Neha Sharma, Haryana
Neha Sharma, Haryana Apr 15, 2021

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸 🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸 🌸🙏*पोस्ट - 176*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸 🌸🙏"अध्याय - 17*🙏🌸 *इस अध्याय में भगवान का प्रकट होकर अदिति को वर देना.... *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! अपने पतिदेव महर्षि कश्यप जी का उपदेश प्राप्त करके अदिति ने बड़ी सावधानी से बारह दिन तक इस व्रत का अनुष्ठान किया। बुद्धि को सारथि बनाकर मन की लगाम से उसने इन्द्रियरूप दुष्ट घोड़ों को अपने वश में कर लिया और एकनिष्ठ बुद्धि से वह पुरुषोत्तम भगवान का चिन्तन करती रही। उसने एकाग्र बुद्धि से अपने मन को सर्वात्मा भगवान वासुदेव में पूर्ण रूप से लगाकर पयोव्रत का अनुष्ठान किया। तब पुरुषोत्तम भगवान उसके सामने प्रकट हुए। *परीक्षित! वे पीताम्बर धारण किये हुए थे, चार भुजाएँ थीं और शंख, चक्र, गदा लिये हुए थे। अपने नेत्रों के सामने भगवान को सहसा प्रकट हुए देख अदिति सादर उठ खड़ी हुई और फिर प्रेम से विह्वल होकर उसने पृथ्वी पर लोटकर उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। फिर उठकर, हाथ जोड़, भगवान की स्तुति करने की चेष्टा की; परन्तु नेत्रों में आनन्द के आँसू उमड़ आये, उससे बोला न गया। सारा शरीर पुलकित हो रहा था, दर्शन के आनन्दोल्लास से उसके अंगों में कम्प होने लगा था, वह चुपचाप खड़ी रही। *परीक्षित! देवी अदिति अपने प्रेमपूर्ण नेत्रों से लक्ष्मीपति, विश्वपति, यज्ञेश्वर-भगवान को इस प्रकार देख रही थी, मानो वह उन्हें पी जायेगी। फिर बड़े प्रेम से, गद्गद वाणी से, धीरे-धीरे उसने भगवान की स्तुति की। *अदिति ने कहा- आप यज्ञ के स्वामी हैं और स्वयं यज्ञ भी आप ही हैं। अच्युत! आपके चरणकमलों का आश्रय लेकर लोग भवसागर से तर जाते हैं। आपके यशकीर्तन का श्रवण भी संसार से तारने वाला है। आपके नामों के श्रवणमात्र से ही कल्याण हो जाता है। आदिपुरुष! जो आपकी शरण में आ जाता है, उसकी सारी विपत्तियों का आप नाश कर देते हैं। भगवन! आप दीनों के स्वामी हैं। आप हमारा कल्याण कीजिये। आप विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के कारण हैं और विश्वरूप भी आप ही हैं। अनन्त होने पर भी स्वच्छन्दता से आप अनेक शक्ति और गुणों को स्वीकार कर लेते हैं। आप सदा अपने स्वरूप में ही स्थित रहते हैं। नित्य-निरन्तर बढ़ते हुए पूर्ण बोध के द्वारा आप हृदय के अन्धकार को नष्ट करते हैं। भगवन! मैं आपको नमस्कार करती हूँ। *प्रभो! अनन्त! जब आप प्रसन्न हो जाते हैं, तब मनुष्यों को ब्रह्मा जी की दीर्घ आयु, उनके ही समान दिव्य शरीर, प्रत्येक अभीष्ट वस्तु, अतुलित धन, स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल, योग की समस्त सिद्धियाँ, अर्थ-धर्म-कामरूप त्रिवर्ग और केवल ज्ञान तक प्राप्त हो जाता है। फिर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना आदि जो छोटी-छोटी कामनाएँ हैं, उनके सम्बन्ध में तो कहना ही क्या है। *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! जब अदिति ने इस प्रकार कमलनयन भगवान की स्तुति की, तब समस्त प्राणियों के हृयद में उनकी गति-विधि जानने वाले भगवान ने यह बात कही। *श्रीभगवान ने कहा- देवताओं की जननी अदिति! तुम्हारी चिरकालीन अभिलाषा को मैं जानता हूँ। शत्रुओं ने तुम्हारे पुत्रों की सम्पत्ति छीन ली है, उन्हें उनके लोक (स्वर्ग) से खदेड़ दिया है। तुम चाहती हो कि युद्ध में तुम्हारे पुत्र उन मतवाले और बली असुरों को जीतकर विजय लक्ष्मी प्राप्त