🕉️शारदीयनवरात्र🕉️की🕉️🕉️ शुभकामनाएं 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️।

🕉️शारदीयनवरात्र🕉️की🕉️🕉️ शुभकामनाएं 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️।

#नवरात्रि

🕉️शारदीयनवरात्र🕉️की🕉️🕉️ शुभकामनाएं 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️


नवरात्रि पूजन के पहले दिन मां🕉️ दुर्गा के पहले स्वरूप माता शैलपुत्री का पूजन किया जाता है। ये ही🕉️ नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वत राज🕉️ हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के🕉️ कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा।🕉️🕉️🕉️🕉️
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नंदी नामक वृषभ पर सवार🕉️🕉️ ‘शैलपुत्री’ के दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है। इन्हें समस्त वन्य जीव-जंतुओं की रक्षक माना जाता है। दुर्गम🕉️ स्थलों पर स्थित बस्तियों में सबसे पहले शैलपुत्री के मंदिर की🕉️🕉️ स्थापना🕉️ इसीलिए की जाती है कि वह स्थान सुरक्षित रह सके।🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️
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अपने पूर्वजन्म में ये प्रजापति दक्ष के घर की🕉️ कन्या के रूप में🕉️ उत्पन्न हुईं थीं। तब इनका नाम🕉️ ‘सती’ था और इनका विवाह🕉️🕉️ भगवान शंकरजी से हुआ था। एक बार प्रजापति दक्ष ने बहुत बड़ा यज्ञ किया जिसमें उन्होंने सारे देवताओं को🕉️ अपना- अपना यज्ञ- भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया। किन्तु दक्ष ने शंकरजी को इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यन्त विशाल यज्ञ का🕉️ अनुष्ठान🕉️🕉️ कर रहे हैं तो वहां जाने के लिए🕉️ उनका मन व्याकुल हो उठा। अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को🕉️ बताई।🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️
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सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा – प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं। अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को🕉️🕉️ आमंत्रित किया है। उनके यज्ञ- भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु🕉️ जान- बूझकर हमें नहीं बुलाया है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहां जाना किसी भी प्रकार श्रेयस्कर नहीं🕉️ होगा।🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️
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शंकरजी के इस उपदेश से सती को कोई बोध नहीं हुआ और पिता का यज्ञ देखने, माता- बहनों से मिलने की इनकी व्यग्रता किसी भी प्रकार कम न हुई। उनका प्रबल आग्रह🕉️ देखकर अंतत: शंकरजी ने उन्हें🕉️ वहां जाने की अनुमति दे ही दी।🕉️
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सती ने पिता के घर पहुंचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बात नहीं कर रहा है। सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं। केवल सती की माता ने स्नेह से उन्हें गले🕉️🕉️ लगाया।🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️
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बहनों की बातों में व्यंग्य और🕉️ उपहास के भाव भरे हुए थे।🕉️🕉️ परिजनों के इस व्यवहार से सती के मन को बहुत क्लेश पहुँचा। सती ने जब देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकर जी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है और दक्ष ने भी उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन कहे।🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️
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यह सब देखकर सती का ब्रदय🕉️ क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा और उन्होंने सोचा भगवान शंकर जी की बात न मान, यहां🕉️ आकर मैने बहुत बड़ी भूल की है। सती अपने पति भगवान शंकर जी का अपमान न सह सकीं और उन्होंने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगग्नि द्वारा भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दु:खद समाचार को सुनकर शंकरजी ने अतिक्रुद्ध होकर अपने गणों को भेजकर दक्ष के यज्ञ का पूर्णतया: विध्वंस करा दिया।🕉️🕉️🕉️🕉️
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सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में🕉️🕉️ शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वे🕉️🕉️ “शैलपुत्री” नाम से विख्यात हुईं।🕉️
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पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं। उपनिषद की कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व- भंजन किया था।🕉️🕉️ “शेलपुत्री” देवी का विवाह भी🕉️ शंकरजी से ही हुआ। पूर्वजन्म की ही भांति वे इस बार भी शिवजी की ही अर्धांगिनी बनीं। नवदुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री दुर्गा का महत्व और शक्तियाँ अनंत हैं।🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️
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उपासना मंत्र : वन्दे वांछितलाभाय चन्दार्धकृतशेखराम्।🕉️🕉️🕉️🕉️
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वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्।🕉️🕉️🕉️

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कामेंट्स

Virendra Bhati Sep 21, 2017
अति सुन्दर जय माता दी

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