ही अनर्थ गर्तों में ढकेल देती है। राघव ! वास्तव में धन, जन और मन सत्य नहीं हैं, किंतु मिंध्या ही दीख पड़ते हैं। क्योंकि आदि और अन्त में सभी पदार्थ असत् हैं और बीच में भी क्षणिक एवं दुःखप्रद हैं; इसलिये बुद्धिमान् पुरुष आकाश-वृक्ष के सदृश कल्पित इस संसार से कैसे प्रेम करेगा । ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (उन्यासीवां दिन) ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय दशावतार व्रत कथा विधान और फल...(भाग 2) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ महाराज युधिष्ठिर ने कहा- भगवन्! आप अपने दशावतार-व्रत का विधान कहिये। भगवान् श्रीकृष्ण बोले- महाराज ! भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को संयतेन्द्रिय हो नदी आदि में स्नान कर तर्पण सम्पन्न करे तथा घर आकर तीन अञ्जलि धान्य का चूर्ण लेकर घृत में पकाये। इस प्रकार दस वर्षों तक प्रतिवर्ष करे। प्रतिवर्ष क्रमशः पूरी, घेवर, कसार, मोदक, सोहालक, खण्डवेष्टक, कोकरस, अपूप, कर्णवेष्ट तथा खण्डक ये पक्वान्न उस चूर्ण से बनाये और उसे भगवान् को नैवेद्य के रूप में समर्पित करे। प्रत्येक दशहरा को दस गौएँ दस ब्राह्मणों को दे । नैवेद्य का आधा भाग भगवान् के सामने रख दे, चौथाई ब्राह्मण को दे और चौथाई भाग पवित्र जलाशय पर जाकर बाद में स्वयं भी ग्रहण करे। गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि उपचारों से मन्त्रपूर्वक दशावतारों का पूजन करे। भगवान्के दस अवतारों के नाम इस प्रकार हैं? – (१) मत्स्य, (२) कूर्म, (३) वराह, (४) नृसिंह, (५) त्रिविक्रम (वामन), (६) परशुराम, (७) श्रीराम, (८) श्रीकृष्ण, (९) बुद्ध तथा (१०) कल्कि। अनन्तर प्रार्थना करे गतोऽस्मि शरणं देवं हरिं नारायणं प्रभुम् । प्रणतोऽस्मि जगन्नाथं स मे विष्णुः प्रसीदतु ॥ छिनत्तु वैष्णवीं मायां भक्त्या प्रीतो जनार्दनः । श्वेतद्वीपं नयत्वस्मान्मयात्मा विनिवेदितः ॥ (उत्तरपर्व ६३ । २४-२५) 'दस अवतारों को धारण करने वाले सर्वव्यापी, सम्पूर्ण संसार के स्वामी हे नारायण हरि! मैं आपकी शरण में आया हूँ। हे देव! आप मुझपर प्रसन्न हों। जनार्दन! आप भक्तिद्वारा प्रसन्न होते हैं। आप अपनी वैष्णवी माया को निवारित करें, मुझे आप अपने धाम में ले चलें। मैंने अपने को आपके लिये सौंप दिया है।' इस प्रकार जो इस व्रत को करता है, वह भगवान् के अनुग्रह से जन्म-मरण से छुटकारा प्राप्त कर लेता है और सदा विष्णुलोक में निवास करता है। जय श्री राम क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्रीमद्देवीभागवत (चौथा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 8 (भाग 2) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ प्रह्लाद का नैमिषारण्य-गमन... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ व्यासजी कहते हैं- प्रह्लाद नैमिषारण्य में तीर्थ के समुचित कार्यक्रम को पूर्ण कर रहे थे। उन्हें सामने एक वट का वृक्ष दिखायी पड़ा। उस वृक्ष की छाया बहुत दूरतक फैली हुई थी। दानवेश्वर ने वहाँ बहुत-से बाण देखे। वे बाण भिन्न-भिन्न प्रकार से बने हुए थे। उनमें गीध की पाँखें लगी हुई थीं। उन्हें शान पर चढ़ाकर तेज कर दिया गया था। वे अत्यन्त चमक रहे थे। उन बाणों को देखकर प्रह्लाद के मन में विचार उत्पन्न हुआ- जिसके ये बाण हैं, वह व्यक्ति ऋषियों के आश्रम पर इस परम पावन पुण्यतीर्थ में रहकर क्या करेगा ? प्रह्लाद के मन में इस प्रकार की कल्पना अभी शान्त नहीं हुई थी, इतने में ही धर्मनन्दन नर और नारायण सामने दृष्टिगोचर हुए। उन मुनियों ने काले मृग का चर्म धारण कर रखा था। सिर पर बड़ी विशाल जटाएँ सुशोभित हो रही थीं। नर और नारायण के सामने दो चमकीले धनुष पड़े थे। उत्तम चिह्नवाले वे धनुष शार्ङ्ग और आजगव नाम से प्रसिद्ध थे। वैसे ही दो तरकस थे, जिनमें बहुत-से बाण भरे थे। उधर महान् भाग्यशाली धर्मनन्दन नर और नारायण का मन ध्यान में मग्न था। उन ऋषियों को देखकर प्रह्लाद की आँखें क्रोध से लाल हो उठीं। वे ऋषियों को लक्ष्य बनाकर कहने लगे 'तुमलोग यह क्या ढकोसला कर रहे हो ? इसी से तो धर्म धूल में मिल रहा है। ऐसी व्यवस्था तो कभी इस संसार में देखने अथवा सुनने में नहीं आयी। कहाँ तो उत्कट तप करना और कहाँ धनुष हाथ में उठाना। इन दोनों कार्यों का सामंजस्य तो पूर्वयुग में भी नहीं था। ब्राह्मणों के लिये जहाँ तपस्या करने का विधान है, वहाँ उन्हें धनुष रखने की क्या आवश्यकता ? कहाँ तो मस्तक पर जटा धारण करना और कहाँ तरकस रखना – ये दोनों कार्य व्यर्थ आडम्बर सिद्ध कर रहे हैं। तुम दोनों दिव्य पुरुष हो। तुम्हें धर्माचरण ही शोभा देता है।' व्यासजी कहते हैं- भारत! प्रह्लाद के उपर्युक्त वचन सुनकर नारायण ने उत्तर दिया 'दैत्येन्द्र ! हमारे तथा हमारी तपस्या के विषय में तुम क्यों व्यर्थ चिन्तित हो रहे हो ? हम समर्थ हैं – इस बात को जगत् जानता है। युद्ध और तपस्या- दोनों में ही हमारी गति है। तुम इसमें क्या करोगे? इच्छानुसार अपने रास्ते चले जाओ। क्यों इस बकवाद में पड़ते हो ? ब्रह्मतेज बड़ी कठिनता से प्राप्त होता है। सुख की अभिलाषा रखने वाले प्राणियों का कर्तव्य है कि ब्राह्मणों की व्यर्थ चर्चा न छेड़ें।' प्रह्लाद ने कहा- तपस्वियो! तुम्हें व्यर्थ इतना अभिमान हो गया है। मैं दैत्यों का राजा हूँ। मुझपर ही धर्म टिका है। मेरे शासन करते हुए इस पवित्र तीर्थ में इस प्रकार का अधर्मपूर्ण आचरण करना सर्वथा अनुचित है। तपोधन! तुम्हारे पास ऐसी कौन-सी शक्ति है? यदि हो तो उसे अब समरांगण में मुझे दिखाओ। क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ पञ्चम स्कन्ध: अथैकोनविंशोऽध्यायः किम्पुरुष और भारतवर्ष का वर्णन...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीशुक उवाच किम्पुरुषे वर्षे भगवन्तमादिपुरुषं लक्ष्मणाग्रजं सीताभिरामं रामं तच्चरण संनिकर्षाभिरतः परमभागवतो हनुमान् सह किम्पुरुषैरविरतभक्तिरुपास्ते ॥ १॥ आष्टिषेणेन सह गन्धर्वैरनुगीयमानां परमकल्याण भर्तृभगवत्कथां समुपशृणोति स्वयं चेदं गायति ॥ २ ॥ ॐ नमो भगवते उत्तमश्लोकाय नम आर्यलक्षणशीलव्रताय नम उपशिक्षितात्म उपासितलोकाय नमः साधुवादनिकषणाय नमो ब्रह्मण्यदेवाय महापुरुषाय महाराजाय नम इति ॥ ३ ॥ यत्तद्विशुद्धानुभवमात्रमेकं स्वतेजसा ध्वस्तगुणव्यवस्थम् । प्रत्यक् प्रशान्तं सुधियोपलम्भनं ह्यनामरूपं निरहं प्रपद्ये ॥ ४ मर्त्यावतारस्त्विह मर्त्यशिक्षणं रक्षोवधायैव न केवलं विभोः। कुतोऽन्यथा स्याद्रमतः स्व आत्मनः सीताकृतानि व्यसनानीश्वरस्य ॥५ न वै स आत्माऽऽत्मवतां सुहृत्तमः सक्तस्त्रिलोक्यां भगवान् वासुदेवः । न स्त्रीकृतं कश्मलमश्रुवीत न लक्ष्मणं चापि विहातुमर्हति ॥ ६ न जन्म नूनं महतो न सौभगं न वाङ् न बुद्धिर्नाकृतिस्तोषहेतुः । न तैर्यद्विसृष्टानपि नो वनौकस श्चकार सख्ये बत लक्ष्मणाग्रजः ॥ ७ सुरोऽसुरो वाप्यथ वानरो नरः सर्वात्मना यः सुकृतज्ञमुत्तमम् । भजे रामं मनुजाकृतिं हरि य उत्तराननयत्कोसलान्दिवमिति ॥ ८ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ श्रीशुकदेवजी कहते हैं - राजन् ! किम्पुरुषवर्ष में श्रीलक्ष्मणजी के बड़े भाई, आदिपुरुष, सीताहृदयाभिराम भगवान् श्रीराम के चरणों की सन्निधि के रसिक परम भागवत श्रीहनुमानजी अन्य किन्नरों के सहित अविचल भक्तिभाव से उनकी उपासना करते हैं ॥ १ ॥ वहाँ अन्य गन्धर्वो के सहित आष्र्ष्टिषेण उनके स्वामी भगवान् राम की परम कल्याणमयी गुणगाथा गाते रहते हैं। श्रीहनुमान् जी उसे सुनते हैं और स्वयं भी इस मन्त्र का जप करते हुए इस प्रकार उनकी स्तुति कर हैं ॥ २ ॥ 'हम ॐकारस्वरूप पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीराम को नमस्कार करते हैं। आपमें सत्पुरुषों के लक्षण, शील और आचरण विद्यमान हैं; आप बड़े ही संयतचित्त, लोकाराधनतत्पर, साधुता की परीक्षा के लिये कसौटी के समान और अत्यन्त ब्राह्मणभक्त हैं। ऐसे महापुरुष महाराज राम को हमारा पुनः पुनः प्रणाम है' ॥ ३ ॥ 'भगवन् ! आप विशुद्ध बोधस्वरूप, अद्वितीय, अपने स्वरूप के प्रकाश से गुणों के कार्यरूप जाग्रदादि सम्पूर्ण अवस्थाओं का निरास करने वाले, सर्वान्तरात्मा, परम शान्त, शुद्ध बुद्धि से ग्रहण किये जानेयोग्य, नाम-रूप से रहित और अहङ्कारशून्य हैं; मैं आपकी शरण में हूँ ॥ ४ ॥ प्रभो ! आपका मनुष्यावतार केवल राक्षसों के वध के लिये ही नहीं है, इसका मुख्य उद्देश्य तो मनुष्यों को शिक्षा देना है ! अन्यथा, अपने स्वरूप में ही रमण करने वाले साक्षात् जगदात्मा जगदीश्वर को सीताजी के वियोग में इतना दुःख कैसे हो सकता था ॥ ५॥ आप धीर पुरुषों के आत्मा और प्रियतम भगवान् वासुदेव हैं; त्रिलोकी की किसी भी वस्तु में आपकी आसक्ति नहीं है। आप न तो सीताजी के लिये मोह को ही प्राप्त हो सकते हैं और न लक्ष्मणजी का त्याग ही कर सकते हैं ॥ ६ ॥ आपके ये व्यापार केवल लोकशिक्षा के लिये ही हैं। लक्ष्मणाग्रज ! उत्तम कुल में जन्म, सुन्दरता, वाक्चातुरी, बुद्धि और श्रेष्ठ योनि– इनमें से कोई भी गुण आपकी प्रसन्नता का कारण नहीं हो सकता, यह बात दिखाने के लिये ही आपने इन सब गुणों से रहित हम वनवासी वानरों से मित्रता की है ।। ७ ।। देवता, असुर, वानर अथवा मनुष्य — कोई भी हो, उसे सब प्रकार से श्रीरामरूप आपका ही भजन करना चाहिये; क्योंकि आप नररूप में साक्षात् श्रीहरि ही हैं और थोड़े किये को भी बहुत अधिक मानते हैं। आप ऐसे आश्रितवत्सल हैं कि जब स्वयं दिव्यधाम को सिधारे थे, तब समस्त उत्तरकोसल वासियों को भी अपने साथ ही ले गये थे' ॥ ८॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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