करें, तब तुम उनके साथ भगवान की उपासना करो। *तुम्हारी इच्छा यह भी है कि तुम्हारे इन्द्रादि पुत्र जब शत्रुओं को मार डालें, तब तुम उनकी रोती हुई दुःखी स्त्रियों को अपनी आँखों से देख सको। *अदिति! तुम चाहती हो कि तुम्हारे पुत्र धन और शक्ति से समृद्ध हो जायें, उनकी कीर्ति और ऐश्वर्य उन्हें फिर से प्राप्त हो जायें तथा वे स्वर्ग पर अधिकार जमाकर पूर्ववत विहार करें। परन्तु देवि! वे असुर सेनापति इस समय जीते नहीं जा सकते, ऐसा मेरा निश्चय है; क्योंकि ईश्वर और ब्राह्मण इस समय उनके अनुकूल हैं। इस समय उनके साथ यदि लड़ाई छेड़ी जायेगी, तो उससे सुख मिलने की आशा नहीं है। *फिर भी देवि! तुम्हारे इस व्रत के अनुष्ठान से मैं बहुत प्रसन्न हूँ, इसलिये मुझे इस सम्बन्ध में कोई-न-कोई उपाय सोचना ही पड़ेगा। क्योंकि मेरी आराधना व्यर्थ तो होनी नहीं चाहिये। उससे श्रद्धा के अनुसार फल अवश्य मिलता है। तुमने अपने पुत्रों की रक्षा के लिये ही विधिपूर्वक पयोव्रत से मेरी पूजा एवं स्तुति की है। अतः मैं अंशरूप से कश्यप के वीर्य में प्रवेश करूँगा और तुम्हारा पुत्र बनकर तुम्हारी सन्तान की रक्षा करूँगा। कल्याणी! तुम अपने पति कश्यप में मुझे इसी रूप में स्थित देखो और उन निष्पाप प्रजापति की सेवा करो। देवि! देखो, किसी के पूछने पर भी यह बात दूसरे को मत बतलाना। देवताओं का रहस्य जितना गुप्त रहता है, उतना ही सफल होता है। *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- इतना कहकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये। उस समय अदिति यह जानकर कि स्वयं भगवान् मेरे गर्भ से जन्म लेने, अपनी कृतकृत्यता का अनुभव करने लगी। भला, यह कितनी दुर्लभ बात है! वह बड़े प्रेम से अपने पतिदेव कश्यप की सेवा करने लगी। कश्यप जी सत्यदर्शी थे, उनके नेत्रों से कोई बात छिपी नहीं रहती थी। अपने समाधि-योग से उन्होंने जान लिया कि भगवान का अंश मेरे अंदर प्रविष्ट हो गया है। जैसे वायु काठ में अग्नि का आधान करती है, वैसे ही कश्यप जी ने समाहित चित्त से अपनी तपस्या के द्वारा चिर-संचित वीर्य का अदिति में आधान किया। जब ब्रह्मा जी को यह बात मालूम हुई कि अदिति के गर्भ में तो स्वयं अविनाशी भगवान् आये हैं, तब वे भगवान के रहस्यमय नामों से उनकी स्तुति करने लगे। *ब्रह्मा जी ने कहा- समग्र कीर्ति के आश्रय भगवन! आपकी जय हो। अनन्त शक्तियों के अधिष्ठान! आपके चरणों में नमस्कार है। ब्रह्मण्यदेव! त्रिगुणों के नियामक! आपके चरणों में मेरे बार-बार प्रणाम हैं। *पृश्नि के पुत्ररूप में उत्पन्न होने वाले! वेदों के समस्त ज्ञान को अपने अंदर रखने वाले प्रभो! वास्तव में आप ही सबके विधाता हैं। आपको मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ। ये तीनों लोक आपकी नाभि में स्थित हैं। तीनों लोकों से परे वैकुण्ठ में आप निवास करते हैं। जीवों के अन्तःकरण में आप सर्वदा विराजमान रहते हैं। ऐसे सर्वव्यापक विष्णु को मैं नमस्कार करता हूँ। *प्रभो! आप ही संसार के आदि, अन्त और इसलिये मध्य भी हैं। यही कारण है कि वेद अनन्त शक्तिपुरुष के रूप में आपका वर्णन करते हैं। जैसे गहरा स्रोत अपने भीतर पड़े हुए तिनके को बहा ले जाता है, वैसे ही आप कालरूप से संसार का धाराप्रवाह संचालन करते रहते हैं। आप चराचर प्रजा और प्रजापतियों को भी उत्पन्न करने वाले मूल कारण हैं। देवाधिदेव! जैसे जल में डूबते हुए के लिये नौका ही सहारा है, वैसे ही स्वर्ग से भगाये हुए देवताओं के लिये एकमात्र आप ही आश्रय हैं। ~~~०~~~ *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि" 🌸🌸🙏🌸🌸 ********************************************

🌸*॥हरि ॐ तत्सत्॥*🌸🙏🌸*श्रीमद्भागवत-कथा*🌸
             🌸🙏*श्रीमद्भागवत-महापुराण*🙏🌸
 🌸🙏*पोस्ट - 176*🌸🙏🌸*स्कन्ध - 08*🙏🌸
                    🌸🙏"अध्याय - 17*🙏🌸
*इस अध्याय में भगवान का प्रकट होकर अदिति को वर देना....

          *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! अपने पतिदेव महर्षि कश्यप जी का उपदेश प्राप्त करके अदिति ने बड़ी सावधानी से बारह दिन तक इस व्रत का अनुष्ठान किया। बुद्धि को सारथि बनाकर मन की लगाम से उसने इन्द्रियरूप दुष्ट घोड़ों को अपने वश में कर लिया और एकनिष्ठ बुद्धि से वह पुरुषोत्तम भगवान का चिन्तन करती रही। उसने एकाग्र बुद्धि से अपने मन को सर्वात्मा भगवान वासुदेव में पूर्ण रूप से लगाकर पयोव्रत का अनुष्ठान किया। तब पुरुषोत्तम भगवान उसके सामने प्रकट हुए। 
          *परीक्षित! वे पीताम्बर धारण किये हुए थे, चार भुजाएँ थीं और शंख, चक्र, गदा लिये हुए थे। अपने नेत्रों के सामने भगवान को सहसा प्रकट हुए देख अदिति सादर उठ खड़ी हुई और फिर प्रेम से विह्वल होकर उसने पृथ्वी पर लोटकर उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। फिर उठकर, हाथ जोड़, भगवान की स्तुति करने की चेष्टा की; परन्तु नेत्रों में आनन्द के आँसू उमड़ आये, उससे बोला न गया। सारा शरीर पुलकित हो रहा था, दर्शन के आनन्दोल्लास से उसके अंगों में कम्प होने लगा था, वह चुपचाप खड़ी रही। 
          *परीक्षित! देवी अदिति अपने प्रेमपूर्ण नेत्रों से लक्ष्मीपति, विश्वपति, यज्ञेश्वर-भगवान को इस प्रकार देख रही थी, मानो वह उन्हें पी जायेगी। फिर बड़े प्रेम से, गद्गद वाणी से, धीरे-धीरे उसने भगवान की स्तुति की। 
          *अदिति ने कहा- आप यज्ञ के स्वामी हैं और स्वयं यज्ञ भी आप ही हैं। अच्युत! आपके चरणकमलों का आश्रय लेकर लोग भवसागर से तर जाते हैं। आपके यशकीर्तन का श्रवण भी संसार से तारने वाला है। आपके नामों के श्रवणमात्र से ही कल्याण हो जाता है। आदिपुरुष! जो आपकी शरण में आ जाता है, उसकी सारी विपत्तियों का आप नाश कर देते हैं। भगवन! आप दीनों के स्वामी हैं। आप हमारा कल्याण कीजिये। आप विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के कारण हैं और विश्वरूप भी आप ही हैं। अनन्त होने पर भी स्वच्छन्दता से आप अनेक शक्ति और गुणों को स्वीकार कर लेते हैं। आप सदा अपने स्वरूप में ही स्थित रहते हैं। नित्य-निरन्तर बढ़ते हुए पूर्ण बोध के द्वारा आप हृदय के अन्धकार को नष्ट करते हैं। भगवन! मैं आपको नमस्कार करती हूँ। 
          *प्रभो! अनन्त! जब आप प्रसन्न हो जाते हैं, तब मनुष्यों को ब्रह्मा जी की दीर्घ आयु, उनके ही समान दिव्य शरीर, प्रत्येक अभीष्ट वस्तु, अतुलित धन, स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल, योग की समस्त सिद्धियाँ, अर्थ-धर्म-कामरूप त्रिवर्ग और केवल ज्ञान तक प्राप्त हो जाता है। फिर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना आदि जो छोटी-छोटी कामनाएँ हैं, उनके सम्बन्ध में तो कहना ही क्या है। 
          *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- परीक्षित! जब अदिति ने इस प्रकार कमलनयन भगवान की स्तुति की, तब समस्त प्राणियों के हृयद में उनकी गति-विधि जानने वाले भगवान ने यह बात कही। 
          *श्रीभगवान ने कहा- देवताओं की जननी अदिति! तुम्हारी चिरकालीन अभिलाषा को मैं जानता हूँ। शत्रुओं ने तुम्हारे पुत्रों की सम्पत्ति छीन ली है, उन्हें उनके लोक (स्वर्ग) से खदेड़ दिया है। तुम चाहती हो कि युद्ध में तुम्हारे पुत्र उन मतवाले और बली असुरों को जीतकर विजय लक्ष्मी प्राप्त करें, तब तुम उनके साथ भगवान की उपासना करो।
          *तुम्हारी इच्छा यह भी है कि तुम्हारे इन्द्रादि पुत्र जब शत्रुओं को मार डालें, तब तुम उनकी रोती हुई दुःखी स्त्रियों को अपनी आँखों से देख सको। 
          *अदिति! तुम चाहती हो कि तुम्हारे पुत्र धन और शक्ति से समृद्ध हो जायें, उनकी कीर्ति और ऐश्वर्य उन्हें फिर से प्राप्त हो जायें तथा वे स्वर्ग पर अधिकार जमाकर पूर्ववत विहार करें। परन्तु देवि! वे असुर सेनापति इस समय जीते नहीं जा सकते, ऐसा मेरा निश्चय है; क्योंकि ईश्वर और ब्राह्मण इस समय उनके अनुकूल हैं। इस समय उनके साथ यदि लड़ाई छेड़ी जायेगी, तो उससे सुख मिलने की आशा नहीं है। 
          *फिर भी देवि! तुम्हारे इस व्रत के अनुष्ठान से मैं बहुत प्रसन्न हूँ, इसलिये मुझे इस सम्बन्ध में कोई-न-कोई उपाय सोचना ही पड़ेगा। क्योंकि मेरी आराधना व्यर्थ तो होनी नहीं चाहिये। उससे श्रद्धा के अनुसार फल अवश्य मिलता है। तुमने अपने पुत्रों की रक्षा के लिये ही विधिपूर्वक पयोव्रत से मेरी पूजा एवं स्तुति की है। अतः मैं अंशरूप से कश्यप के वीर्य में प्रवेश करूँगा और तुम्हारा पुत्र बनकर तुम्हारी सन्तान की रक्षा करूँगा। कल्याणी! तुम अपने पति कश्यप में मुझे इसी रूप में स्थित देखो और उन निष्पाप प्रजापति की सेवा करो। देवि! देखो, किसी के पूछने पर भी यह बात दूसरे को मत बतलाना। देवताओं का रहस्य जितना गुप्त रहता है, उतना ही सफल होता है। 
          *श्रीशुकदेव जी कहते हैं- इतना कहकर भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये। उस समय अदिति यह जानकर कि स्वयं भगवान् मेरे गर्भ से जन्म लेने, अपनी कृतकृत्यता का अनुभव करने लगी। भला, यह कितनी दुर्लभ बात है! वह बड़े प्रेम से अपने पतिदेव कश्यप की सेवा करने लगी। कश्यप जी सत्यदर्शी थे, उनके नेत्रों से कोई बात छिपी नहीं रहती थी। अपने समाधि-योग से उन्होंने जान लिया कि भगवान का अंश मेरे अंदर प्रविष्ट हो गया है। जैसे वायु काठ में अग्नि का आधान करती है, वैसे ही कश्यप जी ने समाहित चित्त से अपनी तपस्या के द्वारा चिर-संचित वीर्य का अदिति में आधान किया। जब ब्रह्मा जी को यह बात मालूम हुई कि अदिति के गर्भ में तो स्वयं अविनाशी भगवान् आये हैं, तब वे भगवान के रहस्यमय नामों से उनकी स्तुति करने लगे। 
          *ब्रह्मा जी ने कहा- समग्र कीर्ति के आश्रय भगवन! आपकी जय हो। अनन्त शक्तियों के अधिष्ठान! आपके चरणों में नमस्कार है। ब्रह्मण्यदेव! त्रिगुणों के नियामक! आपके चरणों में मेरे बार-बार प्रणाम हैं। 
          *पृश्नि के पुत्ररूप में उत्पन्न होने वाले! वेदों के समस्त ज्ञान को अपने अंदर रखने वाले प्रभो! वास्तव में आप ही सबके विधाता हैं। आपको मैं बार-बार नमस्कार करता हूँ। ये तीनों लोक आपकी नाभि में स्थित हैं। तीनों लोकों से परे वैकुण्ठ में आप निवास करते हैं। जीवों के अन्तःकरण में आप सर्वदा विराजमान रहते हैं। ऐसे सर्वव्यापक विष्णु को मैं नमस्कार करता हूँ। 
          *प्रभो! आप ही संसार के आदि, अन्त और इसलिये मध्य भी हैं। यही कारण है कि वेद अनन्त शक्तिपुरुष के रूप में आपका वर्णन करते हैं। जैसे गहरा स्रोत अपने भीतर पड़े हुए तिनके को बहा ले जाता है, वैसे ही आप कालरूप से संसार का धाराप्रवाह संचालन करते रहते हैं। आप चराचर प्रजा और प्रजापतियों को भी उत्पन्न करने वाले मूल कारण हैं। देवाधिदेव! जैसे जल में डूबते हुए के लिये नौका ही सहारा है, वैसे ही स्वर्ग से भगाये हुए देवताओं के लिये एकमात्र आप ही आश्रय हैं।
                             ~~~०~~~
                   *श्रीकृष्ण  गोविन्द  हरे मुरारे।
                   *हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥
                           "जय जय श्री हरि"
                           🌸🌸🙏🌸🌸
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कामेंट्स

GOVIND CHOUHAN Apr 15, 2021
Jai Shree Radhe Radhe Jiii 🌹 Jai Shree Radhe Krishna Jiii 🌹 Subh Sandhiya Vandan Pranaam Jiii Didi 👏👏👏👏👏

Kamlesh Apr 15, 2021
जय श्री राधे राधे 🙏🙏

जितेन्द्र दुबे Apr 15, 2021
🚩🌹🥀जय श्री मंगलमूर्ति गणेशाय नमः 🌺🌹💐🚩🌹🌺 शुभ रात्रि वंदन🌺🌹 राम राम जी 🌺🚩🌹मंदिर के सभी भाई बहनों को राम राम जी परब्रह्म परमात्मा आप सभी की मनोकामना पूर्ण करें 🙏 🚩🔱🚩प्रभु भक्तो को सादर प्रणाम 🙏 🚩🔱 🕉️ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ओम नमो नारायण हरि ऊँ तत्सत परब्रह्म परमात्मा नमः ॐ या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता नमस्तस्ए नमस्तस्ए नमस्तस्ए नमो नमःऊँ माँ ब्रम्हचारिणी नमः🌺🚩 ऊँ उमामहेश्वराभ्यां नमः🌺 ऊँ राम रामाय नमः 🌻🌹ऊँ सीतारामचंद्राय नमः🌹 ॐ राम रामाय नमः🌹🌺🌹 ॐ हं हनुमते नमः 🌻ॐ हं हनुमते नमः🌹🥀🌻🌺🌹ॐ शं शनिश्चराय नमः 🚩🌹🚩ऊँ नमः शिवाय 🚩🌻 जय श्री राधे कृष्णा जी🌹 श्री जगत पिता परम परमात्मा श्री हरि विष्णु जी माता लक्ष्मी माता चंद्रघंटा की कृपा दृष्टि आप सभी पर हमेशा बनी रहे 🌹 आप का हर पल मंगलमय हो 🚩जय श्री राम 🚩🌺हर हर महादेव🚩राम राम जी 🥀शुभ रात्रि स्नेह वंदन💐शुभ गुरुवार🌺 हर हर महादेव 🔱🚩🔱🚩🔱🚩🔱🚩 जय माता दी जय श्री राम 🚩 🚩हर हर नर्मदे हर हर नर्मदे 🌺🙏🌻🙏🌻🥀🌹🚩🚩🚩

Ranveer soni Apr 15, 2021
🌹🌹जय श्री कृष्णा🌹🌹

madan pal 🌷🙏🏼 Apr 15, 2021
जय श्री राधे कृष्णा जी शूभ प्रभात वंदन जी आपका हर पल शूभ मंगल हों जी 👌🏼👌🏼🌹🌹🌹🌷🌷🌷👏👏👏

Yogi Kashyap May 13, 2021

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Renu Singh May 13, 2021

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muskan May 13, 2021

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Mohinder Dhingra May 13, 2021

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Jai Mata Di May 12, 2021

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